Thursday, June 4, 2009

समाज का वैचारिक रूप से असमंजस में रहना ठीक नहीं-आलेख

एक नहीं ऐसी सौ घटनायें भी हों तो उसे पूरे समाज से जोड़ना अज्ञान और संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण होगी। एक लड़की के द्वारा अपने प्रेमी से मिलकर मां की हत्या की वह घटना अगर दिल्ली में नहीं होती तो शायद इतना चर्चा का विषय नहीं बनती। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिनकी चर्चा अनेक बार अखबारों में छप चुकी है। वैसे भी यह देश इतना विविधताओं से भरा पड़ा है कि किसी एक घटना को पूरे समाज से देखना अपने आप में संकीर्णता का परिचायक है। हमारे देश के बड़े शहरों और छोटे शहरों के समाजों में बहुत बड़ा अंतर है पर खबरें देने और उनके विश्लेषण करने वाले हमेशा बड़े शहरों को लेकर ही बहस करते हैं शायद इसलिये ही छोटे शहरों की खबरें उनके लिये चर्चा का विषय नहीं बनती।
एक समय कहा जाता था कि भारत का असली समाज तो गांवों में बसता है और इस बात ने समाज विज्ञानियों को इतना बेफिक्र कर दिया कि वह छोटे शहरों, गांवों और कसबों के समाज की आम गतिविधियों के सहारे अपनी संस्कृति और संस्कार बचने की चिंता से मुक्त होकर केवल बड़े शहरों के विषयों पर बहस करते रहे और उन्हें शायद इस बात का आभास नहीं है कि पाश्चात्य सुविधाओं के उपयोग तथा संचार माध्यमों की पहुंच ने भारतीय संस्कृति की जड़े पूरी तरह से खोद दी हैं। यहां यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि अंदर से खोखले होते जा रहे समाज मेें बेटी द्वारा अपने प्रेमी से मिलकर अपने ही परिवार पर आक्रमण करने की घटना भले ही पूरे देश के समूचे लोगों से जोड़ना ठीक नहीं हो पर उसे अब एक सहज अपराध माने लगा है जो कि एक चिंता का विषय है।
आखिर मुश्किल कहां है? समाज को पूरी तरह खुला रखना है या शर्तों पर उसे आजादी देना है-यह बात देश के विद्वान अभी तक तय नहीं कर पाये। एक तरफ उनको अपनी संस्कृति और संस्कार को अक्षुण्ण बनाये रखने की चिंता होती है और दूसरी तरफ औरतों की आजादी पश्चिम के समक्ष बनाये रखने का अभियान भी जारी रखना चाहते हैं। उनका यही असमंजस समाज का संकट बन रहा है। समाज में माता पिता अपनी बेटियों को आजाद दिखाकर अपने को आधुनिक तो साबित करना चाहते हैं पर उसके साथ ऊंच नीच होने पर बदनामी का कथित भय भी उनको सताता है। उनका यह असमंजस अनेक घरों में हिंसक परिणति का रूप लेता है-इससे अधिक संख्या उन घरों की है जहां मामला दबा रहता है या फिर समय के साथ ठंडा पड़ जाता है।
दहेज प्रथा का प्रकोप उससे अधिक है जितना दिखाई देता है। सभ्रांत समाज केवल दहेज ले-देकर संतुष्ट नहीं होता बल्कि वह विवाह कार्यक्रम का उपयोग अपनी शक्ति दिखाने के लिये अधिक व्यय के साथ करता है। शादियों में शराब पीना अब शान हो गयी है जोकि कभी नफरत का प्रतीक थी। इस देश में कई ऐसे लोग अब भी मिल जायेंगे जिन्होंने केवल फिल्म की आदत होने पर किसी लड़के को लड़की के अयोग्य मान लेने की प्रवृत्ति समाज में देखी होगी। शराबी के बेटे-बेटी के साथ भी लोग रिश्ता नहीं करना चाहते थे।
मगर अब क्या हुआ? हमारा जो वर्तमान समाज है उसके नियम निर्माताओं पर औरत को गुलाम बनाये रखने का आरोप लगता है। हो सकता है यह सही हो पर सच बात तो यह है कि उनकी नीयत औरत को गुलाम बनाये रखने की बजाय उसको दैहिक और आर्थिक रूप से सुरक्षित रखने की थी। समय के साथ ऐसा लगता हो कि वह संकीर्ण विचारों के जनक हों पर उस पर बहस किये बिना केवल नारों के आधार पर ही उन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता है।
कुछ पुराने विद्वान यह कहते हैं कि ‘बेटी की कमाई नहीं खाना चाहिए।’
वर्तमान में अनेक लोग इस दकियानूसी विचार कहेंगे मगर ऐसे लोगों ने इस समाज की प्रवृत्ति को नहीं समझा। लड़कियां नौकरियां करती हैं। अनेक लड़के भी नौकरीशुदा लड़कियां जीवनसंगिनी के रूप में चाहते हैं। कितनी सुखद कल्पना लगती है न देश की! मगर ऐसी अनेक लड़कियां हैं जिनको ससुराल में विवाह के बाद केवल इस आधार पर प्रताड़ना मिलती है कि विवाह के पूर्व उन्होंने जो कमाया वह कहां गया?
उस समय लड़की को यह कहकर सास, ननद, और पति ताने देते हैं कि ‘इसका बाप कन्या की कमाई खा गया।’
ऐसा कहने वाली सास या ननद अगर अनपढ़ हो तो मान लें कि ठीक है पर अगर वह पढ़ी लिख हो तो क्या कहेंगे?
आजकल सभ्रांत वर्ग ऐसी जगह बेटियों की शादी करना चाहता है जहां काम करने वाली नौकरानियां हों-यहां तक कि बेटी को खाना भी न बनाना पड़े। कहा जाता है कि खाना बनाना ही औरत की सबसे बड़ी उपलब्धि है जिससे वह पूरे परिवार पर नियंत्रण करती है-अगर नारी स्वातंत्र्य समर्थक इसे पुरातनपंथी माने तो चलेगा-मगर उसी हथियार के बिना औरत का अपने पति और ससुराल पर नियंत्रण कैसे होगा? यह कौन बता सकता है? स्थिति यह है कि नारी स्वातंत्र्य समर्थक नारियां भी कई बार ऐसी बातें कहती हैं जिससे लगता है कि घर का काम नारी द्वारा किया जाना उसकी गुलामी का प्रतीक है। अब सवाल यह है कि क्या पुरुष घर का काम करने लगे तभी नारी की आजादी का अभियान पूरा माना जायेगा क्या? एक बात तय है कि खाना तो बनेगा क्योंकि उसके बिना परिवार का चलना कठिन है। नारी स्वातंत्र्य समर्थकों को उसकी आजादी की बात तो दिखाई देता है पर खाना बनाना, कपड़े धोना, बच्चे पालना, और सफाई आदि के काम करने की जिम्मेदारी नहीं दिखती जो कि पश्चिमी विचाराधारा के अनुसार आर्थिक दृष्टि से अधिक महंगे हैं। एक अमेरिकी अर्थशास्त्री के अनुसार अगर मुद्रा में भारत की घरेलू स्त्रियों द्वारा किये गये कार्यों का आंकलन किया जाये तो वह पुरुषों से अधिक कमाती हैं। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि जो स्त्रियां बाहर कमा रही हैं-चंद समृद्ध और उच्च पदस्थ महिलाओं की बात यहां छोड़ देते हैं जो सामान्य नौकरी वाली औरतों से गुणात्मक रूप से अधिक आय अर्जित करती हैं-वह अपने आसपास की घरेलू महिलाओं के मुकाबले प्रत्यक्ष रूप से धन कमाने की वजह से श्रेष्ठ दिख सकती हैं पर जहां तक वास्तविक कमाई का प्रश्न है तो वह पीछे हैं।
तात्पर्य यह है कि हमारा समाज असमंजस में पड़ा है। न तो वह खुलकर पाश्चात्य संस्कृति की तरफ जा रहा है और न पूरी तरह अपने संस्कार छोड़ पा रहा है। हमारा मानना यह है कि जिन लोगों को पाश्चात्य सभ्यता अपनाना है तब उनको इस बात की परवाह नहीं करना चाहिए कि समाज क्या कहेगा? जिनको अपनी संस्कृति अपनानी होगा उनको पूरी तरह से नहीं तो आंशिक रूप से पाश्चात्य संस्कृति से परे रहना होगा -अधिक से अधिक वह पहनावे तक ही सीमित रहें पर वैलंटाईन डे, शुभेच्छु दिवस, प्रेम दिवस तथा अन्य ऐसे त्यौहारों से परे रहे जो कामनायें बढ़ाने के लिये प्रेरित करें। इस मामलें में कानून की भी समीक्षा करनी होगी जिससे कि पाश्चात्य संस्कृति अपनाने वालों के लिये कोई बाधा न खड़ी हो। समाज का इस तरह विचारों की दृष्टि से असमंजस में पड़े रहना ठीक नहीं है।
........................................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, May 28, 2009

सात पुश्तों के लिये रोटी का जुगाड़-व्यंग्य कविता (sat pidhiyon ke roti-hindi hasya vyangya kavita)


वादे और इरादे
बाजार में बिक जाते हैं
सच देखने तक भला
कितने लोग जिंदा रह पाते हैं।

धरती पर बने जुहन्नम में जीते लोग
जन्नत की ख्वाहिश में
अपनी जिंदगी घिसते चले जाते हैं
वहां जगह मिली कि नहीं
भला मुर्दे कभी बताने आते हैं।

गरीबी मिटाने
भूख भगाने और
सम्मान दिलाने के वादे
करते रहो
ना शब्द से करना परहेज
बस हां कहो
समझदार इसलिये वही कहलाते
जो भले ही एक टुकड़ागुड़ का न दें
बात और वादे तो गुड़ जैसे जरूर करते
सात पुश्तों के लिये
रोटी का जुगाड़ इसी तरह किये जाते हैं।

.......................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, May 24, 2009

ब्लाग जब्त होना चिंता की बात नहीं-आलेख

दूसरे का मामला हो तो दिलचस्प हो जाता है पर जब स्वयं उससे जुड़े हों तो चिंताजनक लगता है। यही इस लेखक के साथ भी हुआ जब गुगल ने दो ब्लाग अमृत संदेश पत्रिका और सिंधु पत्रिका को डेशबोर्ड से हटा दिया। दो ब्लाग हटा दिये या किसी तकनीकी गड़बड़े मे फंस गये यह एक अलग विषय था। चिंता थी तो इस बात की ब्लाग स्पाट के अन्य ब्लाग भी कभी इस तरह के संकट में फंस सकते हैं। ब्लाग स्पाट के ब्लाग दिखने में आकर्षक हैं पर उनमें ऐसा कुछ नहीं है जिसकी चिंता की जाये। गूगल भी एक बहुत बहुत बड़ा संगठन है पर उसके सहारे ही अंतर्जाल पर लेखन यात्रा चलेगी यह जरूरी नहीं है, मगर उसके दो ब्लाग पर ढाई सौ पाठ हों और वह उसे जब्त कर ले तो उसे बर्दाश्त भी तो नहीं किया जा सकता।

अगर गूगल कोई आदमी होता तो हम उससे कहने कि‘यार, किसी बात पर नाराज है तो अपने ब्लाग ले जा हमारे पाठ तो फैंक जा! हमने वह कितनी मेहनत से लिखें हैं। हम उनको जाकर वर्डप्रेस की अलमारी में सजायेंगे।’

मगर अंतर्जाल पर आदमी सारा खेल कीबोर्ड पर ही करता है और उससे संपर्क करना कठिन काम है। कहने को गूगल एक संगठन हैं पर काम तो आदमी ही करते हैं। सो किस आदमी ने इस लेखक के दो ब्लाग उड़ा दिये उसकी तलाश करना जरूरी था पर वह एक ही था यह कहना भी कठिन है।
कल अपना पाठ लिखते हुए लेखक ने इस बात की सावधानी बरती थी कि कोई आक्षेप किसी पर न लगायें क्योंकि इन दो ब्लाग को लेकर ही हमें कुछ संदेह थे और लग रहा था कि कोई ऐसा कारण जरूर है कि यह फंसने ही थे। यह फंसे हमारी लापरवाही और सुस्ती से।
इसे भाग्य भी कह सकते हैं कि कोई अदृश्य शक्ति है जो काम करती है वरना इस लेखक के सारे ब्लाग गूगल के कैदखाने में होते-यह कहना कठिन है कि वर्डप्रेस के ब्लाग वह पकड़ पाता की नहीं। शिकायत तो इस बात की है कि उसने ऐसा करने में डेढ़ साल क्यों लिया? उसने वह वेबसाईट एक वर्ष पूर्व अपने सर्च इंजिन से कैसे निकलने दी जिसे आज वह खराब बता रहा है।

शायद दिसंबर 2007 की बात होगी। लेखक इस ब प्रयास में था कि ब्लाग स्पाट पर आने वाले पाठकों की संख्या कैसे पता लगे। हिंदी के एक ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरम से बाहर के पाठकों की संख्या का अनुमान नहीं हो पाता था। उस पर एक आलेख लिखा गया। आलेख के प्रकाशन के एक माह बाद एक मासूम ब्लाग लेखक ने अपनी टिप्पणी में एक वेबसाईट का पता दिया जिसका नाम था‘गुड कांउटर’। उस ब्लाग लेखक के लिये मासूम शब्द मजाक में नहीं लिखा। वह अतिसक्रिय ब्लाग लेखक है और गाहे बगाहे किसी निराश और परेशान ब्लाग लेखक का मार्गदर्शन करने पहुंच ही जाता है। कभी कभी गंभीर पाठ पर ऐसे सवाल भी उठा देता है जिसका जवाब देते नहीं बनता या देने के लिये एक अन्य पाठ लिखने का मन नहीं करता।
उसकी टिप्पणी से ही उस वेबसाईट का पता लिया और उस समय अपने ब्लाग स्पाट के सभी आठ ब्लाग पर गुड कांउटर लगा दिया। उसकी सूचनायें लुभावनी लगी और उससे यह पता लगता था कि किस शहर से कब ब्लाग देखा गया। उसके आकर्षण की वजह से उसे वर्डप्रेस पर भी लगाया। लगभग उसी समय किसी अन्य ब्लाग लेखक ने स्टेट काउंटर का पता अपने पाठ पर लगाया और चिट्ठकारों की चर्चा में भी उसका नाम आया। इस लेखक ने उसे भी अपने एक दो ब्लाग पर लगाया। कोई गड़बड़ी नहीं थी पर गुड कांउटर के पीछे दूसरा सच भी था जो बाद में दिखाई दिया। अगर कोई पाठक वहां क्लिक करे तो उसे घोड़ों की रेस पर दांव लगाने का अवसर मिल सकता था। यह देखकर ं थोड़ी परेशानी हुई। यह जुआ देखना पसंद नहीं था। पाठकों की जानकारी की वजह से उसे लगाया था पर फिर उसे हटा दिया क्योंकि उसकी जगह स्टेट कांउटर भी अच्छा काम रहा था। उसमें कोई गड़बड़झाला नहीं था। फिर एक एक कर गुड कांउटर सभी जगह से हटा दिया मगर जो ब्लाग जब्त हुए हैं वह इतने सक्रिय नहीं थे इसलिये वहां से हटाने की तरफ ध्यान नहीं गया।
बाद में उन ब्लाग का पता बदलकर उसे सक्रिय किया। पाठक संख्या कोई अधिक नहीं थी इसलिये कोई चिंता वाली बात नहीं थी। एक दो बार गुड काउंटर पर नजर गयी पर यह सोचकर कि अभी हटाते हैं पर नहीं हटाया। वैसे भी चूंकि उनका पता बदला गया था इसलिये वह निष्क्रिय लगता था।
मुख्यधारा में लाने से पूर्व भी ब्लाग पर कोई पाठक नहीं आता था यह बात स्टेट कांउटर से पता लगती थी। गुड कांउटर से तो कभी देखने का प्रयास भी नहीं किया। जब्त होने के तीन चार दिन पहले वहां चार पांच ऐसे पाठकों की आवक देखी गयी जो ब्लाग के पते से उसे खोलते थे। हो सकता है कोई एक पाठक रहा हो। बहरहाल कोई अधिक आवक नहीं थी। सिंधु पत्रिका पर अंतिम दिन नौ पाठ पढ़े गये और उसमें कोई भी उसका पता लगाकर ढूंढता हुआ नहीं आया।
हिंदी के पाठक तो वैसे भी कम हैं और ब्लाग स्पाट पर तो और भी कम है। वैसे इन ब्लाग पर पिछले तीन दिनों में अमेरिका से पाठक संख्या अधिक थी और शक यही है कि उस वेबसाईट को वहीं के कुछ लोग देख रहे होंगे। अंतर्जाल पर एक समस्या यह है कि आप अगर किसी वेबसाईट को लिंक करते हैं और अगर उसे कहीं सर्च किया जाये तो आपका ब्लाग भी वहां चला जायेगा। ऐसा लगता है कि गुड कांउटर को ढूंढ रहे किसी एक या दो आदमी को इस लेखक के एक या दोनों ही ब्लाग हाथ लग गये होंगे। उन्होंने सोचा होगा कि हमें इससे क्या मतलब कि ब्लाग किस भाषा में है मतलब तो गुड कांउटर से घुडदौड़ के समाचार देखने से है-यह कहना कठिन है कि उस पर आन लाईन सट्टा भी हो सकता था या नहीं क्योंकि उसे खोलकर देखे ही लेखक को करीब सवा साल हो गया है बहरहाल उस काउंटर से दोनों ब्लाग पर कोई ऐसी सक्रियता नहीं देखी गयी पर उसका लिंक होना उनके लिये परेशानी का सबब बना। ऐसा लगता है कि हाल ही में उस गुड कांउटर वाली साईट को प्रतिबंधित घोषित किया गया होगा क्योंकि इससे पहले डेढ़ वर्ष तक गूगल का आटोमैटिक सिस्टम उसे नहीं पकड़ रहा था।
उस मासूम ब्लाग लेखक के नाम का जिक्र हमने इसलिये नहीं किया क्योंकि वह भी तो हमारी तरह ही है जिसे बहुत सारी बातें बाद में पता चली होंगी। हो सकता है कि वह स्वयं भी भूल गया हों उसने अतिउत्साह में उस गुड कांउटर का पता बताया और हमने भी लगभग उसी मासूमियत से लगाया। अब समस्या आ रही है उन दोनों ब्लाग को वापस लाने की। गूगल के वेबमास्टर टूल पर अपना प्रयास किया है और तकनीकी ज्ञान की कमी के चलते यह कहना कठिन है कि हम अभी सफल हुए हैं या नहीं। यह तय बात है कि पहले उसे ब्लाग की सैटिंग मेें जाकर तृतीय पक्ष की क्षमता वाली जगह पर जाकर वहां से गुड कांउटर हटाना पड़ेगा। अब गूगल से वह कब वापस मिलेगा। हम अपनी प्रविष्टी सही जगह पर कर रहे हैं या नहीं इसका दावा करना कठिन है। वह दिन हमें आज भी याद है कि इन दोनों में किसी एक ब्लाग पर महीना भर पहले उस अनावश्यक और निष्क्रिय काउंटर का हटाने के लिये हमने माउस उठाया था कि लाईट चली गयी। उस समय पता नहीं था कि वह साथ में ब्लाग भी ले जाने वाली है। वह हटाते तो भी दूसरे ब्लाग को तो जाना ही था क्योंकि हमें तो पता ही नहीं था कि वह दो पर है।
बस एक बात का संतोष है कि किसी अन्य ब्लाग को कोई खतरा नहीं है जिसकी आंशका बनी हुई थी। इस लेखक की चिंता सबसे अधिक ‘शब्द लेख सारथी' की होती है जो पाठकों में ब्लाग स्पाट का सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला ब्लाग है। सबसे बड़ी बात यह कि गूगल की विश्वसनीयता को लेकर कोई सवाल उठाना ठीक नहीं है। वैसे यह प्रतिबंध साईट द्वारा प्रदत्त सामग्री से अधिक गूगल के साथ उसकी कोई व्यापारिक संधि न होने के कारण लगा-ऐसा लगता है। जहां तक अश्लील और आन लाईन सट्टेबाजी की साईटों का सवाल है तो कौन गूगल भी पीछे है। पर इससे हमें क्या? हमारे सात्विक लिखने और पढ़ने में बाधा नहीं आना चाहिए। गूगल ने अगर गुड काउंटर को गलत समझा तो ठीक है हम भी उससे सहमत हैं। बस अफसोस इस बात है कि डेढ़ साल पहले उसने ऐसा क्यों नहीं किया। दूसरा जिन अन्य ब्लाग लेखकों के ब्लाग जब्त हुए हैं वह भी याद करें कि कहीं उन्होंने इस तरह की साईटें तो नहीं लगायी थी। हिंदी ब्लाग जगत के लेखक होने के नाते पश्चिमी तौर तरीकों और दाव पैंचों को अधिक नहीं जानते इसलिये इस तरह के धोखे में फंस जाना कोई बड़ी बात नहीं है। बहरहाल जो ब्लाग मित्र या पाठक हैं उन्हें चिंतित होने की बात नहीं है। प्रयास करने पर दोनों ब्लाग वापस मिलते हैं तो ठीक वरना कोई बात नहीं। अन्य ब्लाग कोई खतरा नहीं है इससे संतुष्ट होना ठीक है।
..................................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, May 23, 2009

गूगल ने दो ब्लाग जब्त किये-आलेख

गुगल ने इस लेखक के दो ब्लाग को बिना किसी पूर्व चेतावनी और सूचना के हटा दिया है। यह दो ब्लाग हैं सिंधु केसरी पत्रिका http://anant-sindhu.blogspot.com और अमृत संदेश पत्रिका http://amrut-sandesh.blogspot.com। इस संबंध में गूगल ग्रुप के सहायता केंद्र पर सूचित किया गया पर अभी तक कोई सूचना नहीं मिली है।
अब यह कहना कठिन है कि यह गलती से हुआ या जानबूझकर किया गया है। जहां तक इस लेखक द्वारा आपत्तिजनक लिखने का प्रश्न है तो अधिकतर ब्लाग लेखक पाठ पढ़ते रहते हैं और कोई ऐसी बात अपने ब्लाग/पत्रिका पर नहीं लिखता जिसे किसी को परेशानी हो। फिर आखिर इन ब्लाग को बिना किसी पूर्व सूचना या चेतावनी के आखिर क्यों हटा दिया गया।
कल चिट्ठाकारों की चर्चा में एक अन्य ब्लाग लेखक ने भी इस तरह की कार्यवाही का जिक्र किया गया तब उसे एक वरिष्ठ ब्लाग लेखक ने बताया कि उसके ब्लाग पर तीसरे पक्ष की कार्यक्षमता में कोई ऐसा लिंक जुड़ गया होगा जो आपत्ति जनक होगा। साथ ही उसे यह भी कहा गया कि वह गूगल को लिखे तो उसे ब्लाग वापस मिल जायेगा। अब गूगल ग्रुप के सहायता केंद्र के अलावा भी कोई ऐसी जगह हो जहां लिखा जाना है तो कृपया सुधि ब्लाग लेखक बतायें। जहां तक लेखक की जानकारी है तो तीसरे पक्ष की कार्यक्षमता में इन दोनों ब्लाग पर जो लिंक हैं वह अन्य ब्लाग पर भी हैं तो इसका आशय यह है कि बाकी ब्लाग भी हटाये जा सकते हैं। वैसे कोई ऐसे लिंक नहीं हैं जो आपत्तिजनक हों पर अगर हैं तो वह बताया जाना चाहिए न कि इस तरह प्रतिबंध लगाया जाये।

जिस तरह इन ब्लाग को हटाया गया है और लिखने के सात घंटे बाद भी न तो उनकी वापसी नहीं हुई है और न कोई सूचना मिली है वह अनेक प्रकार की आशंकाओं को तो जन्म देने के साथ ही इन वेबसाईट की विश्वसनीयता पर भी संदेह पैदा करती है। आखिर कोई आदमी कितनी मेहनत से लिखता है और फिर उसका ब्लाग आप बिना किसी सूचना के जब्त करें तो इसे तो विश्वासघात ही कहा जायेगा। याद रखने वाली बात यह है कि उदारीकरण के इस युग में निजी वेबसाईटों को विश्वास के सहारे ही चलना है।
इससे पहले एक बार ऐसा हुआ था जब पूरा ब्लाग स्पाट ही गलती का शिकार हुआ था। तब यही संदेश आ रहा था कि यह वेबसाईट आपके कंप्यूटर के लिये खतरनाक है। अब यह केवल इन दो ब्लाग पर ही आ रहा है और बाकी काम कर रहे हैं। अभी तक तो यह मानकर ही चलना चाहिये कि यह किसी त्रुटि का परिणाम है पर अगर यह सोद्देश्य किया गया है तो इसकी खोजबीन की जायेगी। बहरहाल कुछ अन्य ब्लाग लेखक भी हो सकते हैं जो इसका शिकार हुए होंगे। ऐसे में तकनीकी जानकार ब्लाग लेखकों से यह अपेक्षा है कि वह इन ब्लाग के संबंध में कोई कार्यवाही हो सकती है तो बतायें। यह आग्रह भी है कि अगर स्वयं कहीं सूचना दे सकते हैं तो भेज दें-उनकी अति क्रृपा होगी।
जिन ब्लाग को हटाया गया है वह इस प्रकार हैं
सिंधु केसरी पत्रिका http://anant-sindhu.blogspot.com
अमृत संदेश पत्रिका http://amrut-sandesh.blgospot.com

...................................

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, May 18, 2009

खुशहाली के वादे-हिंदी शायरी (khushi ke vade-hindi shayri)


समाज के बदलते दौर में
चेहरे बदल जाते
मगर इंसानी बुतों की
बोल और अदायें एक ही
तरह सामने आते।

आकाश जैसा चमकीला
बनाने का वादा तो सभी कर जाते
इसलिये धरती पर
कृत्रिम सितारे सजाते।
भुगतते हैं सभी अपने कारनामों के अंजाम
औकात के हिसाब से मिलते
इंसान को काम और दाम
अपने कर्ज चुकाने हैं खुद सभी को
दिखाने के लिये हमदर्द सभी बनते
साथी वही बनते, हमसफर हों जो
ऐसे में बहुत अच्छा लगता है
सारे संसार में खुशहाली के वादे
जो हकीकत से परे होते भी प्यारे नजर आते।

.........................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, May 17, 2009

ताज का राज -व्यंग्य कविता (taj ka raj-hindi vyangya kavita)

सूरत देखकर ही
लोग सिर पर ताज पहनाते हैं
किसकी सीरत कौन देखेगा
अपने काम पर लोग खुद ही शर्माते हैं.

कहैं दीपक बापू
"बीच बाज़ार में
कागज पर लिखकर हों
या उसके बने नोटों में बिककर हों
सामने सबके सौदा होने से पहले
कमरे के अन्दर अकेले में तय किये जाते हैं.
किसने पहना
और किसने पहनाया ताज
इसमें भले नहीं दिखता कोई राज
पर भूमिका और पात्र कहीं अन्यत्र
तय किये जाते हैं.

--------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, May 12, 2009

गरीब की भूख के कद्रदान-हिंदी शायरी (garib ki bhookh ke kadradan-hindi vyangya kavita)

हक की बात करते हैं लोग सभी
फर्ज पर बहस नहीं करते कभी।।

अपने फायदे के लिये बनाये कायदे
वह भी मौका पड़े, याद आते हैं तभी।।

दिखाने के लिये लोग अहसान करते हैं
नाम मदद, पर कीमत मांगते हैं सभी।।

रोटियों का ढेर भले भरा हो जिनके गले तक
उनकी भूख का शेर पिंजरे में नहीं जाता कभी।।

नारों से पेट भरता तो यहां भूख कौन होता
दिखाते हैं सब, पेट में नहीं डालता कोई कभी।।

गरीब के साथ जलना जरूरी है, भूख की आग का
उसके कद्रदानों की रोटी पक सकती है तभी।।

..................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, May 10, 2009

मुखौटों के पीछे मुख हैं-व्यंग्य कविता (mukhauton ke pichhe mukh-vyangya hindi shayri)

कभी करते हैं वैश्वीकरण का नारा जोर से बुलंद .
कभी हो जाती है उनकी सोच, अपने दायरों में बंद ..
बाजार ने सजाये हैं मुखौटे, जो सोचते दिखते हैं
मगर होते हैं सौदागरों के इशारों पर चलने के पाबन्द ..
बाज़ार भाव के उतार चढाव देखना जरूरी है
मुखौटों की भंगिमा कभी चमकती है,कभी होती मंद
खुले बाज़ार में सब खुला रखने की हिमायत पहले करते
सौदागरों का इशारा हो जाये तो सब हो जाता बंद..
सारे जहां का जिम्मा है इसलिए सोचते दिखना जरूरी है
सौदागर का खेल चलता, मुस्कराता हैं वह मंद मंद..
--------------------------------
बाज़ार उनको नचाता है
या वह बाज़ार को चलाते हैं
यह कहना कठिन है.
मुखौटों के पीछे मुख हैं
जो लिखते हैं संवाद
और वह होंठ हिलाते नजर आते हैं
लोग तो बस विषयों के साथ
शब्दों को मिलाते हैं
परदे के पीछे का खेल कौन
देख पाता है
सामने के दृश्य से ही
सभी का मन भर जाता है
वैसे भी कुछ बेकार है कहना
बस! बाज़ार के खेल में
जज्बातों के साथ मत बहना
चाहे भले ही कोई
रात को बताता दिन है..

--------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, May 6, 2009

जंग से अच्छा अमन है-व्यंग्य कविता (zang se achchha aman hai-vyangya kavita)

लुटता रहा पूरा शहर
मगर लोग देखते रहे।
‘खराब ज़माना आ गया है’
एक दूसरे से बस यही कहते रहे।

‘बचाने के लिये जंग कर
जान गंवाने या
शरीर पर जख्म लेने से
अच्छा अमन है’
यही सोचकर आपस में हंसते रहे।

फिर भी
आसमान की तरफ देखकर
वहां से किसी फरिश्ते के जमीन पर आकर
खुद को बचाने की उम्मीद में
इंसान खामोशी से जमीन पर कटते रहे।।

..................................

हिंदी साहित्य,मनोरंजन,हिंदी शायरी,शेर,समाज
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, May 2, 2009

आदमी का दिल कहार नहीं बन सकता-हिन्दी शायरी (admi ka dil kahar nahin hai-hindi shayri)

जिंदगी के इस सफ़र में
बिछडे साथियों का पता
किससे पूछें
सभी ढूंढ रहे हैं
अपने यार जो खो गए.

मगर फिर भी पूछते हैं
क्योंकि बात से बात निकलते ही
वही हमारे यार हो गये.

हर आदमी का दिल कहार नहीं बन सकता
जो यादों की डोली लाद कर चलता रहे
बिछडों की याद में हाथ मलता रहे
हमदर्दी लेकर दर्द बाटने वाले
जो लोग मिले, वही दिलदार हो गए..

--------------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, April 23, 2009

रौशनी का वास्ता कब तक दिलाओगे-हिंदी शायरी (roshni ka vasata-hindi shayri)

तख्तियों पर लिखे शीर्षकों के तले
खड़े लोगों की भीड़ को
कब तक बहलाओगे।
इंसान की आदतों को
कब तक भीड़ में छिपाओगे।
टकराते हैं जब लोगों मे मतलब आपस में
तब जंग भी होती है
इंसान अपने लिये जागता है
पर भीड़ तो हमेशा सोती है
लोगों की भीड़ में ढूंढते हो
आदमी-औरत, गरीब-अमीर
और शोषक-शोषित
बांटकर उनको
तरक्की के रास्ते पहुंचाने का
दिखावा कब तब कर पाओगे।
बरसों से यही हाल है
जो आज दिख रहा है
जमाने ने देखा है तुम्हारा दौर भी
जब तुूम्हारे हाथ में था अलादीन का चिराग
तब भी तुमने कोई जादू नहीं किया
इस बात पर करना जरूरी है गौर भी
वादे करना और कसमें खाना
तुम्हारी पुरानी आदत है
पर जमाने को कब तक
खाली भरोसे पर बहलाओगे
अंधेरे में गुजारते हुए बरसों हो गये
खाली चिराग सजाकर
कब तब रौशनी का वास्ता दिलाओगे।

....................................

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, April 15, 2009

खूबसूरत हमसफर भी लगते हैं बदसूरत-हिन्दी शायरी

शोला कहो या शबनम
मोहब्बत के जज्बातों के
इजहार में हर लफ्ज़ है कम।
मगर जिदंगी में सफर में
खूबसूरत हमसफर भी
लगते हैं बदसूरत
जब होते है सामने गम।
चैहरे को कब तक बनावटी सामान से
कितना चमकाओगे
उम्र के साथ फीके होते जाओगे
जला सके ताउम्र खूबसूरत कोई चिराग
जिस्म की मोहब्बत में नहीं है इतना दम।
.........................
रंगबिरंगे कागज पर शायरी लिखने से
रंगीन नहीं हो जाएगी
शब्द को शोर करते हुए लिखने से
संगीन नहीं हो जाएगी।
रोते हुए उसके जज़्बातों से
वह गमगीन नहीं हो जाएगी।
ओ शायर!
जब तेरे अल््फ़ाजों में
तुझे तेरा अक्स दिखने लगे
तू हो जाये बेहोश
तेरे जज़्बात खुद लिखने लगे
तभी समझना कि तेरी शायरी
जमाने में रौशन हो जायेगी।

....................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, April 10, 2009

जब तक अपनी नई सोच को खुद रौशन नहीं करोगे-हिन्दी शायरी

वहम और दिखावे से कैसे जंग लड़ोगे
इंसानी दिमाग की फितरत है
अच्छी हो या बुरी
किसी सोच की गुलामी करना
तुम खाली जुबां से कैसे जीतोगे
उस अंधेरे से
जब तक अल्फाजों की नई रौशनी नहीं भरोगे।

आदमी का दिल कितना भी दरिया हो
ख्यालों के दायरे उसके बहुत तंग हैं
चलते हैं उधार की सोच पर सभी
अपने अल्फाज़ नहीं तय करते वह कभी
दोस्त हो या दुश्मन
जो दिखाये सपने, होते उसी के संग हैं
रौशनी के चिराग बुझ जाते हैं
कितना भी बचो, अंधेरे फिर भी आते हैं
मंजिल का पता नहीं
रास्ते सभी भटके हैं
फिर भी उम्मीद पर
किताबी कीड़ों के घर पर लटके हैं
शायद वह कोई अल्फाज़ों से निकालकर
मंजिल का पता बता दे
कैसे बताओगे उनको
सही मंजिल और रास्ते का पता
जब तक तुम अपनी सोच को
खुद ही रौशन नहीं करोगे

................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, April 6, 2009

यादें और अहसास-हिंदी शायरी

उनके लिये
हमारे दिल में जगह खाली है
किसी कोने में।
उनकी यादें करती है अठखेलियां वहां
कोई अंतर नहीं पड़ता उनके पास न होने में।
अलग नजरिये ने कर दिये
दोनों के अलग अलग रास्ते
हमने दिल में बसा रखी उनकी तस्वीर
भले ही पराये हो गये उनके वास्ते
उनको परवाह हो न हो
इसकी फिक्र नहीं है
पर उनकी यादों को संजोये
रखने में एक अलग ही मजा है
भले ही यह बिछड़ना एक अनचाही सजा है
दिल में रखी
उनकी तस्वीर और यादों के मोल के आगे
तराशा गया हीरा पत्थर लगता है
लोहे का अहसास होता है सोने में।

......................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, April 5, 2009

बादशाह बनने की चाहत-हिंदी शायरी (hindi shayri)

हीरे जवाहरात और रत्नों से सजा सिंहासन
और संगमरमर का महल देखकर
बादशाह बनने की चाहत मन में चली ही आती है।
पर जमीन पर बिछी चटाई के आसन
कोई क्या कम होता है
जिस पर बैठकर चैन की बंसी
बजाई जाती है।

देखने का अपना नजरिया है
चलने का अपना अपना अंदाज
पसीने में नहाकर भी मजे लेते रहते कुछ लोग
वह बैचेनी की कैद में टहलते हैं
जिनको मिला है राज
संतोष सबसे बड़ा धन है
यह बात किसी किसी को समझ में आती है।
लोहे, पत्थर और रंगीन कागज की मुद्रा में
अपने अरमान ढूंढने निकले आदमी को
उसकी ख्वाहिश ही बेचैन बनाती है।

.....................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, April 1, 2009

अप्रैल फूल की बधाई-लघु हास्य व्यंग्य

आज अप्रैल फूल दिवस है। यह भी पश्चिम से आयातित एक विचार है कि अप्रैल के पहले दिन एक दूसरे को मूर्ख बनाया जाये-इसी कारण लोग एक दूसरे का मजाक उड़ाते हैं। वैलंेटाइन डे, फ्रैंड्स डे, प्रेम दिवस और न जाने कौन कौन से दिवस यहां भारत में मनाये जाते हैं। कुछ दिवस तो इतने गंभीर होते हैं कि लोग उस दिन गहरे चिंतन और चिंतायें व्यक्त करते हैं। नारी,पुरुष,बालक,वृद्ध और न जाने कौनसे वर्गों के लिये अनेक प्रस्ताव और विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। मगर व्यंग्यकारों की आदत होती है हर विषय में अपने व्यंग्य प्रस्तुत करना। इसलिये हम भी बेतुकी हास्य कवितायें या व्यंग्य लिख देते हैं भले ही उनमें गंभीरता का भाव दिखाने के लिये डाल देते हैं ताकि लोगों को यह न लगे कि यह हर विषय को मजाक समझता है।
अन्य दिवसों की तरह अप्रैल फूल दिवस भी हमें नहीं जमता पर इसमें कहीं न कहीं मजाक का पुट लगता है इसलिये सोचा कि इस पर कुछ लिखा जाये। क्या लिखा जाये? तब हमने सोचा कि बाकी सभी लोग अन्य दिवस पर एक दूसरे को बधाई देते हैं-जैसे मित्रता दिवस, शुभेच्छू दिवस, प्रेम दिवस आदि-और हम मजाक बनाते हैं। आज मजाक का दिन है इसलिये थोड़ा गंभीर हो जायें। इसलिये सभी सहृदय मित्रों पाठकों और सम्मानीय लोगों को अप्रैल फूल की बधाई! वह इसी तरह पूरे साल हंसते रहे जैसे कि आज हंस रहे हैं। पूरे साल उनको ऐसे आइडिया मिलते रहे हैं कि उनके दिलो दिमाग में प्रसन्नता का भाव रहे।
-----------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, March 23, 2009

व्यंग्य सामग्री के लिये आड़ की क्या जरूरत-आलेख

यह कोई आग्रह नहीं है यह कोई चेतावनी भी नहीं है। यह कोई फतवा भी नहीं है और न ही यह अपने विचार को किसी पर लादने का प्रयास है। यह एक सामान्य चर्चा है और इसे पढ़कर इतना चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। हां, अगर मस्तिष्क में अगर चिंतन के तंतु हों तो उनको सक्रिय किया जा सकता है। किसी भी लेखक को किसी धर्म से प्रतिबद्ध नहीं होना चाहिये पर उसे इस कारण यह छूट भी नहीं लेना चाहिये कि वह अपने ही धार्मिक पुस्तकों या प्रतीकों की आड़ में व्यंग्य सामग्री (गद्य,पद्य और रेखाचित्र) की रचना कर वाह वाही लूटने का विचार करे।
यह विचित्र बात है कि जो लोग अपनी संस्कृति और संस्कार से प्रतिबद्धता जताते हैंे वही ऐसी व्यंग्य सामग्रियों के साथ संबद्ध(अंतर्जाल पर लेखक और टिप्पणीकार के रूप में) हो जाते हैं जो उनके धार्मिक प्रतीकों के केंद्र बिंदु में होती है।
यह लेखक योगसाधक होने के साथ श्रीगीता का अध्ययनकर्ता भी है-इसका आशय कोई सिद्ध होना नहीं है। श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण की आड़ लेकर रची गयी व्यंग्य सामग्री देखकर हमें कोई पीड़ा नहीं हुई न मन विचलित हुआ। अगर अपनी इष्ट पुस्तक और देवता के आड़ लेकर रची गयी व्यंग्य सामग्री देखकर परेशानी नहीं हुई तो उसका श्रेय भी उनके संदेशों की प्रेरणा को ही जाता है।
यह कोई आक्षेप नहीं है। हम यहां यह चर्चा इसलिये कर रहे हैं कि कम से कम अंतर्जाल पर सक्रिय लेखक इससे बाहर चल रही पुरानी परंपरागत शैली से हटकर नहीं लिखेंगे तो यहां उनकी कोई पूछ परख नहीं होने वाली है। अंतर्जाल से पूर्व के लेखकों ने यही किया और प्रसिद्धि भी बहुत पायी पर आज भी उन्हें इस बात के लिये फिक्रमंद देखा जा सकता है कि वह कहीं गुमनामी के अंधेरे में न खो जायें।
स्वतंत्रता से पूर्व ही भारत के हिंदी लेखकों का एक वर्ग सक्रिय हो गया था जो भारतीय अध्यात्म की पुस्तकों को पढ़ न पाने के कारण उसमें स्थित संदेशों को नहीं समझ पाया इसलिये उसने विदेशों से विचारधारायें उधार ली और यह साबित करने का प्रयास किया कि वह आधुनिक भारत बनाना चाहते हैं। उन्होंने अपने को विकासवादी कहा तो उनके सामने खड़े हुए परंपरावादियों ने अपना मोर्चा जमाया यह कहकर कि वह अपनी संस्कृति और संस्कारों के पोषक हैं। यह लोग भी कर्मकांडों से आगे का ज्ञान नहीं जानते थे। बहरहाल इन्हीं दो वर्गों में प्रतिबद्ध ढंग से लिखकर ही लोगों ने नाम कमाया बाकी तो संघर्ष करते रहे। अब अंतर्जाल पर यह अवसर मिला है कि विचाराधाराओं से हटकर लिखें और अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचायें।
पर यह क्या? अगर विदेशी विचाराधाराओं के प्रवर्तक लेखक भगवान श्रीकृष्ण या श्रीगीता की आड़ में व्यंग्य लिखें तो समझा जा सकता है और उस पर उत्तेजित होने की जरूरत नहीं है। निष्काम कर्म, निष्प्रयोजन दया और ज्ञान-विज्ञान में अभिरुचि रखने का संदेश देने वाली श्रीगीता का नितांत श्रद्धापूर्वक अध्ययन किया जाये तो वह इतना दृढ़ बना देती है कि आप उसकी मजाक उड़ाने पर भी विचलित नहीं होंगे बल्कि ऐसा करने वाले पर तरस खायेंगे।
अगर श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण में विश्वास करने वाले होते तो कोई बात नहीं पर ऐसा करने वाले कुछ लेखक विकासवादी विचाराधारा के नहीं लगे इसलिये यह लिखना पड़ रहा है कि अगर ऐसे ही व्यंग्य कोई अन्य व्यक्ति करता तो क्या वह सहन कर जाते? नहीं! तब वह यही कहते कि हमारे प्रतीकों का मजाक उड़ाकर हमारा अपमान किया जा रहा है। यकीनन श्रीगीता में उनकी श्रद्धा होगी और कुछ सुना होगा तो कुछ ज्ञान भी होगा मगर उसे धारण किया कि पता नहीं। श्रीगीता का ज्ञान धारण करने वाला कभी उत्तेजित नहीं होता और न ही कभी अपनी साहित्य रचनाओं के लिये उनकी आड़ लेता है।
सच बात तो यह है कि पिछले कुछ दिनों से योगसाधना और श्रीगीता की आड़ लेकर अनेक जगह व्यंग्य सामग्री देखने,पढ़ने और सुनने को मिल रही है। एक पत्रिका में तो योगसाधना को लेकर ऐसा व्यंग्य किया गया था जिसमें केवल आशंकायें ही अधिक थी। ऐसी रचनायें देखकर तो यही कहा जा सकता है कि योगसाधना और व्यंग्य पर वही लोग लिख रहे हैं जिन्होंने स्वयं न तो अध्ययन किया है और न उसे समझा है। टीवी पर अनेक दृश्यों में योगसाधना पर व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति देखकर इस बात का आभास तो हो गया है कि यहां गंभीर लेखन की मांग नहीं बल्कि चाटुकारिता की चाहत है। लोगों को योग साधना करते हुए हादसे में हुई एक दो मौत की चर्चा करना तो याद रहता है पर अस्पतालों में रोज सैंकड़ों लोग इलाज के दौरान मरते हैं उसकी याद नहीं आती।
देह को स्वस्थ रखने के लिये योगसाधना करना आवश्यक है पर जीवन शांति और प्रसन्नता से गुजारने के लिये श्रीगीता का ज्ञान भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस धरती पर मनुष्य के चलने के लिये दो ही रास्ते हैं। मनुष्य को चलाता है उसका मन और वह श्रीगीता के सत्य मार्ग पर चलेगा या दूसरे माया के पथ पर। दोनों ही रास्तों का अपना महत्व है। मगर आजकल एक तीसरा पथ भी दिखता है वह दोनों से अलग है। माया के रास्ते पर चले रहे हैं पर वह उस विशाल रूप में साथ नहीं होती जो वह मायावी कहला सकें। तब बीच बीच में श्रीगीता या रामायण का गुणगान कर अनेक लोग अपने मन को तसल्ली देते हैं कि हम धर्म तो कर ही रहे हैं। यह स्थिति तीसरे मार्ग पर चलने वालों की है जिसे कहा जा सकता है कि न धन साथ है न धर्म।
अगर आप व्यंग्य सामग्री लिखने की मौलिक क्षमता रखते हैं तो फिर प्राचीन धर्म ग्रंथों या देवताओं की आड़ लेना कायरता है। अगर हमें किसी पर व्यंग्य रचना करनी है तो कोई भी पात्र गढ़ा जा सकता है उसके लिये पवित्र पुस्तकों और भगवान के स्वरूपों की आड़ लेने का आशय यह है कि आपकी सोच की सीमित क्षमतायें है। जो मौलिक लेखक हैं वह अध्यात्म पर भी खूब लिखते हैं तो साहित्य व्यंग्य रचनायें भी उनके हाथ से निकल कर आती हैं पर कभी भी वह इधर उधर से बात को नहीं मिलाते। अगर किसी अध्यात्म पुरुष पर लिखते हैं फिर उसे कभी अपने व्यंग्य में नहीं लाते।
अरे इतने सारे पात्र व्यंग्य के लिये बिखरे पड़े हैं। जरूरी नहीं है कि किसी का नाम दें। अगर आप चाहें तो रोज एक व्यंग्य लिख सकते हैं इसके लिये पवित्र पुस्तकों यह देवताओं के नाम की आड़ लेने की क्या आवश्यकता है? वैसे भी जब अब किसी का नाम लेकर रचना करते हैं और वह सीधे उसकी तरफ इंगित होती है तो वह व्यंजना विधा नहीं है इसलिये व्यंग्य तो हो ही नहीं सकती।
यह पाठ किसी प्रकार का विवाद करने के लिये नहीं लिखा गया है। हम तो यह कहते हैं कि दूसरा अगर हमारी पुस्तकों या देवताओं की मजाक उड़ाता है तो उस पर चर्चा ही नहीं करो। यहां यह भी बता दें कुछ लोग ऐसे है जो जानबूझकर अपने आपको धार्मिक प्रदर्शित करने के लिये अपने ही देवताओं और पुस्तकों पर रची गयी विवादास्पद सामग्री को सामने लाते हैं ताकि अपने आपको धार्मिक प्रदर्शित कर सकें। उनकी उपेक्षा कर दो। ऐसा लगता है कि कुछ लोग वाकई सात्विक प्रवृत्ति के हैं पर अनजाने में या उत्साह में ऐसी रचनायें कर जाते हैं। उनका यह समझाना भर है कि जब हम अपनी पवित्र पुस्तकों या देवताओं की आड़ में कोई व्यंग्य सामग्री लिखेंगे- भले ही उसमें उनके लिये कोई बुरा या मजाकिया शब्द नहीं है-तो फिर किसी ऐसे व्यक्ति को समझाइश कैसे दे सकते हैं जो बुराई और मजाक दोनों ही करता है। याद रहे समझाईश! विरोध नहीं क्योंकि ज्ञानी लोग या तो समझाते हैं या उपेक्षा कर देते हैं। यह भी समझाया अपने को जाता है गैर की तो उपेक्षा ही की जानी चाहिये। हालांकि जिन सामग्रियों को देखकर यह पाठ लिखा गया है उनमें श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण के लिये कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी पर सवाल यह है कि वह व्यंग्यात्मक सामग्रियों में उनका नाम लिखने की आवश्यकता क्या है? साथ ही यह भी कि अगर कोई इस विचार से असहमत है तो भी उस पर कोई आक्षेप नहीं किया जाना चाहिये। सबकी अपनी मर्जी है और अपने रास्ते पर चलने से कोई किसी को नहीं रोक सकता, पर चर्चायें तो होती रहेंगी सो हमने भी कर ली।
..........................................

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, March 18, 2009

तभी अपने लिए उम्मीद कर पाओगे-हिंदी शायरी (apne liye ummid-hindi shayri)

अपने दिल के घाव छिपाना, नहीं तो बहुत पछताओगे.
देख लिया किसी ने तो, ज़माने में बिचारे बन जाओगे.

अपने अन्दर बहते हुए आंसुओं पर खूब हंसना
किसी से हमदर्दी चाही तो खुद एक मजाक बन जाओगे.

पूरा ज़माना डूबा है गम में, ढूंढता है दूसरा ग़मगीन
देख लिया किसी ने दिल तुम्हारा, तो हंसी की शय बन जाओगे.

रोने से इन्सान के लड़ने की ताकत कम हो जाती है
मांस के बुतों का यह शहर है, कोई हमदर्द नहीं ढूंढ पाओगे.

दस्तूर हैं दूसरों की मदद का, पर निभाते हैं उसे कम लोग
पर तुम बाँटना दूसरों का दर्द, तभी अपने लिए उम्मीद कर पाओगे.

------------------

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, March 12, 2009

अपनी नजरों के दायरे में कैद-व्यंग्य कविता (hindi vyangya kavita)

रीढ़हीन हो तो भी चलेगा।
चरित्र कैसा हो भी
पर चित्र में चमकदार दिखाई दे
ऐसा चेहरा ही नायक की तरह ढलेगा।

शब्द ज्ञान की उपाधि होते हुए भी
नहीं जानता हो दिमाग से सोचना
तब भी वह जमाने के लिये
लड़ता हुआ नायक बनेगा।
कोई और लिखेगा संवाद
बस वह जुबान से बोलेगा
तुतलाता हो तो भी कोई बात नहीं
कोई दूसरा उसकी आवाज भरेगा।

बाजार के सौदागर खेलते हैं
दौलत के सहारे
चंद सिक्के खर्च कर
नायक और खलनायक खरीद
रोज नाटक सजा लेते हैं
खुली आंख से देखते है लोग
पर अक्ल पर पड़ जाता है
उनकी अदाओं से ऐसा पर्दा पड़ जाता
कि ख्वाब को भी सच समझ पचा लेते हैं
धरती पर देखें तो
सौदागर नकली मोती के लिये लपका देते हैं
आकाश की तरफ नजर डालें
तो कोई फरिश्ता टपका देते हैं
अपनी नजरों की दायरे में कैद
इंसान सोच देखने बाहर नहीं आता
बाजार में इसलिये लुट जाता
ख्वाबों का सच
ख्यालों की हकीकत
और फकीरों की नसीहत के सहारे
जो नजरों के आगे भी देखता है
वही इंसान से ग्राहक होने से बचेगा।

..................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

entertainment, hindi, masti, mastram, poem, मनोरंजन, मस्त राम, मस्ती, समाज, हिंदी साहित्य

Tuesday, March 10, 2009

सभी को याद करना पर हमें भूल जाना-हिंदी कविता (holi par hamen bhool jana-hindi kavita)

होली के रंग खूब खेलना
पर हमारी तरफ नहीं ठेलना।
जमाने के रंग हर बार फीके होते देखे हैं
रंगीन चेहरों के भी तेवर तीखे देखे हैं
दिलो दिमाग मे जलती है आग
उसी से रौशन है हमारा चिराग
बुझ जायेगा, पानी की बूंदों में
रंग डालकर होली हमारे साथ मत खेलना ।

हमारा चेहरा उदास देखकर
उस पर कोई रंग पोतकर
चमक लाने की कोशिश बेकार होगी
जनम से ही चिंतन के रोगी
पैदा कर लेते हैं ख्यालों के रंग
बाहर के रंगों से
भला उन पर क्या रौनक होगी
खेलते हुए कम पड़ जायें तो
रंग हम से उधार ले लेना।

आदत हो गयी है अपनी उदासियों के साथ जिंदा रहने की
अपने पीठ पीछे निंदा सहने की
अपनी बात कहना आया नहीं
दूसरे का कहा कभी भाया नहीं
पहले कितने भी चमके
पर बाद में फीके पड़े गये रंग
कितना भी खेला हो इंसान
पर बढ़ा नहीं उसकी सोच का दायरा
दिमाग रहा हमेशा तंग
प्यासे हैं बरसों के
एक दिन होली खेलने से मन नहीं भरेगा
प्यास बढ़ गयी अरमानों की तो
कौन उनको पूरा करेगा
बेरंग हो चुकी हमारी जिंदगी में
कोई रंग अब नहीं भरा जा सकता
अकेले में उदासी ही हमारा रंग है
तुम खुशनसीब हो जो भीड़ में
अपने लिये खुशियां तलाश लेते हो
दुआ है हमारी अधिक से अधिक सहेज लेना।

सभी को याद करना पर हमें भूल जाना
पसंद नहीं है किसी की यादों पर जाकर उसे सताना
खूब उड़ाना रंग और गुलाल
पर हमारी तरफ नहीं आना
बेरंग होती जा रही हमारी जिंदगी
में अपना पांव नहीं फंसाना
यकीन करो अकेले में
अपने उदासी के रंगों से खेलना
हमें बहुत भाता है
तुम डर जाओगे वह देखकर
इसलिये बीच बाजार होली हमें भुलाकर खेलना

.......................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकाऐं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर