Saturday, September 27, 2014

बीमारी में ज़माना रोज जिये-हिन्दी कविता(bimari mein zamana roj jiye-hindi poem)



अपने लिये ढूंढते हैं
फुर्सत के क्षण
ताकि दिल बहला सकें।

जिंदगी की जंग में
रोज होते लोग घायल
नहीं मिलता समय किसी को
ताकि दोस्तों के जख्म पर
हाथ फिराकर सहला सकें।

कहें दीपक बापू ढूंढ रहे दवा
सभी अपनी बीमारी के
इलाज के लिये,
मधुमेह, वायुविकार और
उच्च रक्तचाप के चंगुल में
ज़माना रोज जिये,
कोई नहीं मिलता
जिसकी मस्तिष्क की
धमनियों मे बचा हो
ताजेपन का अहसास
ताकि उसे उद्यानों में टहला सकें।
_____________________

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Sunday, September 21, 2014

ज्ञान किताबें और सत्य-हिन्दी कविता(gyan ke kitaben aur satya-hindi vyangya kavita)




उनके घर में
ज्ञान की बड़ी बड़ी किताबें
कीमती सामान की तरह पड़ी हैं।

भक्त का चोला ओढ़ा कभी
अब उनकी तस्वीर
शिष्यों के घर में दीवारों पर जड़ी हैं।

कभी वह स्वयं झुकाते थे
सर्वशक्तिमान के दरबार में
अब उनके दरवाजे पर
भक्तों की भीड़ खड़ी है।

कहें दीपक बापू अप्रकट ब्रह्म
अपने भक्त के हृदय में ही
प्रकट हो जाता है,
छद्म भक्ति में लगे पाखंडियों को
स्वयं ही सर्वशक्तिमान का
अवतार होने का मोह हो जाता है,
सत्य की दिखाते रूप
जपाते अपना सभी से
घर में माया बड़े रूप में
हमेशा उनके साथ
सहचरिणी की तरह खड़ी है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Sunday, September 14, 2014

हिन्दी ब्लॉगर की छवि-14 सितम्बर हिन्दी दिवस पर हास्य कविता(hindi Blogger ki Chhavi-A hindi comedy poem on 14 september hindi day, hindi diwas,hindi diwas)



रास्ते में तेजी से चलता
मिल गया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू तुम्हारे पास ही आ रहा था
सुना है दस सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग लेखक
सम्मान पाने वाले हैं,
ऐसा लगता है हिन्दी के अंतर्जाल पर भी
अच्छे दिन आने वाले हैं,
हो सकता है तुमको भी
कहीं से सम्मान मिल जाये,
हमारा छोटा शहर भी
ऐसी किसी खबर से हिल जाये,
आठ साल अंतर्जाल पर हो गये लिखते,
पहल दिन से आज तक
तुम फ्लाप कवि ही दिखते,
मिल जाये तो मुझे जरूर याद करना
मैंने ही तुम्हारे अंदर हमेशा
उम्मीद जगाई,
सबसे पहले दूंगा आकर बधाई।

सुनकर हंसे दीपक बापू और बोले
‘‘अंतर्जाल पर लिखते हुए अध्यात्म विषय
हम भी हम निष्काम हो गये हैं,
कोई गलतफहमी मत रखना
हमसे बेहतर लिखने वाले
बहुत से नाम हो गये हैं,
हमारी मजबूरी है अंतर्जाल पर
हिन्दी में लिखते रहना,
शब्द हमारी सासें हैं
चलाते हैं जीवन रुक जाये वरना,
मना रहे हैं जिस तरह
टीवी चैनल हिन्दी दिवस
उससे ही हमने प्रसन्नता पाई,
नहीं मिलेगा हमें यह तय है
फिर भी देंगे
सम्मानीय ब्लॉग लेखको को हार्दिक बधाई,
हम तो इसी से ही प्रसन्न हैं
हिन्दी ब्लॉग लेखक शब्द
अब प्रचलन में आयेगा,
अपना परिचय देना
हमारे लिये सरल हो जायेगा,
सम्मान का बोझ
नहीं उठा सकते हम,
उंगलियां चलाते ज्यादा
कंधे उठाते कम,
इसी से संतुष्ट हैं कि
अंतर्जाल पर हिन्दी लिखकर
हमने अपने ब्लॉग लेखक होने की छवि
अपनी ही आंखों में बनाई।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Monday, September 8, 2014

नहीं होता अनुमान-हिन्दी कवितायें(nahin hota anuman-(poem;s in hindi on hindi diwas)



सभी चेहरों पर
लगा रंगबिरंगा नकाब है।

नहीं होता अनुमान
 कौन अच्छा देखने में
कौन खराब है।

कहें दीपक बापू पीने का मजा
ले रहे लोग हाथ में
लेकर ग्लास
नहीं होता अनुमान
शर्बत पीकर नाच रहे
या बहका रही शराब है।
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हमारे जिस्मे से
निकल गया पसीना
मगर अमीरों को मजा नहीं आया।

घी पीने में लग रहे वह
हमारी सूखी रोटी खाना भी
उनको रास न आया।

कहें दीपक बापू मजे में
हम जीते रहे
अपनी टुकड़ों टुकड़ों में बंटी जिंदगी
छिपाये अपने गम
मगर हमारी खुशी ने भी
उनकी आंखों को बहुत सताया।
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Tuesday, September 2, 2014

यथास्थितिवादी-हिन्दी व्यंग्य कविता(yathasthititiwadi-hindi satire poem)



कभी कॉफी की चुस्कियों के साथ
देश की स्थिति पर
वह चर्चा करते थे।

अब बार में शराब के जाम
उनकी बहस रोचक बनाते
जो खाली बैठे आहें भरते थे।

कहें दीपक बापू विद्वानों की सेना
भारतीय आकाश में चिंत्तन के साथ
विचरण करती है,
यथास्थिति से प्रसन्न होती
परिवर्तन की हवा के झौंके से
उनकी हर सांस डरती है,
उन लोगों ने जुटा ली
उपाधियां बड़े नाम वाली े
प्रतिष्ठा और प्रचार के लिये
दौलतमंदों और ऊंचे ओहदे वालों के
सम्मान में लिखते हुए
चाटुकारिता की घास चरते थे।
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