Tuesday, April 28, 2015

वही जीते जिंदगी-हिन्दी कविता(vahi jeete zindagi-hindi poem)


जिंदगी की सासें
कब तक उखड़ेंगी
तय नहीं है

कभी हादसे कभी खुशियां
समय की चाल में
लय नहीं है।

कहें दीपक बापू जिंदा दिली से
वही जीते जिंदगी
जिनके दिल में कोई भी
भय नहीं है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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Wednesday, April 22, 2015

कोई दिल टूट न जाये-हिन्दी व्यंग्य कविता(koyee dil toot n jaye-hindi satire poem)

पूछते है लोग
तुम दिल पर कोई
रचना क्यों नहीं लिखते।

इश्क के अफसाने
इतने होते जहां में
क्या वह तुम्हें नहीं दिखते।

कहें दीपक बापू दिल ठहरा सौदागर
कभी किसी के जिस्म पर
जज़्बात छिड़कता है,
किसी सामान की किस्म पर
लात थिरकता है,
सर्वशक्तिमान के रूप भी
विज्ञापन के प्रचलन से
चुनता है,
चाहिये जहां भंवर से
पार होने के लिये सत्य की नाव
वह भ्रम के जाल बुनता है,
लोगों के जिस्म का
सबसे ताकतवर अंग दिल
कमजोरी का शिकार होता
कोई टूट न जाये
इसलिये उस पर कोई
व्यंग्य हम नहीं लिखते।

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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Wednesday, April 8, 2015

नकल मार्ग का राहगीर तो नहीं-हिन्दी कविता(nakal marga ka rahgir to nahin-hindi poem)


अब तो काबिल इंसान पर भी
यह सोचकर शक होता है कि
वह नकली तो नहीं।

नकली उपाधियां भी
शिक्षा के बाज़ार मे बिकतीं
गुरु बदल देते
परीक्षा के समय
चेले की शक्ल भी कहीं।

कहें दीपक बापू समस्याओं से
नहीं लगता लोगों को अब डर
घबड़ाते हैं यह सोचकर
इलाज के लिये चिकित्सक
पढ़ाने के लिये शिक्षक
बचाने के लिये रक्षक
नकली मार्ग से
गुजरकर आया राहगीर तो नहीं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Friday, April 3, 2015

गम भुलाने के बहाने भी लूट लेते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता(gam bhulane ke bahane bhi dhoondh lete hain-hindi satire poem)


अपने अपने भाग्य का
हिस्सा  सभी बड़े मजे से
लूट लेते हैं।

सर्वशक्तिमान की कृपा हो तो
अपने काम से बचने की भी
छूट लेते हैं।

कहें दीपक बापू अधिकार पर
सभी दावा करते हैं,
अपने कर्तव्य की बात से
बेहद डरते हैं,
अमीरों का दबदबा ऐसा
सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन
मयखानों में मय पीने के लिये
गरीबों के गम भुलाने के बहाने भी
लूट लेते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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