Sunday, March 29, 2015

आप और हम-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(aap aur hum-hindi satire poem's)

सड़क से राजमहल में
जिन्होंने पहुंचा दिया
उनकी शिकायत
अब वह कर रहे हैं।

कहार बनकर
उठाये थे दर्द का बोझ
उनसे ही हिकारत
अब वह कर रहे हैं।

कहें दीपक बापू जिंदगी के खेल में
मतलब के हिसाब से
रिश्त बनते और बिगड़ते
साथी सिंहासन तक के होते
कारिंदों पर नज़रे इनायत
अब वह कर रहे हैं।
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गम क्यों करते हो
तुमने अगर मंजिल तक
जिन्हें पहुंचाया
अब वह मुंह फेर रहे हैं।

पहले अपना दर्द
तुम्हें भेंट कर
उन्होंने हमदर्दी बटोर ली
अब तो पेशेवर कारिंदे
 उनको घेर रहे है।

कहें दीपक बापू ज़माने पर
रोना बेकार है
सड़क पर क्यों कोई
आराम पायेगा
राजमहल में पहुंचे
लोगों के पास भी
बेचने के लिये दर्द के
सौदे ढेर रहे हैं।

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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Tuesday, March 24, 2015

खिलौनो का खिलवाड़-हिन्दी कविता(khilono ka khilwad-hindi poem)




अब पुराने मकान
नयी इमारत में
अपना रूप बदल रहे हैं।

धरती से निकली गैस
आकाश में करती छेद
सूरज की आग से गर्माते शहर
अपना रूप बदल रहे हैं।

कहें दीपक बापू इंसानों पर
पत्थर और लोहे के
रंगबिरंगे टुकड़ों से
खेलने का नशा छाया
दिल बहलाने वाले खिलौने
खिलवाड़ करने के लिये
अपना रूप बदल रहे हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, March 18, 2015

आधुनिक वीर-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(adhunik veer-hindi satire poem's)



सेवक बनकर आते

बड़े घर पर कर कब्जा

स्वामी जैसा रखते अहंकार।



कहें दीपक बापू आज के वीर

अपनी आवाज के शोर

 बिना धनुष बाण करते टंकार।।

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बातें बड़ी करने वाले

सभी जगह मिल जाते

काम का समय आये

अपनी जगह से हिल जाते हैं।



कहें दीपक बापू परिश्रम की

प्रशंसा करता ज़माना

मगर मुफ्त के माल से

सभी के चेहरे खिल जाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Thursday, March 5, 2015

ज़माने से कब तक छिपाओगे-हिन्दी कविता(zamane se kab tak chhipaoge-hindi kavita)



कपड़े साबुन से धो लोगे

मगर नीयत के काले दाग

ज़माने से कब तक छिपाओगे।



अपना दर्द भुला दोगे

मगर जिस अपने ही

कसूर से खाये जख्म

ज़माने से कब तक छिपाओगे।



कहें दीपक बापू निर्भयता की

बातें करते हो

अपने कारनामों का

भय तुम्हारे मन दिल में है

ज़माने से कम तक छिपाओगे।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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