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Sunday, August 3, 2014

दिल के आगे सभी बेबस-हिन्दी व्यंग्य कविता(dil ke aage sabhi bebas-hindi vyangya kavia)



इश्क की नदी में तैरने की चाहत
हर जवां दिल में होती है
चढ़ेगा जो लवलेटर की नाव
पार लगेगा या डूब जायेगा।

धन की होती भयानक हवस या तन की
पैमाना तय अभी तक हुआ नहीं
चढ़ जाये भूत सिर पर
इंसान बनेगा घूड़सवार
या कातिल बन जायेगा।

कहें दीपक बापू दिल के आगे सभी बेबस
दिमाग में बसी ख्वाहिशें ढेर सारी
दौलत से बनते राजमहल
दिल के तनते ख्वाबी ताजमहल
जिस्म से बने रिश्तों का बोझ ढोते लोग
कोई अनुमान नहीं जिस्म और पैसे के वास्ते
कौन कब रिश्तों की दीवार गिरा जायेगा।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Saturday, July 26, 2014

पत्थर और इंसानी बुत-हिन्दी व्यंग्य कविता(pattha aur insani but-hindi satire poem)




प्राणहीन पत्थर के बुत हैं
कितना भी पुचकारो
मगर कभी बोलते नहीं हैं।

ज्ञानहीन मांस के बुत है
कितना भी पुचकारो
अर्थ के बिना शब्द तोलते नहीं हैं।

पानी के प्रेम से पत्थर घिस जाते हैं,
मांस के पिंड कौड़ियों में ही पिस पाते हैं,
जज़्बातों में दिल खोलते नहीं हैं।

कहें दीपक बापू पूजने पर
पत्थर में परमात्मा के दर्शन संभव हैं
मगर जिनको मिला है
कुदरत से सांसों का तोहफा
बिना दाम लिये किसी के दर्द में
उम्मीद का रस घोलते नहीं है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Wednesday, July 16, 2014

इंसान और उसकी शान-हिन्दी कविता(insan aur uski shan-hindi poem's)




प्रसिद्धि की खातिर कोई विद्वता का लबादा ओढ़ता
 कोई दूसरों को हंसाने के लिये बनता जोकर,
यह अलग बात है प्रचार में कोई नायक बनता
किसी के हिस्से आती केवल ठोकर,
सभी के लिये समय एक जैसा नहीं होता,
शब्दों का जादूगर अपना असर देखकर हंसता है,
जग को हंसाने वाला अकेले में अपने हाल पर रोता,
ज़माने का दिल बहलाते हैं लोग कमाने के लिये,
अपने अंधेरे से भागते दूसरों का देते जलाकर दिये,
कहें दीपक बापू गोल दुनियां में हालातों में डोलता इंसान
जिस शान पर इतराता बेबस हो जाता उसे खोकर।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Saturday, June 28, 2014

विकास का विनाश-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(vikas ka vinash-hindi vyangya kavitaen)



पुराने विकास के दौर में बड़ी बड़ी इमारतें खड़ी हो गयी,
अब गिरने लगी हैं तो नये विनाश की कड़ी हो गयी।
कहें दीपक बापू नये विकास का कद तो बहुत ऊंचा होगा
विनाश का ख्याल नहीं उम्मीद अब पहले से बड़ी हो गयी।
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विकास को दौर पहले भी चलते रहे हैं,
चिराग अपना रंग बदलकर हमेशा जलते रहे हैं।
कहें दीपक बापू आम आदमी महंगाई के बाज़ार में खड़ा रहा
उसका भला चाहने वाले दलाल महलों में पलते रहे हैं।
एक बात तय है कि आज जो बना है कल ढह जायेगा,
पत्थरों से प्रेम करने वाला हमेशा पछतायेगा,
बड़े बड़े बादशाह तख्त बेदखल हो गये,
चमकीले राजमहल देखते देखते खंडहर हो गये,
इतिहास में उगे बहुत लोग उगत सूरज की तरह
मगर समय के साथ सभी ढलते रहे हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Monday, May 19, 2014

नायिका भी चुनावी भूमिका-हिन्दी हास्य कविता(nayika ki chunavi bhumika-hindi comedy poem's)



निर्माता ने हीरोईन को फिल्म की पटकथा सुनाते हुए कहा
‘‘इस फिल्में में आपकी भूमिका नेत्री की है
जो चुनाव में लड़कर जमानत गंवा देती है,
फिर छेड़ती है भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन
अपने विरोधियों  को पद से हटाकर बदला लेती है,
यह पटकथा जोरदार है फिल्म जरूर हिट हो जायेगी।’’
सुनकर हीरोईन बोली
‘‘ न बाबा न, चुनाव में जमानत खोना तो दूर,
हारने तक की बात मुझे नहीं है मंजूर,
क्या पता मुझे कब चुनाव सचमुच लड़ना पड़ जाये,
जमानत खोने वाली छवि का नतीजा वहां नज़र आये,
कहा जाता है कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है,
पर यह भी सच है कि फिल्म हस्तियों की छवि
एक बार बन जाये वह हमेशा वह ढोती है,
आप तो इस फिल्म से कमा लेंगे
आप पटकथा बदलो तभी काम करूंगी
आपकी बात मानी तो मेरी मंत्री बनने की ख्वाहिश खाक हो जायेगी।’’
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Sunday, May 11, 2014

मातृदिवस पर विशेष लेख-बच्चे के विवाह में मां की उपस्थिति अनिवार्य होने का नियम बनाय जाये(special hindi article-bachche ke vivah mein maan ki upasthiti ko anivarya hone ka niyam banaya jaye)



      आज पूरे देश में मातृदिवस मनाया गया। पूंजीपतियों, प्रचारक प्रबंधकों और पश्चिमी पोथीपंथियों के लिये विदेशी संस्कृति के परिचायक ऐसे दिवस उनकी सुविधा के अनुसार उपयोगी होते हैं।  भारतीय पर्वों के लिये एक पंरपरागत समूह है जो बाज़ार, प्रचार और विचार विमर्श के लिये सदैव उपस्थित रहता है अतः उसके लिये कोई विशेष प्रयास नहीं करने होते पर प्राचीनता से अघाये लोगों को नवीनता देने तथा उसे अपने पास आमंत्रित करने के लिये बाज़ार, प्रचार तथा बौद्धिक प्रबंधकों को ऐसे पश्चिमी पर्व अत्यंत सुविधाजनक लगते हैं। बाज़ार को ग्राहक, प्रचार को वाहक और बुद्धिमानों को सहायक मिलते हैं जिससे उनको लाभ होंता है। यही कारण है कि मातृ, पितृ, मित्र और प्रेम दिवस मनाये जाते हैं।
      आधुनिक बाज़ार की बात क्या करें, प्राचीन भारतीय धार्मिक पंरपरा के रक्षक संगठन भी इन्हें भारतीय संदर्भ में मनाते हैं ताकि उनके शिष्य समुदाय आधुनिक समाज में भी बने रहें।  मगर हम यहां इस पर चर्चा करने की बज़ाय ऐसा विषय उठाने जा रहे हैं जिसे किसी ने नहीं उठाया है।  बात मातृदिवस से ही जुड़ी है और जो समाजसेवी महिला उद्धार के लिये जमीन आसमान एक किये हुए हैं उन्हें परेशान करने वाली हो सकती है।  यह अलग बात है कि मां का गुणगान करने में वह भी पीछे नहीं है। वह महिलाओं को संविधान में विशेष अधिकार देने के लिये अभियान चलाये रहते हैं पर कभी मां के अधिकारों को संवैधानिक दर्जा देने की मांग नहीं करते।
      आगे की बात करने से पहले आज का एक किस्सा ही बयान कर लें। एक युवक अपने गांव की ही एक युवती को लेकर शहर चला गया और उससे प्रेम विवाह कर लिया।  डेढ़ वर्ष बाद घर लौटा तो लड़की के परिवार वालों ने उसे तथा दो भाईयों समेत कुल्हाड़ियों से मार दिया। इसमें लड़की का भाई भी बुरी तरह घायल हुआ।  इस तरह दो मातायें  अपने औलादों की वजह से उस संकट में फंस गयी जिसमें उनकी कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई भूमिका नहीं थी। दरअसल बालिगों को विवाह की कानूनी अनुमति है और कोई मां अपनी औलाद को रोक नहीं सकती।  वैसे तो हर मां अपनी औलाद का घर बसते देखना चाहती है पर जब जाति, धर्म या अपने समूह से बाहर कोई प्रेमी जोड़ा विवाह करता है तो पूरा समाज आंदोलित हो उठता है तब  पुरुष प्रधान समाज होने के कारण दोष मां पर ही डाला जाता है।  उस समय नारी के लिये अपने बचाव में कहने के लिये कुछ नहीं रह जाता। नारी स्वतंत्रता के समर्थक उसे एक इकाई के रूप में मानते हुए उसके लिये संघर्षरत तो रहते हैं पर जहां, मां, बेटी, सास, ननद या किसी अन्य रिश्ते में उसके महत्व पर विचार नहीं करते। एक नारी जो अपने बच्चे को जन्म देती है, उसे निष्काम भाव से पालती है वही उसके विवाह का सपना भी बुनती है तब क्या उसे अपने बच्चे की विवाह में कानूनी अनुमति से वंचित करना उचित है? खासतौर से जब हम देखते हैं कि विवादास्पद विवाहों में सबसे अधिक प्रताड़ित मां ही होती है।
      वैसे तो विवाह सामाजिक बंधन है और जिन्हें असामाजिक बनना है उन्हें इस तरह की परंपरा अपनानी ही नहीं चाहिये पर कानूनी सुरक्षा के लिये युगल प्रेमी विवाह कर ही लेते हैं। अंततः स्वयं को सामाजिक बनाये रखने के लिये विवाह नाम की उस पंरपरा का सहारा लेना ही पड़ता है जो मनुष्य समाजों ने ही बनायी है।  अनेक मातायें  अंतर्समाजीय विवाह को अनचाहे स्वीकार कर भी लेती है पर कहीं न कहीं उनके मन में यह कुंठा होती है कि स्वयं की औलाद ने उनकी अवहेलना की है।  हमारा मानना है कि कानूनी या धार्मिक संस्थाओं में मां की उपस्थिति अनिवार्य की जानी चाहिये। सामाजिक रूप से आयोजित विवाह में मां तो वैसे ही उपस्थित रहती है पर जहां प्रेम विवाह को कानूनी जामा पहनाना हो वहां गवाह के रूप में मां की उपस्थिति अनिवार्य की जानी चाहिये।  हमें आशा  है कथित नारी उद्धारक इस पर विचार करेंगे क्योंकि हमने यहां पिता के लिये कोई बात नहीं की। वैसे भी नारी उद्धारकों के लिये हर पुरुष मूल रूप से दैत्य ही होता है जो  देवता बनने का अक्सर पाखंड करता है। यह अलग बात है कि ऐसी सोच नारी समर्थक पुरुष भी रखते हैं। वैसे हमारा तो मानना है कि समाज का उद्धार उसे वर्ग में बांटने से हो नहीं सकता पर नारीवादियों के लिये हमने मां को विशेषाधिकार मांगने का सुझाव इसलिये दिया ताकि नारियां ही सुरक्षित रह सकें। हालांकि हमारा मानना है कि यह सुझाव दूर तक नहीं जायेगा क्योंकि अपने पाठक इतने नहीं है और गाहे बगाहे पहुंच भी गया तो नारीवादी नाकभौं सिकोड़ लेंगे।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Tuesday, April 29, 2014

आम आदमी और राजमहल-हिन्दी व्यंग्य कविता(aam admi aur rajmahal-hindi vyangya kavita)




इतिहास गवाह है सिंहासन के लिये हमेशा जंग होती रही है,
बड़े योद्धाओं के जीत दर्ज कर पहना ताज क्रांति के नाम पर
यह अलग बात है जनता अपने चेहरे का रंग खोती रही है।
कहें दीपक बापू आम इंसान लड़ता रहा हमेशा
अपने लिये रोटी जुटाने के वास्ते,
मदद मांगने कभी नहीं गया वह राजमहल के रास्ते,
घर पर अपना आसन लगाकर बैठा रहा
उसे मालुम है कोई नहीं बनेगा हमदर्द
वह लोग तो कतई नहीं
जिनकी शाही पालकी
उसकी भुजाओं की मेहनत ढोती रही है
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, April 20, 2014

वातानुकूलन यंत्र के शिकार विरुद्ध पसीने के वीर-हिन्दी कविता(vatanukulan ke shikar aur paseene ke veer-hindi poem)



एक इंसान वह हैं जो कृत्रिम वातानुकूलन यंत्र से सजे
महलों में लेते सांस
रास्ते पर वाहनों में सफर करते हुए भी
जिंदगी में बदलाव की हवा से कांपते हैं,
दूसरी तरफ वह मेहनतकश भी हैं जो
गर्मी की भरी दोपहरिया में
खेत खलिहान और चौराहों पर
पसीना बहाते हुए अपनी तकलीफों से दिखते लापरवाह
चाहे हांफते हैं।
कहें दीपक बापू उन अमीरों को
अपना दर्द सुनाने से कोई फायदा नहीं है,
कांपते जिनके बीमार दिल
मदद देना उनका कायदा नहीं है,
सच यह है कि जंग में खड़े रहते हैं वह यकीन के साथ,
पसीना बहाने में नही डरते जिनके हाथ,
उनकी सच्ची हमदर्दी की वीरता को हम भांपते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Sunday, April 13, 2014

बादशाहों के खेल -हिन्दी व्यंग्य कविता(badshahon ke khel nirale-hindi satire poem)



बादशाहों के खेल होते हैं हमेशा एकदम निराले,
छवि बहादुर की दिखाते अपने महलों पर लगाते बड़े ताले।
गरीबों को देते सलाह कम रोटी खाने की,
बात नहीं करते अन्न से भरे अपने रसोईखाने की,
मजदूरों के पसीने से पैदा पैसे से भरते खजाना,
फिजूलखर्ची पर देते हैं अपनी जनता को ताना,
उनकी दरबारों में चलती है हमेशा सिहांसन के लिये जंग,
खुश होते है चढ़ता है जब उन पर चढ़ता चाटुकारिता का रंग,
कहें दीपक बापू इस धरती का कोई इंसान खास नहीं होता
इतिहास गवाह है अपनी आदतों के सामनें सभी ने हथियार डाले।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Tuesday, April 8, 2014

रामनवमी पर विशेष लेख-भगवान राम के चरित्र का वर्णन और श्रवण दोनों ही आनंददायक(special hindi editorial on ramnawami or ramnavami-bhagwan ram ke charatra ka vanran aur shravan donon hi anand dayak)



      आज रामनवमी का पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास मनाया जा रहा है। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से भगवान श्रीराम के लिपबद्ध चरित्र का अत्यंत महत्व है। जब हम भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप की भी चर्चा करते हैं तो उस दौरान भी कहीं न कहीं  मनुष्य हृदय में श्रीराम की कल्पना उपस्थित रहती है। भगवान श्रीराम तथा श्रीकृष्ण को भगवान श्रीविष्णु का अवतार माना जाता है। यह दृष्टिकोण दोनों के चरित्र का वर्णन करने वाले महर्षियों  का है जिसे भक्त सहजता से स्वीकार भी करते हैं पर दोनों ने अपने श्रीमुख से कभी ऐसा दावा नहीं किया।  बहरहाल एक बात तय है कि मनुष्य रूप में भगवान श्री राम तथा श्रीकृष्ण का चरित्र ही ऐसा है कि उनके भगवान होने की स्वाभाविक अनुभूति उस हर हृदय में होती है जिसके अंदर अध्यात्मिक दर्शन के प्रति रुचि है।
      मूलतः भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र का आधार महर्षि बाल्मीकि की रचनाओं से जुड़ा है जो कि संस्कृत में है। महर्षि तुलसीदास ने भगवान श्रीराम के प्रति अपनी पवित्र भक्ति के कारण श्रीरामचरित मानस की रचना की।  जनभाषा में होने के कारण यह पूरे भारत में उनकी रचना महान ग्रंथ बन गयी।  सच बात तो यह है कि आधुनिक समय में भगवान श्रीराम के चरित्र में नायकत्व जोड़ने का संत तुलसीदास ने ही किया है।  श्रीराम के चरित्र को अपने मानस की तीक्ष्ण दृष्टि से देखने के बाद तुलसीदास ने उसे जो शब्द रूप दिया उससे स्वयं ही भगवत्रूप प्राप्त किया। यही वजह है कि आज उनका नाम पूरे विश्व में जाना जाता है।  इससे एक बात तो स्पष्ट होती है कि श्रीराम चरित्र की चर्चा करने तथा सुनने से मनुष्य के हृदय में जो अध्यात्मिकता का रस उत्पन्न होता है उससे उसके मन के विकार जलकर नष्ट हो जाते हैं और वह एक दिव्य रूप को प्राप्त होता है

संत तुलसीदास ने श्रीरामचरित मानस में कहा है कि
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पुलक वाटिका बाग वन सुख सुविहंग विहारु।
माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-रामकथा सुनने में मनुष्य की देह के अंतर्गत बहने वाली रक्त धारा में रोमांच उत्पन्न होता है। वही पक्षियों का विहार, वाटिका और उद्यान और वन है। निर्मल मन ही माली है जो प्रेमरूपी जल से सुन्दर  नेत्रों से उनको सीचंता है।
जे गावहि यह चरित सैंभारे।
तेइ एहि ताल चतुर लखवारे।।
सदा सुनहिं सादर नर नारी।
तेइ सुरवर मानस अधिकारी।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जो लोग भगवान श्रीराम का चरित्र सावधानी से करते हैं वे ही इस संसार रूप तालाब के चतुर रखवाले हैं। जो इसे आदरपूर्वक इसे सुनते हैं वे ही इस सुंदर मानस के आधिकारी और उत्तम देवता है।

      भगवान श्रीराम की साकार तथा निराकार दोनों प्रकार से भक्ति की जाती है। निराकार भक्त उनके नाम के स्मरण को ही इस भवसागर से तर जाने मार्ग मानते हैं तो साकार उपासक इस अवसर पर उनके मंदिरों में जाकर श्रद्धा से मत्था टेकने और प्रसाद चढ़ाने की प्रक्रिया से अपने हृदय में आनंद की धारा लाने का प्रयास करते हैं।  भगवान श्रीराम का चरित्र का वर्णन करना और सुनना ही अपने आप में आनंददायी होता है।  मुख्य बात यह है कि उनकी साकार तथा निराकार दोनों प्रकार की भक्ति निष्काम ही होती है जिसे हृदय में एक सहज भाव की अनुभूति होती हैं। जीवन में हर समय ही मर्यादा का पालन करने वाले भगवान श्रीराम का चरित्र अत्यंत प्रेरणादायी है। इतना ही नहीं रावण जैसे महाबली के साथ उन्होंने युद्ध कर उसे परास्त कर संसार को यह संदेश दिया कि मनुष्य चाहे कितना धनी और प्रभावशाली क्यों न हो अगर वह अपने नैतिक आचरण पथ से भ्रष्ट होता है तो वह पतन की तरफ ही जाता है। एक न एक दिन दृष्टता को प्राप्त शक्तिशाली मनुष्य को  चुनौती देने वाला आदर्श पुरुष सामने आ ही जाता है।
      रामनवमी के इस पावन पर्व पर पाठकों तथा लेखक मित्रों को बधाई। यह हमारी शुभकामनायें हैं कि भगवान श्रीराम कृपा से उनका जीवन मंगलमय हो। जयश्रीराम, जयश्रीकृष्ण।


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Monday, March 31, 2014

आदर्श के लिये युद्ध-हिन्दी व्यंग्य कविता(adarssh ke liye yuddh)



जिनसे उम्मीद होती मौके पर सहारे की
वही ताना देकर हैरान करने लगें,
क्या कहें उनको
ढांढस देना चाहिये जिनको जिंदगी की जंग में
वही हमारी हालातों को देखकर डरने लगें।
कहें दीपक बापू ऊंचे महलों में जो रहते हैं,
महंगे वाहनों में सड़क पर साहबों की तरह बहते हैं,
दौलतमंद है,
मगर देह से मंद है,
मन उनके बंद हैं,
आदर्श के लिये युद्ध वह क्या लड़ेंगे
अपना घर बचाने के लिये
जो अपने से ताकतवर के यहां पानी भरने लगें।
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