Wednesday, January 18, 2017

पेट जिनके भरे सीने उनके तने हैं, मत पूछो उनके महल कैसे बने हैं-दीपकबापूवाणी (Pet jinke Bhare seene Unke tane hain-DeepakBapuWani)

सिंहासन के लिये होता दंगल, घावों से रिसते खून में दिखाते मंगल।
‘दीपकबापू’ भावनाहीन हो गये, शहर भी डराते अब जैसे सूने जंगल।।
संवेदनहीन शहर में घृणा बढ़ गयी, प्रेम की कीमत यूं ही चढ़ गयी।
‘दीपकबापू’ विश्वास की तलाश छोड़कर, आंख पत्थर में गढ़ गयी।।
दौलत की चमक बढ़ा देती करचोरी, खर्च करें निर्बाध साथ सीनाजोरी।
‘दीपकबापू’ ईमानदारी का फंदा डाले, देशभक्ति में हाथ से सीते बोरी।।
--
मत करना यकीन बात के बंदर हैं, देव दिखें बाहर राक्षस अंदर हैं।
‘दीपकबापू’ शब्दों पर चलाते व्यापार, वह केवल सपनों का समंदर हैं।।
--
आम के दर्द की शिकायत खास दरबार में कौन सुने।
चापलूस सजे रत्न की तरह, जनकल्याण पर मौन बुने।।
मन का हाल आंख में छप जाता, शब्द सहमे बाहर आते,
‘दीपकबापू’ भौपूओं की महफिल में मधुर स्वर कौन चुने।।
------

मत करना यकीन बात के बंदर हैं, देव दिखें बाहर राक्षस अंदर हैं।
‘दीपकबापू’ शब्दों पर चलाते व्यापार, वह केवल सपनों का समंदर हैं।।
--
आम के दर्द की शिकायत खास दरबार में कौन सुने।
चापलूस सजे रत्न की तरह, जनकल्याण पर मौन बुने।।
मन का हाल आंख में छप जाता, शब्द सहमे बाहर आते,
‘दीपकबापू’ भौपूओं की महफिल में मधुर स्वर कौन चुने।।
------
पेट जिनके भरे सीने उनके तने हैं, मत पूछो उनके महल कैसे बने हैं।
‘दीपकबापू’ दान दया का लगाते नारा, मन में लोभ के बादल घने हैं।।
अन्ना के चेले वोट की राजनीति में व्यापार में उनका नाम तक नहीं लेते। क्या दिलचस्प है?
भयातुर कभी भ्रष्ट से नहीं लड़ पाते, कातर कभी कष्ट से नहीं लड़ पाते।
‘दीपकबापू’ स्वार्थ के जाल में फंसे, परमार्थ में पत्ता भी नहीं जड़ पाते।।
-------
सपनों के व्यापार में सभी लगे, दौलत को निरंतर ताड़ते सभी जगे।
‘दीपकबापू’ स्मृतियां रहती क्षीण, खाली रहे ग्राहक फिर भी सदा भगे।।
--
पत्तल छोड़कर सब थाली में खाने लगे, संगीत में शोर अब बजाने लगे।
‘दीपकबापू’ कोयल का सुर पहचाने नहीं, तालियों पर मेंढक टर्राने लगे।।
-

Tuesday, January 10, 2017

बहते जाना आसान नहीं है-हिन्दी कविता (Bahate jana asan nahin hai-Hindi Poem)

हृदय की धड़कनों के साथ
बहते जाना आसान नहीं है
संवेदना की नाव में
सवार होना भी जरूरी है।

जुबान के शब्दों की लहर के साथ
बहना आसान नहीं है
सामने सवालों के झौंके
आना भी जरूरी है।

‘दीपकबापू’ पत्थरों पर
रंगीन स्याही से लिखना
बहुत आसान नहीं है
विचारों के जंगल में
घुसना भी जरूरी है।
-----

Friday, November 4, 2016

अमर शब्द-लोकतंत्र में सेवक स्वामी-दो कवितायें (Amar Shabd And boss of Democracy-Two Hindi Poems)

अमर शब्द-हिन्दी कविता
--
मरना मारना
सदियों से चल रहा है

शिकारी के घर चिराग
शिकार के खून से ही
जल रहा है।

कहें दीपकबापू जीवन में
किसी के जन्म पर जश्न कैसा
मरने पर सियापा कैसा
वही कवि हुए अमर
जिनका शब्द
राम नाम के साथ
अब भी मचल रहा है।
--
लोकतंत्र में सेवक स्वामी-हिन्दी व्यंग्य कविता
--------------
लोकतंत्र के पर्दे पर कलाकार
कभी नायक 
कभी खलनायक की
भूमिका निभाते हैं।

कभी परस्पर मित्र
कभी शत्रुता निभाते हैं।

कहें दीपकबापू यह खेल है
पैसा फैंकने वाले
बन जाते निदेशक
लेने वाले इशारा मिलते ही
कभी सेवक 
कभी स्वामी की भूमिका निभाते हैं।
--------------------------------------

Wednesday, October 19, 2016

पतंजलि नाम की छाप अगर व्यापार से जुड़ेगा तो उसका मजाक भी जरूर बनेगा-हिन्दीसंपादकीय (Patanjali Name when Linkd with Brand for Tread than would cartoon-Hindi Editorial)

                     देशी हो या विदेशी व्यापार उसमें ऊंच नीच होता ही है।  अनेक छाप लगाकर विभिन्न वस्तुयें बाज़ार में बेची जाती हैं।  इन्हीं छाप में कहीं कहीं धर्मिक प्रतीकों का उपयोग होता है।  हमने बचपन में बीड़ी और साबुन पर हिन्दू प्रतीकों का उपयोग होते देखा है-तब कोई विरोध नहीं करता था। फिर अचानक पूरे विश्व में धर्म के प्रति जनजागरण हुआ।  भारत में राममंदिर आंदोलन ने भारी जनजागरण किया।  इसके बावजूद धार्मिक प्रतीकों की छाप उपयोग में लायी जाती रही है-इतना जरूर है कि बीड़ी या सिगरेट पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती पर कहीं चप्पल या जूते पर छाप आ जाये तो हाहाकार मच जाता है।  प्रश्न यह है कि बीड़ी पर धार्मिक प्रतीक छपता है तब यह धार्मिक ठेकेदार कहां जाते हैं जबकि चप्पल या जूते से यह बुरी चीज है! हमारा तो मानना है कि धार्मिक प्रतीक या नाम का उपयोग किसी तरह की वस्तु के साथ जोड़ना वर्जित होना चाहिये-इसके लिये भी सरकार से हस्तक्षेप की बजाय हम धर्म के ठेकेदारों से यह कहेंगे कि वह इसका विरोध कर जनता में धार्मिक प्रतीक या नाम के छाप वाली वस्तु के बहिष्कार की प्रेरणा उत्पन्न करें।
------------
                    नोट-इस विचार का संबंध उस कार्टून से कतई नहीं है जोहमने पंतजलि क्रीम को लेकर बनाया गया।  हम जैसे अध्यात्मिक साधक पंतजलि को योग साधना का प्रवर्तक ़या कहें भगवान ही मानते हैं।  उस कार्टून में पतंजलि का नाम देखकर पीड़ा हुई पर यह उनकी प्रेरणा है कि जल्दी उससे उबर भी गये। तब एक प्रश्न दिमाग में भी आया कि क्या कोई पतंजलि के नाम का उपयोग अपनी वस्तुओं केवल इसलिये कर सकता है कि वह स्वदेशी विचाराधारा का पोषक है।  वैसे भी पतंजलि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित नाम हो चुका है अतः देश की सीमाओं में उन्हें बांधना ठीक नहीं है।  बात यह भी आई कि जब आप किसी का नाम छाप के रूप में अपनी वस्तुओं में उपयोग करते हैं तो उसका मजाक उड़ाने का विरोध यह कहकर नहीं कर सकते कि इससे हमारी धार्मिक भावनाओं पर ठेस लगती है।  बहरहाल हम पहले ही लिख चुके कि ऊपर लिखे गये विचार से हमारे नोट का कोई संबंध नहीं है। लिखते लिखते कहां पहुंच जाते हैं यह हमें बाद में पता चलता है जब पाठ पूरा हो जाता है।
--------------------
                         तिहरे तलाक पर अंग्रेजी  और हिन्दी समाचार चैनल इतना समय बर्बाद कर चुके हैं कि उन्हें यह समझाना जरूरी है कि भईये तुम केवल हिन्दूओं की समस्याओं पर ही ध्यान दो।  मूल रूप से पहले तो यह तय करो कि हिन्दू धर्म या जीवन शैली-हमारा मानना है कि यह जीवन शैली है जिसका यहां की भूमि, भाषा तथा भावना से संबंध है। यहां विदेशी विचाराधारायें अपनी जगह स्थाई रूप से नहीं बना सकती है क्योंकि उनका उद्गम स्थल कहीं अन्यत्र है।  भारतीय या हिन्दू जीवन शैली सभी जगह चल सकती है क्योंकि उसमें अध्यात्मिक ज्ञान समाया हुआ है। दरअसल हमारे हिसाब से तो धर्म का संबंध कर्म तथा आचरण से है उसका कोई नाम नहीं हो सकता। धर्मनिरपेक्ष तो वही लोग होते हैं जिनका संबंध कदाचरण से है-ऐसे लोगों की संख्या कम होती है। इसलिये कोई भला आदमी यह कह ही नहीं सकता कि ‘मैं धर्म निरपेक्ष हूं।’ ट्रंप से हिन्दूओं की जीवन शैली, व्यवहार और व्यवसाय से प्रभावित होकर प्रशंसा की है जिसका सीधा संबंध हमारे क्षेत्र में उत्पन्न एक ऐसी अध्यात्मिक विचाराधारा से है जो सदाबहार है।

Thursday, September 29, 2016

राहिल शरीफ की हीरोगिरी खत्म करना जरूरी था-हिंदी संपादकीय (Rahil Sharif now not HERO Of Pakistan-Hindi Editorial)

                          यह क्षणिक आक्रमण के धारावाहिक प्रवाह प्रारंभ है।  भारत आगे भी करेगा यह बात तय है। हमने पहले ही कहा था कि भारतीय सीमा अंदर जाकर मारकर चली आयेगी। हमले हमारा अनुमान था कि भारतीय सेना चूंकि सीमा के पार नहीं करेगी  इसलिये पाकिस्तान जवाबी हमला करने की बजाय इधर उधर चिल्लायेगा। अब तो पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष हमले से ही इंकार कर रहा है।  जिस मित्र चीन पर सबसे ज्यादा भरोसा है उसने इस घटना के तत्काल दोनों देशों से संपर्क रखने का दावा करते हुए शान्ति की अपील की है। भारत ने चीन को पहले ही बता दिया था। अब अगर वह शांति की अपील कर रहा है तो इसका मतलब यह है कि वह पाकिस्तान से कह रहा है कि भईये, तुम आगे मत जाना।भारत कह देगा कि तुम्हारी शंाति की अपील मान लेते है।‘  वह तो कर चुका सो कर चुका अब अपील मानने में क्या हर्ज है?
                                       बिना कुछ किये धरे राहिल शरीफ पाकिस्तान के नायक बना हुआ था। भारतीय आक्रमण पर कह रहा है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ।नवाज शरीफ ने माना कि हुआ और भारत की निंदा की।  मतलब नवाज ने राहिल शरीफ पर जिम्मा डाल दिया कि जो करना है तुम करो। मैं तो निंदा ही कर सकता हूं। संकट राहिल के सामने ही नहीं पूरी सेना पर है जो पाकिस्तान की भाग्यनियंता बनकर वहां की माफिया बन गयी है। वहां के सैनिक अधिकारी भारी संपदा तो लूटकर पूंजीपति बन ही गये हैं बाकी जनता को दोयम दर्जे की नागरिक समझते हैं।  फिर भी जनता यह सोचकर झेलती है कि चलो इनकी वजह से देश बचा हुआ है। मगर अब.............पाकिस्तान की जनता का यह टूटा भ्रम इतिहस की धारा बदलने वाला सहायक हो सकता है। पहला अवसर था इसलिये भारत ने सब तरफ अपनी बात कहकर अच्छा काम किया।  अब दूसरी बार तो करने के बाद किसी को कहने की जरूरत नहीं हैं। पाकिस्तान की जनता को भी भारतीय सेना के प्रति आभार जताना चाहिये कि आतंकवाद खत्म करने का काम उनकी सेना ने नहीं किया वह कर रही है।
                        ----------------

Sunday, September 25, 2016

शराब की मस्ती देखकर नहीं पीने वाले जलते क्यों हैं-दीपकबापूवाणी (Wine Drinker and not Drinker-DeepakBapuWani)

शराबियों के सिर चढ़कर शराब गम भुलाती है।
नहीं पीने वालों को भी अहंकार में डुलाती है।
कहें दीपकबापू यह सच है कि  हर नशा बुरा होता
उस कुर्सी का क्या जो अहं के नशे में सुलाती है।
------------
उनके दर्द का हाल भी पूछ लेते मगर बंदिशों का पहरा था।
यह लगा गैर ने नहीं अपने ने ही दिया घाव जो गहरा था।
--------------
रूठे मित्र हों या टूटे दिल, शब्दों से कोई रंग नहीं भरता।
कौन सांत्वना दें उसे, जिसका मधुर संबंध स्वार्थ से मरता।
.............
फिरते जो मुफ्तखोर पुजने के लिये, चाहें पद सुरा सुंदरी के लिये।
‘दीपकबापू भलाई का ढिंढोरा पीटते, जो लूट का माल खाकर जिये।।
------------------
शराब की मस्ती देखकर नहीं पीने वाले जलते क्यों हैं।
मजे का माहौल फैला है जब, सूखे दिल ढलते क्यों है।
-------------
दोस्तों से किनारा न करना दुश्मन अकेले होने के इंतजार में रहते।
इश्क से बचना मोहब्बत करना नहीं, लोग पाखंड की बात कहते।।
मोबाईल से मोहब्बत हुई, दोस्तों के लिये जज़्बात कहां से लायेंगे।
भरवाते बात करने का समय, बोलने के लिये शब्द कहां से लायेंगे।
---------------------
यार मत पूछो दिल का हिसाब, लोग अपने राज छिपा जाते हैं।
अपने अंदर भी झांको, अपनी औकात हम अपने से छिपा जाते हैं।
--------------
लच्छेदार शब्दों के होते व्यापारी, खेलते है सौदे की लंबी पारी।
‘दीपकबापू’ नाटकीयता बरतते, सच में फंसने की भी आती बारी।
---------------

Saturday, September 17, 2016

कुत्ता बिल्ली और चूहा जैसे शब्दों से लोकप्रियता नहीं मिलती-हिन्दी व्यंग्य (Why Dog, Cat & rate word use for Any Popolar Parsanalty-Hindi Satire)


                        कभी कभी ट्विटर लोकप्रिय टेग देखकर उस पर लिखने का मन करता है। आज सोचा कि चलो कोई टेग देखें तो हैरानी हुई किसी पत्रकार के नाम से कुत्ता शब्द लिखकर लोकप्रिय टैग चलाया जा रहा है। हमने अंतर्जाल पर स्वयं ही अपने लिये एक आचरण संहिता बनायी है उसक अनुसार जिसकी प्रशंसा करनी होती है उसका नाम तो लिख देते हैं पर जिसकी आलोचना या विरोध करना हो उसका सीधे नाम न लिखकर व्यंजना विधा में संकेत देते हैं।  हमारी संस्कृत देवा भाषा कही जाती है जिससे हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं का सृजन स्वतः हुआ है।  इसके अनुसार शब्द तथा वाक्य की संरचना में शाब्दिक, लाक्षणिक तथा व्यंजना विधा में अपनी बात कही जाती है। पुराने रचनाकारों ने तो लाक्षणिक तथा व्यंजना विधा का उपयोग हमारी रचना परंपरा को एक महान स्थान दिलाया है।  ऐसे मेें किसी सार्वजनिक व्यक्तित्व के नाम से कुत्ता बिल्ली या चूहा जैसे शब्द जब सामने आते हैं तब असहजता का अनुभव होता है।
                          सर्वश्रेष्ठ लेखक वही माने जाते हैं जो व्यंजना विधा का उपयोग करना जानते हैं। जो इसका उपयोग नहीं करते उनमें अपनी रचना या शब्द के प्रभाव को लेकर आत्मविश्वास का अभाव होता है। उनमें यकीन नहीं होता कि उसके लाक्षणिक या व्यंजना विधा को कोई समझेगा? हमारी दृष्टि से इस तरह अभद्र शब्द उपयोग करने वालों के पास अध्ययन तथा चिंत्तन का अभाव होता है इस कारण वह आत्मविश्वास की बजाय अतिविश्वास से यह सोचकर लिखते हैं कि हमारी बात लोगा जल्दी सुनेंगे। वह किसी विषय या व्यक्ति पर लिखते हैं उससे संबंधित पूरी जानकारी भी उनको नहीं होती उन्हें तो बस तात्कालिक रूप् से अपनी भडास निकालनी होती है। कहना चाहिये कि  अंतर्जाल ने कुंठित लोगों के लिये अभिव्यक्ति का एक सुगम साधन दिया है पर उसका उपयोग सभ्यता से उपयोग करने की जरूरत है।
------------------

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकाऐं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर