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Sunday 15 November 2009

हिंसा और मानवाधिकार- व्यंग्य चिंत्तन (hindi aur manvadhikar-vyangya chintan)

वर्तमान भौतिकवादी युग में यह मानना ही बेवकूफी है कि कोई बिना मतलब के जनसेवा करता है। अगर लाभ न हो तो आदमी अपने रिश्तेदार को पानी के लिये भी नहीं पूछता। वैसे यह मानवीय प्रवृत्ति पुराने समय से है कि बिना मतलब के कोई किसी का काम नहीं करता पर आजकल के समय में कुछ कथित समाज सेवक देखकर यह साफ लगता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से लाभ लिये बिना काम नहीं कर रहे हैं । यही स्थिति मानवाधिकार के लिये काम करने वाले लोगों और उनके संगठनों के बारे में देखी जा सकती है। हम तो सीधी बात कहें कि जब हम किसी को जनकल्याण, मानवाधिकार या किसी अन्य सार्वजनिक अभियान चलाते हुए देखते हैं तो उसके उद्ददेश्य से अधिक इस बात को जानने का प्रयास करते हैं कि वह उसके पीछे कौनसा अपना हित साध कहा है।
आतंकवाद के बारे में कुछ विशेषज्ञों का स्पष्टतः मानना है कि यह एक उद्योग है जिसके सहारे अनेक दो नंबरी व्यवसाय चलते हैं। आंकड़े इस बात का प्रमाण है कि जहां आतंकवाद दृष्टिगोचर होता है वहीं दो नंबर का व्यापार अधिक रहता है। आतंकवाद को उद्योग इसलिये कहा क्योंकि किसी नवीन वस्तु का निर्माण करने वाला स्थान ही उद्योग कहा जाता है और आतंकवाद में एक इंसान को हैवान बनाने का काम होता है। इसी आतंकवाद या हिंसा का सहायक व्यापार मानवाधिकार कार्यक्रम लगता है। नित अखबार और समाचार पत्र पढ़ते हुए कई प्रश्न कुछ लोगों के दिमाग में घुमड़ते हैं। इसका जवाब इधर उधर ढूंढते हैं पर कहीं नहीं मिलता। जवाब तो तब मिले जब वैसे सवाल कोई उठाये। कहने का तात्पर्य यह है सवाल करने वालों का भी टोटा है।
बहरहाल एक बड़ा उद्योग या व्यवसाय अनेक सहायक व्यवसायों का भी पोषक होता है। मान लीजिये कहीं कपड़े के नये बाजार का निर्माण होता है तो उसके सहारे वहां चाय और नाश्ते की दुकानें खुल जाती हैं। वजह यह है कि कपड़े का बाजार है पर वहां रहने वाले दुकानदार और आगंतुकों के लिये खाने पीने की व्यवस्था जरूरी है। इस तरह कपड़े का मुख्य स्थान होते हुए भी वहां अन्य सहायक व्यवसाय स्थापित हो जाते हैं। कहीं अगर बुनकरी का काम होता है तो उसके पास ही दर्जी और रंगरेज की दुकानें भी खुल जाती हैं। यही स्थिति शायद आतंकवाद के उद्योग के साथ है। जहां इसका प्रभाव बढ़ता है वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता अधिक सक्रिय हो जाते हैं। उनकी यह बात हमें बकवाद लगती है कि वह केवल स्व प्रेरणा की वजह से यह काम कर रहे हैं। यह ऐसे ही जैसे कपड़े की बाजार के पास कोई चाय की दुकान खोले और कहे कि ‘मैं तो यहां आने वाले व्यापारियों की सेवा करने आया हूं।’
ऐसे अनेक निष्पक्ष विशेषज्ञ हैं जो भले ही साफ न कहते हों पर विश्व भर में फैले आतंकवाद के पीछे काम कर रहे आर्थिक तत्वों का रहस्ययोद्घाटन करते हैं पर वह समाचार पत्रों में अंदर के कालम में छपते हैं और फिर उन पर कोई अधिक नहीं लिखता क्योंकि विश्व भर में बुद्धिजीवियों को तो जाति, भाषा, धर्म, और क्षेत्र के नाम पर फैल रहे आतंकवाद की सच्चाई पर ध्यान देने की बजाय उसके कथित विषयों पर अनवरत बहस करनी होती है। अगर वह इस सच को एक बार मान लेंगे कि इसके पीछे दो नंबर का धंधा चलाने वाले किसी न किसी रूप से अपना आर्थिक सहयोग इसलिये देते हैं ताकि प्रशासन का ध्यान बंटे और उनका काम चलते रहे, तो फिर उनके लिये बहस की गुंजायश ही कहां बचेगी? फिर मानवाधिकार कार्यकताओं का काम भी कहां बचेगा, जिसके सहारे अनेक लोग मुफ्त का खाते हैं बल्कि प्रचार माध्यमों को अपने कार्यक्रमों की जगह भरने के लिये अपने शब्द और चेहरा भी प्रस्तुत करते हैं।
शक की पूरी गुंजायश है और यह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में छपी सामग्री पर थोड़ा भी चिंतन करें तो वह पुख्ता भी हो जाता है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। ऐसा कोई भी गांव या शहर नहीं है जो इससे मुक्त हो। अलबत्ता घटना केवल उन्हीं जगहों की सामने आती हैं जिनको प्रचार माध्यम इन्हीं मानवाधिकार कार्यकताओं के सहारे प्राप्त करते हैं।
आप जरा ध्यान से अखबार पढ़ें कि भारत के मध्य क्षेत्र में ऐसे अनेक एनकांउटर होते हैं जिनमें किसी कुख्यात अपराधी को मार दिया जाता है। उस पर उसके परिवार वाले विरोध भी जताते हैं पर वहां कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता या संगठन सक्रिय नहीं होता क्योंकि इसके लिये उनको कोई प्रायोजक नहीं मिलता। प्रायोजक तो वहीं मिलेगा जहां से आय अच्छी होती हो। सीमावर्ती क्षेत्रों से तस्करी और घुसपैठ को लेकर अनेक संगठन कमाई करते हैं और इसलिये वहां आतंकवादियों की सक्रियता भी रहती है। इसलिये वहां सुरक्षाबलों से उनकी मुठभेड भी होती है जिसमें लोग मारे जाते हैं। मानवाधिकर कार्यकर्ता वहां एकदम सक्रिय रहते हैं। उनकी सक्रियता पर कोई आपत्ति नहीं है पर मध्य क्षेत्र में उनकी निष्क्रियता संदेह पैदा करती है। पूर्वी क्षेत्र को लेकर इस समय हलचल मची हुई है। हिंसक तत्व वहां की प्राकृत्तिक संपदा का दोहन करने का आरोप लगाते हुए सक्रिय हैं। वह अनेक बार अनेक सामान्य सशस्त्र कर्मियों को मार देते हैं पर इन हिंसक तत्वों में कोई मरता है तो मानवाधिकार कार्यकर्ता उसका नाम लेकर चिल्लाते हैं। सवाल यह है कि क्या यह मानवाधिकार कार्यकर्ता यह मानते हैं कि सामान्य सुरक्षा अधिकारी या कर्मचारी का तो काम ही मरना है। उसका तो कोई परिवार ही नहीं है। उसके लिये यह कभी आंसु नहीं बहाते।
कुछ निष्पक्ष विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि अगर कहीं संसाधनों के वितरण को लेकर हिंसा हो रही है तो वह इसलिये नहीं कि आम आदमी तक उसका हिस्सा नहीं पहुंच रहा बल्कि यह कि उसका कुछ हिस्सा हिंसक तत्व स्वयं अपने लिये चाहते हैं। इसके अलावा यह हिंसक तत्व आर्थिक क्षेत्र की आपसी प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे को निपटाने के काम भी आते हैं
इसके बाद भी एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कुछ लोगों ने तो बड़ी बेशर्मी से खास जाति, भाषा और धर्म के समूह पकड़ कर उनके मानवाधिकारों के हनन का प्रचार कर रखा है। इसमें भी उनका स्वार्थ दिखाई देता है। इनमें अगर जातीय या भाषाई समूह हैं तो उनका धरती क्षेत्र ऐसा है जो धन की दृष्टि से उपजाऊ और धार्मिक है तो उसके लिये कहीं किसी संस्था से उनको अप्रत्यक्ष रूप से पैसा मिलता है-उनकी गतिविधियां यही संदेह पैदा करती हैं। इधर फिर कुछ ऐसे देश अधिक धनवान हैं जो धर्म पर आधारित शासन चलाते हैं और उनके शासनध्यक्षों से कृपा पाने के लिये कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता उनके धर्म की पूरे विश्व में बजा रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यह मानवाधिकार कार्यक्रम चलाने वाले जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र की दृष्टि से बंटे समाज में ऐसे छिद्र ढूंढते हैं जिनको बंद करने का प्रयास सुधारक करते हैं।
अखबार में एक नहीं अनेक ऐसी खबरें छपती हैं जिनमें मानवाधिकार हनन का मामला साफ बनता है पर वहां कार्यकर्ता लापता होते हैं। कल एक ब्लाग में पढ़ने को मिला जिसमें बताया कि सरकार ने धारा 498-ए के तहत मामले छानबीन के बाद दर्ज करने का आदेश जारी किया है क्योंकि पाया गया कि इसमें फर्जी मामले दर्ज हुए और शिकायत में ढेर सारे नाम थे पर छानबीन के बाद जांच एजेंसियों ने पैसा खाकर कुछ लोगों को छोड़ा। इतना ही नहीं कई में तो शिकायत ही झूठी पायी गयी। इससे अनेक लोगों को परेशानी हुई। इस तरह के कानून से हमारे भारतीय समाज के कितने लोगों को परेशानी झेलनी पड़ी है इस पर कथित रूप से कोई मानवाधिकार संगठन कभी कुछ नहीं बोला। सरकार ने स्वयं ही यह काम किया। यह कैसे मान लें कि सरकार समाज का दर्द नहीं जानती। मानवाधिकार कार्यकर्ता तो केवल चिल्लाते हैं पर सरकार अपना काम करती है,यह इसका प्रमाण है
सच तो हम नहीं जानते। अखबार और टीवी के समाचारों के पीछे अपने चिंत्तन के घोड़े दौड़ाते है-हमारे गुरु जी का भी यही संदेश है- तब यही सवाल हमारे दिमाग में आते हैं। दूसरा हमारा फार्मूला यह है कि आज कल कोई भी आदमी बिना स्वार्थ के समाज सेवा नहीं करता। फिर उनके चेहरे भी बताते हैं कि वह कितने निस्वार्थी होंगे। हम ब्रह्मा तो हैं नहीं कि सब जानते हों। हो सकता है कि हमारी सोच में ही कमी हो। एक आम लेखक के रूप में यही अभिव्यक्ति दिखी, व्यक्त कर दी।
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Thursday 12 November 2009

गड़े मुर्दे ताजा हो जाते-हिन्दी क्षणिकाएं (murde taza ho jate-hindi short poem)

गड़े मुर्दे उखड़ कर भी
इसलिये ताजा हो जाते हैं।
क्योंकि जिसे मुद्दे पर
चला चर्चा का दौर एक बार
फिर वह कभी मर नहीं पाते हैं।
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नायकत्व का आकर्षण इतना
कि लोग मरों की राख से
अपना चेहरा सजाते।
एक नारा खोजकर
अपनी जुबान से वाद की तरह बजाते।
दिखावे की जिंदगी जीने की आदत
इस कदर हो गयी लोगों में
अपनी ही सच से मुंह स्वयं ही मुंह छिपाते।

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Monday 2 November 2009

मनुष्यता-त्रिपदम (mansushyata-tripadam)

यह लघुता
चाहती है प्रभुता
छुरे के साथ।

वह क्रूरता
नाम रखे साधुता
खूनी हैं हाथ।

बड़ी शत्रुता
मांगती है मित्रता
सोच अनाथ।

मनुष्यता
बरतती पशुता
बनती नाथ।

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Thursday 29 October 2009

अभद्र और अश्लील शब्दों पर नज़र-व्यंग्य आलेख (hindi bhasha-vyangya lekh)

एक टीवी चैनल को उसके मनोरंजक कार्यक्रम में अभद्र और अश्लील शब्दों के प्रयोग पर आखिर नोटिस थमा दिया गया है। हो सकता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ समर्थक इस पर नाराज हों पर यह एक जरूरी कदम है। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई रोक नहीं होना चाहिये पर अभद्र और अश्लील शब्दों के सार्वजनिक प्रयोग पर रोक तो लगानी होगी। स्वतंत्रता समर्थक पश्चिम की तरफ देख कर यहां की बात करते हैं पर उनको भाषाओं के जमीनी स्वरूप का अधिक ज्ञान नहीं है। अंग्रेजी में मंकी शब्द नस्लवाद का प्रतीक है पर भारतीय भाषाओं में इसे इतना बुरा नहीं समझा जाता। इसके अलावा हिंदी भाषा में कई ऐसे शब्द और संकेत हैं जो बड़े भयावह हैं और संभवतः वह अंग्रेजी में तो हो ही नहीं सकते। ऐसे में भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खुलेपन के वैसे मायने भी नहीं हो सकते जैसे पश्चिम में है।
दूसरी भी एक वजह है। यह पता नहीं पश्चिम के लोगों पर की मनस्थिति पर टीवी और फिल्मों में प्रस्तुत सामग्री का कितना प्रभाव पड़ता है ं पर भारत में बहुत पड़ता है। यहां बच्चे बच्चे को टीवी और फिल्मों में दिखाये गये वाक्य और गीत याद रहते हैं। अनेक बार अखबार भी अनेक बार लिखते हैं कि अमुक अपराध अमुक फिल्म को देखकर किया गया। भले ही टीवी और फिल्म वाले कहते हैं कि जो समाज में चल रहा है उसे हम दिखाते हैं पर हम उसका उल्टा देखते हैं। महिलाओं के प्रति अपराध पहले इतने नहीं थे जितने फिल्मों में दिखाने के बाद बड़े हैं। इसके अलावा आशिकों और सिरफिरों के टंकी पर चढ़ने के किस्से भी पहले नहीं सुने गये थे। इनका प्रचलन शोले के बाद ही शुरु हुआ वह भी बहुत समय बाद! एक तरह से इस फिल्म के प्रदर्शित होते समय जो बच्चे थे बड़े होने के बाद इस तरह की हरकत करते नजर आने लगे।
मनोरंजन में भारतीय समाज अपने लिये अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के संदेश ढूंढता है। सीधे शब्दों में लिखी गयी गीता कौन पढ़ता अगर उसके साथ महाभारत की फंतासी या नाटकीयता जुड़ी नहीं होती। हमारे अध्यात्मिक महर्षियों ने महान अध्यात्मिक ज्ञान के रूप में वेदों में सृजन किया पर उसे पढ़ने वाले कितने रहे। यही ज्ञान श्री रामायण, श्रीमद्भागवत, और महाभारत (श्रीगीता उसी का ही एक हिस्सा है) में भी व्यक्त हुआ। उनके साथ अधिक फंतासी या नाटकीयता जैसी सामग्री जुड़ी है इसलिये उनको खूब सुना और सुनाया जाता है, पर उसमें जो अध्यात्मिक संदेश है उसे कौन ध्यान में रखना चाहता है?
कहते हैं कि कमल कीचड़ में और गुलाब कांटों में खिलता है अगर हम भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को कमल या गुलाब माने तो हमें अपने समाज को मनोवृत्ति को कीचड़ या कांटे की तरह मानना ही होगा। यह सत्य की खोज की गयी क्योंकि लोग असत्य का शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं। उन्हें चैमासा ही मनोरंजन चाहिये पर इसलिये उनकी अध्यात्मिक शांति की आवश्यकतायें भी अधिक है। जिस तरह ठंडा खाने के बाद गर्म पदार्थ की आवश्यकता अनुभव होती है वही स्थिति मनोरंजन के बाद मन की शांति पाने की इच्छा चाहत के रूप में प्रकट होती है।
अब ऐसे में यह मनोरंजक चैनल अगर इस तरह अभद्र शब्द या अश्लील शब्द सार्वजनिक रूप से सुनाये तो हो सकता है कि बच्चों पर ही क्या बड़ों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़े। यह तो गनीमत है कि सच का सामना जल्दी बंद हो गया वरना अगर एक दो साल चल पड़ता तो जगह जगह लोग एक दूसरे से सच जानते हुए लड़ते नजर आते। मनोरंजक कार्यक्रमों में शुद्ध रूप से मनोरंजन है पर कोई संदेश नहीं है। उनके कार्यक्रमों में अगर गंदे वाक्य शामिल होंगे तो उनका सार्वजनिक प्रचनल बढ़ेगा। ऐसे में उन पर नियंत्रण रखना चाहिये। अगर इन पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो हो सकता है कि परिवारों में छोटे बच्चे ऐसे शब्दों का उपयोग करने लगें जिससे बड़े शर्मिंदगी झेलने को बाध्य हों।


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Tuesday 20 October 2009

नया सामान और कबाड़-व्यंग्य कविता (naya saman aur kabad-hindi vyangya kavita)

सुनने और पढने वाला
जाल में फंस जाए
विज्ञापन ऐसे ही सजाये जाते हैं.
अगर उनमें सच होता तो
नहीं भर जाते घर उस कबाड़ के सामान से
जिनको खरीदा था कभी चाव से
बड़े महंगे भाव से
आये थे जो सामान नए बनकर ठेले से
वही कभी कबाड़ बनकर फिर उसमें लद जाते हैं.
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बाज़ार अब नगद ही नहीं
उधार पर भी चलते हैं.
चुकाते हुए रोते रहो
नहीं चुकाने पर
चीख पुकार भी मचती है
कभी उधार वाले
पहलवान बनकर गर्दन भी पकड़ते हैं.

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Friday 16 October 2009

खुशियां और दर्द-हिंदी शायरी (khushiyan aur dard-hindi shayri)

बाहर जलती रौशनी देखकर भी
कब तक खुश रहा जा सकता है
अंदर का अंधेरा कभी न कभी
बाहर आकर दर्द देता
खुशियों का बोझ भी कब तक सहा जा सकता है
....................................
अपनी आवाज बुलंद होने का गुमान
कुछ इस तरह है उनको कि
कहीं मशहूर हम भी न हो जायें
वह अपने लबों सें नाम लेते भी डरते हैं।
हम भी कहां चाहते हैं
रौशनी करने की कीमत
क्योंकि ठहरे वह चिराग जो
अपने तले अंधेरा रखते हैं।


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Monday 12 October 2009

छोटे ईमान के लोग बड़े बन जाते-हिंदी व्यंग्य कविता (chhote log-hindi vyangya kavita)

जब बहता था दरिया में पानी
तब भला कौन वादा करता था उसे लाने का।
कहीं बांध बनाये
कहीं रास्ता बदला
पानी को बनाकर बेचने की शय
जिन्होंने बिगाड़ दी प्रकृति की लय
अब वही करते हैं सभी जगह वादा
पानी का दरिया बहाने का।
छोटे ईमान के लोग
बड़े बन जाते हैं इस जमाने में
लेकर सहारा ऐसे ही अफसाने का।
.............................

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Saturday 3 October 2009

दूर उठती लहरें देखकर-हिंदी कविता (zindagi aur samandar-hindi poem)

जिंदगी की इस धारा में
किस किसकी नाव पार लगाओगे।
समंदर से गहरी है इसकी धारा
लहरे इतनी ऊंची कि
आकाश का भी तोड़ दे तारा
अपनी सोच को इस किनारे से
उस किनारे तक ले जाते हुए
स्वयं ही ख्यालों में डूब जाओगे।
दूसरे को मझधार से तभी तो निकाल सकते हो
जब पहले अपनी नाव संभाल पाओगे।
दूर उठती लहरें देखकर
खेलने का मन करता है
पर उनकी ताकत तभी समझ आयेगी
जब उनसे लड़ने जाओगे।

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Tuesday 29 September 2009

प्रायोजन की महिमा-व्यंग्य कवितायें

अपना दर्द यूं जमाने को न दिखाओ
दवा देकर इलाज करने वाले
हर जगह नहीं मिलते हैं।
जो अल्फाजों की जादूगरी से
जख्मों का बहता खून चूस लें
इस जहां में
जुबानी हमदर्दी के ऐसे सौदागर भी मिलते हैं।
..............................
चक्षुहीन करते प्रकृति सौंदर्य का बखान
बहरे सिर हिलाते, सुनकर कोई भी गान
पैसे से प्रायोजन की महिमा होती अपरंपार
गूंगे गाते कविता, मूर्ख बताते वेदों का ज्ञान।
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Tuesday 22 September 2009

अमृत कहाँ धरा है-व्यंग्य कविताएँ (amrut aur zahar-vyangya kavitaen)

फरिश्तों ने छोड़ दिया दौलत का घर
मासूम इंसानों के लिए.
पर शैतानों ने कर लिया उस पर कब्जा,
दिखाया इंसानियत का जज्बा,
करोडों से भर रहे हैं अपने घर
पाई से जला रहे चिराग जमाने के लिए.
वह भी रखे अपने घर की देहरी पर
अपनी मालिकी जताने के लिए.
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जितनी चमक है उनकी शयों में
जहर उससे ज्यादा भरा है.
अमृत तो पी गए फ़रिश्ते किसी तरह बचाकर
छोड़ दिया अपने हाल पर दुनिया को
उसे पचाकर,
शैतानों ने हर शय को सजाकर,
रख दिया बाज़ार में,
कहते भले हों अमृत उसमें भरा है.
पर वह अब इस दुनिया में कहाँ धरा है.
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Saturday 19 September 2009

मिस काल-हास्य व्यंग्य कविताएँ (miss call on mobile-hinde hasya kavitaen)

माशुका अब आशिक के लिये
हो गयी है मिस काल।
वह घंटी बजाकर बंद करती है
फिर करता है आशिक उसे काल।
वह भी क्या करे
आशिक ने जीवन भर सुनने के लिये
मोबाइल तो दिया
मगर अब नहीं भरवा कर दे रहा वार्तालाप समय
कोई पुरुष ‘मिस काल’ बनकर
इश्क की चोरी न कर ले
उसको भी लगता है भय
जब भी कहती है
वार्तालाप समय भरवाने को माशुका
मंदी का बहाने से आशिक देता है टाल।
.................................
सच मोबाइल से रिश्ते निभाने में
सभी को सुविधा हो गयी है
पर बेशर्म बन करें जो मिस काल
उनको कोई परवाह नहीं है
पर पानीदार को वापस करना ही पड़ता है काल
चाहे अनचाहे बात करना दुविधा हो गयी है।
..............................
मोबाइल से रिश्ते
अधिक प्रगाढ़ हो गये लगते
क्योंकि चाहे जब बात करो
दूर बैठे अपने, बहुत पास लगते।
जब तक मिस कालों का
जवाब देते रहो सभी को लगता है अच्छा
न करो तो
कंजूस कहकर इज्जत का नाश करते।
............................
एक दोस्त ने कहा
‘यार, देखो में कितना तुम्हें याद करता हूं
दिन में कितनी बार तो मिस काल करता हूं
एक तुम हो कि जवाब नहीं देते।’
दूसरे ने कहा
‘हां, मैं भी तुम्हें बहुत याद करता हूं
जब तुम्हारा मिस काल आता है
तुम्हारे लिये आहें भरता हूं
वार्ता समय नहीं मेरे मोबाइल में
वरना हम दोनों ही बात कर लेते।’

.............................
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Wednesday 16 September 2009

जो बहते पानी की तरह जिये-हिंदी साहित्य कविता (bahata pani aur samaj-hindi sahityak kaviata)

जब तक प्राचीन स्तंभ खड़े रहेंगे
पहचान बताने के लिये
कोई नहीं जलायेगा नये ज्ञान दिये।
जल चुकी कपास की बाती
फिर नहीं रौशनी फैलायेगी
चाहे जितना भी तेल पिये।

सुगंधित फूलों के कितने भी पेड़
किनारे पर लगा लो
रुका पानी अपने अंदर समाये तालाब
गंदगी से लबालब हो ही जाता है
चलता रहे जो जिंदगी
बदलते ख्यालों के साथ
जिंदगी को वही समझ पाता है
जिंदा रहता है इतिहास उन्हीं समाजों का
जो बहते पानी की तरह जिये।

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Thursday 10 September 2009

नोट पहले क्यों नहीं दिखाया-हास्य व्यंग्य कविता (rupya aur iman-hasya vyangya kavita)

आम आदमी उस कार्यालय पहुंचा तो
सभी के कानों में मोबाइल का तार लगा पाया।
सुन रहे थे सभी गाने
उसके समझ में कुछ नहीं आया।
वह बोलता रहा कुर्सी पर बैठे अधिकारी से
पर उसे अपनी तरफ नहीं देखता पाया।
आखिर उसने जेब से
पांच सौ का नोट दिखाकर उसे दिखाया।
उसे देखते ही अधिकारी ने कान से तार निकाली
और बोला
‘अरे, भई बताओ कौनसा काम है
यह नोट पहले क्यों नहीं दिखाया।’

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Tuesday 8 September 2009

ईमान का दीपक-हिंदी कविता (iaman ka deepak-hindi sahityak kavita)

आजकल के जमाने में दुश्मन कम नहीं है.
किसकी सोचें, क्या और साथ गम नहीं हैं.
आसान है धोखा देना,इसलिए सब देते
वफादारी निभाने का सब में दम नहीं है.
गंदे अल्फाज़ बोलना, बन गया है रिवाज़
बोलकर दिखाते सब कि वह बेदम नहीं है.
उसूलों के दिखावे में माहिर हैं सब लोग
पैसा लूटना किसी से, अब सितम नहीं है.
उनको सलाम, रोशन करते ईमान का दीपक
जमाने को दिखाते कि सब जैसे हम नहीं है.
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Friday 4 September 2009

नजरें फेरते ही-हिंदी कविता (nazaren-hindi poem)

सच बोलना कभी कभी
ठीक नहीं लगता
कड़वा जो होता।
सोचता भी नहीं
कोई दिमाग की हलचल को
सुन न ले
दीवारों के भी कान होता।
हां, लाचार हूं
एकदम बेबस हूं
निगाहों के सामने हैं दोस्त बहुत
नजरें फेरते ही
हर कोई मेरी शिकायतें लिये
कोई दुश्मन ढूंढ रहा होता।
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Tuesday 1 September 2009

टीवी एंकर और कवि-हिंदी हास्य कविता (tv anchor and hindi poet-hindi hasya kavita)

कवि ने टीवी एंकर से कहा
‘यह मेरे साक्षात्कार का बेकार नाटक रचाया।
तुम सवाल करते हुए
जवाब भी बताकर
उसे दोहराने को मजबूर करती थी,
जब अपनी बात कहता तो
ब्रेक लगाकर दूर कर देती थी,
तुम्हारे सवाल मेरे जवाब से लंबे थे
मैं सवाल समझता तुम
जवाब वैसे ही भर देती थी,
यह कार्यक्रम देखकर लोग तुम्हें ही
याद रखेंगे,
मुझे भूल जायेंगे,
लोग इसे देखकर
मुझ पर हंसने लग जायेंगे
इस कार्यक्रम में तो तुमने
मुझे एक तरह से आइटम कवि बनाया।

यह सुनकर एंकर को गुस्सा आया।
वह बोली
‘काहे के कवि हो
पता है ब्लाग पर तुम्हारी
हास्य कविताऐं फ्लाप हो जाती है
मैंने भी पढ़ी
पर समझ में नहीं आती हैं।
आधी रात को प्रसारित होने वाले
इस कार्यक्रम के लिये
कोई आइटम नहीं मिल रहा था
इसलिये तुमको बड़ा कवि बताया।
यह चैनल कोई तुम्हारा मंच नहीं है
इस पर करोड़ों का खर्च आया।
फिर तुम्हें मालुम नहीं है कि
कमाई से ही होता है सम्मान
मैं अपने कार्यक्रम के लिये
इतना पैसा लेती हूं
तो प्रचार भी मुझे ही मिलेगा
तुम जैसे फोकट के कवि का चेहरा दिखाकर
हमारा नाम कार्यक्रमों की तुलनात्मक दौड़ में गिरेगा
कवि हो इतना भी नहीं जानते
महिलाओं से हिट्स होते हैं कार्यक्रम
तुम जैसे कवियों को लोग फालतू मानते
अब जाकर पी लेना
कैंटीन में काफी
वरना वह भी खत्म हो जायेगी
फिर न कहना पहले नहीं बताया।
तुम्हारे साक्षात्कार से
न तो कोई सनसनी फैलेगी,
न जमेगी हंसी की महफिल,
हमारी पब्लिक इसे कैसे झेलेगी,
पता करूंगी इस चैनल में
कौन उल्लू है
जो तुम्हें यहां ले आया।
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Saturday 29 August 2009

कविता की शाम-हास्य कविता (evening of hindi poem-hasya kavita)

एक पुराने कवि ने
अपनी पहली कविता लिखने के दिवस को
साहित्यक पदार्पण दिवस के
रूप में मनाया।
ढेर सारे हिट और फ्लाप कवियों का
जमघट होटल में लगाया।
चला दौर जाम का
कविता के नाम का
सभी ने अपना ग्लास एक दूसरे से टकराया।

अकेले में एक फ्लाप कवि ने
उस कवि से पूछ लिया
‘आप तो पीते हो जाम
बातें करते हो आदर्श की सरेआम
भला या विरोधाभास कैसे दिख रहा है
लोग नहीं देखते यह सब
जबकि अपने नाम खूब कमाया।’

सुनकर वह पुराना कवि हंस पड़ा
और बोला-‘
‘अभी नये आये हो सब पता चल जायेगा
बिना पिये यह जाम
नहीं सज सकती कविता की शाम
जब तक हलक से न उतरे
देश में तरक्की की बात करने का
जज्बा नहीं आ सकता
एकता, अखंडता और जन कल्याण का
नारा कभी नहीं छा सकता
गला जब तर होता है तभी
ख्याल वहां पैदा होते हैं
आम लोग करते हैं वाह वाह
गहराई से चिंतन लिखने वाले
हमेशा ही असफल होकर रोते हैं
अंग्रेज अपनी संस्कृति के साथ
छोड़ गये यह बोतल भी यहां
आजादी की दीवानगी पर लिखने वाले भी
उनके गुलाम होकर विचरते यहां
पढ़ते लिखते नहीं धर्म की किताबें
उन भी हम बरस जाते
सारे धर्म छोड़कर इंसान धर्म मानने की
बात कहकर ऐसे ही नहीं हिट हो जाते
साथ में प्रगति के प्रतीक भी बन जाते
ओढ़े बैठे हैं जो धर्म की किताबों की चादर
उनको अंधविश्वासी बताकर जमाने से दूर हम हटाते
हमने जब भी बिताई अपनी शाम
कविता और साहित्य के नाम छलकाये
बस! इसी तरह जाम
कभी नहीं रखा धर्म से वास्ता
जाम से सराबोर नैतिकता का बनाया अपना ही रास्ता
ऐसे ही नहीं इतिहास में नाम दर्ज कराया।’

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hindi poem, hindi sher, shayri, vyangya kavita, मनोरंजन, शायरी, शेर, संदेश, हिंदी साहित्य

Tuesday 25 August 2009

मजहब और बदलाव-हिंदी व्यंग्य कविता (dharm aur badlav-hindi shayri

बूढ़ी इमारतों की तरह खड़े हैं
उन्हें ढहाना जरूरी
लगता है
पर नया मजहब मत बनाओ।


प्यार और दया तो  इंसानी खून में होते हैं
तुम
अपने लफ्ज और लकीरें खींचकर
कोई नया पैगाम न लाओ।


भूख और प्यास कुदरत का
दिया तोहफा है
जो
इंसान को दुनियां घुमाता है
तुम उसे अपने कागज पर
तकलीफों की तरह न
सजाओ।


जरुरतों के गुलामों की जंजीरों को
सर्वशक्तिमान
नहीं तोड़ सकता
तुम भी ऐसा दावा न जताओ।


दूसरों से उधार लेकर सोच
तुम अपने ख्यालों के
चिराग जला रहे हो
जिंदगी एक बहता दरिया है
जिस पर कोई काबू नहीं कर
सकता
रास्ते बदल सको जमाने के
तुम अपनी ताकत ऐसी न बताओ।


गुस्से को सजाकर शायरी में सजाकर
वाह वाही
बटोरने वालों
जोश से कभी जिंदगी नहीं बदलती
भले ही दिल में बदलाव की चाहत
मचलती
नया मजहब लाकर
कोई दूसरा पैगाम सजाकर
दुनियां में बदला का ख्याल
अच्छा लगता है
पर हर सोच पर झगड़ा बढ़ता  है
जिदंगी को अपनी राह पर
अपनी गति
से चलने दो
सिखाओ लोगों को आंख से देखना
कान से सुनना
दिमाग से
सोचना
वरना तो सामने बैठे जो बैठे है
कुदरत के ऐसे बुत हैं
जो केवल वाह
वाही कर सकते हैं
या बजा सकते हैं तालियां
कुछ दे सकते हैं गालियां
पर
उनसे बदलाव की उम्मीद न लगाओ।
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Friday 21 August 2009

विभाजन का यह सच भी हो सकता है-आलेख (truth of independent-hindi article)

1947 में देश के दो भागों-बाद में तीन भाग हो गये-में बंटने का मुद्दा अक्सर चर्चा का विषय बनता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जैसे रटीरटाई बातें फिर दोहराई जा रही हैं। इतिहास के दर्ज तथ्यों का विश्लेषण कागजों में दर्ज और दृश्यव्य पात्रों के आधार सीमित दायरे में करना सभी के लिये आसान है पर अगर उससे अलग हटकर विचार करना हो तो बहुत मुश्किल होता है। इस लेखक के पूर्वजों ने उस विभाजन का दर्द भोगा है और उनसे समय समय पर हुई चर्चा में अनेक ऐसी बातें हैं जो अनेक बार दोहराई जा चुकी हैं। फिर भी ऐसा लगता है कि कुछ ऐसा है जिस पर किसी विद्वान ने दृष्टिपात करने का प्रयास नहीं किया है। हम यहां थोड़ा दृश्यव्य पात्रों के पीछे जाकर देखने का प्रयास करें तो लगता है कि भारत के विभाजन में इस देश के लोग नहीं बल्कि ब्रिटेन के रणनीतिकारों की कुटिल चालें जिम्मेदार हैं। ऐसा लगता है कि इस देश में महात्मा गांधी के अलावा तो कोई ऐसा व्यक्ति न था जिसमें देश का विभाजन कराने या उसे रोकने का माद्दा था।
हम अपने भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन गाथा को जानते हैं। मगर दुर्भाग्य यह है कि हमने उनके कार्य और प्रभाव का आंकलन केवल स्वतंत्रता संग्राम तक ही सीमित करते हुए देखते हैं और इस बात को भूल जाते हैं कि हमारे देश की स्वतत्रंता के केवल हमें ही मतलब था अन्य किसी को नहीं-शेष विश्व के लिये तो महात्मा गांधी एक विराट व्यक्तित्व थे। महात्मा गांधी जैसे चरित्र विरले होते हैं और इस बात की पूरी संभावना थी कि अगर इस देश की आजादी और स्वरूप वही होता जैसा वह चाहते थे तो संभवतः वह विश्व में भगवान की तरह पुजते और उनके बैरी यही नहीं चाहते थे और विभाजन उनकी इसी कुटिल नीति का परिणाम था।
हम महात्मा गांधी के चरित्र और जीवन के विश्लेषण से पहले स्वतंत्रता संग्राम के अन्य सेनानियों को नमन करना नहीं भूल सकते। शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकल्ला, उधम सिंह, वीर सावरकर सुभाषचंद्र बोस तथा अन्य कितने ही क्रांतिकारियों के नाम इतिहास में दर्ज हैं और उनकी भूमिका को कम आंकना गद्दारी करने जैसा है, मगर इतिहास हो या साहित्य उसे हमेशा ही अपनी रचना और पाठ के लिये एक शीर्षक की आवश्यकता होती है। अगर हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक प्राकृतिक पाठ माने तो उसके शीर्षक में महात्मा गांधी का नाम आता है। यह शीर्षक देने की बाध्यता है कि दक्षिण अफ्रीका में भी अनेक नेताओं ने बलिदान किये पर वहां शीर्षक पर नाम आया नेल्सन मंडेला का। हम भारतीय स्वतत्रंता संग्राम के शीर्ष पुरुष महात्मा गांधी को केवल देश की आजादी के परिप्रेक्ष्य में ही देखते हैं इसलिये हमारा ध्यान उन तथ्यों से हट जाता है जिसकी वजह से देश का विभाजन हुआ।
दक्षिण अफ्रीका में एक ट्रेन से यात्रा करते हुए एक भारतीय बैरिस्टर को इसलिये डिब्बे से उतारा गया क्योंकि वह अंग्रेजों के लिये सुरक्षित था। हां, यह जंग उसी दिन ही शुरु हुई और उसका समापन भारतीय विभाजन पर ही हुआ। वह बैरिस्टर थे महात्मा गांधी जिन्हें वह अपमान सहन नहीं हुआ। उसके बाद तो उन्होंने अफ्रीका में भेदभाव के खिलाफ आंदोलन शुरु किया। लोग इस आंदोलन का अब सही मतलब नहीं समझते। दरअसल सशस्त्र संघर्ष जीतने वाले अंग्रेजों के लिये महात्मा गांधी का अहिंसक संघर्ष कांटे चुभने जैसा था। उस समय अंग्रेज बहुत ताकतवर थे पर वह अपने आपको सभ्य, शिष्ट और नई दुनियां का जनक दिखने की उनकी ख्वाहिश सब जानते थे। हिंसा का प्रतिकार करने में उनका कोई सानी नहीं था पर जस की तस नीति अपनाते हुए इन अंग्रेजों के विरोधी भी हिंसा कर रहे थे। इन हिंसक आदोलनों और युद्धों को कुचलते हुए अंग्रेज विजय राह पर चलते जाते और फिर अपने चेहरे और चरित्र से सभ्य दिखने का प्रयास करते। अनेक देशों के समाजों के अंतद्वंद्वों में प्रवेश कर वह न्यायप्रिय दिखने का प्रयास करते। गोरे चेहरे की वजह से लोगों का उनके प्रति वैसे भी आकर्षण था।
अंग्रेजों को पास से देखने वाले श्री महात्मा गांधी इस बात को समझ गये और उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह का सहारा लिया। अंग्र्रेजों के पास इसका कोई जवाब कभी नहीं रहा। अगर वह महात्मा गांधी से हिंसक तरीके से निपटते तो उनके सभ्य होने की सारी पोल खुल जाती और नहीं निपटते तो उनका रथ बढ़ता ही जा रहा था। यह रथ केवल स्वतंत्रता प्राप्ति तक ही सीमित नहीं रहने वाला था क्योंकि इसके परिणाम एतिहासिक होने थे और संभव है कि वह विश्व के एक ऐसे मसीहा बन जाते जिसके आगे अंग्रेजों के इष्ट देव भी फीके नजर आते।
अंग्रेज हार रहे थे। भारत में राज्य करना उनके लिये आसान नहीं था। इसके अलावा द्वितीय विश्व युद्ध में महात्मा गांधी की सकारात्मक भूमिका ने आम अंगेे्रज के मन में उनके प्रति श्रद्धा भर दी थी। अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र करने का निर्णय लिया पर उनके रणपनीतिकारों के मन में महात्मा गांधी के प्रति बदले की भावना होने के साथ ही यह चिंता भी थी कि कहीं आगे चलकर उनके देश में महात्मा गांधी जी के स्मारक जगह जगह न बनने लगे।
भारत का विभाजन उनकी एक दूरगामी योजना का हिस्सा था और इसे केवल एक ही आदमी जानता था। वह थे स्वयं महात्मा गांधी। हम अगर उनके विचारों और कार्यों का अवलोकन करें तो यह सच सामने आता है कि इस धरती पर गोरों की चालाकियों का इलाज करने वाला एक ही चिकित्सक था ‘महात्मा गांधी‘।
गांधी जी विभाजन के लिये तैयार नहीं थे पर उनके आसपास अंग्रेज अपना जाल बुन चुके थे। शासन पर उनका बरसों से नियंत्रण था इसलिये उनके लोग हर जगह थे और यह कोई आसान काम नहीं था कि उसके सहारे वह आजादी के तत्काल बाद तक अपना हित पूरे करवा सकें। सच तो यह गुलामी के अंतिम दिनों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल महात्मा विरुद्ध अंग्रेज तक ही सीमित रह गया था और इसे उनके अलावा कोई नहीं जान पाया।
स्वतंत्रता संग्राम अंततः एक आंदोलन था और उसमें महात्मा गांधी के अलावा अन्य सैंकडों लोग थे। शायद उस समय एक नहीं हजारों लोग ऐसे थे जो आजादी पाने के लिये उतावले थे और ऐसे में महात्मा गांधी के लिये अकेले अपना निर्णय थोपना आसान नहीं रह गया था। उन्होंने अनिच्छा से विभाजन होने दिया मगर अंग्रेज इससे संतुष्ट नहीं होने वाले थे। उनका मुख्य ध्येय तो महात्मा गांधी से बदला लेना था। शासन में उनकी पैठ इतनी आसानी से समाप्त नहीं होने वाली थी। यही कारण है कि निचले स्तर पर उनके ही लोगों ने हिंसा का तांडव शुरु किया होगा-यह भी संभव है कि उन्होंने स्वयं हिंसा न कर हिंसक तत्वों को खुलेआम ऐसा करने की छूट दी होगी।
एक बात याद रखिये। अंग्रेजों का इष्ट देव भी गुलामों को आजादी दिलाने के कारण ही पूरे विश्व में पूजा जाता है ऐसे में इस बात की आशंका उनको रही होगी कि कहीं महात्मा गांधी उनकी जगह न लें। यही कारण है कि उन्होंने सोची समझी योजना के तहत इस हिंसा का आयोजन किया होगा। दरअसल उनका उद्देश्य भारत का विभाजन करने से अधिक उसकी आड़ में हिंसा कराना ही रहा होगा।
क्या यह विडंबना नहीं है कि जिन महात्मा गांधी ने अनेक बार अंग्रेजों की हिंसा के विरुद्ध सत्याग्रह किया वही आजादी के तत्काल बाद अपने ही लोगों के कुकृत्य के विरुद्ध उसी हथियार का सहारा ले रहे थे-याद रहे नोआखली में उन्होंने देश में हुई हिंसा के विरुद्ध सत्याग्रह किया था। दरअसल यह हिंसा देश की हार थी और अंग्रेज पूरे विश्व में यह संदेश देने में सफल हो गये थे कि महात्मा गांधी के संदेश को तो उनके लोग ही नहीं मानते। इसके अलावा चर्चिल भी कहा करते थे कि भारतीयों को राज्य करना नहीं आता-अंग्रेज उसे प्रमाणित करते हुए विजयी मुद्रा में इस देश से विदा हुए थे और यहां से जाने का दर्द इसी हिंसा को देखकर भुलाया था।
कुछ लोगों कहते हैं कि इसने विभाजन कराया या उसने जो कि उनका केवल भ्रम है। बाकी सारे पात्र तो केवल जाने अनजाने अंग्रेजों के अनुकूल अभिनय कर रहे थे। उस समय महात्मा गांधी के अलावा कोई ऐसा दमदार शख्स नहीं था जो उनको अपनी औकात दिखा सके।
यह इस पाठ के लेखक की अपनी सोच है और उसका आधार इस देश में समय समय पर योजनाबद्ध रूप से सामूहिक हिंसा हुई अनेक ऐसी घटनायें हैं जो इस बात को प्रमाणित करती हैं कि यह प्रवृत्ति अंग्रेजों की ही देन है। याद रखिये घटनाओं की तारीख, समय और पात्र बदल सकते हैं पर उनसे झांकती प्रवृत्तियां हमेशा यहां रहती हैं और समय समय पर प्रकट होती हैं।
इस पाठ की प्रेरणा भी एक दो घटना से नहीं मिली बल्कि अनेक अवसरों पर इस विषय पर होने वाली चर्चाओं के समय इस लेखक के मन में यह विचार आते हैं।
कहने को विश्व में अनेक नेता हुए हैं पर महात्मा गांधी जैसे विलक्षण व्यक्तित्व कभी कभी आते हैं। एक मजे की बात यह है कि अंग्रेज वर्तमान सभ्यता को अपनी ही देन समझते हैं और महात्मा गांधी का अहिंसा का मंत्र इसी सभ्यता में ही सर्वाधिक महत्व का है। अंग्रेजों को यह दर्द आज तक सताता है कि उनकी काट हिटलर, मुसोलिनी और स्टालिन जैसे सैन्य बल से संपन्न योद्धा नहीं ढूंढ पाये उसे एक काले बैरिस्टर ने ढूंढ निकाला। वह उस टीटी को कोसते होंगे जिसने उसे ट्रेन के डिब्बे से उतारा था। आखिरी बात यह है कि गांधीजी की अहिंसा और सत्याग्रह का मंत्र किसी भी आंदोलन को ताकत दे सकता है पर बशर्ते है कि उसके नेताओं में सब्र हो।
यह इस पाठ के लेखक की एक सोच है जो कई बरसों से दिमाग में घुमड़ रही थी जिसे आज व्यक्त कर दिया। एक मामूली लेखक के लिये इससे अधिक भूमिका होती भी नहीं है। हो सकता है कि इस सोच में कमी हो पर दृश्यव्य इतिहास के पीछे झांकने का प्रयास करना कोई सरल काम नहीं होता। इसमें मूर्खतायें हो जाना स्वाभाविक हैं।
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Sunday 9 August 2009

चमड़ी हो या दमड़ी-हास्य कविता (chamdi ho damdi-hasya kavita)

स्वाईन फ्लू की बीमारी ने आते ही देश में प्रसिद्धि आई।
इतने इंतजार के बाद, आखिर शिकार ढूंढते विदेश से आई।।
ढेर सारी देसी बीमारियां पंक्तिबद्ध खड़ी होकर खड़ी थी
पर तब भी विदेश में बीमारी के नृत्य की खबरें यहां पर छाई।
देसी कुत्ता हो या बीमारी उसकी चर्चा में मजा नहीं आता
देसी खाने और दवा के स्वाद से नहीं होती उनको कमाई।।
महीनों से लेते रहे स्वाईन फ्लू का नाम बड़ी शिद्दत से
उससे तो फरिश्ता भी प्रकट हो जाता, यह तो बीमारी है भाई।।
करने लगे हैं लोग, देसी बीमारी का देसी दवा से इलाज
बड़ी मुश्किल से कोई बीमारी धंधा कराने विदेश से आई।।
कहैं दीपक बापू मजाक भी कितनी गंभीरता से होता है
चमड़ी हो या दमड़ी, सम्मान वही पायेगी जो विदेश से आई।।

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