Friday, August 12, 2016

धरती पर स्वर्ग-हिन्दी कविता (Dharati Par Swarg-Hindi Kavita)

मतलब की बात
जल्दी सुनते
वरना बहरे हो जाते हैं।

डराते जो ज़माने को
खौफ में जीत वह भी
उनके घर खड़े पहरे हो जाते हैं।

कहें दीपकबापू सरलता से
जीवन बिताने की आदत
बना देती धरती पर स्वर्ग
चालाक अंदाज से
दुश्मन गहरे हो जाते हैं।
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Wednesday, July 27, 2016

मौसम और मन के मिजाज-हिन्दी कविता (Mausam ki Mizaz-HindiShayari)

साथ चलते इंसान
परिंदों की तरह उड़ गये।

उनकी यादों ने 
कुछ देर परेशान किया
फिर नये राही जुड़़ गये।

कहें दीपकबापू हम भी
खड़े देखते रहे
मौसम और मन के मिजाज
धूप से लड़ने की ठानी
कभी छांव की तरफ भी मुड़ गये।
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Friday, July 15, 2016

अर्थ के बाग-हिन्दी कविता(Arth ke Baag-HindiPoem)

पर्दे पर रोज
पुराने चेहरे ही
कुश्ती करने आते हैं।

दंगे में शांति का
पर्व में क्रांति का शब्द
कान में भरने आते हैं।

कहें दीपकबापू वाणी से
कमाना जिन्होंने सीख लिया
उनके मुख से निकले वाक्य
अर्थ के बाग चरने आते हैं।
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Monday, June 27, 2016

दिल का दाव-हिन्दी व्यंग्य कविता (Dil ka Dav-Hindi Satire Poem)

शिकायत न करें तो
लोग कमजोर
करें तो दुश्मन माने।

हम समझें मित्र
वह मोल देखकर
कभी कम कभी ज्यादा जाने।

कहें दीपकबापू संबंधों में
चलते हिसाब किताब
लालच पर दिल का दाव
कभी लगाने की न ठाने।
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Tuesday, June 14, 2016

विचार युद्ध जारी है-हिन्दी व्यंग्य कविता(Vichar Yuddh Jari hai-Hindi Satire Poem)


विध्वंस के दौर में
उबाऊ बहसों में
विचार युद्ध जारी है।
तर्कशास्त्र कभी पढ़े नहीं
डटे विद्वान मंच पर
विचार युद्ध जारी है।

कहें दीपकबापू निष्कर्ष से
संबंध नहीं रखते
उन बुद्धिमानों का
शब्द से अर्थ की वसूली में
विचार युद्ध जारी है।
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Wednesday, June 1, 2016

दूर के ढोल-हिन्दी कविता(Door ke Dhol-Hindi Poem)

वाणी से निकले 
शब्द सुनते जाओ
सवाल पूछो नहीं।

खेत की सुनायें
या खलिहान पर बुदबुदायें
उनकी पहेली बूझो नहीं।

कहें दीपकबापू दूर का ढोल
अच्छा लगते रहने दो
डर जाओगे
इसलिये पास जाने के लिये
यूं ही जूझो नहीं।
----------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, May 20, 2016

सोफे पर चिंत्तन-हिन्दी कविता (Thoughts on Sofa-Hindi Poem)

धूप की तपिश से दूर
जिन्होंने बैठक पायी
पानी की प्यास नहीं जाने।

सोफे पर पांव पसारे
करते हैं चिंत्तन
गरीबी दूर करने की ठाने।

कहें दीपकबापू भीड़ में
भाषण करने की कला
सभी को नहीं आती
हो गये जो महारथी
शब्द तीर की तरह बरसाते
भाषा का धनुष ताने।
-----------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Thursday, May 5, 2016

मशहूरी का खेल-हिन्दी कविता(Play of Popularty-Hindi Poem)

अपना दिल साफ नहीं
परायों पर बदनीयती का
इल्जाम लगाते।

योग्यता के अभाव में
भला काम होता नहीं
ज़माने में कसूर जताते।

कहें दीपकबापू मशहूरी के
खेल में जीतने वाले गरियाते
हारने वाले भी
कभी नहीं पछताते।
---------------

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, April 30, 2016

हालत का कसूर है पुण्य का भागी बना दिया-हिन्दी क्षणिकायें (Halat ka Kasur hai Punya ka Bhagi Bana diya-HindiShortPoem)

ऊंची इमारतों का विज्ञापन
रंगीन पर्दे पर ही
देख खुश हो जाओ।

जमीन पर विकास का सच
ढूंढने मत जाना
दिल टूट जायेगा
आंखें अंधेरे में न ले जाओे।
----------------
वह पुतले पर्दे पर
रोज दिखने के लिये
फिक्रमंद हैं।

नट के हाथ में डोर
उनकी अदा की भी खूब चर्चा
पर नतीजे का जिक्र बंद है।
---------
निर्देशक पुराने चेहरों पर
रोज लगाते नया मुखौटा
लोग बहल जाते हैं।

जिंदगी का खेल चलता
रुपहले पर्दे पर
कभी दर्शक होते खुश
कभी दहल जाते हैं।
--------
हम तो खड़े थे
उनके इंतजार में
वह बचने के लिये
राह ही बदल गये।

हमारी अदा या चेहरे से डरे
पता नहीं
हमसे मुंह फेरने के लिये
अपनी चाह ही बदल गये।
------------
न पैसा पाया
न मिली प्रतिष्ठा
भाग्य ने जबरन
त्यागी बना दिया।

पाप कमाने का
कभी मौका मिला नहीं
यह तो हालत का कसूर है
पुण्य का भागी बना दिया।
-------

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Tuesday, April 19, 2016

धर्म का खेल-हिन्दी कविता (Play Of Religion-HindiPoem)

धर्म को खेल समझें
गेंद की तरह
लोग बदल देते हैं।

एक इष्ट से न मिले फल
दिल में जगह
उसकी बदल देते हैं।

कहें दीपकबापू न लें साथ
उनका जिनकी नीयत में
बदलने की आदत शामिल है
काम क्रोध व लोभ की आंच में
वह जनक जननी भी बदल देते हैं।
----------- 

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, April 9, 2016

बिकने की शय-हिन्दी कविता (Bikne ki Shay-Hindi Kavita)

जिंदा रहने की शर्तें
हम स्वयं ही
दिल में तय कर देते हैं।

जिंदगी के खेल में
जीत की चिंता
हार का भय भर देते हैं।

कहें दीपकबापू सद्भावना से
जीने की चाहत सभी की होती
मगर अहंकार के बाज़ार में
बिकने की शय कर देते हैं।
-----------

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Tuesday, March 22, 2016

विज्ञापन के नायक-हिन्दी कविता (Vigyapan ke Nayak-Hindi Kavita Hero Of Add-HindiPoem)

विज्ञापन के प्रभाव में
कभी कभी
तुच्छ इंसान भी
नायक बन जाते हैं।

संगीत के शोर में
बुरे स्वर के स्वामी भी
महान गायक बन जाते हैं।

कहें दीपकबापू दौलत से
गुण नहीं मिलते
पर खर्च करने से
नाकाम भी लायक बन जाते हैं।
------------

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, March 12, 2016

प्रकाशपुंज अंधेरे से हारते लग रहे हैं-हिन्दी कविता(Prakashpunj Andhere se harte lag rahe hain-HindiKavita)

शहर में खड़ी
आकर्षक इमारतों में
घर टूटे लग रहे हैं।

सड़क पर चलती
रंगबिरंगी कारों में
सवार सोते से जग रहे हैं।

कहें दीपकबापू आराम से
जीना भूल गया ज़माना
ढूंढ रहा सुख का खजाना
बृहद प्रकाशपुंज भी
अंधेरे से हारते लग रहे हैं।
-------------- 

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Wednesday, March 2, 2016

सवाल बवाल-हिन्दी कविता(Sawal Bawal-Hindi Kavita)

खामोश रहें तो
करते शिकायत 
हम नहीं सवाल करते हैं।

अपने शब्द कहें तो
अपने अर्थ लगाकर
बवाल करते हैं।

कहें दीपकबापू हृदय में
जिनके छाया अंधेरा 
प्रकाश मांगते उधार में
आदर्श की बातें करते
घर में ज़माने भर का
माल भरते हैं।
----------
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Saturday, February 20, 2016

पतझड़ की नयी सुगंध-हिन्दी कविता (Patjhad ki nayi sugandh-Hindi Kavita)

उपवन में फूल के साथ कांटे
कमल के साथ कीचड़ भी है
दोनों का नाता देख
अपनी जिंदगी के 
हसीन पलों से जुड़े
गम के दर्द का
अहसास कम हो जाता है
बसंत के पीछे
पतझड़ यूं ही नहीं आता
ऋतु परिवर्तन से
नयी सुगंध भी साथ लाता है।
--------------
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Thursday, February 4, 2016

जिंदगी का हिसाब-हिन्दी कविता(Zindagi ka Hisab-Hindi Kavita)


इतनी बड़ी जिंदगी
हर पल का हिसाब
किस बहीखाते में लिखते।
दो भुजा दो पांव
एक मुख  हमारे साथ
कहां कहां दिखते।
कहें दीपकबापू
अपने सीने में
पल रहा दर्द
किसके कान में डालकर
इलाज की चाह रखते
यहां  ऊंची   छवि के
लोग भी सस्ते में बिकते।
...................
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Monday, January 18, 2016

घृणा की राह प्रेम की चाह-हिन्दी कविता-(Grana ki rah prem ki chah-Hindi Kavita)

घृणा की राह पर
बिना प्रयास चलना
एकदम सहज होता है।

प्रेम की चाह पर
जब परीक्षा का समय आता
त्याग असहज होता है।

कहें दीपकबापू हृदय के भाव में
बहता हुआ आदमी
कुछ तय नहीं कर पाता
खुशी या हादसा
नतीजा महज होता है।
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Thursday, December 31, 2015

खरीखोटी नीयत-हिन्दी कविता(KhariKhoti Neeyat-Hindi Kavita)

ज़माने के हालात वही रहे
तारीख बदल जाती है।

वादे सुनते हुए
निकाल दी जिंदगी
जुबान देने वाली
सूरतें बदल जाती हैं।

कहें दीपकबापू विश्वास से
नाता टूटे बरसों बीते
खरे सिक्कों की नीयत भी
खोट में बदल जाती है।
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Tuesday, December 22, 2015

अभिव्यक्ति-हिन्दी शायरी(AbhiVyakti-HindiShayari)

हम पर निगाह रखते
हाथ से इशारा
कभी करते नहीं।

हृदय में सद्भाव
सामने आकर
कभी शब्द भरते नहीं ।

कहें दीपकबापू अपनी चाहत से
स्वयं ही तुम छिपते रहो
मगर हम अपनी
अभिव्यक्ति से डरते नहीं।
------------
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Saturday, December 12, 2015

प्रकाशपुंज-हिन्दी कविता(Prakashpunj-Hindi Kavita)

सफलता का उत्सव
मनाने का प्रचलन
समाज में चला है।

खाने के लोभ में
उठता नहीं सवाल
किस तेल में तला है।

कहें दीपकबापू अंधेरे में
सोते लोग नहीं देखते
राजभवनों में
प्रकाशपुंज कैसे जला है।
--------
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