Tuesday, July 28, 2015

आम जनमानस की उपेक्षा करने वाले अंतर्जाल की ताकत समझें(aam janmanas ki upeksha karane wale social media ki takat samjhen)


                    सार्वजनिक जीवन में मानवीय संवेदनाओं से खिलवाड़ कर  सदैव लाभ उठाना खतरनाक भी हो सकता है। खासतौर से आज जब अंतर्जाल पर सामाजिक जनसंपर्क तथा प्रचार की सुविधा उपलब्ध है। अभी तक भारत के विभिन्न पेशेवर बुद्धिजीवियों ने संगठित प्रचार माध्यमों में अपने लिये खूब मलाई काटी पर अब उनके लिये परेशानियां भी बढ़ने लगी हैं-यही कारण है कि बुद्धिजीवियों का एक विशेष वर्ग अंतर्जालीय जनसंपर्क तथा प्रचार पर नियंत्रण की बात करने लगा है।
                              1993 में मुंबई में हुए धारावाहिक बम विस्फोटों का पंजाब के गुरदासपुर में हाल ही में हमले से सिवाय इसके कोई प्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं है कि दोनों घटनायें पाकिस्तान से प्रायोजित है।  बमविस्फोटों के सिलसिले में एक आरोपी को फांसी होने वाली है जिस पर कुछ बुद्धिमान लोगों ने वैसे ही प्रयास शुरु किये जैसे पहले भी करते रहे हैं। इधर उधर अपीलों में करीब तीन सौ से ज्यादा लोगों ने हस्ताक्षर किये-मानवीय आधार बताया गया। इसका कुछ सख्त लोगों ने विरोध किया। अंतर्जाल पर इनके विरुद्ध अभियान चलने लगा। इसी दौरान पंजाब के गुरदासपुर में हमला होने के बाद पूरे देश में गुस्सा फैला जो अंतर्जाल पर दिख रहा है। लगे हाथों सख्त मिजाज लोगों ने इन हस्ताक्षरकर्ता बुद्धिजीवियों पर उससे ज्यादा भड़ास निकाली।  जिन शब्दों का उपयोग हुआ वह हम लिख भी नहीं सकते। हमारे हिसाब से स्थिति तो यह बन गयी है कि इन हस्ताक्षरकर्ता बुद्धिजीवियों के हृदय भी अब यह सोचकर कांप रहे होंगे कि गुरदासपुर की घटना के बाद आतंकवाद पर उनका परंपरागत ढुलमुल रवैया जनमानस में स्वयं की खलनायक छवि स्थाई न बना दे।
                              हमने पिछले दो दिनों से ट्विटर और फेसबुक पर देखा है।  यकीनन यह लोग अभी तक अंतर्जालीय मंच को निम्न कोटि का समझते हैं शायद परवाह न करें पर कालांतर में उनको यह अनुभव हो जायेगा कि संगठित प्रचार माध्यमों से ज्यादा यह साामाजिक जनसंपर्क और प्रचार माध्यम ज्यादा शक्तिशाली है। सबसे बड़ी बात यह कि आम जनमानस के प्रति उपेक्षा का रवैया अपनाने वाले इन लोगों का इस बात का अहसास धीरे धीरे तब होने लगेगा उनके जानने वाले तकनीक लोग उन्हें अपनी छवि के बारे में बतायेंगे।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Saturday, July 25, 2015

श्रीमद्भागवत गीता का महत्व शब्दों में बयान करना संभव नहीं(shri madbhagawat geeta ka mahatva shabdon ke bayan karna sambhav nahin)


                              अनेक बार फुर्सत के क्षण मे जब इस लेखक की अपने  अंतर्जाल पर स्वरचित पाठों पर दृष्टि जाती है तो पता चलता है कि श्रीमद्भागवत गीता से संबद्ध सामग्री अन्य की तुलना में ज्यादा पाठकों को प्रभावित करती है। अनेक लोग यह दावा करते हैं कि वह अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण श्रीमद्भागवत गीता के प्रति अधिक संवदेनशील है।  अनेक लोग कहते हैं कि श्रीमद्भागवत गीता में उनकी आस्था है।  अनेक पेशेवर धार्मिक बुद्धिमान श्रीमद्भागवत गीता के संदेश सुनाकर यह प्रमाणित करते हैं कि वह समाज को सुधारने के योग्य हैं।
                              एक योग साधक तथा श्रीगीता का नियमित पाठक होने के कारण इस लेखक ने अंतर्जाल पर अनेक अध्यात्मिक पाठ लिखे  है पर श्रीगीता के महत्व का बखान करने केे लिये शब्द पर्याप्त नही होते।  हमारा मानना है कि  श्रीगीता के संदेश जो मर्म में स्थापित कर लेगा वह कभी उसके प्रति संवेदनशील नहीं होगा।  श्रीगीता जीवन जीने की कला सिखाने का वह ग्रंथ है जो व्यक्ति को मार्मिक नहीं कार्मिक बनाती है।  भावनाओं में बहने की बजाय सांसरिक विषयों के सागर से भागने की बजाय उसमें होती उथल पुथल में स्थिर खड़े रहना सिखाती है।  जिसमें श्रीगीता समा गयी वह आस्था का प्रचार नहीं करता वरन् उसका व्यक्तित्व, व्यवहार और विचार उसके ज्ञानी होने का प्रमाण देते हैं।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने संदेशों में साफ कहा है कि श्रीगीता का ज्ञान हमेशा उनके भक्तों के बीच में ही दिया जाना चाहिये।  सार्वजनिक रूप से श्रीगीता का ज्ञान बघारना यही साबित करता है कि वक्ता उसका अनुसरण नहीं कर रहा है।
                              हमारे यहां अक्सर कहा जाता है कि दूसरे की धार्मिक आस्था पर सवाल नहीं उठाना चाहिये। श्रीमद्भागवत गीता का पाठक कभी भी यह काम नहीं करेगा क्योंकि उसे यह समझाने या सिखाने की जरूरत नहीं है कि भक्त और भक्ति के प्रकारों के अनुसार चार प्रकृत्ति के लोग इस विश्व में निवास करेंगे। सच बात तो यह कि श्रीगीता विश्व का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान के सिद्धांत एक साथ मौजूद हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Monday, July 20, 2015

सच के पांव छिपाये जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता(sach ke paanv chhipaye jate hain-hindi satire poem)

हमेशा तकलीफ देने वालों की
शिकायत करना बेकार है
मसला है उन हमदर्दों का
जो नये घाव दे जाते हैं।

लुटेरों से सफाई कौन मांगता
शिकायत है उन पहरेदारों से
उनके हाथ जो खजाना दे आते हैं।

कहें दीपक बापू चमकीले पर्दे पर
झूठे किस्से बयान किया जाते
सच के पांव पीछे ले जाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Thursday, July 16, 2015

हिन्दी समाचार चैनल उच्च स्तर से बहुत दूर-हिन्दी चिंत्तन लेख(hindi new chainal far away form high standard-hindi thought article)


                              हमारे देश के निजी हिन्दी टीवी समाचार चैनल अभी प्रसारण के उच्च स्तर से बहुत दूर हैं। बहुत समय से सोचते रहे हैं कि हिन्दी टीवी समाचार चैनलों पर अपनी राय रखें पर लगता नहीं है कि पहले तो सही जगह बात पहुंचेगी दूसरा यह कि इसका कोई प्रभाव पड़ेगा। वैसे भी हम जैसे असंगठित लेखकों के पढ़ने वाले लोग अधिक नहीं होते हैं।  बहरहाल भारत के जितने भी राष्ट्रीय हिन्दी समाचार चैनल हैं उनमें शायद ही कोई अब लोकप्रियता की दौड़ में है।  इन चैनलों के पास समाचारों के लिये क्रिकेट, पाकिस्तान की सीमा पर गोलीबारी और चीन के ड्रोन के अलावा अगर कोई चौथी सनसनीखेज खबर होती है तो वह भारतीय समाज में कथित साप्रदायिक तनाव को इंगित करती है। इस मुद्दे पर किसी का एक कोने में दिया गया बयान पहले पूरे देश में जबरदस्ती सुनाकर फिर उस पर बहस करते हैं।
                              इन चैनलों के प्रबंधकों का यह पता होना चाहिये कि मनोरंजन के लिये बहुत सारे चैनल है।  कुछ प्रादेशिक चैनल इन राष्ट्रीय चैनलों से बेहतर समाचार प्रसारण कर रहे हैं। इन चैनलों की सबसे बुरी प्रवृत्ति यह दिखाई दे रही है कि यह न्यायपालिका पर अप्रत्यक्ष हमला करते हैं। इतना ही नहीं सरकार की कुछ अपराधियों के विरुद्ध की गयी कार्यवाही में भी मीनमेख निकालने का प्रयास करते हैं-यह जानते हुए भी कि अंततः न्यायपालिका के बिना यहां किसी को सजा नहीं दी जा सकती।  बहरहाल इन राष्ट्रीय टीवी समाचार चैनलों को यह पता होना चाहिये कि दृनियां भर की खबर लेना भी एक नशा है जिसे यह परोस नहीं पा रहे।  उन्होंने अपनी विषयों का इतना सीमित कर दिया है कि समाचारों के अनेक  नशेड़ी भी अब इनसे विरक्त होने लगे हैं।  सभी चैनल एक जैसे हैं और यह कोई नशेड़ी यह नहीं बता सकता कि उसने कौनसा समाचार किस चैनल पर सुना था।  बहसों पर तो कोई बात भी नहीं करता। इसमें दिये गये तर्क इतने प्रायोजित होते हैं कि इसमें शामिल कथित विद्वानों से बेहतर सोच तो समाचारों के नशेड़ी स्वयं अपने पास रखते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, July 11, 2015

धूप में बाल सफेद-हिन्दी व्यंग्य कविता(dhoop mein bal safed-hindi satire poem)

कमजोर सपने बुनकर
 झूठे वादे चुनकर
अपनी उम्र बिताते हैं।

किया नहीं किसी का भला
तना रहा हमेशा गला
सम्मानीय दिखने के लिये
अब भी इतराते हैं।

कहें दीपक बापू बड़ी उम्र से
बड़े कहलाने के लिये
मरे जाते बहुत लोग
पूरी जिंदगी अपने बाल
धूप में जो सफेद किये जाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Sunday, July 5, 2015

गरीबी शब्द आकाशीय फरिश्ते का प्रतीक-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख(garibi shabda aakshiya farishte ka prateek-hindi satire thought article)

                              ‘गरीबीशब्द अब किसी श्रेणी की बजाय किसी आकाशीय फरिश्ते  का प्रतीक लगता है।  यह फरिश्ता अपनी चादर ओढ़े विचरने वालो  लोगों की तरफ तो नहीं देखता मगर अपना नाम जपने वालों को तख्त की सीढ़ियों पर पहुंचा देता है। जो गरीब इस फरिश्ते को घर में धारण किये हैं उनकी तरफ तो देखता भी नहीं है पर जो उससे हटाने या मिटाने के नारे लगाता है उसे खूब लोकप्रियता इतनी मिल जाती है कि वह दौलत, शौहरत और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंच जाता है।
                              सामान्य इंसानों में गरीब होना अभिशाप है पर यह उन चालाक लोगों के लिये वरदान बन जाता है जो इस अभिशाप को दूर करने के लिये संघर्ष करने के नाटक रचते हैं।  हमारे देश में तो स्थिति यह है कि अगर कहीं क्रिकेट मैच में जीत पर जश्न मनाया जा रहा हो तो टीवी पर कोई भी कहता है कि ‘‘इससे क्या? पहले देश की गरीबी दूर करो।’’
                              हंसी तो तब आती है जब टीवी चैनलों पर प्रचारक खेल, क्रिकेट, कला या साहित्यक विषय पर चर्चा करते करते देश की गरीबी पर चले आते हैं।  अनेक स्वयंभू समाज सेवक जब इन बहसों के चरम पहुंचते हैं तो केवल गरीबी को दूर करना ही अपना लक्ष्य बताते हैं।
                              अभी डिजिटल इंडिया सप्ताह पर बहस चल रही थी।  यह सभी जानते हैं कि डिजिटल कार्य के लिये शिक्षित होने के साथ ही कंप्यूटर या मोबाइल होना जरूरी है। हमारे देश में करोड़ों लोग इस कार्य से जुड़ भी चुके हैं।  जब डिजिटल सप्ताह की चर्चा चल रही है तब उसके योग्य काम करने वालों की समस्याओं पर चर्चा होना चाहिये न कि उस समय गरीबी का रोना धोना होना चाहिये।  अब यह तो हो नहीं सकता कि पहले सभी को शिक्षित करने के साथ ही उनके कंप्यूटर तथा मोबाइल देने के बाद यह  सप्ताह मनाया जाये। इन टीवी चैनलों से कोई पूछे कि इस देश मेें अनेक गांवों में तो उनका कार्यक्रम भी देखने को नहीं मिलता तो क्या वह अपना प्रसारण बंद कर देंगे?
                              हमारे यह प्रगतिशील और जनवादी सोच इस कदर घुस गयी है कि किसी को विद्वान तब तक नहीं माना जाता जब तक गरीबी या गरीब का हितैषी होने का दावा कोई कर ले। इस सोच का विस्तार इस कदर है कि मजदूर को मजबूर और गरीब को भिखारी की तरह समझा जाता है।  यही कारण है कि मजदूरों को सिंहासन और गरीब को स्वर्ग दिलाने का वादा करने वाले अपना रोजगार  खूब चलाते हैं। यह अलग बात है कि आजकल मजदूर और गरीब यह समझ गये हैं कोई उनको सिंहासन तो क्या जमीन पर बैठने के लिये  चटाई और ही चलने लिये गाड़ी तो क्या साइकिल तक नहीं देगा।
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