Thursday, December 26, 2013

चाणक्य नीति दर्शन-नकारा आदमी दूसरों की निंदा कर अपनी श्रेष्ठता जताता है(nikamma aadmo doosron ki ninda kar apani shreshta jataataa hai)



     हमारे देश में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने लोगों की चिंत्तन क्षमता को सीमित कर दिया है। सच बात तो यह है कि लोग मानव जन्म को श्रेष्ठ तो मानते हैं पर उसके फलितार्थ नहीं समझ पाते। पश्चिम की उपभोग संस्कृति से सराबोर समाज में सुविधाओं की वस्तुओं के नये तथा परिवर्तित वस्तुओं को विज्ञान की उन्नति तथा बाज़ार में उनकी उपलब्धता को विकास मान लिया गया है। इस भौतिक विकास से जो दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक विकार  युक्त लोगों के लिये जीवन का संघर्ष अत्यंत कठिन होता है यही कारण है कि वह किसी के सपने दिखाने पर ही उसके वश में हो जाते हैं। स्थिति यह है कि लोग अपनी रोजमर्रा की परेशानियों से निजात पाने के लिये सर्वशक्तिमान की दरबार में जाते हैं या फिर किसी चालाक मनुष्य को ही सिद्ध मानकर उसके इर्दगिर्द अपनी समस्याओं का रोना रोते हैं।
            सर्वशक्तिमान ने इंसान को हाथ, पांव, नाक, कान तथा आंखों के साथ अन्य जीवों से अधिक बुद्धि दी है पर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के कारण समाज अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है।  यही कारण है कि प्रकृत्ति के उपहार होते हुए भी अनेक लोग लाचारी का जीवन बिता रहे हैं। इससे उन चालाक तथा विलासी लोगों की चांदी हो रही है जिनके पास बेचने के लिये सपने हैं।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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धर्मार्थकाममीक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते।
अजागलस्तनास्येव तस्य जन्म निरर्थकम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-जिस व्यक्ति के पास धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष इन चारों में से कोई पुरुषार्थ नहीं है उसका जन्म बकरे के गले में लटके थनों के समान व्यर्थ आर निष्फल है।
दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः पर-यशोऽगिना।
अशक्तास्तत्पद्र गन्तुं ततो निन्दां प्रकृर्वते।।
            हिन्दी में भावार्थ-दुष्ट आदमी दूसरों की कीर्ति को देखकर जलता है और जब स्वयं उन्नति नहीं कर पाता तो वह दूसरे का विकास देखकर उसकी निंदा करने लगता है।
आजकल यह भी देखा जा रहा है कि समाज के हित के लिये कोई काम करने की योजना तो बनाता नहीं है। न ही कोई सार्वजनिक हित के लिये काम करने को इच्छुक है पर कमजोर और लाचार लोगों का भला करने के नाम पर अनेक चालाक लोग अपनी दुकान लगा ही लेते हैं।  ऐसे लोग एक दूसरे की निंदा करते हैं।  अमुक ऐसा है हम भले हैं-जैसी बातें कहते हैं।  दूसरे के काम में दोष निकालते हैं पर स्वयं कुछ नहीं करे।  इस प्रचार के युग में निंदा करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। भौतिकता ने लोगों के निजी स्वाभिमान को नष्ट कर दिया है। अपनी समस्याओं पर दूसरे पर आश्रित रहने की सामान्य प्रवृत्ति ने समाज में अनेक ऐसे लोगों तथा उनके समूहों का निर्माण कर दिया है जो भलाई का व्यापार समाज सेवा के नाम पर करते हैं।
इस संसार में समस्यायें सभी के सामने होती हैं पर योग तथा ज्ञान साधक अपने प्रयासों से उनका निपटारा करते हैं। परिणाम के लिये प्रतीक्षा करने का उनमें धैर्य होता है।  दूसरे उनकी बुद्धि का हरण नहीं कर सकते। इस प्रकार का गुण अपने अंदर लाने का एकमात्र उपाय यही है कि हम अपने अध्यात्मिक दर्शन के ग्रंथों का अध्ययन करें।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Monday, December 9, 2013

भ्रष्टाचार मुक्त समाज की कल्पना-हिन्दी व्यंग्य कविता(bhrashtachar mukt samaj ki kalpana-hindi vyangya kavita)

भ्रष्टाचार मुक्त समाज की कल्पना
कितनी सुखद लगती है,
मगर इसके लिये जरूरी है कि
भगवान अवतार लेकर
स्वयं राजा बन जायें,
हम सारे सुख भोगते हुए
केवल उनका नाम गायें।
कहें दीपक बापू
हम बंदे इंसानों में देवता
क्यों तलाशते हैं,
यकीन कर लेते हैं
खूबसूरत चेहरों पर
स्वर्ग धरती पर लाने का वादा
करते हुए जो नाचते हैं,
कुछ लोग महापुरुष बनने के लिये
सतयुग जैसा वातावरण
लाने का का स्वांग रचते हैं,
आम आदमी  की भलाई काम हाथ में लिये
अपनी सारी समस्याओं से बचते हैं,
हम सुनकर उनकी बातें
कभी अपने दिल में न ले जायें।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

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Tuesday, November 12, 2013

मय का वहम-हिन्दी व्यंग्य कविता(may ka vaham-hindi vyangya kavita)



मयखानों में भीड़ लगी है,

जैसे भीड़ अभी नींद से जगी है,

लगता है सारा जहान ही

बोतल में खुशियां तलाश रहा है,

एकता की मिसाल मिलती वहां

किसी ने खूब कहा है।

कहें दीपक बापू

कतरा कतरा हलक से उतरती मय

ऐसा शैतान पैदा करती

बात करता  जो फरिश्तों जैसी

मगर  दिल में जिसके

बदनीयती जगह बना लेती है,

नशेड़ी सच बोलता है

किस मूर्ख ने कहा है,

वहम है कि मय पीने से

गम दूर होता है

सच यह है

उतरती शराब से

बढ़ जाता है वह दर्द

जो होशहवास में सहा है,

जिसे कोई करना नहीं आता

पीने लग जाता है

कोई गम कोई खुशी की

वजह झूठी बता रहा है।

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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

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Tuesday, October 29, 2013

लोकतंत्र और गरीब-हिन्दी क्षणिकायें(loktantra aur garib-hindi short poem's)



तंगहाल लोगों को

खूबसूरत सपने दिखाकर

बरगलाना आसान है,

यही सिद्धांत लोकतंत्र की जान है।

कहें दीपक बापू

किसी की निंदा जितना ही खतरा

किसी की तारीफ करने में है

इसलिये मौन रहने से  ही बढ़ती शान है।

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गरीब का स्तर कमतर रहना जरूरी है,

अमीर के नखरे उठाये उसकी मजबूरी हैं।

कहें दीपक बापू

गरीब के पसीने से लोकतंत्र नहीं चलता,

अमीर के पैसे से अंधेरे में खड़ी भेड़ों की भीड़ के लिये

सपनों का  चिराग जलता,

गरीब के भले के लिये

चलते रहेंगे बड़े बड़े अभियान

तख्त पर बैठेगा वही

जिसकी गरीबी से दूरी है।

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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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Thursday, October 17, 2013

एकांतवास की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी चिंत्तन लेख(ekantwas ki taraf badhta samaj-hindi chinttan lekh,thought article)



                                                मनुष्य के मन में किसके प्रति क्या है, यह सहजता से पता नहीं लगाया जा सकता है।  रक्त संबंधों में माता और पिता अपने बेटे और बेटी  का विकास चाहते हैं इसमें कोई संदेह नहीं है।  वह किसी भी प्रकार से अपनी संतान का अहित होने का विचार तक मन में नहीं लाते, इसके लिये उनको किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अन्य रिश्तों में यह बात लागू नहीं होती।  अधिकतर लोग मुंह पर तो शुभकामनायें देते हैं पर मन में वाकई उसका स्थान है या नहीं यह कहना कठिन है।  मनुष्यों के बीच रिश्तों  में समय, स्थिति और स्वार्थों के अनुसार उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। गैर आदमी से असंतुष्ट होने पर उससे दूर रहा जा सकता है पर जिनके साथ पारिवारिक संबंध है उनकी उपेक्षा करना सहज नहीं होता।  यही कारण है कि जब किसी रिश्तेदार से कोई स्वार्थ पूरा नहीं होता तो उसे सामने तो कोई आदमी कुछ नहीं कहता पर मन ही मन अमंगल कामना तो करने ही लगता है। इसलिये जहां तक हो सके अपने लोगों से वाद विवाद करने से बचना चाहिये।
                        दो रिश्तेदारों में झगड़ा हुआ। एक रिश्तेदार ने दूसरे से कहा-‘‘अभी तो तू मेरी उपेक्षा कर रहा है पर जिस दिन कोई बीमारी आदि का संकट आया तो मैं ही तेरी सेवा करने वाला हूं, इसलिये सोच समझकर व्यवहार कर।’’
                        दूसरे ने कहा-‘‘तू मेरी चिंता छोड़ अपनी कर।  तेरा परिवार जिस तरह डांवाडोल है उसके चलते तुझे मेरी ही आवश्यकता पड़नी है।’’
                        बात का बतंगड़ बन गया।  दोनों के बीच संवाद ही समाप्त हो गया।  हमारे देश में जिन रिश्तों की वजह से कथित संस्कारवान् होने का दावा किया जाता रहा है अब वह आधुनिक समय में स्वार्थपूर्ति तक ही सीमित रह गये हैं।  देश में सामान्य परिवारों की आर्थिक स्थितियां ज्यादा मजबूत नहीं रही इसके बावजूद परंपराओं को को केवल रिश्ते के दबावों में ढोया जा रहा है।  रिश्तों में मिठास की बात तो दूर शुष्कता का भाव हो तो ठीक है पर अब तो खटास जैसी प्रवृत्ति उसमें मिश्रित होती दिखने लगी है।  अभी तक हमने सुना था कि चीन में एक बच्चे का नियम कानूनी रूप से लागू होने के कारण वहां का सामाजिक तानाबना गड़बड़ा गया है पर भारत में तो सभ्रांत वर्ग ने कम संतान सुखी इंसान और हम दो हमारे दो की नीति स्वेच्छा से अपनायी इस कारण अब शहरी समाज में बृहद संयुक्त परिवारों का स्वरूप देखने को नहीं मिलता।  यह दावा भी खोखला हो गया है कि कम संतान से इंसान सुखी रहेगा। हमने तो यहां तक देखा है कि माता पिता को इकलौता पुत्र है पर वह बाहर चला गया है तो अब बड़ी आयु के दंपत्ति एकांतवास कर रहे हैं।  उसकी बचपन की यादें उनके सीने में है पर आंखों से जीवन की चमक गायब हैै। उनकी शुष्क आंखों को कोई भी पढ़ सकता है।
                        उस दिन एक सज्जन बता रहे थे कि उनकी कालोनी तो एक तरह से वृद्धाश्रम या कालोनी बन गयी है। अधिकतर दंपत्ति वृद्ध हैं।  बेटा बाहर गया तो बेटी भी पराये शहर चली गयी। नाती और पोते हैं पर उनकी यादें ही उनके पास है मिलने के लिये उनको दो तीन साल का इंतजार करना पड़ता है।  मकान बड़ा है, किरायेदार रखना नहीं चाहते क्योंकि बाहर से बच्चे आयेंगे तो रहेंगे कहां? घर के काम के लिये नौकर पर निर्भर हैं। किसी दिन वह न आये तो वृद्ध दंपति निराश हो जाते हैं। ऐसे दंपत्ति तो प्रतीक्षा करते हैं कि कोई गैर इंसान मिले तो उनसे अपने परिवार की भव्य गाथा सुनाये। कभी पार्क में तो कभी मुहल्ले में दूसरे के घर जाकर वह अपनी वाणी से शब्दों का विसर्जन करने का अवसर ढूंढते हैं। बृहद परिवार में हम आपसी वैमनस्य का भाव देखते थे तो सीमित परिवारों में एकांत का दुःख भी कम नहीं दिखता।
                        जब हम समाज की बात  बात करते हैं तो पुराने स्वरूप का ही विचार रहता है। नये विघटित समाज की समझ अभी स्थाई नहीं बन पायी। हम देखते हैं कि पेशेवर संतों के पास भीड़ बढ़ रही है तो उसका कारण लोगों के मन  में  धर्म के प्रति अधिक झुकाव नहीं वरन् एकांत से भीड़ में जाकर भाव परिवर्तन की चाह पाने के प्रयास से अधिक कुछ नहीं हैै।
                        बात करें हम अध्यात्मिक दर्शन की तो सच्चाई यह है कि जिसमें  यह इसके प्रति रुचि  गुण बचपन से पड़ गया वह कभी एकांत में कष्ट नहीं उठायेगा।  योग साधना, ध्यान, नाम और मंत्र जाप तथा अन्य रचनात्मक प्रवृत्तियों के चलते साधक अपना समय बेहतर व्यतीत करते हैं।  उन्हें यह भय नहीं सताता कि समाज उन्हें एकांत में धकेलकर आनंद उठायेगा। हां, यह भी सच है कि हमारे समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जो इसी प्रयास में रहता है कि अपने पास एकत्रित भीड़ में वह अकेले आदमी का मजाक बनाये।  ज्ञान और योग साधकों को ऐसे लोगों की परवाह नहीं रहती।                    
  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

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Wednesday, October 9, 2013

अपने शुद्ध संकल्प से अनुकूल वातावरण का निर्माण करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(apne shuddh sankalp se anukul vatavaran ka niraman karen-hindi chinntan lekh)



                        हम अपने समाज में रामराज्य की कल्पना कर सकते हैं पर उसे धरातल पर लाना लगभग असंभव है।  कम से कम श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन करने पर तो कोई साधक इस तरह का विचार व्यक्त कर सकता है। उसमें कहा गया है कि इस संसार में दैवीय तथा आसुरीय तो प्रकार के मनुष्य होते हैं। इससे हम यूं भी मान सकते हैं कि इस संसार में दोनों प्रकार के लोग सदैव उपस्थित रहेंगे ही चाहे कोई माने या माने।  इतना ही नहीं दैवीय प्रकृत्ति के लोगों में भी सात्विक, राजस तथा तामस प्रकृत्ति के लोग हमेशा ही अपने स्वभाव के अनुसार सक्रिय पाये जायेंगे।  इस आधार हम कह सकते हैं कि समूची मानव जाति एक ही रंग में रंगी जाये यह संभव नहीं है।
                        समाज में कथित लोग समाज में  सुधार लाने के प्रयासों में लगे बुद्धिमान लोग इस विचार को निराशाजनक विचार मान सकते हैं पर ज्ञान साधकों के लिये यही संसार का सत्य है। यह सत्य उनमें स्वयं को ही सुधारने के लिये प्रेरित करता है।  ज्ञान साधकों को जब यह आभास होने लगता है कि इस संसार का निर्माण जिस तरह परामात्मा के संकल्प के आधार पर हुआ है उसी तरह वह भी अपने देहकाल में संकल्प के आधार अपने आसपास शुद्ध वातावरण का निर्माण करें। वह संसार में दूसरे लोगों  को सुधार कर उन्हें अपने अनुकूल लाने की अपेक्षा अपने अंदर ऐसी शक्ति पैदा करते हैं कि प्रतिकूल व्यक्ति और स्थिति उनके अनुकूल हो जाये।  वह किसी के लिये मन में द्वेष, ईर्ष्या और घृणा का भाव नहीं पालते। कोई दूसरा उनके प्रति कुविचार रखता है तो उसे आसुरीय प्रवृत्तियों के वशीभूत मानकर क्षमा कर देते हैं।  किसी का परोपकार करें या नहीं पर किसी का अपकार करने का विचार हृदय में भी नहीं लाते।  किसी के कठोर वचनों के उत्तर में भी मधुर वचन में बात करते हैं।  प्रमाद या आलस्य से परे होकर सदैव सकारात्मक कार्यों में लगे रहते हैं।  इससे उनके व्यक्तित्व की धवल छवि का निर्माण होता है जिससे कालांतर में उनको सम्मान मिलता है।
                        इसके विपरीत जो अज्ञानी हैं वह बिना कुछ किए ही सम्मान पाना चाहते हैं। कुछ लोग धन, मित्र और सहायकों का समुदाय एकत्रित कर यह समझते हैं कि उनका तो स्वतः ही समाज में सम्मान होगा तो यह उनका भ्रम है।  ऐसे लोगों को सम्मान पाने की भावना अंध कर देती है और किसी से प्रतिकूल व्यवहार मिलने पर वह हिंसा पर उतर आते हैं। हम आज समाज में जो हिंसक वातावरण देख रहे हैं वह राजसी लोगों की आक्रामकता और तामसी प्रवृत्ति लोगों के बौद्धिक आलस्य का परिणाम है।  सात्विक लोगों की संख्या कम है पर आज के भौतिकतावादी युग में कोई उन्हें साथ रखना नहीं चाहता।  सात्विक लोगों का ध्येय वैसे भी समाज में हर विषय पर टांग फंसाकर प्रतिष्ठा अर्जित  करना नहीं होता। वह जानते हैं कि हमारे समाज में समस्या विचारों के संकट की नहीं वरन्् उसे धारण करने की प्रवृत्ति का अभाव है।  ज्ञान चर्चा बहुत होती है पर उसे धारण करने की न लोगों में शक्ति है न उनके पास ऐसा संकल्प है। निकट भविष्य में लोग ज्ञान के आचरण की तरफ प्रवृत्त होंगे इसकी संभावना लगती भी नहीं है। समाज अपने साथ विध्वसंक तत्व लेकर चल रहा है और हम मानते हैं कि आगे हालात अधिक खराब होने वाले हैं।  यह अलग बात है कि समाज में पेशेवर समाज सेवक के सुधार का  नाटक भी जमकर चल रहा है।  हमने देखा है कि अनेक कथित सुधारक समाज में व्याप्त अंधविश्वास का विरोध करते हैं पर मनुष्य में मन में कोई विश्वास का बीज कैसे बोया जाये इस विषय पर खामोश रहते हैं। 
                        बहरहाल समाज की समस्याओं को दूर करने की बजाय अपने सुधार पर अधिक ध्यान देना चाहिये। सबसे बड़ी बात यह है कि हमें अपने शुद्ध विचार रखने और  सुखद कल्पनायें करने के साथ ही अपने अंदर एक दृढ़ संकल्प स्थापित करना चाहिये। हम बाहर जैसा वातावरण देखना चाहते हैं उसे पहले अपने अंतर्मन में संकल्प कर स्थापित करना होगा।  आजकल के तनावपूर्ण वातावरण से प्रथक होकर एकांत में शुद्ध स्थान पर ध्यान करते हुए इस बात पर विचार करना चाहिये कि हम किस तरह अपना जीवन सफल करें।


  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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Tuesday, October 1, 2013

पाखंड और श्रद्धा-हिन्दी व्यंग्य कविता(pakhand aur shraddha-hindi vyangya kavita)



दौलत के भंडार है उनके घर
पर जिस्म में ताकतवर जान नहीं है,
महापुरुषों की  तस्वीरों पर
चढ़ाते हैं दिखावे के लिये  माला
पर दिल में उनके लिये मान नहीं है,
सारे जहान में फैला है पाखंड
दिखना चाहते हैं शानदार वह लोग
जिनकी आंखों में किसी की शान नहीं है।
कहें दीपक बापू
मजदूर ने तराशा जिस पत्थर को
अपनी पसीने से तराशा
बन गया भगवान,
पड़ा रहा जो रास्ते पर
बना रहा दुनियां में अनजान,
जिनके पेट भरे हैं
उनकी चिंता सभी करते हैं
परिश्रम करने वालों को पूरी रोटी मिले
इससे आंखें फेरते है
स्वर्ग की चिंता में जिंदगी
दाव पर लगाते हैं लोग
जिसका किसी को ज्ञान नहीं है,
दिवंगतों की तस्वीर के  आगे सिर झुकाते लोग
शोकाकुल सुरत से श्रद्धा निभाते
भले ही उनकी बनती  शान नहीं है।
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  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

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Thursday, September 19, 2013

बीमारी और दवाओं पर सत्संग-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(bimari aru davaon par satsang-hindi vyangya kavita or hindi satire poem)



इस जहान में आधे से ज्यादा लोग
चिकित्सक हो गये हैं,
अपनी बीमारियों की दवायें खाते खाते
इतना अभ्यास कर लिया है कि
वह बीमारी और दवा के बीच
अपना अस्तित्व खो रहे हैं,
बताते हैं दूसरों को दवा
भले कभी खुद ठीक न हो रहे हों।
कहें दीपक बापू
अपनी छींक आते ही हम
रुमाल लगा लेते हैं
इस भय से कि कोई देखकर
दुःखी हो जायेगा,
बड़ी बीमारी का भय दिखाकर
बड़े चिकित्सक का रास्ता बतायेगा,
सत्संग में भी सत्य पर कम
मधुमेह पर चर्चा ज्यादा होती है,
सर्वशक्तिमान से ज्यादा
दवाओं  पर बात  होती है,
कितनी बीमारियां
कितनी दवायें
बीमार समाज देखकर लगता है
छिपकर खुशी की सांस ली जाये,
लाचार शरीर में लोग
ऊबा हुआ मन ढो रहे हैं,
बीमार खुश है अपनी बीमारी और दवाओं पर
भीड़ में सत्संग कर
यह सोचते हुए कि
वह स्वास्थ्य का बीज बो रहे हैं।

  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

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Wednesday, September 11, 2013

हिन्दी दिवस पर व्यंग्य कविता-अंग्रेजी पढ़ने वाले हिन्दी रास्ता दिखाते हैं (satire poem on hindi day,hindi diwas par vyangya kavita)



ओढ़े हैं अंग्रेजी का लबादा
टिकायें है आसरा
दूसरों पर हिन्दी मशाल जलाने का,
कार पर सवार
हिंग्लिश में बतियाते हैं,
ख्वाब रखते हैं गरीबों पर
राष्ट्रभाषा की बैलगाड़ी का,
देश के इंसानों को गुलाम बनकर
विकास का रास्ता दिखाते हैं,
समाज के बड़े अब परे हो गये हैं,
अंग्रेजी भाषा के ठेकेदार
नाम पट्ठिका  भाषा की पदवी लिखाते हैं।
कहें दीपक बापू
अमीर से हो गयी  आम आदमी की लंबी दूरी,
गरीब के पसीने से निकले सोने को
बटोरने की उनके सामने हैं मजबूरी,
इसलिये साल में एक बार हिन्दी दिवस मनाते हैं,
मातृभाषा पर अहसान जताते हैं,
पूरा घर पढ़ रहा है जिनका अंग्रेजी में
देश के लोगों हिन्दी का मार्ग वही दिखाते हैं।


  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

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Friday, September 6, 2013

आओ अपना सम्मान स्वयं करें-हिन्दी दिवस पर विशेष लेख (aao apana samman swyan karen-hindi diwas, hindi divas par vishesh lekh or hindi article hindi day)



                        14 सितम्बर 2013 को एक बार फिर हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है।  इस अवसर पर सरकारी तथा अर्द्धसरकारी तथा निजी संस्थाओं में कहीं हिन्दी सप्ताह तो कही पखवाड़ा मनाया जायेगा।  इस अवसर पर सभी जगह जो कार्यक्रम आयोजित होंगे उसमें निबंध, कहानी तथा कविता लेखन के साथ ही वादविवाद प्रतियोगितायें होंगी। कहीं परिचर्चा आयोजित होगी।  अनेक लोग भारत में हिन्दी दिवस मनाये जाने पर व्यंग्य करते हैं। उनका मानना है कि यह देश के लिये दुःखद है कि राष्ट्रभाषा के लिये हमें एक दिन चुनना पड़ता है।  उनका यह भी मानना है कि हिन्दी भाषा अभी भी अंग्रेजी के सामने दोयम दर्जे की है।  कुछ लोग तो अब भी हिन्दी को देश में दयनीय स्थिति में मानते हैं। दरअसल ऐसे विद्वानों ने अपने अंदर पूर्वाग्रह पाल रखा है। टीवी चैनल, अखबार तथा पत्रिकाओं में उनके लिये छपना तो आसान है पर उनका चिंत्तन और दृष्टि आज से पच्चीस या तीस वर्ष पूर्व से आगे जाती ही नहीं है।  ऐसे विद्वानों को मंच भी सहज सुलभ है क्योंकि हिन्दी का प्रकाशन बाज़ार उनका प्रयोजक है। इनमें से कई तो ऐसे हैं जो हिन्दी लिखना ही नहीं जानते बल्कि उनके अंग्रेजी में लिखे लेख हिन्दी प्रकाशनों में अनुवाद के साथ आते हैं। उनका सरोकार केवल लिखने से है। एक लेखक का इससे ज्यादा मतलब नहीं होना चाहिये पर शर्त यह है कि वह समय के बदलाव के साथ अपना दृष्टिकोण भी बदले।
                        एक संगठित क्षेत्र का लेखक कभी असंगठित लेखक के साथ बैठ नहीं सकता।  सच तो यह है कि जब तक इंटरनेट नहीं था हमें दूसरे स्थापित लेखकों को देखकर निराशा होती थी पर जब इस पर लिखना प्रारंभ किया तो इससे बाहर प्रकाशन में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया।  यहां लिखने से पहले हमने बहुत प्रयास किया कि भारतीय हिन्दी क्षितिज पर अपना नाम रोशन करें पर लिफाफे भेज भेजकर हम थक गये।  सरस्वती माता की ऐसी कृपा हुई कि हमने इंटरनेट पर लिखना प्रारंभ किया तो फिर बाहर छपने का मोह समाप्त हो गया।  यहंा स्वयंभू लेखक, संपादक, कवित तथा चिंत्तक बनकर हम अपना दिल यह सोचकर ठंडा करते हैं कि चलो कुछ लोग तो हमकों पढ़ ही रहे हैं।  कम से कम हिन्दी दिवस की अवधि में हमारे ब्लॉग जकर हिट लेते हैं।  दूसरे ब्लॉग  लेखकों का पता नहीं पर इतना तय है कि भारतीय अंतर्जाल पर हिन्दी की तलाश करने वालों का हमारे ब्लॉग से जमकर सामना होता है।  दरअसल निबंध, कहानी, कविता तथा टिप्पणी लिखने वालों को अपने लिये विषय चाहिये।  वादविवाद प्रतियोगिता में भाग लेने वाले युवाओं तथा परिचर्चाओं में बोलने वाले विद्वानों को हिन्दी विषय पर पठनीय सामग्रंी चाहिये और अब किताबों की बजाय ऐसे लोग इंटरनेट की तरफ आते हैं।  सर्च इंजिनों में उनकी तलाश करते हुए हमारे बलॉग उनके सामने आते हैं।  यही बीस ब्लॉग बीस  किताब की तरह हैं।  यही कारण है कि हम अब अपनी किताब छपवाने का इरादा छोड़ चुके हैं।  कोई प्रायोजक हमारी किताब छापेगा नहीं और हमने छपवा लिये तो हमारा अनुमान है कि हम हजार कॉपी बांट दें पर उसे पढ़ने वाले शायद उतने न हों जितना हमारी एक कविता यहां छपते ही एक दिन में लोग पढ़ते हैं।  इतना ही नहीं हमारे कुछ पाठ तो इतने हिट हैं कि लगता है कि उस ब्लॉग पर बस वही हैं।  अगर वह पाठ  हम किसी अखबार में छपवाते तो उसे शायद इतने लोग नहीं देखते जितना यहां अब देख चुके हैं। आत्ममुग्ध होना बुरा हेाता है पर हमेशा नहीं क्योंकि अपनी अंतर्जालीय यात्रा में हमने देख लिया कि हिन्दी के ठेकेदारों से अपनी कभी बननी नहीं थी।  यहां हमें पढ़ने वाले जानते हैं कि हम अपने लिखने के लिये बेताब जरूर रहते हैं पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हमें कोई प्रचार की भूख है।  कम से कम इस बात से  हमें तसल्ली है कि अपने समकालीन हिन्दी लेखकों में स्वयं ही अपनी रचना टाईप कर लिखने की जो कृपा प्राकृतिक रूप से हुई है कि हम  उस पर स्वयं भी हतप्रभ रह जाते हैं क्योंकि जो अन्य लेखक हैं वह इंटरनेट पर छप तो रहे हैं पर इसके लिये उनको अपने शिष्यों पर निर्भर रहना पड़ता है।  दूसरी बात यह भी है कि टीवी चैनल ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर जैसे अंतर्जालीय प्रसारणों में वही सामग्री उठा रहे हैं जो प्रतिष्ठत राजनेता, अभिनेता या पत्रकार से संबंधित हैं।  यह सार्वजनिक अंतर्जालीय प्रसारण पूरी तरह से बड़े लोगों के लिये है यह भ्रम बन गया है।  अखबारों में भी लोग छप रहे हैं तो वह अंतर्जालीय प्रसारणों का मोह नहीं छोड़ पाते।  कुछ मित्र पाठक पूछते हैं कि आपके लेख किसी अखबार में क्या नहीं छपतें? हमारा जवाब है कि जब हमारे लिफाफोें मे भेजे गये लेख नहीं छपे तो यहां से उठाकर कौन छापेगा?  जिनके अंतर्जालीय प्रसारण अखबारों या टीवी में छप रहे हैं वह संगठित प्रकाशन जगत में पहले से ही सक्रिय हैं। यही कारण है कि अंतर्जाल पर सक्रिय किसी हिन्दी लेखक को राष्ट्रीय क्षितिज पर चमकने का भ्रम पालना भी नहीं चाहिये।  वह केवल इंटरनेट के प्रयोक्ता हैं। इससे ज्यादा उनको कोई मानने वाला नहीं है।
                        दूसरी बात है कि मध्यप्रदेश के छोटे शहर का होने के कारण हम जैसे लेखको यह आशा नहीं करना चाहिये कि जिन शहरों या प्रदेशों के लेखक पहले से ही प्रकाशन जगत में जगह बनाये बैठे हैंे वह अपनी लॉबी से बाहर के आदमी को चमकने देंगे।  देखा जाये तो क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्म तथा विचारवाद पहले से ही देश में मौजूद हैं अंतर्जाल पर हिन्दी में सक्रिय लेाग उससे अपने को अलग रख नहीं पाये हैं।  अनेक लोगों से मित्र बनने का नाटक किया, प्रशंसायें की और आत्मीय बनने का दिखावा किया ताकि हम मुफ्त में यहां लिखते रहें।  यकीनन उन्हें कहीं से पैसा मिलता रहा होगा।  वह व्यवसायिक थे हमें इसका पता था पर हमारा यह स्वभाव है कि किसी के रोजगार पर नज़र नहीं डालते।  अब वह सब दूर हो गये हैं।  कई लोग तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर को होने का दावा भी करने लगे हैं पर उनका मन जानता है कि वह इस लेखक के मुकाबले कहां हैं? वह सम्मान बांट रहे हैं, आपस में एक दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं। कभी हमारे प्रशंसक थे अब उनको दूसरे मिल गये हैं। चल वही रहा है अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर दें।  दरअसल वह इंटरनेट पर हिन्दी फैलाने से अधिक अपना हित साधने में लगे हैं। यह बुरा नहीं है पर अपने दायित्व को पूरा करते समय अपना तथा पराया सभी का हित ध्यान में न रखना अव्यवसायिकता है। पैसा कमाते सभी है पर सभी व्यवसायी नहीं हो जाते। चोर, डाकू, ठग भी पैसा कमाते हैं।  दूसरी बात यह कि कहीं एक ही आदमी केले बेचने वाला है तो उसे व्यवसायिक कौशल की आवश्यकता नहीं होती। उसके केले बिक रहे हैं तो वह भले ही अपने व्यवसायिक कौशल का दावा करे पर ग्राहक जानता है कि वह केवल लाभ कमा रहा है।  अंतर्जाल पर हिन्दी का यही हाल है कि कथित रूप से अनेक पुरस्कार बंट जाते हैं पर देने वाला कौन है यह पता नहीं लगता।  आठ दस लोग हर साल आपस में ही पुरस्कार बांट लेते हैं।  हमें इनका मोह नहीं है पर अफसोस इस बात का है कि यह सब देखते हुए हम किसी दूसरे लेखक को यहां लिखने के लिये प्रोत्साहित नहीं कर पाते।  हमारे ब्लॉगों की पाठक संख्या चालीस लाख पार कर गयी है। यह सूचना हम देना चाहते हैं। इस पर बस इतना ही।  हिन्दी दिवस पर कोई दूसरा तो हमें पूछेगा नहंी इसलिये अपना स्म्मान स्वयं ही कर दिल बहला रहे हैं।                      


  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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