Sunday, May 10, 2009

मुखौटों के पीछे मुख हैं-व्यंग्य कविता (mukhauton ke pichhe mukh-vyangya hindi shayri)

कभी करते हैं वैश्वीकरण का नारा जोर से बुलंद .
कभी हो जाती है उनकी सोच, अपने दायरों में बंद ..
बाजार ने सजाये हैं मुखौटे, जो सोचते दिखते हैं
मगर होते हैं सौदागरों के इशारों पर चलने के पाबन्द ..
बाज़ार भाव के उतार चढाव देखना जरूरी है
मुखौटों की भंगिमा कभी चमकती है,कभी होती मंद
खुले बाज़ार में सब खुला रखने की हिमायत पहले करते
सौदागरों का इशारा हो जाये तो सब हो जाता बंद..
सारे जहां का जिम्मा है इसलिए सोचते दिखना जरूरी है
सौदागर का खेल चलता, मुस्कराता हैं वह मंद मंद..
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बाज़ार उनको नचाता है
या वह बाज़ार को चलाते हैं
यह कहना कठिन है.
मुखौटों के पीछे मुख हैं
जो लिखते हैं संवाद
और वह होंठ हिलाते नजर आते हैं
लोग तो बस विषयों के साथ
शब्दों को मिलाते हैं
परदे के पीछे का खेल कौन
देख पाता है
सामने के दृश्य से ही
सभी का मन भर जाता है
वैसे भी कुछ बेकार है कहना
बस! बाज़ार के खेल में
जज्बातों के साथ मत बहना
चाहे भले ही कोई
रात को बताता दिन है..

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