Sunday, June 11, 2017

दलालों के कारिंदे बाज़ार में आग सजाते-दीपकबापूवाणी (Dalalon ka karinde bazar mein aag sajate-DeepakbapuWani)

शब्दों के खिलाड़ी प्रेम से सहलाते, नरक में स्वर्ग लाने के वादे से बहलाते।
‘दीपकबापू’ विज्ञापन से पाई वाणी, आज का सच कल के सपने में नहलाते।
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बेरहम सौदागर के गोदाम में रहम बंद है, गुलाम रखते लेखे जुबान बंद है।
‘दीपकबापू’ दोनाली से निकाल रहे अमन, सफाई के पाखंडी नीयत गंद है।।
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बाज़ार जवानी के जोश में इश्क मिलाता, विष भी अमृतरस जैसा पिलाता।
‘दीपकबापू’ नशे में शैतान बने अमीर, दोस्त क्या दुश्मन भी हाथ मिलाता।।
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दलालों के कारिंदे बाज़ार में आग सजाते, सौदागर अमन का राग बजाते।
‘दीपकबापू’ खूनखराबे के खेल में माहिर, लोग फरिश्तों पर भी दाग लगाते।।
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प्रसिद्धि में बड़े पर कदम उनके छोटे हैं, बदनामी का डर साथ चैन के टोटे हैं।
‘दीपकबापू’ हर पल श्रृंगार करते चेहरे पर, शब्दों में सौंदर्य पर विचार खोटे हैं।।
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आंखों के सामने पर आस नहीं होते, हाथों में हाथ पर दिल के पास नहीं होते।
‘दीपकबापू’ प्रेम के पाखंड में हो गये दक्ष, गले मिलते पर सभी खास नहीं होते।।
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गुलामी का बरसों पुराना सबक पढ़ाते, आजादी का नित नया नारा आगे बढ़ाते।
‘दीपकबापू’ पुराने आकाओं का ज्ञान पकड़ा, बिन रोटीदाल कागज का दान चढ़ाते।।
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सुंदर शब्द के पीछे कुविचार छिपाते, विकास के पीछे ढांचे तबाह कर छिपाते।
‘दीपकबापू’ समाज सेवा में लेते दलाली, सबकी भक्ति में लगे आसक्ति छिपाते।।
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गर्मी में पानी की बूंदें स्वर्ग बरसायें, न हों तो शीत में नरक जैसा तरसायें।
‘दीपकबापू’ स्वर्ण के मोह में अंधे हुए, न प्यास बुझे न सूखी रोटी भी पायें।
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दिल में चाहत जेब में पैसा नहीं है, कर्जे से चमक जाये चेहरा ऐसा नहीं है।
‘दीपकबापू’ सपने उधार से सच बनाये, अंधेरे दिल में रौशनी जैसा नहीं है।।
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सोच से पैदल अक्लमंदों के कहार होते, पूछते रास्ता उनसे जो भटके यार होते।
‘दीपकबापू’ अजीब नज़ारे देखे दुनियां में, होशियार जूझें मझधार में मूर्ख पार होते।।
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दिल के लिये अब कोई नहीं खेलता, सौदागर खेल जुआ बना पैसा पेलता।
‘दीपकबापू’ व्यापारी मन बना लिया, जेब भरे हार भी दिलदार जैसा झेलता।।
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गोदाम में अनाज का भंडार रखा है, बाहर गरीब ने बस भूख को चखा है।
‘दीपकबापू’ तख्त पर बैठ करें बंदोबस्त, दलाली करने वालों के ही सखा हैं।
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बहुत देर गरजे पर बादल बरसे नहीं, भरे भंडार जिनके प्यास से वह तरसे नहीं।
‘दीपकबापू’ हमदर्दी दिखाने भीड़ में जाते, भूखे पर हाथ फेरें पर रोटी परसे नहीं।।
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स्वार्थ साधना में फंस गयी आसक्ति, लोहे लकड़ी के सामान पर चढ़ गयी भक्ति।
‘दीपकबापू’ मांस के बुतों में ढूंढ रहे देवता, बीमारी पालते दवा की भा गयी शक्ति।।
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