Friday, July 16, 2010

हास्य कविताएँ -भ्रष्टाचार पुराण- (bhrashtachar puran-hindi hasya kavitaen)

भ्रष्टाचार के विरुद्ध निकले
जुलूस में एक आदमी ने दूसरे से पूछा
‘‘यार, एक बात बताओ,
सभी जगह भ्रष्टाचार व्याप्त है,
इतने अभियान चलते हैं
पर नहीं होता यह समाप्त है,
बताओ तुम यह भ्रष्टाचार क्या होता है,
तुमने कभी किसी भ्रष्ट आदमी को देखा है
जिसके खिलाफ नारें लगायें।’’

दूसरे ने कहा-‘भई लगता है
बिना किराया लिये हुए यहां आए हो,
बिना मतलब के अपनी जान फंसाए हो,
भला, भ्रष्टाचार कभी समाप्त हो सकता है,
जिसके पास हो थोड़ी भी ताकत
हरे नोटों की माला पहनने के साथ ही
अपनी तिजोरी भरता है,
यह तो रस्मी जुलूस है,
जो हम अपने नेता के कहने पर करने आये हैं,
अपनी रकम पूरी पाये हैं,
किसी आदमी के खिलाफ नारे लगाकर
उसे क्यों मशहूर बनायें,
वह तुरंत अपनी सफाई देने आयेगा,
मुफ्त में प्रचार पायेगा,
फिर इस हमाम में सब नंगे हैं,
जो नहीं पकड़े गये वही चंगे हैं,
यह बड़े लोगों कराते हैं वह हमें करना है,
वह भरते तिजोरी हमें तो पेट भरना है,
पता कब किससे काम पड़ जाये
इसलिये भ्रष्टाचार के खिलाफ  खूब बोलेंगे
उससे जिनको लाभ है वही मुद्दा तोलेंगे
हम बिना वजह किसी का नाम लेकर
उसे क्यों अपना दुश्मन बनायें।’’
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जब उनसे भ्रष्टाचार पर बोलने के लिये
कहा गया तो वह बोले-
‘‘भ्रष्टाचार वह अमृत है जिसे हर कोई चखता है,
स्वयं पीकर अमर होना चाहता है
हर कोई अपनी सात पीढ़ियां
रखना चाहता है हष्टपुष्ट
पर दूसरे पर वक्र दृष्टि रखता है,
जो पीयें उनकी सात पुश्तें तरती
जो न पीयें उनके बच्चे जन्म भर पछतायें।
इससे ज्यादा हम नहीं समझे
तुम्हें क्या समझायें।’’
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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2 comments:

Jandunia said...

शानदार पोस्ट

Sulochana Mishra said...

apki kavitaaye vaakai me bahut acchi hai... apke Bhrashtachar aur mahangai pr jo kavitaye likhi wah adbhoot hai,,,,

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