Saturday, December 24, 2011

गर्मी से बचकर, बरसात से हटकर और सर्दी से डटकर लड़ा जा सकता है-हिन्दी लेख (grami se bachakar,barsat se hatkar aur sardi se datkar bachen-hindi lekh or article)

             ठंड बढ़ रही है, और ऐसा लगता है उन इलाकों से गुजरने पर भी आसपास बर्फ जमे होने का अहसास होता है जो भीषण गर्मी की वजह से जाने जाते हैं। हम भारतीय लोग ठंड, बरसात और गर्मी का सामना करने के आदी माने जाते हैं पर लगता है आधुनिक जीवन शैली ने भारतीय समाज में ढेर सारे विभाजन कर दिये हैं जिसकी वजह से आज हम अपनी कोई बात या अपना सिद्धांत समस्त लोगों पर लागू नहीं कर सकते। मूल बात यह है कि गर्मी का सामना बचकर, बरसात का सामना हटकर और सर्दी का सामना डटकर ही हो सकता है। जब गर्मी में सूर्य की तेज किरणें धरती पर बरस रही हों तब आदमी पेट में पानी भरने के साथ ही पांव में ऐसे जूते पहनकर निकले जिनसे वह जले नहीं। जब बरसात हो रही हो तब जहां तक हो सके अपना सिर भीगने से बचाये ताकि सिर पर पानी पड़ने से स्वास्थ्य की हानि न हो। उसी तरह सर्दी का मुकाबला भले ही रात में बिस्तर में दुबककर हो सकता है पर दिन में जहां तक हो सके अपने शरीर को चलाईये जिससे उसमें अग्नि प्रज्जवलित रहे।
          टीवी पर एक कार्यक्रम में बताया गया कि दिल्ली में बढ़ती सर्दी के बावजूद लोगों के दिमाग में गर्म भरी हुई है। रास्ते चलते हुए वाहन टकराने पर झगड़े और कत्ल हो रहे हैं। इस पर तमाम तरह के सवाल जवाब हो सकते हैं पर मूल बात यह है कि हम मानव के बाह्य रूप के विज्ञान को जानते हैं। संभव है कि कोई मनोविज्ञानिक होने का दावा कर यह बताये कि वह मनुष्य की दिमागी गतिविधियों पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत कर कसते हैं। मगर प्रकृति और निवृत्ति के विज्ञान का सही ज्ञान केवल गीता साधकों को ही हो सकता है। इसके सूत्र बहुत हो सकते हैं पर उनका विस्तार करने से असली बात रह जायेगी। मुख्य बात यह है कि मनुष्य शरीर को एक आत्मा धारण करता है जिसके बिना इस जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। यह अलग बात है कि इस देह का संचालन मनुष्य स्वाभाविक रूप से मन, बुद्धि तथा अहंकार के वश होने देता है। यह केवल ज्ञानियों के लिये ही संभव है कि इन तीनों प्रकृतियों के प्रभाव से निवृत होना जानते हैं। इसके अलावा पंच तत्वों से बनी देह में जल, अग्नि, आकाश, वायु तथा प्रथ्वी पर जो समयानुसार प्रतिक्रिया होती है उसका भी मनुष्य की मनस्थिति पर प्रभाव पड़ता है। जैसा खाये अन्न वैसा हो मन। जैसा पाये धन वैसा हो जाये तन! हम अगर अधिक ज्ञान की बात करेंगे तो शायद समाज का ऐसा भयानक रूप दिखने लगेगा जिससे अंततः स्वयं को ही असहजता अनुभव होगी मगर सत्य तो सत्य है! हमेशा ज्ञानी बने रहना एकाकी बना देता है।
           अभी तक अधिकतर लोगों का हृदय असहज था तब तक चलता रहा पर अब तो लोगों के मस्तिष्क भी असंवेदनशील हो गये हैं जो कि आने वाले खतरों का संकेत है। उनकी प्राणशक्ति अत्यंत क्षीण है जो उनको असहनशील बना रही है। हमारे देश में विकास का पर्याय भौतिक साधनों के अधिक उपभोग से आंकी जा रही है। चीन से हमारे यहां कंप्युटर कम हैं, वहां के मुकाबले कारें कम चल रही हैं, वहां के मुकाबले हमारे यहां टीवी कम चल रहे तथा वहां के मुकाबले यहां इंटरनेट प्रयोक्ता कम है इसलिये हम उससे पीछे हैं, यह बात देश के हितचिंतक बड़े दुःख से कहते हैं। उपभोक्ता बाजार को बढ़ाया जा रहा है। यही कारण है कि कारें और बाईक की तो संख्या में बढ़ रही है पर सड़के चौडी होने की बजाय अतिक्रमण का शिकार हो गयी हैं। फिर आजकल का खानपान ऐसा है कि लोगों की शक्ति कम हो रही है। जैसा कि कहा जाता है कि जो चीज आदमी के पास नहीं होती वह उसके होने का अहसास करना चाहता है। शक्ति है नहीं पर वह दिखाना चाहता है। इसलिये रास्ते पर जरा जरा सी बात झगड़ा। कहीं कहीं कत्ल हो जाता हैं। कहीं सड़क दुर्घटना पर जाम लग जाता है। हमें तो ऐसा लगता है कि अनेक ऐसे लोगों के पास कार या बाइक आ गयी है जो उसके लायक नहीं है पर मगर यह बात उनसे कहना जान आफत में डालना है। बंदर के हाथ में उस्तरा कहें या गंजे को भगवान ने नाखून दे दिये यह कहें। हमारा समाज यह मानता है कि जिसके पास पैसा है उसके पास सब कुछ है। अक्ल तो भगवान उसे वैसे ही दे देता है। हमारा अनुभव इसका उल्टा है। सबसे ज्यादा नकारा धनवान हो गये है यही कारण है कि समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा राजरोगों की चपेट में है। यह रोग उनकी मनस्थिति को खतरनाक न बनायें यह संभव नहीं है।
          अन्ना हजारे ने समाज में चेतना लायी यह कहते हुए बहुत लोग थकते नहीं है पर इसका मतलब यह है कि हमारे यहां लोग सुप्तावस्था में थे। प्रचार माध्यमों को देखकर भले ही लोग समाज में चेतना का दंभ भर रहे हैं पर यह एक भ्रम है। अनेक मनोविशेषज्ञ लगतार यह कह रहे हैं कि भारत में मनोरोगी इतनी बड़ी संख्या में है कि कईयों को इसका आभास तक नहीं कि वह इसका शिकार हैं। मानसिक रूप से रुग्ण समाज अगर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर तालियां बजा रहा है तो उसके नायक के अभिनय को श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता है। प्रश्न तो दर्शक दीर्घा में उपस्थित लोगों की योग्यता पर भी संदेह है। भीड़ प्रसिद्ध का प्रमाण है पर प्रतिभा के लिये किसी भी आदमी की योग्यता के भौतिक सत्यापन से ही संभव है जो कि अपने लिये काम करने से नहीं वरन् समाज को कुछ देने से मिल सकता है। आदमी अकेले जीने का आदी है। वह सड़क पर भी अकेले चलने की अनुभूति चाहता है। ऐसे में कोई   वाहन से टक्कर मारत है तो वह उसमें थोड़ी टूट फूट से बिफर जाता है। घबड़ाता है कि घर पर लोग कहीं यह ताना न दें कि वाहन नहीं चलाना आता। इसलिये वह लड़कर अपनी भड़ासं निकालना चाहता है। पैसा वसूलना चाहता है। सर्दी, गर्मी और बरसात अब उसकी देह को प्रभावित करती है मस्तिष्क को नहीं जो कि असंवेदशील हो चुका है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Wednesday, December 14, 2011

मोहब्बत और सोहबत-हिन्दी शायरी (mohbbat aur sohbat-hindi shayari)

कुछ लोगों ने ज़िंदगी में
हमेशा ज़ंग की
कुछ ने किया अपनों को
गैर बनाने का गुनाह
कभी समझी नहीं मोहब्बत।
कहें दीपक बापू
उनके अंजाम पर क्या रोना
जिन्होने दौलत में तस्वीर देखी जन्नत
मगर कर ली लुटिया डुबोने वाले
शैतानो से सोहबत।
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Saturday, December 10, 2011

ए.एम.आर.आई अस्पताल कलकत्ता के हादसे से सबक-हिन्दी लेख( lesson of terssdy of AMRi culcutta hospital-hindi article)

            कलकत्ता के ए.एम.आर.आई अस्पताल (AMRi culcutta hospital) में करीब 90 लोगों की मौत हो चुकी है। अगर प्रचार माध्यमों के इससे जुड़े समाचारों पर यकीन किया जाये तो कुछ लोग अभी भी अपने परिजनों को ढूंढ रहे है जिस कारण यह संख्या अधिक भी हो सकती है। हम इस हादसे में हताहत लोगों के प्रति संवेदना जताते हैं। इस दुर्घटना के बाद अनेक विचार दिमाग में आये। जिस सवाल ने यह सबसे ज्यादा परेशान किया कि यह एक निजी अस्पताल है और इससे क्या यह साबित नहीं होता हम अब निजी क्षेत्र की क्षमताओं पर पर प्रश्न उठायें? अभी तक हम मानकर चलते हैं कि सरकारी और अर्द्धसरकारी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार और कुप्रबंध है इस दुर्घटना के बाद अब निजी क्षेत्र के प्रबंधन पर भी सवाल उठेंगें।
             जिन महान बुद्धिमानों ने सरकारी क्षेत्र को एकदम निकम्मा मानकर निजी क्षेत्र की वकालत की थी उनकी राय पर तब भी आश्चर्य हुआ था और अब तो यह लगने लगा है कि निजी क्षेत्र भी उसी कुप्रबंध का शिकार हो रहा है जिसके लिये सरकारी क्षेत्र पर बदनाम माना जाता था। अर्थशास्त्री भारत में जिन समस्याओं को उसके विकास में संकट मानते हैं उसमें कुप्रबंध भी शामिल माना गया है। कुछ हद तक खेती में उसे माना गया है पर निजी क्षेत्र में इसे कभी नहीं देखा गया। दरअसल हम जैसे निष्पक्ष चिंतक और अल्पज्ञानी अर्थशास्त्री हमेशा ही यह मानते हैं कि प्रबंध कौशल के बारे में हमारा देश बहुत कमजोर रहा है। इसका कारण हमारी प्रवृत्ति और इच्छा शक्ति है। एक तरह से देखा जाये तो हमारे वणिक वर्ग का समाज-यह जाति सूचक शब्द नहंी है क्योंकि इसमें अनेक जातियों के सदस्य ऐसे भी हैं जिनके समाज के साथ वणिक सूचक संज्ञा नहीं जुड़ी होती जैसे सिंधी, पंजाबी, और गुजराती तथा अन्य स्थानीय समाज-कमाने के लिये योजना बनाता है पर प्रबंध कौशल में बहुत कम लोग सिद्धहस्त होते हैं। भाग्य, परिश्रम, बौद्धिक अथवा प्रतिद्वंद्वी के अभाव में अनेक लोग अपने व्यवसाय में महान सफलता प्राप्त करते है पर ऐसे विरले ही होते है जिनको विपरीत परिस्थतियों में केवल अपने प्रबंध कौशल से सफलता मिली हो। जब कुछ बुद्धिमान लोग सरकारी और अर्द्धसरकार क्षेत्रों में कुप्रबंध की बात करते हैं तो अपने अनुभव से सीखे हम जैसे लोग यह भी मानते हैं कि कम से कम हम भारतीयों का नजरिया अपने काम को लेकर कमाने का अवश्य होता है पर प्रबंध कौशल दिखाने की चिंता बिल्कुल नहीं होती। ऐसे बहुत कम लोग हैं जिनको प्रबंध कौशल में महारत है। उसके बाद कुछ लोग मध्यम प्रवृत्ति के होते है जो एक समय तक प्रबंध कौशल दिखाते हैं फिर आलसी हो जाते हैं। ऐसे में जब आर्थिक जगत में निजीकरण तेजी से हो रहा था तब बहुत कम लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि प्रबंध कौशल एक कला है और उसमें महारत हासिल करने वालों को प्राथमिकता दी जाये। मुख्य बात यह है कि निजी क्षेत्र पर इतना विश्वास कैसे किया जा सकता है कि उसे अस्पताल, वायुसेवा, बस सेवा तथा अन्य जीवनोपयेागी की सेवाओं का पूरी तरह से जिम्मा सौंपा जाना चाहिए?
ए.एम.आर.आई अस्पताल (AMRi culcutta hospital) में हुई दुर्घटना चूंकि अत्यंत दर्दनाक है इसलिये इस पर चर्चा हुई पर निजी अस्पतालों में अनेक लोग गलत इलाज से मर जाते हैं तब वह एक अचर्चित खबर बनकर रह जाती है। इतना ही नहीं हम उन अन्य सेवाओं को भी देख रहे हैं जहां निजी क्षेत्र प्रभावी होता जा रहा है। वहां आम आदमी ग्राहक नहीं बल्कि एक शौषक और मजबूर प्रयोक्ता बन जाता है। उसके पास निजी क्षेत्र की सेवा के उपयोग करने के अलावा कोई मार्ग नहीं रह जाता।
              अब प्रचार माध्यमों की बात कर लें। अगर यह हादसा किसी सरकारी अस्पताल में हुआ होता तो प्रचार माध्यम कोई सरकारी आदमी शिकार के रूप में फंसते देखना चाहते। सारे राज्य के अस्पतालों की दुर्दशा को लेकर प्रशासन को कोसा जाता। निजी अस्पताल को लेकर ऐसा कोई विवाद नहीं उठा। यह ठीक है कि पश्चिम बंगाल ने अस्पताल के प्रशासन ने अस्पताल प्रबंधकों के खिलाफ कार्यवाही की है पर अगर यह सरकारी अस्पताल होता तो वही अपनी सफाई देने में लगा होता। हम यह दुर्घटना निजी क्षेत्र में अकुशल प्रबंधन के एक ऐसे प्रतीक के रूप में इसलिये देख रहे हैं क्योंकि वह प्रचार माध्यमों में चर्चित हुई वरना सच यह है कि अब तो अनेक सेवाओं में निजी क्षेत्र आम आदमी को लाचार बना रहा है।
           हम यहां यह बात नहीं कह रहे कि निजी क्षेत्र का प्रवेश पूंजीगत रूप से दखल कम होना चाहिए। जनोपयोगी सेवाओं में निजी क्षेत्र का योगदान तब भी था जब सरकारी क्षेत्र शक्तिशाली था। निजी क्षेत्र ने अनेक ऐसी सुविधायें भी जुटाई हैं जिससे आम मध्यम वर्ग को सुविधा हो रही है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि ऐसी सेवाओं से सरकारी प्रभाव को समाप्त होने की मांग मान ली जाये। हमारा मानना है कि हर क्षेत्र में सरकारी पूंजी को सक्रिय रहना चाहिए। किसी क्षेत्र में सरकारी प्रभाव इसलिये समाप्त नहीं होना चाहिए कि वहां अब निजी क्षेत्र काम कर रहा है।
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Monday, November 28, 2011

आम आदमी कार्टून में खड़ा रहेगा-हिन्दी हास्य व्यंग्य कवितायें (comman man, cortton and corttunist-hindi satire comedy poem's)

बहुत मुद्दो पर बहस
टीवी चैनलों पर चलती है,
अखबारों में समाचारों के साथ
संपादकीय भी लिखे जाते हैं,
बरसों से मसले वहीं के वहीं हैं,
बस, चर्चाकार बदल जाते हैं।
लगता है आम आदमी इसी तरह
बेबस होकर कार्टूनों में खड़ा रहेगा
जिसकी समस्याओं के हल के लिये
रोज रोज बनती हैं नीतियां
कभी कार्यक्रमा भी बनाये जाते हैं।
-------------
एक कार्टूनिस्ट से आम आदमी ने पूछा
‘‘यार,
आप जोरदार कार्टून बनाते हो,
हमारे दर्द को खूबसूरती बयान कर जाते हैं,
मगर समझ में नहीं आता
देश के मसले कब हल होंगे
हमारा उद्धार कब हो जायेगा।’’
सुनकर कार्टूनिस्ट ने कहा
‘‘सुबह सुबह शुभ बोलो,
जब यह देश का हर आदमी
दर्द से निकल जायेगा,
मेरे कार्टून के विषय हो जायेंगे लापता
नाम पर भी लगेेगा बट्टा
मगर भगवान की कृपा है
तुम जैसे लोग खड़े रहेंगे
मेरे कटघरे में इसी तरह
भले ही तुम अपनी जंग खुद लड़ते रहो
मगर तुम्हारे भले के लिये
कोई न कोई रोज नया आदमी खड़ा होगा,
अभिनय कर देवता बन जायेंगे
उनके नाटक पर
मेरे लिये रोज एक कार्टून तैयार हो जायेगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, November 19, 2011

धोखे के पीछे सच सो रहा चादर तान-हिन्दी शायरियां (dhokhe ke peechhe sach so raha hai-hindi shayariyan)

इस धरती पर भी बहुत सारे तारे चलते हैं,
जहां को रौशन करने वाले चिराग भी जलते हैं।
जिन्होंने अपने चेहरे सजाये सौंदर्य प्रसाधनों से
उम्र के साथ वह भी डूबते सूरज की तरह ढलते हैं,
लूट लिया पसीने से कमाया खजाना उन्होंने
मेहनतकशों की दरियादिली पर जो रोज पलते हैं।
कहें दीपक बापू उखड़ जाती है जिनकी जल्दी सासें
लोग उनके आसरे अपनी जिंदगी रखकर मचलते हैं।
---------------
गद्दार बता रहे हैं वफा की पहचान,
लुटेरे पा रहे हैं इस जहां में सम्मान।
सौंदर्य सज गया है नकली सोने से
क्या करेंगे जौहरी, सच लेंगे जो जान,
कहें दीपक बापू, जहां में अक्ल चर रही घास
धोखे की पीछे सच सो रहा है चादर तान।
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Sunday, November 13, 2011

अन्ना हजारे टीम के वरिष्ठ सदस्य अरविंद केजरीवाल के प्रचार माध्यम कर्मियों को टिप्स-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (anna hazare's core team member arvind kejariwal and media workers-hindi satire thought)

             अन्ना हजारे की कथित कोर टीम की सक्रियता अब हास्य व्यंग्य का विषय बन रही है। अरविंद केजरीवाल एक तरह से इस तरह व्यवहार कर रहे हैं कि जैसे कि वह स्वयं कोई प्रधानमंत्री हों और अन्ना हजारे राष्ट्रपति जो उनकी सलाह के अनुरूप काम कर रहे हैं। दरअसल अब अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पिछले अनेक महीनों से चलते हुए इतना लोकप्रिय हो गया है कि लगता है कि देश में कोई अन्य विषय ही लिखने या चर्चा करने के लिये नहीं बचा है। अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, और किरण बेदी ने अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़कर जो प्रतिष्ठा पाई है वह उनके लिये इससे पहले सपना थी। इधर जनप्रिय हो जाने से इन सभी ने अनेक तरह के भ्रम पाल लिये हैं। इतना भ्रम तो ब्रह्मज्ञानी भी नहीं पालते। इसका अंदाज इनको नहीं है कि इस देश में बुद्धिमान लोगों की कमी नहीं है जो उनकी गतिविधियों और बयानों पर नजर रखे हुए हैं। अन्ना टीम के सदस्यों ने इतिहास के अनेक महापुरुषों को अपना आदर्श बनाया होगा पर उनको यह नहीं भूलना चाहिए उस समय प्रचार माध्यम इतने शक्तिशाली और तीव्रगामी नहीं थे वरना उनकी महानता भी धरातल पर आ जाती।
          बात दरअसल यह है कि अन्ना हजारे टीम के एक सदस्य अरविंद केजरीवाल अब प्रचार कर्मियों को समझा रहे हैं कि वह अपना ध्यान जनलोकपाल बनवाने पर ही रखें। अन्य विवादास्पद मुद्दो पर ध्यान न दें।
केजरीवाल की प्रचार माध्यमों में बने रहने की इच्छा तो अन्ना के पूर्व ब्लागर राजू परुलेकर ने बता ही दी थी। ऐसे में किरण बेदी के यात्रा दौरों पर विवाद पर बोलने के लिये किसने अरविंद केजरीवाल को प्रेरित किया था? इस सवाल का जवाब कौन देगा?
            किरण बेदी हर विषय पर ऐसा बोलती हैं कि गोया कि उनको हर विषय का ज्ञान है। प्रशांत भूषण ने कश्मीर के विषय पर बयान क्यों दिया? विश्वास नाम के एक सदस्य अन्ना के पूर्व ब्लागर राजू परूलेकर से बहस करने क्यों टीवी चैनल पर आ गये?
         एक ब्लाग लेखक होने के नाते राजू परुलेकर से हमें सहानुभूति है। इस विषय पर लिखे गये एक लेख पर हमारे एक सम्मानीय पाठक ने आपत्ति दर्ज कराई थी। हम उनका आदर करते हुए यह कहना चाहते हैं कि कि अन्ना हजारे और उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को लेकर दुराग्रह नहीं है। इस आंदोलन को लेकर हमने संदेहास्पद बातें अंतर्जाल पर पढ़ी थी और हमें लगता है कि इसके कर्ताधर्ता अपनी गतिविधियों से दूर नहीं कर पाये है।
          अन्ना हजारे की प्रशंसा में अब हमें कोई प्रशंसात्मक शब्द भी नहीं कहना क्योंकि उनके दोनों अनशन केवल आश्वासन लेकर समाप्त हुए और इससे उन पर अनेक लोगों ने संदेह के टेग लगा दिये हैं। उनके साथ जुड़ी कथित सिविल सोसायटी के सदस्य भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से प्रचार पाकर अपने अन्य कार्यों के प्रचार में उसका लाभ उठा रहे हैं। कोई हल्का फुल्का लेखक होता तो उनको जोकर कहकर अपना जी हल्का कर लेता है पर हम जैसा चिंतक जानता है कि कहीं न कहीं इस आंदोलन  को जारी करने के पीछे जन असंतोष को भ्रमित करने का प्रायोजित भी हो सकता है। भ्रष्टाचार सहित अन्य समस्याओं से लोगों के असंतोष है। यह असंतोष की वीभत्स रूप न ले इसलिये उसके सामने काल्पनिक महानायक के रूप में अन्ना हजारे को प्रस्तुत किया गया लगता है क्योंकि उनका मार्गदर्शन करने वाली कथित कोर टीम में पेशेवर समाज सेवक हैं जो पहले ही अन्य विषयों पर चंदा लेकर अपनी सक्रियता दिखाते हैं। सीधी बात कहें कि बाज़ार अपना व्यवसाय चलाने के लिये समाज में धर्म, राजनीति, और फिल्म के अलावा सेवा के नाम पर भी संगठन प्रायोजित करता है ताकि लोग निराशा वादी हालतों में आशावाद के स्वप्न देखते हुए यथास्थिति के घेरे में बने रहें। माननीय टिप्पणीकार कहते हैं कि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के के विरुद्ध समाज में चेतना जगायी पर उसका परिणाम क्या हुआ है? यह सवाल हम हर लेख में करते रहे हैं और इस जारी रखेंगे।
           अरविंद केजरीवाल प्रचार कर्मियों को सिखा रहे हैं कि अन्य विषयों से हटकर केवल भ्रष्टाचार पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें। अब उनसे कौन सवाल करे कि किरण बेदी की यात्राओं पर विवाद पर उन्होंने क्यों अपना बयान दिया? सीधी बात है कि वह अपने को अन्ना का उत्तराधिकारी साबित करना चाहते हैं। भ्रष्टाचार हटाने में उनकी दिलचस्पी कितनी है यह तो समय बतायेगा। जब अन्ना के अनशन का प्रचार चरम पर था तब यही केजरीवाल हर निर्णय का जिम्मा अन्ना पर सौंप देते थे। अब इन्हीं  प्रचार माध्यमों ने उनको इतना ज्ञानवान बना दिया है कि वह उनको सिखा रहे हैं कि अपना ध्यान केवल जनलोकपाल पर केंद्रित करें।
          प्रशांत भूषण से किसने कहा था कि कश्मीर पर बयान दो। इससे भी एक महत्वपूर्ण बात है कि केजरीवाल ने कहा था कि हमारे साथ जुड़े छोटे मोटे विवादों से बड़ी समस्या देश में व्याप्त भ्रष्टाचार है फिर क्यों अन्य विषयों पर जवाब देने आ जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि अन्ना हजारे की कोर टीम एक मुखौटा दिख रही है जिसकी डोर कहीं अन्यत्र केंद्रित है। अन्ना हजारे अनशन करने और आंदोलन चलाने में सिद्धहस्त हैं पर वह भी बिना पैसे नहीं चलते और यही पेशेवर समाज सेवक उनका खर्च उठाते हैं। ऐसे में यह संभव नहीं है कि अन्ना उनके बिना काम कर सकें। मूल बात यह है कि जब तक कोई परिणाम नहीं आता ऐसे सवाल उठते हैं। मूल बात यह है कि यह आंदोलन अभी नारों से आगे नहीं बढ़ पाया। इंटरनेट में फेसबुक के साथ ट्विटर पर इसका समर्थन बहुत दिखता है पर ब्लाग और वेबसाइटों पर अभी इसे परखा जा रहा है। फेसबुक और ट्विटर पर नारे लिखकर लोग काम चला लेते हैं इसलिये ‘अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं, क्योंकि जनलोकपाल के पीछे तुम्हारे हाथ हैं’ के नारे लिखे जा सकते हैं पर ब्लाग और वेबसाईटों पर विस्तार से लिखने वाले पूरी बात लिखकर ही चैन पाते हैं। इसलिये अन्ना की कोर टीम को दूसरों से गंभीरता दिखाने की बजाय स्वयं गंभीर होना चाहिए।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, November 6, 2011

अन्ना हजारे टीम का ब्लॉगर से पंगा-हिन्दी व्यंग्य (anna hazare core team and his blogger-hindi satire or vyangya)

             अन्ना हजारे की टीम ने राजू परूलेकर नामक ब्लॉगर से पंगा लेकर अपने लिये बहुत बड़ी चुनौती बुला ली है। हमने परुलेकर को टीवी चैनलों पर देखा। अन्ना टीम का कोई सदस्य भी योग्यता में उनके मुकाबले कहीं नहीं टिकता। अब भले ही अन्ना हजारे ने अपनी टीम को बचाने के लिये उससे किनारा कर लिया है पर यह कहना कठिन है कि भविष्य में क्या करेंगे? अगर राजू परुलकर की बात को सही माने तो एक न एक दिन अन्ना का अपनी इसी कोर टीम से टकराव होगा।
             अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अब एक ऐसी बहुभाषी फिल्म लगने लगी है जिसकी पटकथा बाज़ार के सौदागरों के प्रबंधकों ने राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विषयों में पारंगत लेखकों से लिखवाया है तो इन्हीं क्षेत्रों में सक्रिय उनके प्रायोजित नायकों ने अभिनीत किया है। बाज़ार से पालित प्रचार माध्यम सामूहिक रूप से फिल्म को दिखा रहे हैं। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि जैसे किसी टीवी चैनल पर कोई कई कड़ियों का धारावाहिक प्रसारित हो रहा है। इसमें सब हैं। कॉमेडी, रोमांच, रहस्य, कलाबाजियां और गंभीर संवाद, सभी तरह का मसाला मिला हुआ है।
          अन्ना के ब्लॉगर राजू ने जिस तरह राजफाश किया उसके बाद अन्ना की गंभीर छवि से हमारा मोहभंग नहीं हुआ पर उनके आंदोलन की गंभीरता अब संदिग्ध दिख रही है। यहां हम पहले ही बता दें कि सरकार ने एक लोकपाल बनाने का फैसला किया था। उस समय तक अन्ना हजारे राष्ट्रीय परिदृश्य में कहीं नहीं दिखाई दे रहे थे। लोकपाल विधेयक के संसद में रखते ही अन्ना हजारे दिल्ली में अवतरित हो गये। उससे पहले बाबा रामदेव भी जमकर आंदोलन चलाते आ रहे थे। देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक वातावरण बन गया था जिसका लाभ उठाने के लिये चंद पेशेवर समाजसेवकों ने अन्ना हजारे के लिये दिल्ली में अनशन की व्यवस्था की। अन्ना रालेगण सिद्धि और महाराष्ट्र में भले ही अपने साथ कुछ सहयोगी रखते हों पर दिल्ली में उनके लिये यह संभव इसलिये नहीं रहा होगा क्योंकि उनका कार्यक्षेत्र अपने प्रदेश के इर्दगिर्द ही रहा है। इन्हीं पेशेवर समाज सेवकों ने प्रचार माध्यमों की सहायता से अण्णा हजारे को महानायक बना दिया। देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी तथा बीमारी से परेशान लोगों के लिये अण्णा हजारे एक ऐसी उम्मीद की किरण बन गये जिससे उनको रोशनी मिल सकती थी। प्रचार माध्यमों को एक ऐसी सामग्री मिल रही थी जिससे पाठक और दर्शक बांधे जा सकते थे ताकि उनके विज्ञापन का व्यवसाय चलता रहे।
        हालांकि अब अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल पास भी हो तो जनचर्चा का विषय नहीं बन पायेगा क्योंकि महंगाई का विषय इतना भयानक होता जा रहा है कि लोग अब यह मानने लगे हैं कि भ्रष्टाचार से ज्यादा संकट महंगाई का है जबकि अन्ना हजारे जनलोकपाल के नारे के साथ ही चलते जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वह दूसरों को बनाये प्रारूप पर काम कर रहे हैं। स्पष्टतः यह जनलोकपाल उनके स्वयं का चिंत्तन का परिणाम नहीं है। गांधीजी की तरह उनकी गहन चिंत्तन की क्षमता प्रमाणिक नहीं मानी जा सकती। जहां तक उनके आंदोलनों और अनशन का सवाल है तो वह यह स्वयं कहते हैं कि उन्होंने कई मंत्री हटवायें हैं और सरकारें गिरायी हैं। ऐसे में यह पूछा जा सकता है कि उनके प्रयासों से रिक्त हुए स्थानों पर कौन लोग विराजमान हुए? क्या वह अपने पूर्ववर्तियों  की तरह से साफ सुथरे रह पाये? आम आदमी को उनसे क्या लाभ हुआ? सीधी बात कहें तों उनके अनशन या आंदोलन दीर्घ या स्थाई परिणाम वाले नहीं रहे। अगर उनका प्रस्तावित जनलोकपाल विधेयक यथारूप पारित भी होता है तो वह परिणाममूलक रहेगा यह तय नहीं है। ऐसे में उनका आंदोलन आम लोगों को अपनी परेशानियों से अलग हटाकर सपनों में व्यस्त व्यस्त रखने का प्रयास लगता है। जिस तरह फिल्मों के सपने बेचे जाते हैं उसी तरह अब जीवंत फिल्में समाचारों के रूप प्रसारित होती दिख रही हैं।
           अभी तक अन्ना को निर्विवाद माना जाता था पर राजू ब्लॉगर को हटाकर उन्होंने अपनी छवि को भारी हानि पहुंचाई है। राजू ब्लॉगर के अनुसार अन्ना चौकड़ी के दबाव में आ जाते हैं। इतना ही नहीं यह चौकड़ी उनका सम्मान नहीं करती। जिस तरह अन्ना ने पहले इस चौकड़ी से पीछा छुड़ाने की बात कही और दिल्ली आकर फिर उसके ही कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं उससे लगता है कि कहीं न कहंी न वह अपने अनशन और आंदोलन पर खर्च होने वाले पैसे के लिये उनके कृतज्ञ हैं। जब देश में पेट्रोल के दाम बढ़ने पर शोर मचा है तब अपने फोन टेपिंग का मामला प्रचार माध्यमों में उछाल रहे हैं। एक तरफ कहते हैं कि हमें इसकी चिंता नहीं है दूसरी तरफ अपने राष्ट्रभक्त होने का प्रमाणपत्र दिखा रहे हैं। सीधी बात कहें तो पेट्रोल की मूल्यवृद्धि से लाभान्वित पूंजीपतियों को प्रसन्न कर रहे हैं जो कहीं न कहीं इन पेशेवर समाजसेवकों के प्रायोजक हो सकते हैं।
        अब हमारी दिलचस्पी अन्ना हजारे से अधिक राजू ब्लॉगर में हैं। अन्ना ने दूसरा ब्लाग बनाकर दो सहायकों को रखने की बात कही है। राजू ब्लॉगर ने एक बात कही थी कि उनके ब्लॉग देखकर अन्ना टीम ने यह प्रतिबंध लगाया था कि उनसे पूछे बगैर उस पर कोई सामग्री नहीं रखी जाये। अन्ना ने इस पर सहमति भी दी थी। राजू ब्लॉगर ने उस पर अमल नहीं किया पर अब लगता है कि अन्ना के नये सहायक अब यही करेंगे। ऐसा भी लगता है कि उनकी नियुक्ति अन्ना टीम अपने खर्च पर ही करेगी। ऐसे में अन्ना हजारे पूरी तरह से प्रायोजक शक्तियों के हाथ में फंस गये लगते हैं। वह त्यागी होने का दावा भले करते हों पर रालेगण सिद्धि से दिल्ली और दिल्ली से रालेगण सिद्धि बिना पैसे के यात्रा नहंी होती। बिना पैसे के अनशन के लिये टैंट और लाउडस्पीकर भी नहीं लगते। अन्ना की टीम के चार पांच पेशेवर समाज सेवक पैसा लगाते हैं इसलिये पच्चीस सदस्यीय समिति में उनका ही रुतवा है। अभी तक अन्ना इस रुतवे में फंसे नहीं दिखते थे पर अगर राजू परुलेकर की बात मानी जाये तो अब वह स्वतंत्र नहीं दिखते। आखिरी बात यह है कि कहीं न कहीं अन्ना हजारे के मन में आत्मप्रचार की भूख है जिसे शांत रखने के लिये वह किसी की भी सहायता ले सकते हैं। राजू ब्लॉगर के अनुसार अन्ना ने अपनी टीम के सबसे ताकतवर सदस्य के बारे में कहा था कि ‘समय पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।’
          मतलब अन्ना जांगरुक और त्यागी हैं तो आत्मप्रचार पाने के इच्छुक होने के साथ ही चालाक भी हैं। इधर अन्ना टीम ने एक ऐसे ब्लॉगर से पंगा लिया है जो लिखने पढ़ने और जानकारी के विषय में उनसे कई गुना अधिक क्षमतावान है। अभी तक अन्ना विरोधी जो काम नहीं कर पाये यह ब्लॉगर वही कर सकता है। ऐसे में अगर वह अन्ना टीम प्रचार माध्यमों में भारी पड़ा तो अन्ना पुनः उसे बुला सकते हैं। बहरहाल आने वाला समय एक जीवंत फिल्म में नये उतार चढ़ाव का है। आखिर इस धारावाहिक या फिल्म में एक ब्लॉगर जो दृश्य में आ रहा है। यह अलग बात है कि फिल्म या धारावाहिकों में इस तरह का परिवर्तन नाटकीय लगता है पर अन्ना हजारे के आंदोलन के जीवंत प्रसारण में यह एकदम स्वाभाविक है। हम यह दावा नहीं करते कि यह आंदोलन प्रायोजित है पर अगर है तो पटकथाकारों को मानना पड़ेगा।
अन्न हज़ारे का ब्लॉग,अण्णा हजारे का ब्लॉग,anna hazare ka blog,anna hazare blog,anna hazare and his blogger
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Tuesday, October 25, 2011

कन्या भ्रुण हत्याओं का परिणाम और कॉमेडी-हिन्दी व्यंग्य लेख

              यह कहना कठिन है कि यह कन्या भ्रुण हत्याओं की वजह से देश में लड़कियों की संख्या कम होने का परिणाम है या छोटे पर्दे लेखकों की संकीर्ण रचनात्मकता का प्रभाव कि हास्य-व्यंग्य पर आधारित कार्यक्रम यानि कॉमेडी के लिये पुरुष पात्रों से महिलाओं का अभिनय कराया जा रहा है। इतना तय है कि इस कारण हास्य व्यंग्य पर आधारित धारावाहिक अपना महत्व आम जनमानस में खो रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि हास्य व्यंग्य पर आधारित एक चैनल भी अब अपनी कहानियों में पुरुष अभिनेताओं को महिलाओं के पात्र निभाने के लिये प्रेरित कर रहा है। एक कार्यक्रम कॉमेडी सर्कस ने तो हद ही कर दी है। उसमें पुरुष जोड़ी को महिला युगल पात्रों का अभिनय कराया तो महिला से पुरुष और पुरुष से महिला पात्र कराने अभिनय भी प्रस्तुत किया।
             हम यहां कोई आपत्ति नहीं कर रहे हैं न कोई बंदिश आदि की मांग कर रहे हैं। बस एक बात हास्य व्यंग्य लेखक और पाठक होने के नाते जानते हैं कि ऐसी मूर्खतापूर्ण प्रस्तुतियों से हंसी तो कतई नहीं आती है। फिर आज की युवा पीढ़ी से यह आशा करना तो बेकार ही है कि वह ऐसे हास्य व्यंग्य को समझ पायेगी जो कि विशुद्ध रूप से विपरीत लिंगी यौन आकर्षण के कारण भी इनको देखती है। अगर कहीं महिला पात्र का निर्वाह कोई पुरुष करता है तो वह युवकों में कोई यौन आकर्षण पैदा नहीं करता। वास्तव में जो हास्य व्यंग्य देखते हैं उनके लिये भी यह निराशाजनक होता है। सब जानते हैं कि विपरीत लिंगी योन आकर्षण भी पर्दे की प्रस्तुतियों को सफल बनाने में योग देता है और यह देश अभी समलैंगिक व्यवहार के लिये तैयार नहीं है जैसा कि कुछ बुद्धिजीवी चाहे हैं। इस तरह के अभिनय अव्यवसायिक रुख का परिणाम लगता है भले ही चैनल वालों को इसकी परवाह नहीं क्योंकि वहां कंपनी राज्य चलता है जिनके उत्पाद बिकने हैं चाहें विज्ञापन दें या नहीं। विज्ञापन तो उनके लिये प्रचार माध्यमों को नियंत्रित करनो का जरिया मात्र है।
             हमें लगता है कि यह शायद इसलिये हो रहा है कि इन पर्दे के व्यवसायियों को महिला पात्र मिल नहीं पा रही हैं या फिर आजकल की लड़कियां भी जागरुक हो गयी हैं और -जैसा कि हम सुनते हैं कि कला की दुनियां दैहिक यानि कास्टिंग काउच शोषण होता है-वह कम संख्या में ही मिल रही हैं। यह सही है कि पर्दे की रुपहली दुनियां के सभी प्रशंसक हैं पर कास्टिंग काउच जैसे समाचारों की वजह से अब आम लड़कियां नायिका बनने के सपने अधिक मात्रा में नहीं देखती। संभव है कि लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है जिस कारण उसका प्रभाव हो या फिर बढ़ती जनसंख्या के बावजूद पर्दे पर अभिनय करने वाली लड़कियों की संख्या कार्यक्रम निर्माताओं की संख्या के अनुपात में न बढ़ी हो। इसलिये संतुलन न बन पा रहा हो। जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे देश का धनपति तथा बाहुबली वर्ग सारी बातें मंजूर कर सकता है पर काम देने के मामले में अपनी शर्तें थोपने की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाते। इसलिये जिनको अभिनय के लिये लड़कियां अपनी शर्तों पर मिलती हैं वह कार्यक्रम बना लेते हैं जिनको नहीं मिलती वह पुरुषों से महिला पात्रों का अभिनय कराने वाली पटकथा लिखवाते हैं। प्रचार प्रबंधकों की मनमानी का ही यह परिणाम है कि क्रिकेट की तरह छोटे पर्दे के कथित वास्तविक प्रसारण यानि रियल्टी शो भी फिक्सिंग के आरोपो से घिरे रहते हैं। अभी हाल ही में बिग बॉस-5 को हिट करने के लिये भी क्षेत्रीयता का मुद्दा उठाया गया। लोगों ने साफ माना कि यह केवल प्रचार बढ़ाने के लिये हैं।
            बहरहाल एक बात तय है कि हिन्दी से कमाने को सभी लालायित हैं पर शुद्ध लेखकों से लिखवाने के लिये कोई तैयार नहीं है। यही कारण कि विदेशी धारावहिकों से अनुवाद कर लिखवाया जाता है। क्लर्कों को कथा पटकथा लेखक कहा जाता है। विदेशी कार्यक्रमों की की हुबहु नकल पर कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं। देश के संस्कारों की समझ किसी को नहीं है न उनको जरूरत है। यहां आम आदमी को तो एक निबुद्धि इंसान माना जाता है। कॉमेडी के नाम पर इसलिये फूहड़ कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
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Thursday, October 13, 2011

सिंध के विषय पर कुछ क्यों नहीं बोलते-हिन्दी लेख (disscussion on sindh state of pakistan and india-hindi article

             अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के लक्ष्यों को लेकर तो उनके विरोधी भी गलत नहीं मानते। इस देश में शायद ही कोई आदमी हो यह नहीं चाहता हो कि देश में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो। अन्ना हजारे ने जब पहली बार अनशन प्रारंभ किया तो उनको व्यापक समर्थन मिला। किसी आंदोलन या अभियान के लिये किसी संगठन का होना अनिवार्य है मगर अन्ना दिल्ली अकेले ही मैदान में उतर आये तो उनके साथ कुछ स्वयंसेवी संगठन साथ हो गये जिसमें सिविल सोसायटी प्रमुख रूप से थी। इस संगठन के सदस्य केवल समाज सेवा करते हैं ऐसा ही उनका दावा है। इसलिये कथित रूप से जहां समाज सुधार की जरूरत है वहां उनका दखल रहता है। समाज सुधार एक ऐसा विषय हैं जिसमें अनेक उपविषय स्वतः शामिल हो जाते हैं। इसलिये सिविल सोसायटी के सदस्य एक तरह से आलराउंडर बन गये हैं-ऐसा लगता है। यह अलग बात है कि अन्ना के आंदोलन से पहले उनकी कोई राष्ट्रीय छवि नहंी थी। अब अन्ना की छत्रछाया में उनको वह सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसकी कल्पना अनेक आम लोग करते हैं। इसलिये इसके सदस्य अब उस विषय पर बोलने लगे हैं जिससे वह जुड़े हैं। यह अलग बात है कि उनका चिंत्तन छोटे पर्दे पर चमकने तथा समाचार पत्रों में छपने वाले पेशेवर विद्वानों से अलग नहीं है जो हम सुनते हैं।
           बहरहाल बात शुरु करें अन्ना हजारे से जुुड़ी सिविल सोसायटी के सदस्य पर हमले से जो कि वास्तव में एक निंदनीय घटना है। कहा जा रहा है कि यह हमला अन्ना के सहयोगी के जम्मू कश्मीर में आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने पर दिया गया था जो कि विशुद्ध रूप से पाकिस्तान का ऐजंेडा है। दरअसल यह संयुक्त राष्ट्र में पारित उस प्रस्ताव का हिस्सा भी है जो अब धूल खा रहा है और भारत की सामरिक और आर्थिक शक्ति के चलते यह संभव नहीं है कि विश्व का कोई दूसरा देश इस पर अमल की बात करे। ऐसे में कुछ विदेशी प्रयास इस तरह के होना स्वाभाविक है कि भारतीय रणनीतिकारों को यह विषय गाहे बगाहे उठाकर परेशान किया जाये। अन्ना के जिस सहयोगी पर हमला किया गया उन्हें विदेशों से अनुदान मिलता है यह बात प्रचार माध्यमों से पता चलती रहती है। हम यह भी जानते हैं कि विदेशों से अनुदान लेने वाले स्वैच्छिक संगठन कहीं न कहीं अपने दानदाताओं का ऐजेंडा आगे बढ़ाते हैं।
           हमारे देश में लोकतंत्र है और हम इसका प्रतिकार हिंसा की बजाय तर्क से देने का समर्थन करते हैं। कुछ लोगों को यह लगता है कि मारपीट कर प्रतिकार करें तो वह कानून को चुनौती देते हैं। इस प्रसंग में कानून अपना काम करेगा इसमें भी कोई शक नहीं है।
           इधर अन्ना के सहयोगी पर हमले की निंदा का क्रम कुछ देर चला पर अब बात उनके बयान की हो रही है कि उसमें भी बहुत सारे दोष हैं। कहीं न कहीं हमला होने की बात पीछे छूटती जा रही है। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हम अपनी बात कहें तो शायद कुछ लोगों को अजीब लगे। हमने अन्ना के सहयोगी के इस बयान को उन पर हमले के बाद ही सुना। इसका मतलब यह कि यह बयान आने के 15 दिन बाद ही घूल में पड़ा था। कुछ उत्तेजित युवकों ने मारपीट कर उस बयान को पुनः लोकप्रियता दिला दी। इतनी कि अब सारे टीवी चैनल उसे दिखाकर अपना विज्ञापनों का समय पास कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि कहीं यह उत्तेजित युवक यह बयान टीवी चैनलों पर दिखाने की कोई ऐसी योजना का अनजाने में हिस्सा तो नहीं बन गये। संभव है उस समय टीवी चैनल किसी अन्य समाचार में इतना व्यस्त हों जिससे यह बयान उनकी नजर से चूक गया हो। यह भी संभव है कि दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई बैंगलौर या अहमदाबाद जैसे महानगरों पर ही भारतीय प्रचार माध्यम ध्यान देते हैं इसलिये अन्य छोटे शहरों में दिये गये बयान उनकी नजर से चूक जाते हैं। इस बयान का बाद में जब उनका महत्व पता चलता है तो कोई विवाद खड़ा कर उसे सामने लाने की कोई योजना बनती हो। हमारे देश में अनेक युवक ऐसे हैं जो अनजाने में जोश के कारण उनकी योजना का हिस्सा बन जाते हैं। यह शायद इसी तरह का प्रकरण हो। हमला करने वाले युवकों ने हथियार के रूप में हाथों का ही उपयोग किया इसलिये लगता है कि उनका उद्देश्य अन्ना के सहयोगी को डराना ही रहा होगा। ऐसे में मारपीट कर उन्होंनें जो किया उसके लिये उनको अब अदालतों का सामना तो उनको करना ही होगा। हैरानी की बात यह है कि हमला करने वाले तीन आरोपियों में से दो मौके से फरार हो गये पर एक पकड़ा गया। जो पकड़ा गया वह अपने कृत्य पर शार्मिंदा नहीं था और जो फरार हो गये वह टीवी चैनलों पर अपने कृत्य का समर्थन कर रहे थे। हैरानी की बात यह कि उन्होंने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रति समर्थन देकर अपनी छवि बनाने का प्रयास किया। इसका सीधा मतलब यह था कि वह अन्ना की आड़ में उनके सहयोगी के अन्य ऐजेंडों से प्रतिबद्धता को उजागर करना चाहते थे। वह इसमें सफल रहे या नहीं यह कहना कठिन है पर एक बात तय है कि उन्होंने अन्ना के सहयोगी को ऐसे संकट में डाल दिया है जहां उनके अपने अन्य सहयोगियों के सामने अपनी छवि बचाने का बहुत प्रयास करना होगा। संभव है कि धीरे धीरे उनको आंदोलन की रणनीतिक भूमिका से प्रथक किया जाये। कोई खूनखराबा नहीं  हुआ यह बात अच्छी है पर अन्ना के सभी सहयोगियों के सामने अब यह समस्या आने वाली है कि उनकी आलराउंडर छवि उनके लिये संकट का विषय बन सकती है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन निर्विवाद है पर जम्मू कश्मीर, देश की शिक्षा नीति, हिन्दुत्ववाद, धर्मनिरपेक्षता तथा आतंकवाद जैसे संवेदनशील विषयों पर अपनी बात सोच समझकर रखना चाहिए। यह अलग बात है कि लोग चिंत्तन करने की बजाय तात्कालिक लोकप्रियता के लिये बयान देते हैं। यही अन्ना के सहयोगी ने किया। स्थिति यह है कि जिन संगठनों ने उन पर एक दिन पहले उन पर हमले की निंदा की दूसरे दिन अन्ना के सहयोगी के बयान से भी प्रथक होने की बात कह रहे हैं। अन्ना ने कुशल राजनीतिक होने का प्रमाण हमले की निंदा करने के साथ ही यह कहकर भी दिया कि मैं हमले की असली वजह के लिये अपने एक अन्य सहयेागी से पता कर ही आगे कुछ कहूंगा।
            आखिरी बात जम्मू कश्मीर के बारे में की जाये। भारत में रहकर पाकिस्तान के ऐजेंडे का समर्थन करने से संभव है विदेशों में लोकप्रिय मिल जाये। कुछ लोग गला फाड़कर चिल्लाते हुए रहें तो उसकी परवाह कौन करता है? मगर यह नाजुक विषय है। भारत का बंटवारा कर पाकिस्तान बना है। इधर पेशेवर बुद्धिजीवी विदेशी प्रायोजन के चलते मानवाधिकारों की आड़ में गाहे बगाहे जनमत संग्रह की बात करते हैं। कुछ ज्ञानी बुद्धिजीवी इस बात को जानते हैं कि यह सब केवल पैसे का खेल है इसलिये बोलते नहीं है। फिर बयान के बाद मामला दब जाता है। इसलिये क्या विवाद करना? अलबत्ता इन बुद्धिजीवियों को कथित स्वैच्छिक समाज सेवकों को यह बता दें कि विभाजन के समय सिंध और पंजाब से आये लोग हिन्दी नहीं जानते थे इसलिये अपनी बात न कह पाये न लिख पाये। उन्होंने अपनी पीड़ा अपनी पीढ़ी को सुनाई जो अब हिन्दी लिखती भी है और पढ़ती भी है। यह पेशेवर बुद्धिजीवी अपने उन बुजुर्गों की बतायी राह पर चल रहे हैं जिसका सामना बंटवारा झेलने वाली पीढ़ी से नहीं हुआ मगर इनका होगा। बंटवारे का सच क्या था? वहां रहते हुए और फिर यहां आकर शरणार्थी के रूप में कैसी पीढ़ा झेली इस सच का बयान अभी तक हुआ नहीं है। विभाजन से पूर्व पाकिस्तान में सिंध, बलूचिस्तान और सिंध प्रांतों में क्या जनमत कराया गया था? पाकिस्तान जम्मू कश्मीर का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार नहीं करता और जनमत संग्रह की मांग करने वाले खुले रूप से उससे हमदर्दी रखते हैं। ऐसे में जनमत संग्रह कराने का मतलब पूरा कश्मीर पाकिस्तान को देना ही है। कुछ राष्ट्रवादियों का यह प्रश्न इन कथित मानवाधिकारियों के सामने संकट खड़ा कर सकता है कि ‘सिंध किसके बाप का था जो पाकिस्तान को दे दिया या किसके बाप का है जो कहता है कि वह पाकिस्तान का हिस्सा है’। जम्मू कश्मीर को अपने साथ मिलाने का सपना पूरा तो तब हो जब वह पहले बलूचिस्तान, सीमा प्रांत और सिंध को आजाद करे जहां की आग उसे जलाये दे रही है। यह तीनों प्रांत केवल पंजाब की गुलामी झेल रहे हैं। इन संकीर्ण बुद्धिजीवियों की नज़र केवल उस नक्शे तक जाती है जो अंग्रेज थमा गये जबकि राष्ट्रवादी इस बात को नहीं भूलते कि यह धोखा था। संभव है कि यह सब पैसे से प्रायोजित होने की वजह से हो रहा हो। इसी कारण इतिहास, भूगोल तथा अपने पारंपरिक समाज से अनभिज्ञ होकर केवल विदेशियों से पैसा देकर कोई भी कैसा भी बयान दे सकता है। यह लोग जम्मू कश्मीर पर बोलते हैं पर उस सिंध पर कुछ नहीं बोलते जो हमारे राष्ट्रगीत में तो है पर नक्शे में नहीं है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, October 1, 2011

महात्मा गांधी का दर्शन और भारत की वर्तमान स्थिति-2 अक्टुबर गांधी जयंती पर विशेष हिन्दी लेख (mahatma gandhi ka darshan nirapad nahin tha-hindi lekh on 2 october gandhi jayanti)

         कल दो अक्टोबर देश में गांधी जयंती मनाई जायेगी। प्रसंगवश इस दिन भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन मनाया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इतिहास में किसी भी महापुरुष का नाम बिना किसी योग्यता, कठिन परिश्रम या त्याग के दर्ज नहीं होता पर यह भी सत्य है कि एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन समय समय पर अनेक लोग अपने ढंग से करते हैं। एतिहासिक पुरुषों के परमधाम गमन के तत्काल बाद सहानुभूति के चलते जहां उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन करने वाले अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाते हैं। उस समय कोई प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं करता पर समय के साथ ही एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व का प्रभाव क्षीण होने लगता है तब विचारवान लोग प्रतिकूल टिप्पणियां भले न करें पर कुछ प्रश्न उठाने ही लगते हैं।
          गांधीजी के दर्शन  पर भी अनेक सवाल उठते हैं तो श्रीलाल बहादुर शास्त्री के बारे में भी यह पूछा जाता है कि पाकिस्तान से युद्ध जीतने के बाद भी उन्होंने मास्को जाकर सोवियत संघ की मध्यस्थता स्वीकार कर हारने जैसा काम क्यों किया? बहुत समय तक यह सवाल किसी ने नहीं पूछा था पर जब कारगिल युद्ध के बंद होने के बाद यह बात उठी थी तब शास्त्री जी की भूमिका सामने आयी थी भले ही उस समय सीधे किसी ने उनका नाम लेकर आक्षेप नहीं किया गया। फिर यह सवाल चर्चा में अधिक नहीं आया पर विचारवान लोगों के लिये इतना ही बहुत था। पाकिस्तान को परास्त करने के बाद विजेता भारत के प्रधानमंत्री का इस तरह मास्को जाकर पाकिस्तान के हुक्मरानों से समझौता करना वाकई देश के लिये कोई सम्मान की बात नहीं थी-यह बात आज अनेक लोग मानते हैं। इस समझौते में पाकिस्तान की जमीन बिना कुछ लिये दिये वापस कर दी गयी थी।
            गांधीजी को विश्व में महान सम्मान प्राप्त हुआ है पर भारतीय जनमानस में अब उनकी छवि क्षीण हो रही है फिर अब फिल्म, क्रिकेट और अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्रों में सक्रिय नये नये महापुरुषों का भी प्रचार हो रहा है। सरकारी और गैर सरकारी तौर पर गांधी जयंती के समय खूब प्रचार होने के साथ ही अनेक कार्यक्रम भी होते हैं पर लगता नहीं कि आज के कठिन समय का सामना कर रहा भारतीय जनमानस उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लेता हो। गांधीजी को राजनीतक संत कहना उनके दर्शन को सीमित दायरे में रखना है। मूलतः गांधी जी एक सात्विक प्रवृत्ति के धार्मिक विचार वाले व्यक्ति थे। निच्छल हªदय और सहज स्वभाव की वजह से उनमें उच्च जीवन चरित्र निर्माण हुआ। एक बात तय है कि उन्होंने भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने का जब अभियान प्रारंभ किया होगा तब उनका लक्ष्य आत्मप्रचार पाना नहीं बल्कि देश के आम इंसान का उद्धार करना रहा होगा। अलबत्ता अपने आंदोलन के दौरान उन्होंने इस बात को अनुभव किया होगा कि उनके सभी सहयोग उनकी तरह निष्काम नहीं है। इसके बावजूद वह इस बात को लेकर आशावदी रहे होंगे कि समय के अनुसार बदलाव होगा और अपने ही देश के भले लोग राज्य अच्छी तरह चलायेंगे। कालांतर में जो हुआ वह हम सब जानते हैं। उनके सपनों का भारत कभी न बना न बनने की आशा है। स्थिति यह है कि अनेक अनुयायी अब दूसरे स्वाधीनता आंदोलन का बात करने लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि गांधी जी का सपना पूरा नहीं हुआ और जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन प्रारंभ किया वह पूरा नहीं हुआ। दूसरे शब्दों में 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी केवल एक ऐसा प्रतीक है जिसकी स्मृतियां केवल उस दिन मनाये जाये वाले कार्यक्रमों में ही मिलती है। जमीन पर अभी गांधीजी के सपनों का पूरा होना बाकी है।
        यहां हम गांधीजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की आलोचना नहीं कर रहे क्योंकि हम जैसा मामूली शख्स भला उन पर क्या लिख सकता है? अलबत्ता देश के हालात देखकर वैचारिक रूप से गांधी दर्शन अब निरापद नहीं माना जा सकता है। सबसे पहला सवाल तो यह है कि भारत का स्वाधीनता आंदोलन अंततः एक राजनीतिक प्रयास था जिसमें राजकाज भारतीयों के हाथ में होने का लक्ष्य तय किया गया था। दूसरी बात यह कि गांधीजी ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आंदोलन किया था जिस पर भारतीयों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने का आरोप था। इसके अलावा देश की समस्याओं के प्रति अंग्रेज सरकार की प्रतिबद्धता पर भी संदेह जताया गया था। इसका अर्थ सीधा है कि गांधीजी एक ऐसी सरकार चाहते थे जो देश के लोगों की होने के साथ ही जनहित का काम करे। ऐसे में राजकाज के पदों पर बैठने वाले महत्वपूर्ण लोगों की गतिविधियां महत्वपूर्ण होती हैं। तब गांधी जी ने राजकाज प्रत्यक्ष रूप से चलाने के लिये कोई पद लेने से इंकार क्यों किया? क्या वह इन पदों को भोग का विषय समझते थे या दायित्व निभाने के लिये अपने अंदर क्षमता का अभाव अनुभव करते थे। अगर यह दोनों बातें नहीं थी तो क्या उनको भरोसा था कि जो लोग राजकाज देखेंगे वह उनके रहते हुए अच्छा काम ही करेंगे? क्या उनको यकीन था कि जिन लोगों को वह राजकाज का जिम्म सौंपेंगे वह अच्छा ही काम करेंगे?
यकीनन सरकार का सैद्धांतिक रूप उनके सपनों में रहा हो पर व्यवहारिक  रूप से उनको इसका कोई अनुभव नहीं था। वह राजनीतिक के सैद्धांतिक पक्ष और व्यवहारिक स्थिति के अंतर को नहीं जानते थे। उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक अभियान शुरु किया जो कालांतर में सीमित लक्ष्य प्राप्त कर समाप्त हो गया। आज उसी प्राप्त लक्ष्य को भी चुनौती मिल रही है। गांधी जी के अनुयायी और आज के महानायक अन्ना हजारे मानते हैं कि आज का शासन भी अंग्रेजों जैसा ही है। श्री अन्ना हजारे स्वयं भी कोई पद नहीं लेना चाहते पर देश के स्वच्छ और विकसित होने की का जिम्मा सरकार का ही मानते हैं। तब ऐसा लगता है कि एक राजनीति शास्त्र का ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति भी राजनीति कर सकता है या राजकाज कोई पद संभाल सकता है। हमारा तो मानना है कि अंग्रेजों के विरुद्ध गांधीजी के आंदोलन के बारे में अब इतिहास पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं अन्ना जी का आंदोलन बता रहा है कि उस समय क्या क्या हुआ होगा?
        28 अगस्त को अन्ना साहिब का जनलोकपाल विधेयक लाने संबंधी आंदोलन समाप्त हुआ। हासिल कुछ नहीं हुआ पर उन्होंने कहा कि हमें आधी जीत मिली है। तब हम जैसे लोग सड़कों पर घूमते हुए उस आधी जीत को ढूंढते हुए सोच रहे थे कि 16 अगस्त को भी कोई हम जैसा शख्स रहा होगा जो उस आजादी को ढूंढ रहा होगा जिसका दावा उस समय किया जा रहा था। बहरहाल गांधीजी के आंदोलन के पीछे उस समय के धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, तथा आर्थिक शिखरों पर बैठे लोग रहे होंगे जो अपने हित साधन के लिये ही ऐसी आजादी चाहते होंगे ताकि वह देश के आम इंसान को गुलाम बनाये रख सके। पता नहीं गांधीजी यह देख पाये या नहीं पर इतना तय है कि वह जैसा भारत चाहते थे वैसा बन नहीं पाया। आखिरी बात यह है कि गांधीजी सात्विक प्रवृत्ति के थे और उनका आंदोलन राजस वृत्ति का था। बात अगर राजनीति की है तो उसमे सात्विक प्रवृत्ति की आशा करना व्यर्थ है। यह राजसी वृत्ति वाले लोगों का काम है। राजसी वृत्ति बुरी नहीं है बशर्त व्यक्ति अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये उचित ढंग से कार्य करे। मुश्किल यह है कि तामसी वृत्ति वाले लोग अब राजकाज करने लगे हैं। भारत में दूसरी भी समस्या है। राजसी लोगों को स्वार्थी जानकर लोग हªदय से सम्मान नहीं करते जबकि सामूहिक नेतृत्व करना उन्हीं के बूते का होता है। सात्विक लोगों को समाज सम्मान देता है पर वह निष्काम होने के कारण राजकाज का काम नहीं करते। यही कारण है कि राजसी वृत्ति के लोग सात्विक लोगों को ढाल बनाकर आगे चलते हैं ताकि समाज उनका नेतृत्व और शासन स्वीकार करे। इसी कारण पूरे विश्व के राष्ट्राध्यक्ष अपने संपर्क धार्मिक नेताओं  से रखते हैं। गांधी को हमने देखा नहीं और अन्ना से कभी मिले नहीं पर प्रचार माध्यमों में देखकर हमने अनुभव किया वह लिख दिया। इस अवसर पर महात्मा गांधी जी और शास्त्री जी को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि!




कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, September 21, 2011

गरीबी हटाने की योजना-हिन्दी कविता (garibi hatane ki yojana-hindi kavita or poem

पोते ने पूछा दादाजी से
‘‘दादाजी आप यह बताओ
बड़े बड़े लोग उपवास क्यों रखते हैं,
छक कर खाते मलाई और मक्खन
फिर भी क्यों भूख का स्वाद चखते हैं।
दादाजी ने कहा
‘‘बेटा,
गरीबों का दिल जीतने के लिये
बड़े लोग उपवास इसलिये करते हैं
क्योंकि उनकी भूख शांत करने के लिये
रोटियां बांटने का जिम्मा लेकर मिली कमीशन से
अपनी तिजोरी भी वही भरते हैं,
देख लेना 32 रुपये खर्च करने वाला
अब गरीब नहीं माना जायेगा,
फिर भी गरीबों की संख्या
आंकड़ों में बढ़ती दिखेगी,
बड़ों की कलम मदद की रकम भी बड़ी लिखेगी,
उनको गरीबों से हमदर्दी नहीं है
फिर भी अपनी शौहरत और दौलत
बढ़ाने के लिये
वह गरीबी हटाने की योजना हमेशा साथ रखते हैं।
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Sunday, September 11, 2011

हिन्दी दिवस पर कविता (hindi diwas or divas par kavita)

हिन्दी में अंग्रेजी के शब्द मिलाकर
मातृभाषा को वह विकास के पथ पर ले जायेंगे,
इसी तरह हर हिन्दी दिवस पर
नये नये तरीके ईजाद करेंगे,
मंच पर खड़े होकर अंग्रेजी में
हिन्दी के लिये सांत्वना संदेश पढ़ेंगे,
कुछ गीत भी संगीत के साथ गुनगुनायेंगे,
इस वादे के साथ
अगले वर्ष फिर हिन्दी दिवस मनायेंगे।
---------------



रास्ते में तेजी से चलता
मिल गया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू तुम्हारे पास ही आ रहा था
सुना है दस सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग लेखक
सम्मान पाने वाले हैं,
ऐसा लगता है हिन्दी के अंतर्जाल पर भी
अच्छे दिन आने वाले हैं,
हो सकता है तुमको भी
कहीं से सम्मान मिल जाये,
हमारा छोटा शहर भी
ऐसी किसी खबर से हिल जाये,
आठ साल अंतर्जाल पर हो गये लिखते,
पहल दिन से आज तक
तुम फ्लाप कवि ही दिखते,
मिल जाये तो मुझे जरूर याद करना
मैंने ही तुम्हारे अंदर हमेशा
उम्मीद जगाई,
सबसे पहले दूंगा आकर बधाई।

सुनकर हंसे दीपक बापू और बोले
‘‘अंतर्जाल पर लिखते हुए अध्यात्म विषय
हम भी हम निष्काम हो गये हैं,
कोई गलतफहमी मत रखना
हमसे बेहतर लिखने वाले
बहुत से नाम हो गये हैं,
हमारी मजबूरी है अंतर्जाल पर
हिन्दी में लिखते रहना,
शब्द हमारी सासें हैं
चलाते हैं जीवन रुक जाये वरना,
मना रहे हैं जिस तरह
टीवी चैनल हिन्दी दिवस
उससे ही हमने प्रसन्नता पाई,
नहीं मिलेगा हमें यह तय है
फिर भी देंगे
सम्मानीय ब्लॉग लेखको को हार्दिक बधाई,
हम तो इसी से ही प्रसन्न हैं
हिन्दी ब्लॉग लेखक शब्द
अब प्रचलन में आयेगा,
अपना परिचय देना
हमारे लिये सरल हो जायेगा,
सम्मान का बोझ
नहीं उठा सकते हम,
उंगलियां चलाते ज्यादा
कंधे उठाते कम,
इसी से संतुष्ट हैं कि
अंतर्जाल पर हिन्दी लिखकर
हमने अपने ब्लॉग लेखक होने की छवि
अपनी ही आंखों में बनाई।
------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, August 31, 2011

अनशन खत्म हुआ जैसे बारात विदा हुई हो-हिन्दी व्यंग्य (anshan aur barat-hindi vyangya or satire)

            अन्ना हजारे साहब का अनशन कथित रूप से स्थगित हो गया है। उन्होंने देश की दूसरी आजादी की लड़ाई क्या प्रारंभ की प्रचार माध्यमों को अपने विज्ञापनों के साथ प्रकाशन और प्रसारण की सामग्री चलाने का अवसर मिल गया। इधर अन्ना साहेब ने अनशन खत्म करने की घोषणा की तो पूरे देश ने चैन की सांस ली होगी पर यकीनन प्रचार प्रबंधकों की चिंताऐं बढ़ा दीच होंगी। अन्ना साहेब को अपनी मांगों के अनुरूप चिट्ठी शनिवार रात को मिली पर उन्होंने सूर्यास्त के बाद अनशन खत्म न करनी अपनी परंपरा का जिक्र करते हुए अगली सुबह दस बजे वह भी रविवार के दिन अनशन समाप्त करने की घोषणा की। प्रचार प्रबंधकों के लिये यह समय अत्यंत कीमती है। इस दौरान मनोरंजन प्रिय लोग -छात्र, छात्रायें, शिक्षक, चिकित्सक और अन्य कर्मचारी- जो सरकारी अवकाश के कारण इस दौरान टीवी के सामने उपस्थित होना प्रारंभ करते हैं। रविवार को अन्ना ने अनशन समाप्त किया। उसमें पूरी तरह से राजनीतिक सिद्धांतों का पालन किया गया। फिर अन्ना अस्पताल रवाना हुए। सभी टीवी चैनलों की चलित वाहिनियां (मोबाईल वैन) उनके पीछे लग गयीं। पूरे दो घंटे की सामग्री मिल गयी। फिर बाद में तमाम चर्चा।
       चलिये साहब! रविवार का दिन निकल गया। सोमवार को भी इस आंदोलन की पाश्च सामग्री बहुत थी हालांकि पूरा दिन उसे नहीं दिया गया। मगर मंगलवार का दिन! यह संभव नही था कि अन्ना अनशन प्रसंग लंबा खींचा जाये। इधर दर्शक भी बोर हो गये थे। ऐसे में दूसरे प्रसंग प्रसारित हुए पर ऐसा लग रहा था कि टीवी चैनलों की स्थिति वही हो गयी थी जैसे दूल्हा दुल्हन के साथ बारातियों के जाने के बाद जनवासे की होती है। दर्शकों की स्थिति भी ऐसी ही थी जैसे कि अभी अभी बारात से लौटे हों और आराम करने का मन हो।
        आमतौर से पश्चिमी विकसित देशों के प्रचार माध्यम-टीवी चैनल और समाचार पत्र- शुद्ध रूप से प्रकाशन और प्रसारण के लिये जनरुचि सामग्री निर्माण के आधार पर चलते हैं और विज्ञापन प्रकाशन उनकी दूसरी प्राथमिकता होती है। वहां प्रकाशक और प्रसारणकर्ता का मुख्य उद्देश्य के रूप में अपने समाज के बीच अपनी छवि बनाने के लिये प्रचार व्यवसाय चुनते हैं। भारत के प्रचार माध्यम मूल रूप से पश्चिम का ही अनुसरण करते हैं पर यहां उनके लक्ष्य और उद्देश्यों का स्वरूप बदल जाता है। अधिकतर प्रसारक और प्रकाशन विज्ञापनों से आय करने का लक्ष्य लेकर अपना संस्थान प्रारंभ करते हैं। उनकी पहली प्राथमिकता विज्ञापनदाताओं के सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करना होता है। दूसरी प्राथमिकता दर्शक और पाठकों की रुचि होती है। ऐसे में अगर किसी समाचार में जनता की रुचि अधिक हो तो उस प्रकाशन और प्रसारण की सामग्री लंबी हो जाती है। समाचार पत्र पत्रिकाओं में मुख्य समाचारों से संबद्ध छोटे समाचार अंदर के पृष्ठों में कतरनों की तरह छपते हैं। टीवी चैनल तो ऐसे घटनाक्रमों लगभग किसी क्रिकेट मैच के प्रसारण की तरह प्रसारित करते हैं जिससे दर्शक उसमें उतार चढ़ाव से बंधा रहता है।
            कहने को देश में हुए अनेक हादसों पर सीधी फिल्म प्रसारित होती है पर उसमें करुणा रस ही बना रहता है। जबकि ऐसी घटनाओं के सारे रसों का स्वाद दर्शक को कराया जा सकता है। पहले अन्ना हजारे फिर बाबा रामदेव और फिर अब अन्ना हजारे के आंदोलनों का प्रसारण तो ऐसे हुए जैसे कि दिन भर ही फिल्म चलती दिखाई दी जिसमें कभी हास्य तो कभी करुणा रस के साथ रची सामग्री देखने को मिली।

        सच बात तो यह है कि इधर दर्शकों और पाठकों की आदत खराब हो गयी है। एक दो दिन के महत्व वाले प्रकरण  उनके मन को अधिक अब नहीं लुभाते खासतौर से जब वह एकरस से सरोबोर हों। इस तरह के सीधे प्रसारण वाले फिल्मरूपी समाचार देखने की उनकी यह आदत बनती जा रही हैं। वैसे एक बात बता दें कि अन्ना अगर उस दिन अनशन नहीं तोड़ते तो यकीन मानिए दर्शक ऊब गये होते। भ्रष्टाचार विरोधी उनका आंदोलन और उसके मुद्दे तो रह गये एक तरफ, मूल मुद्दा बन गया था कि अन्ना साहेब का अनशन टूटेगा नहीं! अब यह संयोग है या प्रचार प्रबंधकों की योजना कि भ्रष्टाचार का मुद्दा अन्ना के जीवन के आगे गौण पड़ गया। इस देश में वैचारिक चिंत्तन वाले लोग कम नहीं है पर जो टीवी से चिपके थे उनमें उनकी संख्या कम रही होगी जबकि इसे फिल्म की तरह देखने वाले लोगों का झुंड अधिक था। अन्ना साहेब के गांव में तो लोगों ने यह कहते हुए जश्न मनाया कि उनके कहे अनुसार जन लोकपाल बिन अंततः बन गया और अब वह अनशन तोड़ रहे हैं।’
         पूरे देश में ही यही स्थिति थी। ऐसे में वैचारिक लोगों के लिये यही बेहतर था कि वह अपना मुख बंद रखें। प्रचार माध्यमों ने इस तरह का माहौल बना दिया कि सच्ची बात कहना उस समय जोखिम मोल लेना था।
इस प्रकरण के समय हमें तीन चार दिन ऐसे दौर से गुजरना पड़ा कि इस पर देखना और लिखना संभव नहीं था। होता भी तो नहीं लिखते। इस फिल्म का न तो सिर समझ में आ रहा था न पैर! बस एक जिज्ञासा थी कि देखें तो रचने वालों ने इस खेल को रचा कैसा है? मानना पड़ेगा कि इस देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो धर्म, देश, समाज, भाषा तथा जनकल्याण के विषयों में लोगों की भावनायें इस कदर उभारने में माहिर हैं जिससे उनके व्यवसायिक लाभ हों। बहरहाल जहां टीवी चैनल बारात विदा होने के बाद जनवासे की तरह लग रहे हैं तो समाचार पत्र ऐसे लगते हैं जैसे छात्रकाल के दौरान परीक्षा के बाद हल किये गये प्रश्न पत्र लगते थे।
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Saturday, August 20, 2011

आशिक का अनशन-हिन्दी हास्य कविता (ashik ka anshan-hindi hasya kavita or hindi comic poem)

आशिक ने कहा माशुका से
"तुम जल्दी से विवाह की तारीख
तय कर लो,
मेरा अभी तक दिल बहलाया है
अब खाली घर भी भर दो,
वरना तुम्हारे घर के बाहर
आमरण अनशन पर बैठ जाऊंगा,
भूखा प्यासा मरकर अमर आशिक का दर्जा पाऊँगा,
दुनिया मेरी याद में आँसू बहाएगी।"

सुनकर माशुका झल्लाई
और गरजते हुए बोली
"मुझे मालूम है
नौकरी से तुम्हारी होने वाली है छटनी,
बन जाएगी तुम्हारी जेब की चटनी,
अब तुम मेरे खर्चे नहीं उठा पाओगे,
घर पर ले जाकर चक्की पिसवाओगे,
पर मैं तुम्हारे झांसे में नहीं आऊँगी,
जब तक न बने तुम्हारा नया ठिकाना
तुमसे तब तक तुमसे दूरी बनाऊँगी,
वैसे तुम याद रखना
नारियों को परेशान करने के खिलाफ
ढेर सारे कानून बन गए हैं,
कई स्वयंसेवी संगठनों के
तंबू भी तन गए हैं,
नया काम मिलने पर ही
मेरे पास आना,
वरना पड़ेगा पछताना,
अनशन किया तो भूखे बाद में मरोगे,
पहले  मेरे मुहल्ले में  दोस्तों के  हाथ फँसोगे,
कारावास में पहरेदार बाद में जमाएँगे लट्ठ
पहले भीड़ तुम्हारी पीठ पर बरसाएगी।"
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Thursday, August 11, 2011

आरक्षण फिल्म पर हायतौबा फिक्सिंग लगती है-सामाजिक लेख (a film movie on resevetion aarakshan and fix discussion and dissput-a hindi social article)

               एक बात तय है कि चाहे जितनी बहसें   और प्रदर्शन हो जायें फिल्म आरक्षण का प्रदर्शन रुकेगा या बाधित होगा ऐसा नहीं लगता। वजह साफ है कि बाज़ार और प्रचार का संयुक्त उपक्रम इस तरह है कि वह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में विभिन्न मुद्दे उठाकर इसी तरह अपने उत्पाद, सेवायें तथा पठनीय या दर्शनीय सामग्री का विक्रय करता है। फिल्म आरक्षण के निर्माता का तो पता नहीं पर उसके सभी अभिनेता निश्चित रूप से बाज़ार और प्रचार के नायक हैं। उनके पास न केवल फिल्मों का ढेर है बल्कि अनेक वस्तुओं के विज्ञापनो में उनके चेहरे प्रतिदिन देखे जा सकते हैं। मतलब यह फिल्म भी बाज़ार और प्रचार के उपक्रमों का ही एक सृजन है। जिस तरह उदारीकरण के चलते बाज़ार और प्रचार उपक्रमों ने समूचे विश्व पर अधिकार कर लिया है उसे देखकर नहीं लगता कि ‘आरक्षण’ फिल्म का प्रदर्शन रुक जायेगा। बल्कि ऐसा लगता है कि इसे प्रचार दिलानें के लिये विवाद खड़ा किया गया है । पहले भी किसी फिल्म के गाने या दृश्यों पर पर आपत्तियों  का प्रचार किया गया पर बाद में कुछ हुआ नहीं। उल्टे फिल्मों को प्रारंभ में ही अच्छी बढ़ता मिली यह अलग बात है कि बाद के दिनों में उनका प्रभाव एकदम घट गया। सीधी बात कहें तो फिल्म ‘आरक्षण’ पर यह हायतौबा फिक्सिंग लगती है।
            यह फिल्म देश की नौकरियों में जाति के आधार पर आरक्षण नीति पर आधारित है। हम यहां इस पर बहस नहीं करना चाहते कि यह नीति गलत है या सही। वैसे भी फिल्म के निर्माता का कहना है कि यह फिल्म आरक्षण नीति पर कोई तर्कसंगत दृष्टिकोण रखने के लिये नहीं बनी। फिल्म में क्या है यह तो पता चल ही जायेगा पर जिस तरह इस फिल्म पर बहस हो रही है और जो तर्क आ रहे हैं वह अधिक चर्चा लायक नहीं है क्योंकि उनमें कुछ नया नहीं है। अलबत्ता अभिव्यक्ति की स्वततंत्रा का मुद्दा जरूर चर्चा का विषय है। पहली बात तो यह है कि बाज़ार और प्रचार के शिखर पुरुषों की ताकत इतनी बड़ी है कि लगता नहीं है कि उनकी यह फिल्म रुकेगी या बाधित होगी। दूसरी बात यह है कि अभिव्यक्ति अब केवल संगठित क्षेत्रों की सपंत्ति बन गयी है। टीवी चैनल और समाचार पत्रों के विद्वान बड़े शहरों में रहने वाले व्यवसायिक प्रचारक होते हैं। उनके वही रटे रटाये तर्क सामने आते हैंे जो बरसों से सुन रहे हैं। इसलिये आम इंसान की अभिव्यक्ति के मुखर होने का तो प्रश्न ही नहीं है।
            दरअसल हम अगर देश की ‘आरक्षण’ नीति पर बहस करेंगे तो ऐसे कई सवाल हैं जो नये ंसदर्भों के उठते हैं जिनपर कथित समर्थक प्रचारक कभी ध्यान नहीं देते तो विरोधियों का भी यही हाल है। आरक्षण समर्थकों में कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने संगठन बनाये बैठे हैं और दावा करते हैं कि वह अपनी समाजों के रक्षक हैं। वह अपने रटे रटाये तर्क लाते हैं। ‘आरक्षण’ का विरोध सार्वजनिक रूप से कोई करता नहीं है क्योंकि ऐसा करने वालों को व्यवस्था से प्रतिरोध का भय रहता है। अगर हम पूरे विश्व के देशों की व्यवस्थाओं का देखें तो सच यह लगता है कि तो आरक्षण हो या न हो इस पर बहस करना ही व्यर्थ है। अभी हाल ही में ब्रिटेन में हुए दंगों में अश्वेतों की उपेक्षा का परिणाम मान गया। इस लिहाज से तो आरक्षण होना भी बुरा नहीं है।
         मुख्य बात यह है कि हम अपनी व्यवस्थाओं का स्वरूप कैसे चाहते हैं? हम उनको जनोन्मुखी बनाना चाहते हैं या उसमें भागीदारी का स्वरूप देखना चाहते हैं। अगर जनोन्मुखी बनाना चाहते हैं तो पूरी तरह से व्यवसायिक कौशल वाले लोगों को आगे रखना होगा और व्यवस्था में भागीदारी दिखाना चाहते हैं तो फिर हमें यह स्वीकार करना होगा कि उसमें कुछ समझौते तो करने ही पड़ेंगे। समस्या यह है कि भागीदारी के स्वरूप में कार्यकर्ता अपने पदों के अधिकार समझते हैं कर्तव्य नहीं जबकि जनोन्मुखी होने पर उनका रुख दायित्व निभाने वाला रहता है।
         हम बार बार देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर व्यथित होने का दावा तो करते हैं पर व्यवस्था में पनपी अकुशलता को अनदेखा कर देते हैं जबकि सारे संकट का कारण वही है। जहां तक कुशल लोगों का सवाल है तो हर जाति, धर्म, भाषा और हर क्षेत्र में हैं पर क्या हमने सभी को अवसर दिया है? क्या देश के सभी कुशल प्रबंधक सम्मानजजनक पदों पर पहुंचे हैं। हमने पद पाना कौशल मान लिया पर उसके कर्तव्यों के निर्वहन की कुशलता पर कभी विचार नहीं किया। हम यहां जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर विचार तो यह बात साफ दिखाई देगा कि आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में व्यवस्था इस तरह हो गयी है कि निजी चतुराई के सहारे अपने स्वार्थ सिद्ध करने वाले पद हथिया लेते हैं पर व्यवसायिक कौशल वाले लोगों को कहीं स्थान नहीं मिल पाया।
      आरक्षण समर्थक एक बुद्धिजीवी ने सवाल किया कि ‘क्या फिल्म को प्रमाण पत्र देने वाले सैंसर बोर्ड में एक भी हमारे समाज का है?’
         इसका जवाब कोई क्या देगा? दरअसल अगर उनसे कहा जाये कि इस मसले पर बहस के लिये अपने समाज से वह आदमी ले आओ जिसके पूरे खानदान में किसी ने आरक्षण का किसी भी तरह लाभ नहीं लिया हो। एक बात बता दें कि जिन समाजों को आरक्षण है उसमें कई ऐसे परिवार हैं जिनकी किसी पीढ़ी को इसका लाभ नहीं मिला। ऐसे लोग आरक्षण को लेकर इतने संवेदनशील भी नहीं होते पर जब भावना की बात आती है तो उनकी संख्या का सहारा लेकर ऐसे अनेक आरक्षण समर्थक विद्वान अपनी बात वजनदार होने का दावा करते हैं। देश के निम्न जातियों के गरीब लोगों की हालत बद से बदतर होती गयी है। आरक्षण की सुविधा लेकर सफेद छवि बनाने वाले लोगों ने अपने समाज के गरीब तबके से कितना वास्ता रखा है यह इस सुविधा से परे उनके लोगों से पूछकर देखा जा सकता है। फिर अब निजीकरण बढ़ रहा है ऐसे में आरक्षण का मुद्दा कितना सार्थक है यह भी विचारणीय बात है। फिल्म की कहानी आरक्षण की असलियत के कितना करीब होगी यह कहना कठिन है पर ऐसी फिल्मों को प्रचार दिलाने के लिये विवाद खड़े किये गये हैं यह देखा गया है।
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Friday, August 5, 2011

पाँव उधार मांगने वालों पर भरोसा-हिन्दी शायरी

क्यों उम्मीद करते हो उन लोगों से
जो हुकूमत का पहाड़ चढ़ने के लिए
तुमसे पाँव उधार मांगने आते हैं,
बताओ ज़रा यह कि
जिनके सिर आसमान में टंगे हैं
चमकते सितारों की तरह
उनकी आँखों को नीचे के बदसूरत नज़ारे
कब नज़र आते हैं।
-----------
जब से सीखा है
कौवे से किसी दूसरे पर
कभी भरोसा न करना
ज़िंदगी अपने अमन और चैन रहने लगा है,
हो गया है इस बात का अहसास कि
वफा बाज़ार में बिकने वाली शय है
यहाँ हर कोई मतलब का सगा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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