Saturday, February 28, 2009

नहीं बनी ऐसी कोई तराजू-हास्य व्यंग्य कविताएँ (nahin bani esi tarazu-hindi hasya vyangya kavitaen)

उनके कान खुले हैं
पर सुनते हैं कि नहीं कैसे बताएं
क्योंकि उनको सुनाया कई बार है दर्द अपना
पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि वह कोई दवा लाएं
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इश्क तो असल अब वही है
जिसके नाम पर कोई उत्पाद
बाज़ार में बिकता है
औरत हो या मर्द
असल में जज्बातों खरीददार होता है बाज़ार में
भले ही माशूक और आशिक के तौर पर दिखता है
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शब्द बिके नहीं बाज़ार में
तो पढ़े भी नहीं जाते
बिकने लायक लिखें तो
समझने लायक नहीं रह जाते
शब्दों के सौदागरों बनते हैं हमदर्द
पर दिल में उनके जज़्बात कभी
पहुँच नहीं पाते
नहीं बनी कोई ऐसी तराजू
जिसमें शब्दों को तौल पाते
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Thursday, February 26, 2009

रंग भी अपना रंग बदलते हैं-हिंदी शायरी (rang bhee badalte hain-hindi poem)

आंखों से देखकर भी
विश्वास नहीं होता
कभी बनते हैं
कभी मिटते हैं
दृश्य तो पलपल बदलते हैं।
सामने से गुजरते हुए
जिंदा इंसान और सामान
अपने अस्तित्व का देते आभास
पर अगले पल नहीं होते पास
किसको यकीन दिलायें कि
यह हमने देखा था, वह नहीं
घूमते सूरज और चांद
जगह बदलती है यह धरती
जिनके होने का अहसास
सुखद अनुभूति देता है
वह भी मिट जाते हैं
जिनसे होता कष्ट
वह भी नष्ट हो जाते हैं
रंगरंगीली इस दुनियां में
रंग भी अपना रंग बदलते हैं
कुछ देर ठहर जायें सुनहरे पल
यह ख्वाहिश करना बेकार है
वह भी किसी के इशारे पर चलते हैं

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Tuesday, February 24, 2009

आजाद की तरह हर गुलाम बहस करेगा-हास्य व्यंग्य कविता (azad aur gulam-hindi hasya kavita)

फंदेबाज बोला
बहुत समय से सुनते आ रहे थे नाम
अब तो आया अपने यहां भी इनाम
बताओ यह ऑस्कर क्या होता हैं
जिसको याद कर अपनी फिल्मी दुनियां का आदमी
रात को भी नहीं सोता है
बरसों से प्रेम,पैसे और प्रतिष्ठा से
जिनको अपने सिर पर बैठा रखा
वही लोग अपने हाथ बाहर फैलाये रहते हैं
भीख की तरह इनाम मिले
इसके लिये हर तरह का ताना सहते हैं
गोरे जब तक न करें वाह
तब तक भरते रहते हैं आह
अब तो यह ऑस्कर आ गया
खुशी मना रहे हैं जमकर लोग
जैसे भाग गया हो कोई पुराना रोग
जरा तुम ही हमें समझाओ’

पहले सुनकर चैंके
फिर आंखों और नाक के बीच लटके चश्में से
झांकते हुए बोले दीपक बापू
‘जब पूरी तरह अपनी बात कह डाली
फिर हमसे क्या सुनना चाहते हो
खुद ही कर लिया करो कविता
हमारे हास्य रस में क्यों नहाते हो
जिन के सिर पर रखते हैं देश के लोग ताज
गुलामी की आदत कुछ ऐसी है उनमें
गोरे अगर नजर इनायत न करें तो
उस पर नहीं होता उनको नाज
इसलिये हाथ फैलाये खड़े हो जाते हैं
ऑस्कर का कार्यक्रम तो बाद में आता
यहां विज्ञापन से पहले ही पैसा वसूल हो जाता
गोरे भी आकर इंसान है
कभी तो उनका दिल जाता है पसीज
खाली हाथ लौटाने वालों की
नहीं सह सकता कोई भी खीज
गोरी चमड़ी का घमंड वह छोड़ नहीं सकते
इसलिये इनामों में भी अब
पुराने गुलामों को चालाकी से तो जोड़ सकते
इसलिये गोरे चेहरे से ही एक फिल्म बनवाई
उसमें अभिनय के लिये गुलामों की भीड़ लगाई
फिल्म के शीर्षक में भी ‘कुत्ता’ शब्द जोड़कर
बता दिया अपने लोगों को
नहीं जा रहे असलियत छोड़कर
अवार्ड डाला कि हड्डी कोई नहीं जानता
फूट डालो और राज करो की नीति में
गोरे हमेशा सफल रहे
इसलिये कोई अवार्ड को अपना
तो कोई पराया मानता
तुमने कहा तो हमने भी कह दिया
मगर बहस यहां बहुत होगी
नहीं तो विज्ञापन से कमाई कौन करेगा
उसकी कमाई मरेगी जो इसे अवार्ड नहीं कहेगा
जिसको कुछ नहीं मिलना वह हड्डी कहेगा
देखते रहो दृष्टा बनकर
आजाद की तरह हर गुलाम बहस करेगा
तुम तो बस ताली बजाओ
नहीं तो महफिल ही छोड़ जाओ

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Friday, February 20, 2009

ऐसा वैसा पढ़ने की चाहत-आलेख

‘आपके लिखने की शैली दीपक भारतदीप से एकदम मिलती जुलती है’-हिंदी के ब्लाग एक ही जगह दिखाने वाले वेबसाईट संचालक ने यह बात मुझे तब लिखी जब मैंने अपने छद्म नाम के दूसरे ब्लाग को अपने यहां दिखाने का आग्रह किया। इस बात ने मुझे स्तब्ध कर दिया। इसका सीधा आशय यह था कि मेरे लिये यहां छद्म नाम से लिखने का अवसर नहीं था। दूसरा यह कि उस समय तक मैं इतना लिख चुका था कि अधिकतर ब्लाग लेखक मेरी शैली से अवगत हो चुके थे। छद्म नाम के उस ब्लाग पर मैंने महीनों से नहीं लिखा पर ब्लाग स्पाट पर वह मेरा सबसे हिट ब्लाग है। सुबह योगसाधना से पहले कभी कभी ख्याल आता है तो मैं अपने ब्लाग के व्यूज को देखता हूं। रात 10 बजे से 6 बजे के बीच उन्हीं दो ब्लाग पर ही पाठक आने के संकेत होते हैं बाकी पर शून्य टंगा होता है। अपने लिखने पर मैं कभी आत्ममुग्ध नहीं होता पर इतना अनुभव जरूर हो गया है कि कुछ लोग ऐसे हैं जो मुझे पढ़ने से चूक नहीं सकते। यही कारण है कि छद्म ब्लाग पर लिखना करीब करीब छोड़ दिया क्योंकि वहां मेरे परिचय का प्रतिबिंब मुझे नहीं दिखाई देता-आर्थिक लाभ तो खैर होना संभव ही नहीं है।

मुझे याद है कि मैंने यह ब्लाग केवल बेकार के विषयों पर लिखने के लिये बनाया था। इस ब्लाग पर पहली रचना के साथ ही यह टिप्पणी मिली थी कि ‘हम तो इसे ऐसा वैसा ब्लाग समझ रहे थे पर आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं।’
उस समय इस टिप्पणी पर लिखी बात मेरे समझ में नहीं आयी पर धीरे धीरे यह पता लग गया कि ब्लाग नाम लोकप्रियता के शिखर से जुड़ा था।
उस दिन अखबार में पढ़ा हिंदी भाषी क्षेत्रों मेें 4.2 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं। इस लिहाज से हिंदी में सात्विक विषयों के ब्लाग पढ़ने की संख्या बहुत कम है। ऐसा नहीं है कि हिंदी के ब्लाग लोग पढ़ नहीं रहे पर उनको तलाश रहती है ‘ऐसा वैसा’ पढ़ने की। जिन छद्म ब्लाग की बात मैंने की उन पर ऐसा वैसा कुछ नहीं है पर वह उनके नाम में से तो यही संकेत मिलता है। यही कारण है कि लोग उसे खोलकर देखते हैं। मैंने उन ब्लाग पर अपने सामान्य ब्लाग के लिंक लगा दिये हैं पर लोग उनके विषयों में दिलचस्पी नहीं लेते क्योंकि वहां से पाठक दूसरे विषयों की तरफ जाते ही नहीं जबकि दूसरे सामान्य ब्लाग पर इधर से उधर पाठकों का आना जाना दिखता है। मैंने उन दोनों ब्लाग से तौबा कर ली क्योंकि उन पर लिखना बेकार की मेहनत थी। न नाम मिलना न नामा।
वर्डप्रेस पर भी दो ब्लाग है जिन पर मैंने अपने नाम के साथ मस्तराम शब्द जोड़ दिया। तब दोनों ब्लाग अच्छे खासे पाठक जुटाने लगे। तब एक से हटा लिया और उस पर पाठक संख्या कम हो गयी पर दूसरे पर बना रहा। वह ब्लाग भी प्रतिदिन अच्छे खासे पाठक जुटा लेता है। तब यह देखकर आश्चर्य होता है कि लोग ‘ऐसा वैसा’ पढ़ने को बहुत उत्सुक हैं और उनकी दिलचस्पी सामान्य विषयों में अधिक नहीं हैं। अभी हाल ही में एक सर्वे में यह बात कही गयी है कि इंटरनेट पर यौन संबंधी साहित्य पढ़ना अधिक घातक होता है बनिस्बत सामान्य स्थिति में। एक तो यौन संबंधी साहित्य वैसे ही दिमागी तौर पर तनाव पैदा करता है उस पर कंप्यूटर पर पढ़ना तो बहुत तकलीफदेह होता है। इस संबंध में हानियों के बारे में खूब लिखा गया था और उनसे असहमत होना कठिन था।
उन ब्लाग की पाठक संख्या अन्य ब्लाग की संख्या को चिढ़ाती है और अपने ब्लाग होने के बावजूद मुझे उन ब्लाग से बेहद चिढ़ है। वह मुझे बताते हैं कि मेरे अन्य विषयों की तुलना में तो यौन संबंधी विषय ही बेहद लोकप्रिय है। सच बात तो यह है कि पहले जानता ही नहीं था कि मस्तराम नाम से कोई ऐसा वैसा साहित्य लिखा जाता है। मेरी नानी मुझे मस्तराम कहती थी इसलिये ही अपने नाम के साथ मस्तराम जोड़ दिया। इतना ही नहीं अपने एक दो सामान्य ब्लाग पर पाठ लिखने के एक दिन बाद-ताकि विभिन्न फोरमों पर तत्काल लोग न देख पायें’-मस्तराम शब्द जोड़कर दस दिन तक फिर कुछ नहीं लिखा तो पता लगा कि उस पर भी पाठक आ रहे हैं। तब बरबस हंसी आ जाती है। अनेक मिलने वाले ऐसी वैसी वेबसाईटों के बारे में पूछते हैंं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों के इंटरनेट कनेक्शन लेने वाले शायद इस उद्देश्य से लेते हैं कि ‘ऐसा वैसा’ पढ़े और देख सकें।

उस दिन एक जगह अपने कागज की फोटो स्टेट कराने गया। वह दुकानदार साइबर कैफे भी चलाता है। उस दिन वह अपने बिल्कुल अंदर के कमरे में था तो मैं इंटरनेट के केबिनों के बीच से होता हुआ वहां तक गया। धीरे धीरे चलते हुए मैं काचों से केबिन में झांकता गया। आठ केबिन में छह को देख पाया और उनमें तीन पर मैंने लोगों को ‘ऐसे वैसे‘ ही दृश्य देखते पाया और बाकी क्या पढ़ रहे थे यह जानने का अवसर मेरे पास नहीं था।

सामान्य रूप से भी यौन संबंधी मनोरंजन साहित्य और सीडी कैसिट उपलब्ध हैं पर इंटरनेट भी एक फैशन हो गया है सो लोग सक्रिय हैं पर उनकी मानसिकता में भी एसा वैसा ही देखने और पढ़ने की इच्छा है। यह कोई शिकायत नहीं है क्योंकि लोगों की ‘यौन संबंधी मनोरंजन साहित्य’ पढ़ने की इच्छा बरसों पुरानी है पर सात्विक साहित्य पढ़ने वालों की भी कोई कमी नहीं है-यह अलग बात है कि वह अभी समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों को ही देखने में सक्रिय हैं और इंटरनेट पर देखने और पढ़ने की उनमें इच्छा अभी बलवती नहीं हो रही है। जिनमें ऐसा वैसा पढ़ने की इच्छा होती है उनके लिये इंटरनेट खोलने की तकलीफ कुछ भी नहीं है पर सात्विक पढ़ने वालों के लिये अभी भी बड़ी है। कहते हैं कि व्यसन और बुरी आदतें आदमी का आक्रामक बना देती हैं पर सात्विक भाव में तो सहजता बनी रहती है।
ऐसा नहीं है कि सामान्य ब्लाग@पत्रिकाओं पर पाठक कोई कम हैं पर उनमें बढ़ोतरी अब नहीं हो रही है। ब्लागस्पाट के ब्लाग तो वैसे ही अधिक पाठक नहीं जुटाते पर वर्डप्रेस के ब्लाग पर नियमित रूप से उनकी संख्या ठीकठाक रहती है। सामान्य विषयों में भी अध्यात्म विषयों के साथ हास्यकवितायें, व्यंग्य और चिंतन के पाठकों की संख्या अच्छी खासी है-कुछ पाठ तो दो वर्ष बाद भी अपने लिये पाठक जुटा रहे हैं। यह कहना भी कठिन है कि ऐसा वैसा पढ़ने वालों की संख्या अधिक है या सात्विक विषय पढ़ने वालों की। इतना जरूर है कि ‘ऐसा वैसा’ पढ़ने पर जो हानियां होती हैं उनके बारे में पढ़कर उन लोगों के प्रति सहानुभूति जाग उठी जो उसमें दिलचस्पी लेते हैं।
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Monday, February 9, 2009

अपनी ऑंखें तो फेर सकते हैं-व्यंग्य आलेख (ankhen to fer sakte hain-hindi satire)

हम कपड़े क्यों पहनते हैं? इसके चार जवाब हो सकते हैं
1.सभी कपड़े पहनकर घूमते हैं।
2.हम बिना कपड़े पहने बाहर निकलेंगे तो लोगों की नजरें हम केंद्रित हो जायेंगी और हमें शर्म आ जायेगी।
3.हम कपड़े पहनकर नहंी निकलेंगे तो लोगों को शर्म आयेगी।
4.हमारा शरीर इसका आदी हो गया है और अगर हम उसे नहीं पहनेंगे तो शरीर को गमी या सदी लग जायेगी।
इनमें से कोई एक या सारे उत्तर सही हो सकते हैं। प्राचीन इतिहास से पता चलता है कि पहले लोग कपड़े नहीं पहनते थे। आदमी पहले बंदर की तरह ही था जिसकी देह पर बड़े बड़े बाल हुआ करते थे। समय के साथ वह कपड़े पहनने लगा तो धीरे धीरे उसकी देह के यह बाल छोटे होते गये। आदमी को कभी पूंछ भी हुआ करती थी जो पायजामा या धोती पहने छोटी होते हुए लुप्त हो गयी । पूंछ के लुप्त होते होते आदमी नैतिकता का लबादा ओढ़ता चला गया। नैतिकता एक फैशन की तरह है। किसी के लिये एक वस्तु या काम बुरा हो सकता है तो दूसरे के लिये अच्छा। सभी कहते हैं कि रिश्वत लेना पाप है जिसको अवसर मिलता है वह लेता है तब वह उसके लिये एक अधिकार होता है। रिश्वत देने वाला आधिकारिक मूल्य के रूप में देता है और लेना वाला कमीशन के रूप में लेता है। तब न देने वाला कहता है कि ‘आपको रिश्वत दे रहा हूं’ और न लेने वाला सोचता है कि रिश्वत ले रहा हूं।’

यही हाल है विवाह पूर्व और विवाहेत्तर प्रेम संबंधों का भी है। सभी लड़के चाहते है कि उनके पास एक ‘गर्लफ्रैंड’ हो ताकि मित्रों पर रुतवा जता सकें। जिसको प्रणय संबंध मिल गया वह लड़की को प्रेयसी कहता है अगर कोई लड़का उससे नाराज होता है तो लड़के के लिये कहता है‘फटकीबाज’ और लड़की को चालू कहता है। विवाहेत्तर संबंधों का भी यही हाल है। जो धनी मानी लोग हैं उनके लिये ऐसे संबंध बनाना कोई मुश्किल काम नहीं होता। ऐसे विवाहेत्तर संबंधों को लोग ‘हाई सोसायटी का ट्रैंड’ कहते हैं। भारतीय समाज की अपनी गति है और वह यहां संस्कार फैशन की तरह बनते और बिगड़ते है तो संस्कृति भी निर्मित और ध्वस्त होती है।

ऐसे में जिन लोगों को नये संस्कार दिल को अच्छे लगते हैं वह उसे अपना लेते हैं-जैसे शराब पीना,जुआ खेलना और विवाहपूर्व शारीरिक संबंध बनाना और विवाहेत्तर संबंधों का निर्माण करना। जिनको आंखों का सुख लेना है उनको स्त्रियों का आधुनिक कपड़े पहनना बुरा नहीं लगता। कुछ लोग ऐसे हैं जिनको अच्छा नहीं लगता वह आंखें फेर लेते हैं क्योंकि अपने देह पर कौन कैसे कपड़े पहन रहा है किसके साथ घूम रहा है यह उसका निजी मसला है। अपना मसला तो अपनी आंखें हैं उनको ही फेरा जा सकता है। ऐसे में कुछ लोग ऐसे भी है जो सुखद दृश्यों को सहन नहीं कर पाते तो वह उनको मिटाना चाहते हैं। दरअसल उनको समाज पर नियंत्रण करने की अपनी शक्ति का भ्रम होता है।
नैतिकता एक बहुत बड़ा भ्रम है। एक विचार या पहनावा किसी के लिये बहुत अच्छा है दूसरे के लिये बुरा है। संस्कार और संस्कृति व्यक्ति के निजी आचरण का प्रतीक होता है और वह उसके परिवार, समाज और घरेलू आर्थिक स्थिति के अनुसार निर्धारित होता है। इस देश में कुछ जातीय समाज ऐसे हैं जहां औरतें बीड़ी और शराब पीतीं हैं। आप उनके शराब पीने को अनैतिकता नहीं कहा सकते। अब अगर कुछ अमीर और धनी परिवार की स्त्रियां शराब पी रहीं हैं तो उन्हेेंं हाई सोसायटी का ट्रैंड कहा जाता है। वह अपने आपको आधुनिक कहती हैं। ऐसे में अगर मध्यम वर्ग की कोई स्त्री पीती है तो उसे अनैतिकता कहा जाता है।

नैतिकता के मुख्य आधार कभी नहीं बदलते। किसी दूसरे को दुःख न देना, ईष्र्या और द्वेष से परे रहना और अवसर पड़े तो दूसरे की सहायता करना। यही संस्कार भी है और संस्कृति। इसके अलावा जो संस्कृति या संस्कार हैं वह कपड़े पहने और खानपान से संबंधित होते हैं। उसका सीधा आधार यही है कि जैसा करेगा वैसा भरेगा। फिर आखिर किस नैतिकता की बात लोग करते हैं। किस सस्कृति की रक्षा करते हैं और वह कौनसे संस्कार हैं जिनको वह जीवंत रखना चाहते हैं।
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Thursday, February 5, 2009

पसीना और प्रबंध-तीन व्यंग्य कवितायें

प्रबंध का मतलब उनको केवल
इतना ही समझ में आता है।
परिश्रमी के शरीर से निकले
पसीने का अमृत बना दें
अपने मालिक के लिये
बदले में डालें उस पर विष भरी दृष्टि
और मुफ्त में उसके काम पर गरियायें
हालांकि अवसर आने पर
पसीने का उचित दाम का
नारा लगाना भी उनको खूब आता है।
..........................
इस देश में कुशल प्रबंधक
उसे ही कहा जाता है
जो मालिक की नजर में चढ़ जाता है
दूसरे के पसीने से सींचे हुए फूलों को
जो न्यौछावर कर दे
अपने मालिक के लिये
वही तरक्की की राह पाता है।
पसीने की बूंदों को भले ही
अमृत कहते हों सभी लोग
पर कुशल प्रबंधक वही कहलाता
जो उसमें शोषण का विष मिलाता है।

.........................
पसीने का मूल्य
पूरी तरह नहीं चुकाओ
तभी कुशल प्रबंधक कहलाओगे
कुचलोगे नहीं जब तक किसी निरीह को
तब तक वीर नहीं कहलाओगे।
जमाने का उसूल है
अच्छा है या बुरा
करता है जीतने वालों को सलाम
पद दिल भी कोई चीज है
अपने ईमान से भटके तो
जीत कर भी पछताओगे।
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Sunday, February 1, 2009

इस खबर से सनसनी नहीं फैलेगी-हास्य व्यंग्य

अपने बास के आदेश पर टीवी कैमरामैन और संवाददाता कि सनसनीखेज खबर को ढूंढने लगे। वह अपनी कार में बैठे सड़कों पर इधर उधर घूम रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि एक आदमी पैदल चलते हुए सड़क पर बने एक गड़ढे में गिर गया। संवाददाता ने कार चालक को कार रोकने का इशारा किया और कैमरामैन से कहा-‘‘जल्दी उतरो। वह आदमी गड़ढे में गिर गया है।’’
कैमरामैने ने कहा-‘अरे सर! आप भूल रहे हो कि हमारा काम खबरें देना हैं न कि लोगों की मदद करना। कम से कम किसी गिरे को उठाने का काम तो हमारा बिल्कुल नहीं है।’
संवाददाता ने कहा-‘अरे, बीच सड़क पर गड्ढा बन गया है। उसमें आदमी गिर गया है। इस खबर से सनसनी फैल सकती है और नहीं फैलेगी तो गड्ढे की बदौलत हम उसे बना लेंगे। आदमी की मदद के लिये थोड़ी ही हम लोग चल रहे हैं।’
दोनों उतर पड़े। मगर तब तक वह आदमी वहां से उठ खड़ा हुआ और अपनी राह चलने लगा। संवाददाता उसके पास पहुंच गया और बोला-‘अरे, आप भी कमाल करते हैं। सड़क पर बने गड्ढे में गिर पड़े और बिना हल्ला मचाये चले जा रहे हैं। जरा रुकिये!’
उस आदमी ने कहा-‘भाई साहब, मुझे जल्दी जाना है। उधार वाले पीछे पड़े रहते हैं। अच्छा हुआ जल्दी उठ गया वरना अधिक देर लगाता तो हो सकता है कि यहां से कोई लेनदार गुजरता तो तकादा करने लग जाता।’
संवाददाता ने कहा-‘उसकी चिंता आप मत करिये। हम समाचार दिखाने वाले लोग हैं। किसी की हिम्मत नहीं है कि कोई हमारे कैमरे के सामने आपसे कर्जा मांग सके। आप वैसे ही इस गड्ढे में दोबारा गिर कर दिखाईये तो हम आपका फोटो टीवी पर दिखायेंगे। इससे गड्ढे के साथ आपका भी प्रचार होगा। आप देखना कल ही यह गड्ढा भर जायेगा।’
उस आदमी ने कहा-‘तो आप गड्ढे का ही फोटो खीच लीजिये न! कल अगर मेरा चेहरा लेनदारों को दिख गया तो उनको पता चलेगा कि मैं इसी शहर में हूं। अभी तो वह घर पर जाते हैं तो परिवार के सदस्य कह देते हैं कि बाहर गया है।’
संवाददाता ने कहा-‘कल तुम यहां की प्रसिद्ध हस्ती हो जाओगे किसी की हिम्मत नहीं है कि तुमसे कर्जा मांग सके। हो सकता है कि इतने प्रसिद्ध हो जाओ कि फिल्मों मेंं तुम्हें गड़ढे में गिरने वाले दृश्यों के लिये स्थाई अभिनेता मान लिया जाये।’
वह आदमी प्रसन्न हो गया। उसने गड्ढे में गिरने का अभिनय किया और इससे उसकी हथेली पहले से अधिक घिसट गयी और खरौंच के निशान बन गये। संवाददाता ने कैमरामैन को इशारा किया। इससे पहले वह फोटो खींचता कि संवाददाता का मोबाइल बज गया। उसने मोबाइल पर बात की और उसे तत्काल जेब में रखते हुए कैमरामैन से बोला-‘इसे छोड़ो। उधर एक सनसनीखेज खबर मिल गयी है। सर्वशक्तिमान की दरबार के बाहर एक चूहा मरा पाया गया है। अभी तक वहां कोई भी दृश्य समाचार टीम नहीं पहुंची है। इस खबर से सनसनी फैल सकती है।’

कैमरामैन ने- जो कि फोटो खींचने की तैयारी कर रहा था- संवाददाता के आदेश पर अपना कैमरा बंद कर दिया। संवाददाता और कैमरामैन दोनों वहां से चल दिये। पीछे से उस आदमी ने कहा-‘अरे, मरे चूहे से क्या सनसनी फैलेगी। तुम इस गड्ढे को देखो और फिर मेरी तरफ? मेरा हाथ छिल गया है? कितनी चोट लगी है।’
संवाददाता ने कहा-‘यह गड्ढा सड़क के एकदम किनारे है और तुम इधर उधर यह देखते हुए चल रहे थे कि कोई लेनदार देख तो नहीं रहा और गिर गये। इसलिये इस खबर से सनसनी नहीं फैलेगी। फिर पहले तो तुमको चोट नहीं आयी। टीवी पर दिखने की लालच पर तुम दूसरी बार गिरे। यह पोल भी कोई दृश्य समाचार देने वाला खोल सकता है। अब हमारे पास एक सनसनी खेज खबर आ गयी है इसलिये जोखिम उठाना बेकार है।
वह दोनों चले गये तो वह आदमी फिर उठकर खड़ा हुआ। यह दृश्य उसको रोज अखबार देने वाला हाकर देख रहा था। वह उसके पास आया और बोला-‘साहब, आप भी किसके चक्कर में पड़े गये और खालीपीली हाथ छिलवा बैठे।’
उस आदमी ने कहा-‘तुम अखबार में समाचार भी देते हो न! जाकर यह खबर दे देा कि दृश्य समाचार वालों के चक्कर में मेरी यह हालत हुई है। हो सकता है इससे प्रचार मिल जाये दूसरे दृश्य समाचार वाले मेरे से साक्षात्कार लेने आ जायें।’
हाकर ने कहा-‘साहब! मैं छोटा आदमी हूं। इन दृश्य समाचार वालों से बैर नहीं ले सकता। क्या पता कब अखबार की ऐजेंसी बंद हो जाये और हमें छोटे मोटे काम के लिये इनके यहां नौकरी के लिये जाना पड़े।’
वह आदमी अपने छिले हुए हाथ को देखता हुआ रुंआसे भाव से चला गया।
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