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Thursday, September 19, 2013

बीमारी और दवाओं पर सत्संग-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(bimari aru davaon par satsang-hindi vyangya kavita or hindi satire poem)



इस जहान में आधे से ज्यादा लोग
चिकित्सक हो गये हैं,
अपनी बीमारियों की दवायें खाते खाते
इतना अभ्यास कर लिया है कि
वह बीमारी और दवा के बीच
अपना अस्तित्व खो रहे हैं,
बताते हैं दूसरों को दवा
भले कभी खुद ठीक न हो रहे हों।
कहें दीपक बापू
अपनी छींक आते ही हम
रुमाल लगा लेते हैं
इस भय से कि कोई देखकर
दुःखी हो जायेगा,
बड़ी बीमारी का भय दिखाकर
बड़े चिकित्सक का रास्ता बतायेगा,
सत्संग में भी सत्य पर कम
मधुमेह पर चर्चा ज्यादा होती है,
सर्वशक्तिमान से ज्यादा
दवाओं  पर बात  होती है,
कितनी बीमारियां
कितनी दवायें
बीमार समाज देखकर लगता है
छिपकर खुशी की सांस ली जाये,
लाचार शरीर में लोग
ऊबा हुआ मन ढो रहे हैं,
बीमार खुश है अपनी बीमारी और दवाओं पर
भीड़ में सत्संग कर
यह सोचते हुए कि
वह स्वास्थ्य का बीज बो रहे हैं।

  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Wednesday, September 11, 2013

हिन्दी दिवस पर व्यंग्य कविता-अंग्रेजी पढ़ने वाले हिन्दी रास्ता दिखाते हैं (satire poem on hindi day,hindi diwas par vyangya kavita)



ओढ़े हैं अंग्रेजी का लबादा
टिकायें है आसरा
दूसरों पर हिन्दी मशाल जलाने का,
कार पर सवार
हिंग्लिश में बतियाते हैं,
ख्वाब रखते हैं गरीबों पर
राष्ट्रभाषा की बैलगाड़ी का,
देश के इंसानों को गुलाम बनकर
विकास का रास्ता दिखाते हैं,
समाज के बड़े अब परे हो गये हैं,
अंग्रेजी भाषा के ठेकेदार
नाम पट्ठिका  भाषा की पदवी लिखाते हैं।
कहें दीपक बापू
अमीर से हो गयी  आम आदमी की लंबी दूरी,
गरीब के पसीने से निकले सोने को
बटोरने की उनके सामने हैं मजबूरी,
इसलिये साल में एक बार हिन्दी दिवस मनाते हैं,
मातृभाषा पर अहसान जताते हैं,
पूरा घर पढ़ रहा है जिनका अंग्रेजी में
देश के लोगों हिन्दी का मार्ग वही दिखाते हैं।


  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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Monday, August 13, 2012

जिंदगी में मजे कुछ यूं लिये-हिन्दी कविता (aindagi ke majre hamane yoon liye-hindi kavita or poem)

चंद पल की खुशी की खातिर
हमने जिंदगी के कई साल बरबाद किये,
जब पढ़ते हैं हम अपनी कहानी
तब पता लगता है कि
अमृत से ज्यादा जहर के प्याले पिये।
कहें दीपक बापू
जुबान से निकले अपने बहुत से बोल
बाहर आते ही जमीन पर गिरते देखे
खामोशी में हम खुशी से जिये,
बहुत से दृश्यों में आंखों फोड़ी
शोर सुनकर कान भी बहरे किये,
मगर मजे से रहे तभी
जब लोग दौड़े सुख के वहम में दुखों की तरफ
हम खड़े रहे बांधे हाथ पीछे किये।
........................................
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ग्वालियर
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Monday, November 28, 2011

आम आदमी कार्टून में खड़ा रहेगा-हिन्दी हास्य व्यंग्य कवितायें (comman man, cortton and corttunist-hindi satire comedy poem's)

बहुत मुद्दो पर बहस
टीवी चैनलों पर चलती है,
अखबारों में समाचारों के साथ
संपादकीय भी लिखे जाते हैं,
बरसों से मसले वहीं के वहीं हैं,
बस, चर्चाकार बदल जाते हैं।
लगता है आम आदमी इसी तरह
बेबस होकर कार्टूनों में खड़ा रहेगा
जिसकी समस्याओं के हल के लिये
रोज रोज बनती हैं नीतियां
कभी कार्यक्रमा भी बनाये जाते हैं।
-------------
एक कार्टूनिस्ट से आम आदमी ने पूछा
‘‘यार,
आप जोरदार कार्टून बनाते हो,
हमारे दर्द को खूबसूरती बयान कर जाते हैं,
मगर समझ में नहीं आता
देश के मसले कब हल होंगे
हमारा उद्धार कब हो जायेगा।’’
सुनकर कार्टूनिस्ट ने कहा
‘‘सुबह सुबह शुभ बोलो,
जब यह देश का हर आदमी
दर्द से निकल जायेगा,
मेरे कार्टून के विषय हो जायेंगे लापता
नाम पर भी लगेेगा बट्टा
मगर भगवान की कृपा है
तुम जैसे लोग खड़े रहेंगे
मेरे कटघरे में इसी तरह
भले ही तुम अपनी जंग खुद लड़ते रहो
मगर तुम्हारे भले के लिये
कोई न कोई रोज नया आदमी खड़ा होगा,
अभिनय कर देवता बन जायेंगे
उनके नाटक पर
मेरे लिये रोज एक कार्टून तैयार हो जायेगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Tuesday, October 25, 2011

कन्या भ्रुण हत्याओं का परिणाम और कॉमेडी-हिन्दी व्यंग्य लेख

              यह कहना कठिन है कि यह कन्या भ्रुण हत्याओं की वजह से देश में लड़कियों की संख्या कम होने का परिणाम है या छोटे पर्दे लेखकों की संकीर्ण रचनात्मकता का प्रभाव कि हास्य-व्यंग्य पर आधारित कार्यक्रम यानि कॉमेडी के लिये पुरुष पात्रों से महिलाओं का अभिनय कराया जा रहा है। इतना तय है कि इस कारण हास्य व्यंग्य पर आधारित धारावाहिक अपना महत्व आम जनमानस में खो रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि हास्य व्यंग्य पर आधारित एक चैनल भी अब अपनी कहानियों में पुरुष अभिनेताओं को महिलाओं के पात्र निभाने के लिये प्रेरित कर रहा है। एक कार्यक्रम कॉमेडी सर्कस ने तो हद ही कर दी है। उसमें पुरुष जोड़ी को महिला युगल पात्रों का अभिनय कराया तो महिला से पुरुष और पुरुष से महिला पात्र कराने अभिनय भी प्रस्तुत किया।
             हम यहां कोई आपत्ति नहीं कर रहे हैं न कोई बंदिश आदि की मांग कर रहे हैं। बस एक बात हास्य व्यंग्य लेखक और पाठक होने के नाते जानते हैं कि ऐसी मूर्खतापूर्ण प्रस्तुतियों से हंसी तो कतई नहीं आती है। फिर आज की युवा पीढ़ी से यह आशा करना तो बेकार ही है कि वह ऐसे हास्य व्यंग्य को समझ पायेगी जो कि विशुद्ध रूप से विपरीत लिंगी यौन आकर्षण के कारण भी इनको देखती है। अगर कहीं महिला पात्र का निर्वाह कोई पुरुष करता है तो वह युवकों में कोई यौन आकर्षण पैदा नहीं करता। वास्तव में जो हास्य व्यंग्य देखते हैं उनके लिये भी यह निराशाजनक होता है। सब जानते हैं कि विपरीत लिंगी योन आकर्षण भी पर्दे की प्रस्तुतियों को सफल बनाने में योग देता है और यह देश अभी समलैंगिक व्यवहार के लिये तैयार नहीं है जैसा कि कुछ बुद्धिजीवी चाहे हैं। इस तरह के अभिनय अव्यवसायिक रुख का परिणाम लगता है भले ही चैनल वालों को इसकी परवाह नहीं क्योंकि वहां कंपनी राज्य चलता है जिनके उत्पाद बिकने हैं चाहें विज्ञापन दें या नहीं। विज्ञापन तो उनके लिये प्रचार माध्यमों को नियंत्रित करनो का जरिया मात्र है।
             हमें लगता है कि यह शायद इसलिये हो रहा है कि इन पर्दे के व्यवसायियों को महिला पात्र मिल नहीं पा रही हैं या फिर आजकल की लड़कियां भी जागरुक हो गयी हैं और -जैसा कि हम सुनते हैं कि कला की दुनियां दैहिक यानि कास्टिंग काउच शोषण होता है-वह कम संख्या में ही मिल रही हैं। यह सही है कि पर्दे की रुपहली दुनियां के सभी प्रशंसक हैं पर कास्टिंग काउच जैसे समाचारों की वजह से अब आम लड़कियां नायिका बनने के सपने अधिक मात्रा में नहीं देखती। संभव है कि लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है जिस कारण उसका प्रभाव हो या फिर बढ़ती जनसंख्या के बावजूद पर्दे पर अभिनय करने वाली लड़कियों की संख्या कार्यक्रम निर्माताओं की संख्या के अनुपात में न बढ़ी हो। इसलिये संतुलन न बन पा रहा हो। जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे देश का धनपति तथा बाहुबली वर्ग सारी बातें मंजूर कर सकता है पर काम देने के मामले में अपनी शर्तें थोपने की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाते। इसलिये जिनको अभिनय के लिये लड़कियां अपनी शर्तों पर मिलती हैं वह कार्यक्रम बना लेते हैं जिनको नहीं मिलती वह पुरुषों से महिला पात्रों का अभिनय कराने वाली पटकथा लिखवाते हैं। प्रचार प्रबंधकों की मनमानी का ही यह परिणाम है कि क्रिकेट की तरह छोटे पर्दे के कथित वास्तविक प्रसारण यानि रियल्टी शो भी फिक्सिंग के आरोपो से घिरे रहते हैं। अभी हाल ही में बिग बॉस-5 को हिट करने के लिये भी क्षेत्रीयता का मुद्दा उठाया गया। लोगों ने साफ माना कि यह केवल प्रचार बढ़ाने के लिये हैं।
            बहरहाल एक बात तय है कि हिन्दी से कमाने को सभी लालायित हैं पर शुद्ध लेखकों से लिखवाने के लिये कोई तैयार नहीं है। यही कारण कि विदेशी धारावहिकों से अनुवाद कर लिखवाया जाता है। क्लर्कों को कथा पटकथा लेखक कहा जाता है। विदेशी कार्यक्रमों की की हुबहु नकल पर कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं। देश के संस्कारों की समझ किसी को नहीं है न उनको जरूरत है। यहां आम आदमी को तो एक निबुद्धि इंसान माना जाता है। कॉमेडी के नाम पर इसलिये फूहड़ कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
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Monday, August 16, 2010

माया में भी नकली माया-हिन्दी व्यंग्य लेख (maya men bhi nakli maya-hindi vyangya lekh)

काग़ज के नोट वैसे भी नकली माया की प्रतीक है क्योंकि उनसे कोई वस्तु खरीदी जा सकती है पर उनका कोई उपयोग नहीं है। हर नोट पर रिजर्व बैंक इंडिया के गवर्नर का एक प्रमाण पत्र रहता है जिस पर लिखा रहता है कि मैं इसके धारा को अंकित रुपया देने का वचन देता हूं। चूंकि वह एक सम्मानित व्यक्ति होता है इसलिये उसका प्रमाण पत्र नोट को नोट प्रमाण बना देता है। कहने का अभिप्राय यह है कि नोट असली माया का प्रतीक है पर स्वयं नकली है पर कमबख्त अब तो नकली माया में भी नकली का संकट खड़ा हो गया लगता है।
इधर सुनते हैं कि चारों तरफ नकली नोटों का बोलबाला है। कहंी दूध तो कहीं खोए के भी नकली होने की चर्चा आती है। एक तो सारा संसाद ही मिथ्या माया का प्रतीक और उसमें भी मिथ्या।
बड़े बड़े अध्यात्मिक चिंतक इस देश में हुए हैं पर किसी ने अपनी तपस्या, यज्ञ या सत्संग में मिथ्या संसार में भी मिथ्या माया की खोज नहीं की। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अपना अध्यात्मिक चिंतन भी चूक गया है क्योंकि वह तो संसार के मिथ्या होने तक ही सीमित है। मिथ्या में भी मिथ्या के आगे वह बेबस हो जाता है।
इधर एक दूग्ध संघ के अधिकारी के पास जांच अधिकारियों को माया के अपरंपार भंडार मिले हैं और उनके लाकर नित नित नये प्रमाण उगल रहे हैं। अब यह कहना मुश्किल है कि सरकारी दुग्ध भंडार के अधिकारी ने दूध से काली कमाई कैसे की? नकली दूध बनाकर बेचा या फिर पानी मिलाकर आम उपभोक्ता को पिलाया! उनके खज़ाने में नकली नोट भी मिल रहे हैं और इससे एक बात जाहिर होती है कि जब आदमी के सामने नोट आता है तो वह उसके आने के अच्छे या बुरे रास्ते आने पर विचार नहीं कर सकता पर अब तो यह हालत है कि नकल और असल की भी पहचान नहीं रही।
मुश्किल यह है कि दूध सफेद ही बेचा जा सकता है पर उससे काली कमाई करने के दो तीन तरीके प्रचलित हैं-पानी मिलाकर, नकली बनाकर या पावडर से तैयार कर! शुद्ध दूध तो आजकल उनको ही मिलना संभव है जिन्होंने पिछले जन्म में पुण्य किये हों या स्वयं ही दूसरों को शुद्ध दूध प्रदान किया हो।
देश की जनसंख्या बढ़ रही है और उसके कारण महंगाई भी! खाद्य और पेय पदार्थों की कमी के कारण यह सभी हो रहा है। दुनियां के बहुत सारे झूठ हैं जिनमें यह भी एक शामिल है क्योंकि अपना मानना है कि सारा संकट अकुशल प्रबंध से जुड़ा है जिसे छिपाने के लिये ऐसा कहा जाता है। मुश्किल यह है कि इस देश में शिखर पर बैठे लोगों ने तय किया है कि कोई काम आसानी से नहीं होने देंगे। पूंजीपति के लिये सारे रास्ते आसान है पर आम इंसान के लिये सभ्ीा जगह मुश्किलों का ढेर है। जिसके पास अवसर आ रहा है वही नोट एकत्रित करने लगता है-न वह काला रास्ता देखता है न सफेद।
अलबत्ता दूध सफेद है तो वह सफेद ही रहेगा-असली हो या नकलीी। नोट भी नोट रहेगा असली या नकली। किसी भी दुग्ध संध के बड़े अधिकारी स्वयं दूध नहीं बेचते। दूध के विपणन में उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका होती है पर उसका निर्णायक महत्व होता है। दूध खरीदना बेचने की सामान्य प्रक्रिया के बीच एक तंत्र है जिसमें ठेके और कमीशन का खेल चलता है। तय बात है कि यह नकली नोट भी किसी ने अपने काम के लिये दिये होंगे। उसका काम असली हुआ पर माल नकली दे गया। किसने देखा कि माल भी नकली रहा हो।
हजार और पांच सौ नोटों का मामला अज़ीब है। एक तरह से समानातंर व्यवस्था चलती दिख रही है। जब सब्जी या अन्य छोटा सामान खरीदना होता है तो सौ, पचास और दस का नोट जेब में देखकर चलना होता है। बैंक से एटीएम में पांच सौ हजार का नोट जब निकलता है तो एक तो चिंता यह होती है कि कहीं नकली न आ जाये दूसरा यह भी कि उनके खर्च करने के लिये कौनसी बड़ी खरीददार होगी। हम यह दावा तो नहीं कर सकते कि कभी नकली नहीं आया क्योंकि अगर आया भी होगा तो चल गया हो, कौन कह सकता है। अलबत्ता कुछ लोगों ने ऐसी शिकायते की हैं कि बैंकों से भी नकली नोट निकले हैं। बहरहाल बड़े नोटों को बड़ी खरीददारी में खर्च कर छोटे नोट जुटाते हैं ताकि उनका छोटी खरीददारी में उपयोग किया जाये। इस तनाव में थोड़ा दृष्टिपात करें तो अपने आप को दो अर्थव्यवस्थाओं के बीच फंसा पायेंगे।
ऐसे में कभी कभी बड़ा डर लगता है कि कहीं अपने हाथ एक हजार या पांच सौं का नोट आ गया तो क्या कहेंगे-माया में भी नकली माया!
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Tuesday, August 10, 2010

अपने से अज़नबी हो गया आदमी-हिन्दी कविता (apne se azanabi ho gaya aadmi-hindi poem

लोगों की संवेदनाऐं मर गयी हैं
इसलिये किसी को दूसरे का दर्द
तड़पने के लिये मजबूर नहीं कर पाता है।

निगाहों ने खो दी है अच्छे बुरे की पहचान
अपने दुष्कर्म पर भी हर कोई
खुद को साफ सुथरा नज़र आता है।

उदारता हाथ ने खो दी है इसलिये
किसी के पीठ में खंजर घौंपते हुए नहीं कांपता,
ढेर सारे कत्ल करता कोई
पर खुद को कातिल नहीं पाता है।

जीभ ने खो दिया है पवित्र स्वाद,
इसलिये बेईमानी के विषैले स्वाद में भी
लोगों में अमृत का अहसास आता है।

किससे किसकी शिकायत करें
अपने से ही अज़नबी हो गया है आदमी
हाथों से कसूर करते हुए
खुद को ही गैर पाता है।
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Thursday, August 5, 2010

रौशनी के लिए-हिन्दी व्यंग्य कविता

रौशनी के आदी हो गये, अब अंधेरों से डरने लगे हैं।
आराम ने कर दिया बेसुध, लोग बीमारियों से ठगे हैं।।
पहले दिखाया सपना विकास का, भलाई के ठेकेदारों ने
अब हर काम और शय की कीमत मांगने लगे हैं।।
खिलाड़ी बिके इस तरह कि अदा में अभिनेता भी न टिके
सौदागर सर्वशक्तिमान को भी सरेराह बेचने लगे हैं।
अपनी हालातों के लिये, एक दूसरे पर लगा रहे इल्ज़ाम,
अपना दामन सभी साफ दिखाने की कोशिश में लगे हैं।।
टुकुर टुकुर आसमान में देखें दीपक बापू, रौशनी के लिए,
खुली आंखें है सभी की, पता नहीं लोग सो रहे कि जगे हैं।।
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Wednesday, August 4, 2010

कितने बिस्तर में कितनी बार-हिन्दी हास्य कविता (kitne bistar men kitni bar-hasya kavita)

दनदनाता आया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू,
जल्दी अपने फ्लाप होने का लबादा छोड़ दो,
जो मैं कहता हूं वही अपनी कविता में जोड़ दो,
अपनी कविता का एक जोरदार शीर्षक लिखो
‘कितने बिस्तर में कितनी बार’
यह लिखकर हिट हो जाओगे।’’
अपने चश्में को ठीक करते हुए
पहले फंदेबाज को घूरा
फिर कहैं दीपक बापू
‘‘क्या विकासवादी समझ रहे हो
जो एक शब्द में हिट होने का
सपना दिखाते हो,
हम तैयार है अगर
पूरी कविता ही तुम लिखाते हो,
लिख दें ‘कितने बिस्तर में कितनी बार’
सामग्री भी तो वैसी चाहिए
जिससे लोग खुश हो जायें
नहीं तो नाराज होंगे अपार,
हम ऐसे अकादमिक नहीं हैं कि
एक शब्द या पंक्ति पर ही मशहूर हो जायें,
सम्मान पाकर मेहनत को अपने दूर भगायें,
कम और निरर्थक लिखकर अनेक लोगों ने प्रसिद्धि पाई,
सबकी अपनी अपनी किस्मत है भाई,
ऐसे ही लोग करते इस्तेमाल
महिला के लिये लिखते ‘छिनाल’
और पुरुष के लिये छिनारा,
निजी झगड़े को पूरी सभ्यता से जोड़कर
कर लेते हैं किनारा,
शीर्षक तुमने जोरदार दिया
पर अपने को इसका कोई फायदा नहीं है
इसलिये तुमसे कोई करते वायदा नहीं है,
तुम्हारे शीर्षक को लिया तो
पेटीकोट, ब्लाऊज, पैंट और चड्डी के साथ
कुछ यौन सामग्री को ही लिखना पड़ेगा,
देश में महंगाई, बेकारी और परेशानियां बहुत हैं
ऐसे में सड़क पर दिखने वाले
मज़दूरों, बेबसों और गरीबों के
फटेहाल वस्त्रों का दृश्य आंखों में उभरेगा,
सच से परे होकर लिखना कठिन लगता है,
रात के अंधेरे से
कहीं अधिक डरावना दिन लगता है,
जमीन पर सोने वाले
बिस्तर वालों से
अधिक बड़े योद्धा होते हैं,
दौलतमंद, बड़े ओहदेदार और अक्लमंद भले ही
दिखते शहंशाह
पर असली जंग का बोझ तो
मज़दूर और गरीब ही ढोते हैं,
एक शब्द और एक पंक्ति पर
उलझना छोड़ दो
समाज की असलियत तभी समझ पाओगे,
वरना ‘कितने बिस्तर में कितनी बार’ सोए
पूरी संख्या याद नहीं कर पाओगे।’
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Friday, July 23, 2010

शब्द और भावना-हिन्दी कविता (shabda aur bhavana-hindi poem)

शब्द सुंदर हैं, पर हृदय में नहीं दिखती हैं भावनायें,
आंखें नीली दिख रहीं हैं, पर उनमें नहीं हैं चेतनायें।
प्राकृतिक रिश्ते, कृत्रिम व्यवहार से निभा रहे हैं सभी इंसान,
चमकीले चेहरों का झुंड दिखता है, पर नहीं है उनमें संवेदनायें।
जल में नभ को नाचता देखकर नहीं बहलता उनका दिल
लगता है जैसे लोटे में भरकर उसे अपने ही पेट में बसायें।
कितनी संपदा बटोरी धनियों ने गरीबों का लहू चूसकर
फिर भी हाथ खाली रखते हैं, ताकि उससे अधिक बनायें।
धर्म की रक्षा और जाति की वफा के नारे लगा रहे हैं बुद्धिमान
ज्ञान बिके उनका सदा, इसलिये समाज में भ्रम और भय बढ़ायें।
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Tuesday, July 20, 2010

हमदर्दी की रस्म-हिन्दी व्यंग्य कविता (hamdardi ki rasma-hindi vyangya kavita)

दौलत और शौहरत के सिंहासन पर
बैठे लोगों से हमदर्दी की
उम्मीद करना बेकार है
क्योंकि वह डरे सहमे हैं
अपनी औकात से ज्यादा
मिली कामयाबी के खो जाने के खौफ से ,
और दुनियां का यह कायदा
भूलना मुश्किल है कि
डरपोक लोग ही खूंखार हो जाते हैं।
इसलिये हर हादसे पर
उनकी हमदर्दी जताने को
रस्मी समझ खामोश हो जाते हैं।
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Friday, July 16, 2010

हास्य कविताएँ -भ्रष्टाचार पुराण- (bhrashtachar puran-hindi hasya kavitaen)

भ्रष्टाचार के विरुद्ध निकले
जुलूस में एक आदमी ने दूसरे से पूछा
‘‘यार, एक बात बताओ,
सभी जगह भ्रष्टाचार व्याप्त है,
इतने अभियान चलते हैं
पर नहीं होता यह समाप्त है,
बताओ तुम यह भ्रष्टाचार क्या होता है,
तुमने कभी किसी भ्रष्ट आदमी को देखा है
जिसके खिलाफ नारें लगायें।’’

दूसरे ने कहा-‘भई लगता है
बिना किराया लिये हुए यहां आए हो,
बिना मतलब के अपनी जान फंसाए हो,
भला, भ्रष्टाचार कभी समाप्त हो सकता है,
जिसके पास हो थोड़ी भी ताकत
हरे नोटों की माला पहनने के साथ ही
अपनी तिजोरी भरता है,
यह तो रस्मी जुलूस है,
जो हम अपने नेता के कहने पर करने आये हैं,
अपनी रकम पूरी पाये हैं,
किसी आदमी के खिलाफ नारे लगाकर
उसे क्यों मशहूर बनायें,
वह तुरंत अपनी सफाई देने आयेगा,
मुफ्त में प्रचार पायेगा,
फिर इस हमाम में सब नंगे हैं,
जो नहीं पकड़े गये वही चंगे हैं,
यह बड़े लोगों कराते हैं वह हमें करना है,
वह भरते तिजोरी हमें तो पेट भरना है,
पता कब किससे काम पड़ जाये
इसलिये भ्रष्टाचार के खिलाफ  खूब बोलेंगे
उससे जिनको लाभ है वही मुद्दा तोलेंगे
हम बिना वजह किसी का नाम लेकर
उसे क्यों अपना दुश्मन बनायें।’’
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जब उनसे भ्रष्टाचार पर बोलने के लिये
कहा गया तो वह बोले-
‘‘भ्रष्टाचार वह अमृत है जिसे हर कोई चखता है,
स्वयं पीकर अमर होना चाहता है
हर कोई अपनी सात पीढ़ियां
रखना चाहता है हष्टपुष्ट
पर दूसरे पर वक्र दृष्टि रखता है,
जो पीयें उनकी सात पुश्तें तरती
जो न पीयें उनके बच्चे जन्म भर पछतायें।
इससे ज्यादा हम नहीं समझे
तुम्हें क्या समझायें।’’
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Saturday, July 10, 2010

बेवफाओं की भीड़-हिन्दी व्यंग्य कविता (bevfaon ki bheed-hindi vyangya kavita)

दूसरों में वफा की तलाश करते हुए
गुजार देते हैं लोग पूरी जिंदगी
फिर निराश हो जाते हैं।
पर कोई भी इंसान
अपने अंदर बैठे गद्दार को
मार नहीं पाया
सभी ज़माने में वफादार ढूंढते हुए
बेवफाओं की भीड़ में खो जाते हैं।
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एक तरफ दौलत, शौहरत और ताकत के
सिंहासन पर आका खड़े हैं
दूसरी तरफ चमचे उनकी दरबार में जड़े हैं।
बाकी इंसान तो भेड़ों की तरह चल रहे
जिनके सपने अपनी औकात से बड़े हैं।
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Tuesday, December 29, 2009

धोखे की कहानी-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (dhokhe ki kahani-hindi vyangya kavitaen)

यह पेज
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उन्होंने धोखा दिया

इस पर क्यों अब आसू बहाते हो?

अपनों से ही होता है धोखा

दुनियां का यह कायदा क्यों भूल जाते हो।

उनके वादे पर रख दिया

अपना सारा सामान उनके घर,

कोई सबूत नहीं था

उनकी ईमानदारी का

यकीन किया तुमने उन पर मगर,

अपने बेबुनियाद विश्वास को छिपाकर

उनके धोखे की कहानी

पूरे जमाने को क्यों सुनाते हो।

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उनको महल में पहुंचा दिया

इस विश्वास पर कि

वह हमारी झौंपड़ी सजा देंगे।

यह नहीं सोचा

वह भी इंसान है हमारी तरह

याद्दाश्त उनकी भी कमजोर है

वहां मुद्दत बाद  मिले सुख में

अपने भी भूल जायेंगे दुःख के दिन

हमारे कैसे याद करेंगे।

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Saturday, September 19, 2009

मिस काल-हास्य व्यंग्य कविताएँ (miss call on mobile-hinde hasya kavitaen)

माशुका अब आशिक के लिये
हो गयी है मिस काल।
वह घंटी बजाकर बंद करती है
फिर करता है आशिक उसे काल।
वह भी क्या करे
आशिक ने जीवन भर सुनने के लिये
मोबाइल तो दिया
मगर अब नहीं भरवा कर दे रहा वार्तालाप समय
कोई पुरुष ‘मिस काल’ बनकर
इश्क की चोरी न कर ले
उसको भी लगता है भय
जब भी कहती है
वार्तालाप समय भरवाने को माशुका
मंदी का बहाने से आशिक देता है टाल।
.................................
सच मोबाइल से रिश्ते निभाने में
सभी को सुविधा हो गयी है
पर बेशर्म बन करें जो मिस काल
उनको कोई परवाह नहीं है
पर पानीदार को वापस करना ही पड़ता है काल
चाहे अनचाहे बात करना दुविधा हो गयी है।
..............................
मोबाइल से रिश्ते
अधिक प्रगाढ़ हो गये लगते
क्योंकि चाहे जब बात करो
दूर बैठे अपने, बहुत पास लगते।
जब तक मिस कालों का
जवाब देते रहो सभी को लगता है अच्छा
न करो तो
कंजूस कहकर इज्जत का नाश करते।
............................
एक दोस्त ने कहा
‘यार, देखो में कितना तुम्हें याद करता हूं
दिन में कितनी बार तो मिस काल करता हूं
एक तुम हो कि जवाब नहीं देते।’
दूसरे ने कहा
‘हां, मैं भी तुम्हें बहुत याद करता हूं
जब तुम्हारा मिस काल आता है
तुम्हारे लिये आहें भरता हूं
वार्ता समय नहीं मेरे मोबाइल में
वरना हम दोनों ही बात कर लेते।’

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, September 16, 2009

जो बहते पानी की तरह जिये-हिंदी साहित्य कविता (bahata pani aur samaj-hindi sahityak kaviata)

जब तक प्राचीन स्तंभ खड़े रहेंगे
पहचान बताने के लिये
कोई नहीं जलायेगा नये ज्ञान दिये।
जल चुकी कपास की बाती
फिर नहीं रौशनी फैलायेगी
चाहे जितना भी तेल पिये।

सुगंधित फूलों के कितने भी पेड़
किनारे पर लगा लो
रुका पानी अपने अंदर समाये तालाब
गंदगी से लबालब हो ही जाता है
चलता रहे जो जिंदगी
बदलते ख्यालों के साथ
जिंदगी को वही समझ पाता है
जिंदा रहता है इतिहास उन्हीं समाजों का
जो बहते पानी की तरह जिये।

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Thursday, September 10, 2009

नोट पहले क्यों नहीं दिखाया-हास्य व्यंग्य कविता (rupya aur iman-hasya vyangya kavita)

आम आदमी उस कार्यालय पहुंचा तो
सभी के कानों में मोबाइल का तार लगा पाया।
सुन रहे थे सभी गाने
उसके समझ में कुछ नहीं आया।
वह बोलता रहा कुर्सी पर बैठे अधिकारी से
पर उसे अपनी तरफ नहीं देखता पाया।
आखिर उसने जेब से
पांच सौ का नोट दिखाकर उसे दिखाया।
उसे देखते ही अधिकारी ने कान से तार निकाली
और बोला
‘अरे, भई बताओ कौनसा काम है
यह नोट पहले क्यों नहीं दिखाया।’

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Tuesday, September 8, 2009

ईमान का दीपक-हिंदी कविता (iaman ka deepak-hindi sahityak kavita)

आजकल के जमाने में दुश्मन कम नहीं है.
किसकी सोचें, क्या और साथ गम नहीं हैं.
आसान है धोखा देना,इसलिए सब देते
वफादारी निभाने का सब में दम नहीं है.
गंदे अल्फाज़ बोलना, बन गया है रिवाज़
बोलकर दिखाते सब कि वह बेदम नहीं है.
उसूलों के दिखावे में माहिर हैं सब लोग
पैसा लूटना किसी से, अब सितम नहीं है.
उनको सलाम, रोशन करते ईमान का दीपक
जमाने को दिखाते कि सब जैसे हम नहीं है.
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Tuesday, September 1, 2009

टीवी एंकर और कवि-हिंदी हास्य कविता (tv anchor and hindi poet-hindi hasya kavita)

कवि ने टीवी एंकर से कहा
‘यह मेरे साक्षात्कार का बेकार नाटक रचाया।
तुम सवाल करते हुए
जवाब भी बताकर
उसे दोहराने को मजबूर करती थी,
जब अपनी बात कहता तो
ब्रेक लगाकर दूर कर देती थी,
तुम्हारे सवाल मेरे जवाब से लंबे थे
मैं सवाल समझता तुम
जवाब वैसे ही भर देती थी,
यह कार्यक्रम देखकर लोग तुम्हें ही
याद रखेंगे,
मुझे भूल जायेंगे,
लोग इसे देखकर
मुझ पर हंसने लग जायेंगे
इस कार्यक्रम में तो तुमने
मुझे एक तरह से आइटम कवि बनाया।

यह सुनकर एंकर को गुस्सा आया।
वह बोली
‘काहे के कवि हो
पता है ब्लाग पर तुम्हारी
हास्य कविताऐं फ्लाप हो जाती है
मैंने भी पढ़ी
पर समझ में नहीं आती हैं।
आधी रात को प्रसारित होने वाले
इस कार्यक्रम के लिये
कोई आइटम नहीं मिल रहा था
इसलिये तुमको बड़ा कवि बताया।
यह चैनल कोई तुम्हारा मंच नहीं है
इस पर करोड़ों का खर्च आया।
फिर तुम्हें मालुम नहीं है कि
कमाई से ही होता है सम्मान
मैं अपने कार्यक्रम के लिये
इतना पैसा लेती हूं
तो प्रचार भी मुझे ही मिलेगा
तुम जैसे फोकट के कवि का चेहरा दिखाकर
हमारा नाम कार्यक्रमों की तुलनात्मक दौड़ में गिरेगा
कवि हो इतना भी नहीं जानते
महिलाओं से हिट्स होते हैं कार्यक्रम
तुम जैसे कवियों को लोग फालतू मानते
अब जाकर पी लेना
कैंटीन में काफी
वरना वह भी खत्म हो जायेगी
फिर न कहना पहले नहीं बताया।
तुम्हारे साक्षात्कार से
न तो कोई सनसनी फैलेगी,
न जमेगी हंसी की महफिल,
हमारी पब्लिक इसे कैसे झेलेगी,
पता करूंगी इस चैनल में
कौन उल्लू है
जो तुम्हें यहां ले आया।
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Sunday, April 5, 2009

बादशाह बनने की चाहत-हिंदी शायरी (hindi shayri)

हीरे जवाहरात और रत्नों से सजा सिंहासन
और संगमरमर का महल देखकर
बादशाह बनने की चाहत मन में चली ही आती है।
पर जमीन पर बिछी चटाई के आसन
कोई क्या कम होता है
जिस पर बैठकर चैन की बंसी
बजाई जाती है।

देखने का अपना नजरिया है
चलने का अपना अपना अंदाज
पसीने में नहाकर भी मजे लेते रहते कुछ लोग
वह बैचेनी की कैद में टहलते हैं
जिनको मिला है राज
संतोष सबसे बड़ा धन है
यह बात किसी किसी को समझ में आती है।
लोहे, पत्थर और रंगीन कागज की मुद्रा में
अपने अरमान ढूंढने निकले आदमी को
उसकी ख्वाहिश ही बेचैन बनाती है।

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