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Tuesday, July 26, 2011

शांति संदेश और दर्द-हिन्दी कवितायें shanti sandesh aur dard-hindi kavitaen)

आसमान के उड़ते कबूतरों के झुंड को देखकर
ख्याल आया कि
इन शांति दूतों की हलचल पर
अब क्यों नहीं लोग नज़र डालते,
फिर जमीन पर देखा घूमते हुए
लोगों ने मिट्टी, लोहे और प्लास्टिक के बने
कबूतर सजा दिये हैं अल्मारी में
दूसरों को दिखाने के लिये
शोर मचाते हुए वह
अपने पक्षीपेमी होने का
सबूत देते हैं,
मगर छत पर दाना चुगते हुए
शांति संदेश के संवाहक कबूतरों को देखकर
मौन होकर कोई देखे
वह तभी जान पायेगा शांति की तलाश
बाहर नहीं अंदर होती है।
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रोते, चिल्लाते और धमकाते
थक गये हम
किसी दूसरे का क्या
अपना दर्द भी अब नहीं सताता
नहीं रुला पाते अपने गम।
जिनके हाथ में खंजर है
वह कत्ल किये बिना नहीं रहेंगे,
जिनके पास दौलत है
वह गरीब का भला नहीं सहेंगे,
शौहरत का हिमालय पा लिया जिन्होंने
लोग उन शैतानों को फरिश्ता समझेंगे,
क्या कहें हम बेदर्द जमाने के
अपने ही दर्द पर अपनी आंखें नहीं होती नम।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Friday, March 18, 2011

होली पर क्रिकेट का सच तो मजाक में भी लिखा जा सकता है-हिन्दी व्यंग्य (holi par cricket ka sach aur majak-hindi vyangya)

होली, क्रिकेट और सट्टा
लेखक -दीपक 'भारतदीप'  
इस बार होली का मजा वैसे भी किरकिरा होना ही है क्योंकि विश्वकप क्रिकेट प्रतियोगिता के मैचे खेल जा रहे हैं। होली पर देश का जनजीवन एकदम ठप्प हो जाता है। कुछ लोग रंग खेलने में लग जाते है तो कुछ उनसे बचने के लिये घरों में दुबक जाते हैं। दोपहर एक बजे तक सड़कें सन्नाटे से घिर जाती हैं जिसको होली के अवसर पर निकलने वाले झुंड ही अपने शोर से चीरकर निकल जाते हैं। जिन लोगों को साफ सुथरा जीवन पसंद है उनके लिये यह दिन उदासी का दिन हो जाता है। ऐसे अवसर पर हमारे देश के बहुत सारे लोग अपनो के बीच जुआ खेलते हैं तो आदतन जुआरियों के लिये तो यह दिन स्वर्णिम होता है। कहीं खुले में भी खेलते हैं तो उनके पास इस बात का पारंपरिक लाईसैंस होता है कि वह यह बताने के लिये कि वह तो रस्म निभा रहे हैं।
शराब, जुआ और बेकार की बकवास करने के लिये होली का दिन उपयुक्त मान लिया जाता है। वैसे दिवाली पर भी लोग जुआ की रस्म निभाते हैं। इससे एक बात तो प्रमाणित होती है कि हमारे पवित्र त्यौहारों में प्रमाद और व्यसनों की अनिवार्यता को जो लोग स्वीकार करते हैं वह निहायत अज्ञानी हैं और ऐसे लोगों की कमी नहीं है। मनोरंजन और खुशी के लिये बने दिनों में व्यसन में लिप्त होकर हुआ में लगने की प्रवृत्ति देश के लिये खतरनाक रही है। यही कारण है कि क्रिकेट तो क्रिकेट अब सुनने में आ रहा है कि टीवी चैनलों में प्रतियोगिताओं पर आधारित हास्य, संगीत तथा वाद विवाद कार्यक्रमों में जीत हार पर सट्टे लगता है और वहां विजेता और उपविजेता फिक्स होते हैं । हम यह न समझें कि सट्टा लगाने और लगवाने वाले कोई अदृश्य तत्व हैं बल्कि वह इस देश के ही लोग हैं। खासतौर से आर्थिक उदारीकरण के बाद बने नवधनाढ्य वर्ग के लोग इसमें शामिल हो रहे हैं। समस्या यह है कि उनके साथ मध्यम और निचली आयवर्ग के युवक भी शामिल होते हैं जो कि संकट का कारण बनती है।
एक बात तय है कि विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता के मैचों में सट्टा चल रहा है। अनेक जगह पुलिस ने अनेक लोगों को पकड़ा है। जब यह सट्टे वाले दो सौ करोड़ तक की रकम वाले संगीत कार्यक्रम को फिक्स कर सकते हैं तो वह अरबों की राशि वाले क्रिकेट मैच में अपना हाथ न दिखायें इस पर अब कौन यकीन कर सकता है। खासतौर से जब धनपति और घनपति-यानि काले धंधे वाले लोग-और उनके पालित मनपति-यानि लोगों के मन का हरण करने वाले प्रचार माध्यमों मे लोग-यह स्वयं बता रहे हैं कि पांच देशों के 21 खिलाड़ी तथा खेले गये सात मैचों की जांच विश्व कप क्रिकेट की अंतर्राष्ट्रीय संस्था आई सी आई कर रही है। इन मैचों के फिक्स होने का उसे संदेह है। भारतीय प्रचार माध्यमों ने इसमें विदेशी खिलाड़ियों होने की बात तो कही है पर भारतीय खिलाड़ियों की तरफ कोई संकेत न कर अपनी व्यवसायिक सीमाओं का भी प्रमाण दिया है। भारतीय खिलाड़ियों की गल्तियों पर खूब शोर हो रहा है पर वह उन्होंने अनजाने में की या अनजाने में हो गयीं इसका पता नहीं। न ही यह पता लग रहा है कि वह उनसे करवाई गयी। इस पर विशेषज्ञ खामोश हैं। बात सीधी है कि टीवी पर हर विषयों की तरह क्रिकेट के विशेषज्ञ भी प्रायोजित हैं। इनमें एक तो ऐसा कप्तान भी है जो फिक्सिंग की वजह से सजा भी पा चुका है मगर जोड़तोड़ कर अब टीवी चैनलों में अपना चेहरा विशेषज्ञ की तरह दिखाने लगा है। क्या मान लें कि भारतीय खिलाड़ी वाकई साफ सुथरे हैं? मान लेते हैं क्योंकि धनपतियों, घनपतियों और मनपतियों ने ऐसा वातावरण फिर बना दिया है जिससे लोग विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में देशप्रेम से जुड़ रहे हैं। इसलिये कुछ कहने या सुनने में खतरे हैं।
उस दिन एक आदमी ने दूसरे से क्रिकेट प्रेमी से कहा-‘काहेका क्रिकेट! सब मैच फिक्स हैं।’
दूसरा उग्र हो गया और बोला-‘तू क्या अपने देश को खिलाड़ियों की पाकिस्तानियों से तुलना कर रहा है।’
वह चुप हो गया। पाकिस्तान का भी एक ऐसा खिलाड़ी विशेषज्ञ की भूमिका हमारे देश के टीवी चैनलों में निभा रहा है जिस पर उसके अपने देश के लोग ही फिक्सर होने का आरोप लगाते हैं। यह आईसीआई क्रिकेट में खेल रहे खिलाड़ियों के किसी सट्टेबाज से मिलने पर उससे शक की निगाह से देखती है पर यह विशेषज्ञ की भूमिका में बदनाम लोग घूम रहे हैं उसके बारे में उसकी राय का पता नहीं चलता। इससे एक बात लगती है कि विश्व क्रिकेट पर नियंत्रण करने वाली संस्था यह प्रयास नहीं कर रही कि खेल साफ सुथरा हो बल्कि वह चाहती है कि वह ऐसा दिखे। कम से कम भारतीय खिलाड़ी तो पाक साफ दिखें क्योंकि इसी देश के लोगों का पैसा इस खेल की प्राणवायु हैं जो कि मनोरंजन और खुशी भी जुआ और सट्टे के साथ मनाते हैं।
वैसे जिस तरह मैच चल रहे हैं अनेक लोगों को शक है कि कुछ गड़बड़ है। ऐसे में अगर मान लीजिये होली के दिन कोई भारतीय खिलाड़ियों के सट्टे में शामिल होने के बारे में कोई बात सत्य भी लिख दे तो लोगों को मजाक लगेगा। वैसे इतने सारे अखबार हैं। इंटरनेट पर भी बहुत कुछ लिखा जा रहा है। इसलिये संभव है उस दिन कोई मजाक करते हुए भी सत्य लिख सकता है। हां, होली पर कोई बात सच कहकर उसे मजाक का रूप दिया जा सकता है।
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Saturday, March 5, 2011

पक्का ख्याल-हास्य कविता (pakka khyal-hasya kavita)

कैदखाने के मुखिया ने
अपनी यहां से रिहा हो रहे चोर से कहा-‘‘
कमबख्त,
तू फिर दस हजार की चोरी के
आरोप की छाया में यहां आया,
पिछली बार की रकम पांच हजार की
चोरी में धरा गया था
अब महंगाई का हिसाब देखें
तू उसमें कोई इजाफा नहीं कर पाया।
शर्म आती है तुम्हें अपने यहां आते देखते हैं,
दस पंद्रह हजार तो अमीर ऐसे ही फैंकते हैं,
यह भी क्या बात हुई कि
जहां हम करोड़ों की हेराफेरी वाले अपने यहां रख रहे है,ं
वहीं हजार की चोरी वाले भी हमारा माल चख रहे हैं,
अब तुम लोगों की यहां कद्र नहीं है
क्या सोचकर यहां चले आते हो,
छोटी मोटी चोरी कर पकड़े जाने पर नहीं शर्माते हो,
बाहर भी तुमने इज्जत नहीं कमाई,
यहां भी तुम्हें कौन पूछेगा
तुमसे बड़े लोगों ने आकर कैदखाने की रौनक बढ़ाई,
इससे अच्छा मूंगफली बेचकर अपना काम चलाओ,
यहां आकर अपनी औकात मत घटाओ,
कैदखाना अब बदनाम जगह नहीं रही,
तुमसे बड़े लुटेरों ने अपनी देह से अब इसे सजाया।’

सुनकर चोर बोला-‘
आपके ज्ञान से मेरे अंर्तचक्षु खुल गये हैं,
यहां से छूटकर करूंगा अच्छा काम
लगता है मेरे सारे पुराने पाप धुल गये हैं।
सही कहते हैं कि संत लोग
सत्संग का असर होता है,
वरना आदमी ख्वाब में सोता है,
मेरा सौभाग्य है जो आपने ज्ञान दिया,
चोर होते हुए भी सम्मान किया,
दरअसल अब हमें भी शर्म आती है,
पकड़े जाते हैं चोरी के आरोप में
रंगेहाथ पकड़े गये रिश्वतखोरों के साथ
जब मिलते हैं
अपनी ही करनी छोटी नज़र आती है,
हम तो लाचारी की वजह से चोरी करते हैं,
वह तो पकवान से पेट भरने के बाद भी
अपनी तिजोरी भी भरते हैं,
बड़े बड़े धुरंधरों को आपके यहां देखकर
सोचता हुं कि
बड़े काम मिलने पर भी रिश्तवतखोरी और बेईमानी
पर आदमी उतारू हो जाता है,
दो नंबर की कमाई करते हुए बाजारू हो जाता है
पहले छोटा काम करने में होती हिचक,
अब उसको लेकर खत्म हो गयी झिझक,
यहां आकर भी छोटी चोरी करने का मलाल मन में आया
बड़ा बुरा काम करना अब संभव नहीं
इससे अच्छा ठेला चलाकर जिंदगी गुजारूं
यह पक्का ख्याल मेरे मन में आया।
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Wednesday, September 29, 2010

भक्तों के लिये भोले हैं राम-हिन्दी कविता (bhakton ke liye bhole hain ram-hindi poem)

दिल में नहीं था कहीं
पर जुबान से लेते रहे राम का नाम,
बनाते रहे अपने काम,
बरसती रही उन पर रोज़ माया,
फिर भी चैन नहीं आया,
कुछ लोग मतलब से पास आते हैं,
निकलते ही दूर चले जाते हैं,
राम का नाम बेचने में
उनको आता है मज़ा,
मगर मिलती है उनको भी बैचेनी की सज़ा,
भक्तों के लिये भोले हैं राम,
जरूरत से बनाते जाते काम
पर जो भक्तों को भुलाते हैं,
झूठे दर्द का वास्ता देकर रुलाते हैं,
नाम लेने से भर जाती उनकी भी झोली,
मगर हृदय में नहीं होते राम,
नहीं पाते इसलिये वह कभी आराम।
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Thursday, September 9, 2010

जिंदगी का हिसाब-हिन्दी शायरी (zindgi ka hisab-hindi shayari)

अवसाद के क्षण भी बीत जाते हैं,
जब मन में उठती हैं खुशी की लहरें
तब भी वह पल कहां ठहर पाते हैं,
अफसोस रहता है कि
नहीं संजो कर रख पाये
अपने गुजरे हुए वक्त के सभी दृश्य
अपनी आंखों में
हर पल नये चेहरे और हालत
सामने आते हैं,
छोटी सी यह जिंदगी
याद्दाश्त के आगे बड़ी लगती है
कितनी बार हारे, कितनी बार जीते
इसका पूरा हिसाब कहां रख पाते हैं।
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Saturday, July 3, 2010

दौलतमंद को सलाम-हिन्दी हास्य कविता (daulatmand ko salam- hasya kavita

भ्रष्टाचार एक भूत है
जो कभी नहीं मिटता,
क्योंकि कभी नहीं दिखता।
जिसकी जेब में जाता पैसा
वह हक की तरह रखता,
जिसकी जेब से जाता
वह भी कहीं अपना दांव तकता,
ज़माने ने बंद कर ली आंख
हर दौलतमंद को सबका सलाम मिलता यहां
भरे बाज़ार में ईमान कौड़ी के भाव बिकता।
जब नहीं लगा मोल
तभी तक हर कोई उसूलों पर टिकता।
चला जो अमीर बनने की राह पर
इंसानियत का हिसाब भी पैसों में लिखता।
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Sunday, March 14, 2010

वह सिकंदर कहलायेगा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (vah sikandar kahlayega-hindi satire poem)

खतरा है जिनसे जमाने को
उनके घर सुरक्षा के पहरे लगे हैं,
लोगों के दिन का चैन
और रात की नींद हराम हो जाती जिनके नाम से
उनके घर के दरवाजे पर पहरेदार, चैबीस घंटे सजे हैं।
कसूरवारों को सजा देने की मांग कौन करेगा
लोग बेकसूर ही सजा होने से डरने लगे हैं।
-----------
बाजार में जो महंगे भाव बिक जायेगा,
वही जमाने में नायक कहलायेगा।
जब तक खुल न जाये राज
कसूरवार कोई नहीं कहलाता,
छिपायेगा जो अपनी गल्तियां
वही सूरमा कहलायेगा।
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इंसान कितना भी काला हो चेहरा
पर उस पर मेअकप की चमक हो,
चरित्र पर कितनी भी कालिख हो
पर उसके साथ दौलत की महक हो,
वह शौहरत के पहाड़ पर चढ़ जायेगा।
बाजार में बिकता हो बुत की तरह जो इंसान
लाचार हो अपनी आजाद सोच से भले
पर वह सिकंदर कहलायेगा।

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Thursday, February 18, 2010

शब्द और अनुभूति-हिन्दी कविता (shabd aur anubhuti-hindi poem)

कब तक तस्वीरों को देखकर
अपना दिल बहलायें,
चेहरों की आखों से पढ़कर
शब्द अपनी समझ से तय कर
दिमाग में सजायें।
इससे तो अच्छा है कि किताबों में
शब्द पढ़कर तस्वीरों के अहसास पायें।
तस्वीरें कितना बोलेंगी,
आंखें कैसे शब्दों को तोलेंगी,
चेहरे स्तब्ध करते हैं
आंखों में आश्चर्य भरते हैं,
दिल की गहराई तक तो
शब्द ही अनभूति पहुंचायें।
इसलिये फुरसत में अपने आगे
किताबों की ही सजायें।

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Saturday, January 30, 2010

मत बहको ऊंचे ठाठ देखकर-हिन्दी शायरी (amiron ke thath dekhakr-hindi comic poem)

दौलत की रौशनी से अमीर, अपनी महफिलें सजाते हैं,

गरीबों के दिल में लगे आग, इसलिये  चिराग जलाते हैं।

मत बहको ऊंचे उनके ठाठ देखकर, हमेशा धोखा खाओगे,

बेचने वाली शयों के, सौदागर ही पहले ग्राहक बन जाते हैं।

दरियादिल दिख रहे है, पर सारा सामान मुफ्त का सजा है

कहीं से चीज का मिला तोहफा, कहीं से पैसा जुटाते हैं।

घी से भरा उनका घर, मिलावटी तेल के कनस्तर बेचकर

मौत के मुख में भेजने पहले, जिंदगी का रास्ता बताते हैं।

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Friday, July 24, 2009

आयु के साथ तय होता है मनोरंजन का स्वरूप-आलेख (age fector and enternment-hindi article)

वह कौनसी संस्कृति और संस्कार है जिसके नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया है जिसे बचाने के लिये इतने सारे बुद्धिजीवी लगे हुए हैं। सविता भाभी नाम की वेबसाईट और सच का सामना नाम का एक धारावाहिक इतने खतरनाक नहीं हो सकते कि वह भारतीय संस्कृति को नष्ट कर दें। भारतीयों की ताकत उनका ध्यान है जो वह अध्यात्मिक ज्ञान से अर्जित करते हैं। भारत के प्राचीन ग्रंथों में कहीं इसकी चर्चा नहीं है कि जुआ, अश्लीलता या यौन विषयों पर प्रतिबंध लगाया जाये।
हमारे प्राचीन ग्रंथ आत्मनियंत्रण का संदेश देते हैं पर यह अपेक्षा नहीं करते कि राज्य इसके लिये कार्यवाही करे। इन्हीं ग्रंथों में योग साधन, प्राणायम, ध्यान और मंत्रों की विधियां बतायी गयी हैं जिनसे शरीर और मन पर नियंत्रण रखा जा सकता है। इस देश के अधिकतर लोग आत्मनिंयत्रण के द्वारा ही जीवन व्यतीत करते हैं और इसी कारण ही भारतीय समाज विश्व का सबसे योग्य समाज भी माना जाता है। तीन प्रकार की प्रवृत्तियों के लोग-सात्विक, राजस और तामस-इस धरती पर हमेशा रहेंगे यह बात बिल्कुल स्पष्ट है। आचार विचार, रहन सहन, और खान पान के आधार आदमी की प्रवृत्तियां निर्धारित करती हैं और वह इन्हीं से पहचाना भी जाता है।
आदमी के अपराधों से निपटने का काम राज्य का है और सामान्य आदमी को स्वयं पर ही नियंत्रण रखना चाहिये। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है या कह रहा है इससे अधिक आदमी अगर स्वयं पर ध्यान दे तो अच्छा है-यह हमारे ग्रंथों का स्पष्ट मत है।

समाज को संभालने का काम गुरु करें यह भी स्पष्ट मत है। फिर फिल्मों, धारावाहिकों, किताबों और वेबसाईटों का प्रभाव हमेशा क्षणिक रहता है उनमें इतनी ताकत नहीं है कि वह पूरा समाज बिगाड़ सकें-कम से कम भारतीय समाज इतना कमजोर नहीं है। यह समाज जीवन के सत्य और रहस्यों को जानता है जो समय समय पर महापुरुष इसे बता गये हैं। इसके बावजूद इस समाज को कमजोर मानने वाले भ्रम में हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह भ्रम उस बौद्धिक समाज को है जो शरीरिक श्रम से परे है। शारीरिक से परे आदमी को भय, आशांकायें और संदेह हमेशा घेरे रहते हैं। यही चंद लोग ऐसी फिल्मों, वेबसाईटों,धारवाहिकों और साहित्य से चिपका रहता है जो आदमी के मन में पहले सुख और बाद में संताप पैदा करता है। जो श्रम करने वाले लोग हैं ऐसा वैसा सब देखकर भूल जाते हैं पर बुद्धिजीवियों के चिंतन की सुई वहीं अटकी रहती है-यह तय करने में कि समाज इससे बिगड़ेगा कि बनेगा!
खासतौर से जिनकी उम्र बढ़ी हो गयी है या फिर जिनको समाज सुधारने का ठेका मिल गया है वह ऐसे सभी स्तोत्रों पर पर प्रतिबंध की मांग करते हैं जिनसे युवा मन विचलित होने की आशंका रहती है।

यह समस्या तो पूरे समाज में है। हर बुढ़े को आजकल के युवा असंयमित दिखते हैं तो हर बुढ़िया को युवती अहंकारी नजर आती है। बुढ़ापे में आदमी का अहंकार अधिक बढ़ जाता है और वह पुजना चाहता है। हम बरसों से सुन रहे हैं कि ‘जमाना बिगड़ गया है।’ हम छोटे थे तो समझते थे कि ‘वास्तव में जमाना बिगड़ गया होगा। अब देखते हैं तो सोचते हैं कि जमाना ठीक कब था। कहते हैं कि घोर कलियुग है पर बताईये सतयुग कब था? रावण त्रेतायुग में हुआ और कंस द्वापर में हुआ। अगर वह युग ठीक था तो फिर उनमें ऐसे दुराचारी कहां से आ गये? कुछ लोग कहते हैं कि उस समय आम आदमी में धर्म की भावना अधिक थी। अब क्या कम है? आम आदमी तो आज भी भला है-उसकी चर्चा अधिक नहीं होती यह अलग बात है। फिर आजकल के प्रचार माध्यम सनसनी फैलाने के लिये खलपात्रों में ही अच्छाई ढूंढते नजर आते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बुढ़ापे में जमाना सभी को भ्रष्ट नजर आता है।
जहां तक यौन और अश्लील साहित्य का सवाल है तो वह चालीस सालों से हम बिकते देख रहे हैं। वह बिकता भी खूब था। अनेक लोग पढ़ते थे पर फिर भी चालीस सालों में ऐसा नहीं लगता कि उससे जमाना बिगड़ गया। उम्र के हिसाब से आदमी चलता है। अनेक युवाओं ने ऐसा साहित्य पढ़ा पर अब उनमें से कई ऐसे भी हैं जो मंदिरों में दर्शन करने के लिये जाते हैं। युवा मन हिलोंरे मारता है। वह ऐसा देखना चाहता है जो नया हो। उस समय हर कोई हर युवा अपने हमउम्र विपरीत लैंगिक संपर्क बढ़ाना चाहता है। युवावस्था में विवाह होने पर जीवन साथी के प्रति दैहिक आकर्षण चरम पर पहुंच जाता है। समय के साथ वह कम होता जाता है पर प्रेम यथावत रहता है क्योंकि मन में तब एक स्वाभाविक प्रेम की ग्रंथि है जो एक दूसरे को बांधे रहती है। यह व्यक्तिगत संपर्क कभी समाज के लिये देखने की चीज नहीं होता बल्कि सभी लोग अपनी बात ढंके रहते हैं पर दूसरे के घर में झांकने की उनके अंदर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो हर मनुष्य मनोरंजन पैदा करती है।
आदमी में मन है तो उसे मनोरंजन की आवश्यकता होती है। मनोरंजन का स्वरूप आयु के अनुसार तय होता है। युवावस्था में यौन विषय नवीनतम और आकर्षक लगता है तो अधेड़ावस्था में दौलत और शौहरत का नशा चढ़ जाता है। बुढ़ापे में जब शरीर के अंग शिथिल होते हैं तब सम्मान पाने का लोभ आदमी में पैदा होता है। ऐसे में आदमी दूसरे की निंदा और आत्मप्रवंचना कर अपने आपको दिलासा देता है कि वह अपना सम्मान बढ़ा रहा है। ऐसे मेें युवाओं के मनोरंजन के साधन उनको भारी तकलीफ देते हैं भले ही अपनी युवावस्था में वह भी उनमें लिप्त रहे हों।

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कोई व्यक्ति या समूह किसी दूसरे को हानि नहीं पहुंचा रहा है तो उसे अपनी आयु के अनुसार मनोरंजन प्राप्त करने का अधिकार है। यह समाज की एक सहज प्रक्रिया होना चाहिये। युवाओं के मन को किस प्रकार का मनोरंजन चाहिये यह तय करने का अधिकार उनको है न कि अधेड़ और बूूढ़े इसका निर्धारण करें। यहां यह भी याद रखने लायक बात है कि बड़ी आयु के लोग ही छोटी आयु के लोगों में संस्कार भरने का प्रयास करते हैं। इसलिये गुरु भी कहलाते हैं। यह उनकी जिम्मेदारी है कि वह उनकी मन के पर्वत को मजबूत बनायें जिससे निकलने वाली मनोरंजन की नदी विषाक्त न हो भले ही वह यौन साहित्य वाले शहर से निकलती हो। इसकी बजाय उनको जबरन रोकने की चाहत एक मजाक ही है। सच तो यह है कि कभी कभी तो यह लगता है कि कुछ उत्पाद इसलिये ही लोकप्रिय हो जाते हैं कि उनका विरोध अधिक होता है। यह विरोध प्रायोजित लगता है। वेबसाईट पर प्रतिबंध और धारावाहिक के विरोध के बाद उनकी सार्वजनिक चर्चा अधिक होना इस बात का संदेह भी पैदा करती है। इस तरह के विरोध युवाओं की तरफ से नहीं होते जो इस बात का प्रमाण है कि वह उनके लिये मनोरंजन का साधन हैं पर वह इससे विचलित हो जायेंगे यह भी नहीं सोचना चाहिये। चलते रहना इस दुनियां का नियम है।
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Sunday, May 24, 2009

ब्लाग जब्त होना चिंता की बात नहीं-आलेख

दूसरे का मामला हो तो दिलचस्प हो जाता है पर जब स्वयं उससे जुड़े हों तो चिंताजनक लगता है। यही इस लेखक के साथ भी हुआ जब गुगल ने दो ब्लाग अमृत संदेश पत्रिका और सिंधु पत्रिका को डेशबोर्ड से हटा दिया। दो ब्लाग हटा दिये या किसी तकनीकी गड़बड़े मे फंस गये यह एक अलग विषय था। चिंता थी तो इस बात की ब्लाग स्पाट के अन्य ब्लाग भी कभी इस तरह के संकट में फंस सकते हैं। ब्लाग स्पाट के ब्लाग दिखने में आकर्षक हैं पर उनमें ऐसा कुछ नहीं है जिसकी चिंता की जाये। गूगल भी एक बहुत बहुत बड़ा संगठन है पर उसके सहारे ही अंतर्जाल पर लेखन यात्रा चलेगी यह जरूरी नहीं है, मगर उसके दो ब्लाग पर ढाई सौ पाठ हों और वह उसे जब्त कर ले तो उसे बर्दाश्त भी तो नहीं किया जा सकता।

अगर गूगल कोई आदमी होता तो हम उससे कहने कि‘यार, किसी बात पर नाराज है तो अपने ब्लाग ले जा हमारे पाठ तो फैंक जा! हमने वह कितनी मेहनत से लिखें हैं। हम उनको जाकर वर्डप्रेस की अलमारी में सजायेंगे।’

मगर अंतर्जाल पर आदमी सारा खेल कीबोर्ड पर ही करता है और उससे संपर्क करना कठिन काम है। कहने को गूगल एक संगठन हैं पर काम तो आदमी ही करते हैं। सो किस आदमी ने इस लेखक के दो ब्लाग उड़ा दिये उसकी तलाश करना जरूरी था पर वह एक ही था यह कहना भी कठिन है।
कल अपना पाठ लिखते हुए लेखक ने इस बात की सावधानी बरती थी कि कोई आक्षेप किसी पर न लगायें क्योंकि इन दो ब्लाग को लेकर ही हमें कुछ संदेह थे और लग रहा था कि कोई ऐसा कारण जरूर है कि यह फंसने ही थे। यह फंसे हमारी लापरवाही और सुस्ती से।
इसे भाग्य भी कह सकते हैं कि कोई अदृश्य शक्ति है जो काम करती है वरना इस लेखक के सारे ब्लाग गूगल के कैदखाने में होते-यह कहना कठिन है कि वर्डप्रेस के ब्लाग वह पकड़ पाता की नहीं। शिकायत तो इस बात की है कि उसने ऐसा करने में डेढ़ साल क्यों लिया? उसने वह वेबसाईट एक वर्ष पूर्व अपने सर्च इंजिन से कैसे निकलने दी जिसे आज वह खराब बता रहा है।

शायद दिसंबर 2007 की बात होगी। लेखक इस ब प्रयास में था कि ब्लाग स्पाट पर आने वाले पाठकों की संख्या कैसे पता लगे। हिंदी के एक ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरम से बाहर के पाठकों की संख्या का अनुमान नहीं हो पाता था। उस पर एक आलेख लिखा गया। आलेख के प्रकाशन के एक माह बाद एक मासूम ब्लाग लेखक ने अपनी टिप्पणी में एक वेबसाईट का पता दिया जिसका नाम था‘गुड कांउटर’। उस ब्लाग लेखक के लिये मासूम शब्द मजाक में नहीं लिखा। वह अतिसक्रिय ब्लाग लेखक है और गाहे बगाहे किसी निराश और परेशान ब्लाग लेखक का मार्गदर्शन करने पहुंच ही जाता है। कभी कभी गंभीर पाठ पर ऐसे सवाल भी उठा देता है जिसका जवाब देते नहीं बनता या देने के लिये एक अन्य पाठ लिखने का मन नहीं करता।
उसकी टिप्पणी से ही उस वेबसाईट का पता लिया और उस समय अपने ब्लाग स्पाट के सभी आठ ब्लाग पर गुड कांउटर लगा दिया। उसकी सूचनायें लुभावनी लगी और उससे यह पता लगता था कि किस शहर से कब ब्लाग देखा गया। उसके आकर्षण की वजह से उसे वर्डप्रेस पर भी लगाया। लगभग उसी समय किसी अन्य ब्लाग लेखक ने स्टेट काउंटर का पता अपने पाठ पर लगाया और चिट्ठकारों की चर्चा में भी उसका नाम आया। इस लेखक ने उसे भी अपने एक दो ब्लाग पर लगाया। कोई गड़बड़ी नहीं थी पर गुड कांउटर के पीछे दूसरा सच भी था जो बाद में दिखाई दिया। अगर कोई पाठक वहां क्लिक करे तो उसे घोड़ों की रेस पर दांव लगाने का अवसर मिल सकता था। यह देखकर ं थोड़ी परेशानी हुई। यह जुआ देखना पसंद नहीं था। पाठकों की जानकारी की वजह से उसे लगाया था पर फिर उसे हटा दिया क्योंकि उसकी जगह स्टेट कांउटर भी अच्छा काम रहा था। उसमें कोई गड़बड़झाला नहीं था। फिर एक एक कर गुड कांउटर सभी जगह से हटा दिया मगर जो ब्लाग जब्त हुए हैं वह इतने सक्रिय नहीं थे इसलिये वहां से हटाने की तरफ ध्यान नहीं गया।
बाद में उन ब्लाग का पता बदलकर उसे सक्रिय किया। पाठक संख्या कोई अधिक नहीं थी इसलिये कोई चिंता वाली बात नहीं थी। एक दो बार गुड काउंटर पर नजर गयी पर यह सोचकर कि अभी हटाते हैं पर नहीं हटाया। वैसे भी चूंकि उनका पता बदला गया था इसलिये वह निष्क्रिय लगता था।
मुख्यधारा में लाने से पूर्व भी ब्लाग पर कोई पाठक नहीं आता था यह बात स्टेट कांउटर से पता लगती थी। गुड कांउटर से तो कभी देखने का प्रयास भी नहीं किया। जब्त होने के तीन चार दिन पहले वहां चार पांच ऐसे पाठकों की आवक देखी गयी जो ब्लाग के पते से उसे खोलते थे। हो सकता है कोई एक पाठक रहा हो। बहरहाल कोई अधिक आवक नहीं थी। सिंधु पत्रिका पर अंतिम दिन नौ पाठ पढ़े गये और उसमें कोई भी उसका पता लगाकर ढूंढता हुआ नहीं आया।
हिंदी के पाठक तो वैसे भी कम हैं और ब्लाग स्पाट पर तो और भी कम है। वैसे इन ब्लाग पर पिछले तीन दिनों में अमेरिका से पाठक संख्या अधिक थी और शक यही है कि उस वेबसाईट को वहीं के कुछ लोग देख रहे होंगे। अंतर्जाल पर एक समस्या यह है कि आप अगर किसी वेबसाईट को लिंक करते हैं और अगर उसे कहीं सर्च किया जाये तो आपका ब्लाग भी वहां चला जायेगा। ऐसा लगता है कि गुड कांउटर को ढूंढ रहे किसी एक या दो आदमी को इस लेखक के एक या दोनों ही ब्लाग हाथ लग गये होंगे। उन्होंने सोचा होगा कि हमें इससे क्या मतलब कि ब्लाग किस भाषा में है मतलब तो गुड कांउटर से घुडदौड़ के समाचार देखने से है-यह कहना कठिन है कि उस पर आन लाईन सट्टा भी हो सकता था या नहीं क्योंकि उसे खोलकर देखे ही लेखक को करीब सवा साल हो गया है बहरहाल उस काउंटर से दोनों ब्लाग पर कोई ऐसी सक्रियता नहीं देखी गयी पर उसका लिंक होना उनके लिये परेशानी का सबब बना। ऐसा लगता है कि हाल ही में उस गुड कांउटर वाली साईट को प्रतिबंधित घोषित किया गया होगा क्योंकि इससे पहले डेढ़ वर्ष तक गूगल का आटोमैटिक सिस्टम उसे नहीं पकड़ रहा था।
उस मासूम ब्लाग लेखक के नाम का जिक्र हमने इसलिये नहीं किया क्योंकि वह भी तो हमारी तरह ही है जिसे बहुत सारी बातें बाद में पता चली होंगी। हो सकता है कि वह स्वयं भी भूल गया हों उसने अतिउत्साह में उस गुड कांउटर का पता बताया और हमने भी लगभग उसी मासूमियत से लगाया। अब समस्या आ रही है उन दोनों ब्लाग को वापस लाने की। गूगल के वेबमास्टर टूल पर अपना प्रयास किया है और तकनीकी ज्ञान की कमी के चलते यह कहना कठिन है कि हम अभी सफल हुए हैं या नहीं। यह तय बात है कि पहले उसे ब्लाग की सैटिंग मेें जाकर तृतीय पक्ष की क्षमता वाली जगह पर जाकर वहां से गुड कांउटर हटाना पड़ेगा। अब गूगल से वह कब वापस मिलेगा। हम अपनी प्रविष्टी सही जगह पर कर रहे हैं या नहीं इसका दावा करना कठिन है। वह दिन हमें आज भी याद है कि इन दोनों में किसी एक ब्लाग पर महीना भर पहले उस अनावश्यक और निष्क्रिय काउंटर का हटाने के लिये हमने माउस उठाया था कि लाईट चली गयी। उस समय पता नहीं था कि वह साथ में ब्लाग भी ले जाने वाली है। वह हटाते तो भी दूसरे ब्लाग को तो जाना ही था क्योंकि हमें तो पता ही नहीं था कि वह दो पर है।
बस एक बात का संतोष है कि किसी अन्य ब्लाग को कोई खतरा नहीं है जिसकी आंशका बनी हुई थी। इस लेखक की चिंता सबसे अधिक ‘शब्द लेख सारथी' की होती है जो पाठकों में ब्लाग स्पाट का सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला ब्लाग है। सबसे बड़ी बात यह कि गूगल की विश्वसनीयता को लेकर कोई सवाल उठाना ठीक नहीं है। वैसे यह प्रतिबंध साईट द्वारा प्रदत्त सामग्री से अधिक गूगल के साथ उसकी कोई व्यापारिक संधि न होने के कारण लगा-ऐसा लगता है। जहां तक अश्लील और आन लाईन सट्टेबाजी की साईटों का सवाल है तो कौन गूगल भी पीछे है। पर इससे हमें क्या? हमारे सात्विक लिखने और पढ़ने में बाधा नहीं आना चाहिए। गूगल ने अगर गुड काउंटर को गलत समझा तो ठीक है हम भी उससे सहमत हैं। बस अफसोस इस बात है कि डेढ़ साल पहले उसने ऐसा क्यों नहीं किया। दूसरा जिन अन्य ब्लाग लेखकों के ब्लाग जब्त हुए हैं वह भी याद करें कि कहीं उन्होंने इस तरह की साईटें तो नहीं लगायी थी। हिंदी ब्लाग जगत के लेखक होने के नाते पश्चिमी तौर तरीकों और दाव पैंचों को अधिक नहीं जानते इसलिये इस तरह के धोखे में फंस जाना कोई बड़ी बात नहीं है। बहरहाल जो ब्लाग मित्र या पाठक हैं उन्हें चिंतित होने की बात नहीं है। प्रयास करने पर दोनों ब्लाग वापस मिलते हैं तो ठीक वरना कोई बात नहीं। अन्य ब्लाग कोई खतरा नहीं है इससे संतुष्ट होना ठीक है।
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Wednesday, April 1, 2009

अप्रैल फूल की बधाई-लघु हास्य व्यंग्य

आज अप्रैल फूल दिवस है। यह भी पश्चिम से आयातित एक विचार है कि अप्रैल के पहले दिन एक दूसरे को मूर्ख बनाया जाये-इसी कारण लोग एक दूसरे का मजाक उड़ाते हैं। वैलंेटाइन डे, फ्रैंड्स डे, प्रेम दिवस और न जाने कौन कौन से दिवस यहां भारत में मनाये जाते हैं। कुछ दिवस तो इतने गंभीर होते हैं कि लोग उस दिन गहरे चिंतन और चिंतायें व्यक्त करते हैं। नारी,पुरुष,बालक,वृद्ध और न जाने कौनसे वर्गों के लिये अनेक प्रस्ताव और विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। मगर व्यंग्यकारों की आदत होती है हर विषय में अपने व्यंग्य प्रस्तुत करना। इसलिये हम भी बेतुकी हास्य कवितायें या व्यंग्य लिख देते हैं भले ही उनमें गंभीरता का भाव दिखाने के लिये डाल देते हैं ताकि लोगों को यह न लगे कि यह हर विषय को मजाक समझता है।
अन्य दिवसों की तरह अप्रैल फूल दिवस भी हमें नहीं जमता पर इसमें कहीं न कहीं मजाक का पुट लगता है इसलिये सोचा कि इस पर कुछ लिखा जाये। क्या लिखा जाये? तब हमने सोचा कि बाकी सभी लोग अन्य दिवस पर एक दूसरे को बधाई देते हैं-जैसे मित्रता दिवस, शुभेच्छू दिवस, प्रेम दिवस आदि-और हम मजाक बनाते हैं। आज मजाक का दिन है इसलिये थोड़ा गंभीर हो जायें। इसलिये सभी सहृदय मित्रों पाठकों और सम्मानीय लोगों को अप्रैल फूल की बधाई! वह इसी तरह पूरे साल हंसते रहे जैसे कि आज हंस रहे हैं। पूरे साल उनको ऐसे आइडिया मिलते रहे हैं कि उनके दिलो दिमाग में प्रसन्नता का भाव रहे।
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Sunday, February 1, 2009

इस खबर से सनसनी नहीं फैलेगी-हास्य व्यंग्य

अपने बास के आदेश पर टीवी कैमरामैन और संवाददाता कि सनसनीखेज खबर को ढूंढने लगे। वह अपनी कार में बैठे सड़कों पर इधर उधर घूम रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि एक आदमी पैदल चलते हुए सड़क पर बने एक गड़ढे में गिर गया। संवाददाता ने कार चालक को कार रोकने का इशारा किया और कैमरामैन से कहा-‘‘जल्दी उतरो। वह आदमी गड़ढे में गिर गया है।’’
कैमरामैने ने कहा-‘अरे सर! आप भूल रहे हो कि हमारा काम खबरें देना हैं न कि लोगों की मदद करना। कम से कम किसी गिरे को उठाने का काम तो हमारा बिल्कुल नहीं है।’
संवाददाता ने कहा-‘अरे, बीच सड़क पर गड्ढा बन गया है। उसमें आदमी गिर गया है। इस खबर से सनसनी फैल सकती है और नहीं फैलेगी तो गड्ढे की बदौलत हम उसे बना लेंगे। आदमी की मदद के लिये थोड़ी ही हम लोग चल रहे हैं।’
दोनों उतर पड़े। मगर तब तक वह आदमी वहां से उठ खड़ा हुआ और अपनी राह चलने लगा। संवाददाता उसके पास पहुंच गया और बोला-‘अरे, आप भी कमाल करते हैं। सड़क पर बने गड्ढे में गिर पड़े और बिना हल्ला मचाये चले जा रहे हैं। जरा रुकिये!’
उस आदमी ने कहा-‘भाई साहब, मुझे जल्दी जाना है। उधार वाले पीछे पड़े रहते हैं। अच्छा हुआ जल्दी उठ गया वरना अधिक देर लगाता तो हो सकता है कि यहां से कोई लेनदार गुजरता तो तकादा करने लग जाता।’
संवाददाता ने कहा-‘उसकी चिंता आप मत करिये। हम समाचार दिखाने वाले लोग हैं। किसी की हिम्मत नहीं है कि कोई हमारे कैमरे के सामने आपसे कर्जा मांग सके। आप वैसे ही इस गड्ढे में दोबारा गिर कर दिखाईये तो हम आपका फोटो टीवी पर दिखायेंगे। इससे गड्ढे के साथ आपका भी प्रचार होगा। आप देखना कल ही यह गड्ढा भर जायेगा।’
उस आदमी ने कहा-‘तो आप गड्ढे का ही फोटो खीच लीजिये न! कल अगर मेरा चेहरा लेनदारों को दिख गया तो उनको पता चलेगा कि मैं इसी शहर में हूं। अभी तो वह घर पर जाते हैं तो परिवार के सदस्य कह देते हैं कि बाहर गया है।’
संवाददाता ने कहा-‘कल तुम यहां की प्रसिद्ध हस्ती हो जाओगे किसी की हिम्मत नहीं है कि तुमसे कर्जा मांग सके। हो सकता है कि इतने प्रसिद्ध हो जाओ कि फिल्मों मेंं तुम्हें गड़ढे में गिरने वाले दृश्यों के लिये स्थाई अभिनेता मान लिया जाये।’
वह आदमी प्रसन्न हो गया। उसने गड्ढे में गिरने का अभिनय किया और इससे उसकी हथेली पहले से अधिक घिसट गयी और खरौंच के निशान बन गये। संवाददाता ने कैमरामैन को इशारा किया। इससे पहले वह फोटो खींचता कि संवाददाता का मोबाइल बज गया। उसने मोबाइल पर बात की और उसे तत्काल जेब में रखते हुए कैमरामैन से बोला-‘इसे छोड़ो। उधर एक सनसनीखेज खबर मिल गयी है। सर्वशक्तिमान की दरबार के बाहर एक चूहा मरा पाया गया है। अभी तक वहां कोई भी दृश्य समाचार टीम नहीं पहुंची है। इस खबर से सनसनी फैल सकती है।’

कैमरामैन ने- जो कि फोटो खींचने की तैयारी कर रहा था- संवाददाता के आदेश पर अपना कैमरा बंद कर दिया। संवाददाता और कैमरामैन दोनों वहां से चल दिये। पीछे से उस आदमी ने कहा-‘अरे, मरे चूहे से क्या सनसनी फैलेगी। तुम इस गड्ढे को देखो और फिर मेरी तरफ? मेरा हाथ छिल गया है? कितनी चोट लगी है।’
संवाददाता ने कहा-‘यह गड्ढा सड़क के एकदम किनारे है और तुम इधर उधर यह देखते हुए चल रहे थे कि कोई लेनदार देख तो नहीं रहा और गिर गये। इसलिये इस खबर से सनसनी नहीं फैलेगी। फिर पहले तो तुमको चोट नहीं आयी। टीवी पर दिखने की लालच पर तुम दूसरी बार गिरे। यह पोल भी कोई दृश्य समाचार देने वाला खोल सकता है। अब हमारे पास एक सनसनी खेज खबर आ गयी है इसलिये जोखिम उठाना बेकार है।
वह दोनों चले गये तो वह आदमी फिर उठकर खड़ा हुआ। यह दृश्य उसको रोज अखबार देने वाला हाकर देख रहा था। वह उसके पास आया और बोला-‘साहब, आप भी किसके चक्कर में पड़े गये और खालीपीली हाथ छिलवा बैठे।’
उस आदमी ने कहा-‘तुम अखबार में समाचार भी देते हो न! जाकर यह खबर दे देा कि दृश्य समाचार वालों के चक्कर में मेरी यह हालत हुई है। हो सकता है इससे प्रचार मिल जाये दूसरे दृश्य समाचार वाले मेरे से साक्षात्कार लेने आ जायें।’
हाकर ने कहा-‘साहब! मैं छोटा आदमी हूं। इन दृश्य समाचार वालों से बैर नहीं ले सकता। क्या पता कब अखबार की ऐजेंसी बंद हो जाये और हमें छोटे मोटे काम के लिये इनके यहां नौकरी के लिये जाना पड़े।’
वह आदमी अपने छिले हुए हाथ को देखता हुआ रुंआसे भाव से चला गया।
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Thursday, January 22, 2009

विचार और विषय को निर्बाध गति से बाहर आने दें-आलेख

हर लिखने वाले की रचना में साहित्य ढूंढना ठीक नहीं है। उसी तरह हर साहित्यकार में भाषा शिल्प की संभावना भी नगण्य रहती है। मुख्य बात है कि लिखने वाले दो तरह के होते हैं एक तो वह जो अपने मन और बुद्धि में आते जाते विचारों को अभिव्यक्ति देने के लिये लिखते हैं दूसरे वह जो भाषा और शिल्प की दृष्टि से भाषा में साहित्य में परिवृद्धि के लिये सृजन करते हैं। ऐसे में संभव है कि अभिव्यक्ति के भाव से लिखने वाला शिल्प की दृष्टि से कमजोर होते हुए भी अपनी बात पाठक तक पहुंचाने में सक्षम हो जाये और साहित्यकार को इसमें सफलता न मिले।
किसकी रचना साहित्यक है और किसकी नहीं इस पर हमेशा बहस होती है और भाषा शिल्प की दृष्टि से कमजोर रचनाओं पर उनका उपहास उड़ाया जाता है भले ही उन्होंने पढ़ने वाले पाठकों की संख्या अधिक हो। भाषा और शिल्प से सजी साहित्यक रचनाओं को पंसद करने वाले हमेशा ऐसी रचनाओं का मखौल उड़ाते हैं। ऐसे में अतंर्जाल पर लिखने वालों को शायद संकोच होता है कि कहीं उनका मजाक न उड़ाया जाये। उन्हें अब इस संकोच में से परे हो जाना चाहिये। सच बात तो यह है कि एक दूसरे को अपने से हेय प्रमाणित करने के लिये हिंदी लेखकों में हमेशा संघर्ष चलता रहा है।

भारत में हिंदी निरंतर बढ़ती रही है पर अभी तक बौद्धिक,आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मजबूत लोगों का उस पर नियंत्रण रहा है और इसलिये ऐसे लेखकों को आगे नहीं आने दिया गया जिन्होंने शक्तिशाली लोगों कह चाटुकारिता नहीं की। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अंतर्जाल पर हिंदी के पढ़ने वाले कुछ लोग अभी भी उसी पुरानी मानसिकता के साथ जी रहे हैं। वह लोगों की श्रेणियां बनाने में लगे हैं और उसका कोई तार्किक आधार उनके पास नहीं दिखता और जो वह आधार प्रस्तुत करते हैं उस पर स्वयं ही खड़े हुए नहीं दिखते। कुछ लोग तो ऐसा प्रयास करते हुए दिखते हैं कि अंतर्जाल पर हिंदी भाषा की विकास यात्रा का टिकट उन्होंने कटवाया है और इसलिये उनका निर्णय बहुत महत्वपूर्ण है और वह जो कहते हैं उसी राह पर सब चलें। समाचार पत्र पत्रिकाओं में हिंदी ब्लाग के विषय पर प्रकाशित लेखों को पढ़ने से पता लगता है कि वह ब्लाग लेखकों को पुरानी राह पर चलने का ही संदेश इस आशय से दिया जा रहा जैसे कि लेखों के लेखक अंतर्जाल विद्या में पारंगत हों।

अंतर्जाल पर जो ब्लाग लेखक सक्रिय हैं उनको यह बात समझ लेना चाहिये कि वह जिस तरह अपने ब्लाग पर लिख रहे हैं उसका इस देश में अनेक लोगों को ज्ञान नहीं है। अधिकतर लोग पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने के आदी हैं इसलिये वह यह अपेक्षा कर रहे हैं कि ब्लाग पर भी वैसा ही दिखे। यह संभव नहीं है। सच बात तो यह है अंतर्जाल पर भाषा और शिल्प की बजाय कथ्य और भाव महत्वपूर्ण हैं और जहां किसी ने अपने भावों को रोककर भाषा और शिल्प पर विचार किया वहां वह मूल विषय को ही भूल जायेगा। बहुत कम लेखक-या कहा जाये उंगलियों पर गिनती करने लायक-भाषा और शिल्प की दृष्टि से बेहतर साहित्य लिख सकते हैं और अंतर्जाल पर जिस तरह पढ़ने के लिये सीमित समय और जगह है वहां विषय और विचार का होना महत्वपूर्ण है।

अंतर्जाल पर कुछ मूर्धन्य ब्लाग लेखक बहुत अच्छी साहित्यक रचनायें प्रस्तुत कर रहे हैं वह बधाई के पात्र हैं पर उनको देखकर कोई कुंठा अपने अंदर लाने की आवश्यकता नहीं है। इस हिंदी ब्लाग जगत में ऐसे भी लोग हैं जो भाषा की शिल्प की दृष्टि से बहुत अच्छा नहीं लिखते पर उनके शब्द मन को छू लेने वाले होते हैं तो कई लोगों के विषय भी बहुत दिल्चस्प होते हैं। ऐसे में जो लोग अपने मन की बात यह सोचकर लिखने से कतराते हैं कि उनके उनके मस्तिष्क में बहुत अच्छे विचार और विषय अपना डेरा जमाये बैठें हैं पर भाषा और शिल्प की दृष्टि से प्रस्तुत करने की उनकी कोई योजना नहीं बन पा रही है तो उनको यह संकोच छोड़ देना चाहिये। भाषा के आकर्षक शब्द और शिल्प की दृष्टि से विचार करने का अर्थ यह होगा कि अपनी रचनाओं को तत्काल निर्बाध गति से बाहर आने से रोकना। हां, लिखते हुए सामान्य व्याकरण का ध्यान तो रखा जाना चाहिये और शब्द संयोजन पर भी अपनी पैनी दृष्टि रखें पर उतनी ही जिससे कि अपने विचार और विषय से ध्यान न भटके। जहां तक साहित्य का प्रश्न है तो आज भी यही शिकायत की जाती है कि लोग साहित्य कम बेहूदी और अश्लील रचनायें अधिक पसंद करते हैं। यह एक अलग मुद्दा है पर एक बात का संकेत तो मिलता है कि लोगों की दिलचस्पी केवल विषय और विचार के अभिव्यक्त भाव में है। ऐसे में सात्विक विषयों में ही रस और अलंकार भरे जायें तो बेहतर हैं। अंतर्जाल एक अलग मार्ग है पर बाहर की दुनियां को यह प्रभावित करेगा इसमें संदेह नहीं है। वैसे ही आजकल की व्यस्तम जिंदगी में लोगों के पास कम समय है और अधिकतर ब्लाग लेखक अव्यवसायिक हैं तब व्यवसायिक प्रकाशनों की तरह सजी संवरी साहित्यक रचनायें मिलना संभव नहीं है फिर पढ़ने वाले को भी कितना समय मिल पाता है यह भी एक विचार का विषय है। ऐसे में भी अंतर्जाल पर लिखने वाले जेा ब्लाग लेखक लिख रहे हैं उन्हें अपने मस्तिष्क में सक्रिय और विचार निर्बाध गति से बाहर आने देने का प्रयास करना चाहिये।
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Friday, January 9, 2009

आय और आयु का सवाल-व्यंग्य

उस 21 साल की अभिनेत्री ने एक 24 साल की अभिनेत्री के लिये कह दिया कि ‘वह मेरे जैसी कम उम्र की अभिनेत्रियों के लिये प्रेरणास्त्रोत हैै।’
भला इसमें बवाल मचने जैसे क्या बात है? मगर मचा क्योंकि एक स्+त्री दूसरे के मुकाबले अपने को कम उम्र का बताकर उसके दिल पर घाव दे रही है जो प्रेरणास्त्रोत बताने से भर नहीं जाता। टीवी चैनल वालों ने 24 साल की उस अभिनेत्री को बूढ़ी कहकर प्रचारित करना शुरू किया और फिर उससे प्रतिक्रिया लेने पहुंच गये। कई बार उस अभिनेत्री के लिये बूढ़ी बूढ़ी शब्द सुनकर हमें हैरानी हुई। वजह! इस समय उस बड़ी अभिनेत्री को भारत की सैक्सी अभिनेत्री कहा जाता है-इसका अर्थ हमें स्वयं भी नहीं मालुम- और नयी आयी छोटी अभिनेत्री भी कम प्रसिद्ध नहीं है। पहले दो क्रिकेट सितारों-इस खेल के लिये खिलाड़ी शब्द अब हल्का लगता है-और एक फिल्मी सितारे से उसके रोमांस के चर्चे बहुत हुए हैं। सवाल यह है कि 24 साल और 21 साल की युवती के बीच इस तरह का वार्तालाप वाकई तनाव का कारण हो हो सकता है?
जवाब है हां! कहते है कि आदमी की आय और औरत की आयु पर कभी उससे सवाल नही करना चाहिये। समझदार कहते हैं कि इशारों में एसी बात नहीं करना चाहिये। उससे उनमें गुस्सा उत्पन्न होता है। खैर, उस दिन दो लड़कों के बीच संवाद इस तरह जो दिलचस्प तो था ही साथ ही यह भी जाहिर करता है कि मनुष्य की मानसिकता कुछ ऐसी ही है कि वह कभी कभी किसी दूसरे के बारे में कोई फैसला उसके साथी की उम्र देखकर भी कर लेता है। भले ही वह दूसरा आदमी उमर का छोटा पर जब वह अपने से बड़ी आयु की संगत करता है तो पहला आदमी चाहे तो भी वह अपने मानसिक दृष्टिकोण को बदल नहीं सकता।
पहला लड़का-‘अरे, तेरी मनपसंद हीरोइन की फिल्म आयी है। चलेगा देखने?
दूसरा बोला-‘अरे, यार वह तो अब बूढ़ी लगने लगी है।’
पहला-‘क्या बेवकूफी की बात करता है वह तेरे से केवल पांच साल ही तो बड़ी है। आजकल यह सब चलता है।’
दूसरा बोला-‘नहीं यार, जब तक वह जवान हीरो के साथ उसका अफेयर था तब तब मुझे वह अच्छी लगती थी आजकल वह मेरे पिताजी के बराबर अभिनेता के बराबर से उसके अफेयर की चर्चा है इसलिये मेरा दिमाग बदल गया है।’
पहले वाले को जैसे ज्ञान प्राप्त हो गया और वह बोला-‘यार, बात तो सही कहते हो। मेरे दिमाग में ऐसी ही बात चल रही थी कि आखिर इतनी बड़ी उम्र का हीरो है और वह हीरोइन उसके साथ रोमांस कर रही है।’
कहीं से एक तीसरा लड़का भी आ गया था और बोला-‘उस हीरो को तो अधिक सिगरेट पीने के कारण दिल दौरा भी पड़ चुका है। एक बार मैंने टीवी पर सुना था।’
स्वाभाविक है यह 21 वर्ष की उस हीरोईन के दिमाग के भी बात स्वाभाविक रूप से आती हो क्योंकि 24 वर्ष की बड़ी हीरोईन का जिस हीरो के साथ कथित रूप से रोमांस है वह भी 43 से ऊपर का हो चुका है। ऐसे में उसकी गलती स्वाभाविक लगती है। कई बार टीवी पर होने वाले साक्षात्कारों में उस हीरो चेहरे पर झुर्रियां दिखाई भी दे जाती हैं। वैसे यह प्यार और शादी निजी विषय हैं और इन पर चर्चा करना ठीक नहीं है पर जब आप सार्वजनिक जीवन में और वह भी अपनी देह के सहारे अभिनेता और अभिनेत्रियों हों तो -फिल्मों से कला का कोई लेना देना लगता भी नहीं है-फिर उम्र और चेहरे की चर्चा के साथ दैहिक रिश्तों पर भी आम लोग दृष्टि डालते ही हैं। हीरोइने युवा लोगों के जज्बातों के कारण ही अपना स्थान बनाये हुये हैं पर उनके रोमांस की खबरों जब अधिक आयु वाले हीरो के साथ आती हैं तो लड़कों में भी उनके प्रति आकर्षण कम हो सकता है। वैसे दो तीन लड़कों की बात पर निष्कर्ष निकालना गलत भी लग सकता है।

मर्दों की आय का भी कुछ ऐसा ही मामला है। एक आदमी सरकारी नौकरी में था। उसकी नौकरी में उपरी आय का कोई चक्कर नहीं था। उसके माता पिता ने उसकी शादी होते ही अपना बड़ा मकान बेचकर छोटा मकान इस इरादे लिया कि छोटे बेटे को भी व्यापार करा देंगे। वैसे उसके पिताजी को यह भ्रम था कि बड़ी बहु कहीं मकान पर कब्जा कर हमें बाहर न निकाल दें। बड़े बेटे ने समझाया कि नौकरी कुछ पुरानी होने दो ताकि वेतन बढ़े तो वह भाई के लिये कुछ इंतजाम कर देगा पर वह नहीं माने। बहरहाल नौकरी वाला बेटा किराये के मकान में चला गया। उसकी पत्नी ने उसे ताना भी दिया कि‘देखो तुम्हारे माता पिता ने मेरे माता पिता के साथ धोखा किया।’

बहरहाल माता पिता का छोटा बेटा अपने व्यापार में घाटा उठाता गया तो उन्होंने वह मकान भी बेच दिया और किराये के मकान में आ गये। अब उनके रिश्तेदारी उनसे सवाल करने लगे कि यह क्या हुआ? बड़ा बेटा सामथर््यानुसार उनकी सहायता करता पर छोटे बेटे की नाकामी छिपाने के लिये आपने हाल के लिये वह बड़े बेटे और बहु को जिम्मेदारी बताते। बहु का हाल यह था कि वह अपने सास ससुर के साथ मुश्किल से दो महीने रही होगी पर अब हुआ यह कि वह अपने रिश्तेदारों के पास जाकर बड़े बेटे और बहु का रोना रोते रहते। रिश्तेदार बड़े बेटे को कहते। उसके रिश्तेदार यह समझते थे कि जब वह सरकारी नौकरी मेें है तो उपरी आय भी अच्छी होगी जबकि वह सूखी तनख्वाह में अपना घर चलाता था। रिश्तेदार व्यापारी धनी थे तो उसे कहते कि‘भई तेरी तन्ख्वाह कितनी है। उपरी कमाई तो होगी। अपने मां बाप की मदद किया कर बिचारे परेशान रहते हैं!’

बड़े बेटे को यह अपमानजनक लगता पर वह कर भी क्या सकता था? इधर पिता का देहावसान हुआ। फिर उसने किसी तरह अपने छोटे भाई की शादी भी करवाई पर अपने व्यसनों की वजह से उसकी नयी नवेली पत्नी भी उसको छोड़ गयी। इधर रिश्तेदारों के सवाल जवाब से वह चिढ़ता भी था। आखिर उसने एक दिन आकर एक बुजुर्ग रिश्तेदार को एक पारिवारिक कार्यक्रम में सभी के सामने कह दिया‘ चाचा जी आप में इतनी अक्ल नहीं है कि औरत की आयु और मर्द की आय नहीं पूछना चाहिये। अच्छा बताईये चाचा जी आपकी कुल आय कितनी है और चाची की उमर भी बताईये।’
चाचा के पैरों तले जमीन खिसक गयी। बहुत पैसे वाले थे पर अपनी आय इस तरह सार्वजनिक रूप से बताने का मतलब था कि जमाने भर के लोगों में एक आंकड़ा देना जो चर्चा का विषय बन जाये यानि चारों और डकैतों के यहां अपने घर पर आक्रमण करने का निमंत्रण देना। बड़े बेटे की यह बात सभी ने सुनी तो उसके बाद फिर रिश्तेदारों ने उससे यह सवाल करना बंद कर दिया।

इस तरह विवादों से बचने का सबसे बढि़या उपाय यही है कि किसी मर्द से उसकी आय और औरत से उसकी आयु न तो सीधे पूछना चाहिये न इशारा करना चाहिये। दूसरी बात अपने आप भी सतर्क रहें। कहीं अपनी आर्थिक तंगी और पत्नी की बीमारी की चर्चा न करें वरना इस तरह के सवाल कोई भी पूछ सकता है।
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Monday, December 29, 2008

दिल का इलाज तो शब्द ही कर पाते हैं-हिंदी शायरी

जख्म दिल पर हों या जिस्म पर
इंसान को बहुत सताते हैं।
जिस्म के लिये तो मिल जाती मरहम
दिल का इलाज तो शब्द ही कर पाते हैं।
कुछ जमाने की सुनो,कुछ अपनी कहो
कई दर्द आवाज में खुद ही बह जाते हैं।
अपने ही दर्द पर हंसना आसान नहीं
पर करते हैं जो ऐसा, अपने बयां खूबसूरती से सजाते हैं।
दुनियां में दर्द के सौदागर भी बहुत हैं
फिर हम अपने दिल की बात क्यों छिपाते हैं।
आओ बाजार चलें इससे पहले कोई चोरी कर जाये
लोगों के सामने अपना दर्द खुद ही सजाते हैं।

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Sunday, December 21, 2008

राजदार पाने के लिए क्यों मचलते हैं-हिन्दी शायरी

आदमी के रूप में सौंप तो
आस्तीन में ही पलते हैं
धोखा देते हैं वही लोग
जो कदम दर कदम साथ चलते हैं
अपना राजदार किसी को न बनाना
ज़माने में अपने ही बदनाम करते हैं
जो तुम अपनी बात दिल में नहीं रखते
तो भला कोई और कैसे रखेगा
इसे कान से उस कान में जाते हुए
शब्द भी अर्थ बदलते हैं
जो कोई और न जाने राज हमारा
यह जानते हुए भी
हम कोई राजदार पाने के लिए क्यों मचलते हैं

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Friday, December 12, 2008

नाकाम इंसान की सनद-तीन क्षणिकायें

जीवन में कामयाबी के लिये
शार्टकट(छौटा रास्ता) के लिये
मत भटको यार
भीड़ बहुत है सब जगह
पता नहीं किस रास्ते
फंस जाये अपनी कार
तब सोचते हैं लंबे रास्ते
ही चले होते तो हो जाते पार
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धरती की उम्र से भी छोटी होती हमारी
फिर भी लंबी नजर आती है
जिंदगी में कामयाबी के लिये
छोटा रास्ता ढूंढते हुए
निकल जाती है उमर
पर जिंदगी की गाड़ी वहीं अटकी
नजर आती है
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जिंदगी मे दौलत और शौहरत
पाने के वास्ते
ढूंढते रहे वह छोटे रास्ते
खड़े रहे वहीं का वहीं
नाकाम इंसान की सनद
बढ़ती रही उनके नाम की तरफ
आहिस्ते-आहिस्ते

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Tuesday, December 9, 2008

वह कोई हवा का झोंका था-हिन्दी शायरी

जब वह पास थे तो ऐसा लगता कि
बस हमेशा के लिए साथ हैं
और कभी अलग नहीं होंगे
जब दूर चले गए तो ऐसा लगता है कि
वह कोई हवा का झोंका था तो
जो हमारे पास से गुजर गया
हम उसे गलतफहमी में
अपना समझते होंगे

वादों के तूफानों में कई बार
उन्होने हमें उडाया होगा
अपने लिए सामानों का समंदर
हमसे लेकर जुटाया होगा
हम तो समझते थे दिल का रिश्ता
क्या पता था कि वह दिल के नहीं
हमारी चीजों के कद्रदान होंगे
हमें कितने सपने दिखाते थे
ख़्वाबों के अंबार जुटाते थे
क्या पता था वह हमें
फुर्सत का सामान समझते होंगे
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दिल का दर्द किसे सुनाएँ
कान से सुनते हैं सब
पर दिल के बहरे नजर आयें
जो बोलते हैं जुबान से
पर हमदर्दी के अल्फाज
बोलने की बजाय गूंगे हो जाएं
आंखों से देखते हैं पर
किसी की तकलीफ देखने से
अपने का अंधा बनायें
इससे अच्छा है अपने दर्द
को अकेले में चिल्ला कर
खुद को ही सुनाएं
नहीं तो कोई गीत गुनगुनाएं

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Saturday, December 6, 2008

लगता है जैसे हर आदमी का चरित्र बौना हो-व्यंग्य कविता

वह हमारे दिल से
यूं खेलते रहे जैसे कोई खिलौना हो
हमने पाला था यह भ्रम कि
शायद उनके दिल में हमारे लिये भी कोई कोना हो
मगर कोई उम्मीद नहीं की थी
क्योंकि यह सच भी जानते थे कि
दिखाने के लिये
यहां सभी मोहब्बत करते हैं
अपने मतलब के लिये ही
सब साथ चलते हैं
दिखते हैं कद काठी से कैसे
यह अब सवाल करना है बेकार
पर लगता है जैसे
यहां हर आदमी का चरित्र बौना हो

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