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Saturday, September 2, 2017

कुदरत के कायदे से ज़माने के रंग बदलते-दीपकबापूवाणी (kudrat ke kayde ka rang badalte-DeepakBapuWani)

दिलदार का रूप पर सोच के छोटे होते, सिक्कों जैसे कुछ इंसान भी खोटे होते।
‘दीपकबापू’ सजधज कर सामने आते पर्दे में, मगर खरी नीयत के उनमें टोटे होते।।
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कुदरत के कायदे से ज़माने के रंग बदलते, लोगों का वहम कि स्वयं ढंग बदलते।
‘दीपकबापू’ चले जा रहे जिंदगी में बदहवास, जिंदगी से पहले उनके ख्याल ढलते।।
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उनके हाथ में मदद बटोरते खुले झोले हैं, आंखों मे आर्त भाव तो चेहरे भी भोले हैं।
‘दीपकबापू’ सर्वशक्तिमान के दरबार में बैठे, बाहर बेबस रूप धरे मस्तों के टोले हैं।।
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घरों के दरवाजे खिड़कियां रहते अब बंद, इश्क की बस्ती वाले दिल रह गये अब चंद।
‘दीपकबापू’ अपने दर्द पर चाद डाल देते, हमदर्द ही हौसलों के कदम करते अब मंद।।
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धन के आसक्त भजन करने भी लग जाते, कोई श्रद्धा जगाये कोई कभी ठग जाते।
‘दीपकबापू’ चेतना की संगत में हुए सयाने, वह निद्रा में बजती घंटी तभी जग जाते।।
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शुल्क लेकर वाणी धाराप्रवाह चलती है, धन से ज्ञान की रौशनी बाहर जलती है।
‘दीपकबापू’ सुविधाभोगी बांटें श्रम ज्ञान, क्या जाने पसीने के बूंद आग में पलती है।।
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Friday, August 11, 2017

हृदय में रस से पत्थर भी गुरु हो जाते हैं-दीपकबापूवाणी (Hridya mein ras se PATHAR BHI GURU HO JATE HAIN-DEEPAK BAPUWANI)

हृदय में रस से पत्थर भी
गुरु हो जाते हैं।
दर्द के मारे रसहीन
जहां कोई मिले
रोना शुरु हो जाते हैं।
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गरीबों के उद्धार के लिये
जो जंग लड़ते हैं।
उनके ही कदम
महलों में पड़ते हैं।
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दिल की बात किससे कहें
सभी दर्द से भाग रहे हैं।
किसके दिल की सुने
सभी दर्द दाग रहे हैं।
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ईमानदारी से जो जीते
गुमनामी उनको घेरे हैं।
चालाकी पर सवार
चारों तरफ मशहूरी फेरे है।
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जहां शब्दों का शोर हो
वह शायर नहीं पहचाने जाते।
जहां जंग हो हक की
वहा कायर नहीं पहचाने जाते।
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समय का खेल 
कभी लोग ढूंढते
कभी दूर रहने के बहाने बनाते।
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राजपथों की दोस्ती
वहम निकलती
जब आजमाई जाती है।
गलियों में मिलती वफा
जहां चाहत जमाई नहीं जाती है।
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कंधे से ज्यादा  बोझ दिमाग पर उठाये हैं,
खाने से ज्यादा गाने पर पैसे लुटाये हैं।
मत पूछना हिसाब ‘दीपकबापू’
इंसान के नाम पशु जुटाये हैं।
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नाम कमाने मे श्रम होता है,
बदनामी से कौन क्रम खोता है।
‘दीपकबापू’ कातिलों की करें पूजा
शिकार गलती का भ्रम ढोता है।।
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Sunday, June 11, 2017

दलालों के कारिंदे बाज़ार में आग सजाते-दीपकबापूवाणी (Dalalon ka karinde bazar mein aag sajate-DeepakbapuWani)

शब्दों के खिलाड़ी प्रेम से सहलाते, नरक में स्वर्ग लाने के वादे से बहलाते।
‘दीपकबापू’ विज्ञापन से पाई वाणी, आज का सच कल के सपने में नहलाते।
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बेरहम सौदागर के गोदाम में रहम बंद है, गुलाम रखते लेखे जुबान बंद है।
‘दीपकबापू’ दोनाली से निकाल रहे अमन, सफाई के पाखंडी नीयत गंद है।।
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बाज़ार जवानी के जोश में इश्क मिलाता, विष भी अमृतरस जैसा पिलाता।
‘दीपकबापू’ नशे में शैतान बने अमीर, दोस्त क्या दुश्मन भी हाथ मिलाता।।
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दलालों के कारिंदे बाज़ार में आग सजाते, सौदागर अमन का राग बजाते।
‘दीपकबापू’ खूनखराबे के खेल में माहिर, लोग फरिश्तों पर भी दाग लगाते।।
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प्रसिद्धि में बड़े पर कदम उनके छोटे हैं, बदनामी का डर साथ चैन के टोटे हैं।
‘दीपकबापू’ हर पल श्रृंगार करते चेहरे पर, शब्दों में सौंदर्य पर विचार खोटे हैं।।
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आंखों के सामने पर आस नहीं होते, हाथों में हाथ पर दिल के पास नहीं होते।
‘दीपकबापू’ प्रेम के पाखंड में हो गये दक्ष, गले मिलते पर सभी खास नहीं होते।।
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गुलामी का बरसों पुराना सबक पढ़ाते, आजादी का नित नया नारा आगे बढ़ाते।
‘दीपकबापू’ पुराने आकाओं का ज्ञान पकड़ा, बिन रोटीदाल कागज का दान चढ़ाते।।
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सुंदर शब्द के पीछे कुविचार छिपाते, विकास के पीछे ढांचे तबाह कर छिपाते।
‘दीपकबापू’ समाज सेवा में लेते दलाली, सबकी भक्ति में लगे आसक्ति छिपाते।।
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गर्मी में पानी की बूंदें स्वर्ग बरसायें, न हों तो शीत में नरक जैसा तरसायें।
‘दीपकबापू’ स्वर्ण के मोह में अंधे हुए, न प्यास बुझे न सूखी रोटी भी पायें।
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दिल में चाहत जेब में पैसा नहीं है, कर्जे से चमक जाये चेहरा ऐसा नहीं है।
‘दीपकबापू’ सपने उधार से सच बनाये, अंधेरे दिल में रौशनी जैसा नहीं है।।
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सोच से पैदल अक्लमंदों के कहार होते, पूछते रास्ता उनसे जो भटके यार होते।
‘दीपकबापू’ अजीब नज़ारे देखे दुनियां में, होशियार जूझें मझधार में मूर्ख पार होते।।
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दिल के लिये अब कोई नहीं खेलता, सौदागर खेल जुआ बना पैसा पेलता।
‘दीपकबापू’ व्यापारी मन बना लिया, जेब भरे हार भी दिलदार जैसा झेलता।।
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गोदाम में अनाज का भंडार रखा है, बाहर गरीब ने बस भूख को चखा है।
‘दीपकबापू’ तख्त पर बैठ करें बंदोबस्त, दलाली करने वालों के ही सखा हैं।
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बहुत देर गरजे पर बादल बरसे नहीं, भरे भंडार जिनके प्यास से वह तरसे नहीं।
‘दीपकबापू’ हमदर्दी दिखाने भीड़ में जाते, भूखे पर हाथ फेरें पर रोटी परसे नहीं।।
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स्वार्थ साधना में फंस गयी आसक्ति, लोहे लकड़ी के सामान पर चढ़ गयी भक्ति।
‘दीपकबापू’ मांस के बुतों में ढूंढ रहे देवता, बीमारी पालते दवा की भा गयी शक्ति।।
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Saturday, February 4, 2017

बेशरमी हमेशा बेहद होती है-हिन्दी कविता (Besharmi hmesha Behad hoti hai-Hindi Poem)


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हद होती शर्म की
बेशरमी हमेशा बेहद होती है।

याचक खड़ा द्वार पर
हाथ फैलाये
वाणी उसकी कातर
शब्द के पद ढोती है।

कहें दीपकबापू सेवक से
तब तक वफा की आशा करें
जब तक स्वामी न बना
फिर तो सोने की पालकी
उसमें मद बोती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश

Wednesday, January 18, 2017

पेट जिनके भरे सीने उनके तने हैं, मत पूछो उनके महल कैसे बने हैं-दीपकबापूवाणी (Pet jinke Bhare seene Unke tane hain-DeepakBapuWani)

सिंहासन के लिये होता दंगल, घावों से रिसते खून में दिखाते मंगल।
‘दीपकबापू’ भावनाहीन हो गये, शहर भी डराते अब जैसे सूने जंगल।।
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संवेदनहीन शहर में घृणा बढ़ गयी, प्रेम की कीमत यूं ही चढ़ गयी।
‘दीपकबापू’ विश्वास की तलाश छोड़कर, आंख पत्थर में गढ़ गयी।।
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दौलत की चमक बढ़ा देती करचोरी, खर्च करें निर्बाध साथ सीनाजोरी।
‘दीपकबापू’ ईमानदारी का फंदा डाले, देशभक्ति में हाथ से सीते बोरी।।
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मत करना यकीन बात के बंदर हैं, देव दिखें बाहर राक्षस अंदर हैं।
‘दीपकबापू’ शब्दों पर चलाते व्यापार, वह केवल सपनों का समंदर हैं।।
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आम के दर्द की शिकायत खास दरबार में कौन सुने।
चापलूस सजे रत्न की तरह, जनकल्याण पर मौन बुने।।
मन का हाल आंख में छप जाता, शब्द सहमे बाहर आते,
‘दीपकबापू’ भौपूओं की महफिल में मधुर स्वर कौन चुने।।
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पेट जिनके भरे सीने उनके तने हैं, मत पूछो उनके महल कैसे बने हैं।
‘दीपकबापू’ दान दया का लगाते नारा, मन में लोभ के बादल घने हैं।।
अन्ना के चेले वोट की राजनीति में व्यापार में उनका नाम तक नहीं लेते। क्या दिलचस्प है?
भयातुर कभी भ्रष्ट से नहीं लड़ पाते, कातर कभी कष्ट से नहीं लड़ पाते।
‘दीपकबापू’ स्वार्थ के जाल में फंसे, परमार्थ में पत्ता भी नहीं जड़ पाते।।
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सपनों के व्यापार में सभी लगे, दौलत को निरंतर ताड़ते सभी जगे।
‘दीपकबापू’ स्मृतियां रहती क्षीण, खाली रहे ग्राहक फिर भी सदा भगे।।
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पत्तल छोड़कर सब थाली में खाने लगे, संगीत में शोर अब बजाने लगे।
‘दीपकबापू’ कोयल का सुर पहचाने नहीं, तालियों पर मेंढक टर्राने लगे।।


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Tuesday, January 10, 2017

बहते जाना आसान नहीं है-हिन्दी कविता (Bahate jana asan nahin hai-Hindi Poem)

हृदय की धड़कनों के साथ
बहते जाना आसान नहीं है
संवेदना की नाव में
सवार होना भी जरूरी है।

जुबान के शब्दों की लहर के साथ
बहना आसान नहीं है
सामने सवालों के झौंके
आना भी जरूरी है।

‘दीपकबापू’ पत्थरों पर
रंगीन स्याही से लिखना
बहुत आसान नहीं है
विचारों के जंगल में
घुसना भी जरूरी है।
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Sunday, September 25, 2016

शराब की मस्ती देखकर नहीं पीने वाले जलते क्यों हैं-दीपकबापूवाणी (Wine Drinker and not Drinker-DeepakBapuWani)

शराबियों के सिर चढ़कर शराब गम भुलाती है।
नहीं पीने वालों को भी अहंकार में डुलाती है।
कहें दीपकबापू यह सच है कि  हर नशा बुरा होता
उस कुर्सी का क्या जो अहं के नशे में सुलाती है।
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उनके दर्द का हाल भी पूछ लेते मगर बंदिशों का पहरा था।
यह लगा गैर ने नहीं अपने ने ही दिया घाव जो गहरा था।
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रूठे मित्र हों या टूटे दिल, शब्दों से कोई रंग नहीं भरता।
कौन सांत्वना दें उसे, जिसका मधुर संबंध स्वार्थ से मरता।
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फिरते जो मुफ्तखोर पुजने के लिये, चाहें पद सुरा सुंदरी के लिये।
‘दीपकबापू भलाई का ढिंढोरा पीटते, जो लूट का माल खाकर जिये।।
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शराब की मस्ती देखकर नहीं पीने वाले जलते क्यों हैं।
मजे का माहौल फैला है जब, सूखे दिल ढलते क्यों है।
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दोस्तों से किनारा न करना दुश्मन अकेले होने के इंतजार में रहते।
इश्क से बचना मोहब्बत करना नहीं, लोग पाखंड की बात कहते।।
मोबाईल से मोहब्बत हुई, दोस्तों के लिये जज़्बात कहां से लायेंगे।
भरवाते बात करने का समय, बोलने के लिये शब्द कहां से लायेंगे।
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यार मत पूछो दिल का हिसाब, लोग अपने राज छिपा जाते हैं।
अपने अंदर भी झांको, अपनी औकात हम अपने से छिपा जाते हैं।
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लच्छेदार शब्दों के होते व्यापारी, खेलते है सौदे की लंबी पारी।
‘दीपकबापू’ नाटकीयता बरतते, सच में फंसने की भी आती बारी।
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Friday, August 12, 2016

धरती पर स्वर्ग-हिन्दी कविता (Dharati Par Swarg-Hindi Kavita)

मतलब की बात
जल्दी सुनते
वरना बहरे हो जाते हैं।

डराते जो ज़माने को
खौफ में जीत वह भी
उनके घर खड़े पहरे हो जाते हैं।

कहें दीपकबापू सरलता से
जीवन बिताने की आदत
बना देती धरती पर स्वर्ग
चालाक अंदाज से
दुश्मन गहरे हो जाते हैं।
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Friday, July 15, 2016

अर्थ के बाग-हिन्दी कविता(Arth ke Baag-HindiPoem)

पर्दे पर रोज
पुराने चेहरे ही
कुश्ती करने आते हैं।

दंगे में शांति का
पर्व में क्रांति का शब्द
कान में भरने आते हैं।

कहें दीपकबापू वाणी से
कमाना जिन्होंने सीख लिया
उनके मुख से निकले वाक्य
अर्थ के बाग चरने आते हैं।
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Monday, June 27, 2016

दिल का दाव-हिन्दी व्यंग्य कविता (Dil ka Dav-Hindi Satire Poem)

शिकायत न करें तो
लोग कमजोर
करें तो दुश्मन माने।

हम समझें मित्र
वह मोल देखकर
कभी कम कभी ज्यादा जाने।

कहें दीपकबापू संबंधों में
चलते हिसाब किताब
लालच पर दिल का दाव
कभी लगाने की न ठाने।
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Monday, October 18, 2010

आतंक के पक्के व्यापारी-हिन्दी हास्य कविता (atank ke pakke vyapari-hindi hasya kavita)

एक पत्रकार आतंकवादी का
साक्षात्कार लेने पहुंचा और बोला
‘भई, बड़ी मुश्किल से तुम्हें ढूंढा है
अब इंटरव्यु के लिऐ मना नहीं करना
बहुत दिन से कोई सनसनीखेज खबर नहीं मिली
इसलिये नौकरी पर बन आई है,
तुम मुझ पर रहम करना
आखिर दरियादिल आतंकवादी की
छबि तुमने पाई हैं।’
सुनकर आतंकवादी बोला
‘‘भई, हमारी मजबूरी है,
तुम्हें साक्षात्कार नहीं दे सकता
क्योंकि तुमने कमीशन देने की
मांग नहीं की पूरी है,
पता नहीं तुम यहां कैसे आ गये,
जिंदा छोड़ रहा हूं
तुम शायद सीधे और नये हो
इसलिये मुझे भा गये,
कमबख्त!
तुम्हें आर्थिक वैश्वीकरण के इस युग में
इस बात का अहसास नहीं है कि
आतंकवाद भी कमीशन और ठेके पर चलता है,
उसी पर ही हमारे अड्डे का चिराग जलता है,
टीवी पर चाहे जैसा भी दिखता हो,
अखबार चाहे जो लिखता हो,
हक़ीकत यह है कि
अगर पैसा न मिले तो हम आदमी क्या
न मारें एक परिंदा भी,
आतंक के पक्के व्यापारी हैं
कहलाते भले ही दरिंदा भी,
हमें सुरक्षा कमीशन मिल जाये
तो समझ लो हाथी सलामत निकल जाये,
न मिले तो चींटी भी गोली खाये,
आजकल निठल्ला बैठा हूं
इसका मतलब यह नहीं कि काम नहीं है
सभी चुका रहे हैं मेरा कमीशन
फिर हमला करने का कहीं से मिला दाम नहीं है,

अब इससे ज्यादा मत बोलना
निकल लो यहां से
सर्वशक्तिमान को धन्यवाद दो कि
क्योंकि अभी तुम्हारी जिंदगी ने अधिक आयु पाई है।
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Saturday, July 10, 2010

बेवफाओं की भीड़-हिन्दी व्यंग्य कविता (bevfaon ki bheed-hindi vyangya kavita)

दूसरों में वफा की तलाश करते हुए
गुजार देते हैं लोग पूरी जिंदगी
फिर निराश हो जाते हैं।
पर कोई भी इंसान
अपने अंदर बैठे गद्दार को
मार नहीं पाया
सभी ज़माने में वफादार ढूंढते हुए
बेवफाओं की भीड़ में खो जाते हैं।
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एक तरफ दौलत, शौहरत और ताकत के
सिंहासन पर आका खड़े हैं
दूसरी तरफ चमचे उनकी दरबार में जड़े हैं।
बाकी इंसान तो भेड़ों की तरह चल रहे
जिनके सपने अपनी औकात से बड़े हैं।
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Saturday, May 22, 2010

सम्मेलन-हिन्दी व्यंग्य कविता (sammelan-hindi vyangya kavita)

सम्मेलन में
कुछ रूठे इस उम्मीद में गये कि
कोई उन्हें मना लेगा
कुछ टूटे दिलों ने आसरा किया कि
कोई उन्हें फिर बना लेगा,
मगर वहां जमी महफिल में
सभी चीख रहे थे
गुर्राने के नये नये तरीके सीख रहे थे,
सद्भाव के नाम संघर्ष दिखने लगा।
सभी ने अपनी अपनी कही,
दूसरे की सलाह भी सही,
तय किया ज़माने में नश्तर चुभोने का,
अपने को छोड़कर सभी को डुबोने का,
फिर कोई अगले सम्मेलन की तारीख लिखने लगा।

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Wednesday, May 12, 2010

पुराने नायक, नये खलनायक-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (purane nayak, naye khalnayak-hindi vyangya kaivtaen)

राजशाही लुट गयी
लुटेरे बन गये
ज़माने के खैरख्वाह।
उठाये थे पहले भी गरीब
साहुकारों का बोझ
भले ही भरकर रह जाते थे आह,
अब भी कहर बरपा रहे
लुटेरे तमंचों के जोर पर रोज
फिर भी बोलना पड़ता है वाह वाह।
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इतिहास क्यों पुराना सुनाते हो,
यहां घट रहा है रोज नया घटनाक्रम
तुम पुरानी कथा क्यों सुनाते हो।
पढ़ लिखकर किताबें क्यों ढूंढ रहे हो
जमाने को दिखाने का रास्ता,
अपनी खुद की सोच बयान करो
मत दो रद्दी हो चुके ख्यालों का वास्ता,
पुराने समय के नायकों की याद में
नये खलनायकों की चुनौती क्यों भुलाते हो।
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Sunday, February 28, 2010

होली या दिवाली-आलेख और व्यंग्य क्षणिकायें (holi ho ya diwali-hindi article and satire poem)

होली हमारे देश का एक परंपरागत त्यौहार है जो उल्लास से मनाया जाता रहा है। यह अलग बात है कि इसे मनाने का ढंग अब लोगों का अलग अलग हो गया है। कोई रंग खेलने मित्रों के घर पर जाता है तो कोई घर पर ही बैठकर खापीकर मनोरंजन करते हुए समय बिताता है। इसका मुख्य कारण यह है कि जब तक हमारे देश में संचार और प्रचार क्रांति नहीं हुई थी तब तक इस त्यौहार को मस्ती के भाव से मनाया जरूर जाता था पर अनेक लोगों ने इस अवसर पर दूसरे को अपमानित और बदनाम करने के लिये भी अपना प्रयास कर दिखाया। केवल शब्दिक नहीं बल्कि सचमुच में नाली से कीचड़ उठाकर फैंकने की भी घटनायें हुईं। अनेक लोगों ने तो इस अवसर पर अपने दुश्मन पर तेजाब वगैरह डालकर उनको इतनी हानि पहुंचाई कि उसे देख सुनकर लोगों का मन ही इस त्यौहार से वितृष्णा से भर गया। तब होली उल्लास कम चिंता का विषय बनती जा रही थी।
शराब पीकर हुड़दंग करने वालों ने लंबे समय तक शहरों में आतंक का वातावरण भी निर्मित किया। समय के साथ सरकारें भी चेतीं और जब कानून का डंडा चला तो फिर हुडदंगबाजों की हालत भी खराब हुई। हर बरस सरकारें और प्रशासन होली पर बहुत सतर्कता बरतता है। इस बीच हुआ यह कि शहरी क्षेत्रों में अनेक लोग होली से बाहर निकलने से कतराने लगे। एक तरह से यह उनकी आदत बन गयी। अब तो ऐसे अनेक लोग हैं जो इस त्यौहार को घर पर बैठकर ही बिताते हैं।
जब सरकारों का ध्यान इस तरफ ध्यान नहीं था और पुलिस प्रशासन इसे सामान्य त्यौहारों की तरह ही लेता था तब हुड़दंगी राह चलते हुए किसी भी आदमी को नाली में पटक देते। उस पर कीचड़ उछालते। शहरों में तो यह संभव ही नहीं था कि कोई पुरुष अपने घर की स्त्री को साथ ले जाने की सोचे। जब पूरे देश में होली के अवसर पर सुरक्षा व्यवस्था का प्रचनल शुरु हुआ तब ऐसी घटनायें कम हो गयी हैं। इधर टीवी, वीडियो, कंप्यूटर तथा अन्य भौतिक साधनों की प्रचुरता ने लोगों को दायरे में कैद कर दिया और अब घर से बाहर जाकर होली खेलने वालों की संख्या कम ही हो गयी है। अब तो यह स्थिति है कि कोई भी आदमी शायद ही अनजाने आदमी पर रंग डालता हो। फिर महंगाई और रंगों की मिलावट ने भी इसका मजा बिगाड़ा।
महंगाई की बात पर याद आया। आज सुबह एक मित्र के घर जाना हुआ। उसी समय उसके मोहल्ले में होली जलाने के चंदा मांगने वाले कुछ युवक आये। हमने मित्र से हाथ मिलाया और अंदर चले गये। उधर उनकी पत्नी पचास रुपये लेकर आयी और लड़कों को सौंपते हुए बोली-‘इससे ज्यादा मत मांगना।’
एक युवक ने कहा-‘नहीं, हमें अब सौ रुपये चाहिये। महंगाई बढ़ गयी है।’
मित्र की पत्नी ने कहा-‘अरे वाह! तुम्हारे लिये महंगाई बढ़ी है और हमारे लिये क्या कम हो गयी? इससे ज्यादा नहीं दूंगी।’
लड़के धनिया, चीनी, आलू, और प्याज के भाव बताकर चंदे की राशि बढ़ाकर देने की मांग करने लगे।
मित्र ने अपनी पत्नी से कहा-‘दे दो सौ रुपया, नहीं तो यह बहुत सारी चीजों के दाम बताने लगेंगे। उनको सुनने से अच्छा है इनकी बात मान लो।’
गृहस्वामिनी ने सौ रुपये दे दिये। युवकों ने जाते हुए कहा-‘अंकल और अंाटी, आप रात को जरूर आईये। यह मोहल्ले की होली है, चंदा देने से ही काम नहीं चलेगा। आना भी जरूर है।’
मित्र ने बताया कि किसी समय उन्होंने ही स्वयं इस होली की शुरुआत की थी। उस समय लड़कों के बाप स्वयं चंदा देकर होली का आयोजन करते थे अब यह जिम्मेदारी लड़कों पर है।’
कहने का अभिप्राय यह है कि इस सामूहिक त्यौहार को सामूहिकता से मनाने की एक बेहतर परंपरा जारी है। जबकि पहले जोर जबरदस्ती सामान उठाकर ले जाकर या चंदा ऐंठकर होली मनाने का गंदा प्रचलन अब बिदा हो गया है। जहां नहीं हुआ वह उसे रोकना चाहिये। सच बात तो यह है कि अनेक बेवकूफ लोगों ने अपने कुकृत्यों से इसे बदनाम कर दिया। यह खुशी की बात है कि समय के साथ अब उल्लास और शांति से यह त्यौहार मनाया जाता है।
इस अवसर पर कुछ क्षणिकायें 
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रंगों में मिलावट
खोऐ में मिलावट
व्यवहार में दिखावट
होली कैसे मनायें।
कच्चे रंग नहीं चढ़ता
अब इस बेरंग मन पर
दिखावटी प्यार कैसे जतायें।
---------
रंगों के संग
खेलते हुए उन्होंने होली
कुछ इस तरह मनाई,
नोटों के झूंड में बैठकर
इठलाते रहे
इसलिये उनकी पूरी काया
रंगीन नज़र आयी।
---------
अगर रुपयों का रंग चढ़ा गया तो
फिर कौनसे रंग में
बेरंग इंसान नहायेगा,
आंख पर कोई रंग असर नहीं करता
होली हो या दिवाली
उसे बस मुद्रा में ही रंग नज़र आयेगा।



कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Thursday, February 18, 2010

शब्द और अनुभूति-हिन्दी कविता (shabd aur anubhuti-hindi poem)

कब तक तस्वीरों को देखकर
अपना दिल बहलायें,
चेहरों की आखों से पढ़कर
शब्द अपनी समझ से तय कर
दिमाग में सजायें।
इससे तो अच्छा है कि किताबों में
शब्द पढ़कर तस्वीरों के अहसास पायें।
तस्वीरें कितना बोलेंगी,
आंखें कैसे शब्दों को तोलेंगी,
चेहरे स्तब्ध करते हैं
आंखों में आश्चर्य भरते हैं,
दिल की गहराई तक तो
शब्द ही अनभूति पहुंचायें।
इसलिये फुरसत में अपने आगे
किताबों की ही सजायें।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, February 7, 2010

इंसानी दिल-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (heart of man-hindi satire poem)

मतलब के लिए इंसान

अपना दिल इस तरह बदल जाते

कि आखें होती तो

बेपैंदी के लोटे भी देखकर शर्माते।

जुबान होती तो

एक दूसरे पर इंसान होने का शक जताते।

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नब्बे फीसदी सांप

जहरीले नहीं होते

यह विशेषज्ञ ने बताया।

तब से इंसानों की सांप से

तुलना करना बंद कर दिया हमने

क्योंकि सांप के डसने से

कई लोगों को बचते देखा

पर इंसानों के धोखे से बचता

कोई नज़र नहीं आया।

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Wednesday, February 3, 2010

नजरिया-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (nazariya-hindi comic poems)

जिंदगी का सच कटु होता जितना

इंसान का सपना उतना ही रंगीन हो जाता है।

रंगीले इंसानों के लिये

जिंदगी की  कड़वाहट में है मनोरंजन

इसलिये सोच से बने अफसानों में

हर रंग सराबोर हो जाता है।

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अमीर के बच्चे ने

गरीबों के दर्द पर

तो गरीब के बच्चे ने अमीरी के ख्वाब पर लिखा।

किन हालातों पर रोयें, किन पर हंसे

इंसानों के नजरिये में ही फर्क दिखा।

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Wednesday, January 27, 2010

प्यार, नफरत और दिल-हिन्दी व्यंग्य कविताएं (pyar,nafarat aur dil-hindi vyangya kavitaen)

राज रखकर ही राज

चलाये जाते हैं

सामने कर दुश्मनी के सौदे

बंद कमरे में दोस्तों में

बांटे जाते हैं।

जज़्बात मर गये हैं लोगों के

प्यार हो नफरत

दिल के अदंर तक नहीं पहुंचती

केवल जमाने को दिखाये जाते हैं।

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दिन भर दिखाते रहे

अपनी दुश्मनी जमाने को,

रात को चले दोस्ती निभाने को।

विज्ञापन का युग है

तारीफों पर अब लोग नहीं बहलते

इसलिये लोग चल पड़ते हैं

दोस्त के ही हाथ से अपने लिये गालियां लिखाने को।


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Tuesday, January 19, 2010

चाहत और राहत-हिन्दी व्यंग्य कविता (chahat aur rahat-hindi vyangya kavita)

असुंदर को सुंदरता की,

भूखे को रोटी की,

और उदास इंसान को

मनोरंजन की होती है चाहत।

इसलिये सुंदर को

असुंदरता का अपमान देखकर,

अमीर को भूख के दर्द से

शाब्दिक हमदर्दी दिखाकर,

और मनोरंजन से थके इंसान को

उदासी की बातों से मिलती है राहत।

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