Saturday, April 30, 2011

मजदूर दिवसः श्रीमदभागवत गीता से लिया जा सकता है समाजवाद का ज्ञान-हिन्दी लेख (shri madbhagwat geeta and socialism-special hindi article on mazdoor diwas. divas or may day)

           भारत में मजदूर दिवस मनाने की कोई परंपरा नहीं है, अलबत्ता यहां विश्वकर्मा जयंती मानी जाती है जिसे करीब करीब इसी तरह का ही माना जा सकता है।  हमारे देश  में  विश्वकर्मा जी को ही श्रम शक्ति का देवता मन जाता है।  हमारा  अध्यात्मिक दर्शन   पाश्चात्य सभ्यता द्वारा प्रदाय अधिकतर दिवसों को खारिज करता है यथा माता दिवस, पिता दिवस, मैत्री दिवस, प्र्रेम दिवस तथा नारी दिवस। मजदूर दिवस भी पश्चिम से ही आयातित विचारधारा से जुड़ा है पर इसे मनाने का समर्थन करना चाहिये। दरअसल इसे तो बहुत शिद्दत से मनाना चाहिए हालाँकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में निष्काम दान तथा निष्प्रयोजन दया में हमेशा लिप्त रहने के प्रेरित किया जाता है न की एक दिन के लिए ।
           आधुनिक युग में कार्ल मार्क्स को मजदूरों का मसीहा कहा जाता है। उनके नाम पर मजदूर दिवस मनाया जाता है तो इसमें मजदूर या श्रम शब्द जुड़ा होने से संवेदनायें स्वभाविक रूप जाग्रत हो उठती हैं। एक बात याद रखिये आज भारत में जो हम नैतिक, अध्यात्म, तथा तथा देशप्रेम की भावना का अभाव लोगों में देख रहे हैं वह शारीरिक श्रम को निकृष्ट मानने की वजह से है। हर कोई सफेद कालर वाली नौकरी चाहता है और शारीरिक श्रम करने से शरीर में से पसीना निकलने से घबड़ा रहे हैं। भारतीय तथा पाश्चात्य दोनों ही   प्रकार के स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि शरीर को जितना चलायेंगे उतना ही स्वस्थ रहेगा तथा जितना सुविधाभोगी बनेंगे उतनी ही तकलीफ होगी।
           सबसे बड़ी बात यह है कि गरीब और श्रमिक को तो एक तरह से मुख्यधारा से अलग मान लिया गया है। वह दया योग्य समझा जाता है न की साथ बिठाने लायक।  संगठित प्रचार माध्यमो में-टीवी चैनल, रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं-इस तरह के प्रसारण तथा प्रकाशन देखने को मिलते हैं जैसे कि श्रम करना एक तरह से घटिया लोगों का काम है। संगठित प्रचार माध्यमों को इसके लिये दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह आधुनिक बाज़ार के विज्ञापनों पर ही अपना साम्राज्य खड़े किये हुए  हैं। यह बाजार सुविधाभोगी पदार्थों का निर्माता तथा विक्रेता है। स्थिति यह है कि फिल्म और टीवी चैनलों के अधिकतर कथानक अमीर घरानों पर आधारित होते हैं जिसमें नायक तथा नायिकाओं को मालिक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। उनमें नौकर के पात्र भी होते हैं पर नगण्य भूमिका में। क्हीं नायक या नायिका मज़दूर या नौकर की भूमिका में दिखते हैं तो उनका पहनावा अमीर जेसा ही होता है। फिर अगर नायक या नायिका का पात्र मजदूर या नौकर है तो कहानी के अंत में वह अमीर बन ही जाता है। जबकि जीवन में यह सच नज़र नहीं आता। ऐसे अनेक उदाहरण समाज में देखे जा सकते हैं कि जो मजदूर रहे तो उनके बच्चे भी मज़दूर बने। आम आदमी इस सच्चाई के साथ जीता भी है कि उसकी स्थिति में गुणात्मक विकास भाग्य से ही आता है
         कार्ल मार्क्स मजदूरों का मसीहा मानने पर विवाद हो सकता है पर पर देश के बुद्धिमान लोगों को अब इस बात के प्रयास करना चाहिये कि हमारी आने वाली पीढ़ी में श्रम के प्रति रूझान बढ़े। यहां श्रम से हमारा स्पष्ट आशय अकुशल श्रम से है-जिसे छोटा काम भी कहा जा सकता है। कुशल श्रम से आशय इंजीनियरिंग, चिकित्सकीय तथा लिपिकीय सेवाओं से है जिनको करने के लिये आजकल हर कोई लालायित है। इसी अकुशल श्रम को सम्मान की तरह देखने का प्रयास करना चाहिये। यह नहीं समझना चाहिए कि जो लोग अकुशल श्रम करते हैं वह भी इंसान है कोइ यन्त्र  या पालतू पशु नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने पास या साथ काम करने वाले श्रमजीवी को कभी असम्मानित या हेय दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। मनुष्य मन की यह कमजोरी है कि वह धन न होते हुूए भी सम्मान चाहता है। दूसरी बात यह है कि श्रमजीवी मजदूरों के प्रति असम्माजनक व्यवहार से उनमें असंतोष और विद्रोह पनपता है जो कालांतर में समाज के लिये खतरनाक होता है। यही श्रमजीवी और मजदूरी ही धर्म की रक्षा में प्रत्यक्ष सहायक होता है। यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में सभी को समान दृष्टि से देखने की बात कही जाती है। इस विषय पर दो वर्ष पूर्व एक लेख यहां प्रस्तुत है। इसी लेख को कल सैकंड़ों पाठकों द्वारा देखने का प्रयास किया इसलिये इसे इस पाठ के नीचे भी प्रस्तुत किया जा रहा है।
        आज मजदूर दिवस है और कई जगह मजदूरों के झुंड एकत्रित कर रैलियाँ निकालीं जायेंगी। ऐसा नहीं है कि हमारे दर्शन में मजदूरों के लिए कोई सन्देश नहीं है पर उसमें मनुष्य में वर्गवाद के वह मन्त्र नहीं है जो समाज में संघर्ष को प्रेरित करते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन द्वारा प्रवर्तित जीवनशैली पर दृष्टिपात करें तो उसमें पूंजीपति मजदूर और गरीब अमीर को आपस में सामंजस्य स्थापित करने का सन्देश है। भारत में एक समय संगठित और अनुशासित समाज था जो कालांतर में बिखर गया। इस समाज में अमीर और गरीब में कोई सामाजिक तौर से कोई अन्तर नहीं था।
           श्री मद्भागवत गीता में कहा गया है कि
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            न द्वेष्टयकुशर्ल कर्म कुशले नातुषज्जजते।
           त्यागी सत्तसमाष्टिी मेघावी छिन्नसंशयः।।
            “जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्वगुण से युक्त पुरुष संशय रहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है।”
            श्रीमदभागवत गीता के १८वे अध्याय के दसवें श्लोक में इस श्लोक में उस असली समाजवादी विचारधारा की ओर संकेत किया गया है जो हमारे देश के लिए उपयुक्त है । जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारे इस ज्ञान सहित विज्ञानं से सुसज्जित ग्रंथ में कोई भी संदेश विस्तार से नहीं दिया क्योंकि ज्ञान के मूल तत्व सूक्ष्म होते हैं और उन पर विस्तार करने पर भ्रम की स्थिति निमित हो जाती है, जैसा कि अन्य विचारधाराओं के साथ होता है। श्री मद्भागवत गीता में अनेक जगह हेतु रहित दया का भी संदेश दिया गया है जिसमें अपने अधीनस्थ और निकटस्थ व्यक्तियों की सदैव सहायता करने के प्रेरित किया गया है।
              श्री मद्भागवत गीता में भी कहा गया है कि 
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              स्वै स्वै कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः।
              सव्कर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।
          "अपने अपने स्वाभाविक कार्ये में तत्परता से लगा मनुष्य भक्ति प्राप्त करते हुए उसमें सिद्धि प्राप्त लेता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि प्राप्त करता है उस विधि को सुन।"
          यतः प्रवृत्तिभूंतानां वेन सर्वमिद्र ततम्।
          स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।
        "जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्तपति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।"
             श्रीमदभागवत गीता में ऊपर लिखे दोनों  श्लोक को  तो यह साफ लगता है अकुशल श्रम से आशय मजदूर के कार्य से ही है । आशय साफ है कि अगर आप शरीर से श्रम करे हैं तो उसे छोटा न समझें और अगर कोई कर रहा है तो उसे भी सम्मान दे। यह मजदूरों के लिए संदेश भी है तो पूंजीपतियों के लिए भी है ।
श्री गीता में ही हेतु रहित दया का सन्देश तो स्पष्ट रुप से धनिक वर्ग के लोगों के लिए ही कहा गया है-ताकि समाज में समरसता का भाव बना रहे। कार्ल मार्क्स एक बहुत बडे अर्थशास्त्री माने जाते है जिन के विचारों पर गरीबों और शोषितों के लिए अनेक विचारधाराओं का निर्माण हुआ और जिनका नारा था “दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ”।
              शुरू में नये नारों के चलते लोग इसमें बह गये पर अब लोगों को लगने लगा है कि अमीर आदमी भी कोई ग़ैर नहीं वह भी इस समाज का हिस्सा है-और जो उनके खिलाफ उकसाते हैं वही उसने हाथ भी मिलाते हैं । जब आप किसी व्यक्ति या उनके समूह को किसी विशेष संज्ञा से पुकारते हैं तो उसे बाकी लोगों से अलग करते हैं तो कहीं न कहीं समाज में विघटन के बीज बोते हैं।
               दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रीगीता में अपने स्वाभाविक कर्मों में अरुचि न दिखाने का संदेश दिया गया है। सीधा आशय यह है कि कोई भी काम छोटा नहीं है और न तो अपने काम को छोटा और न किसी भी छोटा काम करने वाले व्यक्ति को हेय समझना चाहिये। ऐसा करना बुद्धिमान व्यक्ति का काम नहीं करना चाहियैं। कई बार एसा होता है कि अनेक धनी लोग किसी गरीब व्यक्ति को हेय समझ कर उसकी उपेक्षा करते हैं-यह तामस प्रवृत्ति है। उसी तरह किसी की मजदूरी कम देना या उसका अपमान केवल इसलिये करना कि वह गरीब है, अपराध और पाप है। हमेशा दूसरे के गुणों और व्यवहार के आधार पर उसकी कोटि तय करना चाहिये।
भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका उसके गुणों, कर्म और व्यक्तित्व के आधार पर तय होती है उसके व्यवसाय और आर्थिक शक्ति पर नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो संत शिरोमणि श्री कबीरदास, श्री रैदास तथा अन्य अनेक ऎसी विभूतियाँ हैं जिनके पास कोई आर्थिक आधार नहीं था पर वे आज हिंदू विचारधारा के आधार स्तम्भ माने जाते हैं।
           कुल मिलाकर हमारे देश में अपनी विचारधाराएँ और व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने इस समाज को एकजुट रखने में अपना योगदान दिया है और इसीलिये वर्गसंघर्ष के भाव को यहां कभी भी लोगों के मन में स्थान नहीं मिल पाया-जो गरीबो और शोषितों के उद्धार के लिए बनी विचारधाराओं का मूल तत्व है। परिश्रम करने वालों ने रूखी सूखी खाकर भगवान का भजन कर अपना जीवन गुजारा तो सेठ लोगों ने स्वयं चिकनी चुपडी खाई तो घी और सोने के दान किये और धार्मिक स्थानों पर धर्म शालाएं बनवाईं । मतलब समाज कल्याण को कोई अलग विषय न मानकर एक सामान्य दायित्व माना गया-बल्कि इसे मनुष्य समुदाय के लिए एक धर्म माना गया वह अपने से कमजोर व्यक्ति की सहायता करे। आज के दिन अकुशल काम करने वाले मजदूरों के लिए एक ही संदेश मैं देना चाहता हूँ कि अपने को हेय न समझो । सेठ साहूकारों और पूंजीपतियों के लिए भी यह कहने में कोइ संकोच नहीं है अपने साथ जुडे मजदूरों और कर्मचारियों पर हेतु रहित दया करें ।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप" 
poet,writter and editor-Deepak "BharatDeep"
http://rajlekh-hindi.blogspot.com
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Monday, April 25, 2011

विशिष्ट लोगों के लिये अलग जेल-हिन्दी हास्य कविता (jail for V.I.P; parson-hindi comic satire poem

विशिष्ट लोगों के जेल जाने की
खबरों से घबड़ाये समाजसेवक ने
अपने चेले को बुलाकर कहा
‘‘जल्दी अपने समर्थकों की आमसभा बुलाओ
सभी सोए कार्यकताओं को हिलाओ डुलाओ,
हम व्ही.आई.पी. लोगों के लिये
अलग जेल बनाने की मांग करेंगे,
चल रहा है भ्रष्टाचार का बुरा समय
कहीं हम भी लगा आरोप तो
जेल में कभी अपने पांव धरेंगे,
सारी जिंदगी समाज सेवा की,
किसी ने दी कमीशन तो हमने ली,
पर इसे पता नहीं क्यों भ्रष्टाचार कहते हैं,
मगर लोग भी प्रचार की धारा में बहते हैं,
इसलिये अच्छा है पहले ही व्ही.आई.पी. जेल बन जाये
ताकि अगर हम फंसे तो
वहां घर और जेल का अंतर न नज़र न आये।
सुनकर चेला बोला
‘‘महाराज,
करना था पहले यह काम,
अब तो हो गये आप बदनाम,
जब आपकी बात सुनी जाती थी,
तब आपको बस चंदा और कमीशन
बटोरने की बात ही याद आती थी,
उस समय अपनी पहुंच का उपयोग कर
विशिष्ट लोगों की जेल बनवाते,
तब आप भी तर जाते,
उस समय विशिष्ट होकर
आम लोगों को समझा था कीड़ा,
जब जेल में जायेंगे तब दिख जायेगी उसकी पीड़ा,
समय आपके हाथ से निकल गया है
कहा भी जाता है
अब क्या होत पछताये,
जब चिड़िया खेत चुग जाये’।’’
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप" 
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Tuesday, April 19, 2011

नकली रौशनी से चिराग को सूरज की तरह बड़ा कर दो-हिन्दी व्यंग्य कविता (nakli roshni aur chirag-hindi vyangya kavita)

चेहरा निर्दोष लगे
वस्त्र सादा और धवल हों,
नारे लगाने में माहिर,
और घोषणाओं पर खुश हो जाये,
ऐसा आदमी आगे खड़ा कर दो
ज़माना उसकी मासूमियत देखकर
सारा दर्द भुला देगा।
काला धंधा छिपकर चलता रहे,
काला धन सफेद होकर पलता रहे,
गगनचुंबी कांच से बनी इमारतें सलामत रहें,
इसके लिये जरूरी है कि आम आदमी
अपनी निराशा भूलकर
आशा की किरण देखता रहे
कोई बुझा चिराग
नकली रौशनी से सूरज की तरह बड़ा कर दो
वरना वह झूठे सिंहासन को फांसी  पर झुला देगा।
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Tuesday, April 12, 2011

रामनवमी का दिन आत्ममंथन के लिये-हिन्दी धार्मिक चिंत्तन (ramnavami ka din atmamanthan ke liye-hindi dharmik lekh)

      आज रामनवमी है। रामनवमी से पहले माता के भक्त नवरात्रि में भजन आदि के साथ व्रत या उपास करते हैं और उनके समापन पर विशेष कार्यक्रमों पर आयोजित किये जाते हैं। दरअसल हम अपने देश में मनाये जाने वाले धार्मिक त्यौहारों या पर्वों को अगर तार्किक दृष्टिकोण से अध्ययन करें तो विचित्र स्थिति नज़र आती है। रामनवमी के दिन माता और हनुमान जी के मंदिरों पर भीड़ अधिक होती है। राममंदिरों में भी सजावट होती है पर वहां भगवान राम के चरित्र की कम ही चर्चा होती है। राम से अधिक माता तथा हनुमान जी को अधिक याद किया जाता है। भगवान राम ने मर्यादा की सीमा लांघे बिना विश्व में धर्म की स्थापना की पर आज लोग हैं कि धर्म की स्थापना के लिये कार्य करते हुए मर्यादा लांध जाते हैं। संतों के वेश में इतने दुष्ट पकड़े जाते हैं कि यह यकीन करना अब कठिन हो गया है कि धर्म स्थापना का कार्य कोई मर्यादा के साथ करता होगा। सच कहें तो धर्म स्थापना का काम अब व्यवसायिक हो गया है भले ही कई लोग उसे परमार्थ भाव से करने का दावा करते हों।

        अब तो यह स्थिति हो गयी है कि धर्म प्रचार के लिये अर्थ की अनिवार्यता को अनेक ठेकेदार खुलेआम बड़ी बेशर्मी से स्वीकार करते हैं। धार्मिक कार्यक्रमों के लिये चंदा वसूला जाता है। कभी कभी तो यह विचार आता है कि यह धर्म प्रचार का काम आखिर क्या बला है जिसे कुछ लोग करते है। भगवान राम ने कोई धर्म प्रचार नहीं किया बल्कि अपने दैहिक जीवन में कर्म करते हुए उसकी प्रेरणा दी। उन्हीं रामजी का नाम लेकर कुछ लोग धर्म प्रचार करते हैं। अब अगर हम एशिया की स्थिति को देखें तो भगवान राम केवल भारत में ही नहीं बल्कि इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड तथा अन्य देशों में भी जनमानस के नायक हैं। कुछ लोग तो रामजी के नाम पर केवल भारत में जागरण करने की बात करते हैं जबकि अन्य देशों में उनके महत्व को भुला देते है। आज तक इस बात की खोज किसने नहंी की कि अगर भगवान राम भारत में हुए तो उनका नाम इंडोनेशिया तक कैसे पहुंचा?
       कुछ अध्यात्मिक विशेषज्ञ तो कहते हैं कि राम का नाम ही एशिया के अनेक देशों की संस्कृति एक होने का प्रमाण देता है। भारत से बाहर पैदा हुई धार्मिक, वैचारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विचाराधाराओं की स्थापना के बाद एशियाई देशों में वैमनस्य फैलने के बावजूद एशियाई देशों के जनमानस में राम का नाम अपनी पहचान रखता है।
भगवान राम के नाम पर नवमी मनाई जाती है। उसी तरह भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी मनाई जाती है। ऐसा लगता है कि जन्म दिन के बाद आठ या नौ दिन के बाद तत्कालीन समाजों में उत्सव की कोई परंपरा रही होगी मगर यह तय है कि सार्वजनिक रूप से जन्म दिन मनाने की कोई परंपरा हमारे देश में नहीं रही। दूसरी बात यह कि यह जन्म दिन से जुड़ा पर्व भी केवल अवतरित पुरुषो के लिये ही मनाया जाता रहा है-वह भी दैहिक रूप से संसार में विद्यमान रहते हुए नहीं वरन् परमधाम गमन के बाद- न कि इसे जनसाधारण के लिये इसे मान्य किया गया। जन्म दिन की तरह हमारे अध्यात्म में मृत्यु के दिन को पुण्यतिथि मनाये जाने की भी परंपरा नहीं है। अब स्थिति दूसरी है। समाज, राजनीति, तथा आर्थिक शिखर पुरुषों ने अपने जीवित रहते हुए हुए जन्म दिन मनाना शुरु कर दिये तो मरने के बाद उनके चेले चपाटे पुण्यतिथि मनाते हैं। स्थिति तो यह हो गयी है कि सामान्य लोग भी अपने घरों में जन्मदिन पर बड़े कार्यक्रम करने लगे हैं। यह धार्मिक तथा अध्यात्मिक मर्यादा का उल्लंघन होने के साथ ही भौतिक संपन्नता में समाज के मदांध होने का प्रमाण है। यहां यह भी याद रखने वाली बात है कि अभी भी हमारे समाज में ऐसे गरीबों की संख्या बहुत अधिक है जिनको न अपने तथा न परिवार के सदस्यों का जन्म दिन याद रहता है न ही अपने लोगों की मृत्यु को याद रखने का अवसर मिलता है। जन्म दिन तथा पुण्यतिथि मनाना उच्च तथा संभ्रांत समाज के चौंचले हैं। हम यह तो देखते हैं कि उच्च और सभ्रांत वर्ग अपने धनबल की वजह से धर्म सक्रियता अधिक दिखाता है पर मज़बूरी में ही सही गरीब और ग्रामीण वर्ग ही शांति से धर्म निभाते हुए मर्यादा का पालन अधिक करता है।
धर्म के नाम पाखंड और दिखावा इतना बढ़ गया है कि जब हम अपने अध्यात्म में वर्णित तत्वज्ञान पर विचार करते हैं तो ऐसा लगता है कि तामसी प्रवृत्तियों का बोलबाला है। हठपूर्वक और शास्त्रों के अनुसार धर्म पथ पर न चलना ही तामस बुद्धि का प्रमाण है। मतलब यह कि तामस आदमी धर्म न माने यह जरूरी नहीं बल्कि दूसरे पर अपने अनुसार धर्म मानने का दबाव वह जरूर डालता है। ऐसे लोगों का कहना होता है कि ‘जैसा हम धर्म पालन कर रहे हैं, वैसा ही तुम भी करो। वरना तुम अधर्मी हो।’
         हमारे धर्म की ताकत हमारा अध्यात्मिक दर्शन है न कि कर्मकांड। जबकि प्रचारित यह किया जाता है कि कर्मकांड ही धर्म का प्रमाण है। अध्यात्मिक शिखर पर बैठे तत्वज्ञान की बात करते हुए सांसरिक बातें करने लगते हैं। कई लोग राम का नाम लेते हुए जीवन बिताते हैं, कोई पाखंड नहीं करते और न ही कर्मकांडों में भाग लेते हैं। उनके गुरु राम हैं पर यहां उनको यह उपदेश दिया जाता है कि संसार में किसी गुरु का होना जरूरी है। कैसे गुरु? जो केवल पाखंड करने के लिये कहते हैं।
बहरहाल रामनवमी का पर्व आत्ममंथन के लिये उपयोग करना चाहिए। कर्मकांडों का निर्वहन करना बुरा नहीं है पर तत्वज्ञान से परे रहना जीवन में शक्तिहीन बना देता है। वैसे भी कहा जाता है कि राम से बड़ा राम का नाम। उनके नाम स्मरण में ही जो शक्ति है उसका आभास हृदय में तभी किया जा सकता है जब निच्छलता और निर्मलता से ही उनको पुकारा जाये। इस अवसर सभी ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों को बधाई।
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Friday, April 1, 2011

लंकादहन को उकसाते हैं पर खुद नारे ही लगाते रहेंगे-हिन्दी व्यंग्य चिंतन (lanka dahan aur cricket match-hindi vyangya chittan)

भारत में कुछ ज्ञानी बुद्धिजीवी आम बुद्धिजीवियों पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि ‘कुछ लोग चाहते हैं कि उनके यहां पैदा होने वाला बेटा कहीं का कलेक्टर बने भले ही पड़ौसी का लड़का भगतसिंह बन जाये।’
आजादी के बाद देश में एक ऐसा सुविधा भोगी वर्ग बन गया है जो क्रांति, इंकलाब, अभिव्यक्ति की आज़ादी तथा गरीबों का कल्याण की बात करते हुए जमकर नारे लगाता है पर जहां प्रतिरोध सामने आया भाग खड़ा होता है। यह वर्ग अपने आकाओं के लिये भीड़ जुटाता है पर विपत्ति जब सामने खड़ी हो तो उसमें शामिल लोग अपने को लाने वाले ठेकेदार की तरफ सहारे के लिये देखते हैं तो उसे नदारद पाते हैं।
ऐसा कई बार हुआ है और हालत यह है कि अगर कोई सामान्य व्यक्ति जब कोई आदर्श की बात करता है तो ‘‘लोग उससे पूछते हैं कि तू क्या नेता हो रहा है। यह सब बातें कर रहा है पर समय आने पर तू ही सबसे पहले पलटा खायेगा।’’
इधर अपने देश में नेतागिरी, समाज सेवा, क्रिकेट बाजी, फिल्म बाजी और जितने भी आकर्षण पैदा करने वाले काम हैं सभी का व्यवसायीकरण इस तरह हो गया है कि उसमें आदर्श की बातें बेची जाती हैं पर व्यवहार में अपनाई कतई नहीं जाती। अभी भारत में चल रही विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता 2011 में यही हाल दिखाई दिया। प्रचार माध्यम यानि समाचार पत्र पत्रिकाऐं और टीवी चैनल अपने विज्ञापनदाताओं को इस कदर समर्पित हो गये कि क्रिकेट जैसे व्यापार में देशभक्ति बेच डाली।
मोहाली में पीसीबी (पाकिस्तान) और बीसीसीआई (भारत) की टीम के बीच मैच को प्रचार माध्यमों ने महा मुकाबला इस तरह प्रचारित किया कि कई जगह बड़ी स्क्रीन पर मैच दिखाने की मुफ्त व्यवस्था की गयी। ऐसे ही एक सामूहिक केंद्र पर हम मैच देखने गये। यह तो केवल बहाना था दरअसल उस दिन हम लोगों की प्रतिक्रिया देखना चाहते थे। उस केंद्र पर एक टीवी रखा रहता है जो मैच के दिनों में चलता रहता है। हम भी राह चलते हुए कभी कभार पानी आदि पीने के विचार से वहां चले जाते हैं। उस दिन हमारे जाते ही मुल्तान का सुल्तान आउट हो गया।
गनीमत किसी ऐसे आदमी ने नहीं देखा जो हमसे कुछ कहने का साहस रखे कि ‘देखो इनके चरण कमल पड़ते ही मुल्तान का सुल्तान आउट हो गया।’
जिन्होंने देखा उनको पता था कि यह व्यंग्यकार है और कहीं कुछ ऐसा वैसा कह दिया तो अपनी भड़ास ब्लाग पर जाकर निकालेगा। भले ही वह ब्लाग नहीं पढ़ते हों पर यह आशंका उनको रहती है कि कहंी मुफ्त में इसे व्यंग्य की सामग्री उपलब्ध न करायें।
हमने थोड़ी देर मैच देखा फिर लौटे आये। फिर थोड़ी देर बाद गये तो पता लगा कि गंभीर का झटका लगा है। अब हमें खुटका होने लगा कि कहीं यह बीसीसीआई की टीम देश का नाम डुबो न दे। तब हम बाहर चाय की दुकान पर जमे रहे। वहां मैच नहीं दिख रहा था पर इधर उधर से आते जाते लोग बता गये कि युवराज का सिंहासन भी चला गया है। हमने तय किया कि यह मैच नहीं देखेंगे। देखकर क्या तनाव पालना? दरअसल हमें अब क्रिकेट से कोई लगाव नहीं है क्योंकि इसे देखते हुए टीवी पर आंखें खराब करने और रिमोट पर उंगलियां थकाने से इंटरनेट पर व्यंग्य लिखना अच्छा लगता है।
वैसे हम पर भी ‘परोपदेशे कुशल बहुतेरे’ का सिद्धांत लागू होता है। भले ही पाठकों से माफिया, मीडिया तथा मनीपॉवर के इस संयुक्त उपक्रम क्रिकेट खेल से दूर रहने को कहें पर जाल में खुद भी फंस जाते हैं। खुद से ही नजरें चुराकर इस तरह देख तो लेते ही हैं कि‘हम भला कहां मैच देख रहे हैं? सो फिर सामूहिक केंद्र की तरफ चले गये तो देखा लोग वहां से निकल रहे हैं।
हमने एक से पूछा‘क्या बात है, क्या बिजली चली गयी?’
उसने कहा-‘नहीं, क्रिक्रेट का भगवान चला गया। अब तो हो गयी टीम की ऐसी की तैसी? दो सौ रन भी नहीं बनेंगे।
हमने कहा-‘अरे, ऐसा क्यों सोचते हो? अभी तो रैना है देखना दो सौ पचास से ऊपर रन बनेंगे और हम जीतेंगे।’
बिल्कुल तुक्का था पर सही जगह पर जाकर लगा। रैना से आशा गलत नहीं थी पर यह एक अनुमान था। टीम की जीत का विश्वास तो प्रचार माध्यमों की वजह से हो चला था। प्रचार माध्यमों की बातों से अनुमान किया था कि पर्दे के पीछे भी कुछ ताकतें हैं जो भारत में क्रिकेट को जिंदा रखना चाहती हैं।
अगले दिन वह आदमी हमसे मिला तो खुश हो गया और बोला-‘यार, तुम गजब की जानकारी रखते हो। यह तो बताओ कि तुम्हारे ब्लाग का नाम क्या है? मैं अपने लड़के से कहकर उसे देखा करूंगा क्योंकि वह घर पर कंप्यूटर पर काम करता है।’
हमने उससे कहा कि ‘अरे, कोई खास ब्लाग नहीं है। ऐसा ही है।
उसे टरकाना जरूरी था। क्रिकेट में जिस तरह देशभक्ति घुस गयी है उसके बाद किसी से इस विषय पर चर्चा करना ठीक नहीं लगता जब तक वह समान विचार वाला न हो। ऐसे में अपने ब्लाग पर जो हमने लिखा है वह उसे नापसंद भी हो सकता है।
पाकिस्तान को रौंद डालो का नारा खत्म हुआ तो अब आया कि लंकादहन कर डालो।’
पता नहीं किसकी सीता अपहृत हो गयी है। फिर सुना है कि मुंबई में बीसीसीआई की टीम के साथ श्रीलंका की टीम का फायनल मैच देखने के लिये वहां के राष्ट्रपति राजपक्षे आ रहे हैं। गनीमत है उनको हिन्दी नहीं आती भले ही उनका नाम कर्णप्रिय संस्कृतनिष्ठ है। उनको शायद ही कोई बताये कि देखिए यह भारत के हिन्दी प्रचार माध्यम क्या उल्टा सीधा बकवास कर रहे हैं।
लंकादहन सीता हरण का परिणाम था और यकीनन वहां के लोगों से अब हमारा कोई ऐसा धार्मिक या सांस्कृतिक बैर नहीं है। ऐसे में इस तरह धार्मिक प्रतीकों का उपयोग करना अत्यंत निंदनीय लगता है। पाकिस्ताने से साठ साल पुराना बैर है पर श्रीलंका के साथ कोई ऐसा विवाद नहीं रहा जिसे उसके दुश्मन घोषित किया जाये।
पाकिस्तान जब हारने लगा था तब यही प्रचार माध्यम खेल को खेल की तरह देखें का नारा लगाने लगे थे जबकि बैर की आग भी उसीने लगायी थी। अगर श्रीलंका मैच हार गया तो फिर कोई नहीं कहेगा कि ‘हमारी टीम ने लंकादहन कर लिया।’ वजह तब तक तो लोगों की भावनाओं का नकदीकरण तो हो चुका होगा न!
सुनने में आया कि आईसीसी के आदेश पर फायनल मैच में वानखेड़े स्टेडियम में मीडिया का प्रवेश रोक दिया गया। इस पर टीवी चैनलों ने बावेला मचाया। अशोक मल्होत्रा ने राय दी कि ‘तुम प्रचार माध्यम भी क्रिकेट का बहिष्कार कर दो क्योंकि यह तुम्हारे दम पर ही हिट है।’
सच तो यह है कि यही हिन्दी प्रचार माध्यम लोगों को बरगलाकर भीड़ जुटा रहे हैं वरना क्या आईसीसी और क्या बीसीसीआई, कभी भी 2007 के बाद क्रिकेट को इस देश में जिंदा नहीं रख सकते थे। मोहाली के मैच में हमने ब्लाग पर पचास से साठ फीसदी पाठ पठन तथा पाठक संख्या कम दर्ज पाई। इसका मतलब यह कि इंटरनेट पर सक्रिय एक बहुत बड़ा वर्ग क्रिकेट के चक्कर में फंस गया था। यह सब इन्हीं प्रचार माध्यमों का प्रभाव था। आईसीसी ने फायनल में अपने ही अघोषित मित्रों पर पाबंदी लगा दी। प्रचार माध्यम चाहते तो आज ही बदले की कार्यवाही करते हुए क्रिकेट की खबरों से किनारा कर लेते। अशोक मल्होत्रा की सलाह से पहले ही यह काम करते तो आईसीसी वाले पांव छूकर माफी मांग लेते। मगर हुआ क्या? प्रदर्शन करने पहुंच गये। फिर आईसीसी वालों ने यह बैन हटा दिया और उनको अभ्यास के साथ ही मैच देखने की अनुमति दे दी। सो प्रचार माध्यमों ने माफ कर दिया। अपने साथ हुई बदसलूकी भूल गये। आईसीसी वाले जानते हैं कि भारतीय प्रचार माध्यम क्रिकेट की कतरन पर ही जिंदा है। गाहे बगाहे फिल्म वाले भी इन प्रचार माध्यमों के कर्मियों को जलील करते हैं क्योंकि उनकी कतरनें भी समाचारों का हिस्सा बनती हैं। प्रचार तंत्र के मालिकों को कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि उनकी तो हमेशा ही पूजा होती है। जलील तो सामान्य वर्ग के कर्मचारी ही होते हैं। ऐसे में समाचार और विश्लेषण वाचक आक्रामक होने की बात तो कर सकते हैं पर खबरों से किनारा नहीं कर सकते। अगर ऐसा करेंगे तो एक घंटे में पांच मिनट तक ही चल पायेंगे। मालिक अधिक खर्चा नहीं कर सकते। कर्मचारी भगत सिंह की तरह शहीद होने की बात कर सकते हैं पर हो नहीं सकते और मालिक तो सोच भी नहीं सकते क्योंकि वह तो क्रिकेट से जुड़े उसी संयुक्त उपक्रम का हिस्सा हैं जो आज भी अंग्रेजों के मार्ग पर चलता है और बागी को कंगाल बना देता है। सो यह प्रचार माध्यम एक दिन शहीद दिवस पर भगतसिंह को याद कर लेंगें बाकी समय तो क्रिकेट का भगवान ही पूजते रहेंगे जिससे उनको सहारा है जिसके बल्ले से प्रचार कार्यक्रमों की सामग्री मुफ्त में मिलती है।
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