Tuesday, May 12, 2009

गरीब की भूख के कद्रदान-हिंदी शायरी (garib ki bhookh ke kadradan-hindi vyangya kavita)

हक की बात करते हैं लोग सभी
फर्ज पर बहस नहीं करते कभी।।

अपने फायदे के लिये बनाये कायदे
वह भी मौका पड़े, याद आते हैं तभी।।

दिखाने के लिये लोग अहसान करते हैं
नाम मदद, पर कीमत मांगते हैं सभी।।

रोटियों का ढेर भले भरा हो जिनके गले तक
उनकी भूख का शेर पिंजरे में नहीं जाता कभी।।

नारों से पेट भरता तो यहां भूख कौन होता
दिखाते हैं सब, पेट में नहीं डालता कोई कभी।।

गरीब के साथ जलना जरूरी है, भूख की आग का
उसके कद्रदानों की रोटी पक सकती है तभी।।

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1 comment:

संगीता पुरी said...

बिल्‍कुल सटीक लिखा है ..

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