Wednesday, July 29, 2009

खास आदमी बनने का मोह-हिंदी व्यंग्य (khas admi banne ka moh-hindi vyangya

सच तो यह है कि जिंदगी वही लोग मजे से गुजारते हैं जिनको पता है कि वह कभी खास आदमी नहीं बन पायेंगे। जो लोग खास बनने का ख्वाब पालते हैं वह अपनी पूरी जिंदगी जद्दोजेहद करते हैं। अब यह अलग बात है कि किसी को खास बनना नसीब होता है तो कुछ लोग केवल इस भ्रम में गुजार देते हैं कि वह ‘खास आदमी’ है। निश्चित रूप से यह लोग उस मध्यम वर्गीय परिवारों के होते हैं जो अंग्रेजी की गुलामी से सराबोर शिक्षा के साथ अपने पास उपलब्ध धन को विलासिता में खर्च करने का सामथ्र्य रखते हैं।
वैसे तो इस देश का पूरा शिक्षित समाज ही इसी गुलामी वाली शिक्षा पद्धति से संपन्न है पर इनमें भी कुछ लोग हैं जो यह मानकर चलते हैं कि वह एक आम परिवार में पैदा हुए हैं और उन्हें खास आदमी बनने के अवसर कभी प्राप्त नहीं होगा। ऐसे लोग अगर लेखक, पत्रकार,चित्रकार या किसी अन्य कला में पारंगत होते हैं तो एकदम सहजता से काम करते हुए चले जाते हैं। इसके विपरीत जो गुणीजन अपने अंदर आम परिवार के होने के बावजूद खास होने का सपना पालते हैं उनके लिये यह जिंदगी असहज और खतरनाक हो जाती है।
ऐसे अनेक लोग हैं जो पहले हिंदी फिल्मों में नायक, गायक, शायर बनने के लिये घर से भागे पर वहां जाकर उनको पता लगा कि ‘जीरो से हीरो’ बनने की कहानी तो केवल फिल्मों में दिखाई जाती है वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता। एक टीन का काम करने वाले दुकानदार का लड़का मुंबई भाग गया। कई दिनों के बाद वह घर लौटा और अपने बाप के काम में हाथ बंटाने लगा।
एक ने उसके बाप से पूछा-‘अच्छी बात है, लड़का मुंबई से लौट आया। इसे दुकान का काम सिखाओ। इसे समझाओ फिल्मों में ऐसे काम नहीं मिलता।’
इससे पहले बाप कुछ बोले वह लड़का स्वयं बोला-‘कैसे नहीं मिलता? मैं तो अभी ऐसे ही आया हूूं। वहा फिल्मों में काम करता हूूं। अभी छुट्टी लेकर आया हूं।’
वह आदमी भी फिल्म देखने का आदी था। उसने पूछा‘किस फिल्म में काम किया है? जरा बताओ तो सही।’
उसने फिल्म का नाम बताया तो वह आदमी चैंक गया और बोला-‘उसे तो मैं तीन बार देख चुका हूं। तुम्हारा चेहरा याद नही आ रहा।’
वह लड़का बोला-‘उस फिल्म में जब हीरो स्टेशन पर था तब उसके पास रेल कर्मचारी की नीली ड्रेस पहनकर मैं खड़ा रहा था। उसने मुझसे रास्ता पूछा मैंने उंगली उठाकर उसे बताया था।’
उस आदमी को याद आया। वह बोला-‘हां, पर उसमें तुम्हारा चेहरा शायद सीधे कैमरे की तरफ नहीं था। केवल एक सैकण्ड का दृश्य था। अरे, वह तो एक ऐसे ही रोल है जो मजदूरनुमा लोगों को दिया जाता है। दूसरी किसी फिल्म में भी काम किया है?’
उसने कहा-‘हां, पर वह अभी आनी है।’
वह लड़का कुछ दिन बाद फिर मुंबई गया। फिर लौट आया। वह न धंधे का रहा न फिल्म लाईन का! बचपन में उसे हमने देखा था और उसका यह प्रभाव हम पर पड़ा कि फिर खास आदमी बनने का मोह कभी नहीं रहा।
फिल्मी कहानियों में हीरो से जीरो बनने वाली कहानियां देखकर खूब आनंद उठाया पर कभी यह नहीं सोचा कि हम भी कभी खास आदमी बनेंगे।
समय के साथ हमारा यह विश्वास पक्का होता चला गया। वैसे आजकल की पीढ़ी के सदस्य अधिकतर समझदार हैं। लेखक, फिल्म, संगीत, साहित्य पत्रकारिता और समाज सेवा में भी आजकल वंश परंपरा चल पड़ी है। जड़ता को प्राप्त इस समाज मेें बहुत कम लोग यह मानकर चलते हैं कि उनको खास श्रेणी मिलेगी।
वैसे आम आदमी बने रहने के अलग मजे हैं। खास आदमी की श्रेणी पाना जहां लगभग असंभव है वहां आम आदमी बनकर ही मजे लिये जायें तो एक बहुत अच्छा है। ऐसे में खास लोगों की गंभीर क्रियायें भी हास्य का बोध कराती हैं। अगर आप चित्रकार, पत्रकार, लेखक या कलाकार हैं तो अपना काम करने के बाद आम आदमी की भीड़ में शामिल हो जाईये। अपने से कमतर लोगों की पूजा होते देख दुःखी मत होईये। हंसिये! जो पुज रहा है जो पूज रहा है दोनों के चेहरे पर कृत्रिम प्रसन्नता का भाव देखकर आप हंसे नहीं तो इसका मतलब यह है कि आप पर खास न होने का अफसोस राज्य कर रहा है। यह आपके स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। अपनी रचना-चित्र, साहित्य कृति या संगीत और स्वर से परिपूर्ण गीत-करने के बाद आप उसे भूल जाईये। उसे भीड़ में जाने दीजिये। लोगों को उसका मजाक उड़ाते हुए देखिये। यह मजाक उनके अंदर मौजूद कुंठाओं से पैदा होता है जो उनके स्वयं के असहाय होने को प्रमाण हैं।
जो खास नहीं बने उन पर तरस खायें पर जो खास हो गये उनको भी देखिये वह बिचारे बार बार इस प्रयास में रहते हैं कि लोग उनको खास समझते रहेें। आदमी उनको खास समझ रहा है पर उनको यह खौफ रहता है कि कहीं उनको लोग भूल न जायें। इस चक्कर में उलूलजुलूल हरकतें करते हैं।
उस दिन हमें एक सहधर्मी व्यंग्यकार मिल गये जो कि हमारे आलोचक भी हैं। हम पर फिकरे कसते रहते हैं और हम भी उनका पीछा नहीं छोड़ते क्यांेकि कई व्यंग्य तो उनसे ही उपहार में मिल जाते हैं। उस दिन वह स्कूटर रोककर एक दुकान से कंगा खरीद रहे थे। हम भी उसी बाजार में थे और उनको देख लिया और लपककर पहुंच गये। सोचा कि दो चार सुना लेगा तो क्या एक दो व्यंग्य का विषय भी तो दे जायेगा। हमें देखकर ही उसका मूंूह सूख गया।
‘यार, तुम्हें शर्म भी नहीं आती! चाहे जब सामने आ जाते हो।’ वह बोला।
हमने कहा-‘यार, इधर विषय का अकाल है। सोचा तुमसे एक दो व्यंग्य रचना ही मिल जाये। चलो तुमने एक हास्य कविता का विषय तो दे दिया।’
वह गुस्से में बोला-‘अरे, हास्य कवि! कितने कवि सम्मेलनों में जाता है? कभी तेरा नाम ही नहीं सुना। तू हमसे बराबरी मत कर। अभी रेडियो पर साक्षात्कार के लिये जा रहा हूं। फिर आकर तेरे से बात करूंगा।’
हमने पूछा-‘यह रेडियो पर साक्षात्कार पर जाने के कारण ही यह कंगा क्यों खरीद रहे हो? जेब में रखा करो। वैसे तुम्हारे सिर पर बाल इतने कम है कि हाथ से ही कंगी हो जाती। वैसे कौनसे रेडियो पर तुम्हारा साक्षात्कार आयेगा।’
वह बोला-‘नहीं बताऊंगा! तुम चालाक हो। मैंने उस दिन अखबार में तुम्हारा व्यंग्य पढ़ा था। तुमने मेरी बातों से ही व्यंग्य चुरा लिया था।’
हमने कहा-‘यह साक्षात्कार किस रेडियो पर आयेगा।’
वह बोला-‘नहीं बताऊंगा! तुम मेरे साक्षात्कार में बहुत सारी सामग्री व्यंग्य में परिवर्तित करोगे।’
हमने कहा-‘यार, हमारा भी साक्षात्कार प्रसारित करा दो। तुम हमारे मित्र हो!’
वह बोला-‘पहले तो मित्र कहकर मेरा अपमान मत करो! मैं तुम्हें कभी अपना मित्र नहीं समझता। मेरी बातों से व्यंग्य निकालकर लिखो और मित्र भी कहो-यह संभव नहीं है। फिर साल छह महीने में एकाध बार अखबार में छप जाने से कोई बड़े लेखक नहीं बन जाते।’
वह स्वयं भी कोई अधिक छपने वालों में नहीं है। हमारी तरह ही एक आम आदमी की तरह उसका जीवन है पर खास होने का मोह उससे नहीं छूटता। हालांकि वह कभी कभी ऐसी बात कर जाता है जो दिल को छू जाती है। हमने पूछा-‘तो कैसे बनते हैं बड़े लेखक!’
वह जोर से हंस पड़ा-‘अरे, यार अगर मुझे पता होता तो खुद ही नहीं बन जाता।’
उसके बाद वह सामान्य होकर हाथ मिलाते हुए वहां से चला गया। उसकी आखिरी बात हमें बहुत अच्छी लगी।
खास आदमी बनने का मोह छोड़ने के बाद आदमी स्वयं ही स्वतंत्र हो जाता है। उस पर किसी प्रकार का दबाव नहीं रहता। वरना तो किसी खास आदमी की चाटुकारिता और झूठी प्रशंसा करते रहो वह खास बनाने से रहा। वह तो केवल अपने लिये उपयोग करता है। यह अलग बात है कि कुछ खास लोगों का चमचा होना भी आजकल कोई कम उपलब्धि नहीं है। मगर यह भी सच है कि अपनी आत्मा को मारकर ही चाटुकारिता हो सकती है।
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Saturday, July 25, 2009

अंग्रेजी ब्लाग के बीच हिंदी ब्लाग क्या करेगा-आलेख (inglish and hindi blog-hindi article)

विलियम्स नाम के 43 वर्षीय उस मानवाधिकार कार्यकर्ता ने पता नहीं क्या सोचकर इस लेखक के हिंदी ब्लाग को अपने ब्लाग से लिंक कर लिया? उसने सुबह लिंक दिया था तब सोचा कि शायद जल्दबाजी में गलती कर गया होगा। फिर शाम को देखा तो उसका ईमेल टिप्पणी के रूप में देखा। इसका मतलब वह जानता है कि उस ब्लाग में क्या है! उसकी टिप्पणी से पता लग जाता है उसे इसके अध्यात्मिक ब्लाग होने का पता है। उसके ब्लाग पर अपना पाठ देखकर हैरानी हुई। आखिर उसके अंग्रेजी पाठक हिंदी का ब्लाग कैसे पढ़ेंगे? उसकी टिप्पणी नीचे लिखी हुई जिसका पूरा अर्थ देखने के लिये लेखक को भी डिक्शनरी देखनी होगी।
William मुझे
विवरण दिखाएँ ७:०२ am (1 दिन पहले) उत्तर दें
William has left a new comment on your post "भर्तृहरि नीति शतक-चमचागिरी से कोई लाभ नहीं होता (c...":
by the way, Deepak Bartdeep, I will remember to salt the meat for abdominal digestibility also. Just remember oh spiritual leader, human rights apply to you to!
Posted by William to दीपक भारतदीप की हिंदी एक्सप्रेस पत्रिका at 25 July, 2009


यकीनन उसे स्वयं भी हिंदी नहीं आती होगी। उसने जरूर अनुवाद टूल के सहारे उसे पढ़ा है और उसे लगा कि शायद यह ब्लाग भी उसका आवागमन बढ़ाने में सहायक होगा या संभव है कि वह कोई मानवाधिकारों से संबंधित कोई लक्ष्य लेकर बढ़ रहा हो। यह मानना गलत होगा कि वह अंग्रेजी का ब्लाग लेखक है तो उसके पास पाठकों आवगमन अधिक होगा क्योंकि लगातार यह बातें आती रहती हैं कि अनेक ब्लागों को पढ़ने वाला एक ही आदमी है। बहरहाल यह दिलचस्प है कि अंग्रेजी और अंग्रेजों के बीच हिंदी अपनी जगह बनाने का प्रयास कर रही है। इस विषय में एक हिंदी ब्लाग लेखक ने एक दूसरे लेखक के ब्लाग पर यह टिप्पणी की थी कि ‘हिंदी नई भाषा है इसलिये यह आगे निश्चित रूप से बढ़ेगी’। वह शायद भूल गये होंगे पर इस लेखक को याद है।
एक अंग्रेजी ब्लाग लेखक द्वारा हिंदी ब्लाग को लिंक करना कोई बड़ी बात नहीं है पर इस बात का संकेत तो है कि भाषा और लिपि की दीवारें अब कमजोर हो रही है। इस लेखक का यह चैथा ब्लाग है जिसे किसी अन्य भाषा के ब्लाग ने लिंक किया है। तीन अरेबिक लिपि के हैं पर भाषा का पता नहीं है। अलबत्ता वह सभी वर्डप्रेस के हैं इसलिये अधिक विचारणीय नहीं लगता पर यह ब्लाग स्पाट का पहला ब्लाग है जिसे किसी अंग्रेजी ब्लाग लेखक ने लिंक दिया है। ऐसा लगता है कि उस ब्लाग लेखक ने यह उम्मीद की होगी कि अनुवाद टूलों के सहारे उसके पाठक हिंदी भी पढ़ लेंगे। यह भी संभव है कि वह इसी आशा के सहारे हिंदी में भी पाठक ढूंढना चाहता हो।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भविष्य में ब्लाग लेखन पूरे विश्व में एक महत्वपूर्ण सकारात्मक भूमिका निभाने वाले हैं। अनेक सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों का जन्म इन्हीं ब्लाग लेखकों के मध्य से होगा। भाषा और लिपि की दीवारें गिरी तो कई ऐसे भ्रमों और मिथकों का ढहना भी तय है कि जो उनके सहारे टिके हुए हैं। ऐसे में हिंदी की अध्यात्मिक शक्ति ही है जो भाषा को बचाये रख सकती है।
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Friday, July 24, 2009

आयु के साथ तय होता है मनोरंजन का स्वरूप-आलेख (age fector and enternment-hindi article)

वह कौनसी संस्कृति और संस्कार है जिसके नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया है जिसे बचाने के लिये इतने सारे बुद्धिजीवी लगे हुए हैं। सविता भाभी नाम की वेबसाईट और सच का सामना नाम का एक धारावाहिक इतने खतरनाक नहीं हो सकते कि वह भारतीय संस्कृति को नष्ट कर दें। भारतीयों की ताकत उनका ध्यान है जो वह अध्यात्मिक ज्ञान से अर्जित करते हैं। भारत के प्राचीन ग्रंथों में कहीं इसकी चर्चा नहीं है कि जुआ, अश्लीलता या यौन विषयों पर प्रतिबंध लगाया जाये।
हमारे प्राचीन ग्रंथ आत्मनियंत्रण का संदेश देते हैं पर यह अपेक्षा नहीं करते कि राज्य इसके लिये कार्यवाही करे। इन्हीं ग्रंथों में योग साधन, प्राणायम, ध्यान और मंत्रों की विधियां बतायी गयी हैं जिनसे शरीर और मन पर नियंत्रण रखा जा सकता है। इस देश के अधिकतर लोग आत्मनिंयत्रण के द्वारा ही जीवन व्यतीत करते हैं और इसी कारण ही भारतीय समाज विश्व का सबसे योग्य समाज भी माना जाता है। तीन प्रकार की प्रवृत्तियों के लोग-सात्विक, राजस और तामस-इस धरती पर हमेशा रहेंगे यह बात बिल्कुल स्पष्ट है। आचार विचार, रहन सहन, और खान पान के आधार आदमी की प्रवृत्तियां निर्धारित करती हैं और वह इन्हीं से पहचाना भी जाता है।
आदमी के अपराधों से निपटने का काम राज्य का है और सामान्य आदमी को स्वयं पर ही नियंत्रण रखना चाहिये। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है या कह रहा है इससे अधिक आदमी अगर स्वयं पर ध्यान दे तो अच्छा है-यह हमारे ग्रंथों का स्पष्ट मत है।

समाज को संभालने का काम गुरु करें यह भी स्पष्ट मत है। फिर फिल्मों, धारावाहिकों, किताबों और वेबसाईटों का प्रभाव हमेशा क्षणिक रहता है उनमें इतनी ताकत नहीं है कि वह पूरा समाज बिगाड़ सकें-कम से कम भारतीय समाज इतना कमजोर नहीं है। यह समाज जीवन के सत्य और रहस्यों को जानता है जो समय समय पर महापुरुष इसे बता गये हैं। इसके बावजूद इस समाज को कमजोर मानने वाले भ्रम में हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह भ्रम उस बौद्धिक समाज को है जो शरीरिक श्रम से परे है। शारीरिक से परे आदमी को भय, आशांकायें और संदेह हमेशा घेरे रहते हैं। यही चंद लोग ऐसी फिल्मों, वेबसाईटों,धारवाहिकों और साहित्य से चिपका रहता है जो आदमी के मन में पहले सुख और बाद में संताप पैदा करता है। जो श्रम करने वाले लोग हैं ऐसा वैसा सब देखकर भूल जाते हैं पर बुद्धिजीवियों के चिंतन की सुई वहीं अटकी रहती है-यह तय करने में कि समाज इससे बिगड़ेगा कि बनेगा!
खासतौर से जिनकी उम्र बढ़ी हो गयी है या फिर जिनको समाज सुधारने का ठेका मिल गया है वह ऐसे सभी स्तोत्रों पर पर प्रतिबंध की मांग करते हैं जिनसे युवा मन विचलित होने की आशंका रहती है।

यह समस्या तो पूरे समाज में है। हर बुढ़े को आजकल के युवा असंयमित दिखते हैं तो हर बुढ़िया को युवती अहंकारी नजर आती है। बुढ़ापे में आदमी का अहंकार अधिक बढ़ जाता है और वह पुजना चाहता है। हम बरसों से सुन रहे हैं कि ‘जमाना बिगड़ गया है।’ हम छोटे थे तो समझते थे कि ‘वास्तव में जमाना बिगड़ गया होगा। अब देखते हैं तो सोचते हैं कि जमाना ठीक कब था। कहते हैं कि घोर कलियुग है पर बताईये सतयुग कब था? रावण त्रेतायुग में हुआ और कंस द्वापर में हुआ। अगर वह युग ठीक था तो फिर उनमें ऐसे दुराचारी कहां से आ गये? कुछ लोग कहते हैं कि उस समय आम आदमी में धर्म की भावना अधिक थी। अब क्या कम है? आम आदमी तो आज भी भला है-उसकी चर्चा अधिक नहीं होती यह अलग बात है। फिर आजकल के प्रचार माध्यम सनसनी फैलाने के लिये खलपात्रों में ही अच्छाई ढूंढते नजर आते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बुढ़ापे में जमाना सभी को भ्रष्ट नजर आता है।
जहां तक यौन और अश्लील साहित्य का सवाल है तो वह चालीस सालों से हम बिकते देख रहे हैं। वह बिकता भी खूब था। अनेक लोग पढ़ते थे पर फिर भी चालीस सालों में ऐसा नहीं लगता कि उससे जमाना बिगड़ गया। उम्र के हिसाब से आदमी चलता है। अनेक युवाओं ने ऐसा साहित्य पढ़ा पर अब उनमें से कई ऐसे भी हैं जो मंदिरों में दर्शन करने के लिये जाते हैं। युवा मन हिलोंरे मारता है। वह ऐसा देखना चाहता है जो नया हो। उस समय हर कोई हर युवा अपने हमउम्र विपरीत लैंगिक संपर्क बढ़ाना चाहता है। युवावस्था में विवाह होने पर जीवन साथी के प्रति दैहिक आकर्षण चरम पर पहुंच जाता है। समय के साथ वह कम होता जाता है पर प्रेम यथावत रहता है क्योंकि मन में तब एक स्वाभाविक प्रेम की ग्रंथि है जो एक दूसरे को बांधे रहती है। यह व्यक्तिगत संपर्क कभी समाज के लिये देखने की चीज नहीं होता बल्कि सभी लोग अपनी बात ढंके रहते हैं पर दूसरे के घर में झांकने की उनके अंदर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो हर मनुष्य मनोरंजन पैदा करती है।
आदमी में मन है तो उसे मनोरंजन की आवश्यकता होती है। मनोरंजन का स्वरूप आयु के अनुसार तय होता है। युवावस्था में यौन विषय नवीनतम और आकर्षक लगता है तो अधेड़ावस्था में दौलत और शौहरत का नशा चढ़ जाता है। बुढ़ापे में जब शरीर के अंग शिथिल होते हैं तब सम्मान पाने का लोभ आदमी में पैदा होता है। ऐसे में आदमी दूसरे की निंदा और आत्मप्रवंचना कर अपने आपको दिलासा देता है कि वह अपना सम्मान बढ़ा रहा है। ऐसे मेें युवाओं के मनोरंजन के साधन उनको भारी तकलीफ देते हैं भले ही अपनी युवावस्था में वह भी उनमें लिप्त रहे हों।

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कोई व्यक्ति या समूह किसी दूसरे को हानि नहीं पहुंचा रहा है तो उसे अपनी आयु के अनुसार मनोरंजन प्राप्त करने का अधिकार है। यह समाज की एक सहज प्रक्रिया होना चाहिये। युवाओं के मन को किस प्रकार का मनोरंजन चाहिये यह तय करने का अधिकार उनको है न कि अधेड़ और बूूढ़े इसका निर्धारण करें। यहां यह भी याद रखने लायक बात है कि बड़ी आयु के लोग ही छोटी आयु के लोगों में संस्कार भरने का प्रयास करते हैं। इसलिये गुरु भी कहलाते हैं। यह उनकी जिम्मेदारी है कि वह उनकी मन के पर्वत को मजबूत बनायें जिससे निकलने वाली मनोरंजन की नदी विषाक्त न हो भले ही वह यौन साहित्य वाले शहर से निकलती हो। इसकी बजाय उनको जबरन रोकने की चाहत एक मजाक ही है। सच तो यह है कि कभी कभी तो यह लगता है कि कुछ उत्पाद इसलिये ही लोकप्रिय हो जाते हैं कि उनका विरोध अधिक होता है। यह विरोध प्रायोजित लगता है। वेबसाईट पर प्रतिबंध और धारावाहिक के विरोध के बाद उनकी सार्वजनिक चर्चा अधिक होना इस बात का संदेह भी पैदा करती है। इस तरह के विरोध युवाओं की तरफ से नहीं होते जो इस बात का प्रमाण है कि वह उनके लिये मनोरंजन का साधन हैं पर वह इससे विचलित हो जायेंगे यह भी नहीं सोचना चाहिये। चलते रहना इस दुनियां का नियम है।
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Sunday, July 19, 2009

भले होने का प्रमाण पत्र-हिंदी व्यंग्य कविता (certificat of good men-hindi vyangya kavita)

उसने पूछा
‘क्या तुम बुरे आदमी हो‘
जवाब मिला
‘कभी अपने काम से
कुछ सोचने का अवसर ही नहीं मिला
इसलिये कहना मुश्किल है
कभी इस बारे में सोचा ही नहीं।’

फिर उसने पूछा
‘क्या तुम अच्छे आदमी हो?’
जवाब मिला
‘यह आजमाने का भी
अवसर नहीं आया
पूरा जीवन अपने स्वार्थ में बिताया
कभी किसी ने मदद के लिये
आगे हाथ नहीं बढ़ाया
कोई बढ़ाता हाथ
तो पता नहीं मदद करता कि नहीं!’’
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अपने भले होने का प्रमाण
कहां से हम लाते
ऐसी कोई जगह नहीं है
जहां से जुटाते।
शक के दायरे में जमाना है
इसलिये हम भी उसमें आते।
सोचते हैं कि
हवा के रुख की तरफ ही चलते जायें
कोई तारीफ करे या नहीं
जहां कसीदे पढ़ेगा कोई हमारे लिये
वह कोई चिढ़ भी जायेगा
अपने ही अमन में खलल आयेगा
इसलिये खामोशी से चलते जाते।

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Wednesday, July 15, 2009

दिखाने के लिये दोस्त कहा जाता है-हिंदी शायरी (dost-hindi shayri)


बेसुरा वह गाने लगे।
किसी के समझ न आये
ऐसे शब्द गुनगनाने लगे।
फिर भी बजी जोरदार तालियां
मन में लोग बक रहे थे गालियां
आकाओं ने जुटाई थी किराये की भीड़
अपनी महफिल सजाने के लिये
इसलिये लोगों ने अपने मूंह सिल लिये
पहले हाथों से चुकाई ताली बजाकर कीमत
दाम में पाया खाना फिर खाने लगे।
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कमअक्ल दोस्त से
अक्लमंद दुश्मन भला
ऐसे ही नहीं कहा जाता है।
दुश्मन पर रहती है नजर हमेशा
दोस्त का पीठ पर वार करना
ऐसे ही नहीं सहा जाता है।
जमाने में खंजर लिये घूम रहा है हर कोई
अकेले भी तो रहा नहीं जाता है
इसलिये दिखाने के लिये
बहुत से लोगों को दोस्त कहा जाता है।

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Friday, July 10, 2009

गुजरात में जहरीली शराब से हुआ हादसा दर्दनाक-आलेख (gujarat men jaharili sharab-hindi article)

गुजरात भारत के संपन्न प्रदेशों में माना जाता है। वहां की औद्योगिक और सामाजिक प्रगति भारत देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाली है। गुजरात में शराब पर प्रतिबंध है। यह लेखक कभी गुजरात नहीं गया इसलिये पता नहीं कि शराब बेचने पर ही प्रतिबंध है या खरीदने पर भी। वैसे अगर प्रतिबंध का आशय माना जाये तो यह दोनों पर ही होना चाहिये।
इधर वहां के बारे में दो खबरें टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में देखने को मिली। एक तो ताजा है जिसमेें जहरीली शराब पीने से अनेक लोगों की मृत्यु हो गयी। कुछ दिन पहले एक खबर देखने को मिली थी जिसमें भीड़ ने रेल में शराब की बोतलें तस्करी कर गुजरात लाये जाने का विरोध करते हुए उनको तोड़ डाला। जिस तरह बोतलों का झुंड देखा उससे तो यह देखकर लगता था कि वह छुपाकर नहीं लायी जा रही थी।
गुजरात का समाज आर्थिक, सामाजिक और दृष्टि से अन्य राज्यों से कुछ अधिक शक्तिशाली हो सकता है पर भिन्न नहीं है। पूरे भारत में पश्चिमी सभ्यता ने प्रभाव डाला है और गुजरात उससे अछूता होगा यह कहना कठिन है। फिर हिंदी फिल्मों ने आदतों, रहन सहन, चाल चलन और चिंतन के विषय में पूरे देश मेें एक साम्यता ला दी है और यह संभव नहीं है कि गुजरात पर उसका प्रभाव न पड़ा हो। कहने कहा तात्पर्य यह है कि शादी और पर्वों पर जिस तरह अन्य प्रदेशों में लोग शराब पीकर जश्न मनाते हैं गुजरात के लोग सूखे रहें यह संभव नहीं लगता। इसका आशय यह है कि शराब पर प्रतिबंध केवल नाम का ही रहा होगा। शराब पर प्रतिबंध से सीधा आशय तो यही होना चाहिये कि वहां इसका व्यवसाय ही न हो-न खरीदना न बेचना-पर जिस तरह यह दोनों घटनायें देखने को मिली उससे तो नहीं लगता कि वहां शराब अन्य प्रदेशों से अनुपात में कम उपलब्ध होगी।
शायद गुजरात देश का पहला एकमात्र प्रदेश है जहां शराब पर प्रतिबंध है। इसका कारण यह है कि भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी वहीं के थे और वह शराब के विरोधी थे। कहने को तो वह पूरे राष्ट्र के पिता थे पर जब शराब की बात आई तो उनका सम्मान केवल गुजरात तक ही सिमट गया।
महात्मा गांधी शराब के विरोधी थे पर क्या वह इस तरह प्रतिबंध के समर्थक भी थे इसकी जानकारी तो इस लेखक को नहीं है। मुद्दे की बात यह है कि शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध संभव नहीं है। अगर आप अंग्रेजी शराब पर प्रतिबंध भी लगायें पर देश के कई ऐसे आदिवासी और जनजातीय समुदाय हैं जो शराब का सेवन धार्मिक अवसरों प्रसाद की तरह करते हैं और उनको रोका नहीं जा सकता। आदिवासी और जनजातीय समुदाय को अपनी शराब बनाकर पीने की शायद किसी सीमा तक कानूनी छूट भी है।
महात्मा गांधी ने शराब का विरोध जिस समय प्रारंभ किया था उस समय आधुनिक धनी और मध्यम वर्गीय लोग शराब का सेवन गंदी आदत की तरह मानते थे। महात्मा गांधी ने दादाभाई नौरोजी के आग्रह पर तत्काल स्वाधीनता संग्राम प्रारंभ करने से पहले दो वर्ष तक देश का दौरा किया तो यह पाया कि जिस तबके के सहारे वह आजादी की जंग लड़ना चाहते हैं वह आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से निम्न स्तर पर खड़ा है और उसके उद्धार के बिना आजादी मिल जाये तो भी वह निरर्थक होगी। गरीब और निम्न वर्ग के संकट का सबसे बड़ा कारण शराब ही है-यह आभास उनको हो गया था। यही कारण है कि उन्होंने शराब का विरोध किया।
अब समय बदल गया है। शराब अब धनी, आधुनिक और सभ्य होने के तौर पर उपयोग की जाने लगी है। ऐसे में गुजरात में लोग पूरी तरह से शराब का सेवन न करे यह संभव नहीं लगता। फिर वहां अन्य प्रदेशों से भी लोग कामकाज की तलाश में गये हैं और उनमें अनेक लोग शराब के मामले में स्वयं पर प्रतिबंध लगायें यह संभव नहीं है। इधर जहरीली शराब की घटना ने वाकई देश को हिलाने के साथ चैंका भी दिया है।
हम यह मानते हैं कि शराब बहुत बुरी चीज है। इससे आर्थिक और शारीरिक हानि तो होती है मानसिक रूप से भी आदमी पंगु हो जाता है। मगर सवाल यह है कि इसके लिये लोगों को समझाने के लिये सामाजिक संगठनों को सक्रिय होना चाहिये कि जबरन प्रतिबंध लगाकर उसे अधिक संकटपूर्ण बनाया जाये। अनेक सामाजिक विद्वानों का मानना है कि जिस किसी समाज को किसी चीज के उपयोग करने से जबरदस्ती रोका जाये तो लोगों के मन में उसके प्रति रुझान अधिक बढ़ने लगता है। जहरीली शराब पीने से जितने लोग मरे हैं उससे तो लगता है कि वहां बड़े पैमाने पर उसका व्यवसाय होता है। शराब और खाना जहरीला होने से लोगों के मरने और बीमार पड़ने की घटनायें अत्यंत दारुण होती है। यह घटना अगर कहीं अन्य होती तो शायद इसको लोग अधिक महत्व नहीं देते क्योंकि अन्यत्र शराब पर प्रतिबंध नहीं है। इस घटना से पीड़ित लोगों के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हुए हम यही आशा करते हैं कि वह जल्दी इस हादसे से उबर कर आयें।
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Monday, July 6, 2009

समाजों का अंतर्द्वंद्व और अंतर्जाल-आलेख (hindi article)

यहां हम इस मुद्दे पर चर्चा नहीं करने जा रहे कि किसी अश्लील वेबसाईट पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये या नहीं और न ही इसके देखने या न देखने के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं बल्कि हमारा मुख्य ध्येय है यह है कि हम समाज के उस अंतद्वंद्व को देखें जिस पर किसी अन्य की नजर नहीं जा रही। यहां हम चीन और भारतीय समाजों को केंद्र बिंदु में रखकर यह चर्चा कर रहे हैं जहां इस तरह की अश्लील वेबसाईटों पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा है। भारत में तो केवल एक ही वेबसाईट पर रोक लगी है-जिसके बारे में अंतर्जाल के लेखक कह रहे हैं कि यह तो समंदर से बूंद निकलाने के बराबर है-पर चीन तो सारी की सारी वेबसाईटों के पीछे पड़ गया है।

कुछ दिनों पहले तक कथित समाज विशेषज्ञ चीन के मुकाबले दो कारणों से पिछड़ा बताते थे। एक तो वहां औसत में कंप्यूटर भारत से अधिक उपलब्ध हैं दूसरा वहां इंटरनेट पर भी लोगों की सक्रियता अधिक है। इन दोनों की उपलब्धता अगर विकास का प्रमाण है तो दूसरा यह भी सच है कि अंतर्जाल पर इन्हीं यौन साहित्य और सामग्री से सुसज्जित वेबसाईटों ने ही अधिक प्रयोक्ता बनाने के लिये इसमें योगदान दिया है। अंतर्जाल ने शिक्षा, साहित्य, व्यापार तथा आपसी संपर्क बढ़ाने मे जो योगदान दिया है उससे कोई इंकार नहीं कर सकता पर सवाल यह भी कि ऐसे सात्विक उद्देश्य की पूर्ति कितने प्रयोक्ता कर रहे हैं? यह लेखक ढाई वर्ष से इस अंतर्जाल को निकटता से देख रहा है और उसका यह अनुभव रहा है कि भारत में प्रयोक्ताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग केवल मनोरंजन के लिये इसे ले रहा है। इससे भी आगे यह कहें कि वह असाधारण मनोरंजन की चाहत इससे पूरी करना चाहता है। जिस तरह चीन सरकार आक्रामक हो उठी है तो उससे तो यही लगता है कि वहां भी इसी तरह का ही समाज है।
अनेक ब्लाग लेखकों ने यह बताया है कि यौन सामग्री वाली वेबसाईटों में ढेर सारी कमाई है और यह इतनी है कि गूगल और याहू जैसी कंपनियों के लिये भी कल्पनातीत है। कोई वेबसाईट दस माह में ही इतनी प्रसिद्ध हो जाती है कि उस पर प्रतिबंध लग जाता है। इसमें समाज के बिगड़ने की चिंता के साथ आर्थिक पक्ष भी हो सकता है। एक आश्चर्य की बात यह है कि दस माह में कोई वेबसाईट इतनी लोकप्रिय कैसे हो जाती है? निश्चित रूप से चीन ने अपने देश की बहुत बड़ी राशि बाहर जाने से रोकने के लिये ही ऐसा किया होगा। उसे रोकने के लिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास हो रहे हैं जो कि इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं इन प्रतिबंधों के पीछे आर्थिक कारण भी है।
भारत और चीनी समाज में बहुत सारी समानतायें हैं। अंतर है बस इतना कि यहां वेबसाईट पर प्रतिबंधों का विरोध मुखर ढंग से किया जा सकता है पर वहां यह संभव नहीं है। वैसे दोनों ही समाजों में बूढ़ों को सम्मान से देखा जाता है और यही कारण है कि समाज पर नियंत्रण के लिये उनकी राय ली जाती है। समस्या यह है आदमी जब युवा होता है तब वह यौन साहित्य छिपकर पढ़ाा है पर बूढ़ा होने पर युवाओं को पढ़ने से रोकना चाहता है। यही दोनों समाजों की समस्या भी है। इसके अलावा सभी चाहते हैं कि वह पश्चिम द्वारा बनाये आधुनिक साधनों का उपयोग तो करें पर उसके रहन सहन की शैली और नियम न अपनायें। सभी लोग भौतिक परिलब्धियों के पीछे अंधाधुंध भाग रहे पर चाहते हैं कि देश की संस्कृति और स्वरूप की रक्षा सरकार करे।
इसमें एक मजेदार विरोधाभास दिखाई देता है। भारत और चीन के समाजों में माता, पिता, गुरु और धर्म चारों ही हमेशा संस्कृति और संस्कार का आधार स्तंभ माना जाते हैं। माता को तो प्रथम गुरु माना जाता है जो बच्चे में संस्कार और संस्कृति के बीच बोती है। गुरुपूर्णिमा हमारे यहां मनायी जाती है पर अब पश्चिमी प्रभाव से माता पिता दिवस भी मनाने लगे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम संस्कृति के लड़खड़ाने की बात करते हैं तो क्या हमारा यह आशय है कि हमारे यह चारों स्तंभ अब काम नहीं करे रहे? अगर कर रहे हैं तो फिर युवाओं के बिगड़ने का भय क्यों सता रहा है? अगर नहीं कर रहे हैं तो फिर संस्कृति को बचाने की जरूरत ही क्या है?
सीधी बात तो यह है कि हम पश्चिमी साधनों को तो हासिल कर लेते हैं पर उसके उपयोग के नियमों को नहीं अपनाना चाहते। कंप्यूटर सभी जगह अपनाना जा रहा है पर उस पर काम करने के कायदे कहीं लागू नहीं है। कंप्यूटर अधिक काम करता है पर चलाता तो आदमी ही है न! मगर उसे भी कंप्यूटर मानकर उससे कैसे काम लिया जाता है? यह कौन देख रहा है? यही हालत हवाई जहाज की है। उसे उड़ाने वाले पायलटों का नियम से कितना चलाया जाता है? यह अलग से बहस का विषय है।
हम चलना तो चाहते हैं कि पश्चिम की खुले समाज की अवधारणा की राह पर अपनी शर्तों के साथ। हम कंप्यूटर और अंतर्जाल प्रयोक्ताओं की अधिक संख्या को विकास का प्रतीक मानकर चर्चा करते हैं पर क्या यह सच नहीं है कि लोगों के यौन साहित्य पढ़ने और देखने की ललक ही इसके लिये अधिक जिम्मेदार है। सही आंकड़े तो इस लेखक के पास नहीं है पर अनुमान से यह कह सकता है कि चीन ने यौन सामग्री की वेबसाईटों को अगर प्रभावपूर्ण ढंग से लागू किया तो यकीनन उसका इन दोनों मामलों में ग्राफ नीचे गिर सकता है। शिक्षा, साहित्य सृजन, रचनात्मक कार्य, आपसी संपर्क और व्यापार में इंटरनेट की अहम भूमिका है पर क्या उसके प्रयोक्ताओं के दम पर ही इतना बड़ा अंतर्जाल चल सकता है? यह विशेषज्ञों को देखना होगा।
हम अंतर्जाल के प्रयोक्ताओं को यह समझा सकते हैं कि टीवी, अखबार, बाहर मिलने वाली किताबों और सीडी आदि से जो काम चल सकता है उसके लिये यहंा आंखें न फोड़कर अपनी सात्विक जिज्ञासाओं के लिये इसका उपयोग करे। इसके लिये इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियों को प्रयास कर ऐसे लोगों को सहायता करनी होगी जो अपने रचनात्मक भूमिका से समाज के युवकों के मन में सात्विक जिज्ञासायें जगाये रख सकते हैं। यह काम कम से कम समाजों के वर्तमान शिखर पुरुषों का बूते का तो नहीं लगता जो उनके नेतृत्व करने का दावा तो करते हैं पर जब नियंत्रण की बात आती है तो वह लट्ठ और नियम के आसरे बैठ कर अपने मूंह से शब्दों की जुगाली करते हैं। समाज के नये संत तो अब वही बन सकते हैं जो इंटरनेट पर रचनात्मक काम करते हुए युवा पीढ़ी में सात्विक जिज्ञासा और इच्छा उत्पन्न कर सकते हैं-वह कोई पुराना धार्मिक या सामाजिक चोला पहनने वालों हों यह जरूरी नहीं है। हो सकता है कि यौन सामग्री और साहित्य प्रस्तुत करने वाली वेबसाईटों से इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियां इसलिये भी खुश हों कि वह उनके लिये प्रयोक्ता जुटा रही हैं पर इससे उनका भविष्य सुरक्षित नहीं हो जायेगा। जिस तरह आदमी समाचार पत्र पत्रिकाओं, किताबों, टीवी चैनलों और फिल्मों की यौन सामग्री से बोर होकर अंतर्जाल पर सक्रिय हो रहा है तो आगे उसमें वैसी विरक्ति भी आ सकती है। संभव है अन्य प्रचार माध्यम अपने यहां कुछ नया करें कि अंतर्जाल को प्रयोक्ता इसे छोड़कर वहां चला जाये। क्या यह दिलचस्प नहीं है कि हर मुद्दे को उठाकर सनसनी फैलाने और आजादी की दुहाई देने वाले टीवी चैनल और अखबार एक वेबसाईट पर प्रतिबंध लगने की तरफ से उदासीन हो गये हैं। उन्हें डर रहा होगा कि कहीं उस वेबसाईट का नाम लें तो उनका उपभोक्ता उसकी तरफ न चला जाये।
इंटरनेट में रचनात्मक काम, संवाद प्रेषण, साहित्य सृजन और व्यापार की संभावनायें और इस पर ही अधिक काम किया जाये तो इसमें निरंतरता बनी रहेगी। वेबसाईटों पर प्रतिबंध के क्या परिणाम है यह तो पता नहीं मगर यह बात निश्चित है कि पश्चिम में भी अंतर्जाल के विकास में इन्हीं यौन साहित्य और सामग्री से सुसज्तित वेबसाईटों को योगदान रहा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि पश्चिम में लोग अब अंतर्जाल यौन साहित्य से ऊब कर सात्विक विषयों की तरफ बढ़ रहे हैं। संभव है कि भारत और चीन में भी आगे यह हो पर तब इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियां रचनात्मक कर्म करने वाले लोगों को ढूंढती रह जायेंगी पर उनको वह मिलेंगे नहीं। रचनात्मक काम करना एक आदत होती है जिसे बनाये रखने के लिय सामान्य आदमी श्रम करता है तो धनी आदमी को उसमें विनिवेश करना चाहिये। हो सकता है कि लेखक की यह सोच औार धारणायें गलत हों पर अंतर्जाल पर जो अनुभव पाया है उसके आधार पर लिख रहा है। यह लेखक कोई ब्रह्मा तो है नहीं कि उसका सत्य अंतिम मान लिया जाये।
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Friday, July 3, 2009

आशिक, माशुका और महबूब-हास्य कविता (ashiq, mashuka & mahboob-hasya kavita)

श्रृंगार रस का कवि
पहुंचा हास्य कवि के पास
लगाये अच्छी सलाह की आस
और बोला
‘यार, अब यह कैसा जमाना आया
समलैंगिकता ने अपना जाल बिछाया।
अभी तक तो लिखी जाती थी
स्त्री पुरुष पर प्रेम से परिपूर्ण कवितायें
अब तो समलिंग में भी प्रेम का अलख जगायें
वरना जमाने से पिछड़ जायेंगे
लोग हमारी कविता को पिछड़ी बतायेंगे
कोई रास्ता नहीं सूझा
इसलिये सलाह के लिये तुम्हारे पास आया।’

सुनकर हास्य कवि घबड़ाया
फिर बोला-’‘बस इतनी बात
क्यों दे रहे हो अपने को ताप
एकदम शुद्ध हिंदी छोड़कर
कुछ फिल्मी शैली भी अपनाओ
फिर अपनी रचनायें लिखकर भुनाओ
एक फिल्म में
तुमने सुना और देखा होगा
नायक को महबूबा के आने पर यह गाते
‘मेरा महबूब आया है’
तुम प्रियतम और प्रियतमा छोड़कर
महबूब पर फिदा हो जाओ
चिंता की कोई बात नहीं
आजकल पहनावे और चाल चलन में
कोई अंतर नहीं लगता
इसलिये अदाओं का बयान
महबूब और महबूबा के लिये एक जैसा फबता
कुछ लड़के भी रखने लगे हैं बाल
अब लड़कियों की तरह बड़े
पहनने लगे हैं कान में बाली और हाथ में कड़े
तुम तो श्रृंगार रस में डूबकर
वैसे ही लिखो समलैंगिक गीत कवितायें
जिसे प्राकृतिक और समलैंगिक प्रेम वाले
एक स्वर में गायें
छोड़े दो सारी चिंतायें
मुश्किल तो हमारे सामने है
जो हास्य कविता में आशिक और माशुका पर
लिखकर खूब रंग जमाया
पर महबूब तो एकदम ठंडा शब्द है
जिस पर हास्य लिखा नहीं जा सकता
हम तो ठहरे हास्य कवि
साहित्य और भाषा की जितनी समझ है
दोस्त हो इसलिये उतना तुमको बताया।

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Wednesday, July 1, 2009

सच का संकट-हास्य व्यंग्य कविता (trouble of truth-hindi hasya poem)

उन्होंने निजी और सरकारी सेवकों का
एक ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ सम्मेलन बुलाया
जब पहुंचे उस जगह तो
वहां कोई नहीं आया।
अपने आमंत्रितों को फोन कर
उन्होंने कारण पता लगाया
किसी ने एक तो किसी ने
न आने का दूसरा बहाना बताया।
‘’यार, तुम भी कैसे समाज सेवक हो
किस विषय पर यह सम्मेलन बुलाया
सच यह है कि आज छुट्टी का दिन है
भूलना चाहते हैं वह सब
जो पूरे हफ्ते बिताया
दफ्तरों में गुजारे पलों को
तुम याद क्यों दिलाना चाहते हो
अपनी ऊपरी कमाई सभी को पवित्र लगती है
दूसरे की भ्रष्टाचार
सभी दौलत के पीछे हैं
ईमानदार का तो बस नकाब लगाया।
फिर वहां बरसेंगी भ्रष्टाचारियों पर गालियां
सभी की बीबी बच्चे बचायेंगे तालियां
आखिर सच कुरेदेगा लोगों का दिमाग
जिसकी अगले हफते पड़ेगी छाया
इसलिये सभी ने इस सच के संकट से
स्वयं को बचाया।’
एक हमदर्द ने उनको बताया।

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