Thursday, October 29, 2015

संसार का सच-हिन्दी व्यंग्य कविता(Sansar ka Such-HindiSatirePoem)


स्वार्थ के संबंध
लंबे समय तक
रह पाते हैं।

अर्थ का रस सूखते ही
कच्ची दीवारों की तरह
ढह जाते हैं।

कहें दीपकबापू रोना बेकार
मिलने वालों का बिछड़ना तय
निस्वार्थ भाव में नहीं होती लय
विरले होते जो संसार का सच
सह पाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com


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Sunday, October 18, 2015

नज़र और नज़रिये का खेल-हिन्दी कविता(Nazar aur Nazariye ka Khel-Hindi Kavita)

देखते हैं चेहरा
जब आईने में
हंसी नज़र नहीं आती।

देखते हैं आंखें झुकाकर
 पांव की एड़ियां
साफ नज़र नहीं आती।

कहें दीपकबापू नज़रिये का खेल
सभी समझ नहीं पाते
पर्दे के खेल पर ही
अपना मन रमाते
सामने नाचते पुतलों की
डोर थामने वाली उंगलियां
सभी की नज़र नहीं जाती।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Wednesday, October 7, 2015

पर्दे पर तस्वीर-हिन्दी कविता(Parde par Taswir)


नहाकर कर से निकलो
धुले कपड़ों पर हवा
धूल डाल ही जाती है।

कीचड़ को देखें
कितना भी घृणा से
कभी कमलमय हो ही जाती है।

कहें दीपकबापू अच्छाई से
बुराई का तुलना क्या करें
यहां तो आंखों के पर्दे पर
चल रही तस्वीर
पल भर में खो ही जाती है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Friday, October 2, 2015

दीपकबापूवाणी(DeepakBapuWani New type poem)


नया ज़माने में मौत भी बिकती, बदले में विज्ञापन लाती है।
दीपकबापूमस्ती से देख पर्दा, जहां खबरें धन बरसाती हैं।।
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यहां लाश की पहचान है धर्म, कातिल भी जात वाला होता है।
दीपकबापूजिंदा बुतों के खेल में, हर दिल घात वाला होता है।।
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कतरा कतरा कचड़ा बना पहाड़, तू उठ खड़ा हो उसे झाड़।
दीपकबापूबीमार बनने से पहले, उसका कलेजा तू फाड़।।
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कोई मांस खाये या घास चर जाये, अक्लमंद परेशान क्यों हैं।
दीपकबापू देव असुर की बस्ती यहां, झगड़े से हैरान क्यों हैं।।
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मुफ्त की रोटी खाने वाले इंसान, शांत वातावरण से ऊब जाते हैं।
दीपकबापूबाग में लगाकर आग,माली मन बहलाने में डूब जाते हैं।।
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आईना चेहरे का सच दिखाता, टूटा तो पांव में चुभ जायेगा।
दीपकबापूनीयत से न खेलो, बढ़िया सोच से शुभ आयेगा।।
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शत्रू मारते वीर सामने से, मित्र पीठ पीछे से झाड़े जाते हैं।
दीपकबापू फूल तोड़ते उंगली से, कांटे नीचे से फाड़े जाते हैं।।
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कर्मफल से घी  मिल जाये, वरना कोई भूखा कोई खाये रूखा।
दीपकबापू कब हंसें या रोयें, कहीं आनंद शब्द बहे कहीं सूखा।।
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दिन में आतंक का डर दिखायें, रात में मित्रता उससे निभायें।
दीपकबापू विकास के झंडाबरदार, विनाश का पाठ भी सिखायें।।
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नया ज़माने में मौत भी बिकती, बदले में विज्ञापन लाती है।
दीपकबापूमस्ती से देख पर्दा, जहां खबरें धन बरसाती हैं।।
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यहां लाश की पहचान है धर्म, कातिल भी जात वाला होता है।
दीपकबापूजिंदा बुतों के खेल में, हर दिल घात वाला होता है।।
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कतरा कतरा कचड़ा बना पहाड़, तू उठ खड़ा हो उसे झाड़।
दीपकबापूबीमार बनने से पहले, उसका कलेजा तू फाड़।।
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