Wednesday, August 31, 2011

अनशन खत्म हुआ जैसे बारात विदा हुई हो-हिन्दी व्यंग्य (anshan aur barat-hindi vyangya or satire)

            अन्ना हजारे साहब का अनशन कथित रूप से स्थगित हो गया है। उन्होंने देश की दूसरी आजादी की लड़ाई क्या प्रारंभ की प्रचार माध्यमों को अपने विज्ञापनों के साथ प्रकाशन और प्रसारण की सामग्री चलाने का अवसर मिल गया। इधर अन्ना साहेब ने अनशन खत्म करने की घोषणा की तो पूरे देश ने चैन की सांस ली होगी पर यकीनन प्रचार प्रबंधकों की चिंताऐं बढ़ा दीच होंगी। अन्ना साहेब को अपनी मांगों के अनुरूप चिट्ठी शनिवार रात को मिली पर उन्होंने सूर्यास्त के बाद अनशन खत्म न करनी अपनी परंपरा का जिक्र करते हुए अगली सुबह दस बजे वह भी रविवार के दिन अनशन समाप्त करने की घोषणा की। प्रचार प्रबंधकों के लिये यह समय अत्यंत कीमती है। इस दौरान मनोरंजन प्रिय लोग -छात्र, छात्रायें, शिक्षक, चिकित्सक और अन्य कर्मचारी- जो सरकारी अवकाश के कारण इस दौरान टीवी के सामने उपस्थित होना प्रारंभ करते हैं। रविवार को अन्ना ने अनशन समाप्त किया। उसमें पूरी तरह से राजनीतिक सिद्धांतों का पालन किया गया। फिर अन्ना अस्पताल रवाना हुए। सभी टीवी चैनलों की चलित वाहिनियां (मोबाईल वैन) उनके पीछे लग गयीं। पूरे दो घंटे की सामग्री मिल गयी। फिर बाद में तमाम चर्चा।
       चलिये साहब! रविवार का दिन निकल गया। सोमवार को भी इस आंदोलन की पाश्च सामग्री बहुत थी हालांकि पूरा दिन उसे नहीं दिया गया। मगर मंगलवार का दिन! यह संभव नही था कि अन्ना अनशन प्रसंग लंबा खींचा जाये। इधर दर्शक भी बोर हो गये थे। ऐसे में दूसरे प्रसंग प्रसारित हुए पर ऐसा लग रहा था कि टीवी चैनलों की स्थिति वही हो गयी थी जैसे दूल्हा दुल्हन के साथ बारातियों के जाने के बाद जनवासे की होती है। दर्शकों की स्थिति भी ऐसी ही थी जैसे कि अभी अभी बारात से लौटे हों और आराम करने का मन हो।
        आमतौर से पश्चिमी विकसित देशों के प्रचार माध्यम-टीवी चैनल और समाचार पत्र- शुद्ध रूप से प्रकाशन और प्रसारण के लिये जनरुचि सामग्री निर्माण के आधार पर चलते हैं और विज्ञापन प्रकाशन उनकी दूसरी प्राथमिकता होती है। वहां प्रकाशक और प्रसारणकर्ता का मुख्य उद्देश्य के रूप में अपने समाज के बीच अपनी छवि बनाने के लिये प्रचार व्यवसाय चुनते हैं। भारत के प्रचार माध्यम मूल रूप से पश्चिम का ही अनुसरण करते हैं पर यहां उनके लक्ष्य और उद्देश्यों का स्वरूप बदल जाता है। अधिकतर प्रसारक और प्रकाशन विज्ञापनों से आय करने का लक्ष्य लेकर अपना संस्थान प्रारंभ करते हैं। उनकी पहली प्राथमिकता विज्ञापनदाताओं के सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करना होता है। दूसरी प्राथमिकता दर्शक और पाठकों की रुचि होती है। ऐसे में अगर किसी समाचार में जनता की रुचि अधिक हो तो उस प्रकाशन और प्रसारण की सामग्री लंबी हो जाती है। समाचार पत्र पत्रिकाओं में मुख्य समाचारों से संबद्ध छोटे समाचार अंदर के पृष्ठों में कतरनों की तरह छपते हैं। टीवी चैनल तो ऐसे घटनाक्रमों लगभग किसी क्रिकेट मैच के प्रसारण की तरह प्रसारित करते हैं जिससे दर्शक उसमें उतार चढ़ाव से बंधा रहता है।
            कहने को देश में हुए अनेक हादसों पर सीधी फिल्म प्रसारित होती है पर उसमें करुणा रस ही बना रहता है। जबकि ऐसी घटनाओं के सारे रसों का स्वाद दर्शक को कराया जा सकता है। पहले अन्ना हजारे फिर बाबा रामदेव और फिर अब अन्ना हजारे के आंदोलनों का प्रसारण तो ऐसे हुए जैसे कि दिन भर ही फिल्म चलती दिखाई दी जिसमें कभी हास्य तो कभी करुणा रस के साथ रची सामग्री देखने को मिली।

        सच बात तो यह है कि इधर दर्शकों और पाठकों की आदत खराब हो गयी है। एक दो दिन के महत्व वाले प्रकरण  उनके मन को अधिक अब नहीं लुभाते खासतौर से जब वह एकरस से सरोबोर हों। इस तरह के सीधे प्रसारण वाले फिल्मरूपी समाचार देखने की उनकी यह आदत बनती जा रही हैं। वैसे एक बात बता दें कि अन्ना अगर उस दिन अनशन नहीं तोड़ते तो यकीन मानिए दर्शक ऊब गये होते। भ्रष्टाचार विरोधी उनका आंदोलन और उसके मुद्दे तो रह गये एक तरफ, मूल मुद्दा बन गया था कि अन्ना साहेब का अनशन टूटेगा नहीं! अब यह संयोग है या प्रचार प्रबंधकों की योजना कि भ्रष्टाचार का मुद्दा अन्ना के जीवन के आगे गौण पड़ गया। इस देश में वैचारिक चिंत्तन वाले लोग कम नहीं है पर जो टीवी से चिपके थे उनमें उनकी संख्या कम रही होगी जबकि इसे फिल्म की तरह देखने वाले लोगों का झुंड अधिक था। अन्ना साहेब के गांव में तो लोगों ने यह कहते हुए जश्न मनाया कि उनके कहे अनुसार जन लोकपाल बिन अंततः बन गया और अब वह अनशन तोड़ रहे हैं।’
         पूरे देश में ही यही स्थिति थी। ऐसे में वैचारिक लोगों के लिये यही बेहतर था कि वह अपना मुख बंद रखें। प्रचार माध्यमों ने इस तरह का माहौल बना दिया कि सच्ची बात कहना उस समय जोखिम मोल लेना था।
इस प्रकरण के समय हमें तीन चार दिन ऐसे दौर से गुजरना पड़ा कि इस पर देखना और लिखना संभव नहीं था। होता भी तो नहीं लिखते। इस फिल्म का न तो सिर समझ में आ रहा था न पैर! बस एक जिज्ञासा थी कि देखें तो रचने वालों ने इस खेल को रचा कैसा है? मानना पड़ेगा कि इस देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो धर्म, देश, समाज, भाषा तथा जनकल्याण के विषयों में लोगों की भावनायें इस कदर उभारने में माहिर हैं जिससे उनके व्यवसायिक लाभ हों। बहरहाल जहां टीवी चैनल बारात विदा होने के बाद जनवासे की तरह लग रहे हैं तो समाचार पत्र ऐसे लगते हैं जैसे छात्रकाल के दौरान परीक्षा के बाद हल किये गये प्रश्न पत्र लगते थे।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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