Monday, November 22, 2010

पहले अपना पांव कीचड़ में डाल दो-हिन्दी व्यंग्य एवं कविता (bigg boss and his actres-hindi vyangya and kavita)

बिग बॉस से निकाली गयी उस अभिनेत्री ने गुरुद्वारे जाकर मत्था टेका। भगवान श्रीगुरुनानक तथा उसके बाद के सिख धर्म गुरुओं की भारतीय जनमानस में जो प्रतिष्ठा है उसे देखते हुए किसी देशवासी का वहां मत्था टेकना कौनसी बड़ी बात है? मगर किसी व्यक्ति विशेष का वहां जाकर मत्था टेकने की खबर जब टीवी समाचार चैनलों ये अखबार में छपे तो यह देखना पड़ता है कि आखिर मत्था टेकने के इस प्रचार को भी तो कहीं नकदी में परिवर्तित नहीं किया जा रहा। जब समाचारों मे विज्ञापन की बजाय विज्ञापनों में समाचार हों तब यह शक पुख्ता हो जाता है कि सभी रसों की तरह अब भक्ति का भी प्रदर्शन हो गया जिससे वह अभिनेत्री अब स्वच्छ छवि होकर विज्ञापनों के लिये काम कर सकेगी और लोग उसके बिग बॉस के अभिनय को भूलकर उससे प्रभावित होंगे।
बिग बॉस में अपनी बदतमीजी तथा गाली गालौच के लिये विख्यात हो चुकी वह अभिनेत्री अब बाहर टीवी समाचार चैनलों और अखबारों के लिये प्रकाशन सामग्री के लिये एक महत्वपूर्ण चेहरा बन गयी है। विख्यात इसलिये लिखा है कि अब कुख्यात कहना भी अज़ीब लगता है। जरा, प्रचार जगत की भूमिका देखें। अधिक समय नहीं एक सप्ताह हुआ होगा जब वह अभिनेत्री उसके लिये कुख्यात थी। लोग बिग बॉस पर आखों तरेर रहे थे और प्रचार जगत उनके बयानों को जगह दे रहा था। ऐसा लग रहा था कि वह अभिनेत्री देश के लिये कोई कलंक है। यह अलग बात है कि इस विवाद के बाद ही हम जैसे लोगों को पता चला कि बिग बॉस नाम का एक कार्यक्रम चल रहा है। समाचार चैनलों का एक बहुत सारा समय उस अभिनेत्री को कोसने में लग गया तो समाचार पत्र पत्रिकाओं में सामग्री प्रकाशित हुई-विज्ञापन अपनी कमाई देते रहे।
एक दिन अचानक ब्रेकिंग न्यूज आई। उसे बिग बॉस निकाल दिया गया-अगर ऐसी खबर ब्रेकिंग बने तो आप समझ सकते हैं कि हमारे प्रचार प्रबंधकों को समाज हित से ज्यादा अपने आर्थिक हितों की चिंता है। मात्र दो दिनों में ही उस अभिनेत्री के साक्षात्कार टीवी चैनलों में आने लगे। वह मुस्कराने लगी। सफाई देती रही। हर चैनल उसके साक्षात्कार को अपने विज्ञापनों में सजाने लगा। ऐसे साक्षात्कारों में हर एकाध मिनट में ब्रेक लिया जाता है क्योंकि प्रचार प्रबंधकों को पता है कि साक्षात्कार के लिये प्रस्तुत चेहरा इस समय ताज़ा है और लोग अपनी आंखें गड़ाकर देखेंगे। इसके लिये जरूरी था कि उस अभिनेत्री की छवि सुधारी जाये। उसको जो ख्याति-अब उसमें सु जोड़े या कु यह पढ़ने वालों पर है-मिली उसे भुनाने के लिये विज्ञापन भी तैयार हो सकते हैं। कुछ दिन बाद वह कोई सामान बेचने के लिये उसका प्रचार करती नज़र आयेगी। इसलिये उससे कहा गया होगा कि‘जाओ, किसी गुरुद्वारे का चक्कर भी लगाकर आओ क्योंकि व्यवायिकता के लिये यह जरूरी है।’
वह गयी होगी। वहां उसने भजन गाये। उसके दृश्य कैमरे में कैद करने के लिये बकायदा चैनल वाले गये होंगे। यकीनन कहीं न कहीं संवाद कायम किया गया होगा और इसके लिये व्यवसायिक आधार वाले लोग ही शामिल हुए होंगे।
बिग बॉस तथा अन्य रियल्टी शो बाज़ार तथा प्रचार के लिये नये मॉडल बनाने के अलावा कुछ नहीं कर रहे, यह इस बात से भी प्रमाणित होने लगा है कि उनके प्रसारणों की पटकथा पहले लिखी जाती है। इंसाफ धारावाहिक प्रसारित करने वाली एक अभिनेत्री ने कहा है कि जैसा उससे कहा जाता है वैसा ही वह बोलती है। बिग बॉस से निकाली गयी अभिनेत्री के बारे में भी लोग यही कह रहे थे कि उसे यही सब करने के लिये पैसे दिये जा रहे थे। वह विख्यात हो रही थी तो बाज़ार के ताकतवर सौदागर तथा प्रचार से जुड़े मध्यस्थ बैचेन हो रहे थे कि कहीं वह बिग बॉस में अधिक चली तो धीरे धीरे नाम की चमक फीकी होती जायेगी तब उनका हिस्सा मारा जायेगा। सो बाहर करवा दिया। अब भक्ति का वह रस उस पर चढ़ा रहे है जिसके बिना भारत में किसी की छवि नहीं बन सकती।
प्रस्तुत है इस पर कविता
........................................
अपने मुख से कुछ शब्द
आग से नहलाकर बाहर उछाल दो,
अपनी आंखों के तीर में
नफरत का बाण भी डाल दो।
बदनाम होकर अपना चेहरा
ज़माने में चमकाना जरूरी है,
क्योंकि आंख और कान से
लोगों की अक्ल की बहुत दूरी है,
फिर सर्वशक्तिमान की दरबार में
जाकर हाजिरी देना
जीवन सुधर जायेगा,
बद है जो नाम
वह मशहूर हो जायेगा,
बाज़ार के दौलतमंद सौदागारों का आसरा मिलेगा
वह कमल बनाकर खिला देंगे
पहले अपना पांव कीचड़ में तो डाल दो।
-------------

प्रस्तुत है इस विषय पर दो लेख जिसमें बिग बॉस तथा राखी इंसाफ पर विचार व्यक्त किये गए हैं एक लेख परसों तथा दूसरा कल लिखा गया था 

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Sunday, November 14, 2010

बैचेन रहने की आदत ऐसे नहीं जायेगी-हिन्दी व्यंग्य (bachain rahne ki aadat aise nahin jayegi -hindi vyangya)

लिखना तथा एक तिवारी जी नामक हिन्दी पटकथा लेखक पर संयोग ऐसा बन गया कि हमें अपना नाम जोड़कर भी इस लेख को लिखना पड़ रहा है क्योंकि इंतजार है उस ब्लाग लेखक के उत्तर का जिसने बिना कांट छांट किये हमारी एक कविता को अपने ब्लाग पर बिना नाम के छाप दिया और हमने उस पर अपनी टिप्पणी लिख कर मामले के निपटारे की मांग की है।
हिन्दी में रचनाकार नहीं है, यह नारा बहुत दिनों से सुन रहे हैं-इस नारे में बाज़ार, राज्य तथा प्रचार व्यवसाय के जुड़े लोगों के जो वह बुद्धिजीवी लगाते हैं जो केवल आलेख लिखते हैं वह भी प्रायोजन मिलने पर। इधर राखी का इंसाफ धारावाहिक विवाद में फंसा तो एक राखी का स्वयंवर धारावाहिक का एक पटकथा लेखक सामने आया जिसने यह दावा किया है कि वह उसकी चुराई हुई है। स्थिति यह है कि उसने आत्महत्या करने की धमकी दे डाली है जैसे कि राखी के इंसाफ में ताने से प्रेरित होकर झांसी के एक लक्ष्मण युवक ने कर ली है।
तिवारी नाम धारी उसे लेखक का दावा था कि जब उसने अपनी पटकथा का होने का दावा किया तो उसे धमकाया गया और कहा गया कि ‘इसकी नायिका एक तरह से पूरे मीडिया की बेटी है। इसलिये उससे पंगा मत लो।’
हमें उस तिवारी नामधारी लेखक से सहानुभूति है। ऐसा लगता है कि वह सच बोल रहा होगा क्योंकि फिल्मों के बारे में मिली यह पहली शिकायत नहीं है। हमारे एक चौरसिया नाम के एक मित्र कहानीकार हैं। उन्होंने कम से कम पच्चीस वर्ष पूर्व एक कलात्मक फिल्म में अपनी कहानी चोरी होने की बात कही थी। तब हंसी आयी थी पर इसमें कोई शक नहीं था चौरसिया जी उच्च दर्जे के कहानीकार हैं। इधर हमने यह भी देखा कि एक अखबार हमारे ही चिंतनों को जस का तस छापता रहा है। जब नाम छापने को कहते हैं कि तो जवाब मिलता है कि ब्लाग का नाम छापने की परंपरा नहीं है। नाम छापने को कहा गया तो जवाब मिला कि अपने संपादक से कहेंगे कि आपकी रचनायें नहीं ले।
कितनी तुच्छ मानसिकता है उन लोगों की जो हिन्दी की खा रहे हैं। हिन्दी लेखक उनकी नज़र में है क्या? क्या खौफ है कि नाम छापेंगे तो लेखक अमिताभ बच्चन बन जायेगा और उसे साबुन, क्रीम या मोटरसाइकिल के विज्ञापन मिलने लगेंगे। मजे की बात है कि नामा न देने की बात स्वीकार तो हिन्दी लेखक कर ही लेते हैं कि क्योंकि उनको पता है कि हिन्दी लेखन और पूंजीपतियों के बीच जो दलाल हैं वह अपना ही पेट मुश्किल से भर पाते हैं पर नाम न देने की बात हमारे समझ में नहीं आयी। स्थिति यह हो गयी है कि समाचार पत्र पत्रिकाओं के पास अब साफ सुथरी हिन्दी लिखने वाले ही नहीं बचे। महंगाई बढ़ रही है कि हिन्दी के अखबार की कीमत आज भी दो ढाई रुपये से अधिक नहीं है। अब तो ऐसा लगता है कि प्रचार माध्यमों के लिये पाठक और दर्शक एक तरह से गूंगी फौज हो गयी है जिसके सहारे वह उच्च स्तर पर अपनी ताकत दिखा रहे हैं वरना आम आदमी में उनकी कोई पकड़ नहीं है। आजकल तो हर आदमी टीवी की तरह मुंह किये बैठा है। इसलिये ही स्थानीय स्तर पर टीवी चैनलों ने अपने पंाव फैला दिये हैं। अखबार छपने की संख्या और उसे पढ़ने वालों की संख्या में बहुत अंतर है। उससे भी अधिक अंतर तो पढ़ने वाले और उस अखबार से हमदर्दी रखने और पढ़ने वालों के बीच है। मतलब यह कि पहले लोग न केवल अखबार पढ़ते थे बल्कि उसे मानसिक हमदर्दी भी रखते थे। यह अब नहंी है।
हिन्दी ब्लाग पर लिखना और लिखवाना आसान नहीं है। अगर किसी लेखक से लिखने को कहो तो वह कहता है कि रचना चोरी हो जायेगी। मतलब यह कि लिखने को तैयार नहीं है और जो लिख रहे हैं वह चोरी का शिकार हो रहे हैं। लोग झूठ कहते हैं कि हिन्दी के ब्लाग केवल ब्लाग लेखक ही पढ़ रहे हैं और अच्छा नहीं लिखा जा रहा है। जबकि इस लेखक के गांधी और ओबामा पर लिखे पाठों के अनेक एक स्तंभकार ने चोरी किये जो कि इसका प्रमाण है कि कथित बुद्धिजीवी भी अब अंतर्जाल पर अपनी सामग्री टटोल रहे हैं। यह शायद मजाक लगता हो पर सच यही है कि कुछ ब्लाग लेखकों का नाम बाहर नहीं लिया जा रहा पर सच यही है कि उनके पाठ दूरगामी मार वाले हैं और बुद्धिजीवी उनसे प्रभावित हैं। हिन्दी ब्लाग पर कूड़ा लिखा जा रहा है तो बताईये बाहर कौनसा सदाबाहर साहित्य लिखा पढ़ने को मिल रहा है। इस ब्लाग लेखक के ब्लागों पर पाठकों की टिप्पणियां इस तरह की आती हैं कि ‘गजब! आप ऐसा भी सोच और लिख सकते हैं।’
लोगों के पास चिंतन नहीं है, दावा चाहे कितने भी करें। नारों पर लिखते हैं और वाद सजाते हैं। फिर उसमें किसी न किसी की तारीफ या निंदा का बिगुल बजाते हैं। फिल्म वालों के पास तो काल्पनिकता और यथार्थ का समन्वय करने की कभी शक्ति ही नहीं दिखी है क्योंकि वहां के निर्माता और निर्देशक हिन्दी लेखकों को स्वतंत्रता न देकर लिपिक बना लेते हैं। समाचार पत्र पत्रिकाओं में लेखकों को लिपिक की तरह ही देखा जाता है। स्थिति यह है कि अधिकतर हिन्दी अखबार अब अंग्रेजी शब्दों के मोह में फंस गये हैं। प्रबंधन करना नहीं आया तो अब मैनेजमेंट करने लगे हैं। क्या खाक करेंगे? प्रबंधन हो या मैनेजमेंट बिना चिंतन और मनन के नहीं होते। हिन्दी का खाकर उसे मिटाने की योजना या साजिश रची गयी है। कहते हैं कि हिन्दी को विश्व स्तर पर पहुंचाना है। क्या खाक पहुंचायेंगे खुद को आती नहीं है। फिर दावा कि हम भाषाविद हैं? क्या खाक हैं एक ढंग की कविता नहीं लिख सकते। हम जैसी कि चुराने का मन हो? कुछ गुस्सा और कुछ हंसी! इस भाव से हम यह लेख लिख रहे हैं क्योंकि चोरी का सदमा है तो खुशी इस बात की है कि हम अच्छा लिख रहे हैं।
आईये पहले उस ब्लाग का नाम देखें। उससे पहले देखकर आयें कि उसने हमारी टिप्पणी का क्या किया? उसने न टिप्पणी प्रकाशित की और न ही जवाब दिया। हम भी उसका नाम नहीं लिख रहे। उसकी बेवसाईट का पता रख लिया है। ऐसा लगता है कि बिचारा रोमन में हिन्दी लिखता है और यह उसकी पहली ऐसी रचना है जो देवानगारी में है। हम उसे बदनाम नहीं करना चाहते पर उम्मीद है कि भाई लोग इसे पढ़कर उसे समझायेंगे। वैसे वह  हमारी टिप्पणियाँ नहीं छाप रहा पर रोमन लिपि में अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर रहा  है । हम यह सब  इसलिए रहे हैं क्योंकि बैचेन रहने की आदत ऐसे नहीं जाएगी। यहाँ यह भी बता दें हमारी रचना छापने का दाम पूछकर एक हज़ार और न पूछना पर दो हज़ार है और हम इसकी विधिवत माग करेंगे। इस लेख का लिखने का दंड अलग से वसूल करेंगे।  
हमारी   रचना यह है 
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बैचेन रहने की  आदत 
लोगों की हमेशा बेचैन रहने की
आदत ऐसी हो गयी है कि
जरा से सुकून मिलने पर भी
डर जाते हैं,
कहीं कम न हो जाये
दूसरों के मुकाबले
सामान जुटाने की हवस
अभ्यास बना रहे लालच का
इसलिये एक चीज़ मिलने पर
दूसरी के लिये दौड़ जाते हैं
। 
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हमारा लिंक यह हैं
http://rajdpk.wordpress.com/2010/10/31/baichen-ki-aadta-hindi-poem/

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Sunday, October 31, 2010

आस्था और आदर्श-हास्य कविताएँ (aastha aur adarsha-hasya kavitaen)

उनकी भावनायें इतनी महान है कि
इलाज की दुकान हो या
रहने का मकान
उनका नाम भी आस्था रखते हैं,
दौलत की चाहत पूरी होने का मज़ा
और सर्वशक्तिमान पर अहसान के साथ ही
दोनों का स्वाद एक साथ चखते हैं।
--------
समाज सेवक ने कहा अपने शिष्य से
‘देखो यह संस्था केवल लोगों की
भलाई के लिये है यह सच मत मान लेना,
भले ही कोई भी नाम रख लेना,
हमारा मुख्य लक्ष्य अपने लिये पैसा कमाना है।
सुनकर शिष्य बोला
‘’मैं मदद के मामले में पुराना पापी हूं,
सारा काम करने के लिये अकेला काफी हूं,
आप अपना आशीर्वाद देते रहें,
ताकि हम लोगों से दान लेते रहें,
जहां तक नाम का सवाल है कुछ भी रख लें
कोई अंतर नहीं पड़ता,
अपनी नीयत से भी अब मैं नहीं डरता,
अलबत्ता लोगों का दिल के जज़्बात भुनाने के लिये
आदर्श नाम रख लेते हैं,
अच्छा है, समझ लीजिये इसमें माल खूब आना है।’’
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Monday, October 18, 2010

आतंक के पक्के व्यापारी-हिन्दी हास्य कविता (atank ke pakke vyapari-hindi hasya kavita)

एक पत्रकार आतंकवादी का
साक्षात्कार लेने पहुंचा और बोला
‘भई, बड़ी मुश्किल से तुम्हें ढूंढा है
अब इंटरव्यु के लिऐ मना नहीं करना
बहुत दिन से कोई सनसनीखेज खबर नहीं मिली
इसलिये नौकरी पर बन आई है,
तुम मुझ पर रहम करना
आखिर दरियादिल आतंकवादी की
छबि तुमने पाई हैं।’
सुनकर आतंकवादी बोला
‘‘भई, हमारी मजबूरी है,
तुम्हें साक्षात्कार नहीं दे सकता
क्योंकि तुमने कमीशन देने की
मांग नहीं की पूरी है,
पता नहीं तुम यहां कैसे आ गये,
जिंदा छोड़ रहा हूं
तुम शायद सीधे और नये हो
इसलिये मुझे भा गये,
कमबख्त!
तुम्हें आर्थिक वैश्वीकरण के इस युग में
इस बात का अहसास नहीं है कि
आतंकवाद भी कमीशन और ठेके पर चलता है,
उसी पर ही हमारे अड्डे का चिराग जलता है,
टीवी पर चाहे जैसा भी दिखता हो,
अखबार चाहे जो लिखता हो,
हक़ीकत यह है कि
अगर पैसा न मिले तो हम आदमी क्या
न मारें एक परिंदा भी,
आतंक के पक्के व्यापारी हैं
कहलाते भले ही दरिंदा भी,
हमें सुरक्षा कमीशन मिल जाये
तो समझ लो हाथी सलामत निकल जाये,
न मिले तो चींटी भी गोली खाये,
आजकल निठल्ला बैठा हूं
इसका मतलब यह नहीं कि काम नहीं है
सभी चुका रहे हैं मेरा कमीशन
फिर हमला करने का कहीं से मिला दाम नहीं है,

अब इससे ज्यादा मत बोलना
निकल लो यहां से
सर्वशक्तिमान को धन्यवाद दो कि
क्योंकि अभी तुम्हारी जिंदगी ने अधिक आयु पाई है।
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Tuesday, October 5, 2010

अंधेरे का सौदा-हिन्दी कविता (andhera ka sauda-hindi shayari)

लोग जलाते हैं जो चिराग
वह उसे बुझा देते हैं,
रौशनी के दलाल
अपनी दलाली के लिये
करते हैं अंधेरों का सौदा
रात के अंधेरे में चमकता
कोई तिनका भी राह में दिख जाये
उसे भी पत्थरों के नीचे दबा देते हैं।
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Wednesday, September 29, 2010

भक्तों के लिये भोले हैं राम-हिन्दी कविता (bhakton ke liye bhole hain ram-hindi poem)

दिल में नहीं था कहीं
पर जुबान से लेते रहे राम का नाम,
बनाते रहे अपने काम,
बरसती रही उन पर रोज़ माया,
फिर भी चैन नहीं आया,
कुछ लोग मतलब से पास आते हैं,
निकलते ही दूर चले जाते हैं,
राम का नाम बेचने में
उनको आता है मज़ा,
मगर मिलती है उनको भी बैचेनी की सज़ा,
भक्तों के लिये भोले हैं राम,
जरूरत से बनाते जाते काम
पर जो भक्तों को भुलाते हैं,
झूठे दर्द का वास्ता देकर रुलाते हैं,
नाम लेने से भर जाती उनकी भी झोली,
मगर हृदय में नहीं होते राम,
नहीं पाते इसलिये वह कभी आराम।
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Friday, September 24, 2010

आस्था का व्यापार-हिन्दी कविताऐं (aastha ka vyapar-hindi kavitaen)

अपनी आस्थाओं को दिखाने के लिये
वह चीखते और चिल्लाते हैं,
भीड़ में प्रचार पाने के लिये
लेकर सर्वशक्तिमान का इठलाते हैं,
उनके लिये अपना विश्वास
दिल में रखकर चलने की चीज नहीं
दुनियां जीतने के इरादे से
भक्ति भी नारों की तरह गाते हैं।
-------
जिनको अपनी आस्थाओं के साथ
जंदा रहना नहीं आता है,
दूसरों की भावनाओं पर
अपने विचारों का व्यापार करने में ही
उनको आस्था का प्रश्न नज़र आता है।
------
अपनी आस्था दिल से निकालकर
किसी को दिखलायें
यह हमें करना नहीं आता है,
मुश्किल यह है कि जो नहीं रखते दिल में
आस्था का व्यापार उनको ही करना आता है।
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Wednesday, September 15, 2010

कहीं हिन्दी दिवस तो कहीं हिन्दी सप्ताह-हिन्दी लेख (hindi divas aur hindi saptah-hindi lekh)

12 सितंबर को सर्च इंजिनों से हिन्दी दिवस से खोज करते हुए पाठकों की संख्या कुछ अधिक दिखी तो आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि इसका अनुमान था कि 14 सितंबर को मनाये जाने वाले कार्यक्रमों के लिये लोग कुछ खोज रहे हैं। आखिर कौन लोग हो सकते हैं यह खोज करने वाले।
शायद वह लोग जो इन कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि या संचालक के रूप में सम्मिलित होते होंगे। उनको वहां बोलने के लिये कोई जानकारी यहां से चाहिए।
यह वह विद्वान भी हो सकते हैं जिनको समाचार पत्रों के लिये लिखना हो या फिर चैनलों पर बहस के लिये जाना हो। साथ ही वह संपादक भी जिनको अपने प्रकाशन के लिये हिन्दी पर कुछ नया लिखना हो वह सर्च इंजिनों में कुछ ढूंढ रहे होंगे।
शायद वह प्रतियोगी भी हो सकते हैं जो इस हिन्दी दिवस पर होने वाली निबंध प्रतियोगिताओं में कुछ लिखना चाहते हों।
वह छात्र भी हो सकते हैं जिनको अपने शिक्षकों ने इस अवसर पर कक्षा में ही अपने विचार रखने का आमंत्रण भी दिया हो या फिर वाद विवाद प्रतियोगता आयोजत की गयी हो।
ऐसे में यह विचार बुरा नहीं लगा कि ब्लाग स्पॉट पर लिखे गये कुछ पाठों को उठाकर वर्डप्रेस के अपने अधिक प्रसिद्ध ब्लागों पर हिन्दी दिवस शब्द लगाकर प्रस्तुत किया जायें ताकि देखा जाये कि पाठ तथा पाठन संख्या में क्या प्रभाव पड़ता है? यह काम 12 सितंबर को कर लेने के बाद 13 सितंबर की शाम को उन ब्लाग संख्या के पाठ/पाठ पठन संख्या का अवलोंकन किया तो गुणात्मक वृद्धि पाई। इसका मतलब यह था कि कुछ नया हिन्दी में ढूंढा जा रहा था। जब इतने सारे समाचार पत्र पत्रिकाऐं उपलब्ध है अनेक किताबें भी मिलती हैं तब आखिर अंतर्जाल पर कौन क्या ढूंढ रहा था। कुछ नया ही न! इसका मतलब यह कि अंतर्जाल के बाहर जो लिखा जा रहा है वह लीक से हटकर नहीं है या विचारों की रूढ़ता के कारण सभी लेखकों के लेख करीब एक जैसे होते हैं जिनका उपयोग करने से भाषण या रचना रूढ़ हो जाती है। इसलिये ही अंतर्जाल पर कुछ नया पढ़ने की चाहत यहां आने के लिये लोगों को बाध्य कर रही है।
दीपक बापू कहिन, हिन्दी पत्रिका, शब्द पत्रिका, ईपत्रिका तथा शब्दलेख पत्रिका-इन पांच ब्लाग पर पाठकों की संख्या 13 सितंबर को अत्यधिक दर्ज की गयी। हिन्दी पत्रिका और शब्द पत्रिका एक दिन में एक हजार पाठक संख्या पार करने के करीब पहुंच गये पर हुए नहीं। प्रथम तीन ब्लाग ने अपने पिछले कीर्तिमान से अधिक पाठक संख्या ढूंढे। शब्द पत्रिका पर 980 पाठक आये जो कि इस लेखक के किसी भी ब्लाग पर आये पाठकों की संख्या से ज्यादा है। shity stat में अंग्रेजी ब्लाग पर साहित्य वर्ग में बढ़त बनाते हुए शब्द पत्रिका, दीपक बापू कहिन तथा ईपत्रिका ने क्रमशः 6, 8 तथा 22 के स्थान पर अपनी उपस्थिति दर्ज की। हिन्दी पत्रिका ने अन्य वर्ग में 54 वां स्थान पाया। अगर यह संख्या नियमित रहती तो यकीनन शब्द पत्रिका नंबर एक पर आता पर इसकी आशा करना व्यर्थ था क्योंकि 14 सितंबर को पाठक संख्या कम हो गयी क्योंकि अपने देश में कार्यक्रम दोपहर या शाम तक ही होते हैं और उसके बाद ऐसा होना स्वाभाविक था।
हिन्दी दिवस के अलावा भी अन्य पर्वो पर उनसे संबंधित पाठों की खोज बहुत तेज होती है पर इतनी अधिक वृद्धि उस समय दर्ज नहीं की जाती। इस बात से एक निष्कर्ष तो निकलता है कि कि समाचार पत्रों के पुराने लेखों या किताबों की अपेक्षा अब नया पाठक तथा विद्वान वर्ग इंटरनेट पर अधिक निर्भर हो रहा है। ऐसे में अंतर्जाल पर अच्छे लेख न देखकर स्वयं को निराशा ही हाथ लगती है पर किया क्या जाये क्योंकि यहां स्वतंत्र मौलिक लेखकों के लिये यहां कोई आर्थिक प्रोत्साहन नहीं है। किसी अच्छे हिन्दी लेखक से यह कहना कठिन है कि इंटरनेट पर लिखो। जो पुराने लेखक लिख रहे हैं तो उनकी रचनाऐं रूढ़ किस्म की हैं और समाचार पत्र पत्रिकाओं में उनको लोग पढ़ते भी हैं। जब इंटरनेट का बिल स्वयं चुकाते हुए लिखना है तो पाठों की गुणवता से अधिक अपनी अभिव्यक्ति ही महत्वपूर्ण लगती है। पाठकों की संख्या भी कोई अधिक प्रेरक नहीं लगती। इस पर संगठित प्रचार माध्यमों ने-टीवी तथा समाचार पत्र पत्रिकाऐं-वातावरण ऐसा बना दिया है जिससे समाज में यह संदेश जाता है कि लेखन केवल अभिनेताओं, नेताओं, अधिकारियों तथा प्रतिष्ठित समाज सेवकों का है। उनके 140 शब्दों के ट्विटर पूरे संचार और प्रचार माध्यमों में छा जाते हैं और हिन्दी ब्लाग लेखकों को तो यह मान लिया गया है कि वह कोई भूत है जो अंतर्जाल पर लिखता है-जिसका दैहिक रूप से कोई अस्तित्व ही नहीं है। अनेक रचनायें यहां से उठाकर वहां छाप दी जाती है।
समाज में लिखना कोई नहीं चाहता और जो लिखते हैं वह अपने आसपास के लोगों को प्रभावित करने के लिये ही लिखते हैं ताकि अखबार में छप जाये तो बात जम जाये। यह कहना कठिन है कि हम अपने लिखे से लोगों को कितना प्रभावित कर रहे हैं क्योंकि इसके लिये कोई तरीका अपने पास उपलब्ध नहीं है। साथ ही यह भी भाव हमारे अंदर है कि हम कोई पैसे, पद तथा प्रतिष्ठा के शिखर पर नहीं बैठे कि हमारे शब्द लोग पढ़ने के लिये लालायित हों।
पहले लगता था कि हिन्दी दिवस मनाने की क्या जरूरत है? यह भी कहते थे कि मित्र दिवस, पितृ दिवस, मातृ दिवस, प्रेंम दिवस या इष्ट दिवस मनाने की क्या जरूरत है क्योंकि वह तो हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा है। यह भी कहते थे कि यह तो पश्चिम में होता है जहां रिश्ते इतने स्वाभाविक नहीं होते। अब हिन्दी दिवस माने की जरूरत लगती है क्योंकि समाज में उसकी उपस्थिति स्वाभाविक रूप से नहीं दिखती। अंग्रेजी का आकर्षण और हिन्दी की जरूरत के बीच फंसा समाज कुछ सोच नहंी पाता। अगर ऐसा होता तो शायद हम अंग्रेजी दिवस मना रहे होते।
आखिरी बात यह कि हिन्दी दिवस पर इतने पाठक आने का आशय यह कतई नहीं है कि वह आम पाठक थे क्योंकि अगर ऐसा होता तो यकीनन यह संख्या अगले दिनों में भी दिखती। इसका आशय यह है कि अभी केवल प्रबुद्ध वर्ग ही इंटरनेट पर सक्रिय है जिसे अपने विषयों से संबंधित जानकारी कहीं प्रस्तुत करने के लिये चाहिए। वैसे हिन्दी दिवस के साथ ही अनेक सरकार संस्थाओं के हिन्दी सप्ताह भी बनता है। हिन्दी दिवस तो निकल गया पर हिन्दी सप्ताह पर अच्छी चर्चायें हों और कोई अन्य बेहतर निष्कर्ष सामने आयें इसकी कामना तो हम ही कर सकते हैं। पाठक संख्या कम जरूर हो गयी है पर इस पूरे सप्ताह तक उसका प्रभाव जरूर रहेगा।
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Thursday, September 9, 2010

जिंदगी का हिसाब-हिन्दी शायरी (zindgi ka hisab-hindi shayari)

अवसाद के क्षण भी बीत जाते हैं,
जब मन में उठती हैं खुशी की लहरें
तब भी वह पल कहां ठहर पाते हैं,
अफसोस रहता है कि
नहीं संजो कर रख पाये
अपने गुजरे हुए वक्त के सभी दृश्य
अपनी आंखों में
हर पल नये चेहरे और हालत
सामने आते हैं,
छोटी सी यह जिंदगी
याद्दाश्त के आगे बड़ी लगती है
कितनी बार हारे, कितनी बार जीते
इसका पूरा हिसाब कहां रख पाते हैं।
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Wednesday, August 25, 2010

लोकतंत्र और क्लर्क राज्य-हिन्दी व्यंग्य (democracy and state of clerk-hindi satire artice

फिलीपीन के राजधानी मनीला में एक बस अपहरण कांड में सात यात्री मारे गये और दुनियां भर के प्रचार माध्यम इस बात से संतुष्ट रहे कि बाकी को बचा लिया गया। इस बस का अपहरण एक निलंबित पुलिस अधिकारी ने किया था जो बाद में मारा गया। पूरा दृश्य देखकर ऐसा लगा कि जैसे तय कर लिया गया था कि दुनियां भर के प्रचार माध्यमों को सनसनी परोसनी है भले ही अंदर बैठे सभी यात्रियों की जान चली जाये जो एक निलंबित पुलिस अधिकारी के हाथ में रखी एक 47 के भय के नीचे सांस ले रहे थे। एक आसान से काम को मुश्किल बनाकर जिस तरह संकट से निपटा गया वह कई तरह के सवाल खड़े करता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में क्लर्क राज्य करते हैं।’ यह बात उस समय समझ में नहीं आती जब शैक्षणिक काल में पढ़ाई जाती है। बाद में भी तभी समझ में आती है जब थोड़ा बहुत चिंतन करने की क्षमता हो। वरना तो क्लर्क से आशय केवल फाईलें तैयार करने वाला एक लेखकर्मी ही होता है। उन फाईलों पर हस्ताक्षर करने वाले को अधिकारी कहा जाता है जबकि होता तो वह भी क्लर्क ही है। अगर एडमस्मिथ की बात का रहस्य समझें तो उसका आशय फाईलों से जुड़े हर शख्स से था जो सोचता ही गुलामों की तरह है पर करता राज्य है।
अपहर्ता निलंबित पुलिस अधिकारी ने अपनी नौकरी बहाल करने की मांग की थी। बस में पच्चीस यात्री थे। उसमें से उसने कुछ को उसने रिहा किया तो ड्राइवर उससे आंख बचाकर भाग निकला। उससे दस घंटे तक बातचीत होती रही। नतीजा सिफर रहा और फिर फिर सुरक्षा बलों ने कार्यवाही की। बस मुक्त हुई तो लोगों ने वहां जश्न मनाया। एक लोहे लंगर का ढांचा मुक्त हो गया उस पर जश्न! जो मरे उन पर शोक कौन मनाता है? उनके अपने ही न!
संभव है पुलिस अधिकारी की नाराजगी को देखते हुए कुछ बुद्धिजीवी उसका समर्थन भी करें पर सवाल यहां इससे निपटने का है।
अपहर्ता ने बस पकड़ी तो उससे निपटने का दायित्व पुलिस का था मगर उसकी मांगें मानने का अधिकार तो नागरिक अधिकारियों यानि उच्च क्लर्कों के पास ही था। आखिर उस अपहर्ता से दस घंटे क्या बातचीत होती रही होगी? इस बात को कौन समझ रहा होगा कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी के नाते उसमें कितनी हिंसक प्रवृत्तियां होंगी। चालाकी और धोखे से उसका परास्त किया जा सकता था मगर पुलिस के लिये यह संभव नहीं था और जो नागरिक अधिकारी यह कर सकते थे वह झूठा और धोखा देने वाला काम करने से घबड़ाते होंगे।
अगर नागरिक अधिकारी या क्लर्क पहले ही घंटे में उससे एक झूठ मूठ का आदेश पकड़ा देते जिसमें लिखा होता कि ‘तुम्हारी नौकरी बहाल, तुम्हें तो पदोन्नति दी जायेगी। हमने पाया है कि तुम्हें झूठा फंसाया गया है और ऐसा करने वालों को हमने निलंबित कर दिया है। यह लो उनके भी आदेश की प्रति! तुम्हें तो फिलीपीन का सर्वोच्च सम्मान भी दिया जायेगा।’
उसके निंलबन आदेश लिखित में थे इसलिये उसे लिखा हुआ कागज देकर ही भरमाया जा सकता था। जब वह बस छोड़ देता तब अपनी बात से पलटा जा सकता था। यह किसने कहा है कि अपनी प्रजा की रक्षा के लिये राज्य प्रमुख या उसके द्वारा नियुक्त क्लर्क-अजी, पद का नाम कुछ भी हो, सभी जगह हैं तो इसी तरह के लोग-झूठ नहीं बोल सकते। कोई भी अदालत इस तरह का झूठ बोलने पर राज्य को दंडित नहीं  कर सकती। पकड़े गये अपराधी को उल्टे सजा देगी वह अलग विषय है।
हम यह दावा नहीं करते कि अपराधी लिखित में मिलने पर मान जाता पर क्या ऐसा प्रयास किया गया? कम से कम यह बात तो अभी तक जानकारी में नहीं आयी।
किसी भी राज्य प्रमुख और उसके क्लर्क को साम, दाम, दण्ड और भेद नीति से काम करने का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है। अपनी प्रजा के लिये छल कपट करना तो राष्ट्रभक्ति की श्रेणी में आता है। मगर यह बात समझी नहीं गयी या कुछ होता दिखे इस प्रवृत्ति के तहत दस घंटे तक मामला खींचा गया कहना कठिन है।
बात केवल फिलीपीन की नहीं  पूरी दुनियां की है। सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की है। नीतिगत निर्णय क्लर्क-जिनको हस्ताक्षर करने का अधिकार है उन क्लर्कों को अधिकारी कह कर बुलाया जाता है-लेते हैं। सजायें अदालतें सुनाती हैं। ऐसे में आपात स्थिति में संकट के सीधे सामने खड़ा पुलिस कर्मी दो तरह के संकट में होता है। एक तो यह कि उसके पास सजा देने का हक नहीं है। गलत तरह का लिखित आश्वासन देकर अपराधी को वह फंसा नहीं सकता क्योंकि वह उस पर यकीन नहीं करेगा यह जानते हुए कि कानून में उसके पास कोई अधिकारी नहीं है और बिना मुकदमे के दंड देने पर पुलिस कर्मचारी खुद ही फंस सकता हैै।
ऐसे में आधुनिक लोकतंत्र में क्लर्कों का जलजला है। संकट सामने हैं पर उससे निपटने का उनका सीधा जिम्मा नहीं है। मरेगा तो पुलिस कर्मचारी या अपराधी! इसलिये वह अपनी कुर्सी पर बैठा दर्शक की तरह कुश्ती देख रहा होता है। बात करने वाले क्लर्क भी अपने अधिकार को झूठमूठ भी नहीं छोड़ सकते। वह कानून का हवाला देते हैं ‘हम ऐसा नहीं कर सकते।’
जहां माल मिले वहां कहते हैं कि ‘हम ही सब कर सकते हैं’
पूरी दुनियां में अमेरिका और ब्रिटेन की नकल का लोकतंत्र है। वहां राज्य करने वाले की सीधी कोई जिम्मेदारी नहीं है। यही हाल अर्थव्यवस्था का है। कंपनी नाम का एक दैत्य सभी जगह बन गया है जिसका कोई रंग रूप नहीं है। जो लोग उन्हें चला रहे हैं उन पर कोई प्रत्यक्ष आर्थिक दायित्व नहीं है। यही कारण है कि अनेक जगह कंपनियों के चेयरमेन ही अपनी कंपनी को डुबोकर अपना घर भरते हैं। दुनियां भर के क्लर्क उनसे जेबे भरते हैं पर उनका नाम भी कोई नहीं ले सकता।
ऐसे में आतंकवाद एक व्यापार बन गया है। उससे लड़ने की सीधी जिम्मेदारी लेने वाले विभाग केवल अपराधियों को पकड़ने तक ही अपना काम सीमित रखते हैं। कहीं अपहरण या आतंक की घटना सामने आये तो उन्हें अपने ऊपर बैठे क्लर्कों की तरफ देखना पड़ता है जो केवल कानून की किताब देखते हैं। उससे अलग हटकर वह कोई कागज़ झूठमूठ भी तैयार नहीं कर सकते क्योंकि कौन उन पर सीधे जिम्मेदारी आनी है। जब घटना दुर्घटना में बदल जाये तो फिर डाल देते हैं सुरक्षा बलों पर जिम्मेदारी। जिनको रणनीति बनानी है वह केवल सख्ती से निपटने का दंभ भरते हैं। ऐसे में इन घटनाओं में अपनी नन्हीं सी जान लेकर फंसा आम इंसान भगवान भरोसे होता है।
मनीला की उस अपहृत बस में जब सुरक्षा बल कांच तोड़ रहे थे तब देखने वालों को अंदर बैठे हांगकांग के उन पर्यटकों को लेकर चिंता लगी होगी जो भयाक्रांत थे। ऐसे में सात यात्री मारे गये तो यह शर्मनाक बात थी। सब भी मारे जाते तो भी शायद लोग जश्न मनाते क्योंकि एक अपहृता मरना ही उनके लिए खुशी की बात थी। फिर अंदर बैठे यात्री किसे दिख रहे थे। जो बचे वह चले गये और जो नहीं बचे उनको भी ले जाया गया। आज़ाद बस तो दिख रही है।
अब संभव है क्लर्क लोग उस एतिहासिक बस को कहीं रखकर वहां उसका पर्यटन स्थल बना दें। आजकल जिस तरह संकीर्ण मानसिकता के लोग हैं तुच्छ चीजों में मनोरंजन पाते हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि यकीनन उस स्थल पर भारी भीड़ लगेगी। हर साल वहां मरे यात्रियों की याद में चिराग भी जल सकते हैं। उस स्थल पर नियंत्रण के लिये अलग से क्लर्कों की नियुक्ति भी हो सकती है। कहीं  उस स्थल पर कभी हमला हुआ तो फिर पुलिस आयेगी और कोई एतिहासिक घटना हुई तो उसी स्थान पर एक ही साल में दो दो बरसियां मनेंगी।
आखिरी बात यह कि अर्थशास्त्री एडस्मिथ अमेरिका या ब्रिटेन का यह तो पता नहीं पर इन दोनों  में से किसी एक का जरूर रहा था और उसने इन दोनों की स्थिति देखकर ही ऐसा कहा होगा। अब जब पूरे विश्व में यही व्यवस्था तो कहना ही पड़ता है कि गलत नहीं कहा होगा। आधुनिक लोकतंत्र में क्लर्क ही सिद्ध होते हैं।
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Monday, August 16, 2010

माया में भी नकली माया-हिन्दी व्यंग्य लेख (maya men bhi nakli maya-hindi vyangya lekh)

काग़ज के नोट वैसे भी नकली माया की प्रतीक है क्योंकि उनसे कोई वस्तु खरीदी जा सकती है पर उनका कोई उपयोग नहीं है। हर नोट पर रिजर्व बैंक इंडिया के गवर्नर का एक प्रमाण पत्र रहता है जिस पर लिखा रहता है कि मैं इसके धारा को अंकित रुपया देने का वचन देता हूं। चूंकि वह एक सम्मानित व्यक्ति होता है इसलिये उसका प्रमाण पत्र नोट को नोट प्रमाण बना देता है। कहने का अभिप्राय यह है कि नोट असली माया का प्रतीक है पर स्वयं नकली है पर कमबख्त अब तो नकली माया में भी नकली का संकट खड़ा हो गया लगता है।
इधर सुनते हैं कि चारों तरफ नकली नोटों का बोलबाला है। कहंी दूध तो कहीं खोए के भी नकली होने की चर्चा आती है। एक तो सारा संसाद ही मिथ्या माया का प्रतीक और उसमें भी मिथ्या।
बड़े बड़े अध्यात्मिक चिंतक इस देश में हुए हैं पर किसी ने अपनी तपस्या, यज्ञ या सत्संग में मिथ्या संसार में भी मिथ्या माया की खोज नहीं की। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अपना अध्यात्मिक चिंतन भी चूक गया है क्योंकि वह तो संसार के मिथ्या होने तक ही सीमित है। मिथ्या में भी मिथ्या के आगे वह बेबस हो जाता है।
इधर एक दूग्ध संघ के अधिकारी के पास जांच अधिकारियों को माया के अपरंपार भंडार मिले हैं और उनके लाकर नित नित नये प्रमाण उगल रहे हैं। अब यह कहना मुश्किल है कि सरकारी दुग्ध भंडार के अधिकारी ने दूध से काली कमाई कैसे की? नकली दूध बनाकर बेचा या फिर पानी मिलाकर आम उपभोक्ता को पिलाया! उनके खज़ाने में नकली नोट भी मिल रहे हैं और इससे एक बात जाहिर होती है कि जब आदमी के सामने नोट आता है तो वह उसके आने के अच्छे या बुरे रास्ते आने पर विचार नहीं कर सकता पर अब तो यह हालत है कि नकल और असल की भी पहचान नहीं रही।
मुश्किल यह है कि दूध सफेद ही बेचा जा सकता है पर उससे काली कमाई करने के दो तीन तरीके प्रचलित हैं-पानी मिलाकर, नकली बनाकर या पावडर से तैयार कर! शुद्ध दूध तो आजकल उनको ही मिलना संभव है जिन्होंने पिछले जन्म में पुण्य किये हों या स्वयं ही दूसरों को शुद्ध दूध प्रदान किया हो।
देश की जनसंख्या बढ़ रही है और उसके कारण महंगाई भी! खाद्य और पेय पदार्थों की कमी के कारण यह सभी हो रहा है। दुनियां के बहुत सारे झूठ हैं जिनमें यह भी एक शामिल है क्योंकि अपना मानना है कि सारा संकट अकुशल प्रबंध से जुड़ा है जिसे छिपाने के लिये ऐसा कहा जाता है। मुश्किल यह है कि इस देश में शिखर पर बैठे लोगों ने तय किया है कि कोई काम आसानी से नहीं होने देंगे। पूंजीपति के लिये सारे रास्ते आसान है पर आम इंसान के लिये सभ्ीा जगह मुश्किलों का ढेर है। जिसके पास अवसर आ रहा है वही नोट एकत्रित करने लगता है-न वह काला रास्ता देखता है न सफेद।
अलबत्ता दूध सफेद है तो वह सफेद ही रहेगा-असली हो या नकलीी। नोट भी नोट रहेगा असली या नकली। किसी भी दुग्ध संध के बड़े अधिकारी स्वयं दूध नहीं बेचते। दूध के विपणन में उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका होती है पर उसका निर्णायक महत्व होता है। दूध खरीदना बेचने की सामान्य प्रक्रिया के बीच एक तंत्र है जिसमें ठेके और कमीशन का खेल चलता है। तय बात है कि यह नकली नोट भी किसी ने अपने काम के लिये दिये होंगे। उसका काम असली हुआ पर माल नकली दे गया। किसने देखा कि माल भी नकली रहा हो।
हजार और पांच सौ नोटों का मामला अज़ीब है। एक तरह से समानातंर व्यवस्था चलती दिख रही है। जब सब्जी या अन्य छोटा सामान खरीदना होता है तो सौ, पचास और दस का नोट जेब में देखकर चलना होता है। बैंक से एटीएम में पांच सौ हजार का नोट जब निकलता है तो एक तो चिंता यह होती है कि कहीं नकली न आ जाये दूसरा यह भी कि उनके खर्च करने के लिये कौनसी बड़ी खरीददार होगी। हम यह दावा तो नहीं कर सकते कि कभी नकली नहीं आया क्योंकि अगर आया भी होगा तो चल गया हो, कौन कह सकता है। अलबत्ता कुछ लोगों ने ऐसी शिकायते की हैं कि बैंकों से भी नकली नोट निकले हैं। बहरहाल बड़े नोटों को बड़ी खरीददारी में खर्च कर छोटे नोट जुटाते हैं ताकि उनका छोटी खरीददारी में उपयोग किया जाये। इस तनाव में थोड़ा दृष्टिपात करें तो अपने आप को दो अर्थव्यवस्थाओं के बीच फंसा पायेंगे।
ऐसे में कभी कभी बड़ा डर लगता है कि कहीं अपने हाथ एक हजार या पांच सौं का नोट आ गया तो क्या कहेंगे-माया में भी नकली माया!
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Tuesday, August 10, 2010

अपने से अज़नबी हो गया आदमी-हिन्दी कविता (apne se azanabi ho gaya aadmi-hindi poem

लोगों की संवेदनाऐं मर गयी हैं
इसलिये किसी को दूसरे का दर्द
तड़पने के लिये मजबूर नहीं कर पाता है।

निगाहों ने खो दी है अच्छे बुरे की पहचान
अपने दुष्कर्म पर भी हर कोई
खुद को साफ सुथरा नज़र आता है।

उदारता हाथ ने खो दी है इसलिये
किसी के पीठ में खंजर घौंपते हुए नहीं कांपता,
ढेर सारे कत्ल करता कोई
पर खुद को कातिल नहीं पाता है।

जीभ ने खो दिया है पवित्र स्वाद,
इसलिये बेईमानी के विषैले स्वाद में भी
लोगों में अमृत का अहसास आता है।

किससे किसकी शिकायत करें
अपने से ही अज़नबी हो गया है आदमी
हाथों से कसूर करते हुए
खुद को ही गैर पाता है।
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Thursday, August 5, 2010

रौशनी के लिए-हिन्दी व्यंग्य कविता

रौशनी के आदी हो गये, अब अंधेरों से डरने लगे हैं।
आराम ने कर दिया बेसुध, लोग बीमारियों से ठगे हैं।।
पहले दिखाया सपना विकास का, भलाई के ठेकेदारों ने
अब हर काम और शय की कीमत मांगने लगे हैं।।
खिलाड़ी बिके इस तरह कि अदा में अभिनेता भी न टिके
सौदागर सर्वशक्तिमान को भी सरेराह बेचने लगे हैं।
अपनी हालातों के लिये, एक दूसरे पर लगा रहे इल्ज़ाम,
अपना दामन सभी साफ दिखाने की कोशिश में लगे हैं।।
टुकुर टुकुर आसमान में देखें दीपक बापू, रौशनी के लिए,
खुली आंखें है सभी की, पता नहीं लोग सो रहे कि जगे हैं।।
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Wednesday, August 4, 2010

कितने बिस्तर में कितनी बार-हिन्दी हास्य कविता (kitne bistar men kitni bar-hasya kavita)

दनदनाता आया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू,
जल्दी अपने फ्लाप होने का लबादा छोड़ दो,
जो मैं कहता हूं वही अपनी कविता में जोड़ दो,
अपनी कविता का एक जोरदार शीर्षक लिखो
‘कितने बिस्तर में कितनी बार’
यह लिखकर हिट हो जाओगे।’’
अपने चश्में को ठीक करते हुए
पहले फंदेबाज को घूरा
फिर कहैं दीपक बापू
‘‘क्या विकासवादी समझ रहे हो
जो एक शब्द में हिट होने का
सपना दिखाते हो,
हम तैयार है अगर
पूरी कविता ही तुम लिखाते हो,
लिख दें ‘कितने बिस्तर में कितनी बार’
सामग्री भी तो वैसी चाहिए
जिससे लोग खुश हो जायें
नहीं तो नाराज होंगे अपार,
हम ऐसे अकादमिक नहीं हैं कि
एक शब्द या पंक्ति पर ही मशहूर हो जायें,
सम्मान पाकर मेहनत को अपने दूर भगायें,
कम और निरर्थक लिखकर अनेक लोगों ने प्रसिद्धि पाई,
सबकी अपनी अपनी किस्मत है भाई,
ऐसे ही लोग करते इस्तेमाल
महिला के लिये लिखते ‘छिनाल’
और पुरुष के लिये छिनारा,
निजी झगड़े को पूरी सभ्यता से जोड़कर
कर लेते हैं किनारा,
शीर्षक तुमने जोरदार दिया
पर अपने को इसका कोई फायदा नहीं है
इसलिये तुमसे कोई करते वायदा नहीं है,
तुम्हारे शीर्षक को लिया तो
पेटीकोट, ब्लाऊज, पैंट और चड्डी के साथ
कुछ यौन सामग्री को ही लिखना पड़ेगा,
देश में महंगाई, बेकारी और परेशानियां बहुत हैं
ऐसे में सड़क पर दिखने वाले
मज़दूरों, बेबसों और गरीबों के
फटेहाल वस्त्रों का दृश्य आंखों में उभरेगा,
सच से परे होकर लिखना कठिन लगता है,
रात के अंधेरे से
कहीं अधिक डरावना दिन लगता है,
जमीन पर सोने वाले
बिस्तर वालों से
अधिक बड़े योद्धा होते हैं,
दौलतमंद, बड़े ओहदेदार और अक्लमंद भले ही
दिखते शहंशाह
पर असली जंग का बोझ तो
मज़दूर और गरीब ही ढोते हैं,
एक शब्द और एक पंक्ति पर
उलझना छोड़ दो
समाज की असलियत तभी समझ पाओगे,
वरना ‘कितने बिस्तर में कितनी बार’ सोए
पूरी संख्या याद नहीं कर पाओगे।’
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Friday, July 23, 2010

शब्द और भावना-हिन्दी कविता (shabda aur bhavana-hindi poem)

शब्द सुंदर हैं, पर हृदय में नहीं दिखती हैं भावनायें,
आंखें नीली दिख रहीं हैं, पर उनमें नहीं हैं चेतनायें।
प्राकृतिक रिश्ते, कृत्रिम व्यवहार से निभा रहे हैं सभी इंसान,
चमकीले चेहरों का झुंड दिखता है, पर नहीं है उनमें संवेदनायें।
जल में नभ को नाचता देखकर नहीं बहलता उनका दिल
लगता है जैसे लोटे में भरकर उसे अपने ही पेट में बसायें।
कितनी संपदा बटोरी धनियों ने गरीबों का लहू चूसकर
फिर भी हाथ खाली रखते हैं, ताकि उससे अधिक बनायें।
धर्म की रक्षा और जाति की वफा के नारे लगा रहे हैं बुद्धिमान
ज्ञान बिके उनका सदा, इसलिये समाज में भ्रम और भय बढ़ायें।
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Tuesday, July 20, 2010

हमदर्दी की रस्म-हिन्दी व्यंग्य कविता (hamdardi ki rasma-hindi vyangya kavita)

दौलत और शौहरत के सिंहासन पर
बैठे लोगों से हमदर्दी की
उम्मीद करना बेकार है
क्योंकि वह डरे सहमे हैं
अपनी औकात से ज्यादा
मिली कामयाबी के खो जाने के खौफ से ,
और दुनियां का यह कायदा
भूलना मुश्किल है कि
डरपोक लोग ही खूंखार हो जाते हैं।
इसलिये हर हादसे पर
उनकी हमदर्दी जताने को
रस्मी समझ खामोश हो जाते हैं।
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Friday, July 16, 2010

हास्य कविताएँ -भ्रष्टाचार पुराण- (bhrashtachar puran-hindi hasya kavitaen)

भ्रष्टाचार के विरुद्ध निकले
जुलूस में एक आदमी ने दूसरे से पूछा
‘‘यार, एक बात बताओ,
सभी जगह भ्रष्टाचार व्याप्त है,
इतने अभियान चलते हैं
पर नहीं होता यह समाप्त है,
बताओ तुम यह भ्रष्टाचार क्या होता है,
तुमने कभी किसी भ्रष्ट आदमी को देखा है
जिसके खिलाफ नारें लगायें।’’

दूसरे ने कहा-‘भई लगता है
बिना किराया लिये हुए यहां आए हो,
बिना मतलब के अपनी जान फंसाए हो,
भला, भ्रष्टाचार कभी समाप्त हो सकता है,
जिसके पास हो थोड़ी भी ताकत
हरे नोटों की माला पहनने के साथ ही
अपनी तिजोरी भरता है,
यह तो रस्मी जुलूस है,
जो हम अपने नेता के कहने पर करने आये हैं,
अपनी रकम पूरी पाये हैं,
किसी आदमी के खिलाफ नारे लगाकर
उसे क्यों मशहूर बनायें,
वह तुरंत अपनी सफाई देने आयेगा,
मुफ्त में प्रचार पायेगा,
फिर इस हमाम में सब नंगे हैं,
जो नहीं पकड़े गये वही चंगे हैं,
यह बड़े लोगों कराते हैं वह हमें करना है,
वह भरते तिजोरी हमें तो पेट भरना है,
पता कब किससे काम पड़ जाये
इसलिये भ्रष्टाचार के खिलाफ  खूब बोलेंगे
उससे जिनको लाभ है वही मुद्दा तोलेंगे
हम बिना वजह किसी का नाम लेकर
उसे क्यों अपना दुश्मन बनायें।’’
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जब उनसे भ्रष्टाचार पर बोलने के लिये
कहा गया तो वह बोले-
‘‘भ्रष्टाचार वह अमृत है जिसे हर कोई चखता है,
स्वयं पीकर अमर होना चाहता है
हर कोई अपनी सात पीढ़ियां
रखना चाहता है हष्टपुष्ट
पर दूसरे पर वक्र दृष्टि रखता है,
जो पीयें उनकी सात पुश्तें तरती
जो न पीयें उनके बच्चे जन्म भर पछतायें।
इससे ज्यादा हम नहीं समझे
तुम्हें क्या समझायें।’’
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Saturday, July 10, 2010

बेवफाओं की भीड़-हिन्दी व्यंग्य कविता (bevfaon ki bheed-hindi vyangya kavita)

दूसरों में वफा की तलाश करते हुए
गुजार देते हैं लोग पूरी जिंदगी
फिर निराश हो जाते हैं।
पर कोई भी इंसान
अपने अंदर बैठे गद्दार को
मार नहीं पाया
सभी ज़माने में वफादार ढूंढते हुए
बेवफाओं की भीड़ में खो जाते हैं।
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एक तरफ दौलत, शौहरत और ताकत के
सिंहासन पर आका खड़े हैं
दूसरी तरफ चमचे उनकी दरबार में जड़े हैं।
बाकी इंसान तो भेड़ों की तरह चल रहे
जिनके सपने अपनी औकात से बड़े हैं।
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Saturday, July 3, 2010

दौलतमंद को सलाम-हिन्दी हास्य कविता (daulatmand ko salam- hasya kavita

भ्रष्टाचार एक भूत है
जो कभी नहीं मिटता,
क्योंकि कभी नहीं दिखता।
जिसकी जेब में जाता पैसा
वह हक की तरह रखता,
जिसकी जेब से जाता
वह भी कहीं अपना दांव तकता,
ज़माने ने बंद कर ली आंख
हर दौलतमंद को सबका सलाम मिलता यहां
भरे बाज़ार में ईमान कौड़ी के भाव बिकता।
जब नहीं लगा मोल
तभी तक हर कोई उसूलों पर टिकता।
चला जो अमीर बनने की राह पर
इंसानियत का हिसाब भी पैसों में लिखता।
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Sunday, June 6, 2010

क्रिकेट मैचों को दो भागों में बांटा जाये-हिन्दी लेख (cricket match and world cup footbal-hindi lekh)

विश्व कप फुटबाल प्रारंभ हो रहा है और टीवी चैनल वालों की समस्या यह है कि उसमें आसानी से अपना समय खर्च कर कमाने का प्रयास जरूरी है पर देश मे यह खेल इतना लोकप्रिय नहीं है। अगर देश में यह खेल लोकप्रिय नहीं है तो टीवी चैनल चाहें तो उससे मुंह फेर लें पर वह ऐसा भी नहीं कर सकते क्योंकि उनको विदेशी चैनलों की बराबरी करते दिखना भी जरूरी लगता है। इसलिये फुटबाल के लिये दर्शक जुटाने का प्रयास प्रारंभ कर दिये हैं। यह प्रयास फलीभूत नहीं भी हों तो भी वह फुटबाल के प्रसारण पर समय खर्च करने के अपने प्रयास को सही तो वह साबित कर ही सकते हैं इसलिये उन्होंने उसके प्रचार क्रिकेट से अपने माडल चुन लिये हैं। एक तो पुराना क्रिकेट कप्तान है जो बता रहा है कि ‘वह रात भर इन मैचों के लिये जागेगा।’
ऐसा नहीं है कि भारत में फुटबाल खेल की लोकप्रियता कोई शून्य के स्तर पर है पर वह जनमानस में क्रिकेट इतना नहीं जाना जाता जिस पर लोग अपना ढेर सारा फालतू वक्त बरबाद कर सकें। बंगाल में तो बहुत समय तक फुटबाल का जादू चला है। ईस्ट बंगाल, मोहम्मडन स्पोर्टिंग तथा मोहन बागान नाम के प्रसिद्ध क्लब रहे हैं जिन्होंने लंबे समय तक पूर्वी क्षेत्र में फुटबाल को लोकप्रिय बनाया। स्थिति यह थी कि देश के सभी समाचार पत्र उन प्रदेशों में भी अपने खेल पृष्ठों पर उनके मैचों के समाचार देते थे जहां यह खेल बिल्कुल नहीं खेला जाता। कम खेले जाने के बावजूद स्थिति यह थी कि बंगाल के इन फुटबाल खिलाड़ियों के इतना पैसा मिलता था कि उनमें से कुछ राष्ट्रीय टीम के लिये खेलने से कतराते थे। उनसे समय निकालकर देश के लिये खेलने का आग्रह किया जाता था। कालांतर में वहां के कुछ खिलाड़ियों देश की टीम को ऊंचे स्तर पर पहुंचाने का प्रयास किया भी पर नाकाम रहे।
उस समय के अखबार लिखते थे कि देश में फुटबाल का स्तर चाहे कुछ भी हो पर अनेक देशों के खिलाड़ियों के मुकाबले भारतीय क्लब के खिलाड़ी अधिक कमाते हैं। लगता है कि क्रिकेट भी अब इसी राह पर चल पड़ा है।
कल त्रिकोणीय मुकाबले में भारत अपना तीसरा मैच हारकर प्रतियोगिता से बाहर हो गया। टीम के खिलाड़ियों के नये या अनुभवी होने का बहाना सरलता से किया जा सकता है पर सच तो यह है कि वरिष्ठ खिलाड़ियों की उपस्थिति भी इस परिणाम को बदल नहीं सकती थी। अब विश्व कप क्रिकेट होने वाला है और उसमें आप देखना यह वरिष्ठ खिलाड़ी क्या कर पाते हैं?
अभी बीस ओवरीय विश्व कप में भी हमने देखा था कि देश की व्यवसायिक प्रतियोगिता में भारी धन लेकर खेलने के आदी हो चुके इन खिलाड़ियों के लिये अब यह संभव नहीं रहा कि वह इन प्रतियोगिताओं को गंभीरता से लें जो अधिक पैसा नहीं देती। कहने को तो यह कहा जा रहा था कि आईपीएल से भारतीय क्रिकेट को फायदा होगा पर उससे होने वाली हानि का अंदाजा किसी को नहीं था। पहले खिलाड़ी राष्ट्रीय प्रतियागिताओं में इसलिये खेलते थे कि देश की टीम में जगह मिले पर अब इसलिये खेल रहे हैं ताकि आईपीएल में जगह मिले। मानसिकता का अंतर आ गया है। वह दोहरी मानसिकता का शिकार हो रहे हैं। अगर वह क्रिकेट से प्रतिबद्ध होते तो चाहे जहां खिला लो वह अपना स्वाभाविक खेल दिखाते पर उनकी प्रतिबद्धता अधिक से अधिक पैसा बटोरना है। यह भावना बुरी नहीं है पर मुश्किल यह है कि क्रिकेट अब उनके लिये धर्म नहीं कमाऊ कर्म रह गया है और अंतर्राष्ट्रीय मैचों मेें यह जज़्बात अधिक देर नहीं चलते।
भारतीय खिलाड़ी दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन या आस्ट्रेलिया की तरह नहीं है जो हर हाल में व्यवसायिक रहते हैं चाहे अधिक पैसा मिले या कम। कहंी न भी मिले तो अपना स्वाभाविक खेल नहीं छोड़ते। यहां तो भारतीय खिलाड़ी अपनी भौतिक उपलब्धियों के बोझ तले दबे जा रहे हैं। कई खिलाड़ी तो केवल इसलिये खेल रहे हैं कि उनका नाम चलता रहे ताकि विज्ञापन का दौर बना रहे।
हम यह नहीं कहते कि व्यवसायिक प्रतियोगिता बंद होना चाहिये मगर अब क्रिकेट को दो भागों में बंटना होगा। एक व्यवसायिक तथा दूसरा अंतराष्ट्रीय! कम से कम भारत में तो यही करना पड़ेगा। टेस्ट मैच, एक दिवसीय तथा बीस ओवरीय मैचों के लिये अलग अलग टीम रखनी होगी क्योंकि इन तीनों का प्रारूप ही अलग है और यह बात तो विशेषज्ञ भी मानते हैं।
व्यवसायिक खिलाड़ियों का बूता नहीं है कि वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता जितवा सकें।
खिलाड़ियों के चयन का आधार भी रणजी ट्राफी और देवधर ट्राफी रखना चाहिये। व्यवसायिक प्रतियोगिताओं में हारने से खिलाड़ी की हार से किसी पर कोई अंतर नहीं पड़ता पर जब देश का नाम आता है तो दुःख होता है। चूंकि भारत की क्रिकेट नियंत्रण करने वाली संस्था अब पूरी तरह व्यवसायिक हो गयी है इसलिये सरकार को अपने देश के नाम पर चुनी जाने वाली टीम के चयन में हस्तक्षेप करना ही चाहिए। ऐसे में अव्यवसायिक खिलाड़ियों को चुनना चाहिये जो क्षेत्ररक्षण या बल्लेबाजी के साथ ही गेंदबाजी में जान लगाकर खेलते हैं। व्यवसायिक प्रतियोगिता मं पैसा कमाने के आदी हो चुके खिलाड़ियों का तो अब एक ही क्ष्य रह गया है कि कथित रूप से अंतराष्ट्रीय मैचों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराओ, एक दो मैचा अच्छा खेलो ताकि व्यवसायिक प्रतियोगिता के किसी क्लब में अपनी नीलामी हो सके। जबकि देश के लिये खेलने के लिये स्वाभिमान की भावना जरूरी है।
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