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Tuesday, December 2, 2014

शब्दों के अर्थ और मायाजाल-हिन्दी कविता(shabdon ke arth aur mayajal-hindi poem)



बाहर हंसने की
नाकाम कोशिश करते लोग
मगर उनके दिल टूटे हैं।

शब्दों का मायाजाल
बुनने में सभी माहिर होते
अनुमान नहीं लगता कि
अर्थ कितने सत्य कितने झूठे हैं।

कहें दीपक बापू सभी के दिल
लगे हैं माया जोडने में,
कुछ उड़ाते
वफा का वादा हवा में
कुछ लगे रिश्ते तोड़ने में,
कमाई के जरिये पर
कोई सवाल नहीं करता
जानना चाहते हैं कि
किसने कितने सिक्के लूटे हैं।
---------------------

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Wednesday, August 14, 2013

१५ अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर विशेष हिंदी लेख-राजसी प्रकृति के लोगों को दृढतापूर्वक राजसी कर्म करना चाहिए (special hindi article on 15 august independay day of india-rajsi prakriti ke logon ko hee drudhtapurvak rajsi karma karna chahiye)



        भारत 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की राजनीतिक दासता से मुक्त हुआ था। जब हम राजनीतिक विषय की बात बरते हैं तो उसका संबंध सीधे मनुष्य की राजस प्रकृति और कर्म से होता है।  जैसा कि हम जानते हैं कि मनुष्य की तीन प्रवृत्तियां होती हैं। सात्विक, राजस और तामस, इसी क्रम में उसके कर्म भी होते हैं।  मनुष्य समाज में राजस भाव के लोगों की प्रधानता होती है और सच बात यह है कि संसार के समुचित संचालन में उनका ही योगदान होता है पर यह यहां स्पष्ट कर दें कि सब कुछ वही नहीं होते। तामसी प्रवृत्ति वाले लोगों का संसार संचालन में अपनी उपस्थिति के अलावा
अन्य कोई योगदान नहीं होता। सात्विक प्रकृत्ति के लोग येनकेन प्रकरेण राजसी प्रकृत्ति के लोगों के प्रति सद्भाव तो रखते हैं पर उनकी प्रकृति और कर्म का अनुकरण नहीं करते।  अगर मदद मांगी जाये तो वह राजसी प्रकृति के मनुष्य की सहायता करने को तैयार भी हो जाते हैं पर उनका अपने लाभ को लेकर कोई लोभ नहीं होता। राजसी प्रकृत्ति वाले कभी कोई काम बिना लाभ के नहीं करते। अपने पद, पैसे और प्रतिष्ठा का उनमें अहंकार भी रहता है। तामस प्रकृत्ति के लोगों का वह सहजता से उपयेाग करते हैं पर अर्थ सिद्ध न करें तो सात्विक मनुष्य की तरफ उदासीनता का भााव दिखाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि राजसी प्रकृति का जैसा स्वभाव है वैसा ही उसे धारण करने वाले का कर्म भी होता है। राजसी व्यक्ति कभी निष्कर्म भाव से सक्रिय नहीं रहता।
            अगर हम इस संसार में संचालन की तरफ देखें तो उसका भौतिक संचालन राजस भाव से ही संभव है। यहां तक कि सात्विक भाव वाले भी कभी न कभी राजस भाव धारण कर कार्य करते हैं।  इन तीनों से परे कर्मयोगी होते हैं जो कर्म की प्रकृति देखकर उसे करने के लिये वैसा ही भाव अपनाते हैं।  वह चाहे जो भी काम करें निष्कर्म भाव से करते हैं।  तय बात है कि ऐसे लोग  विरले ही होते हैं।  हां, यह जरूर है कि कुछ सात्विक प्रकृत्ति के लोग कभी कभी राजस कर्म की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इनमें एक नाम आता है महात्मा गांधी।  देखा जाये तो महात्मा गांधी सात्विक प्रकृत्ति के थे।  दक्षिण अफ्रीका में जब उनको भारतीय होने के कारण रेल के उस डिब्बे से निकाला गया जो केवल गोरे लागों के लिये सुरक्षित था तब उनके मन में आक्रोश का भाव पैदा हुआ। वहीं से उनकी अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोला तो उसकी चरम परिणति  15 अगस्त 1947  को भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के रूप में हुई।  सात्विक प्रकृत्ति के महात्मा गांधी ने राजसी भाव से जिस तरह अपना लक्ष्य प्राप्त किया वह पूरी दुनियां के लिये अनुकरणीय है।
        इसके बावजूद कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर सहजता से नहीं मिल पाता। पहला प्रश्न तो यह कि गांधीजी ने स्वतंत्रता तो दिलाई पर सत्ता से दूर रहे।  कुछ लोग इसे उनका त्याग मानते हैं पर ज्ञान साधक उनके इस भाव को स्वीकार नहीं करते। जब अंग्रेज भारत छोड़ रहे तो महात्मा गांधी यहां की व्यवस्था से प्रथक क्यों हुए? क्या सत्ता केवल भोग  के लिये है जिससे दूर रहना एक पुण्यकर्म है? यदि हम यह माने कि यह त्याग है तो इसका मतलब हम मानते हैं कि राज्य की व्यवस्था तो भगवान के भरोसे ही चलती है और राजा या राज्य प्रमुख तो केवल सुख भोगी होता है।  उस पर प्रजा की भलाई के लिये कोई जिम्मा नहीं होता और उसके लिये चतुराई के साथ उदारता की आवश्यकता भी नहीं होती।  सच तो यह है कि सात्विक प्रकृत्ति के महात्मा गांधी राजसी भाव में एक सीमा तक ही लिप्त हो सकते थे।  कहीं न कहीं अंग्रजों के प्रति उनके मन में नाराजगी का भाव था जो कि विशुद्ध रूप से राजसी भाव का प्रतीक था। जिनकी सात्विक प्रकृति होती है वह राजसी कर्म में निरंतर लिप्त नहीं रह पाते। किसी भी आंदोलन में व्यक्ति की सक्रियता नियमित नहीं होती है इसलिये उसका ठीक से आंकलन नहीं होता। दूसरी बात यह कि आंदोलन चाहे हिंसक हो या अहिंसक कही  न कहीं किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति के विध्वंस का भाव लिये होते हैं।  महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को भारत से बाहर किया पर जब उसके बाद नये भारत क निर्माण का प्रश्न आया तो वह त्यागी हो गये।  अब सवाल आता है कि निर्माण तो किसी भी व्यक्ति की रचनात्मकता की प्रकृति से ही संभव है।  महात्मा गांधी ने सरकार में कोई पद नहीं लिया इसे क्या समझा जाना चाहिये?  हमारा मानना है कि किसी समूह को आंदोलन सफल होने के बाद अभियान चलाना भी आना चाहिये।  आंदोलन से विध्वंस के बाद रचना का अभियान न चलाया जाये तो यह मानना चाहिये कि नेतृत्व में क्षमता का अभाव है।
      महात्मा गांधी के इस कथित त्याग ने देश में तत्कालीन ही नहीं वरन् भविष्य की राजनीतिक पीढ़ी को भी गलत संदेश दिया। आज भी राजनीति में सक्रिय लोगों से जब प्रधानमंत्री या  मुख्यमंत्री पर पर बैठने की इच्छा के बारे में तो वह हृदय में लालसा होते हुए भी मना करने का स्वांग रचते हैं। क्या वह यह साबित नहीं करते कि उच्च पद जिम्मेदारी की बजाय भोग के लिये होता है? दूसरी बात यह कि राजनीति को समाज सेवा के लिये अपनाने का ढोंग कई तरह के विरोधाभासों को उत्पन्न करता है। राज्य प्रमुख  को दृढ केवल न होना चाहिये वरन् दिखना भी चाहिये।  इससे प्रजा तथा शत्रु राष्ट्र डरे रहते हैं।  अगर उच्च पदों पर मन में कुछ और जुबान पर कुछ होने वाले बैठेंगे तो यकीनन राज्य में प्रजा की प्रसन्नता की आशा नहीं करना चाहिये।  सच तो यह है कि राजनीति समाज सेवा का नहीं वरन् राज्य को साधने के लिये करना चाहिये।  सभी को साथ लेकर चलने का स्वांग करने की बजाय सभी को साधने का निश्चय उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को धारण करना चाहिये।  गांधी जी ने अंग्रेजों के राज्य का विध्वंस करने वाले आंदोलन के प्रेरक तो बने पर देश की व्यवस्था को नया रूप देने के लिये किसी अभियान को कैसे चलायें, यह संदेश नहीं दे पाये।  कोई पद लेकर वह शासन चलाने की तरीका सिखाते तो यकीनन उनका दर्जा महात्मा  की बजाय देवता का होता।  यही कारण है कि उनके अनेक अनुयायी यदकदा उनके नाम का जाप करते हुए दूसरी आजादी का आंदोलन करते हैं। कोई कहता है कि हमें अधूरी आजादी मिली।  हम देख रहे हैं कि भारत अभी भी राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से अस्थिर मनस्थिति में फंसा है।  गांधी के ढेर सारे कथन हैं पर उनसे आंदोलन ही चल सकता है।  उनका संदेश या दर्शन किसी अभियान में सहायक हो सकता है, इसके लिये गांधी जी ने कोई उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया।
      बहरहाल 15 अगस्त 1947 को भारत ने राजनीतिक आजादी पायी। इससे अधिक इसका कोई महत्व नहीं है। इससे पूर्व जो भारत था उसके अब तक तीन भाग हो चुके  हैं। एक पाकिस्तान तथा बंग्लादेश तो तीसरा भारत।  दोनों ही देश दुश्मन बने हुए हैं।  मतलब यह कि इस दिन हमने एक दुश्मन पाया जिसके हमने ही दो टुकड़े किये पर दोनों का रवैया एक जैसा है।  पहले अंग्रेजों से लड़ते थे आज इन दोनों टुकड़ों से लड़ना पड़ रहा है।  जहां देश की व्यवस्था का प्रश्न है तो वह अंग्रेजों ने जो बनायी वही चल रही है। इतना ही नहीं हम दावा करते हैं कि अब हमारे अपने कानून हैं पर ताज्जुब हैं उनमें से अधिकतर अंग्रेजों के बने हुए है।  इनमें से कई कानून ऐसे हैं जो अनेक उन कामों को गलत मानते हैं जिनको अंग्रेजी समाज आज भी नहीं मानता।  यही कारण है कि अनेक वि़द्वान अभी भी पूर्ण आजादी के लिये वैचारिक युद्ध मे व्यस्त रहते हुए बहसें करते हैं।  जिनके पास शिखर पर पद हैं पता नहीं वह उनका कितना आनंद उठाते हैं, पर एक बात तय है कि अंग्रेजों की व्यवस्था चल रही है सो चल रही है। वैसे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ कहते हैं कि ‘‘लोकतंत्र में लिपिक शासन चलाते हैं।’’
       एडमस्मिथ ने कभी भारत का दौरा किया यह तो पता नहीं पर उसने यह उस पश्चिमी व्यवस्था को देखकर ही कहा होगा जिसका अनुकरण हम कर रहे हैं।  हमारे देश में जो व्यवस्था है उसे कौन चला रहा है यह पता नहीं चलता।  खासतौर से उच्च पदों पर विराजमान शिखर पुरुष भी कभी कभी अपने अधीनस्थ अधिकारियों की-लगता है एडमस्मिथ उनको ही क्लर्क मानते होंगे-शिकायत करते हैं कि वह उनकी सुनते ही नहीं है तब यह कहना ही  पड़ता है कि यह देश भगवान भरोसे ही चल रहा है। इस स्वतत्रता दिवस पर हम इतना ही कह सकते हैं कि अभी देश के राजसी प्रवृत्ति के लोगों को सीखने की आवश्यकता है इसके लिये उन्हें कम से कम सात्विक होने का पाखंड छोड़कर राजसी कर्म के प्रति राजसी भाव से दृढ़ता पूर्वक लिप्त होना चाहिये। 
       सभी ब्लॉग लेखक मित्रों और पाठकों इस स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर हार्दिक बधाई।




  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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Saturday, September 1, 2012

हिंदी दिवस पर लेख-यथार्थवाद के बाज़ार को फैसबुक से चुनौती (hindi diwas par lekh-yatharthawad ke bazar ko facebbok ki chunauti-article on hindi divas )

       हमारे देश में यथार्थवादी लेखकों तथा बुद्धिजीवियों को अनेक राजकीय सम्मान मिले हैं।  यह लेखक और बुद्धिजीवी स्वयं को समाज का बहुत बड़ा झंडाबरदार समझते रहे हैं।  स्थिति यह रही है कि इनके समर्थक इन्हें समाज का सच सामने लाने वाला ऐसा महान आदमी मानते हैं जो अगर पैदा नहीं होता तो शायद लोग अंधेरे में जीते। इन यथार्थवादियों को हिन्दी के प्रकाशन तथा प्रचार संगठनों का बहुत समर्थन मिला है। स्थिति यह रही है कि इनके यथार्थवाद ने समाज में कोई सुधार तो नहीं ला सका अलबत्ता इनकी सामग्री का प्रचार प्रसार होने पर अंतर्राष्ट्रीय पटल पर  देश की छवि हमेशा खराब ही रही।  इनको सांगठनिक प्रकाशन तथा प्रचार मिलने  से   समाज में अध्यात्म तथा साहित्यक क्षेत्र में निष्पक्ष लेखकों को कभी आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला।
   इस यथार्थवाद में जिस कचड़े को प्रस्तुत किया जाता है दरअसल वह हमारे समाज में पहले से दिखता है।  समाज के कुछ सदस्य इसे भोगते हैं तो कुछ उनके हमदर्द बनकर सहारा भी देते हैं।  इन दोनों के लिये यथार्थवादी एक कल्पित क्रांतिकारी होता है।  एक अभिनेता ने अभी हाल में टीवी चैनल पर समाज के अनेक यथार्थों को प्रस्तुत किया तो वह लोकप्रिय हो गया।  सच बात तो यह है कि उसकी प्रस्तुति को आमजन में अधिक महत्व नहीं दिया क्योंकि समाज में वह सब पहले से ही देख रहा है।  समाज की अनेक दुखांत घटनाओं के समाचार भी हम देख रहे हैं।  यह अलग बात है कि हमारे प्रचार और प्रकाशन प्रबंधक मानते हैं कि भारतीय समाज सोया हुआ है और यथार्थ का चित्रण एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

           चाहे छोटे पर्दे का हो या बड़े पर्दे का अभिनेता  वह बाज़ार और प्रचार समूहों का एक ऐसा बुत होता है जो आमजन को मनोरंजन में इस तरह व्यस्त  रखने में सहायक होता है जिसका  उसका दिमाग कहीं गरीब और अमीर के बीच बढ़ते तनाव के विचलित न हो और देश बदलाव से दूर रहे।  इस यथार्थ में भले ही दोष आर्थिक, धाार्मिक, सामाजिक तथा राजनीति क्षेत्र के शिखर पुरुषों का हो पर उसके लिये समाज को दायी माना जाये। यह काम पहले लेखक करते थे अब अभिनेता भी करने लगे।  छोटे और बड़े पर्दे पर अभिनेता तथा अभिनेत्रियों का राज है और बाज़ार तथा प्रकाशन से जुड़े व्यवसायी उनका चेहरे के साथ नाम अपनी सामग्री बेचने के लिये उसी तरह कर रहे हैं जैसे कि पहले बुद्धिजीवियों के लिये सेमीनारों का आयोजन तथा लेखकों की किताबें प्रकाशित करते थे।
बहरहाल इन्हीं यथार्थवादियों के लिये अब फेसबुक एक चुनौती पेश कर रहा है। यहां अनेक लोग समाज का चित्र अपने कैमरे से कैद कर इस मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं। वह चित्र डराते हैं, हंसाते हैं और दिल को गुदगुदाते हैं।  उस दिन एक चित्र देखा उसमें एक गिलहरी प्लास्टिक की डंडी के सहारे ठंडेपेय की एक खाली बोतल में बची सामग्री अपने मुंह में खींचने की कोशिश कर रही थी। वैसे भी गिलहरियों की अदायें अनेक बार रोचक होती हैं। प्राकृतिक प्रेमियों के लिये उसकी चाल भी बड़ी रुचिकर होती है। 
      एक चित्र में दो बच्चों का चित्रण देखा जिसमें बड़ा बच्चा कचड़े से खाना उठाकर अपनी गोदी में बैठे बच्चे को खिला रहा था। हृदय को चुभोने वाला दृश्य यथार्थवादियों के ढेर सारे शब्दों या फिल्मों से अधिक प्रभावी था।   ऐसे बहुत चित्र देखने को मिलते हैं जिनकी प्रस्तृति लंबी खींचने या उन पर शब्दों का अपव्यय करना बेकार लगता है।  वह चित्र बहुत बड़ी कहानी कह देता है। हम जैसे आम लेखकों के लिये ब्लॉग और फेसबुक पर अधिक समर्थन नहीं होता न ही समाज में प्रचार मिलता है। इसका कारण यह है कि बाज़ार, प्रचार तथा प्रकाशन समूहों के शिखर पुरुष और उनके प्रबंधक अंतर्जाल  पर केवल प्रचारित लोगों की उपस्थिति ही दिखाते हैं।  
         आम लेखक का प्रचार करना इन  समाज पर कब्जा जमाये अपने संगठनों से प्रतिबद्ध लेखकों तथा बुद्धिजीवियों के लिये चुनौती पेश करने में उनको डर लगता है।  इसके बावजूद यह सच है कि फेसबुक ने इन सभी को चुनौती दी है।  इनके पेशेवर बुद्धिजीवियों और लेखकों से आज की पीढ़ी कट गयी है।
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लेखक एंव कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
Writer and poet-Deepak raj kureja "Bharatdeep"
Gwalior' Madhya Pradesh

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Saturday, November 19, 2011

धोखे के पीछे सच सो रहा चादर तान-हिन्दी शायरियां (dhokhe ke peechhe sach so raha hai-hindi shayariyan)

इस धरती पर भी बहुत सारे तारे चलते हैं,
जहां को रौशन करने वाले चिराग भी जलते हैं।
जिन्होंने अपने चेहरे सजाये सौंदर्य प्रसाधनों से
उम्र के साथ वह भी डूबते सूरज की तरह ढलते हैं,
लूट लिया पसीने से कमाया खजाना उन्होंने
मेहनतकशों की दरियादिली पर जो रोज पलते हैं।
कहें दीपक बापू उखड़ जाती है जिनकी जल्दी सासें
लोग उनके आसरे अपनी जिंदगी रखकर मचलते हैं।
---------------
गद्दार बता रहे हैं वफा की पहचान,
लुटेरे पा रहे हैं इस जहां में सम्मान।
सौंदर्य सज गया है नकली सोने से
क्या करेंगे जौहरी, सच लेंगे जो जान,
कहें दीपक बापू, जहां में अक्ल चर रही घास
धोखे की पीछे सच सो रहा है चादर तान।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, September 21, 2011

गरीबी हटाने की योजना-हिन्दी कविता (garibi hatane ki yojana-hindi kavita or poem

पोते ने पूछा दादाजी से
‘‘दादाजी आप यह बताओ
बड़े बड़े लोग उपवास क्यों रखते हैं,
छक कर खाते मलाई और मक्खन
फिर भी क्यों भूख का स्वाद चखते हैं।
दादाजी ने कहा
‘‘बेटा,
गरीबों का दिल जीतने के लिये
बड़े लोग उपवास इसलिये करते हैं
क्योंकि उनकी भूख शांत करने के लिये
रोटियां बांटने का जिम्मा लेकर मिली कमीशन से
अपनी तिजोरी भी वही भरते हैं,
देख लेना 32 रुपये खर्च करने वाला
अब गरीब नहीं माना जायेगा,
फिर भी गरीबों की संख्या
आंकड़ों में बढ़ती दिखेगी,
बड़ों की कलम मदद की रकम भी बड़ी लिखेगी,
उनको गरीबों से हमदर्दी नहीं है
फिर भी अपनी शौहरत और दौलत
बढ़ाने के लिये
वह गरीबी हटाने की योजना हमेशा साथ रखते हैं।
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Thursday, August 11, 2011

आरक्षण फिल्म पर हायतौबा फिक्सिंग लगती है-सामाजिक लेख (a film movie on resevetion aarakshan and fix discussion and dissput-a hindi social article)

               एक बात तय है कि चाहे जितनी बहसें   और प्रदर्शन हो जायें फिल्म आरक्षण का प्रदर्शन रुकेगा या बाधित होगा ऐसा नहीं लगता। वजह साफ है कि बाज़ार और प्रचार का संयुक्त उपक्रम इस तरह है कि वह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में विभिन्न मुद्दे उठाकर इसी तरह अपने उत्पाद, सेवायें तथा पठनीय या दर्शनीय सामग्री का विक्रय करता है। फिल्म आरक्षण के निर्माता का तो पता नहीं पर उसके सभी अभिनेता निश्चित रूप से बाज़ार और प्रचार के नायक हैं। उनके पास न केवल फिल्मों का ढेर है बल्कि अनेक वस्तुओं के विज्ञापनो में उनके चेहरे प्रतिदिन देखे जा सकते हैं। मतलब यह फिल्म भी बाज़ार और प्रचार के उपक्रमों का ही एक सृजन है। जिस तरह उदारीकरण के चलते बाज़ार और प्रचार उपक्रमों ने समूचे विश्व पर अधिकार कर लिया है उसे देखकर नहीं लगता कि ‘आरक्षण’ फिल्म का प्रदर्शन रुक जायेगा। बल्कि ऐसा लगता है कि इसे प्रचार दिलानें के लिये विवाद खड़ा किया गया है । पहले भी किसी फिल्म के गाने या दृश्यों पर पर आपत्तियों  का प्रचार किया गया पर बाद में कुछ हुआ नहीं। उल्टे फिल्मों को प्रारंभ में ही अच्छी बढ़ता मिली यह अलग बात है कि बाद के दिनों में उनका प्रभाव एकदम घट गया। सीधी बात कहें तो फिल्म ‘आरक्षण’ पर यह हायतौबा फिक्सिंग लगती है।
            यह फिल्म देश की नौकरियों में जाति के आधार पर आरक्षण नीति पर आधारित है। हम यहां इस पर बहस नहीं करना चाहते कि यह नीति गलत है या सही। वैसे भी फिल्म के निर्माता का कहना है कि यह फिल्म आरक्षण नीति पर कोई तर्कसंगत दृष्टिकोण रखने के लिये नहीं बनी। फिल्म में क्या है यह तो पता चल ही जायेगा पर जिस तरह इस फिल्म पर बहस हो रही है और जो तर्क आ रहे हैं वह अधिक चर्चा लायक नहीं है क्योंकि उनमें कुछ नया नहीं है। अलबत्ता अभिव्यक्ति की स्वततंत्रा का मुद्दा जरूर चर्चा का विषय है। पहली बात तो यह है कि बाज़ार और प्रचार के शिखर पुरुषों की ताकत इतनी बड़ी है कि लगता नहीं है कि उनकी यह फिल्म रुकेगी या बाधित होगी। दूसरी बात यह है कि अभिव्यक्ति अब केवल संगठित क्षेत्रों की सपंत्ति बन गयी है। टीवी चैनल और समाचार पत्रों के विद्वान बड़े शहरों में रहने वाले व्यवसायिक प्रचारक होते हैं। उनके वही रटे रटाये तर्क सामने आते हैंे जो बरसों से सुन रहे हैं। इसलिये आम इंसान की अभिव्यक्ति के मुखर होने का तो प्रश्न ही नहीं है।
            दरअसल हम अगर देश की ‘आरक्षण’ नीति पर बहस करेंगे तो ऐसे कई सवाल हैं जो नये ंसदर्भों के उठते हैं जिनपर कथित समर्थक प्रचारक कभी ध्यान नहीं देते तो विरोधियों का भी यही हाल है। आरक्षण समर्थकों में कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने संगठन बनाये बैठे हैं और दावा करते हैं कि वह अपनी समाजों के रक्षक हैं। वह अपने रटे रटाये तर्क लाते हैं। ‘आरक्षण’ का विरोध सार्वजनिक रूप से कोई करता नहीं है क्योंकि ऐसा करने वालों को व्यवस्था से प्रतिरोध का भय रहता है। अगर हम पूरे विश्व के देशों की व्यवस्थाओं का देखें तो सच यह लगता है कि तो आरक्षण हो या न हो इस पर बहस करना ही व्यर्थ है। अभी हाल ही में ब्रिटेन में हुए दंगों में अश्वेतों की उपेक्षा का परिणाम मान गया। इस लिहाज से तो आरक्षण होना भी बुरा नहीं है।
         मुख्य बात यह है कि हम अपनी व्यवस्थाओं का स्वरूप कैसे चाहते हैं? हम उनको जनोन्मुखी बनाना चाहते हैं या उसमें भागीदारी का स्वरूप देखना चाहते हैं। अगर जनोन्मुखी बनाना चाहते हैं तो पूरी तरह से व्यवसायिक कौशल वाले लोगों को आगे रखना होगा और व्यवस्था में भागीदारी दिखाना चाहते हैं तो फिर हमें यह स्वीकार करना होगा कि उसमें कुछ समझौते तो करने ही पड़ेंगे। समस्या यह है कि भागीदारी के स्वरूप में कार्यकर्ता अपने पदों के अधिकार समझते हैं कर्तव्य नहीं जबकि जनोन्मुखी होने पर उनका रुख दायित्व निभाने वाला रहता है।
         हम बार बार देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर व्यथित होने का दावा तो करते हैं पर व्यवस्था में पनपी अकुशलता को अनदेखा कर देते हैं जबकि सारे संकट का कारण वही है। जहां तक कुशल लोगों का सवाल है तो हर जाति, धर्म, भाषा और हर क्षेत्र में हैं पर क्या हमने सभी को अवसर दिया है? क्या देश के सभी कुशल प्रबंधक सम्मानजजनक पदों पर पहुंचे हैं। हमने पद पाना कौशल मान लिया पर उसके कर्तव्यों के निर्वहन की कुशलता पर कभी विचार नहीं किया। हम यहां जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर विचार तो यह बात साफ दिखाई देगा कि आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में व्यवस्था इस तरह हो गयी है कि निजी चतुराई के सहारे अपने स्वार्थ सिद्ध करने वाले पद हथिया लेते हैं पर व्यवसायिक कौशल वाले लोगों को कहीं स्थान नहीं मिल पाया।
      आरक्षण समर्थक एक बुद्धिजीवी ने सवाल किया कि ‘क्या फिल्म को प्रमाण पत्र देने वाले सैंसर बोर्ड में एक भी हमारे समाज का है?’
         इसका जवाब कोई क्या देगा? दरअसल अगर उनसे कहा जाये कि इस मसले पर बहस के लिये अपने समाज से वह आदमी ले आओ जिसके पूरे खानदान में किसी ने आरक्षण का किसी भी तरह लाभ नहीं लिया हो। एक बात बता दें कि जिन समाजों को आरक्षण है उसमें कई ऐसे परिवार हैं जिनकी किसी पीढ़ी को इसका लाभ नहीं मिला। ऐसे लोग आरक्षण को लेकर इतने संवेदनशील भी नहीं होते पर जब भावना की बात आती है तो उनकी संख्या का सहारा लेकर ऐसे अनेक आरक्षण समर्थक विद्वान अपनी बात वजनदार होने का दावा करते हैं। देश के निम्न जातियों के गरीब लोगों की हालत बद से बदतर होती गयी है। आरक्षण की सुविधा लेकर सफेद छवि बनाने वाले लोगों ने अपने समाज के गरीब तबके से कितना वास्ता रखा है यह इस सुविधा से परे उनके लोगों से पूछकर देखा जा सकता है। फिर अब निजीकरण बढ़ रहा है ऐसे में आरक्षण का मुद्दा कितना सार्थक है यह भी विचारणीय बात है। फिल्म की कहानी आरक्षण की असलियत के कितना करीब होगी यह कहना कठिन है पर ऐसी फिल्मों को प्रचार दिलाने के लिये विवाद खड़े किये गये हैं यह देखा गया है।
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Sunday, July 10, 2011

भूख का मतलब समझना चाहिए-हिन्दी शायरी (bhookh ka matalab-hindi shayari)

खजाना हाथ लग जाये
तो उसे ठिकाने लगाने की
अक्ल भी आना चाहिए,
दौलत सभी के पास आती है
मगर अक्ल कई लोगों से घबड़ाती है,
खर्च करने की तमीज भी चाहिए।

कहें दीपक बापू
कब नहीं भरे थे
खजाने इस देश में,
फिर भी गरीब रहे फटे वेश में,
जेब में रखी गिन्नियां
सेठों के सिर चढ़कर बोलती हैं
आकाश में ढूंढ रहे फरिश्तों के लिये
इंसान की आंखें अपनी नजर खोलती हैं,
जिस धरती पर खड़े हैं लोग
उसकी ताकत समझने की
तमीज होना चाहिए।
अमीर है देश है अपना,
सोना पाने का है सभी का सपना
मोटे पेट वालों को
भूख की मतलब समझना चाहिए।
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Monday, May 30, 2011

आनंद उठाना भी एक कला है-हिन्दी अध्यात्मिक चिंत्तन लेख (anand uthana bhee ek kala hai-hindi adhyamik chittan)

     सुख की तलाश सभी लोग करते रहते हैं पर उसकी अनुभूति कभी नहीं कर पाते। सुख या आनंद उठाना भी एक कला है जो हरेक सभी को नहीं आती। किसी चीज के मिल जाने से सुख मिल जायेगा यह सोचकर उसके पीछे लोग चल पड़ते है पर जब वह मिल जाती है तब उसके उपभोग से होने वाले सुख की अनुभूति उनको नहीं हो पाती । इसका कारण यह है कि जब मनुष्य किसी वस्तु को पाने या खरीदने का उपक्रम करता है तब उसकी समस्त इंद्रियां सक्रिय हो जाती हैं और इससे होने वाले उसके कर्म से उसे सुख मिलता है वही मनुष्य में सक्रियता और उत्साह बनाये रखता है। जब अभीष्ट वस्तु मिलती है उसके उपभोग में सक्रियता नहीं के बराबर रह जाती है। दूसरी बात यह कि उपभोग से हम अपने अंदर जो तत्व ग्रहण करते हैं वह अंततः विकार बन जाता है। जब हम अपने कर्म में सक्रिय होते हैं तब हमारी देह से विकार निकलते हैं। मन में कर्म करने के उत्साह का संचार होता है। इससे देह और मन में हल्कापन आता है वस्तु के उपभोग से तत्व अंदर जाता है जिससे देह पर बोझ बढ़ता है। उससे निवृत्त होने की कला को समझना जरूरी है।
     हम फ्रिज घर में लाना चाहते हैं। इसके लिये पैसा लेकर उसे खरीदने बाज़ार जाते हैं। इससे देह में और मन में सक्रियता आ जाती है जो कि आंनद प्रदान करने वाली होती है। पैसे नहीं हों तो फ्रिज खरीदने लायक पैसा कमाने के लिये हम प्रयास करते हैं। अपने खर्च में कटौती कर धन का संचय करने पर भी विचार करते हैं। इसमें एक आनंद है मगर जब फ्रिज घर में आ जाता है तो उससे कितना आनंद मिल पाता है? ठंडा पानी पीने के लिये सभी लालायित होते हैं पर यह काम तो मटका भी करता है। सब्जी आदि ताजा रखने का अच्छा यह विकल्प भी है कि प्रतिदिन खरीदी जायें।

     उसी तरह कार खरीदने में आनंद है पर जब देह का चलना फिरना कम होता है तो वह विकारों का शिकार होती है। ऐसी और कूलर से ठंडी हवा लेना अच्छा लगता है पर इससे देह की गर्मी से लड़ने की प्रतिरोकधक क्षमता कम होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि वस्तुओं के पाने के लिये किये गये उपक्रम में क्षणिक आनंद मिलता है पर अभीष्ट वस्तुओं का उपभोग ऐसा आंनद नहीं प्रदान करता क्योंकि अंततः उपभोग कभी भी आनंद का तत्व नहीं बन सकता। अधिक से अधिक इतना कि हम उसके होने की निरर्थक चर्चा दूसरों से करते है।
       उपभोग की प्रवृत्ति में आनंद अधिक नहीं है या कहें की बिलकुल नहीं है। उसका आनंद हम तभी उठा सकते हैं जब उपभोग से पैदा विकार से बचने के लिये निवृत्ति करना जानते हों। निवृत्ति तत्व से आशय उस ज्ञान से है जिससे से बात समझ में आती है कि उपभोग में लाई वस्तु का उपयोग हम भौतिक सुविधा के लिये करते हैं पर वह आध्यात्मिक सुख का कारण नहीं बन सकती। जबकि वास्तविक सुख अध्यत्मिक शांति से है।
     यह ज्ञान विरलों को ही होता है। वरना तो लोग शोर में शांति, भीड़ में आत्मीय साथी और व्यवसाय के वफादार मित्र ढूंढते हैं। जब मौन रहना हो तब वार्तालाप करते हैं। आंखें बंद कर ध्यान लगाना हो तब खोलकर चिल्लाते आनंद ढूंढते हैं। जब नहीं मिलता तो निराशा में हाथ पांव पटकने लगते हैं। लोग जानते ही नहीं कि शरीर की सक्रियता का आनंद तभी लिया जा सकता है जब हमें उसे शिथिल करना आता हो। यह शिथिलता ध्यान से अनुभव की जा सकती है। इसके अलावा जब हम सोते हैं तो पहले अपने अंगों को शिथिल होते देखें। जब तनाव में हों चिल्लायें नहीं बल्कि आंखें बंद कर ध्यान लगायें। चलने का आनंद तभी उठाया जा सकता है जब हम रुकना जानते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि सुख या आनंद उठाना एक कला है और इसे केवल ज्ञानी ही जानते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप" 
poet,writter and editor-Deepak "BharatDeep"
http://rajlekh-hindi.blogspot.com
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Monday, April 25, 2011

विशिष्ट लोगों के लिये अलग जेल-हिन्दी हास्य कविता (jail for V.I.P; parson-hindi comic satire poem

विशिष्ट लोगों के जेल जाने की
खबरों से घबड़ाये समाजसेवक ने
अपने चेले को बुलाकर कहा
‘‘जल्दी अपने समर्थकों की आमसभा बुलाओ
सभी सोए कार्यकताओं को हिलाओ डुलाओ,
हम व्ही.आई.पी. लोगों के लिये
अलग जेल बनाने की मांग करेंगे,
चल रहा है भ्रष्टाचार का बुरा समय
कहीं हम भी लगा आरोप तो
जेल में कभी अपने पांव धरेंगे,
सारी जिंदगी समाज सेवा की,
किसी ने दी कमीशन तो हमने ली,
पर इसे पता नहीं क्यों भ्रष्टाचार कहते हैं,
मगर लोग भी प्रचार की धारा में बहते हैं,
इसलिये अच्छा है पहले ही व्ही.आई.पी. जेल बन जाये
ताकि अगर हम फंसे तो
वहां घर और जेल का अंतर न नज़र न आये।
सुनकर चेला बोला
‘‘महाराज,
करना था पहले यह काम,
अब तो हो गये आप बदनाम,
जब आपकी बात सुनी जाती थी,
तब आपको बस चंदा और कमीशन
बटोरने की बात ही याद आती थी,
उस समय अपनी पहुंच का उपयोग कर
विशिष्ट लोगों की जेल बनवाते,
तब आप भी तर जाते,
उस समय विशिष्ट होकर
आम लोगों को समझा था कीड़ा,
जब जेल में जायेंगे तब दिख जायेगी उसकी पीड़ा,
समय आपके हाथ से निकल गया है
कहा भी जाता है
अब क्या होत पछताये,
जब चिड़िया खेत चुग जाये’।’’
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप" 
poet,writter and editor-Deepak "BharatDeep"
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Wednesday, September 15, 2010

कहीं हिन्दी दिवस तो कहीं हिन्दी सप्ताह-हिन्दी लेख (hindi divas aur hindi saptah-hindi lekh)

12 सितंबर को सर्च इंजिनों से हिन्दी दिवस से खोज करते हुए पाठकों की संख्या कुछ अधिक दिखी तो आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि इसका अनुमान था कि 14 सितंबर को मनाये जाने वाले कार्यक्रमों के लिये लोग कुछ खोज रहे हैं। आखिर कौन लोग हो सकते हैं यह खोज करने वाले।
शायद वह लोग जो इन कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि या संचालक के रूप में सम्मिलित होते होंगे। उनको वहां बोलने के लिये कोई जानकारी यहां से चाहिए।
यह वह विद्वान भी हो सकते हैं जिनको समाचार पत्रों के लिये लिखना हो या फिर चैनलों पर बहस के लिये जाना हो। साथ ही वह संपादक भी जिनको अपने प्रकाशन के लिये हिन्दी पर कुछ नया लिखना हो वह सर्च इंजिनों में कुछ ढूंढ रहे होंगे।
शायद वह प्रतियोगी भी हो सकते हैं जो इस हिन्दी दिवस पर होने वाली निबंध प्रतियोगिताओं में कुछ लिखना चाहते हों।
वह छात्र भी हो सकते हैं जिनको अपने शिक्षकों ने इस अवसर पर कक्षा में ही अपने विचार रखने का आमंत्रण भी दिया हो या फिर वाद विवाद प्रतियोगता आयोजत की गयी हो।
ऐसे में यह विचार बुरा नहीं लगा कि ब्लाग स्पॉट पर लिखे गये कुछ पाठों को उठाकर वर्डप्रेस के अपने अधिक प्रसिद्ध ब्लागों पर हिन्दी दिवस शब्द लगाकर प्रस्तुत किया जायें ताकि देखा जाये कि पाठ तथा पाठन संख्या में क्या प्रभाव पड़ता है? यह काम 12 सितंबर को कर लेने के बाद 13 सितंबर की शाम को उन ब्लाग संख्या के पाठ/पाठ पठन संख्या का अवलोंकन किया तो गुणात्मक वृद्धि पाई। इसका मतलब यह था कि कुछ नया हिन्दी में ढूंढा जा रहा था। जब इतने सारे समाचार पत्र पत्रिकाऐं उपलब्ध है अनेक किताबें भी मिलती हैं तब आखिर अंतर्जाल पर कौन क्या ढूंढ रहा था। कुछ नया ही न! इसका मतलब यह कि अंतर्जाल के बाहर जो लिखा जा रहा है वह लीक से हटकर नहीं है या विचारों की रूढ़ता के कारण सभी लेखकों के लेख करीब एक जैसे होते हैं जिनका उपयोग करने से भाषण या रचना रूढ़ हो जाती है। इसलिये ही अंतर्जाल पर कुछ नया पढ़ने की चाहत यहां आने के लिये लोगों को बाध्य कर रही है।
दीपक बापू कहिन, हिन्दी पत्रिका, शब्द पत्रिका, ईपत्रिका तथा शब्दलेख पत्रिका-इन पांच ब्लाग पर पाठकों की संख्या 13 सितंबर को अत्यधिक दर्ज की गयी। हिन्दी पत्रिका और शब्द पत्रिका एक दिन में एक हजार पाठक संख्या पार करने के करीब पहुंच गये पर हुए नहीं। प्रथम तीन ब्लाग ने अपने पिछले कीर्तिमान से अधिक पाठक संख्या ढूंढे। शब्द पत्रिका पर 980 पाठक आये जो कि इस लेखक के किसी भी ब्लाग पर आये पाठकों की संख्या से ज्यादा है। shity stat में अंग्रेजी ब्लाग पर साहित्य वर्ग में बढ़त बनाते हुए शब्द पत्रिका, दीपक बापू कहिन तथा ईपत्रिका ने क्रमशः 6, 8 तथा 22 के स्थान पर अपनी उपस्थिति दर्ज की। हिन्दी पत्रिका ने अन्य वर्ग में 54 वां स्थान पाया। अगर यह संख्या नियमित रहती तो यकीनन शब्द पत्रिका नंबर एक पर आता पर इसकी आशा करना व्यर्थ था क्योंकि 14 सितंबर को पाठक संख्या कम हो गयी क्योंकि अपने देश में कार्यक्रम दोपहर या शाम तक ही होते हैं और उसके बाद ऐसा होना स्वाभाविक था।
हिन्दी दिवस के अलावा भी अन्य पर्वो पर उनसे संबंधित पाठों की खोज बहुत तेज होती है पर इतनी अधिक वृद्धि उस समय दर्ज नहीं की जाती। इस बात से एक निष्कर्ष तो निकलता है कि कि समाचार पत्रों के पुराने लेखों या किताबों की अपेक्षा अब नया पाठक तथा विद्वान वर्ग इंटरनेट पर अधिक निर्भर हो रहा है। ऐसे में अंतर्जाल पर अच्छे लेख न देखकर स्वयं को निराशा ही हाथ लगती है पर किया क्या जाये क्योंकि यहां स्वतंत्र मौलिक लेखकों के लिये यहां कोई आर्थिक प्रोत्साहन नहीं है। किसी अच्छे हिन्दी लेखक से यह कहना कठिन है कि इंटरनेट पर लिखो। जो पुराने लेखक लिख रहे हैं तो उनकी रचनाऐं रूढ़ किस्म की हैं और समाचार पत्र पत्रिकाओं में उनको लोग पढ़ते भी हैं। जब इंटरनेट का बिल स्वयं चुकाते हुए लिखना है तो पाठों की गुणवता से अधिक अपनी अभिव्यक्ति ही महत्वपूर्ण लगती है। पाठकों की संख्या भी कोई अधिक प्रेरक नहीं लगती। इस पर संगठित प्रचार माध्यमों ने-टीवी तथा समाचार पत्र पत्रिकाऐं-वातावरण ऐसा बना दिया है जिससे समाज में यह संदेश जाता है कि लेखन केवल अभिनेताओं, नेताओं, अधिकारियों तथा प्रतिष्ठित समाज सेवकों का है। उनके 140 शब्दों के ट्विटर पूरे संचार और प्रचार माध्यमों में छा जाते हैं और हिन्दी ब्लाग लेखकों को तो यह मान लिया गया है कि वह कोई भूत है जो अंतर्जाल पर लिखता है-जिसका दैहिक रूप से कोई अस्तित्व ही नहीं है। अनेक रचनायें यहां से उठाकर वहां छाप दी जाती है।
समाज में लिखना कोई नहीं चाहता और जो लिखते हैं वह अपने आसपास के लोगों को प्रभावित करने के लिये ही लिखते हैं ताकि अखबार में छप जाये तो बात जम जाये। यह कहना कठिन है कि हम अपने लिखे से लोगों को कितना प्रभावित कर रहे हैं क्योंकि इसके लिये कोई तरीका अपने पास उपलब्ध नहीं है। साथ ही यह भी भाव हमारे अंदर है कि हम कोई पैसे, पद तथा प्रतिष्ठा के शिखर पर नहीं बैठे कि हमारे शब्द लोग पढ़ने के लिये लालायित हों।
पहले लगता था कि हिन्दी दिवस मनाने की क्या जरूरत है? यह भी कहते थे कि मित्र दिवस, पितृ दिवस, मातृ दिवस, प्रेंम दिवस या इष्ट दिवस मनाने की क्या जरूरत है क्योंकि वह तो हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा है। यह भी कहते थे कि यह तो पश्चिम में होता है जहां रिश्ते इतने स्वाभाविक नहीं होते। अब हिन्दी दिवस माने की जरूरत लगती है क्योंकि समाज में उसकी उपस्थिति स्वाभाविक रूप से नहीं दिखती। अंग्रेजी का आकर्षण और हिन्दी की जरूरत के बीच फंसा समाज कुछ सोच नहंी पाता। अगर ऐसा होता तो शायद हम अंग्रेजी दिवस मना रहे होते।
आखिरी बात यह कि हिन्दी दिवस पर इतने पाठक आने का आशय यह कतई नहीं है कि वह आम पाठक थे क्योंकि अगर ऐसा होता तो यकीनन यह संख्या अगले दिनों में भी दिखती। इसका आशय यह है कि अभी केवल प्रबुद्ध वर्ग ही इंटरनेट पर सक्रिय है जिसे अपने विषयों से संबंधित जानकारी कहीं प्रस्तुत करने के लिये चाहिए। वैसे हिन्दी दिवस के साथ ही अनेक सरकार संस्थाओं के हिन्दी सप्ताह भी बनता है। हिन्दी दिवस तो निकल गया पर हिन्दी सप्ताह पर अच्छी चर्चायें हों और कोई अन्य बेहतर निष्कर्ष सामने आयें इसकी कामना तो हम ही कर सकते हैं। पाठक संख्या कम जरूर हो गयी है पर इस पूरे सप्ताह तक उसका प्रभाव जरूर रहेगा।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, January 30, 2010

मत बहको ऊंचे ठाठ देखकर-हिन्दी शायरी (amiron ke thath dekhakr-hindi comic poem)

दौलत की रौशनी से अमीर, अपनी महफिलें सजाते हैं,

गरीबों के दिल में लगे आग, इसलिये  चिराग जलाते हैं।

मत बहको ऊंचे उनके ठाठ देखकर, हमेशा धोखा खाओगे,

बेचने वाली शयों के, सौदागर ही पहले ग्राहक बन जाते हैं।

दरियादिल दिख रहे है, पर सारा सामान मुफ्त का सजा है

कहीं से चीज का मिला तोहफा, कहीं से पैसा जुटाते हैं।

घी से भरा उनका घर, मिलावटी तेल के कनस्तर बेचकर

मौत के मुख में भेजने पहले, जिंदगी का रास्ता बताते हैं।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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