अपनी आस्थाओं को दिखाने के लिये
वह चीखते और चिल्लाते हैं,
भीड़ में प्रचार पाने के लिये
लेकर सर्वशक्तिमान का इठलाते हैं,
उनके लिये अपना विश्वास
दिल में रखकर चलने की चीज नहीं
दुनियां जीतने के इरादे से
भक्ति भी नारों की तरह गाते हैं।
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जिनको अपनी आस्थाओं के साथ
जंदा रहना नहीं आता है,
दूसरों की भावनाओं पर
अपने विचारों का व्यापार करने में ही
उनको आस्था का प्रश्न नज़र आता है।
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अपनी आस्था दिल से निकालकर
किसी को दिखलायें
यह हमें करना नहीं आता है,
मुश्किल यह है कि जो नहीं रखते दिल में
आस्था का व्यापार उनको ही करना आता है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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