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Saturday, September 2, 2017

कुदरत के कायदे से ज़माने के रंग बदलते-दीपकबापूवाणी (kudrat ke kayde ka rang badalte-DeepakBapuWani)

दिलदार का रूप पर सोच के छोटे होते, सिक्कों जैसे कुछ इंसान भी खोटे होते।
‘दीपकबापू’ सजधज कर सामने आते पर्दे में, मगर खरी नीयत के उनमें टोटे होते।।
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कुदरत के कायदे से ज़माने के रंग बदलते, लोगों का वहम कि स्वयं ढंग बदलते।
‘दीपकबापू’ चले जा रहे जिंदगी में बदहवास, जिंदगी से पहले उनके ख्याल ढलते।।
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उनके हाथ में मदद बटोरते खुले झोले हैं, आंखों मे आर्त भाव तो चेहरे भी भोले हैं।
‘दीपकबापू’ सर्वशक्तिमान के दरबार में बैठे, बाहर बेबस रूप धरे मस्तों के टोले हैं।।
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घरों के दरवाजे खिड़कियां रहते अब बंद, इश्क की बस्ती वाले दिल रह गये अब चंद।
‘दीपकबापू’ अपने दर्द पर चाद डाल देते, हमदर्द ही हौसलों के कदम करते अब मंद।।
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धन के आसक्त भजन करने भी लग जाते, कोई श्रद्धा जगाये कोई कभी ठग जाते।
‘दीपकबापू’ चेतना की संगत में हुए सयाने, वह निद्रा में बजती घंटी तभी जग जाते।।
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शुल्क लेकर वाणी धाराप्रवाह चलती है, धन से ज्ञान की रौशनी बाहर जलती है।
‘दीपकबापू’ सुविधाभोगी बांटें श्रम ज्ञान, क्या जाने पसीने के बूंद आग में पलती है।।
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Friday, August 11, 2017

हृदय में रस से पत्थर भी गुरु हो जाते हैं-दीपकबापूवाणी (Hridya mein ras se PATHAR BHI GURU HO JATE HAIN-DEEPAK BAPUWANI)

हृदय में रस से पत्थर भी
गुरु हो जाते हैं।
दर्द के मारे रसहीन
जहां कोई मिले
रोना शुरु हो जाते हैं।
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गरीबों के उद्धार के लिये
जो जंग लड़ते हैं।
उनके ही कदम
महलों में पड़ते हैं।
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दिल की बात किससे कहें
सभी दर्द से भाग रहे हैं।
किसके दिल की सुने
सभी दर्द दाग रहे हैं।
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ईमानदारी से जो जीते
गुमनामी उनको घेरे हैं।
चालाकी पर सवार
चारों तरफ मशहूरी फेरे है।
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जहां शब्दों का शोर हो
वह शायर नहीं पहचाने जाते।
जहां जंग हो हक की
वहा कायर नहीं पहचाने जाते।
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समय का खेल 
कभी लोग ढूंढते
कभी दूर रहने के बहाने बनाते।
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राजपथों की दोस्ती
वहम निकलती
जब आजमाई जाती है।
गलियों में मिलती वफा
जहां चाहत जमाई नहीं जाती है।
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कंधे से ज्यादा  बोझ दिमाग पर उठाये हैं,
खाने से ज्यादा गाने पर पैसे लुटाये हैं।
मत पूछना हिसाब ‘दीपकबापू’
इंसान के नाम पशु जुटाये हैं।
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नाम कमाने मे श्रम होता है,
बदनामी से कौन क्रम खोता है।
‘दीपकबापू’ कातिलों की करें पूजा
शिकार गलती का भ्रम ढोता है।।
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Wednesday, May 3, 2017

सिंहासन का नशा-हिन्दी व्यंग्य कविता (Singhasan ka Nasha-HindiSatirepoem)


सिंहासन का नशा-हिन्दी व्यंग्य कविता
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आकाश में उड़ने वाले पक्षी
कभी इश्क में
तारे तोड़कर लाने का
वादा नहीं करते हैं।

जाम पीने वाले
कतरा कतरा भरते ग्लास में
ज्यादा नहीं भरते हैं।

कहें दीपकबापू सिंहासन पर
बैठने का नशा ही अलग
जिन्हें मिल जाता 
फिर कभी उतरने का 
इरादा नहीं करते हैं।
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नीयत के सियार
दिखने मे गधे हैं।
‘दीपकबापू’ न पालें भ्रम
स्वार्थ से सभी सधे हैं।
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Saturday, February 4, 2017

बेशरमी हमेशा बेहद होती है-हिन्दी कविता (Besharmi hmesha Behad hoti hai-Hindi Poem)


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हद होती शर्म की
बेशरमी हमेशा बेहद होती है।

याचक खड़ा द्वार पर
हाथ फैलाये
वाणी उसकी कातर
शब्द के पद ढोती है।

कहें दीपकबापू सेवक से
तब तक वफा की आशा करें
जब तक स्वामी न बना
फिर तो सोने की पालकी
उसमें मद बोती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश

Wednesday, January 18, 2017

पेट जिनके भरे सीने उनके तने हैं, मत पूछो उनके महल कैसे बने हैं-दीपकबापूवाणी (Pet jinke Bhare seene Unke tane hain-DeepakBapuWani)

सिंहासन के लिये होता दंगल, घावों से रिसते खून में दिखाते मंगल।
‘दीपकबापू’ भावनाहीन हो गये, शहर भी डराते अब जैसे सूने जंगल।।
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संवेदनहीन शहर में घृणा बढ़ गयी, प्रेम की कीमत यूं ही चढ़ गयी।
‘दीपकबापू’ विश्वास की तलाश छोड़कर, आंख पत्थर में गढ़ गयी।।
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दौलत की चमक बढ़ा देती करचोरी, खर्च करें निर्बाध साथ सीनाजोरी।
‘दीपकबापू’ ईमानदारी का फंदा डाले, देशभक्ति में हाथ से सीते बोरी।।
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मत करना यकीन बात के बंदर हैं, देव दिखें बाहर राक्षस अंदर हैं।
‘दीपकबापू’ शब्दों पर चलाते व्यापार, वह केवल सपनों का समंदर हैं।।
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आम के दर्द की शिकायत खास दरबार में कौन सुने।
चापलूस सजे रत्न की तरह, जनकल्याण पर मौन बुने।।
मन का हाल आंख में छप जाता, शब्द सहमे बाहर आते,
‘दीपकबापू’ भौपूओं की महफिल में मधुर स्वर कौन चुने।।
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पेट जिनके भरे सीने उनके तने हैं, मत पूछो उनके महल कैसे बने हैं।
‘दीपकबापू’ दान दया का लगाते नारा, मन में लोभ के बादल घने हैं।।
अन्ना के चेले वोट की राजनीति में व्यापार में उनका नाम तक नहीं लेते। क्या दिलचस्प है?
भयातुर कभी भ्रष्ट से नहीं लड़ पाते, कातर कभी कष्ट से नहीं लड़ पाते।
‘दीपकबापू’ स्वार्थ के जाल में फंसे, परमार्थ में पत्ता भी नहीं जड़ पाते।।
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सपनों के व्यापार में सभी लगे, दौलत को निरंतर ताड़ते सभी जगे।
‘दीपकबापू’ स्मृतियां रहती क्षीण, खाली रहे ग्राहक फिर भी सदा भगे।।
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पत्तल छोड़कर सब थाली में खाने लगे, संगीत में शोर अब बजाने लगे।
‘दीपकबापू’ कोयल का सुर पहचाने नहीं, तालियों पर मेंढक टर्राने लगे।।


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Tuesday, January 10, 2017

बहते जाना आसान नहीं है-हिन्दी कविता (Bahate jana asan nahin hai-Hindi Poem)

हृदय की धड़कनों के साथ
बहते जाना आसान नहीं है
संवेदना की नाव में
सवार होना भी जरूरी है।

जुबान के शब्दों की लहर के साथ
बहना आसान नहीं है
सामने सवालों के झौंके
आना भी जरूरी है।

‘दीपकबापू’ पत्थरों पर
रंगीन स्याही से लिखना
बहुत आसान नहीं है
विचारों के जंगल में
घुसना भी जरूरी है।
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Friday, November 4, 2016

अमर शब्द-लोकतंत्र में सेवक स्वामी-दो कवितायें (Amar Shabd And boss of Democracy-Two Hindi Poems)

अमर शब्द-हिन्दी कविता
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मरना मारना
सदियों से चल रहा है

शिकारी के घर चिराग
शिकार के खून से ही
जल रहा है।

कहें दीपकबापू जीवन में
किसी के जन्म पर जश्न कैसा
मरने पर सियापा कैसा
वही कवि हुए अमर
जिनका शब्द
राम नाम के साथ
अब भी मचल रहा है।
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लोकतंत्र में सेवक स्वामी-हिन्दी व्यंग्य कविता
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लोकतंत्र के पर्दे पर कलाकार
कभी नायक 
कभी खलनायक की
भूमिका निभाते हैं।

कभी परस्पर मित्र
कभी शत्रुता निभाते हैं।

कहें दीपकबापू यह खेल है
पैसा फैंकने वाले
बन जाते निदेशक
लेने वाले इशारा मिलते ही
कभी सेवक 
कभी स्वामी की भूमिका निभाते हैं।
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Sunday, September 25, 2016

शराब की मस्ती देखकर नहीं पीने वाले जलते क्यों हैं-दीपकबापूवाणी (Wine Drinker and not Drinker-DeepakBapuWani)

शराबियों के सिर चढ़कर शराब गम भुलाती है।
नहीं पीने वालों को भी अहंकार में डुलाती है।
कहें दीपकबापू यह सच है कि  हर नशा बुरा होता
उस कुर्सी का क्या जो अहं के नशे में सुलाती है।
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उनके दर्द का हाल भी पूछ लेते मगर बंदिशों का पहरा था।
यह लगा गैर ने नहीं अपने ने ही दिया घाव जो गहरा था।
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रूठे मित्र हों या टूटे दिल, शब्दों से कोई रंग नहीं भरता।
कौन सांत्वना दें उसे, जिसका मधुर संबंध स्वार्थ से मरता।
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फिरते जो मुफ्तखोर पुजने के लिये, चाहें पद सुरा सुंदरी के लिये।
‘दीपकबापू भलाई का ढिंढोरा पीटते, जो लूट का माल खाकर जिये।।
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शराब की मस्ती देखकर नहीं पीने वाले जलते क्यों हैं।
मजे का माहौल फैला है जब, सूखे दिल ढलते क्यों है।
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दोस्तों से किनारा न करना दुश्मन अकेले होने के इंतजार में रहते।
इश्क से बचना मोहब्बत करना नहीं, लोग पाखंड की बात कहते।।
मोबाईल से मोहब्बत हुई, दोस्तों के लिये जज़्बात कहां से लायेंगे।
भरवाते बात करने का समय, बोलने के लिये शब्द कहां से लायेंगे।
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यार मत पूछो दिल का हिसाब, लोग अपने राज छिपा जाते हैं।
अपने अंदर भी झांको, अपनी औकात हम अपने से छिपा जाते हैं।
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लच्छेदार शब्दों के होते व्यापारी, खेलते है सौदे की लंबी पारी।
‘दीपकबापू’ नाटकीयता बरतते, सच में फंसने की भी आती बारी।
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Friday, August 12, 2016

धरती पर स्वर्ग-हिन्दी कविता (Dharati Par Swarg-Hindi Kavita)

मतलब की बात
जल्दी सुनते
वरना बहरे हो जाते हैं।

डराते जो ज़माने को
खौफ में जीत वह भी
उनके घर खड़े पहरे हो जाते हैं।

कहें दीपकबापू सरलता से
जीवन बिताने की आदत
बना देती धरती पर स्वर्ग
चालाक अंदाज से
दुश्मन गहरे हो जाते हैं।
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Friday, July 15, 2016

अर्थ के बाग-हिन्दी कविता(Arth ke Baag-HindiPoem)

पर्दे पर रोज
पुराने चेहरे ही
कुश्ती करने आते हैं।

दंगे में शांति का
पर्व में क्रांति का शब्द
कान में भरने आते हैं।

कहें दीपकबापू वाणी से
कमाना जिन्होंने सीख लिया
उनके मुख से निकले वाक्य
अर्थ के बाग चरने आते हैं।
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Saturday, April 30, 2016

हालत का कसूर है पुण्य का भागी बना दिया-हिन्दी क्षणिकायें (Halat ka Kasur hai Punya ka Bhagi Bana diya-HindiShortPoem)

ऊंची इमारतों का विज्ञापन
रंगीन पर्दे पर ही
देख खुश हो जाओ।

जमीन पर विकास का सच
ढूंढने मत जाना
दिल टूट जायेगा
आंखें अंधेरे में न ले जाओे।
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वह पुतले पर्दे पर
रोज दिखने के लिये
फिक्रमंद हैं।

नट के हाथ में डोर
उनकी अदा की भी खूब चर्चा
पर नतीजे का जिक्र बंद है।
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निर्देशक पुराने चेहरों पर
रोज लगाते नया मुखौटा
लोग बहल जाते हैं।

जिंदगी का खेल चलता
रुपहले पर्दे पर
कभी दर्शक होते खुश
कभी दहल जाते हैं।
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हम तो खड़े थे
उनके इंतजार में
वह बचने के लिये
राह ही बदल गये।

हमारी अदा या चेहरे से डरे
पता नहीं
हमसे मुंह फेरने के लिये
अपनी चाह ही बदल गये।
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न पैसा पाया
न मिली प्रतिष्ठा
भाग्य ने जबरन
त्यागी बना दिया।

पाप कमाने का
कभी मौका मिला नहीं
यह तो हालत का कसूर है
पुण्य का भागी बना दिया।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com


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Monday, April 25, 2011

विशिष्ट लोगों के लिये अलग जेल-हिन्दी हास्य कविता (jail for V.I.P; parson-hindi comic satire poem

विशिष्ट लोगों के जेल जाने की
खबरों से घबड़ाये समाजसेवक ने
अपने चेले को बुलाकर कहा
‘‘जल्दी अपने समर्थकों की आमसभा बुलाओ
सभी सोए कार्यकताओं को हिलाओ डुलाओ,
हम व्ही.आई.पी. लोगों के लिये
अलग जेल बनाने की मांग करेंगे,
चल रहा है भ्रष्टाचार का बुरा समय
कहीं हम भी लगा आरोप तो
जेल में कभी अपने पांव धरेंगे,
सारी जिंदगी समाज सेवा की,
किसी ने दी कमीशन तो हमने ली,
पर इसे पता नहीं क्यों भ्रष्टाचार कहते हैं,
मगर लोग भी प्रचार की धारा में बहते हैं,
इसलिये अच्छा है पहले ही व्ही.आई.पी. जेल बन जाये
ताकि अगर हम फंसे तो
वहां घर और जेल का अंतर न नज़र न आये।
सुनकर चेला बोला
‘‘महाराज,
करना था पहले यह काम,
अब तो हो गये आप बदनाम,
जब आपकी बात सुनी जाती थी,
तब आपको बस चंदा और कमीशन
बटोरने की बात ही याद आती थी,
उस समय अपनी पहुंच का उपयोग कर
विशिष्ट लोगों की जेल बनवाते,
तब आप भी तर जाते,
उस समय विशिष्ट होकर
आम लोगों को समझा था कीड़ा,
जब जेल में जायेंगे तब दिख जायेगी उसकी पीड़ा,
समय आपके हाथ से निकल गया है
कहा भी जाता है
अब क्या होत पछताये,
जब चिड़िया खेत चुग जाये’।’’
कवि, लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप" 
poet,writter and editor-Deepak "BharatDeep"
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Saturday, July 10, 2010

बेवफाओं की भीड़-हिन्दी व्यंग्य कविता (bevfaon ki bheed-hindi vyangya kavita)

दूसरों में वफा की तलाश करते हुए
गुजार देते हैं लोग पूरी जिंदगी
फिर निराश हो जाते हैं।
पर कोई भी इंसान
अपने अंदर बैठे गद्दार को
मार नहीं पाया
सभी ज़माने में वफादार ढूंढते हुए
बेवफाओं की भीड़ में खो जाते हैं।
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एक तरफ दौलत, शौहरत और ताकत के
सिंहासन पर आका खड़े हैं
दूसरी तरफ चमचे उनकी दरबार में जड़े हैं।
बाकी इंसान तो भेड़ों की तरह चल रहे
जिनके सपने अपनी औकात से बड़े हैं।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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