Showing posts with label samaj. Show all posts
Showing posts with label samaj. Show all posts

Saturday, March 9, 2013

महिला दिवस पर संपादकीय-एक पहिया आगे तो दूसरा पीछे लगना ही है (edtorial on women day-man and woman two wheel of life)

       हमारे देश में आजकल रोज एक दिवस मनता दिखता है।  वैसे तो भारत को वैसे भी त्यौहारों का ही देश कहा जाता है पर वह सप्ताह या माह के अंतराल बाद ही आते हैं। पूर्णमासी तथा अमावस्या हर महीने ही आती हैं।  कैलेंडर में देखें तो रोज कोई न कोई खास दिन होता है। इधर पश्चात्य संस्कृति ने अपने पांव पसारे हैं तो लगता है कि हर दिन ही त्यौहार है। मित्र दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस और नया वर्ष जैसे दिन तो बहुत सुनते हैं। कभी एड्स विरोधी दिवस तो कभी कैंसर निरोधी दिवस भी सुनाई देता हैं  इधर हाल ही में महिला दिवस मना। व्यवसायिक बुद्धिमानों ने जहां अपनी वाणी और चेहरे से टीवी चैनलों के साथ ही रेडियों पर अपने भाषण झाड़े वही आमजनों में अपना रुतवा रखने वाले महानुभावों ने नारी शक्ति अनौपचारिक बैठकों में  बखान किया।
      हमने देखा है कि पुरुष दिवस कभी नहीं मनता। इसका सीधा मतलब यह है कि यह मान लिया गया है कि यह संसार पुरुषों की संपत्ति है जिसमें महिलायें उनकी अनुकंपा से जी रही हैं।  हमारे देश के जनवादी और प्रगतिशील  बुद्धिमान हमेशा ही जाति, वर्ण, भाषा तथा क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाते हैं पर नारी विषय पर उनका रुख बदल जाता है।  वहां वह पुरुष को एक तरह से राक्षसी वृत्ति का मान लेते हैं यह अलग बात है कि वह स्वयं भी पुरुष ही होते हैं। उनके तर्कों पर हम हंसते हैं।  कहते हैं कि समाज में पुरुषवादी मानसिकता है।  हम पूछते हैं कि जब आप नारी अनाचार के विरुद्ध विषवमन करते हो तब क्या कभी यह देखा है कि वास्तव में उनका शत्रु कौन होता है?
    कुछ नारीवादी बुद्धिमान तो नारी के लिये विवाह बंधन ही खतरनाक मानते हैं यह अलग बात है कि उनमें अविवाहित या ब्रह्चारी कोई नहीं होता।  आयुवर्ग में भी वह युवा न होकर उस अवस्था में होते हैं जब देह में रोमांस का असर काम हो जाता है।  अपनी बात वह युवाओं पर तब लादते दिखते हैं जब उनका खुद का समय बीत गया होता है। अपने युवा दिनों की मटरगस्ती को वह भूल जाते हैं।  कहा जाता है कि विवाह का लड्डू जो खाये वह भी दुःखी जो न खाये वह भी दुःखी।  जिन्होंने स्वयं खा लिया है वह दूसरों को न खाने की सलाह देते हैं।  मजे की बात यह कि भारतीय पारिवारिक संस्कारों के साथ जीने वाले लोग उसका मजाक बनाते हैं पर स्वयं के लिये उनका नियम पुराना ही होता है। वह विद्रोह का झंडा दूसरों के हाथ में देकर स्वयं आराम से सामाजिक फिल्म देखना चाहते हैं ताकि उसकी समीक्षायें लिखी और सुनाईं जा सकें।  समस्या यह है कि वह इस बात नियम को नहीं मानते कि नारी के लिये पुरुष कम नारियां ही अधिक समस्या खड़ी करती हैं।  भारतीय रिश्तों में नहीं वरन् पूरे विश्व में ही ननद-भाभी, सास-बहु, देवरानी-जेठानी तथा अन्य बहन जैसे रिश्तों में तनाव की बात सामने आती है।  अपवाद स्वरूप ही देवर-भाभी, ससुर-बहु, नन्दोही-सलहज और साली बहनोई के रिश्ते में खटास वाली घटनायें होती हैं।  सामाजिक विशेषज्ञों का अनुभव तो यह भी कहता है कि पर्दे के पीछे नारियों के विवाद होते हैं पर समाज के सामने फंसता पुरुष ही है क्योंकि परिवार उसके नाम पर जाना जाता है।  हमारे यहां घरेलु नारियों की रक्षा के नाम पर जितने भी प्रयास हुए हैं उनमें जड़ में नारियों का आपसी विवाद होता है पर परेशान पुरुष ही होता है।  इन मामलों में यह देखा गया है कि मामलों को बाहर सुलझाने के लिये घर से बाहर ले जाने जो प्रयास होते हैं उनमें से अधिकतर शिकायतें गलत आधार पर गलत व्यक्ति के खिलाफ होती है।  दहेज विरोधी कानून का जमकर दुरुपयोग हुआ।  अनेक सामाजिक विशेषज्ञ तो यह कहते हैं कि इस कानून का दुरुपयोग करने का यह परिणाम हुआ है कि ऐसे अनेक दंपत्ति जो एक साथ समझाने पर रह सकते थे वह मामला बाहर आने में मन में  बढ़ी हुई  खटास के कारण अलग हो गये।  अनेक लोगों की कथा तो इसलिये भी दर्दनाक रही है कि वह उस शादी में एक समय का भोजन करना उन्हें महंगा लगा जिसका भांडा चौराहे पर फूटा और उन पर भी घाव हुए। स्थिति इतनी खराब है कि कहीं नवदंपत्ति का विवाद होने  पर निकटस्थ रिश्तेदार बीच में आकर सुलझाना ही नहीं चाहते क्योंकि उनको लगता है कि कहीं उनका नाम चौराहे पर न घसीट लिया जाये।  विवाह एक सामाजिक मामला है और उसे उसके नियमों के दायरे में ही रखना चाहिये न कि उसमें राजकीय हस्तक्षेप हो।  राजकीय हस्तक्षेप से समाज के सुधार का प्रयास पाश्चात्य विचाराधारा से उपजा है जो निहायत अव्यवाहारिक है।  ऐसे प्रयासों से भारतीय समाज बिखरा है। दूसरी बात यह कि जिस तरह सारे पुरुष देवता नहीं है तो राक्षस भी नहीं है उसी तरह नारियों का भी हमेशा सकारात्म स्वरूप रहता है यह माना नहीं माना जा सकता।  अगर समाज में नारियों के विरुद्ध अपराध बढ़े हैं तो उसमें शामिल नारियों की संख्या भी बढ़ी है।
     अब मुश्किल यह है कि जनवादियों और प्रगतिवादियों ने देश के अभिव्यक्ति के साधनों पर इस कदर कब्जा कर लिया है कि उनके प्रतिकूल सर प्रथक  किसी बात कहने पर किसी पर प्रभाव नहीं होता।  समाज में आयु, वर्ण, जाति, भाषा, धर्म और लिंग के आधार पर कल्याण के दावे हो रहे हैं पर खुश कोई नहीं है।  वजह साफ है कि  समाज को एक इकाई मानते हुए देश में सभी शहरों के साथ गांवों में भी सड़कों का जाल बिछा होना चाहिये।   सभी जगह शुद्ध पेयजल प्रदाय की सहज व्यवस्था हो।  इसके साथ ही बिजली हर घर में पहुंचना चाहिये।  यह मूलभूत सुविधायें हैं अगर यह देश के किसी हिस्से में नहीं है तो हम अपने पूर्ण विकास का दावा नहीं कर सकते।  इसके विपरीत देश के बुद्धिमान किश्तों में अलग अलग समाज को भागों में बांटकर विकास देखना चाहते हैं।  हमारे देश में गरीब परिवारों जो स्थिति है उसमें नारी दयनीय जीवन जीती है पर यकीनन पुरुष भी कोई खुशहाल नहीं होता।   अपने पिता, पति और पुत्र को जूझते देखकर नारी स्वयं की दयनीय स्थिति से समझौता कर लेती है।  सीधी बात कहें तो नारी और पुरुष के बिना मानवीय संसार नहीं चल सकता।  दोनों परिवार के पहिये हैं।  एक पहिया पीछे तो एक आगे चलता है।  आगे का पहिया पुरुष है और अगर नारीवादी चाहते हैं कि नारी आगे पहिये के रूप में चले तो ठीक है।  उनके प्रयास बुरे नहीं है पर उन्हें यह समझना होगा कि तब पुरुष को पिछला पहिया बनना होगा। एक पहिया आगे तो एक पीछे रखना ही होगा। हालांकि तब इन नारीवादियों को तब पुरुषवादी बनना पड़ेगा।
  दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'

Gwalior, Madhya Pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Wednesday, January 23, 2013

भूत का भय-हिन्दी कविता (bhay ka bhoot-hindi kavita


मरे इंसान का नाम लेने से भी
वह घबड़ाते हैं
डर है उसके साथ  हमदर्दी करते हुए
ज़माना बह न जाये
जो कह न सके  कीमती जिंदा लोग
उसका भूत वह बात न कह जाये
इसलिये अमुक नाम से बुलाते हैं।
कहें दीपक बापू
बाज़ार के सौदागरों के
प्रचार माध्यम भौंपू हैं
खड़े करते हैं दाम देकर मशहूर लोग,
समझ न हो पर भी बोलने का हो जिनको रोग,
कत्ल किया गया जिसका जिस्म
जलकर वह राख हो गया,
जिंदा कौड़ी का था
मरकर उसका दाम टके से लाख हो गया,
चलने लगे न उसके नाम का सिक्का
छिपाया इसलिये
अपने खोटे सिक्कों को पिटने से बचाते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, October 21, 2012

दिल यूं ही गुनगुनाता है-हिंदी कविता

भीड़ में जाकर
अपना दर्द कहना
अब  हमें नहीं सुहाता है,
अपने गमों से हारे
चीखते चिल्लाते लोग
कानों से सुनते नहीं
अपनी जुबां से
उनको अपना हाल  बयान करना ही  आता है।
कहें दीपक बापू
सर्वशक्तिमान का शुक्रिया
अपने दर्द और खुशी पर
कविता या गीत लिखने की
कला दी है
दिल हर नजारे पर
यूं ही कुछ लफ्ज गुनागुनाता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Monday, April 2, 2012

अध्यात्म ज्ञान क्रय विक्रय की वस्तु नहीं-हिन्दी संपादकीय (adhyatma gyan [kharid frokhta ki cheej nahin-hindi editorial, article or lekh)

             योग और ध्यान की कला बाज़ार में बिकने वाली चीज नहीं है जिसे खरीदकर कोई सिद्ध बन जाये। इसके अलावा जो सिद्ध हैं वह अपनी सिद्धियां बाज़ार में ब नहीं जाते। सच बात तो यह है कि साधना एकांत में सक्रिय रहकर की जा सकती है। ऐसे में चौराहों पर आकर अगर कोई यह दावा करता है कि वह योग और ध्यान में सिद्ध है और अपने चेले चपाटे इस प्रचार में लगा देता है कि उसके धार्मिक संसार का विस्तार हो तो समझ लीजिये कि वह गुरु अध्यात्म ज्ञान से स्वतः वंचित है। अध्यात्म और धर्म में अंतर है। धर्म बाह्य रूप से निर्वाह किया जाता है और अध्यात्म अंतर ज्योति में प्रकाशित होता है अतः उसका ज्ञान होने पर आदमी अंतर्मुखी होता है।
               आज हम देख रहे हैं कि सारे देश में धर्म के नाम पर तमाम तरह के प्रचारक हैं पर उनमें अध्यात्म ज्ञानी कितने हैं, यह शोध का विषय है। एक बात तय रही कि धन लेने और देने वाले कभी भी अध्यात्म ज्ञान में पारंगत नहीं हो सकते। अध्यात्म स्वचिंतन के लिये प्रेरित करता है और ऐसे में आदमी अपनी इंद्रियों को अंतर में सक्रियता रखता है। जब आदमी की इंद्रियां जैसे कान, नाक, हाथ, और आंख बाहरी रूप से सक्रिय हैं तब वह अध्यात्म से परे हो जाती हैं। ऐसे में अच्छा सुने या देखें वह प्रभाव अंदर तक नहीं जाता। उनका प्रभाव तभी अच्छी तरह अंदर जा सकता है जब इंद्रियों को अंतर में ले जाया जाये। यह कला ध्यानी और ज्ञानी जानते हैं और वह कभी आत्म प्रचार के लिये चेले चपाटे नहीं जुटाते।
              इस समय हमारे देश में योग का जिस तरह बाज़ार सजाया जा रहा है उसे देखकर अनेक लोग यह समझते हैं कि यह विधा बहुत सरल है और इसे चंद समय में कोई भी सिखा सकता है। इतना ही नहीं अनेक लोग तो ऐसे हैं जिन्होंने कहीं से दस पंद्रह दिन का योगासन और प्राणायाम का प्रशिक्षण लिया और अब स्वयं शिक्षक बन गये हैं। बहुत कम लोग इस बात को समझते हैं कि पंतजलि योग सूत्र और श्रीमद्भागवत गीता के संदेश केवल श्रद्धा से ही पढ़ने वाली सामग्री नहंी है वरन इनका अध्ययन भी कक्षा दर कक्षा में पढ़कर किया जा सकता है। मतलब यह कि इनके पाठों का अध्ययन करने में वैसी ही बुद्धि की आवश्यकता होती है जिसे गणित, विज्ञान और भूगोल की पुस्तकों को पढ़ने के लिये उपयोग में लायी जाती है। अंतर इतना है कि योग साहित्य और श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन से नौकरी नहीं मिलती दूसरा यह भी कि इनको श्रद्धा से पढ़ने पर ही समझा जा सकता है। थोड़ा बहुत अध्ययन कर शिक्षक बने लोग केवल धार्मिक व्यवसायी बन जाते हैं।
            पतंजलि योग साहित्य के आठ भाग हैं। यह एक तरह से अध्यात्मिक विज्ञान है जिसकी तुलना किसी अन्य किताब या ग्रंथ से नहीं है। यह अलग बात है कि पश्चिमी विज्ञानिकों की दृष्टि से अध्यात्म का कोई विज्ञान नहीं होता। इसी कारण इसके अध्ययन की उपेक्षा हमारे देश में हुई है जिसका लाभ अब वह लोग उठा रहे है जिन्होंने बस इतना सीखा है कि इससे अपनी रोजी रोटी कैसे चलायी जाये। हमें उनकी क्रिया पर कोई आपत्ति नहंी है पर लोगों का यह समझना चाहिए कि पतंजलि योग विज्ञान तथा श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान में वही पारंगत हो सकता है जिसने इनका विशद अध्ययन किया हो। अंत में यह भी बता दें कि जिन्होंने दोनों में अपना महारथ प्राप्त किया है वह कभी प्रचार के मैदान में नहीं दिखाई देंगे। वह दवाई, कैलेंडर और पेन बेचते नहीं दिखाई देंगे। यह भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का प्रभाव कहें कि उनका ज्ञान कभी अर्थ पर आधारित न होने से वह स्वाभाविक रूप से क्रय विक्रय की वस्तु नहीं बन पाया। अगर कोई इसे क्रय और विक्रय की वस्तु समझता है तो वह यकीनन घोर अज्ञानी है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, January 8, 2012

उस दिन-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (us din-hindi vyangya kavitaen,shayari,poem)

खामोश
कमरे के अंदर
इस जहान के सारे खलीफा
बहस मेँ व्यस्त हैं
मुद्दा यह है कि
अलग अलग तरीके के हादसों पर
बयान किस तरह बदल बदल कर दिये जाएँ
हमलावरों को डरने की जरूरत नहीं है
उनके खिलाफ कार्रवाई का बयान आयेगा
मगर करेगा कौन
यह तय कभी नहीं होगा।
------------------
इंतज़ार करो
हुकूमत की नज़र आम इंसान पर
ज़रूर जाएगी।
जब वह दिखाकर कुछ सपने
वह दिल बहलाएगी,
मांगे तो खिलाएगी खाना
और दारू भी पिलाएगी।
येन केन प्रकरेण
अपनी हुकूमत पर हुक्म की
मोहर  उस दिन सड़क पर पकड़कर लगवाएगी।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, January 1, 2012

नीम की कड़वाहट, चंदन की खुशबु-हिन्दी व्यंग्य शायरियां (neem ki kadvahat, chandan ki khusbu-hindi vyangya shayariyan)

नीम के पेड़ पर चंदन की खुशबु कभी आ नहीं सकती,
चंदन के पेड़ पर भी कोई दवा भी नहीं मिल सकती।
कहें दीपक बापू सुगंध और मिठाई की दीवानी दुनियां
झूठ के आदी लोग कड़वी सच्चाई कभी पच नहीं सकती।
-----------
खाली दिमाग शैतान का घर होता है,
दिल बहलाने के लिये भी
उसके पास हैवान का दर होता है।
कहें दीपक बापू एक आदमी की बात होती तो ठीक
जहां तो सारा जहान ही जागते हुए सोता है।
--------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, December 24, 2011

गर्मी से बचकर, बरसात से हटकर और सर्दी से डटकर लड़ा जा सकता है-हिन्दी लेख (grami se bachakar,barsat se hatkar aur sardi se datkar bachen-hindi lekh or article)

             ठंड बढ़ रही है, और ऐसा लगता है उन इलाकों से गुजरने पर भी आसपास बर्फ जमे होने का अहसास होता है जो भीषण गर्मी की वजह से जाने जाते हैं। हम भारतीय लोग ठंड, बरसात और गर्मी का सामना करने के आदी माने जाते हैं पर लगता है आधुनिक जीवन शैली ने भारतीय समाज में ढेर सारे विभाजन कर दिये हैं जिसकी वजह से आज हम अपनी कोई बात या अपना सिद्धांत समस्त लोगों पर लागू नहीं कर सकते। मूल बात यह है कि गर्मी का सामना बचकर, बरसात का सामना हटकर और सर्दी का सामना डटकर ही हो सकता है। जब गर्मी में सूर्य की तेज किरणें धरती पर बरस रही हों तब आदमी पेट में पानी भरने के साथ ही पांव में ऐसे जूते पहनकर निकले जिनसे वह जले नहीं। जब बरसात हो रही हो तब जहां तक हो सके अपना सिर भीगने से बचाये ताकि सिर पर पानी पड़ने से स्वास्थ्य की हानि न हो। उसी तरह सर्दी का मुकाबला भले ही रात में बिस्तर में दुबककर हो सकता है पर दिन में जहां तक हो सके अपने शरीर को चलाईये जिससे उसमें अग्नि प्रज्जवलित रहे।
          टीवी पर एक कार्यक्रम में बताया गया कि दिल्ली में बढ़ती सर्दी के बावजूद लोगों के दिमाग में गर्म भरी हुई है। रास्ते चलते हुए वाहन टकराने पर झगड़े और कत्ल हो रहे हैं। इस पर तमाम तरह के सवाल जवाब हो सकते हैं पर मूल बात यह है कि हम मानव के बाह्य रूप के विज्ञान को जानते हैं। संभव है कि कोई मनोविज्ञानिक होने का दावा कर यह बताये कि वह मनुष्य की दिमागी गतिविधियों पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत कर कसते हैं। मगर प्रकृति और निवृत्ति के विज्ञान का सही ज्ञान केवल गीता साधकों को ही हो सकता है। इसके सूत्र बहुत हो सकते हैं पर उनका विस्तार करने से असली बात रह जायेगी। मुख्य बात यह है कि मनुष्य शरीर को एक आत्मा धारण करता है जिसके बिना इस जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। यह अलग बात है कि इस देह का संचालन मनुष्य स्वाभाविक रूप से मन, बुद्धि तथा अहंकार के वश होने देता है। यह केवल ज्ञानियों के लिये ही संभव है कि इन तीनों प्रकृतियों के प्रभाव से निवृत होना जानते हैं। इसके अलावा पंच तत्वों से बनी देह में जल, अग्नि, आकाश, वायु तथा प्रथ्वी पर जो समयानुसार प्रतिक्रिया होती है उसका भी मनुष्य की मनस्थिति पर प्रभाव पड़ता है। जैसा खाये अन्न वैसा हो मन। जैसा पाये धन वैसा हो जाये तन! हम अगर अधिक ज्ञान की बात करेंगे तो शायद समाज का ऐसा भयानक रूप दिखने लगेगा जिससे अंततः स्वयं को ही असहजता अनुभव होगी मगर सत्य तो सत्य है! हमेशा ज्ञानी बने रहना एकाकी बना देता है।
           अभी तक अधिकतर लोगों का हृदय असहज था तब तक चलता रहा पर अब तो लोगों के मस्तिष्क भी असंवेदनशील हो गये हैं जो कि आने वाले खतरों का संकेत है। उनकी प्राणशक्ति अत्यंत क्षीण है जो उनको असहनशील बना रही है। हमारे देश में विकास का पर्याय भौतिक साधनों के अधिक उपभोग से आंकी जा रही है। चीन से हमारे यहां कंप्युटर कम हैं, वहां के मुकाबले कारें कम चल रही हैं, वहां के मुकाबले हमारे यहां टीवी कम चल रहे तथा वहां के मुकाबले यहां इंटरनेट प्रयोक्ता कम है इसलिये हम उससे पीछे हैं, यह बात देश के हितचिंतक बड़े दुःख से कहते हैं। उपभोक्ता बाजार को बढ़ाया जा रहा है। यही कारण है कि कारें और बाईक की तो संख्या में बढ़ रही है पर सड़के चौडी होने की बजाय अतिक्रमण का शिकार हो गयी हैं। फिर आजकल का खानपान ऐसा है कि लोगों की शक्ति कम हो रही है। जैसा कि कहा जाता है कि जो चीज आदमी के पास नहीं होती वह उसके होने का अहसास करना चाहता है। शक्ति है नहीं पर वह दिखाना चाहता है। इसलिये रास्ते पर जरा जरा सी बात झगड़ा। कहीं कहीं कत्ल हो जाता हैं। कहीं सड़क दुर्घटना पर जाम लग जाता है। हमें तो ऐसा लगता है कि अनेक ऐसे लोगों के पास कार या बाइक आ गयी है जो उसके लायक नहीं है पर मगर यह बात उनसे कहना जान आफत में डालना है। बंदर के हाथ में उस्तरा कहें या गंजे को भगवान ने नाखून दे दिये यह कहें। हमारा समाज यह मानता है कि जिसके पास पैसा है उसके पास सब कुछ है। अक्ल तो भगवान उसे वैसे ही दे देता है। हमारा अनुभव इसका उल्टा है। सबसे ज्यादा नकारा धनवान हो गये है यही कारण है कि समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा राजरोगों की चपेट में है। यह रोग उनकी मनस्थिति को खतरनाक न बनायें यह संभव नहीं है।
          अन्ना हजारे ने समाज में चेतना लायी यह कहते हुए बहुत लोग थकते नहीं है पर इसका मतलब यह है कि हमारे यहां लोग सुप्तावस्था में थे। प्रचार माध्यमों को देखकर भले ही लोग समाज में चेतना का दंभ भर रहे हैं पर यह एक भ्रम है। अनेक मनोविशेषज्ञ लगतार यह कह रहे हैं कि भारत में मनोरोगी इतनी बड़ी संख्या में है कि कईयों को इसका आभास तक नहीं कि वह इसका शिकार हैं। मानसिक रूप से रुग्ण समाज अगर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर तालियां बजा रहा है तो उसके नायक के अभिनय को श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता है। प्रश्न तो दर्शक दीर्घा में उपस्थित लोगों की योग्यता पर भी संदेह है। भीड़ प्रसिद्ध का प्रमाण है पर प्रतिभा के लिये किसी भी आदमी की योग्यता के भौतिक सत्यापन से ही संभव है जो कि अपने लिये काम करने से नहीं वरन् समाज को कुछ देने से मिल सकता है। आदमी अकेले जीने का आदी है। वह सड़क पर भी अकेले चलने की अनुभूति चाहता है। ऐसे में कोई   वाहन से टक्कर मारत है तो वह उसमें थोड़ी टूट फूट से बिफर जाता है। घबड़ाता है कि घर पर लोग कहीं यह ताना न दें कि वाहन नहीं चलाना आता। इसलिये वह लड़कर अपनी भड़ासं निकालना चाहता है। पैसा वसूलना चाहता है। सर्दी, गर्मी और बरसात अब उसकी देह को प्रभावित करती है मस्तिष्क को नहीं जो कि असंवेदशील हो चुका है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Wednesday, December 14, 2011

मोहब्बत और सोहबत-हिन्दी शायरी (mohbbat aur sohbat-hindi shayari)

कुछ लोगों ने ज़िंदगी में
हमेशा ज़ंग की
कुछ ने किया अपनों को
गैर बनाने का गुनाह
कभी समझी नहीं मोहब्बत।
कहें दीपक बापू
उनके अंजाम पर क्या रोना
जिन्होने दौलत में तस्वीर देखी जन्नत
मगर कर ली लुटिया डुबोने वाले
शैतानो से सोहबत।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, December 10, 2011

ए.एम.आर.आई अस्पताल कलकत्ता के हादसे से सबक-हिन्दी लेख( lesson of terssdy of AMRi culcutta hospital-hindi article)

            कलकत्ता के ए.एम.आर.आई अस्पताल (AMRi culcutta hospital) में करीब 90 लोगों की मौत हो चुकी है। अगर प्रचार माध्यमों के इससे जुड़े समाचारों पर यकीन किया जाये तो कुछ लोग अभी भी अपने परिजनों को ढूंढ रहे है जिस कारण यह संख्या अधिक भी हो सकती है। हम इस हादसे में हताहत लोगों के प्रति संवेदना जताते हैं। इस दुर्घटना के बाद अनेक विचार दिमाग में आये। जिस सवाल ने यह सबसे ज्यादा परेशान किया कि यह एक निजी अस्पताल है और इससे क्या यह साबित नहीं होता हम अब निजी क्षेत्र की क्षमताओं पर पर प्रश्न उठायें? अभी तक हम मानकर चलते हैं कि सरकारी और अर्द्धसरकारी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार और कुप्रबंध है इस दुर्घटना के बाद अब निजी क्षेत्र के प्रबंधन पर भी सवाल उठेंगें।
             जिन महान बुद्धिमानों ने सरकारी क्षेत्र को एकदम निकम्मा मानकर निजी क्षेत्र की वकालत की थी उनकी राय पर तब भी आश्चर्य हुआ था और अब तो यह लगने लगा है कि निजी क्षेत्र भी उसी कुप्रबंध का शिकार हो रहा है जिसके लिये सरकारी क्षेत्र पर बदनाम माना जाता था। अर्थशास्त्री भारत में जिन समस्याओं को उसके विकास में संकट मानते हैं उसमें कुप्रबंध भी शामिल माना गया है। कुछ हद तक खेती में उसे माना गया है पर निजी क्षेत्र में इसे कभी नहीं देखा गया। दरअसल हम जैसे निष्पक्ष चिंतक और अल्पज्ञानी अर्थशास्त्री हमेशा ही यह मानते हैं कि प्रबंध कौशल के बारे में हमारा देश बहुत कमजोर रहा है। इसका कारण हमारी प्रवृत्ति और इच्छा शक्ति है। एक तरह से देखा जाये तो हमारे वणिक वर्ग का समाज-यह जाति सूचक शब्द नहंी है क्योंकि इसमें अनेक जातियों के सदस्य ऐसे भी हैं जिनके समाज के साथ वणिक सूचक संज्ञा नहीं जुड़ी होती जैसे सिंधी, पंजाबी, और गुजराती तथा अन्य स्थानीय समाज-कमाने के लिये योजना बनाता है पर प्रबंध कौशल में बहुत कम लोग सिद्धहस्त होते हैं। भाग्य, परिश्रम, बौद्धिक अथवा प्रतिद्वंद्वी के अभाव में अनेक लोग अपने व्यवसाय में महान सफलता प्राप्त करते है पर ऐसे विरले ही होते है जिनको विपरीत परिस्थतियों में केवल अपने प्रबंध कौशल से सफलता मिली हो। जब कुछ बुद्धिमान लोग सरकारी और अर्द्धसरकार क्षेत्रों में कुप्रबंध की बात करते हैं तो अपने अनुभव से सीखे हम जैसे लोग यह भी मानते हैं कि कम से कम हम भारतीयों का नजरिया अपने काम को लेकर कमाने का अवश्य होता है पर प्रबंध कौशल दिखाने की चिंता बिल्कुल नहीं होती। ऐसे बहुत कम लोग हैं जिनको प्रबंध कौशल में महारत है। उसके बाद कुछ लोग मध्यम प्रवृत्ति के होते है जो एक समय तक प्रबंध कौशल दिखाते हैं फिर आलसी हो जाते हैं। ऐसे में जब आर्थिक जगत में निजीकरण तेजी से हो रहा था तब बहुत कम लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि प्रबंध कौशल एक कला है और उसमें महारत हासिल करने वालों को प्राथमिकता दी जाये। मुख्य बात यह है कि निजी क्षेत्र पर इतना विश्वास कैसे किया जा सकता है कि उसे अस्पताल, वायुसेवा, बस सेवा तथा अन्य जीवनोपयेागी की सेवाओं का पूरी तरह से जिम्मा सौंपा जाना चाहिए?
ए.एम.आर.आई अस्पताल (AMRi culcutta hospital) में हुई दुर्घटना चूंकि अत्यंत दर्दनाक है इसलिये इस पर चर्चा हुई पर निजी अस्पतालों में अनेक लोग गलत इलाज से मर जाते हैं तब वह एक अचर्चित खबर बनकर रह जाती है। इतना ही नहीं हम उन अन्य सेवाओं को भी देख रहे हैं जहां निजी क्षेत्र प्रभावी होता जा रहा है। वहां आम आदमी ग्राहक नहीं बल्कि एक शौषक और मजबूर प्रयोक्ता बन जाता है। उसके पास निजी क्षेत्र की सेवा के उपयोग करने के अलावा कोई मार्ग नहीं रह जाता।
              अब प्रचार माध्यमों की बात कर लें। अगर यह हादसा किसी सरकारी अस्पताल में हुआ होता तो प्रचार माध्यम कोई सरकारी आदमी शिकार के रूप में फंसते देखना चाहते। सारे राज्य के अस्पतालों की दुर्दशा को लेकर प्रशासन को कोसा जाता। निजी अस्पताल को लेकर ऐसा कोई विवाद नहीं उठा। यह ठीक है कि पश्चिम बंगाल ने अस्पताल के प्रशासन ने अस्पताल प्रबंधकों के खिलाफ कार्यवाही की है पर अगर यह सरकारी अस्पताल होता तो वही अपनी सफाई देने में लगा होता। हम यह दुर्घटना निजी क्षेत्र में अकुशल प्रबंधन के एक ऐसे प्रतीक के रूप में इसलिये देख रहे हैं क्योंकि वह प्रचार माध्यमों में चर्चित हुई वरना सच यह है कि अब तो अनेक सेवाओं में निजी क्षेत्र आम आदमी को लाचार बना रहा है।
           हम यहां यह बात नहीं कह रहे कि निजी क्षेत्र का प्रवेश पूंजीगत रूप से दखल कम होना चाहिए। जनोपयोगी सेवाओं में निजी क्षेत्र का योगदान तब भी था जब सरकारी क्षेत्र शक्तिशाली था। निजी क्षेत्र ने अनेक ऐसी सुविधायें भी जुटाई हैं जिससे आम मध्यम वर्ग को सुविधा हो रही है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि ऐसी सेवाओं से सरकारी प्रभाव को समाप्त होने की मांग मान ली जाये। हमारा मानना है कि हर क्षेत्र में सरकारी पूंजी को सक्रिय रहना चाहिए। किसी क्षेत्र में सरकारी प्रभाव इसलिये समाप्त नहीं होना चाहिए कि वहां अब निजी क्षेत्र काम कर रहा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Monday, November 28, 2011

आम आदमी कार्टून में खड़ा रहेगा-हिन्दी हास्य व्यंग्य कवितायें (comman man, cortton and corttunist-hindi satire comedy poem's)

बहुत मुद्दो पर बहस
टीवी चैनलों पर चलती है,
अखबारों में समाचारों के साथ
संपादकीय भी लिखे जाते हैं,
बरसों से मसले वहीं के वहीं हैं,
बस, चर्चाकार बदल जाते हैं।
लगता है आम आदमी इसी तरह
बेबस होकर कार्टूनों में खड़ा रहेगा
जिसकी समस्याओं के हल के लिये
रोज रोज बनती हैं नीतियां
कभी कार्यक्रमा भी बनाये जाते हैं।
-------------
एक कार्टूनिस्ट से आम आदमी ने पूछा
‘‘यार,
आप जोरदार कार्टून बनाते हो,
हमारे दर्द को खूबसूरती बयान कर जाते हैं,
मगर समझ में नहीं आता
देश के मसले कब हल होंगे
हमारा उद्धार कब हो जायेगा।’’
सुनकर कार्टूनिस्ट ने कहा
‘‘सुबह सुबह शुभ बोलो,
जब यह देश का हर आदमी
दर्द से निकल जायेगा,
मेरे कार्टून के विषय हो जायेंगे लापता
नाम पर भी लगेेगा बट्टा
मगर भगवान की कृपा है
तुम जैसे लोग खड़े रहेंगे
मेरे कटघरे में इसी तरह
भले ही तुम अपनी जंग खुद लड़ते रहो
मगर तुम्हारे भले के लिये
कोई न कोई रोज नया आदमी खड़ा होगा,
अभिनय कर देवता बन जायेंगे
उनके नाटक पर
मेरे लिये रोज एक कार्टून तैयार हो जायेगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, November 13, 2011

अन्ना हजारे टीम के वरिष्ठ सदस्य अरविंद केजरीवाल के प्रचार माध्यम कर्मियों को टिप्स-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (anna hazare's core team member arvind kejariwal and media workers-hindi satire thought)

             अन्ना हजारे की कथित कोर टीम की सक्रियता अब हास्य व्यंग्य का विषय बन रही है। अरविंद केजरीवाल एक तरह से इस तरह व्यवहार कर रहे हैं कि जैसे कि वह स्वयं कोई प्रधानमंत्री हों और अन्ना हजारे राष्ट्रपति जो उनकी सलाह के अनुरूप काम कर रहे हैं। दरअसल अब अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पिछले अनेक महीनों से चलते हुए इतना लोकप्रिय हो गया है कि लगता है कि देश में कोई अन्य विषय ही लिखने या चर्चा करने के लिये नहीं बचा है। अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, और किरण बेदी ने अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़कर जो प्रतिष्ठा पाई है वह उनके लिये इससे पहले सपना थी। इधर जनप्रिय हो जाने से इन सभी ने अनेक तरह के भ्रम पाल लिये हैं। इतना भ्रम तो ब्रह्मज्ञानी भी नहीं पालते। इसका अंदाज इनको नहीं है कि इस देश में बुद्धिमान लोगों की कमी नहीं है जो उनकी गतिविधियों और बयानों पर नजर रखे हुए हैं। अन्ना टीम के सदस्यों ने इतिहास के अनेक महापुरुषों को अपना आदर्श बनाया होगा पर उनको यह नहीं भूलना चाहिए उस समय प्रचार माध्यम इतने शक्तिशाली और तीव्रगामी नहीं थे वरना उनकी महानता भी धरातल पर आ जाती।
          बात दरअसल यह है कि अन्ना हजारे टीम के एक सदस्य अरविंद केजरीवाल अब प्रचार कर्मियों को समझा रहे हैं कि वह अपना ध्यान जनलोकपाल बनवाने पर ही रखें। अन्य विवादास्पद मुद्दो पर ध्यान न दें।
केजरीवाल की प्रचार माध्यमों में बने रहने की इच्छा तो अन्ना के पूर्व ब्लागर राजू परुलेकर ने बता ही दी थी। ऐसे में किरण बेदी के यात्रा दौरों पर विवाद पर बोलने के लिये किसने अरविंद केजरीवाल को प्रेरित किया था? इस सवाल का जवाब कौन देगा?
            किरण बेदी हर विषय पर ऐसा बोलती हैं कि गोया कि उनको हर विषय का ज्ञान है। प्रशांत भूषण ने कश्मीर के विषय पर बयान क्यों दिया? विश्वास नाम के एक सदस्य अन्ना के पूर्व ब्लागर राजू परूलेकर से बहस करने क्यों टीवी चैनल पर आ गये?
         एक ब्लाग लेखक होने के नाते राजू परुलेकर से हमें सहानुभूति है। इस विषय पर लिखे गये एक लेख पर हमारे एक सम्मानीय पाठक ने आपत्ति दर्ज कराई थी। हम उनका आदर करते हुए यह कहना चाहते हैं कि कि अन्ना हजारे और उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को लेकर दुराग्रह नहीं है। इस आंदोलन को लेकर हमने संदेहास्पद बातें अंतर्जाल पर पढ़ी थी और हमें लगता है कि इसके कर्ताधर्ता अपनी गतिविधियों से दूर नहीं कर पाये है।
          अन्ना हजारे की प्रशंसा में अब हमें कोई प्रशंसात्मक शब्द भी नहीं कहना क्योंकि उनके दोनों अनशन केवल आश्वासन लेकर समाप्त हुए और इससे उन पर अनेक लोगों ने संदेह के टेग लगा दिये हैं। उनके साथ जुड़ी कथित सिविल सोसायटी के सदस्य भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से प्रचार पाकर अपने अन्य कार्यों के प्रचार में उसका लाभ उठा रहे हैं। कोई हल्का फुल्का लेखक होता तो उनको जोकर कहकर अपना जी हल्का कर लेता है पर हम जैसा चिंतक जानता है कि कहीं न कहीं इस आंदोलन  को जारी करने के पीछे जन असंतोष को भ्रमित करने का प्रायोजित भी हो सकता है। भ्रष्टाचार सहित अन्य समस्याओं से लोगों के असंतोष है। यह असंतोष की वीभत्स रूप न ले इसलिये उसके सामने काल्पनिक महानायक के रूप में अन्ना हजारे को प्रस्तुत किया गया लगता है क्योंकि उनका मार्गदर्शन करने वाली कथित कोर टीम में पेशेवर समाज सेवक हैं जो पहले ही अन्य विषयों पर चंदा लेकर अपनी सक्रियता दिखाते हैं। सीधी बात कहें कि बाज़ार अपना व्यवसाय चलाने के लिये समाज में धर्म, राजनीति, और फिल्म के अलावा सेवा के नाम पर भी संगठन प्रायोजित करता है ताकि लोग निराशा वादी हालतों में आशावाद के स्वप्न देखते हुए यथास्थिति के घेरे में बने रहें। माननीय टिप्पणीकार कहते हैं कि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के के विरुद्ध समाज में चेतना जगायी पर उसका परिणाम क्या हुआ है? यह सवाल हम हर लेख में करते रहे हैं और इस जारी रखेंगे।
           अरविंद केजरीवाल प्रचार कर्मियों को सिखा रहे हैं कि अन्य विषयों से हटकर केवल भ्रष्टाचार पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें। अब उनसे कौन सवाल करे कि किरण बेदी की यात्राओं पर विवाद पर उन्होंने क्यों अपना बयान दिया? सीधी बात है कि वह अपने को अन्ना का उत्तराधिकारी साबित करना चाहते हैं। भ्रष्टाचार हटाने में उनकी दिलचस्पी कितनी है यह तो समय बतायेगा। जब अन्ना के अनशन का प्रचार चरम पर था तब यही केजरीवाल हर निर्णय का जिम्मा अन्ना पर सौंप देते थे। अब इन्हीं  प्रचार माध्यमों ने उनको इतना ज्ञानवान बना दिया है कि वह उनको सिखा रहे हैं कि अपना ध्यान केवल जनलोकपाल पर केंद्रित करें।
          प्रशांत भूषण से किसने कहा था कि कश्मीर पर बयान दो। इससे भी एक महत्वपूर्ण बात है कि केजरीवाल ने कहा था कि हमारे साथ जुड़े छोटे मोटे विवादों से बड़ी समस्या देश में व्याप्त भ्रष्टाचार है फिर क्यों अन्य विषयों पर जवाब देने आ जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि अन्ना हजारे की कोर टीम एक मुखौटा दिख रही है जिसकी डोर कहीं अन्यत्र केंद्रित है। अन्ना हजारे अनशन करने और आंदोलन चलाने में सिद्धहस्त हैं पर वह भी बिना पैसे नहीं चलते और यही पेशेवर समाज सेवक उनका खर्च उठाते हैं। ऐसे में यह संभव नहीं है कि अन्ना उनके बिना काम कर सकें। मूल बात यह है कि जब तक कोई परिणाम नहीं आता ऐसे सवाल उठते हैं। मूल बात यह है कि यह आंदोलन अभी नारों से आगे नहीं बढ़ पाया। इंटरनेट में फेसबुक के साथ ट्विटर पर इसका समर्थन बहुत दिखता है पर ब्लाग और वेबसाइटों पर अभी इसे परखा जा रहा है। फेसबुक और ट्विटर पर नारे लिखकर लोग काम चला लेते हैं इसलिये ‘अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं, क्योंकि जनलोकपाल के पीछे तुम्हारे हाथ हैं’ के नारे लिखे जा सकते हैं पर ब्लाग और वेबसाईटों पर विस्तार से लिखने वाले पूरी बात लिखकर ही चैन पाते हैं। इसलिये अन्ना की कोर टीम को दूसरों से गंभीरता दिखाने की बजाय स्वयं गंभीर होना चाहिए।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Tuesday, October 25, 2011

कन्या भ्रुण हत्याओं का परिणाम और कॉमेडी-हिन्दी व्यंग्य लेख

              यह कहना कठिन है कि यह कन्या भ्रुण हत्याओं की वजह से देश में लड़कियों की संख्या कम होने का परिणाम है या छोटे पर्दे लेखकों की संकीर्ण रचनात्मकता का प्रभाव कि हास्य-व्यंग्य पर आधारित कार्यक्रम यानि कॉमेडी के लिये पुरुष पात्रों से महिलाओं का अभिनय कराया जा रहा है। इतना तय है कि इस कारण हास्य व्यंग्य पर आधारित धारावाहिक अपना महत्व आम जनमानस में खो रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि हास्य व्यंग्य पर आधारित एक चैनल भी अब अपनी कहानियों में पुरुष अभिनेताओं को महिलाओं के पात्र निभाने के लिये प्रेरित कर रहा है। एक कार्यक्रम कॉमेडी सर्कस ने तो हद ही कर दी है। उसमें पुरुष जोड़ी को महिला युगल पात्रों का अभिनय कराया तो महिला से पुरुष और पुरुष से महिला पात्र कराने अभिनय भी प्रस्तुत किया।
             हम यहां कोई आपत्ति नहीं कर रहे हैं न कोई बंदिश आदि की मांग कर रहे हैं। बस एक बात हास्य व्यंग्य लेखक और पाठक होने के नाते जानते हैं कि ऐसी मूर्खतापूर्ण प्रस्तुतियों से हंसी तो कतई नहीं आती है। फिर आज की युवा पीढ़ी से यह आशा करना तो बेकार ही है कि वह ऐसे हास्य व्यंग्य को समझ पायेगी जो कि विशुद्ध रूप से विपरीत लिंगी यौन आकर्षण के कारण भी इनको देखती है। अगर कहीं महिला पात्र का निर्वाह कोई पुरुष करता है तो वह युवकों में कोई यौन आकर्षण पैदा नहीं करता। वास्तव में जो हास्य व्यंग्य देखते हैं उनके लिये भी यह निराशाजनक होता है। सब जानते हैं कि विपरीत लिंगी योन आकर्षण भी पर्दे की प्रस्तुतियों को सफल बनाने में योग देता है और यह देश अभी समलैंगिक व्यवहार के लिये तैयार नहीं है जैसा कि कुछ बुद्धिजीवी चाहे हैं। इस तरह के अभिनय अव्यवसायिक रुख का परिणाम लगता है भले ही चैनल वालों को इसकी परवाह नहीं क्योंकि वहां कंपनी राज्य चलता है जिनके उत्पाद बिकने हैं चाहें विज्ञापन दें या नहीं। विज्ञापन तो उनके लिये प्रचार माध्यमों को नियंत्रित करनो का जरिया मात्र है।
             हमें लगता है कि यह शायद इसलिये हो रहा है कि इन पर्दे के व्यवसायियों को महिला पात्र मिल नहीं पा रही हैं या फिर आजकल की लड़कियां भी जागरुक हो गयी हैं और -जैसा कि हम सुनते हैं कि कला की दुनियां दैहिक यानि कास्टिंग काउच शोषण होता है-वह कम संख्या में ही मिल रही हैं। यह सही है कि पर्दे की रुपहली दुनियां के सभी प्रशंसक हैं पर कास्टिंग काउच जैसे समाचारों की वजह से अब आम लड़कियां नायिका बनने के सपने अधिक मात्रा में नहीं देखती। संभव है कि लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है जिस कारण उसका प्रभाव हो या फिर बढ़ती जनसंख्या के बावजूद पर्दे पर अभिनय करने वाली लड़कियों की संख्या कार्यक्रम निर्माताओं की संख्या के अनुपात में न बढ़ी हो। इसलिये संतुलन न बन पा रहा हो। जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे देश का धनपति तथा बाहुबली वर्ग सारी बातें मंजूर कर सकता है पर काम देने के मामले में अपनी शर्तें थोपने की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाते। इसलिये जिनको अभिनय के लिये लड़कियां अपनी शर्तों पर मिलती हैं वह कार्यक्रम बना लेते हैं जिनको नहीं मिलती वह पुरुषों से महिला पात्रों का अभिनय कराने वाली पटकथा लिखवाते हैं। प्रचार प्रबंधकों की मनमानी का ही यह परिणाम है कि क्रिकेट की तरह छोटे पर्दे के कथित वास्तविक प्रसारण यानि रियल्टी शो भी फिक्सिंग के आरोपो से घिरे रहते हैं। अभी हाल ही में बिग बॉस-5 को हिट करने के लिये भी क्षेत्रीयता का मुद्दा उठाया गया। लोगों ने साफ माना कि यह केवल प्रचार बढ़ाने के लिये हैं।
            बहरहाल एक बात तय है कि हिन्दी से कमाने को सभी लालायित हैं पर शुद्ध लेखकों से लिखवाने के लिये कोई तैयार नहीं है। यही कारण कि विदेशी धारावहिकों से अनुवाद कर लिखवाया जाता है। क्लर्कों को कथा पटकथा लेखक कहा जाता है। विदेशी कार्यक्रमों की की हुबहु नकल पर कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं। देश के संस्कारों की समझ किसी को नहीं है न उनको जरूरत है। यहां आम आदमी को तो एक निबुद्धि इंसान माना जाता है। कॉमेडी के नाम पर इसलिये फूहड़ कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
---------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, October 1, 2011

महात्मा गांधी का दर्शन और भारत की वर्तमान स्थिति-2 अक्टुबर गांधी जयंती पर विशेष हिन्दी लेख (mahatma gandhi ka darshan nirapad nahin tha-hindi lekh on 2 october gandhi jayanti)

         कल दो अक्टोबर देश में गांधी जयंती मनाई जायेगी। प्रसंगवश इस दिन भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन मनाया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इतिहास में किसी भी महापुरुष का नाम बिना किसी योग्यता, कठिन परिश्रम या त्याग के दर्ज नहीं होता पर यह भी सत्य है कि एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन समय समय पर अनेक लोग अपने ढंग से करते हैं। एतिहासिक पुरुषों के परमधाम गमन के तत्काल बाद सहानुभूति के चलते जहां उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन करने वाले अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाते हैं। उस समय कोई प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं करता पर समय के साथ ही एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व का प्रभाव क्षीण होने लगता है तब विचारवान लोग प्रतिकूल टिप्पणियां भले न करें पर कुछ प्रश्न उठाने ही लगते हैं।
          गांधीजी के दर्शन  पर भी अनेक सवाल उठते हैं तो श्रीलाल बहादुर शास्त्री के बारे में भी यह पूछा जाता है कि पाकिस्तान से युद्ध जीतने के बाद भी उन्होंने मास्को जाकर सोवियत संघ की मध्यस्थता स्वीकार कर हारने जैसा काम क्यों किया? बहुत समय तक यह सवाल किसी ने नहीं पूछा था पर जब कारगिल युद्ध के बंद होने के बाद यह बात उठी थी तब शास्त्री जी की भूमिका सामने आयी थी भले ही उस समय सीधे किसी ने उनका नाम लेकर आक्षेप नहीं किया गया। फिर यह सवाल चर्चा में अधिक नहीं आया पर विचारवान लोगों के लिये इतना ही बहुत था। पाकिस्तान को परास्त करने के बाद विजेता भारत के प्रधानमंत्री का इस तरह मास्को जाकर पाकिस्तान के हुक्मरानों से समझौता करना वाकई देश के लिये कोई सम्मान की बात नहीं थी-यह बात आज अनेक लोग मानते हैं। इस समझौते में पाकिस्तान की जमीन बिना कुछ लिये दिये वापस कर दी गयी थी।
            गांधीजी को विश्व में महान सम्मान प्राप्त हुआ है पर भारतीय जनमानस में अब उनकी छवि क्षीण हो रही है फिर अब फिल्म, क्रिकेट और अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्रों में सक्रिय नये नये महापुरुषों का भी प्रचार हो रहा है। सरकारी और गैर सरकारी तौर पर गांधी जयंती के समय खूब प्रचार होने के साथ ही अनेक कार्यक्रम भी होते हैं पर लगता नहीं कि आज के कठिन समय का सामना कर रहा भारतीय जनमानस उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लेता हो। गांधीजी को राजनीतक संत कहना उनके दर्शन को सीमित दायरे में रखना है। मूलतः गांधी जी एक सात्विक प्रवृत्ति के धार्मिक विचार वाले व्यक्ति थे। निच्छल हªदय और सहज स्वभाव की वजह से उनमें उच्च जीवन चरित्र निर्माण हुआ। एक बात तय है कि उन्होंने भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने का जब अभियान प्रारंभ किया होगा तब उनका लक्ष्य आत्मप्रचार पाना नहीं बल्कि देश के आम इंसान का उद्धार करना रहा होगा। अलबत्ता अपने आंदोलन के दौरान उन्होंने इस बात को अनुभव किया होगा कि उनके सभी सहयोग उनकी तरह निष्काम नहीं है। इसके बावजूद वह इस बात को लेकर आशावदी रहे होंगे कि समय के अनुसार बदलाव होगा और अपने ही देश के भले लोग राज्य अच्छी तरह चलायेंगे। कालांतर में जो हुआ वह हम सब जानते हैं। उनके सपनों का भारत कभी न बना न बनने की आशा है। स्थिति यह है कि अनेक अनुयायी अब दूसरे स्वाधीनता आंदोलन का बात करने लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि गांधी जी का सपना पूरा नहीं हुआ और जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन प्रारंभ किया वह पूरा नहीं हुआ। दूसरे शब्दों में 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी केवल एक ऐसा प्रतीक है जिसकी स्मृतियां केवल उस दिन मनाये जाये वाले कार्यक्रमों में ही मिलती है। जमीन पर अभी गांधीजी के सपनों का पूरा होना बाकी है।
        यहां हम गांधीजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की आलोचना नहीं कर रहे क्योंकि हम जैसा मामूली शख्स भला उन पर क्या लिख सकता है? अलबत्ता देश के हालात देखकर वैचारिक रूप से गांधी दर्शन अब निरापद नहीं माना जा सकता है। सबसे पहला सवाल तो यह है कि भारत का स्वाधीनता आंदोलन अंततः एक राजनीतिक प्रयास था जिसमें राजकाज भारतीयों के हाथ में होने का लक्ष्य तय किया गया था। दूसरी बात यह कि गांधीजी ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आंदोलन किया था जिस पर भारतीयों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने का आरोप था। इसके अलावा देश की समस्याओं के प्रति अंग्रेज सरकार की प्रतिबद्धता पर भी संदेह जताया गया था। इसका अर्थ सीधा है कि गांधीजी एक ऐसी सरकार चाहते थे जो देश के लोगों की होने के साथ ही जनहित का काम करे। ऐसे में राजकाज के पदों पर बैठने वाले महत्वपूर्ण लोगों की गतिविधियां महत्वपूर्ण होती हैं। तब गांधी जी ने राजकाज प्रत्यक्ष रूप से चलाने के लिये कोई पद लेने से इंकार क्यों किया? क्या वह इन पदों को भोग का विषय समझते थे या दायित्व निभाने के लिये अपने अंदर क्षमता का अभाव अनुभव करते थे। अगर यह दोनों बातें नहीं थी तो क्या उनको भरोसा था कि जो लोग राजकाज देखेंगे वह उनके रहते हुए अच्छा काम ही करेंगे? क्या उनको यकीन था कि जिन लोगों को वह राजकाज का जिम्म सौंपेंगे वह अच्छा ही काम करेंगे?
यकीनन सरकार का सैद्धांतिक रूप उनके सपनों में रहा हो पर व्यवहारिक  रूप से उनको इसका कोई अनुभव नहीं था। वह राजनीतिक के सैद्धांतिक पक्ष और व्यवहारिक स्थिति के अंतर को नहीं जानते थे। उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक अभियान शुरु किया जो कालांतर में सीमित लक्ष्य प्राप्त कर समाप्त हो गया। आज उसी प्राप्त लक्ष्य को भी चुनौती मिल रही है। गांधी जी के अनुयायी और आज के महानायक अन्ना हजारे मानते हैं कि आज का शासन भी अंग्रेजों जैसा ही है। श्री अन्ना हजारे स्वयं भी कोई पद नहीं लेना चाहते पर देश के स्वच्छ और विकसित होने की का जिम्मा सरकार का ही मानते हैं। तब ऐसा लगता है कि एक राजनीति शास्त्र का ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति भी राजनीति कर सकता है या राजकाज कोई पद संभाल सकता है। हमारा तो मानना है कि अंग्रेजों के विरुद्ध गांधीजी के आंदोलन के बारे में अब इतिहास पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं अन्ना जी का आंदोलन बता रहा है कि उस समय क्या क्या हुआ होगा?
        28 अगस्त को अन्ना साहिब का जनलोकपाल विधेयक लाने संबंधी आंदोलन समाप्त हुआ। हासिल कुछ नहीं हुआ पर उन्होंने कहा कि हमें आधी जीत मिली है। तब हम जैसे लोग सड़कों पर घूमते हुए उस आधी जीत को ढूंढते हुए सोच रहे थे कि 16 अगस्त को भी कोई हम जैसा शख्स रहा होगा जो उस आजादी को ढूंढ रहा होगा जिसका दावा उस समय किया जा रहा था। बहरहाल गांधीजी के आंदोलन के पीछे उस समय के धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, तथा आर्थिक शिखरों पर बैठे लोग रहे होंगे जो अपने हित साधन के लिये ही ऐसी आजादी चाहते होंगे ताकि वह देश के आम इंसान को गुलाम बनाये रख सके। पता नहीं गांधीजी यह देख पाये या नहीं पर इतना तय है कि वह जैसा भारत चाहते थे वैसा बन नहीं पाया। आखिरी बात यह है कि गांधीजी सात्विक प्रवृत्ति के थे और उनका आंदोलन राजस वृत्ति का था। बात अगर राजनीति की है तो उसमे सात्विक प्रवृत्ति की आशा करना व्यर्थ है। यह राजसी वृत्ति वाले लोगों का काम है। राजसी वृत्ति बुरी नहीं है बशर्त व्यक्ति अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये उचित ढंग से कार्य करे। मुश्किल यह है कि तामसी वृत्ति वाले लोग अब राजकाज करने लगे हैं। भारत में दूसरी भी समस्या है। राजसी लोगों को स्वार्थी जानकर लोग हªदय से सम्मान नहीं करते जबकि सामूहिक नेतृत्व करना उन्हीं के बूते का होता है। सात्विक लोगों को समाज सम्मान देता है पर वह निष्काम होने के कारण राजकाज का काम नहीं करते। यही कारण है कि राजसी वृत्ति के लोग सात्विक लोगों को ढाल बनाकर आगे चलते हैं ताकि समाज उनका नेतृत्व और शासन स्वीकार करे। इसी कारण पूरे विश्व के राष्ट्राध्यक्ष अपने संपर्क धार्मिक नेताओं  से रखते हैं। गांधी को हमने देखा नहीं और अन्ना से कभी मिले नहीं पर प्रचार माध्यमों में देखकर हमने अनुभव किया वह लिख दिया। इस अवसर पर महात्मा गांधी जी और शास्त्री जी को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि!




कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Wednesday, September 21, 2011

गरीबी हटाने की योजना-हिन्दी कविता (garibi hatane ki yojana-hindi kavita or poem

पोते ने पूछा दादाजी से
‘‘दादाजी आप यह बताओ
बड़े बड़े लोग उपवास क्यों रखते हैं,
छक कर खाते मलाई और मक्खन
फिर भी क्यों भूख का स्वाद चखते हैं।
दादाजी ने कहा
‘‘बेटा,
गरीबों का दिल जीतने के लिये
बड़े लोग उपवास इसलिये करते हैं
क्योंकि उनकी भूख शांत करने के लिये
रोटियां बांटने का जिम्मा लेकर मिली कमीशन से
अपनी तिजोरी भी वही भरते हैं,
देख लेना 32 रुपये खर्च करने वाला
अब गरीब नहीं माना जायेगा,
फिर भी गरीबों की संख्या
आंकड़ों में बढ़ती दिखेगी,
बड़ों की कलम मदद की रकम भी बड़ी लिखेगी,
उनको गरीबों से हमदर्दी नहीं है
फिर भी अपनी शौहरत और दौलत
बढ़ाने के लिये
वह गरीबी हटाने की योजना हमेशा साथ रखते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, September 11, 2011

हिन्दी दिवस पर कविता (hindi diwas or divas par kavita)

हिन्दी में अंग्रेजी के शब्द मिलाकर
मातृभाषा को वह विकास के पथ पर ले जायेंगे,
इसी तरह हर हिन्दी दिवस पर
नये नये तरीके ईजाद करेंगे,
मंच पर खड़े होकर अंग्रेजी में
हिन्दी के लिये सांत्वना संदेश पढ़ेंगे,
कुछ गीत भी संगीत के साथ गुनगुनायेंगे,
इस वादे के साथ
अगले वर्ष फिर हिन्दी दिवस मनायेंगे।
---------------



रास्ते में तेजी से चलता
मिल गया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू तुम्हारे पास ही आ रहा था
सुना है दस सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग लेखक
सम्मान पाने वाले हैं,
ऐसा लगता है हिन्दी के अंतर्जाल पर भी
अच्छे दिन आने वाले हैं,
हो सकता है तुमको भी
कहीं से सम्मान मिल जाये,
हमारा छोटा शहर भी
ऐसी किसी खबर से हिल जाये,
आठ साल अंतर्जाल पर हो गये लिखते,
पहल दिन से आज तक
तुम फ्लाप कवि ही दिखते,
मिल जाये तो मुझे जरूर याद करना
मैंने ही तुम्हारे अंदर हमेशा
उम्मीद जगाई,
सबसे पहले दूंगा आकर बधाई।

सुनकर हंसे दीपक बापू और बोले
‘‘अंतर्जाल पर लिखते हुए अध्यात्म विषय
हम भी हम निष्काम हो गये हैं,
कोई गलतफहमी मत रखना
हमसे बेहतर लिखने वाले
बहुत से नाम हो गये हैं,
हमारी मजबूरी है अंतर्जाल पर
हिन्दी में लिखते रहना,
शब्द हमारी सासें हैं
चलाते हैं जीवन रुक जाये वरना,
मना रहे हैं जिस तरह
टीवी चैनल हिन्दी दिवस
उससे ही हमने प्रसन्नता पाई,
नहीं मिलेगा हमें यह तय है
फिर भी देंगे
सम्मानीय ब्लॉग लेखको को हार्दिक बधाई,
हम तो इसी से ही प्रसन्न हैं
हिन्दी ब्लॉग लेखक शब्द
अब प्रचलन में आयेगा,
अपना परिचय देना
हमारे लिये सरल हो जायेगा,
सम्मान का बोझ
नहीं उठा सकते हम,
उंगलियां चलाते ज्यादा
कंधे उठाते कम,
इसी से संतुष्ट हैं कि
अंतर्जाल पर हिन्दी लिखकर
हमने अपने ब्लॉग लेखक होने की छवि
अपनी ही आंखों में बनाई।
------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, August 20, 2011

आशिक का अनशन-हिन्दी हास्य कविता (ashik ka anshan-hindi hasya kavita or hindi comic poem)

आशिक ने कहा माशुका से
"तुम जल्दी से विवाह की तारीख
तय कर लो,
मेरा अभी तक दिल बहलाया है
अब खाली घर भी भर दो,
वरना तुम्हारे घर के बाहर
आमरण अनशन पर बैठ जाऊंगा,
भूखा प्यासा मरकर अमर आशिक का दर्जा पाऊँगा,
दुनिया मेरी याद में आँसू बहाएगी।"

सुनकर माशुका झल्लाई
और गरजते हुए बोली
"मुझे मालूम है
नौकरी से तुम्हारी होने वाली है छटनी,
बन जाएगी तुम्हारी जेब की चटनी,
अब तुम मेरे खर्चे नहीं उठा पाओगे,
घर पर ले जाकर चक्की पिसवाओगे,
पर मैं तुम्हारे झांसे में नहीं आऊँगी,
जब तक न बने तुम्हारा नया ठिकाना
तुमसे तब तक तुमसे दूरी बनाऊँगी,
वैसे तुम याद रखना
नारियों को परेशान करने के खिलाफ
ढेर सारे कानून बन गए हैं,
कई स्वयंसेवी संगठनों के
तंबू भी तन गए हैं,
नया काम मिलने पर ही
मेरे पास आना,
वरना पड़ेगा पछताना,
अनशन किया तो भूखे बाद में मरोगे,
पहले  मेरे मुहल्ले में  दोस्तों के  हाथ फँसोगे,
कारावास में पहरेदार बाद में जमाएँगे लट्ठ
पहले भीड़ तुम्हारी पीठ पर बरसाएगी।"
--------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Thursday, August 11, 2011

आरक्षण फिल्म पर हायतौबा फिक्सिंग लगती है-सामाजिक लेख (a film movie on resevetion aarakshan and fix discussion and dissput-a hindi social article)

               एक बात तय है कि चाहे जितनी बहसें   और प्रदर्शन हो जायें फिल्म आरक्षण का प्रदर्शन रुकेगा या बाधित होगा ऐसा नहीं लगता। वजह साफ है कि बाज़ार और प्रचार का संयुक्त उपक्रम इस तरह है कि वह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में विभिन्न मुद्दे उठाकर इसी तरह अपने उत्पाद, सेवायें तथा पठनीय या दर्शनीय सामग्री का विक्रय करता है। फिल्म आरक्षण के निर्माता का तो पता नहीं पर उसके सभी अभिनेता निश्चित रूप से बाज़ार और प्रचार के नायक हैं। उनके पास न केवल फिल्मों का ढेर है बल्कि अनेक वस्तुओं के विज्ञापनो में उनके चेहरे प्रतिदिन देखे जा सकते हैं। मतलब यह फिल्म भी बाज़ार और प्रचार के उपक्रमों का ही एक सृजन है। जिस तरह उदारीकरण के चलते बाज़ार और प्रचार उपक्रमों ने समूचे विश्व पर अधिकार कर लिया है उसे देखकर नहीं लगता कि ‘आरक्षण’ फिल्म का प्रदर्शन रुक जायेगा। बल्कि ऐसा लगता है कि इसे प्रचार दिलानें के लिये विवाद खड़ा किया गया है । पहले भी किसी फिल्म के गाने या दृश्यों पर पर आपत्तियों  का प्रचार किया गया पर बाद में कुछ हुआ नहीं। उल्टे फिल्मों को प्रारंभ में ही अच्छी बढ़ता मिली यह अलग बात है कि बाद के दिनों में उनका प्रभाव एकदम घट गया। सीधी बात कहें तो फिल्म ‘आरक्षण’ पर यह हायतौबा फिक्सिंग लगती है।
            यह फिल्म देश की नौकरियों में जाति के आधार पर आरक्षण नीति पर आधारित है। हम यहां इस पर बहस नहीं करना चाहते कि यह नीति गलत है या सही। वैसे भी फिल्म के निर्माता का कहना है कि यह फिल्म आरक्षण नीति पर कोई तर्कसंगत दृष्टिकोण रखने के लिये नहीं बनी। फिल्म में क्या है यह तो पता चल ही जायेगा पर जिस तरह इस फिल्म पर बहस हो रही है और जो तर्क आ रहे हैं वह अधिक चर्चा लायक नहीं है क्योंकि उनमें कुछ नया नहीं है। अलबत्ता अभिव्यक्ति की स्वततंत्रा का मुद्दा जरूर चर्चा का विषय है। पहली बात तो यह है कि बाज़ार और प्रचार के शिखर पुरुषों की ताकत इतनी बड़ी है कि लगता नहीं है कि उनकी यह फिल्म रुकेगी या बाधित होगी। दूसरी बात यह है कि अभिव्यक्ति अब केवल संगठित क्षेत्रों की सपंत्ति बन गयी है। टीवी चैनल और समाचार पत्रों के विद्वान बड़े शहरों में रहने वाले व्यवसायिक प्रचारक होते हैं। उनके वही रटे रटाये तर्क सामने आते हैंे जो बरसों से सुन रहे हैं। इसलिये आम इंसान की अभिव्यक्ति के मुखर होने का तो प्रश्न ही नहीं है।
            दरअसल हम अगर देश की ‘आरक्षण’ नीति पर बहस करेंगे तो ऐसे कई सवाल हैं जो नये ंसदर्भों के उठते हैं जिनपर कथित समर्थक प्रचारक कभी ध्यान नहीं देते तो विरोधियों का भी यही हाल है। आरक्षण समर्थकों में कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने संगठन बनाये बैठे हैं और दावा करते हैं कि वह अपनी समाजों के रक्षक हैं। वह अपने रटे रटाये तर्क लाते हैं। ‘आरक्षण’ का विरोध सार्वजनिक रूप से कोई करता नहीं है क्योंकि ऐसा करने वालों को व्यवस्था से प्रतिरोध का भय रहता है। अगर हम पूरे विश्व के देशों की व्यवस्थाओं का देखें तो सच यह लगता है कि तो आरक्षण हो या न हो इस पर बहस करना ही व्यर्थ है। अभी हाल ही में ब्रिटेन में हुए दंगों में अश्वेतों की उपेक्षा का परिणाम मान गया। इस लिहाज से तो आरक्षण होना भी बुरा नहीं है।
         मुख्य बात यह है कि हम अपनी व्यवस्थाओं का स्वरूप कैसे चाहते हैं? हम उनको जनोन्मुखी बनाना चाहते हैं या उसमें भागीदारी का स्वरूप देखना चाहते हैं। अगर जनोन्मुखी बनाना चाहते हैं तो पूरी तरह से व्यवसायिक कौशल वाले लोगों को आगे रखना होगा और व्यवस्था में भागीदारी दिखाना चाहते हैं तो फिर हमें यह स्वीकार करना होगा कि उसमें कुछ समझौते तो करने ही पड़ेंगे। समस्या यह है कि भागीदारी के स्वरूप में कार्यकर्ता अपने पदों के अधिकार समझते हैं कर्तव्य नहीं जबकि जनोन्मुखी होने पर उनका रुख दायित्व निभाने वाला रहता है।
         हम बार बार देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर व्यथित होने का दावा तो करते हैं पर व्यवस्था में पनपी अकुशलता को अनदेखा कर देते हैं जबकि सारे संकट का कारण वही है। जहां तक कुशल लोगों का सवाल है तो हर जाति, धर्म, भाषा और हर क्षेत्र में हैं पर क्या हमने सभी को अवसर दिया है? क्या देश के सभी कुशल प्रबंधक सम्मानजजनक पदों पर पहुंचे हैं। हमने पद पाना कौशल मान लिया पर उसके कर्तव्यों के निर्वहन की कुशलता पर कभी विचार नहीं किया। हम यहां जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर विचार तो यह बात साफ दिखाई देगा कि आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में व्यवस्था इस तरह हो गयी है कि निजी चतुराई के सहारे अपने स्वार्थ सिद्ध करने वाले पद हथिया लेते हैं पर व्यवसायिक कौशल वाले लोगों को कहीं स्थान नहीं मिल पाया।
      आरक्षण समर्थक एक बुद्धिजीवी ने सवाल किया कि ‘क्या फिल्म को प्रमाण पत्र देने वाले सैंसर बोर्ड में एक भी हमारे समाज का है?’
         इसका जवाब कोई क्या देगा? दरअसल अगर उनसे कहा जाये कि इस मसले पर बहस के लिये अपने समाज से वह आदमी ले आओ जिसके पूरे खानदान में किसी ने आरक्षण का किसी भी तरह लाभ नहीं लिया हो। एक बात बता दें कि जिन समाजों को आरक्षण है उसमें कई ऐसे परिवार हैं जिनकी किसी पीढ़ी को इसका लाभ नहीं मिला। ऐसे लोग आरक्षण को लेकर इतने संवेदनशील भी नहीं होते पर जब भावना की बात आती है तो उनकी संख्या का सहारा लेकर ऐसे अनेक आरक्षण समर्थक विद्वान अपनी बात वजनदार होने का दावा करते हैं। देश के निम्न जातियों के गरीब लोगों की हालत बद से बदतर होती गयी है। आरक्षण की सुविधा लेकर सफेद छवि बनाने वाले लोगों ने अपने समाज के गरीब तबके से कितना वास्ता रखा है यह इस सुविधा से परे उनके लोगों से पूछकर देखा जा सकता है। फिर अब निजीकरण बढ़ रहा है ऐसे में आरक्षण का मुद्दा कितना सार्थक है यह भी विचारणीय बात है। फिल्म की कहानी आरक्षण की असलियत के कितना करीब होगी यह कहना कठिन है पर ऐसी फिल्मों को प्रचार दिलाने के लिये विवाद खड़े किये गये हैं यह देखा गया है।
------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Friday, August 5, 2011

पाँव उधार मांगने वालों पर भरोसा-हिन्दी शायरी

क्यों उम्मीद करते हो उन लोगों से
जो हुकूमत का पहाड़ चढ़ने के लिए
तुमसे पाँव उधार मांगने आते हैं,
बताओ ज़रा यह कि
जिनके सिर आसमान में टंगे हैं
चमकते सितारों की तरह
उनकी आँखों को नीचे के बदसूरत नज़ारे
कब नज़र आते हैं।
-----------
जब से सीखा है
कौवे से किसी दूसरे पर
कभी भरोसा न करना
ज़िंदगी अपने अमन और चैन रहने लगा है,
हो गया है इस बात का अहसास कि
वफा बाज़ार में बिकने वाली शय है
यहाँ हर कोई मतलब का सगा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकाऐं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर