Thursday, August 6, 2009

स्वाइन फ्लू का इलाज-लघु हास्य व्यंग्य (swine flu ka ilaj-hasya vyangya)

उसने चैराहे पर मजमा लगा लिया।
‘आईये भद्रजनो, दुनियां की सबसे खतरनाक बीमारी ‘स्वाईन फ्लू’ का सही तरह से दलाज करने वाली दवाई खरीदे। यह विदेश से आयी है और इसकी दवा भी वहीं से खासतौर से मंगवाई है।’
लोगों की भीड़ जमा हो गयी। वह बोलता जा रहा था-‘यह बीमारी आ रही है। सभी एयरपोर्ट पर पहुंच गयी है। इसे रोकने की कितनी भी कोशिश करो। जब यहां पहुंचे जायेगी तब इसका मिलना मुश्किल होगी। पचास रुपये की शीशी खरीद लीजिये और निश्चित हो जाईये।’
एक दर्शक ने पूछा-‘तपेदिक की दवा हो तो मुझे दे दो! मुझे इस बीमारी ने परेशान किया है। बहुत इलाज करवाया पर कोई लाभ नहीं हुआ।’
‘हटो यहां से! क्या देशी बीमारियों का नाम लेते हो। अरे यह स्वाइन फ्लू खतरनाक विदेशी बीमारी है। तुम अभी इसे जानते नहीं हो।’ वह फिर भीड़ की तरह मुखातिब होकर बोला-हां! तो मैं कह रहा था.....................’’
इतने में दूसरा बोला-‘इसका नाम टीवी पर रोज सुन रहे हैं, पर मलेरिया का कोई इलाज हो तो बताओ। मेरे दोस्त को हो गयी है। वह भी इलाज के लिये परेशान है।’
वह बोला-‘हटो यहां से! देसी बीमारियों का मेरे सामने नाम मत लो।’

वह बोलता रहा। आखिर में उसने अपनी पेटी खोली। लोगों ने दवाई खरीदी। कुछ चलते बने। एक आदमी ने उत्सकुता से उससे पूछा-‘पर यह स्वाईन फ्लू बीमारी होती कैसे है और इसके लक्षण क्या हैं?
उसने कहा-‘पहले दवाई खरीद लो तो समझा देता हूं।’
उस आदमी ने पचास रुपये निकाल कर बढ़ाये और दवाई की शीशी हाथ में ली। उसने अपनी पेटी बंद की और चलने लगा। उस आदमी ने कहा-‘भई, मैंने इस बीमारी के बारे में पूछा था कि यह होती कैसे है और इसके लक्षण क्या हैं? उसका उत्तर तो देते जाओ।’
उसने कहा-‘जाकर टीवी पर सुन लेना। मेरा काम स्वाईन फ्लू की दवाई बेचना है। बीमारी का प्रचार करने का काम जिसका है वही करेंगे।’
वह चला गया और सवाल पूछने वाला आदमी कभी शीशी को कभी उसकी ओर देखता रहा।
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Sunday, August 2, 2009

शिकायतों का पुलिंदा-हिंदी मुक्त कविता (shikayat ka pulinda-hindi mukt kavita)

यादों में जो बसता है
उसका नाम जुबां से बयां कहां होता है।

दिलबर नजर से हो कितना भी दूर
उसके पास होने का हमेशा अहसास होता है

आंखों में बसा दिखता है यह पूरा जमाना
पर ख्याल में जो बसा, वही दिल के पास होता है।
..........................
तंगदिल साथी के साथ
जिंदगी का यह सफर
तन्हाई में गुजरता जाता है।

शिकायतों का पुलिंदा ढोते हैं साथ
उम्मीद नहीं है, चाहे पास है उसका हाथ
शिकायतों का बोझ दिल में लिये
कारवां राह पर, खामोशी से गुजरता जाता है।

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Saturday, August 1, 2009

झगड़ा जोरदार, खबर धारदार-हिन्दी लघुकथा (hindi laghu katha)

उससे कहा गया की वह बहुत दिन से कोई खबर नहीं लाया है और आज अगर आज कोई खास नहीं लाया तो उसकी नौकरी भी जा सकती है।
वह दफ्तर से कैमरा लेकर निकला और बाहर खडा हो गया. उसने वहाँ पास से गुजरते एक आदमी से पूछा-ष्तुम आस्तिक हो या नास्तिक? जो भी हो तो क्यों? बताओ मैं तुम्हारा बयान और चेहरा अपने कैमरे से सबको दिखा चाहता हूँ।
उस आदमी ने कहा-मैं आस्तिक हूँ और अभी मंदिर जा रहा हूँ। बाकी वहाँ से लौटकर बताऊंगा।

वह चला गया तो दूसरा आदमी वहाँ से गुजरा तो उसने वही प्रश्न उससे दोहराया। उसने जवाब दिया-श्मैं नास्तिक हूँ और अभी शराब पीने जा रहा हूँ। उसके कुछ पैग पीने के बाद ही बता पाऊंगा। तुम रुको मैं अभी आता हूँ।

वह अपना कैमरा लेकर टीवी टावर पर चढ़ गया। थोडी देर बाद दोनों लौटे। उसको न देखकर दोनों ने एक दूसरे से पूछाश्श्वह कैमरे वाला कहाँ है?
फिर दोनों का परिचय हुआ तो असली मुद्दा भी सामने आया। दोनों के बीच बहस शुरू हो गई और नौबत झगडे तक आ पहुची। दोनों अपनी कमीज की आस्तीन ऊपर कर झगडे की तैयारी कर रहे थे। उनके बीच गाली-गलौच सुनकर भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। उसमें से एक समझदार आदमी ने दोनों से पूछा ‘‘पहले यह बताओ की यह प्रश्न आया कहाँ से? किसने तुम्हें इस बहस में उलझाया।’’

दोनों इधर-उधर देखने लगे तब तक वह कैमरा लेकर नीचे उतर आया। दोनों ने उसकी तरफ इशारा किया। उसने दोनों से कहा-आप दोनों का धन्यवाद! मुझे मिल गयी आज की जोरदार खबर!’’

वह चला गया। दोनों हैरान होकर उसे देखने लगे। समझदार आदमी ने कहा-तुम दोनों भी घर जाओ और उसकी जोरदार खबर देखो। हम सबने यहां देख ली, तुम नहीं देख पाए यह जोरदार खबर, क्योंकि तुम दोनों आस्तिक-नास्तिक के झगडे में व्यस्त थे तो कहाँ से देखते। वैसे हम भी जा रहे हैं क्योंकि यह खबर दोबारा टीवी पर देखकर भी मजा आयेगा।’’
दोनों वहीं हतप्रभ खडे रहे और भीड़ के सब लोग वहाँ से चले गए अपने घर वह आज की जोरदार खबर देखने।
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Wednesday, July 29, 2009

खास आदमी बनने का मोह-हिंदी व्यंग्य (khas admi banne ka moh-hindi vyangya

सच तो यह है कि जिंदगी वही लोग मजे से गुजारते हैं जिनको पता है कि वह कभी खास आदमी नहीं बन पायेंगे। जो लोग खास बनने का ख्वाब पालते हैं वह अपनी पूरी जिंदगी जद्दोजेहद करते हैं। अब यह अलग बात है कि किसी को खास बनना नसीब होता है तो कुछ लोग केवल इस भ्रम में गुजार देते हैं कि वह ‘खास आदमी’ है। निश्चित रूप से यह लोग उस मध्यम वर्गीय परिवारों के होते हैं जो अंग्रेजी की गुलामी से सराबोर शिक्षा के साथ अपने पास उपलब्ध धन को विलासिता में खर्च करने का सामथ्र्य रखते हैं।
वैसे तो इस देश का पूरा शिक्षित समाज ही इसी गुलामी वाली शिक्षा पद्धति से संपन्न है पर इनमें भी कुछ लोग हैं जो यह मानकर चलते हैं कि वह एक आम परिवार में पैदा हुए हैं और उन्हें खास आदमी बनने के अवसर कभी प्राप्त नहीं होगा। ऐसे लोग अगर लेखक, पत्रकार,चित्रकार या किसी अन्य कला में पारंगत होते हैं तो एकदम सहजता से काम करते हुए चले जाते हैं। इसके विपरीत जो गुणीजन अपने अंदर आम परिवार के होने के बावजूद खास होने का सपना पालते हैं उनके लिये यह जिंदगी असहज और खतरनाक हो जाती है।
ऐसे अनेक लोग हैं जो पहले हिंदी फिल्मों में नायक, गायक, शायर बनने के लिये घर से भागे पर वहां जाकर उनको पता लगा कि ‘जीरो से हीरो’ बनने की कहानी तो केवल फिल्मों में दिखाई जाती है वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता। एक टीन का काम करने वाले दुकानदार का लड़का मुंबई भाग गया। कई दिनों के बाद वह घर लौटा और अपने बाप के काम में हाथ बंटाने लगा।
एक ने उसके बाप से पूछा-‘अच्छी बात है, लड़का मुंबई से लौट आया। इसे दुकान का काम सिखाओ। इसे समझाओ फिल्मों में ऐसे काम नहीं मिलता।’
इससे पहले बाप कुछ बोले वह लड़का स्वयं बोला-‘कैसे नहीं मिलता? मैं तो अभी ऐसे ही आया हूूं। वहा फिल्मों में काम करता हूूं। अभी छुट्टी लेकर आया हूं।’
वह आदमी भी फिल्म देखने का आदी था। उसने पूछा‘किस फिल्म में काम किया है? जरा बताओ तो सही।’
उसने फिल्म का नाम बताया तो वह आदमी चैंक गया और बोला-‘उसे तो मैं तीन बार देख चुका हूं। तुम्हारा चेहरा याद नही आ रहा।’
वह लड़का बोला-‘उस फिल्म में जब हीरो स्टेशन पर था तब उसके पास रेल कर्मचारी की नीली ड्रेस पहनकर मैं खड़ा रहा था। उसने मुझसे रास्ता पूछा मैंने उंगली उठाकर उसे बताया था।’
उस आदमी को याद आया। वह बोला-‘हां, पर उसमें तुम्हारा चेहरा शायद सीधे कैमरे की तरफ नहीं था। केवल एक सैकण्ड का दृश्य था। अरे, वह तो एक ऐसे ही रोल है जो मजदूरनुमा लोगों को दिया जाता है। दूसरी किसी फिल्म में भी काम किया है?’
उसने कहा-‘हां, पर वह अभी आनी है।’
वह लड़का कुछ दिन बाद फिर मुंबई गया। फिर लौट आया। वह न धंधे का रहा न फिल्म लाईन का! बचपन में उसे हमने देखा था और उसका यह प्रभाव हम पर पड़ा कि फिर खास आदमी बनने का मोह कभी नहीं रहा।
फिल्मी कहानियों में हीरो से जीरो बनने वाली कहानियां देखकर खूब आनंद उठाया पर कभी यह नहीं सोचा कि हम भी कभी खास आदमी बनेंगे।
समय के साथ हमारा यह विश्वास पक्का होता चला गया। वैसे आजकल की पीढ़ी के सदस्य अधिकतर समझदार हैं। लेखक, फिल्म, संगीत, साहित्य पत्रकारिता और समाज सेवा में भी आजकल वंश परंपरा चल पड़ी है। जड़ता को प्राप्त इस समाज मेें बहुत कम लोग यह मानकर चलते हैं कि उनको खास श्रेणी मिलेगी।
वैसे आम आदमी बने रहने के अलग मजे हैं। खास आदमी की श्रेणी पाना जहां लगभग असंभव है वहां आम आदमी बनकर ही मजे लिये जायें तो एक बहुत अच्छा है। ऐसे में खास लोगों की गंभीर क्रियायें भी हास्य का बोध कराती हैं। अगर आप चित्रकार, पत्रकार, लेखक या कलाकार हैं तो अपना काम करने के बाद आम आदमी की भीड़ में शामिल हो जाईये। अपने से कमतर लोगों की पूजा होते देख दुःखी मत होईये। हंसिये! जो पुज रहा है जो पूज रहा है दोनों के चेहरे पर कृत्रिम प्रसन्नता का भाव देखकर आप हंसे नहीं तो इसका मतलब यह है कि आप पर खास न होने का अफसोस राज्य कर रहा है। यह आपके स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। अपनी रचना-चित्र, साहित्य कृति या संगीत और स्वर से परिपूर्ण गीत-करने के बाद आप उसे भूल जाईये। उसे भीड़ में जाने दीजिये। लोगों को उसका मजाक उड़ाते हुए देखिये। यह मजाक उनके अंदर मौजूद कुंठाओं से पैदा होता है जो उनके स्वयं के असहाय होने को प्रमाण हैं।
जो खास नहीं बने उन पर तरस खायें पर जो खास हो गये उनको भी देखिये वह बिचारे बार बार इस प्रयास में रहते हैं कि लोग उनको खास समझते रहेें। आदमी उनको खास समझ रहा है पर उनको यह खौफ रहता है कि कहीं उनको लोग भूल न जायें। इस चक्कर में उलूलजुलूल हरकतें करते हैं।
उस दिन हमें एक सहधर्मी व्यंग्यकार मिल गये जो कि हमारे आलोचक भी हैं। हम पर फिकरे कसते रहते हैं और हम भी उनका पीछा नहीं छोड़ते क्यांेकि कई व्यंग्य तो उनसे ही उपहार में मिल जाते हैं। उस दिन वह स्कूटर रोककर एक दुकान से कंगा खरीद रहे थे। हम भी उसी बाजार में थे और उनको देख लिया और लपककर पहुंच गये। सोचा कि दो चार सुना लेगा तो क्या एक दो व्यंग्य का विषय भी तो दे जायेगा। हमें देखकर ही उसका मूंूह सूख गया।
‘यार, तुम्हें शर्म भी नहीं आती! चाहे जब सामने आ जाते हो।’ वह बोला।
हमने कहा-‘यार, इधर विषय का अकाल है। सोचा तुमसे एक दो व्यंग्य रचना ही मिल जाये। चलो तुमने एक हास्य कविता का विषय तो दे दिया।’
वह गुस्से में बोला-‘अरे, हास्य कवि! कितने कवि सम्मेलनों में जाता है? कभी तेरा नाम ही नहीं सुना। तू हमसे बराबरी मत कर। अभी रेडियो पर साक्षात्कार के लिये जा रहा हूं। फिर आकर तेरे से बात करूंगा।’
हमने पूछा-‘यह रेडियो पर साक्षात्कार पर जाने के कारण ही यह कंगा क्यों खरीद रहे हो? जेब में रखा करो। वैसे तुम्हारे सिर पर बाल इतने कम है कि हाथ से ही कंगी हो जाती। वैसे कौनसे रेडियो पर तुम्हारा साक्षात्कार आयेगा।’
वह बोला-‘नहीं बताऊंगा! तुम चालाक हो। मैंने उस दिन अखबार में तुम्हारा व्यंग्य पढ़ा था। तुमने मेरी बातों से ही व्यंग्य चुरा लिया था।’
हमने कहा-‘यह साक्षात्कार किस रेडियो पर आयेगा।’
वह बोला-‘नहीं बताऊंगा! तुम मेरे साक्षात्कार में बहुत सारी सामग्री व्यंग्य में परिवर्तित करोगे।’
हमने कहा-‘यार, हमारा भी साक्षात्कार प्रसारित करा दो। तुम हमारे मित्र हो!’
वह बोला-‘पहले तो मित्र कहकर मेरा अपमान मत करो! मैं तुम्हें कभी अपना मित्र नहीं समझता। मेरी बातों से व्यंग्य निकालकर लिखो और मित्र भी कहो-यह संभव नहीं है। फिर साल छह महीने में एकाध बार अखबार में छप जाने से कोई बड़े लेखक नहीं बन जाते।’
वह स्वयं भी कोई अधिक छपने वालों में नहीं है। हमारी तरह ही एक आम आदमी की तरह उसका जीवन है पर खास होने का मोह उससे नहीं छूटता। हालांकि वह कभी कभी ऐसी बात कर जाता है जो दिल को छू जाती है। हमने पूछा-‘तो कैसे बनते हैं बड़े लेखक!’
वह जोर से हंस पड़ा-‘अरे, यार अगर मुझे पता होता तो खुद ही नहीं बन जाता।’
उसके बाद वह सामान्य होकर हाथ मिलाते हुए वहां से चला गया। उसकी आखिरी बात हमें बहुत अच्छी लगी।
खास आदमी बनने का मोह छोड़ने के बाद आदमी स्वयं ही स्वतंत्र हो जाता है। उस पर किसी प्रकार का दबाव नहीं रहता। वरना तो किसी खास आदमी की चाटुकारिता और झूठी प्रशंसा करते रहो वह खास बनाने से रहा। वह तो केवल अपने लिये उपयोग करता है। यह अलग बात है कि कुछ खास लोगों का चमचा होना भी आजकल कोई कम उपलब्धि नहीं है। मगर यह भी सच है कि अपनी आत्मा को मारकर ही चाटुकारिता हो सकती है।
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Saturday, July 25, 2009

अंग्रेजी ब्लाग के बीच हिंदी ब्लाग क्या करेगा-आलेख (inglish and hindi blog-hindi article)

विलियम्स नाम के 43 वर्षीय उस मानवाधिकार कार्यकर्ता ने पता नहीं क्या सोचकर इस लेखक के हिंदी ब्लाग को अपने ब्लाग से लिंक कर लिया? उसने सुबह लिंक दिया था तब सोचा कि शायद जल्दबाजी में गलती कर गया होगा। फिर शाम को देखा तो उसका ईमेल टिप्पणी के रूप में देखा। इसका मतलब वह जानता है कि उस ब्लाग में क्या है! उसकी टिप्पणी से पता लग जाता है उसे इसके अध्यात्मिक ब्लाग होने का पता है। उसके ब्लाग पर अपना पाठ देखकर हैरानी हुई। आखिर उसके अंग्रेजी पाठक हिंदी का ब्लाग कैसे पढ़ेंगे? उसकी टिप्पणी नीचे लिखी हुई जिसका पूरा अर्थ देखने के लिये लेखक को भी डिक्शनरी देखनी होगी।
William मुझे
विवरण दिखाएँ ७:०२ am (1 दिन पहले) उत्तर दें
William has left a new comment on your post "भर्तृहरि नीति शतक-चमचागिरी से कोई लाभ नहीं होता (c...":
by the way, Deepak Bartdeep, I will remember to salt the meat for abdominal digestibility also. Just remember oh spiritual leader, human rights apply to you to!
Posted by William to दीपक भारतदीप की हिंदी एक्सप्रेस पत्रिका at 25 July, 2009


यकीनन उसे स्वयं भी हिंदी नहीं आती होगी। उसने जरूर अनुवाद टूल के सहारे उसे पढ़ा है और उसे लगा कि शायद यह ब्लाग भी उसका आवागमन बढ़ाने में सहायक होगा या संभव है कि वह कोई मानवाधिकारों से संबंधित कोई लक्ष्य लेकर बढ़ रहा हो। यह मानना गलत होगा कि वह अंग्रेजी का ब्लाग लेखक है तो उसके पास पाठकों आवगमन अधिक होगा क्योंकि लगातार यह बातें आती रहती हैं कि अनेक ब्लागों को पढ़ने वाला एक ही आदमी है। बहरहाल यह दिलचस्प है कि अंग्रेजी और अंग्रेजों के बीच हिंदी अपनी जगह बनाने का प्रयास कर रही है। इस विषय में एक हिंदी ब्लाग लेखक ने एक दूसरे लेखक के ब्लाग पर यह टिप्पणी की थी कि ‘हिंदी नई भाषा है इसलिये यह आगे निश्चित रूप से बढ़ेगी’। वह शायद भूल गये होंगे पर इस लेखक को याद है।
एक अंग्रेजी ब्लाग लेखक द्वारा हिंदी ब्लाग को लिंक करना कोई बड़ी बात नहीं है पर इस बात का संकेत तो है कि भाषा और लिपि की दीवारें अब कमजोर हो रही है। इस लेखक का यह चैथा ब्लाग है जिसे किसी अन्य भाषा के ब्लाग ने लिंक किया है। तीन अरेबिक लिपि के हैं पर भाषा का पता नहीं है। अलबत्ता वह सभी वर्डप्रेस के हैं इसलिये अधिक विचारणीय नहीं लगता पर यह ब्लाग स्पाट का पहला ब्लाग है जिसे किसी अंग्रेजी ब्लाग लेखक ने लिंक दिया है। ऐसा लगता है कि उस ब्लाग लेखक ने यह उम्मीद की होगी कि अनुवाद टूलों के सहारे उसके पाठक हिंदी भी पढ़ लेंगे। यह भी संभव है कि वह इसी आशा के सहारे हिंदी में भी पाठक ढूंढना चाहता हो।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भविष्य में ब्लाग लेखन पूरे विश्व में एक महत्वपूर्ण सकारात्मक भूमिका निभाने वाले हैं। अनेक सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों का जन्म इन्हीं ब्लाग लेखकों के मध्य से होगा। भाषा और लिपि की दीवारें गिरी तो कई ऐसे भ्रमों और मिथकों का ढहना भी तय है कि जो उनके सहारे टिके हुए हैं। ऐसे में हिंदी की अध्यात्मिक शक्ति ही है जो भाषा को बचाये रख सकती है।
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Friday, July 24, 2009

आयु के साथ तय होता है मनोरंजन का स्वरूप-आलेख (age fector and enternment-hindi article)

वह कौनसी संस्कृति और संस्कार है जिसके नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया है जिसे बचाने के लिये इतने सारे बुद्धिजीवी लगे हुए हैं। सविता भाभी नाम की वेबसाईट और सच का सामना नाम का एक धारावाहिक इतने खतरनाक नहीं हो सकते कि वह भारतीय संस्कृति को नष्ट कर दें। भारतीयों की ताकत उनका ध्यान है जो वह अध्यात्मिक ज्ञान से अर्जित करते हैं। भारत के प्राचीन ग्रंथों में कहीं इसकी चर्चा नहीं है कि जुआ, अश्लीलता या यौन विषयों पर प्रतिबंध लगाया जाये।
हमारे प्राचीन ग्रंथ आत्मनियंत्रण का संदेश देते हैं पर यह अपेक्षा नहीं करते कि राज्य इसके लिये कार्यवाही करे। इन्हीं ग्रंथों में योग साधन, प्राणायम, ध्यान और मंत्रों की विधियां बतायी गयी हैं जिनसे शरीर और मन पर नियंत्रण रखा जा सकता है। इस देश के अधिकतर लोग आत्मनिंयत्रण के द्वारा ही जीवन व्यतीत करते हैं और इसी कारण ही भारतीय समाज विश्व का सबसे योग्य समाज भी माना जाता है। तीन प्रकार की प्रवृत्तियों के लोग-सात्विक, राजस और तामस-इस धरती पर हमेशा रहेंगे यह बात बिल्कुल स्पष्ट है। आचार विचार, रहन सहन, और खान पान के आधार आदमी की प्रवृत्तियां निर्धारित करती हैं और वह इन्हीं से पहचाना भी जाता है।
आदमी के अपराधों से निपटने का काम राज्य का है और सामान्य आदमी को स्वयं पर ही नियंत्रण रखना चाहिये। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है या कह रहा है इससे अधिक आदमी अगर स्वयं पर ध्यान दे तो अच्छा है-यह हमारे ग्रंथों का स्पष्ट मत है।

समाज को संभालने का काम गुरु करें यह भी स्पष्ट मत है। फिर फिल्मों, धारावाहिकों, किताबों और वेबसाईटों का प्रभाव हमेशा क्षणिक रहता है उनमें इतनी ताकत नहीं है कि वह पूरा समाज बिगाड़ सकें-कम से कम भारतीय समाज इतना कमजोर नहीं है। यह समाज जीवन के सत्य और रहस्यों को जानता है जो समय समय पर महापुरुष इसे बता गये हैं। इसके बावजूद इस समाज को कमजोर मानने वाले भ्रम में हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह भ्रम उस बौद्धिक समाज को है जो शरीरिक श्रम से परे है। शारीरिक से परे आदमी को भय, आशांकायें और संदेह हमेशा घेरे रहते हैं। यही चंद लोग ऐसी फिल्मों, वेबसाईटों,धारवाहिकों और साहित्य से चिपका रहता है जो आदमी के मन में पहले सुख और बाद में संताप पैदा करता है। जो श्रम करने वाले लोग हैं ऐसा वैसा सब देखकर भूल जाते हैं पर बुद्धिजीवियों के चिंतन की सुई वहीं अटकी रहती है-यह तय करने में कि समाज इससे बिगड़ेगा कि बनेगा!
खासतौर से जिनकी उम्र बढ़ी हो गयी है या फिर जिनको समाज सुधारने का ठेका मिल गया है वह ऐसे सभी स्तोत्रों पर पर प्रतिबंध की मांग करते हैं जिनसे युवा मन विचलित होने की आशंका रहती है।

यह समस्या तो पूरे समाज में है। हर बुढ़े को आजकल के युवा असंयमित दिखते हैं तो हर बुढ़िया को युवती अहंकारी नजर आती है। बुढ़ापे में आदमी का अहंकार अधिक बढ़ जाता है और वह पुजना चाहता है। हम बरसों से सुन रहे हैं कि ‘जमाना बिगड़ गया है।’ हम छोटे थे तो समझते थे कि ‘वास्तव में जमाना बिगड़ गया होगा। अब देखते हैं तो सोचते हैं कि जमाना ठीक कब था। कहते हैं कि घोर कलियुग है पर बताईये सतयुग कब था? रावण त्रेतायुग में हुआ और कंस द्वापर में हुआ। अगर वह युग ठीक था तो फिर उनमें ऐसे दुराचारी कहां से आ गये? कुछ लोग कहते हैं कि उस समय आम आदमी में धर्म की भावना अधिक थी। अब क्या कम है? आम आदमी तो आज भी भला है-उसकी चर्चा अधिक नहीं होती यह अलग बात है। फिर आजकल के प्रचार माध्यम सनसनी फैलाने के लिये खलपात्रों में ही अच्छाई ढूंढते नजर आते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बुढ़ापे में जमाना सभी को भ्रष्ट नजर आता है।
जहां तक यौन और अश्लील साहित्य का सवाल है तो वह चालीस सालों से हम बिकते देख रहे हैं। वह बिकता भी खूब था। अनेक लोग पढ़ते थे पर फिर भी चालीस सालों में ऐसा नहीं लगता कि उससे जमाना बिगड़ गया। उम्र के हिसाब से आदमी चलता है। अनेक युवाओं ने ऐसा साहित्य पढ़ा पर अब उनमें से कई ऐसे भी हैं जो मंदिरों में दर्शन करने के लिये जाते हैं। युवा मन हिलोंरे मारता है। वह ऐसा देखना चाहता है जो नया हो। उस समय हर कोई हर युवा अपने हमउम्र विपरीत लैंगिक संपर्क बढ़ाना चाहता है। युवावस्था में विवाह होने पर जीवन साथी के प्रति दैहिक आकर्षण चरम पर पहुंच जाता है। समय के साथ वह कम होता जाता है पर प्रेम यथावत रहता है क्योंकि मन में तब एक स्वाभाविक प्रेम की ग्रंथि है जो एक दूसरे को बांधे रहती है। यह व्यक्तिगत संपर्क कभी समाज के लिये देखने की चीज नहीं होता बल्कि सभी लोग अपनी बात ढंके रहते हैं पर दूसरे के घर में झांकने की उनके अंदर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो हर मनुष्य मनोरंजन पैदा करती है।
आदमी में मन है तो उसे मनोरंजन की आवश्यकता होती है। मनोरंजन का स्वरूप आयु के अनुसार तय होता है। युवावस्था में यौन विषय नवीनतम और आकर्षक लगता है तो अधेड़ावस्था में दौलत और शौहरत का नशा चढ़ जाता है। बुढ़ापे में जब शरीर के अंग शिथिल होते हैं तब सम्मान पाने का लोभ आदमी में पैदा होता है। ऐसे में आदमी दूसरे की निंदा और आत्मप्रवंचना कर अपने आपको दिलासा देता है कि वह अपना सम्मान बढ़ा रहा है। ऐसे मेें युवाओं के मनोरंजन के साधन उनको भारी तकलीफ देते हैं भले ही अपनी युवावस्था में वह भी उनमें लिप्त रहे हों।

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कोई व्यक्ति या समूह किसी दूसरे को हानि नहीं पहुंचा रहा है तो उसे अपनी आयु के अनुसार मनोरंजन प्राप्त करने का अधिकार है। यह समाज की एक सहज प्रक्रिया होना चाहिये। युवाओं के मन को किस प्रकार का मनोरंजन चाहिये यह तय करने का अधिकार उनको है न कि अधेड़ और बूूढ़े इसका निर्धारण करें। यहां यह भी याद रखने लायक बात है कि बड़ी आयु के लोग ही छोटी आयु के लोगों में संस्कार भरने का प्रयास करते हैं। इसलिये गुरु भी कहलाते हैं। यह उनकी जिम्मेदारी है कि वह उनकी मन के पर्वत को मजबूत बनायें जिससे निकलने वाली मनोरंजन की नदी विषाक्त न हो भले ही वह यौन साहित्य वाले शहर से निकलती हो। इसकी बजाय उनको जबरन रोकने की चाहत एक मजाक ही है। सच तो यह है कि कभी कभी तो यह लगता है कि कुछ उत्पाद इसलिये ही लोकप्रिय हो जाते हैं कि उनका विरोध अधिक होता है। यह विरोध प्रायोजित लगता है। वेबसाईट पर प्रतिबंध और धारावाहिक के विरोध के बाद उनकी सार्वजनिक चर्चा अधिक होना इस बात का संदेह भी पैदा करती है। इस तरह के विरोध युवाओं की तरफ से नहीं होते जो इस बात का प्रमाण है कि वह उनके लिये मनोरंजन का साधन हैं पर वह इससे विचलित हो जायेंगे यह भी नहीं सोचना चाहिये। चलते रहना इस दुनियां का नियम है।
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Sunday, July 19, 2009

भले होने का प्रमाण पत्र-हिंदी व्यंग्य कविता (certificat of good men-hindi vyangya kavita)

उसने पूछा
‘क्या तुम बुरे आदमी हो‘
जवाब मिला
‘कभी अपने काम से
कुछ सोचने का अवसर ही नहीं मिला
इसलिये कहना मुश्किल है
कभी इस बारे में सोचा ही नहीं।’

फिर उसने पूछा
‘क्या तुम अच्छे आदमी हो?’
जवाब मिला
‘यह आजमाने का भी
अवसर नहीं आया
पूरा जीवन अपने स्वार्थ में बिताया
कभी किसी ने मदद के लिये
आगे हाथ नहीं बढ़ाया
कोई बढ़ाता हाथ
तो पता नहीं मदद करता कि नहीं!’’
......................................
अपने भले होने का प्रमाण
कहां से हम लाते
ऐसी कोई जगह नहीं है
जहां से जुटाते।
शक के दायरे में जमाना है
इसलिये हम भी उसमें आते।
सोचते हैं कि
हवा के रुख की तरफ ही चलते जायें
कोई तारीफ करे या नहीं
जहां कसीदे पढ़ेगा कोई हमारे लिये
वह कोई चिढ़ भी जायेगा
अपने ही अमन में खलल आयेगा
इसलिये खामोशी से चलते जाते।

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Wednesday, July 15, 2009

दिखाने के लिये दोस्त कहा जाता है-हिंदी शायरी (dost-hindi shayri)


बेसुरा वह गाने लगे।
किसी के समझ न आये
ऐसे शब्द गुनगनाने लगे।
फिर भी बजी जोरदार तालियां
मन में लोग बक रहे थे गालियां
आकाओं ने जुटाई थी किराये की भीड़
अपनी महफिल सजाने के लिये
इसलिये लोगों ने अपने मूंह सिल लिये
पहले हाथों से चुकाई ताली बजाकर कीमत
दाम में पाया खाना फिर खाने लगे।
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कमअक्ल दोस्त से
अक्लमंद दुश्मन भला
ऐसे ही नहीं कहा जाता है।
दुश्मन पर रहती है नजर हमेशा
दोस्त का पीठ पर वार करना
ऐसे ही नहीं सहा जाता है।
जमाने में खंजर लिये घूम रहा है हर कोई
अकेले भी तो रहा नहीं जाता है
इसलिये दिखाने के लिये
बहुत से लोगों को दोस्त कहा जाता है।

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Friday, July 10, 2009

गुजरात में जहरीली शराब से हुआ हादसा दर्दनाक-आलेख (gujarat men jaharili sharab-hindi article)

गुजरात भारत के संपन्न प्रदेशों में माना जाता है। वहां की औद्योगिक और सामाजिक प्रगति भारत देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाली है। गुजरात में शराब पर प्रतिबंध है। यह लेखक कभी गुजरात नहीं गया इसलिये पता नहीं कि शराब बेचने पर ही प्रतिबंध है या खरीदने पर भी। वैसे अगर प्रतिबंध का आशय माना जाये तो यह दोनों पर ही होना चाहिये।
इधर वहां के बारे में दो खबरें टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में देखने को मिली। एक तो ताजा है जिसमेें जहरीली शराब पीने से अनेक लोगों की मृत्यु हो गयी। कुछ दिन पहले एक खबर देखने को मिली थी जिसमें भीड़ ने रेल में शराब की बोतलें तस्करी कर गुजरात लाये जाने का विरोध करते हुए उनको तोड़ डाला। जिस तरह बोतलों का झुंड देखा उससे तो यह देखकर लगता था कि वह छुपाकर नहीं लायी जा रही थी।
गुजरात का समाज आर्थिक, सामाजिक और दृष्टि से अन्य राज्यों से कुछ अधिक शक्तिशाली हो सकता है पर भिन्न नहीं है। पूरे भारत में पश्चिमी सभ्यता ने प्रभाव डाला है और गुजरात उससे अछूता होगा यह कहना कठिन है। फिर हिंदी फिल्मों ने आदतों, रहन सहन, चाल चलन और चिंतन के विषय में पूरे देश मेें एक साम्यता ला दी है और यह संभव नहीं है कि गुजरात पर उसका प्रभाव न पड़ा हो। कहने कहा तात्पर्य यह है कि शादी और पर्वों पर जिस तरह अन्य प्रदेशों में लोग शराब पीकर जश्न मनाते हैं गुजरात के लोग सूखे रहें यह संभव नहीं लगता। इसका आशय यह है कि शराब पर प्रतिबंध केवल नाम का ही रहा होगा। शराब पर प्रतिबंध से सीधा आशय तो यही होना चाहिये कि वहां इसका व्यवसाय ही न हो-न खरीदना न बेचना-पर जिस तरह यह दोनों घटनायें देखने को मिली उससे तो नहीं लगता कि वहां शराब अन्य प्रदेशों से अनुपात में कम उपलब्ध होगी।
शायद गुजरात देश का पहला एकमात्र प्रदेश है जहां शराब पर प्रतिबंध है। इसका कारण यह है कि भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी वहीं के थे और वह शराब के विरोधी थे। कहने को तो वह पूरे राष्ट्र के पिता थे पर जब शराब की बात आई तो उनका सम्मान केवल गुजरात तक ही सिमट गया।
महात्मा गांधी शराब के विरोधी थे पर क्या वह इस तरह प्रतिबंध के समर्थक भी थे इसकी जानकारी तो इस लेखक को नहीं है। मुद्दे की बात यह है कि शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध संभव नहीं है। अगर आप अंग्रेजी शराब पर प्रतिबंध भी लगायें पर देश के कई ऐसे आदिवासी और जनजातीय समुदाय हैं जो शराब का सेवन धार्मिक अवसरों प्रसाद की तरह करते हैं और उनको रोका नहीं जा सकता। आदिवासी और जनजातीय समुदाय को अपनी शराब बनाकर पीने की शायद किसी सीमा तक कानूनी छूट भी है।
महात्मा गांधी ने शराब का विरोध जिस समय प्रारंभ किया था उस समय आधुनिक धनी और मध्यम वर्गीय लोग शराब का सेवन गंदी आदत की तरह मानते थे। महात्मा गांधी ने दादाभाई नौरोजी के आग्रह पर तत्काल स्वाधीनता संग्राम प्रारंभ करने से पहले दो वर्ष तक देश का दौरा किया तो यह पाया कि जिस तबके के सहारे वह आजादी की जंग लड़ना चाहते हैं वह आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से निम्न स्तर पर खड़ा है और उसके उद्धार के बिना आजादी मिल जाये तो भी वह निरर्थक होगी। गरीब और निम्न वर्ग के संकट का सबसे बड़ा कारण शराब ही है-यह आभास उनको हो गया था। यही कारण है कि उन्होंने शराब का विरोध किया।
अब समय बदल गया है। शराब अब धनी, आधुनिक और सभ्य होने के तौर पर उपयोग की जाने लगी है। ऐसे में गुजरात में लोग पूरी तरह से शराब का सेवन न करे यह संभव नहीं लगता। फिर वहां अन्य प्रदेशों से भी लोग कामकाज की तलाश में गये हैं और उनमें अनेक लोग शराब के मामले में स्वयं पर प्रतिबंध लगायें यह संभव नहीं है। इधर जहरीली शराब की घटना ने वाकई देश को हिलाने के साथ चैंका भी दिया है।
हम यह मानते हैं कि शराब बहुत बुरी चीज है। इससे आर्थिक और शारीरिक हानि तो होती है मानसिक रूप से भी आदमी पंगु हो जाता है। मगर सवाल यह है कि इसके लिये लोगों को समझाने के लिये सामाजिक संगठनों को सक्रिय होना चाहिये कि जबरन प्रतिबंध लगाकर उसे अधिक संकटपूर्ण बनाया जाये। अनेक सामाजिक विद्वानों का मानना है कि जिस किसी समाज को किसी चीज के उपयोग करने से जबरदस्ती रोका जाये तो लोगों के मन में उसके प्रति रुझान अधिक बढ़ने लगता है। जहरीली शराब पीने से जितने लोग मरे हैं उससे तो लगता है कि वहां बड़े पैमाने पर उसका व्यवसाय होता है। शराब और खाना जहरीला होने से लोगों के मरने और बीमार पड़ने की घटनायें अत्यंत दारुण होती है। यह घटना अगर कहीं अन्य होती तो शायद इसको लोग अधिक महत्व नहीं देते क्योंकि अन्यत्र शराब पर प्रतिबंध नहीं है। इस घटना से पीड़ित लोगों के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हुए हम यही आशा करते हैं कि वह जल्दी इस हादसे से उबर कर आयें।
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Monday, July 6, 2009

समाजों का अंतर्द्वंद्व और अंतर्जाल-आलेख (hindi article)

यहां हम इस मुद्दे पर चर्चा नहीं करने जा रहे कि किसी अश्लील वेबसाईट पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये या नहीं और न ही इसके देखने या न देखने के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं बल्कि हमारा मुख्य ध्येय है यह है कि हम समाज के उस अंतद्वंद्व को देखें जिस पर किसी अन्य की नजर नहीं जा रही। यहां हम चीन और भारतीय समाजों को केंद्र बिंदु में रखकर यह चर्चा कर रहे हैं जहां इस तरह की अश्लील वेबसाईटों पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा है। भारत में तो केवल एक ही वेबसाईट पर रोक लगी है-जिसके बारे में अंतर्जाल के लेखक कह रहे हैं कि यह तो समंदर से बूंद निकलाने के बराबर है-पर चीन तो सारी की सारी वेबसाईटों के पीछे पड़ गया है।

कुछ दिनों पहले तक कथित समाज विशेषज्ञ चीन के मुकाबले दो कारणों से पिछड़ा बताते थे। एक तो वहां औसत में कंप्यूटर भारत से अधिक उपलब्ध हैं दूसरा वहां इंटरनेट पर भी लोगों की सक्रियता अधिक है। इन दोनों की उपलब्धता अगर विकास का प्रमाण है तो दूसरा यह भी सच है कि अंतर्जाल पर इन्हीं यौन साहित्य और सामग्री से सुसज्जित वेबसाईटों ने ही अधिक प्रयोक्ता बनाने के लिये इसमें योगदान दिया है। अंतर्जाल ने शिक्षा, साहित्य, व्यापार तथा आपसी संपर्क बढ़ाने मे जो योगदान दिया है उससे कोई इंकार नहीं कर सकता पर सवाल यह भी कि ऐसे सात्विक उद्देश्य की पूर्ति कितने प्रयोक्ता कर रहे हैं? यह लेखक ढाई वर्ष से इस अंतर्जाल को निकटता से देख रहा है और उसका यह अनुभव रहा है कि भारत में प्रयोक्ताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग केवल मनोरंजन के लिये इसे ले रहा है। इससे भी आगे यह कहें कि वह असाधारण मनोरंजन की चाहत इससे पूरी करना चाहता है। जिस तरह चीन सरकार आक्रामक हो उठी है तो उससे तो यही लगता है कि वहां भी इसी तरह का ही समाज है।
अनेक ब्लाग लेखकों ने यह बताया है कि यौन सामग्री वाली वेबसाईटों में ढेर सारी कमाई है और यह इतनी है कि गूगल और याहू जैसी कंपनियों के लिये भी कल्पनातीत है। कोई वेबसाईट दस माह में ही इतनी प्रसिद्ध हो जाती है कि उस पर प्रतिबंध लग जाता है। इसमें समाज के बिगड़ने की चिंता के साथ आर्थिक पक्ष भी हो सकता है। एक आश्चर्य की बात यह है कि दस माह में कोई वेबसाईट इतनी लोकप्रिय कैसे हो जाती है? निश्चित रूप से चीन ने अपने देश की बहुत बड़ी राशि बाहर जाने से रोकने के लिये ही ऐसा किया होगा। उसे रोकने के लिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास हो रहे हैं जो कि इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं इन प्रतिबंधों के पीछे आर्थिक कारण भी है।
भारत और चीनी समाज में बहुत सारी समानतायें हैं। अंतर है बस इतना कि यहां वेबसाईट पर प्रतिबंधों का विरोध मुखर ढंग से किया जा सकता है पर वहां यह संभव नहीं है। वैसे दोनों ही समाजों में बूढ़ों को सम्मान से देखा जाता है और यही कारण है कि समाज पर नियंत्रण के लिये उनकी राय ली जाती है। समस्या यह है आदमी जब युवा होता है तब वह यौन साहित्य छिपकर पढ़ाा है पर बूढ़ा होने पर युवाओं को पढ़ने से रोकना चाहता है। यही दोनों समाजों की समस्या भी है। इसके अलावा सभी चाहते हैं कि वह पश्चिम द्वारा बनाये आधुनिक साधनों का उपयोग तो करें पर उसके रहन सहन की शैली और नियम न अपनायें। सभी लोग भौतिक परिलब्धियों के पीछे अंधाधुंध भाग रहे पर चाहते हैं कि देश की संस्कृति और स्वरूप की रक्षा सरकार करे।
इसमें एक मजेदार विरोधाभास दिखाई देता है। भारत और चीन के समाजों में माता, पिता, गुरु और धर्म चारों ही हमेशा संस्कृति और संस्कार का आधार स्तंभ माना जाते हैं। माता को तो प्रथम गुरु माना जाता है जो बच्चे में संस्कार और संस्कृति के बीच बोती है। गुरुपूर्णिमा हमारे यहां मनायी जाती है पर अब पश्चिमी प्रभाव से माता पिता दिवस भी मनाने लगे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम संस्कृति के लड़खड़ाने की बात करते हैं तो क्या हमारा यह आशय है कि हमारे यह चारों स्तंभ अब काम नहीं करे रहे? अगर कर रहे हैं तो फिर युवाओं के बिगड़ने का भय क्यों सता रहा है? अगर नहीं कर रहे हैं तो फिर संस्कृति को बचाने की जरूरत ही क्या है?
सीधी बात तो यह है कि हम पश्चिमी साधनों को तो हासिल कर लेते हैं पर उसके उपयोग के नियमों को नहीं अपनाना चाहते। कंप्यूटर सभी जगह अपनाना जा रहा है पर उस पर काम करने के कायदे कहीं लागू नहीं है। कंप्यूटर अधिक काम करता है पर चलाता तो आदमी ही है न! मगर उसे भी कंप्यूटर मानकर उससे कैसे काम लिया जाता है? यह कौन देख रहा है? यही हालत हवाई जहाज की है। उसे उड़ाने वाले पायलटों का नियम से कितना चलाया जाता है? यह अलग से बहस का विषय है।
हम चलना तो चाहते हैं कि पश्चिम की खुले समाज की अवधारणा की राह पर अपनी शर्तों के साथ। हम कंप्यूटर और अंतर्जाल प्रयोक्ताओं की अधिक संख्या को विकास का प्रतीक मानकर चर्चा करते हैं पर क्या यह सच नहीं है कि लोगों के यौन साहित्य पढ़ने और देखने की ललक ही इसके लिये अधिक जिम्मेदार है। सही आंकड़े तो इस लेखक के पास नहीं है पर अनुमान से यह कह सकता है कि चीन ने यौन सामग्री की वेबसाईटों को अगर प्रभावपूर्ण ढंग से लागू किया तो यकीनन उसका इन दोनों मामलों में ग्राफ नीचे गिर सकता है। शिक्षा, साहित्य सृजन, रचनात्मक कार्य, आपसी संपर्क और व्यापार में इंटरनेट की अहम भूमिका है पर क्या उसके प्रयोक्ताओं के दम पर ही इतना बड़ा अंतर्जाल चल सकता है? यह विशेषज्ञों को देखना होगा।
हम अंतर्जाल के प्रयोक्ताओं को यह समझा सकते हैं कि टीवी, अखबार, बाहर मिलने वाली किताबों और सीडी आदि से जो काम चल सकता है उसके लिये यहंा आंखें न फोड़कर अपनी सात्विक जिज्ञासाओं के लिये इसका उपयोग करे। इसके लिये इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियों को प्रयास कर ऐसे लोगों को सहायता करनी होगी जो अपने रचनात्मक भूमिका से समाज के युवकों के मन में सात्विक जिज्ञासायें जगाये रख सकते हैं। यह काम कम से कम समाजों के वर्तमान शिखर पुरुषों का बूते का तो नहीं लगता जो उनके नेतृत्व करने का दावा तो करते हैं पर जब नियंत्रण की बात आती है तो वह लट्ठ और नियम के आसरे बैठ कर अपने मूंह से शब्दों की जुगाली करते हैं। समाज के नये संत तो अब वही बन सकते हैं जो इंटरनेट पर रचनात्मक काम करते हुए युवा पीढ़ी में सात्विक जिज्ञासा और इच्छा उत्पन्न कर सकते हैं-वह कोई पुराना धार्मिक या सामाजिक चोला पहनने वालों हों यह जरूरी नहीं है। हो सकता है कि यौन सामग्री और साहित्य प्रस्तुत करने वाली वेबसाईटों से इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियां इसलिये भी खुश हों कि वह उनके लिये प्रयोक्ता जुटा रही हैं पर इससे उनका भविष्य सुरक्षित नहीं हो जायेगा। जिस तरह आदमी समाचार पत्र पत्रिकाओं, किताबों, टीवी चैनलों और फिल्मों की यौन सामग्री से बोर होकर अंतर्जाल पर सक्रिय हो रहा है तो आगे उसमें वैसी विरक्ति भी आ सकती है। संभव है अन्य प्रचार माध्यम अपने यहां कुछ नया करें कि अंतर्जाल को प्रयोक्ता इसे छोड़कर वहां चला जाये। क्या यह दिलचस्प नहीं है कि हर मुद्दे को उठाकर सनसनी फैलाने और आजादी की दुहाई देने वाले टीवी चैनल और अखबार एक वेबसाईट पर प्रतिबंध लगने की तरफ से उदासीन हो गये हैं। उन्हें डर रहा होगा कि कहीं उस वेबसाईट का नाम लें तो उनका उपभोक्ता उसकी तरफ न चला जाये।
इंटरनेट में रचनात्मक काम, संवाद प्रेषण, साहित्य सृजन और व्यापार की संभावनायें और इस पर ही अधिक काम किया जाये तो इसमें निरंतरता बनी रहेगी। वेबसाईटों पर प्रतिबंध के क्या परिणाम है यह तो पता नहीं मगर यह बात निश्चित है कि पश्चिम में भी अंतर्जाल के विकास में इन्हीं यौन साहित्य और सामग्री से सुसज्तित वेबसाईटों को योगदान रहा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि पश्चिम में लोग अब अंतर्जाल यौन साहित्य से ऊब कर सात्विक विषयों की तरफ बढ़ रहे हैं। संभव है कि भारत और चीन में भी आगे यह हो पर तब इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियां रचनात्मक कर्म करने वाले लोगों को ढूंढती रह जायेंगी पर उनको वह मिलेंगे नहीं। रचनात्मक काम करना एक आदत होती है जिसे बनाये रखने के लिय सामान्य आदमी श्रम करता है तो धनी आदमी को उसमें विनिवेश करना चाहिये। हो सकता है कि लेखक की यह सोच औार धारणायें गलत हों पर अंतर्जाल पर जो अनुभव पाया है उसके आधार पर लिख रहा है। यह लेखक कोई ब्रह्मा तो है नहीं कि उसका सत्य अंतिम मान लिया जाये।
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Friday, July 3, 2009

आशिक, माशुका और महबूब-हास्य कविता (ashiq, mashuka & mahboob-hasya kavita)

श्रृंगार रस का कवि
पहुंचा हास्य कवि के पास
लगाये अच्छी सलाह की आस
और बोला
‘यार, अब यह कैसा जमाना आया
समलैंगिकता ने अपना जाल बिछाया।
अभी तक तो लिखी जाती थी
स्त्री पुरुष पर प्रेम से परिपूर्ण कवितायें
अब तो समलिंग में भी प्रेम का अलख जगायें
वरना जमाने से पिछड़ जायेंगे
लोग हमारी कविता को पिछड़ी बतायेंगे
कोई रास्ता नहीं सूझा
इसलिये सलाह के लिये तुम्हारे पास आया।’

सुनकर हास्य कवि घबड़ाया
फिर बोला-’‘बस इतनी बात
क्यों दे रहे हो अपने को ताप
एकदम शुद्ध हिंदी छोड़कर
कुछ फिल्मी शैली भी अपनाओ
फिर अपनी रचनायें लिखकर भुनाओ
एक फिल्म में
तुमने सुना और देखा होगा
नायक को महबूबा के आने पर यह गाते
‘मेरा महबूब आया है’
तुम प्रियतम और प्रियतमा छोड़कर
महबूब पर फिदा हो जाओ
चिंता की कोई बात नहीं
आजकल पहनावे और चाल चलन में
कोई अंतर नहीं लगता
इसलिये अदाओं का बयान
महबूब और महबूबा के लिये एक जैसा फबता
कुछ लड़के भी रखने लगे हैं बाल
अब लड़कियों की तरह बड़े
पहनने लगे हैं कान में बाली और हाथ में कड़े
तुम तो श्रृंगार रस में डूबकर
वैसे ही लिखो समलैंगिक गीत कवितायें
जिसे प्राकृतिक और समलैंगिक प्रेम वाले
एक स्वर में गायें
छोड़े दो सारी चिंतायें
मुश्किल तो हमारे सामने है
जो हास्य कविता में आशिक और माशुका पर
लिखकर खूब रंग जमाया
पर महबूब तो एकदम ठंडा शब्द है
जिस पर हास्य लिखा नहीं जा सकता
हम तो ठहरे हास्य कवि
साहित्य और भाषा की जितनी समझ है
दोस्त हो इसलिये उतना तुमको बताया।

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Wednesday, July 1, 2009

सच का संकट-हास्य व्यंग्य कविता (trouble of truth-hindi hasya poem)

उन्होंने निजी और सरकारी सेवकों का
एक ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ सम्मेलन बुलाया
जब पहुंचे उस जगह तो
वहां कोई नहीं आया।
अपने आमंत्रितों को फोन कर
उन्होंने कारण पता लगाया
किसी ने एक तो किसी ने
न आने का दूसरा बहाना बताया।
‘’यार, तुम भी कैसे समाज सेवक हो
किस विषय पर यह सम्मेलन बुलाया
सच यह है कि आज छुट्टी का दिन है
भूलना चाहते हैं वह सब
जो पूरे हफ्ते बिताया
दफ्तरों में गुजारे पलों को
तुम याद क्यों दिलाना चाहते हो
अपनी ऊपरी कमाई सभी को पवित्र लगती है
दूसरे की भ्रष्टाचार
सभी दौलत के पीछे हैं
ईमानदार का तो बस नकाब लगाया।
फिर वहां बरसेंगी भ्रष्टाचारियों पर गालियां
सभी की बीबी बच्चे बचायेंगे तालियां
आखिर सच कुरेदेगा लोगों का दिमाग
जिसकी अगले हफते पड़ेगी छाया
इसलिये सभी ने इस सच के संकट से
स्वयं को बचाया।’
एक हमदर्द ने उनको बताया।

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Sunday, June 28, 2009

पकाना रोटी और खबर का-हास्य व्यंग्य कविता (roti aur khabar-hasya kavita)

बोरवेल का ढक्कन खुला देख कर
सनसनी खबर की तलाश में भटक रहे
संवाददाता ने कैमरामेन से कहा
^रुक जाओ यहाँ
लगता है अपनी सनसनीखेज खबर पक रही है
अपनी टांगें वैसे ही थक रही है.

पास से निकल रहा चाय की रेहडी वाला भी रुक गया
और बोला
^साहब अच्छा हुआ!
आज अतिक्रमण विरोधी अभियान कि वजह से
मैं दूसरी जगह ढूंढ रहा था
आपके शब्द कान में अमृत की तरह पड़े
अब रुक यही जाता हूँ
आपको छाया देने के लिए
प्लास्टिक की चादर लगाकर
बैठने के लिए बैंच बिछाता हूँ
भगवान् ने चाहा तो दोनों का
काम हो जाएगा
कोई बदकिस्मती से गिरा इस गड्ढे में
तो लोगों का हुजूम लग जाएगा
आपकी सनसनीखेज खबर के साथ
मेरी भी रोटी पक जायेगी
अगर आप बोहनी कराओ तो अच्छा
इसके लिए सुबह से मेरी आँखें तक रही हैं.
-------------------------
नोट-यह व्यंग्य कविता काल्पनिक है तथा किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है. कोई संयोग हो जाये तो यह महान हास्य कवि उसके लिए जिम्मेदार नहीं है.


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Wednesday, June 24, 2009

वैश्विक काल में हिंदी भाषा का सृजन-आलेख (future of hindi in the world-hindi lekh)

वह बहस बहुत अच्छी थी। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के सृजन को किसी लेखक ने-उसका नाम इस लेखक ने उसी ब्लाग के पाठ में पढ़ा हालांकि बताया जा रहा था कि वह कोई प्रसिद्ध हिंदी आलोचक हैं-ने दो कौड़ी का बता दिया। विद्वान टिप्पणीकारों ने उस पर तमाम टिप्पणियां लिखी। कुछ अप्रवासी हिंदी लेखक उनके बयान से दुःखी थे। हां, उस पाठ में जिस आलोचक का नाम था उसके बारे में पहली इस लेखक ने सुना पर टिप्पणीकर्ताओं का नाम वह जानता है। इस लेखक के मध्यप्रदेश के ही एक प्रसिद्ध ब्लाग लेखक ने भी टिप्पणी लिख कर उस जोरदार बहस पर हैरानी जाहिर की। आशय यह है कि हमारे प्रदेश पाठक और लेखक के इस तरह की साहित्यक बहसों से घबड़ाते हैं जिसमें कहानी, कवितायें या अन्य साहित्यक विद्या की खास रचना की बजाय भाषा के लिखने पर बहस हो रही हो। एक दूसरी भी मुश्किल है कि अंतर्जाल पर अन्य प्रदेशों के ब्लाग लेखक कई ऐसी प्रसिद्ध साहित्य हस्तियों का नाम बताते हैं जिनका नाम तक इस प्रदेश में पैदा लोग नहीं जानते।

बहरहाल उस आलोचक महाशय के अनुसार विदेश में रह रहे लेखक बस अपने को पत्रकार या लेखक साबित करने के लिये लिखते हैं वरना उनका लिखा दो कौड़ी का है। बात इस लेखक के सिर के ऊपर से निकल गयी। पहली बात तो किसी का लिखा दो कौड़ी का नहीं होता। अगर कोई मूर्धन्य साहित्यकार भी आकर हमसे कहे कि अमुक आदमी ने दो कौड़ी का लिखा है तो हम उनकी साहित्यक रचनाओ की चिंदियां उनको दिखा सकते हैं कि वह इससे बेहतर हैं।
दूसरा सवाल यह है कि विदेश में रह रहे अप्रवासी भारतीय अपने आपको लेखक या पत्रकार साबित करने का प्रयास कर रहे हैं तो उसमें बुराई क्या है? आखिर आदमी लिखता क्यों है? अपनी बात दूसरे से कहने के लिये? दूसरा पढ़कर उसे लेखक मान ही लेता है। हिंदी में वह हर रचना साहित्य है जो सामाजिक और रचनात्मक सरोकारों से जोड़कर लिखी गयी है। इस लेखक के इस पाठ को कुछ लोग साहित्यक न माने पर यह प्रमाणपत्र देने वाले वह कौन? यह पाठ किसी को पत्र बनाकर नहीं लिखा जा रहा है। बल्कि इसे हिंदी भाषा से सरोकार रखने वाले विषय पर लिखा गया है। स्पष्टतः इससे कोई न कोई सामाजिक तथा रचनात्मक सरोकार जुड़ा है।
हिंदी में स्तरीय और गैरस्तरीय लेखन की बहुत चर्चा होती है। कई ऐसे सेमीनार होते हैं जिनमें शामिल होकर ऐसा लगता है कि हम कहां आकर फंसे। इससे अच्छा तो कोई घर पर बैठकर एक दो हास्य कविता लिखकर ही जी हल्का कर लेते। यह बात तय है कि हम अपने आपको एक लेखक और साहित्यकार ही समझते हैं और लगता नहीं कि इसके लिये किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता है।
सच बात तो यह है कि हम जिसे गैर स्तरीय साहित्य कहते हैं वह बाजार में हर जगह मिलता है और पाठक भी उसके बहुत हैं। अपराध और यौन से संबंधित साहित्य की बाजार में बिक्री बहुत है पर हममें से कई लेखक उसे गैरस्तरीय कहकर हिकारत से देखते हैं पर सच यह भी है कि कई इनको पढ़ते हुए ही लिखने के लिये प्रेरित हुए। हालांकि यह भी सच है कि लोग वाकई स्तरीय विषय पढ़ना चाहते हैं पर बाजार की समस्या यह है कि वह लेखक को लिपिक की तरह बनाये रखना चाहता है। इससे उसकी मौलिकता और स्वतंत्रता नष्ट होती है। यही कारण है कि हिंदी में बेहतर साहित्य प्रकाशित नहीं हो पाता-लिखा नहीं जाता यह कहना गलत है।
वैसे ही दूसरे की रचनाओं पर टीका टिप्पणियां करने वालों का लेखन कैसा है यह अलग से बहस का विषय है। अगर आप देखें तो हमारे यहां अनेक हास्य कवियों ने करोड़ो रुपये कमा लिये पर क्या उनकी रचनाओं में कहीं कोई सामाजिक संदेश है? हिंदी फिल्मों के कामेडियनों की तरह अदायें करते हुए अनेक कवि लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गये। अगर आप कथित रूप से स्तरीय पढ़ने वाले हैं तो क्या आप उसे साहित्य मानते हैं। शायद आप कहेंगे ‘नहीं’ पर वही कवि अगर आपके सामने आ जाये या अंतर्जाल पर टिप्पणी लिख दे तो अपने आपको धन्य कहने लगेंगे।

इधर अनेक लेखकों के चेले चपाटे अंतर्जाल पर सक्रिय हुए हैं और वह उनके कथित साक्षात्कार इस उद्देश्य से प्रकाशित करते हैं कि उनके प्रदेश या शहर से अधिक से अधिक टिप्पणियां आ जायेंगी। यह बुरा भी नहीं है पर जब अंतर्जाल पर लिखने वाले हिंदी लेखकों पर कटाक्ष होता है तब यह बताना पड़ता है कि यह अंतर्जाल पर लिखना कोई आसान काम नहीं है। बहुत कटु पर सत्य है कि एक लंबे अर्से से हिंदी के आकाश पर कोई ऐसा लेखक पैदा ही नहीं हुआ जो सदाबहार रचनायें दे सके। सभी ने बाजार और राज्य के तय ढांचे में ही अपनी रचनायें कर धन, पद और सम्मान पाया मगर हिंदी भाषा को समृद्ध करने वाले कितने लेखक हैं यह हम सभी जानते हैं।
आज के जो भी कथित बड़े लेखक हैं वह अंतर्जाल को न तो पढ़ते हैं न उनकी रुचि है। कंप्यूटर पर लिखना या पढ़ना कोई मुश्किल काम नहीं है पर इससे दूर रहकर अगर अपनी यथास्थिति रहती है तो इसे कौन सीखना चाहेगा? इस लेखक का तो हमेशा यही कहना है कि हां, हम तो लेखक कहलाने ही यहां आये हैं। क्या करें? हर जगह ढांचे और खांचे बने हुऐ हैं जिसमें हमारा लिखा फिट होगा या नहीं इस बात से अधिक इस बात का महत्व है कि हमारा व्यवहार-जिसमें चाटुकारिता, चंदा और चतुराई शामिल है-उनके अनुकूल है कि नहीं।
यहां प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अपने ऊपर छोड़े जा रहे व्यंग्यबाणों की इसलिये परवाह नहीं करते क्योंकि हमें अपने लेखक होने पर कोई संदेह नहीं है। साहित्य की हर विद्या पर लिखा-अच्छा या बुरा यह संकट पाठकों का है-और यह साबित करने का प्रयास किया कि ब्लाग भी पत्रिका की तरह उपयोग में लाया जा सकता है। यहां हमने पढ़ा भी और पाया कि समाज के आम लोगों के विचारों का जो प्रतिबिंब यहां दिखाई देता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लेखक टाईप स्वयं करते हैं इससे उनको छोटा समझना अपने आप में बेवकूफी है। अभी तक अनेक बड़े लेखक और पत्रकार यही मानते हैं कि टाईप करने का काम लिपिकीय है। इसके विपरीत यह लेखक तो दूसरी बात ही कहता है कि बेहतर लेखक वही है जो स्वयं एक बैठक में टाईप कर अंतर्जाल पर प्रस्तुत करता है। अधिकतर अंग्रेजी लेखक सीधे टाईप कर रचनायें लिखते रहे हैं-यह जानकारी पत्र पत्रिकाओं से मिलती रही है। हिंदी के कथित बड़े लेखक आत्ममुग्धता की स्थिति से उबर नही पाये और उन्हें यह सुनकर निराशा होगी कि हिंदी का असली लेखक तो अब हिंदी के वैश्विक काल की शुरुआत कर चुका है-उनका आधुनिक काल अब बीते समय की बात हो गया है। उनकी कहानियां और कवितायें अब अप्रासंगिक होने जा रही है। ऐसे में अंतर्जाल पर लिखने वाले लेखकों को यही सलाह है कि वह कुंठा छोड़कर अपनी रचनायें करें। यह अप्रवासी और प्रवासी हिंदी लेखक की चर्चा भी इसलिये भी करनी पड़ी क्योंकि अभी लोगों के मन में है पर अगर हम इस हिंदी के नवीन वैश्विक काल की बात करें तो वह अप्रासंगिक है क्योंकि आपने हिंदी में लिखा तो यह इस बात की पूरी संभावना है कि वह किसी अन्य भाषा में टूलों से स्वाभाविक रूप से अनुवाद कर पढ़ा जायेगा और इसके लिये मानवीय अनुवादक की जरूरत नहीं है। ऐसे में कुछ लेखक आगे इस तरह का प्रयास करेंगे कि वह जब भारतीय संदर्भ में अपनी रचना लिखें तो वह विश्व के डेढ़ सौ देशों के लोगों की समझ में आये। उनकी यह सोच निश्चित रूप से हिंदी को एतिहासिक रचनायें देगी। शेष फिर कभी।
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Monday, June 22, 2009

असमंजित समाज-त्रिपदम (hindi tripadam)

बड़े हादसे
प्रचार पा जाते हैं
बिना दाम के।

चमकते हैं
नकलची सितारे
बिना काम के।

कायरता में
ढूंढ रहे सुरक्षा
योद्धा काम के।

असलियत
छिपाते वार करें
छद्म नाम से।

भ्रष्टाचार
सम्मान पाता है
सीना तान के।

झूठी माया से
नकली मुद्रा भारी
खड़ी शान से ।

चाटुकारिता
सजती है गद्य में
तामझाम से।

असमंजित
पूरा ही समाज है
बिना ज्ञान के।

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Saturday, June 20, 2009

क्रिकेट प्रतियोगिता में हार का मनोविज्ञान और आर्थिक रूप से प्रभाव-आलेख (hindi editorial)

बीसीसीआई की क्रिकेट टीम बीस ओवरीय एक दिवसीय प्रतियोगिता में हार गयी और अब पता लगा कि उसमें पांच खिलाड़ी अनफिट थे। टीम जिस तरह अपने मैच खेल रही थी उससे लग तो नहीं रहा था कि वह कप जीत पायेगी पर इस कदर पिटेगी यह आभास भी नहीं था। इससे पहले एक क्लब स्तर की प्रतियोगिता हुई थी। उसमें बीसीसीआई के यह सभी खिलाड़ी बड़े शहरों के नाम पर बनी टीमों के लिये खेले।

कहने वाले तो शुरुआती दौर में ही कह रहे थे कि खिलाड़ी थक गये होंगे इसलिये शायद उनका प्रदर्शन प्रभावित होगा। हुआ भी यही पर इस दलील का विरोध करने वाले कहते हैं कि अन्य देशों के खिलाड़ी भी तो इसमें खेले थे फिर उनका प्रदर्शन प्रभावित क्यों नहीं हुआ? यानि हर तरह से इस हार को स्वाभाविक बताने का प्रयास किया जा रहा है। क्रिकेट अनिश्चताओं का खेल है पर इस आड़ में ऐसी हार के कारण छिप नहीं सकते। हारना एक अलग बात है और खराब खेलना अलग। यहां मुद्दा यह नहीं है कि बीसीसीआई की टीम बीस ओवरीय प्रतियोगता में हारी बल्कि उसका प्रदर्शन इतना खराब रहा कि लोग को रहे हैं कि भारत के किसी भी शहर से कोई टीम उठाकर भेज देते तो वह भी इनसे अच्छा खेलते। नये होने के कारण वह उत्साह से खेलते तो पता लगता कि बीस ओवरीय प्रतियोगता का विश्व कप ही जीत लाये। भारत में खिलाड़ियों की कमी नहीं है। फिर बीस ओवरीय प्रतियोगता तो ऐसी है जिसमें अनुभव वगैरह की तो जरूरत ही नहीं है-इसे तो केवल मनोबल के आधार पर ही जीता जा सकता है।
एक पुराने खिलाड़ी ने बढ़िया टिप्पणी की। उसने कहा कि हम भारतीयों में पैसा पचाने की क्षमता बहुत कम हैं। वर्तमान भारतीय खिलाड़ी इतना पैसा कमा चुके हैं कि वह फिर भूल गये कि वह इसी खेल की दम पर हैं।
वह खिलाड़ी चूंकि पेशवर है इसलिये अन्य सच नहीं कह पाया। जिन खिलाड़ियों को बीस ओवरीय मैचों का स्टार माना जाता था वह इस तरह खेले जैसे कि पचास ओवरों वाला मैच खेल रहे हैं। कहने को तो सभी कह रहे हैं कि हम चुस्त दुरस्त थे और क्लब स्तर की प्रतियोगिता में खेलने की वजह से हमारा खेल प्रभावित नहीं हुआ। दरअसल यह उसी क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के दोबारा आयोजन में बाधा न पड़े इसलिये ही कहा जा रहा है। फिर वह उसी प्रतियोगिता में अपनी सदस्यता बनाये रखना चाह रहे हैं। यह खिलाड़ी सभी तरह की गेंदें खेलने में माहिर हैं चाहे शार्टपिच हो या स्पिन पर अब बिचारे शार्टपिच गेंदों का तोड़ ढूंढ रहे हैं। सच बात तो यह है कि चाहे खेल कोई भी हो अगर खिलाड़ी का मन नहीं है तो विपक्षी के दांव पैंच उसके लिये पहाड़ हो जाते हैं। भारतीय खिलाड़ी इतना पैसा कमा चुके थे कि अब उनको अपने परिवारों के लिये समय चाहिये था। इंकार इसलिये नहीं कर सकते थे कि कहीं उनकी जगह शामिल नया खिलाड़ी उसमें छा गया तो इससे भी जायेंगे। खेलना है इसलिये खेले। कह सकते हैं कि हाजिरी देने के लिये खेले। जीतने की खुशी या हारने के गम से परे होकर वह निर्विकार भाव से खेलते दिख रहे थे। मगर यह कोई उच्च स्थिति नहीं थी बल्कि उनके चेहरे पर खेलने की बाध्यता के भाव भी थे जो इस बात को दर्शा रहे थे कि वह न खुश हैं न उत्साहित बल्कि टालू खेल दिखा रहे हैं।
अन्य देशों के खिलाड़ी क्लब स्तर में खेलने के बावजूद यहां भी खेले तो इसलिये कि उनको इतना पैसा नहीं मिलता जितना भारत के खिलाड़ियों को मिलता है। भारतीय खिलाड़ी विज्ञापनों और रैम्पों पर इतना पैसा कमा चुके हैं कि उनका बोझ उठाना अब संभव नहीं था। वह खेल की थकवाट से नहीं बल्कि अपनी आर्थिक परिलब्धियेां का उपयोग न कर पाने की गम का बोझ उठाये हुए थे। सच कहें तो ऐसा लगता है कि इस विश्व में शायद उनके लिये मिलने वाली धनराशि इतनी उपयोगी नहीं थी जितनी क्लब स्तर की प्रतियोगिता से मिली होगी। अन्य देशों के खिलाड़ियों के लिये यह रकम भी बहुत बड़ी होगी इसलिये खेल रहे हैं।
क्रिकेट से देश के लोगों ने अपने जज्बात ख्वामख्वाह जोड़ रखे हैं पर उसके लिये यहां कोई जवाबदेह नहीं है। हार गये तो क्या कर लोगे? हां, लोगों का गुस्सा कम करने के लिये तमाम तरह की सफाई दी जा रही है वह इसलिये कि कहीं वह लोग फिर विरक्त न हो जायें और क्रिकेट का व्यापार कहीं ठप न हो जाये।
अगर खिलाड़ी अनफिट हैं तो फिर अभी बाहर जाने वाली टीम के के लिये उनको कैसे चुन लिया गया। वही कप्तान वही खिलाड़ी!
प्रबंधन के मामले में हमारा देश अप्रतिभाशाली माना जाता है। यह हमारी कमजोरी है। कोई नया बदलाव कहीं करना ही नहीं चाहता। दरअसल क्रिकेट अब बाजार का खेल है-कम से कम भारत में तो यही लगता है। खिलाड़ियों ने विज्ञापन कर रखे होते हैं जो ऐसी प्रतियोगिताओं में समय अधिक दिखाई देते हैं। इसलिये उसमें अभिनय करने वाले खिलाड़ियों का होना जरूरी है अतः अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं यह बात भी देखी जाती है कि बाजार का ध्यान अधिक रखा जाता है फोकटिया दर्शक का कम। एक खिलाड़ी इस टीम में शामिल नहीं हुआ तो वह दर्शक दीर्घा में अन्य खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने पहुंच गया। दरअसल उसके विज्ञापन भी दिख रहे थे और वह यकीनन उनकी वजह से ही अपनी सूरत दिखाने वहां पहुंचा होगा ताकि विज्ञापन दाता उससे खुश रहें। टीवी कैमरा हर मैच में उसका चेहरा अनेक बार दिखाता था। कितनी अच्छी बात लगती है यह बात सुनकर कि इतना बड़ा खिलाड़ी मनोबल बढ़ाने पहुंचा मगर इसके पीछे का सच कौन पढ़ पाता है। यह सब बुरा नहीं है क्योंकि सभी को कमाने का हक है पर आम लोगों को यही सच समझते हुए यह देखना चाहिये। क्रिकेट टीम का खेलना एक व्यवसाय है और उसे बाजार प्रभावित कर सकता है-इससे मान लेना चाहिये। किसी को क्या दोष देना? क्रिकेट वालों को पूरा पैसा मिल रहा है टीम हारे या जीते-तब उनसे यह आशा करना बेकार है कि वह नये और तरोताजा खिलाड़ी भेजकर प्रतियोगिता जीतने का प्रयास कर अपने प्रबंध कौशल का प्रमाण दें। अपने देश में पैसा कमाना महत्वपूर्ण है कि प्रबंध कौशल!
सो टीम हार गयी तो कोई बात नहीं। जिस कप्तान को सिर पर उठाये रखा है उसने कहा है कि कुछ महीने बाद फिर प्रतियोगिता है। उसमें दमखम दिखायेंगे। वहां यह आश्वासन देना ठीक है क्योंकि अगली बार तक लोग इंतजार कर अपना पैसा खर्च कर सकते हैं।
पिछली बीस ओवरीय प्रतियोगिता बीसीसीआई की टीम ने जीती थी। उससे पहले विश्व में हारने की वजह से पूरी टीम की जो किरकिरी हुई वह लोग भूल गये। बीस ओवरीय प्रतियोगिता में बीसीसीआई टीम की पिछली जीत की दो वजहें थी एक तो दूसरी टीमें गंभीरता से नहीं खेली दूसरा भारतीयों पर जीत का कोई दबाव नहीं था। कुछ लोग तो उस समय मान रहे थे कि इस आड़ में भारत में क्रिकेट को दोबारा प्रतिष्ठा दिलाने का योजनाबद्ध प्रयास किया गया है। यह योजना वैसे ही सफल हुई जैसे कि 1983 में एक दिवसीय विश्व क्रिकेट कप में बीसीसीआई की टीम के जीतने पर क्रिकेट का वह प्रारूप भारत में लोकप्रिय हो गया। मतलब पच्चीस साल तक बाजार उस जीत को भुनाता रहा। अब हमारे लिये यह देखने का विषय है कि पिछली बीस ओवरीय प्रतियोगता की जीत को बाजार कब तक भुनाता रहेगा। इस बात तो टीम पिट गयी इसलिये निश्चित रूप से क्रिकेट के इस व्यापर पर बुरा प्रभाव पड़ेगा-चाहे वह एक नंबर को हो या दो नंबर का। देखना है कि इस हार का मनौवैज्ञानिक और आर्थिक रूप से बाजार पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
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Friday, June 19, 2009

हारने पर चौगुना इनाम-हिन्दी हास्य व्यंग्य (harne par inam-a hindi stire)

आठवीं कक्षा ‘अ’ के छात्रों को उनके शिक्षक ने बताया कि उनका उसी विद्यालय की आठवीं की अन्य कक्षा ‘ब’ से एक दस ओवरीय मैच होगा और जीतने वाली टीम के सभी सदस्यों को प्लास्टिक का चीन में निर्मित एक खिलौना, पेन, और कापी के साथ एक स्टील का कप भी मिलेगा।
एक छात्र ने पूछ लिया कि ‘सर, आप हमें जीतने वाला नहीं हारने वाला इनाम बताईये। हमने सुना है कभी कभी हारने वाले को अधिक पुरस्कार मिलता है।’
शिक्षक ने समझा कि वह मजाक कर रहा है इसलिये कह दिया कि-‘कप को छोड़कर बाकी सब चौगुना मिलेगा।’
अगले दिन मैच हुआ और ‘अ’ वाले हार गये। जीतने वाली टीम को सभी के सामने बकायदा इनाम से नवाजा गया। पुरस्कार बांटे जाते समय हारने वाले छात्र भी तालियां बजा रहे थे। यह देखकर सातवीं कक्षा के एक छात्र-जो हारी टीम के सदस्यों के ठीक पीछे ही खड़ा हुआ था- को गुस्सा आ गया पर उसने प्रेम से बोलना सिखाने वाली एक गोली खाकर हारी हुई टीम के खिलाड़ी से कहा-‘तुम लोगों को शर्म नहीं आती। एक तो हार गये फिर जीतने वालों को पुरस्कार मिलने पर तालियां बजा रहे हो।’
उस मासूम परास्त योद्धा ने कहना चाहा-‘जीतने वाले से चौगुना.....’’
इससे पहले ही उसके साथी खिलाड़ी ने उसे कुहनी मारते हुए कहा-‘‘चुप! अपनी असलियत सभी को मत बता। यह अंदर की बात है। ऐसे तो तुम कभी तरक्की नहीं कर पाओगे।’’
परास्त योद्धा की बात पूरी नहीं हो पायी। इनाम वितरण कार्यक्रम समाप्त हो गया। थोड़ी देर बाद परास्त टीम के छात्र अपना गुप्त इनाम लेने कक्षा शिक्षक के पास पहुंचे और बोले-‘सर, हम बड़ी ईमानदारी से हारे। किसी को हवा तक नहीं लगने दी कि हारने के लिये खेल रहे हैं। अब लाईये हमारा चौगुना इनाम!’
कक्षा शिक्षक की आंखें फटी रह गयी और वह बोले-‘पागल हो गये हो!’ हारने वाली टीम को भी भला कभी इनाम मिलता है। अगर इसी तरह खेलों में हारने वाले को भी पुरस्कार मिलने लगे तो जीतने के लिये खेलेगा कौन?’
एक छात्र ने मासूमियत से जवाब दिया-‘जिसे चौगुना इनाम नहीं मिलेगा। वह जरूर खेलेगा। हमारे बाबा क्रिकेट के पुराने और पापा नये प्रेमी हैं। उन्होंने बताया था कि एक मैच ऐसा भी हुआ था जिसमें दोनों टीमें हारना चाहती थीं क्योंकि तब हारने पर अधिक इनाम मिलना था।’
कक्षा शिक्षक ने उनको झिड़क दिया। यह सोचकर कि बच्चे इस तरह मान जायेंगे। मगर ऐसा हुआ नहीं। उनमें से कुछ बच्चे अगले दिन अपने पालकों को ले आये। पालकों ने आकर कक्षा शिक्षक को घेर लिया।
एक पालक ने कहा-‘‘मेरा लड़का तूफानी बालर है। उसकी गेंद के आगे कोई नहीं टिक सकता। कल उसने चौगुने इनाम की लालच में ढीली और धीमी गेंद डाली। अपनी भद्द पिटवायी। अब उसका इनाम दो नहीं तो तुम्हारी खैर नहीं।’
दूसरे पालक ने कहा-‘‘मेरा लड़का क्रिकेट की गेंद को ऐसा मारता है जैसे कि वह उसको फुटबाल दिख रही हो। कल दो रन बनाकर आउट हो गया। उसके मन में चौगुना इनाम पाने का सपना था। अब तुम चाहे जैसे भी उसका इनाम भरो।’
कक्षा शिक्षक की हवाईयां उड़ रही थी। मामला प्रिंसिपल तक जा पहुंचा। वह भी घबड़ा गये। एक बार तो उनके मन में आया कि चौगुना इनाम देकर अपने विद्यालय की लाज बचायें पर दूसरे शिक्षक ने उनको बताया कि उससे तो वह और बर्बाद हो जायेगी।
तब एक बूढ़ा चपरासी उनकी मदद को आगे आया। उसने हारने वाले छात्रों से जिरह की।
चपरासी ने पूछा-‘क्या तुमने कक्षा ‘ब’ के छात्रों से पहले इस बारे में चर्चा की थी ताकि वह भी हारने का प्रयास करें?’
छात्रों ने कहा-‘नहीं।’
चपरासी ने कहा-‘क्या तुममें से कोई अनफिट था जो मैदान में उतर गया हो।’
छात्रों ने कहा-‘नहीं।’
चपरासी ने फिर पूछा-‘तुममें से किसी ने लंगड़ाते हुए गेंद डाली। क्या कोई रनआउट या हिट विकेट हुआ? क्या किसी ने रनआउट या कैच का अवसर मिलने पर उसे छोड़ा? जिससे लगे कि तुम हारने के लिये खेल रहे हो!
छात्रों ने एक स्वर से कहा-‘नहीं! हम बहुत सफाई से हारे हैं।’
चपरासी ने कहा-‘एक भी तो सबूत तुम्हारे पास नहीं है। कैसे मान लिया जाये कि तुम हारने के लिये खेले? बेईमानी के भी कुछ उसूल होते हैं। तुम्हारे शिक्षक ने मजाक किया तो तुमने सच मान लिया। यह भी तो सोचो कि इस विद्यालय के लिये दोनों कक्षायें एक समान हैं इसलिये यह कैसे हो सकता है कि तुम्हारी कक्षा को तो यह बताया जाये कि हारने पर चौगुना इनाम मिलेगा पर दूसरी टीम के छात्रों को अंधेरे में रखा जाये। इसलिये अब भूल जाओ।’
पालकों के बात समझ में आ गयी। छात्र भी कोई सबूत छोड़ने में विफल रहे थे इसलिये चुप्पी साधने में ही अपनी भलाई समझी। सभी चले गये। कक्षा शिक्षक ने चैन की सांस ली और चपरासी ने कहा-‘बच गया।’
चपरासी ने कहा-‘महाशय बच कैसे गये। मेरा हिस्सा भी तो दो। हारने पर ग्यारह छात्रों को जो इनाम दिया जाना था वह क्या पूरा डकार जाओगे। मेरा कमीशन भी तो दो।’
कक्षा शिक्षक ने कहा-‘अरे यार, तुम भी बच्चों जैसे बातें करने लगे। अरे, भई यह तो प्रिंसिपल साहब जानते हैं कि ऐसा कोई इनाम नहीं दिया जाने वाला था। अगर मुझ पर विश्वास न हो तो उनसे जाकर पूछ लो।’
चपरासी ने कहा-‘अब क्या आपसे जिरह करूं! मुझे मालुम होता तो कभी उन लोगों से आपको नहीं बचाता। मैंने सोचा कि कुछ मिल जायेगा। अब सब माल आप और प्रिंसिपल साहब हड़पना चाहते हो तो अलग बात है।’

कक्षा शिक्षक अपने बाल नौचते हुए बोले-‘अरे, तुम क्या बात कर रहे हो? भला हारने पर भी किसी खेल में इनाम मिलता है?’
चपरासी कंधे उचकाते हुए बोला-‘मुझे नहीं पता? पर सुना तो है। इस दुनियां में सब चलता है साहब!’
चपरासी कुटिलता से कक्षा शिक्षक की तरफ देखता हुआ चला गया। कक्षा शिक्षक आकाश की तरफ देखते हुए बोला-‘हे, सर्वशक्तिमान! क्या ऐसा भी होता है?’
नोट यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है पर अगर किसी की कारिस्तानी इससे मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।
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Saturday, June 13, 2009

सामूहिक ठगी से उजागर बौद्धिक खोखलेपन का डरावना रूप-आलेख

एक के बाद एक सामूहिक ठगी की तीन वारदातें टीवी चैनलों और समाचार पत्रों की सुर्खियां बन गयी हैं। आप यह कहेंगे कि ठगी की हजारों वारदातें इस देश में ं होती हैं इसमें खास क्या है? याद रखिये यह सामूहिक ठगी की वारदातें हैं और कोई एक व्यक्ति को ठग कर भागने का मामला नहीं है। उन ठगों की आम ठग से तुलना करना उनका अपमान करना है। आम ठग अपनी ठगी के लिये बहुत बुद्धिमानी के साथ दूसरे के पास पहुंचकर ठगी करता है जबकि इन ठगों ने केवल दूसरों की मजबूरियों का फायदा उठाने के इरादे से विज्ञापन का जाल बिछाया बल्कि बाकायदा अपना एजेंट नियुक्त किये। शिकार खुद वह खुद उनके जाल में आया और वह भी उनके वातानुकूलित दफ्तरों में अपने पांव या वाहन पर चलकर।
यह एकल ठगी का मामला नहीं है। हर विषय पर अपना बौद्धिक ज्ञान बघारने वाले बुद्धिमान लोगों के लिये इसमें कुछ नहीं है जिस पर हायतौबा कर अपनी चर्चाओं को रंगीन बना सकें। इनमें समाजों का आपस द्वंद्व नहीं है बल्कि समाजों की छत्र छाया तले रहने वाले परिवारों और व्यक्तियों के अंतद्वंद्वों का वह दुष्परिणाम है जो कभी भी बुद्धिमान लोगों की दृष्टि के केंद्र बिंदु में नहीं आते। जो बुद्धिमान लोग इस पर ध्यान भी दे रहे हैं तो उनका ध्यान केवल घटना के कानूनी और व्यक्तिगत पक्ष पर केंद्रित है। आप सवाल पूछेंगे कि आखिर इसमें ऐसा क्या है जो कोई नहीं देख रहा?

जो लोग ठगे गये हैं वह केवल यही कह रहे हैं कि उन्होंने अपने पैसे अपनी बच्चियों की शादी के लिये रखे थे। यह सोचकर कि पैसा दुगुना या तिगुना हो जायेगा तो वह उनकी शादी अच्छी तरह कर सकेंगे। समाज पर चलती तमाम बहसों में दहेज प्रथा की चर्चा होती है पर उसकी वजह से समाज किस तरह टूट रहे हैं इस पर कोई दृष्टि नहीं डालता। पूरा भारतीय समाज अब अपना ध्यान केवल धनर्जान पर केंद्रित कर रहा है और अध्यात्मिक ज्ञान या सत्संग उसके लिये वैसे ही जैसे मनोरंजन प्राप्त करना। पैसा दूना या चैगुना होना चाहिए। किसलिये चाहिये? बेटे की उच्च शिक्षा और बेटी की अच्छी शादी करने के लिये। सारा समाज इसी पर केंद्रित हो गया है। आखिर आदमी ऐसा क्यों चाहता है? केवल इसलिये कि समाज में वह सीना तानकर वह सके कि उसने अपने सांसरिक कर्तव्यों को पूरा कर लिया और वह एक जिम्मेदारी आदमी है।
कुछ लोगों के बच्चे संस्कार, भाग्य, परिश्रम या किसी दूसरे की सहायता उच्च स्थान पर पहुंच जाते हैं तो उनके विवाह कार्यक्रम भी बहुत आकर्षक ढंग से संपन्न होते हैं जो किसी भी भारतीय नर नारी का बरसों से संजोया एक सपना होता है’-इसी सपने को पूरा करने के लिये वह जिंदगी गुजारते हैं।
जिनके बच्चे शैक्षिक और बौद्धिक क्षमता की दृष्टि से औसत स्तर के हैं उनके लिये यह समस्या गंभीर हो जाती है कि वह किस तरह उनके लिये भविष्य बनायें ताकि वह स्वयं को समाज में एक ‘जिम्मेदार व्यक्ति’ साबित कर सकें। इसके लिये चाहिए धन। आम मध्यम वर्गीय परिवार के लिये यह एक बहुत बड़ी समस्या है। अगर हम उसके जीवन का आर्थिक चक्र देखें तो वह हमेशा ही बाजार के दामों में पिछड़ता है। जब प्लाट की कीमत डेढ़ सौ रुपया फुट थी तब वह पचास खर्च कर सकता था। जब वह डेढ़ सौ खर्च करने लायक हुआ तो प्लाट की कीमत तीन सौ रुपया प्रति फुट हो गयी। जब वह तीन सौ रुपये लायक हुआ तो वह पांच सौ रुपया हो गयी। जब वह पांच सौ रुपया लायक हुआ तो पता लगा कि डेढ़ हजार रुपये प्रतिफुट हो गयी।
इस चक्र में पिछड़ता आम मध्यम और निम्न वर्ग दोगुना और चैगुना धन की लालच में भटक ही जाता है। आज के आधुनिक ठग ऐसे तो हैं नहीं कि बाजार या घर में मिलते हों जो उन पर विश्वास न किया जाये। उनके तो बकायदा वातानुकूलित दफ्तर हैं। उनके ऐजेंट हैं। एकाध बार वह धन दोगुना भी कर देते हैं ताकि लोगों का विश्वास बना रहे। ऐसे में उनका शिकार बने लोग दो तरफ से संकट बुलाते हैं। पहला तो उनकी पूरी पूंजी चली जाती है दूसरा परिवार के सभी सदस्यों का मनोबल गिर जाता है जिससे संकट अधिक बढ़ता है। बहरहाल नारी स्वातंत्र्य समर्थकों के लिये इस घटना में भले ही अधिक कुछ नहीं है पर जो लोग वाकई छोटे शहरों में बैठकर समाज को पास से देखते हैं उन्हें इन घटनाओं के समाज पर दूरगामी परिणाम दिखाई देते हैं जो अंततः नारियों को सर्वाधिक कष्ट में डालते हैं।

कन्या भ्रुण की हत्या रोकने के लिये कितने समय से प्रयास चल रहा है पर समाज विशेषज्ञ लगातार बता रहे हैं कि यह दौर अभी बंद नहीं हुआ। हालांकि अनेक लोग उन माताओं की ममता को भी दोष देते हैं जो कन्या भ्रुण हत्या के लिये तैयार हो जाती हैं पर कोई इसको नहीं मानते। शायद वह मातायें यह अनुभव करती हैं कि अगर वह लड़की पैदा हो गयी तो उसके प्रति ममता जाग्रत हो जायेगी फिर पता नहीं उसके जन्म के बाद उसके विवाह तक का दायित्व उसका पति और वह स्वयं निभा पायेंगी कि नहीं। इसमें हम समाज का दोष नहीं देखते। इतने सारे सामाजिक आंदोलन होते हैं पर बुद्धिजीवी इस दहेज प्रथा को रोकने और शादी को सादगी से करने का कोई आंदोलन नहीं चला सके। उल्टे शादी समारोहों के आकर्षण को अपनी रचनाओं में प्रकाशित करते हैं।
समस्या केवल ठगी के शिकार लोगों की नहीं है बल्कि इन ठगों की भी है। इन ठगों के अनुसार उन्होंने अपना पैसा शेयर बाजार और सट्टे में-पक्का तो पता नहीं है पर जरूर सट्टा क्रिकेट से जुड़ा हो सकता है क्योंकि आजकल के आधुनिक लोग उसी पर ही दांव खेलते हैं-लगाया होगा। अधिकतर टीवी चैनलों और अखबारों में सट्टे से बर्बाद होने वाले लोगों की खबरें आती है पर उसका स्त्रोत छिपाया जाता है ताकि लोग कहीं उसे शक से न देखने लगें। वैसे हमने यह देखा है कि सट्टा खेलने वाले-खिलाने वाले नहीं- ठगने में उस्ताद होते हैं। सच तो यह है कि वह दया के पात्र ही हैं क्योंकि वह मनुष्य होते हुए भी कीड़े मकौड़े जैसे जीवन गुजारते हैं। वह तो बस पैसा देखते हैं। किसी से लूटकर या ठगकर अपने पास रखें तो भी उन पर क्रोध करें मगर वह तो उनको कोई अन्य व्यक्ति ठगकर ले जाता है। ऐसे लोग गैरों को क्या अपनों को ही नहीं छोड़ते। बाकी की तो छोड़िये अपनी बीवी को बख्श दें तो भी उसे थोड़ा बुद्धिमान ठग मानकर उस पर क्रोध किया जा सकता है।

कई तो ऐसे सट्टा लगाने वाले हैं जो लाखों की बात करते हैं पर जेब में कौड़ी नहीं होती। अगर आ जाये तो पहुंच जाते हैं दांव लगाने।
मुख्य बात यही है कि क्रिकेट के सट्टे का समाज पर बहुत विपरीत प्रभाव है पर कितने बुद्धिमान इसे देख पा रहे हैं? इससे देश की अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव भले ही नहीं पड़ता हो पर इतने व्यक्तियों और परिवारों ने तबाही को गले लगाया है कि उनकी अनदेखी करना अपने आप में मूर्खता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ठगी की इन घटनाओं के कानूनी पक्ष के अलावा कुछ ऐसे भी विषय हैं जो समाज पर बुरा प्रभाव डाल रहे हैं पर कितने बुद्धिजीवी इस पर लिख या सोच पाते हैं इस आलेख को पढ़ने वाले इस पर दृष्टिपात अवश्य करें। हालांकि यह भी बुरा होगा क्योंकि तब उनको जो इस देश मेें बौद्धिक खोखलापन दिखाई देगा वह भी कम डरावना नहीं होगा। यह बौद्धिक खोखलापन ठग के साथ उनके शिकार पर ही बल्कि इन घटनाओं पर विचार करने वालों में साफ दिखाई देगा।
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Friday, June 5, 2009

वफा और भरोसे की कद्र कौन करेगा-हिंदी शायरी (vafa aur bharose ki kadra-hindi shayri)


सभी इंसान
वादा कर निभाने लगे
तो भरोसे की कद्र कौन करेगा।
सभी साथ निभाने लगे
तो वफा की कद्र कौन करेगा।
सभी मुस्करायेंगे खुशियों में
तो गमों के गीतों में लफ्ज कौन भरेगा।
दुनियां में फरिश्तों की बसती होने का
एक ख्वाब है
अगर सच हो गया
तो सर्वशक्तिमान की इबातद कौन करेगा।
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भरोसा और वफा
बाजार में दाम देकर मिल जाती है
हर इंसान सौदागर है यहां
सच कहने में शर्म क्यों आती है।
खरीदता है कोई
तो वफा और भरोसे के साथ बिक जाना
पर जब खरीददार होकर
जाओ बाजार
वफा और भरोसे समेत
इंसान मिल जायेगा
यह उम्मीद छोड़कर जाना
अपने अंदर ही ईमान हो
उस पर जरूर यकीन करना
पर दूसरे के दिल की नीयत
दिख जाये सामने
ऐसी तरकीब कहीं नहीं मिल पाती है।

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Thursday, June 4, 2009

समाज का वैचारिक रूप से असमंजस में रहना ठीक नहीं-आलेख

एक नहीं ऐसी सौ घटनायें भी हों तो उसे पूरे समाज से जोड़ना अज्ञान और संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण होगी। एक लड़की के द्वारा अपने प्रेमी से मिलकर मां की हत्या की वह घटना अगर दिल्ली में नहीं होती तो शायद इतना चर्चा का विषय नहीं बनती। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिनकी चर्चा अनेक बार अखबारों में छप चुकी है। वैसे भी यह देश इतना विविधताओं से भरा पड़ा है कि किसी एक घटना को पूरे समाज से देखना अपने आप में संकीर्णता का परिचायक है। हमारे देश के बड़े शहरों और छोटे शहरों के समाजों में बहुत बड़ा अंतर है पर खबरें देने और उनके विश्लेषण करने वाले हमेशा बड़े शहरों को लेकर ही बहस करते हैं शायद इसलिये ही छोटे शहरों की खबरें उनके लिये चर्चा का विषय नहीं बनती।
एक समय कहा जाता था कि भारत का असली समाज तो गांवों में बसता है और इस बात ने समाज विज्ञानियों को इतना बेफिक्र कर दिया कि वह छोटे शहरों, गांवों और कसबों के समाज की आम गतिविधियों के सहारे अपनी संस्कृति और संस्कार बचने की चिंता से मुक्त होकर केवल बड़े शहरों के विषयों पर बहस करते रहे और उन्हें शायद इस बात का आभास नहीं है कि पाश्चात्य सुविधाओं के उपयोग तथा संचार माध्यमों की पहुंच ने भारतीय संस्कृति की जड़े पूरी तरह से खोद दी हैं। यहां यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि अंदर से खोखले होते जा रहे समाज मेें बेटी द्वारा अपने प्रेमी से मिलकर अपने ही परिवार पर आक्रमण करने की घटना भले ही पूरे देश के समूचे लोगों से जोड़ना ठीक नहीं हो पर उसे अब एक सहज अपराध माने लगा है जो कि एक चिंता का विषय है।
आखिर मुश्किल कहां है? समाज को पूरी तरह खुला रखना है या शर्तों पर उसे आजादी देना है-यह बात देश के विद्वान अभी तक तय नहीं कर पाये। एक तरफ उनको अपनी संस्कृति और संस्कार को अक्षुण्ण बनाये रखने की चिंता होती है और दूसरी तरफ औरतों की आजादी पश्चिम के समक्ष बनाये रखने का अभियान भी जारी रखना चाहते हैं। उनका यही असमंजस समाज का संकट बन रहा है। समाज में माता पिता अपनी बेटियों को आजाद दिखाकर अपने को आधुनिक तो साबित करना चाहते हैं पर उसके साथ ऊंच नीच होने पर बदनामी का कथित भय भी उनको सताता है। उनका यह असमंजस अनेक घरों में हिंसक परिणति का रूप लेता है-इससे अधिक संख्या उन घरों की है जहां मामला दबा रहता है या फिर समय के साथ ठंडा पड़ जाता है।
दहेज प्रथा का प्रकोप उससे अधिक है जितना दिखाई देता है। सभ्रांत समाज केवल दहेज ले-देकर संतुष्ट नहीं होता बल्कि वह विवाह कार्यक्रम का उपयोग अपनी शक्ति दिखाने के लिये अधिक व्यय के साथ करता है। शादियों में शराब पीना अब शान हो गयी है जोकि कभी नफरत का प्रतीक थी। इस देश में कई ऐसे लोग अब भी मिल जायेंगे जिन्होंने केवल फिल्म की आदत होने पर किसी लड़के को लड़की के अयोग्य मान लेने की प्रवृत्ति समाज में देखी होगी। शराबी के बेटे-बेटी के साथ भी लोग रिश्ता नहीं करना चाहते थे।
मगर अब क्या हुआ? हमारा जो वर्तमान समाज है उसके नियम निर्माताओं पर औरत को गुलाम बनाये रखने का आरोप लगता है। हो सकता है यह सही हो पर सच बात तो यह है कि उनकी नीयत औरत को गुलाम बनाये रखने की बजाय उसको दैहिक और आर्थिक रूप से सुरक्षित रखने की थी। समय के साथ ऐसा लगता हो कि वह संकीर्ण विचारों के जनक हों पर उस पर बहस किये बिना केवल नारों के आधार पर ही उन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता है।
कुछ पुराने विद्वान यह कहते हैं कि ‘बेटी की कमाई नहीं खाना चाहिए।’
वर्तमान में अनेक लोग इस दकियानूसी विचार कहेंगे मगर ऐसे लोगों ने इस समाज की प्रवृत्ति को नहीं समझा। लड़कियां नौकरियां करती हैं। अनेक लड़के भी नौकरीशुदा लड़कियां जीवनसंगिनी के रूप में चाहते हैं। कितनी सुखद कल्पना लगती है न देश की! मगर ऐसी अनेक लड़कियां हैं जिनको ससुराल में विवाह के बाद केवल इस आधार पर प्रताड़ना मिलती है कि विवाह के पूर्व उन्होंने जो कमाया वह कहां गया?
उस समय लड़की को यह कहकर सास, ननद, और पति ताने देते हैं कि ‘इसका बाप कन्या की कमाई खा गया।’
ऐसा कहने वाली सास या ननद अगर अनपढ़ हो तो मान लें कि ठीक है पर अगर वह पढ़ी लिख हो तो क्या कहेंगे?
आजकल सभ्रांत वर्ग ऐसी जगह बेटियों की शादी करना चाहता है जहां काम करने वाली नौकरानियां हों-यहां तक कि बेटी को खाना भी न बनाना पड़े। कहा जाता है कि खाना बनाना ही औरत की सबसे बड़ी उपलब्धि है जिससे वह पूरे परिवार पर नियंत्रण करती है-अगर नारी स्वातंत्र्य समर्थक इसे पुरातनपंथी माने तो चलेगा-मगर उसी हथियार के बिना औरत का अपने पति और ससुराल पर नियंत्रण कैसे होगा? यह कौन बता सकता है? स्थिति यह है कि नारी स्वातंत्र्य समर्थक नारियां भी कई बार ऐसी बातें कहती हैं जिससे लगता है कि घर का काम नारी द्वारा किया जाना उसकी गुलामी का प्रतीक है। अब सवाल यह है कि क्या पुरुष घर का काम करने लगे तभी नारी की आजादी का अभियान पूरा माना जायेगा क्या? एक बात तय है कि खाना तो बनेगा क्योंकि उसके बिना परिवार का चलना कठिन है। नारी स्वातंत्र्य समर्थकों को उसकी आजादी की बात तो दिखाई देता है पर खाना बनाना, कपड़े धोना, बच्चे पालना, और सफाई आदि के काम करने की जिम्मेदारी नहीं दिखती जो कि पश्चिमी विचाराधारा के अनुसार आर्थिक दृष्टि से अधिक महंगे हैं। एक अमेरिकी अर्थशास्त्री के अनुसार अगर मुद्रा में भारत की घरेलू स्त्रियों द्वारा किये गये कार्यों का आंकलन किया जाये तो वह पुरुषों से अधिक कमाती हैं। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि जो स्त्रियां बाहर कमा रही हैं-चंद समृद्ध और उच्च पदस्थ महिलाओं की बात यहां छोड़ देते हैं जो सामान्य नौकरी वाली औरतों से गुणात्मक रूप से अधिक आय अर्जित करती हैं-वह अपने आसपास की घरेलू महिलाओं के मुकाबले प्रत्यक्ष रूप से धन कमाने की वजह से श्रेष्ठ दिख सकती हैं पर जहां तक वास्तविक कमाई का प्रश्न है तो वह पीछे हैं।
तात्पर्य यह है कि हमारा समाज असमंजस में पड़ा है। न तो वह खुलकर पाश्चात्य संस्कृति की तरफ जा रहा है और न पूरी तरह अपने संस्कार छोड़ पा रहा है। हमारा मानना यह है कि जिन लोगों को पाश्चात्य सभ्यता अपनाना है तब उनको इस बात की परवाह नहीं करना चाहिए कि समाज क्या कहेगा? जिनको अपनी संस्कृति अपनानी होगा उनको पूरी तरह से नहीं तो आंशिक रूप से पाश्चात्य संस्कृति से परे रहना होगा -अधिक से अधिक वह पहनावे तक ही सीमित रहें पर वैलंटाईन डे, शुभेच्छु दिवस, प्रेम दिवस तथा अन्य ऐसे त्यौहारों से परे रहे जो कामनायें बढ़ाने के लिये प्रेरित करें। इस मामलें में कानून की भी समीक्षा करनी होगी जिससे कि पाश्चात्य संस्कृति अपनाने वालों के लिये कोई बाधा न खड़ी हो। समाज का इस तरह विचारों की दृष्टि से असमंजस में पड़े रहना ठीक नहीं है।
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