Wednesday, July 29, 2009

खास आदमी बनने का मोह-हिंदी व्यंग्य (khas admi banne ka moh-hindi vyangya

सच तो यह है कि जिंदगी वही लोग मजे से गुजारते हैं जिनको पता है कि वह कभी खास आदमी नहीं बन पायेंगे। जो लोग खास बनने का ख्वाब पालते हैं वह अपनी पूरी जिंदगी जद्दोजेहद करते हैं। अब यह अलग बात है कि किसी को खास बनना नसीब होता है तो कुछ लोग केवल इस भ्रम में गुजार देते हैं कि वह ‘खास आदमी’ है। निश्चित रूप से यह लोग उस मध्यम वर्गीय परिवारों के होते हैं जो अंग्रेजी की गुलामी से सराबोर शिक्षा के साथ अपने पास उपलब्ध धन को विलासिता में खर्च करने का सामथ्र्य रखते हैं।
वैसे तो इस देश का पूरा शिक्षित समाज ही इसी गुलामी वाली शिक्षा पद्धति से संपन्न है पर इनमें भी कुछ लोग हैं जो यह मानकर चलते हैं कि वह एक आम परिवार में पैदा हुए हैं और उन्हें खास आदमी बनने के अवसर कभी प्राप्त नहीं होगा। ऐसे लोग अगर लेखक, पत्रकार,चित्रकार या किसी अन्य कला में पारंगत होते हैं तो एकदम सहजता से काम करते हुए चले जाते हैं। इसके विपरीत जो गुणीजन अपने अंदर आम परिवार के होने के बावजूद खास होने का सपना पालते हैं उनके लिये यह जिंदगी असहज और खतरनाक हो जाती है।
ऐसे अनेक लोग हैं जो पहले हिंदी फिल्मों में नायक, गायक, शायर बनने के लिये घर से भागे पर वहां जाकर उनको पता लगा कि ‘जीरो से हीरो’ बनने की कहानी तो केवल फिल्मों में दिखाई जाती है वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता। एक टीन का काम करने वाले दुकानदार का लड़का मुंबई भाग गया। कई दिनों के बाद वह घर लौटा और अपने बाप के काम में हाथ बंटाने लगा।
एक ने उसके बाप से पूछा-‘अच्छी बात है, लड़का मुंबई से लौट आया। इसे दुकान का काम सिखाओ। इसे समझाओ फिल्मों में ऐसे काम नहीं मिलता।’
इससे पहले बाप कुछ बोले वह लड़का स्वयं बोला-‘कैसे नहीं मिलता? मैं तो अभी ऐसे ही आया हूूं। वहा फिल्मों में काम करता हूूं। अभी छुट्टी लेकर आया हूं।’
वह आदमी भी फिल्म देखने का आदी था। उसने पूछा‘किस फिल्म में काम किया है? जरा बताओ तो सही।’
उसने फिल्म का नाम बताया तो वह आदमी चैंक गया और बोला-‘उसे तो मैं तीन बार देख चुका हूं। तुम्हारा चेहरा याद नही आ रहा।’
वह लड़का बोला-‘उस फिल्म में जब हीरो स्टेशन पर था तब उसके पास रेल कर्मचारी की नीली ड्रेस पहनकर मैं खड़ा रहा था। उसने मुझसे रास्ता पूछा मैंने उंगली उठाकर उसे बताया था।’
उस आदमी को याद आया। वह बोला-‘हां, पर उसमें तुम्हारा चेहरा शायद सीधे कैमरे की तरफ नहीं था। केवल एक सैकण्ड का दृश्य था। अरे, वह तो एक ऐसे ही रोल है जो मजदूरनुमा लोगों को दिया जाता है। दूसरी किसी फिल्म में भी काम किया है?’
उसने कहा-‘हां, पर वह अभी आनी है।’
वह लड़का कुछ दिन बाद फिर मुंबई गया। फिर लौट आया। वह न धंधे का रहा न फिल्म लाईन का! बचपन में उसे हमने देखा था और उसका यह प्रभाव हम पर पड़ा कि फिर खास आदमी बनने का मोह कभी नहीं रहा।
फिल्मी कहानियों में हीरो से जीरो बनने वाली कहानियां देखकर खूब आनंद उठाया पर कभी यह नहीं सोचा कि हम भी कभी खास आदमी बनेंगे।
समय के साथ हमारा यह विश्वास पक्का होता चला गया। वैसे आजकल की पीढ़ी के सदस्य अधिकतर समझदार हैं। लेखक, फिल्म, संगीत, साहित्य पत्रकारिता और समाज सेवा में भी आजकल वंश परंपरा चल पड़ी है। जड़ता को प्राप्त इस समाज मेें बहुत कम लोग यह मानकर चलते हैं कि उनको खास श्रेणी मिलेगी।
वैसे आम आदमी बने रहने के अलग मजे हैं। खास आदमी की श्रेणी पाना जहां लगभग असंभव है वहां आम आदमी बनकर ही मजे लिये जायें तो एक बहुत अच्छा है। ऐसे में खास लोगों की गंभीर क्रियायें भी हास्य का बोध कराती हैं। अगर आप चित्रकार, पत्रकार, लेखक या कलाकार हैं तो अपना काम करने के बाद आम आदमी की भीड़ में शामिल हो जाईये। अपने से कमतर लोगों की पूजा होते देख दुःखी मत होईये। हंसिये! जो पुज रहा है जो पूज रहा है दोनों के चेहरे पर कृत्रिम प्रसन्नता का भाव देखकर आप हंसे नहीं तो इसका मतलब यह है कि आप पर खास न होने का अफसोस राज्य कर रहा है। यह आपके स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। अपनी रचना-चित्र, साहित्य कृति या संगीत और स्वर से परिपूर्ण गीत-करने के बाद आप उसे भूल जाईये। उसे भीड़ में जाने दीजिये। लोगों को उसका मजाक उड़ाते हुए देखिये। यह मजाक उनके अंदर मौजूद कुंठाओं से पैदा होता है जो उनके स्वयं के असहाय होने को प्रमाण हैं।
जो खास नहीं बने उन पर तरस खायें पर जो खास हो गये उनको भी देखिये वह बिचारे बार बार इस प्रयास में रहते हैं कि लोग उनको खास समझते रहेें। आदमी उनको खास समझ रहा है पर उनको यह खौफ रहता है कि कहीं उनको लोग भूल न जायें। इस चक्कर में उलूलजुलूल हरकतें करते हैं।
उस दिन हमें एक सहधर्मी व्यंग्यकार मिल गये जो कि हमारे आलोचक भी हैं। हम पर फिकरे कसते रहते हैं और हम भी उनका पीछा नहीं छोड़ते क्यांेकि कई व्यंग्य तो उनसे ही उपहार में मिल जाते हैं। उस दिन वह स्कूटर रोककर एक दुकान से कंगा खरीद रहे थे। हम भी उसी बाजार में थे और उनको देख लिया और लपककर पहुंच गये। सोचा कि दो चार सुना लेगा तो क्या एक दो व्यंग्य का विषय भी तो दे जायेगा। हमें देखकर ही उसका मूंूह सूख गया।
‘यार, तुम्हें शर्म भी नहीं आती! चाहे जब सामने आ जाते हो।’ वह बोला।
हमने कहा-‘यार, इधर विषय का अकाल है। सोचा तुमसे एक दो व्यंग्य रचना ही मिल जाये। चलो तुमने एक हास्य कविता का विषय तो दे दिया।’
वह गुस्से में बोला-‘अरे, हास्य कवि! कितने कवि सम्मेलनों में जाता है? कभी तेरा नाम ही नहीं सुना। तू हमसे बराबरी मत कर। अभी रेडियो पर साक्षात्कार के लिये जा रहा हूं। फिर आकर तेरे से बात करूंगा।’
हमने पूछा-‘यह रेडियो पर साक्षात्कार पर जाने के कारण ही यह कंगा क्यों खरीद रहे हो? जेब में रखा करो। वैसे तुम्हारे सिर पर बाल इतने कम है कि हाथ से ही कंगी हो जाती। वैसे कौनसे रेडियो पर तुम्हारा साक्षात्कार आयेगा।’
वह बोला-‘नहीं बताऊंगा! तुम चालाक हो। मैंने उस दिन अखबार में तुम्हारा व्यंग्य पढ़ा था। तुमने मेरी बातों से ही व्यंग्य चुरा लिया था।’
हमने कहा-‘यह साक्षात्कार किस रेडियो पर आयेगा।’
वह बोला-‘नहीं बताऊंगा! तुम मेरे साक्षात्कार में बहुत सारी सामग्री व्यंग्य में परिवर्तित करोगे।’
हमने कहा-‘यार, हमारा भी साक्षात्कार प्रसारित करा दो। तुम हमारे मित्र हो!’
वह बोला-‘पहले तो मित्र कहकर मेरा अपमान मत करो! मैं तुम्हें कभी अपना मित्र नहीं समझता। मेरी बातों से व्यंग्य निकालकर लिखो और मित्र भी कहो-यह संभव नहीं है। फिर साल छह महीने में एकाध बार अखबार में छप जाने से कोई बड़े लेखक नहीं बन जाते।’
वह स्वयं भी कोई अधिक छपने वालों में नहीं है। हमारी तरह ही एक आम आदमी की तरह उसका जीवन है पर खास होने का मोह उससे नहीं छूटता। हालांकि वह कभी कभी ऐसी बात कर जाता है जो दिल को छू जाती है। हमने पूछा-‘तो कैसे बनते हैं बड़े लेखक!’
वह जोर से हंस पड़ा-‘अरे, यार अगर मुझे पता होता तो खुद ही नहीं बन जाता।’
उसके बाद वह सामान्य होकर हाथ मिलाते हुए वहां से चला गया। उसकी आखिरी बात हमें बहुत अच्छी लगी।
खास आदमी बनने का मोह छोड़ने के बाद आदमी स्वयं ही स्वतंत्र हो जाता है। उस पर किसी प्रकार का दबाव नहीं रहता। वरना तो किसी खास आदमी की चाटुकारिता और झूठी प्रशंसा करते रहो वह खास बनाने से रहा। वह तो केवल अपने लिये उपयोग करता है। यह अलग बात है कि कुछ खास लोगों का चमचा होना भी आजकल कोई कम उपलब्धि नहीं है। मगर यह भी सच है कि अपनी आत्मा को मारकर ही चाटुकारिता हो सकती है।
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