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Saturday, July 25, 2009

अंग्रेजी ब्लाग के बीच हिंदी ब्लाग क्या करेगा-आलेख (inglish and hindi blog-hindi article)

विलियम्स नाम के 43 वर्षीय उस मानवाधिकार कार्यकर्ता ने पता नहीं क्या सोचकर इस लेखक के हिंदी ब्लाग को अपने ब्लाग से लिंक कर लिया? उसने सुबह लिंक दिया था तब सोचा कि शायद जल्दबाजी में गलती कर गया होगा। फिर शाम को देखा तो उसका ईमेल टिप्पणी के रूप में देखा। इसका मतलब वह जानता है कि उस ब्लाग में क्या है! उसकी टिप्पणी से पता लग जाता है उसे इसके अध्यात्मिक ब्लाग होने का पता है। उसके ब्लाग पर अपना पाठ देखकर हैरानी हुई। आखिर उसके अंग्रेजी पाठक हिंदी का ब्लाग कैसे पढ़ेंगे? उसकी टिप्पणी नीचे लिखी हुई जिसका पूरा अर्थ देखने के लिये लेखक को भी डिक्शनरी देखनी होगी।
William मुझे
विवरण दिखाएँ ७:०२ am (1 दिन पहले) उत्तर दें
William has left a new comment on your post "भर्तृहरि नीति शतक-चमचागिरी से कोई लाभ नहीं होता (c...":
by the way, Deepak Bartdeep, I will remember to salt the meat for abdominal digestibility also. Just remember oh spiritual leader, human rights apply to you to!
Posted by William to दीपक भारतदीप की हिंदी एक्सप्रेस पत्रिका at 25 July, 2009


यकीनन उसे स्वयं भी हिंदी नहीं आती होगी। उसने जरूर अनुवाद टूल के सहारे उसे पढ़ा है और उसे लगा कि शायद यह ब्लाग भी उसका आवागमन बढ़ाने में सहायक होगा या संभव है कि वह कोई मानवाधिकारों से संबंधित कोई लक्ष्य लेकर बढ़ रहा हो। यह मानना गलत होगा कि वह अंग्रेजी का ब्लाग लेखक है तो उसके पास पाठकों आवगमन अधिक होगा क्योंकि लगातार यह बातें आती रहती हैं कि अनेक ब्लागों को पढ़ने वाला एक ही आदमी है। बहरहाल यह दिलचस्प है कि अंग्रेजी और अंग्रेजों के बीच हिंदी अपनी जगह बनाने का प्रयास कर रही है। इस विषय में एक हिंदी ब्लाग लेखक ने एक दूसरे लेखक के ब्लाग पर यह टिप्पणी की थी कि ‘हिंदी नई भाषा है इसलिये यह आगे निश्चित रूप से बढ़ेगी’। वह शायद भूल गये होंगे पर इस लेखक को याद है।
एक अंग्रेजी ब्लाग लेखक द्वारा हिंदी ब्लाग को लिंक करना कोई बड़ी बात नहीं है पर इस बात का संकेत तो है कि भाषा और लिपि की दीवारें अब कमजोर हो रही है। इस लेखक का यह चैथा ब्लाग है जिसे किसी अन्य भाषा के ब्लाग ने लिंक किया है। तीन अरेबिक लिपि के हैं पर भाषा का पता नहीं है। अलबत्ता वह सभी वर्डप्रेस के हैं इसलिये अधिक विचारणीय नहीं लगता पर यह ब्लाग स्पाट का पहला ब्लाग है जिसे किसी अंग्रेजी ब्लाग लेखक ने लिंक दिया है। ऐसा लगता है कि उस ब्लाग लेखक ने यह उम्मीद की होगी कि अनुवाद टूलों के सहारे उसके पाठक हिंदी भी पढ़ लेंगे। यह भी संभव है कि वह इसी आशा के सहारे हिंदी में भी पाठक ढूंढना चाहता हो।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भविष्य में ब्लाग लेखन पूरे विश्व में एक महत्वपूर्ण सकारात्मक भूमिका निभाने वाले हैं। अनेक सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों का जन्म इन्हीं ब्लाग लेखकों के मध्य से होगा। भाषा और लिपि की दीवारें गिरी तो कई ऐसे भ्रमों और मिथकों का ढहना भी तय है कि जो उनके सहारे टिके हुए हैं। ऐसे में हिंदी की अध्यात्मिक शक्ति ही है जो भाषा को बचाये रख सकती है।
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Sunday, August 17, 2008

चाणक्य नीति:पास और परे होने का सम्बन्ध हृदय से है

1.राजा, अग्नि, गुरु, स्त्री इनसे निकटता खतरनाक होती है। इनसे थोड़ा परे रहकर संपर्क रखना चाहिए। अग्नि, जल, सर्प, मूर्ख, और राजा कभी भी रुष्ट होने पर मनुष्य के प्राण तक ले सकते हैं।
2.सच्चा ज्ञानी तो वही है जो प्रसंग के अनुसार वार्तालाप में अपने तर्क उचित ढंग से प्रस्तुत करता है। वह अनुकूल होने पर प्रेम करता है और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध प्रदर्शन करने वाला भी होता है।
3.हृदय में रहने वाला दूर रहकर भी पास है और हृदय में न रहने वाला पास रहकर भी दूर रहता है। परे और निकट के संबंध का आधार हृदय के भाव से है।
4.जल में तेल पड़ते ही कम होने के बावजूद तेल का विस्तार हो जाता है। उसी तरह दुष्ट के साथ गोपनीय विषय पर की गयी वार्ता विद्युत गति से फैल जाती है। उसी तरह सुदान की चर्चा भी विस्तार पाती है। विस्तार की शक्ति अपने पात्र के कार्य करने पर निर्भर रहती है।
5.निर्धन को पत्नी, मित्र, सेवक, भाई और परिजन सब छोड़ देते हैं।

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Saturday, August 16, 2008

भृतहरि शतक: मूर्खता के निवारण के लिए कोई औषधि नहीं बनी

शक्यो वारयितं जलेन हुतभुक् छत्त्रेण सूर्यातपो
नागेन्द्रो निशितांकुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ
व्याधिर्भैषजसंग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगग्र्विषम्
सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्

हिंदी में भावार्थ-आग का पानी से धूप का छाते से, मद से पागल हाथी का अंकुश से, बैल और गधे का डंडे से, बीमारियों का दवा से और विष का मंत्र के प्रयोग निवारण किया जा सकता है। शास्त्रों के अनेक विकारों और बीमारियों के प्रतिकार का वर्णन तो है पर मूर्खता के निवारण के लिये कोई औषधि नहीं बताई गयी है।
येषा न विद्या न तपो न दानं
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मत्र्यलोके भुवि भारतूवा
मनुष्य रूपेणः मृगाश्चरन्ति।।


हिंदी में भावार्थ-जिन मनुष्यों में दान देने की प्रवृत्ति, विद्या, तप,शालीनता और अन्य कोई गुण नहीं है और वह इस प्रथ्वी पर भारत के समान है। वह एक मृग के रूप में पशु की तरह अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
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