Friday, July 23, 2010

शब्द और भावना-हिन्दी कविता (shabda aur bhavana-hindi poem)

शब्द सुंदर हैं, पर हृदय में नहीं दिखती हैं भावनायें,
आंखें नीली दिख रहीं हैं, पर उनमें नहीं हैं चेतनायें।
प्राकृतिक रिश्ते, कृत्रिम व्यवहार से निभा रहे हैं सभी इंसान,
चमकीले चेहरों का झुंड दिखता है, पर नहीं है उनमें संवेदनायें।
जल में नभ को नाचता देखकर नहीं बहलता उनका दिल
लगता है जैसे लोटे में भरकर उसे अपने ही पेट में बसायें।
कितनी संपदा बटोरी धनियों ने गरीबों का लहू चूसकर
फिर भी हाथ खाली रखते हैं, ताकि उससे अधिक बनायें।
धर्म की रक्षा और जाति की वफा के नारे लगा रहे हैं बुद्धिमान
ज्ञान बिके उनका सदा, इसलिये समाज में भ्रम और भय बढ़ायें।
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Tuesday, July 20, 2010

हमदर्दी की रस्म-हिन्दी व्यंग्य कविता (hamdardi ki rasma-hindi vyangya kavita)

दौलत और शौहरत के सिंहासन पर
बैठे लोगों से हमदर्दी की
उम्मीद करना बेकार है
क्योंकि वह डरे सहमे हैं
अपनी औकात से ज्यादा
मिली कामयाबी के खो जाने के खौफ से ,
और दुनियां का यह कायदा
भूलना मुश्किल है कि
डरपोक लोग ही खूंखार हो जाते हैं।
इसलिये हर हादसे पर
उनकी हमदर्दी जताने को
रस्मी समझ खामोश हो जाते हैं।
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Friday, July 16, 2010

हास्य कविताएँ -भ्रष्टाचार पुराण- (bhrashtachar puran-hindi hasya kavitaen)

भ्रष्टाचार के विरुद्ध निकले
जुलूस में एक आदमी ने दूसरे से पूछा
‘‘यार, एक बात बताओ,
सभी जगह भ्रष्टाचार व्याप्त है,
इतने अभियान चलते हैं
पर नहीं होता यह समाप्त है,
बताओ तुम यह भ्रष्टाचार क्या होता है,
तुमने कभी किसी भ्रष्ट आदमी को देखा है
जिसके खिलाफ नारें लगायें।’’

दूसरे ने कहा-‘भई लगता है
बिना किराया लिये हुए यहां आए हो,
बिना मतलब के अपनी जान फंसाए हो,
भला, भ्रष्टाचार कभी समाप्त हो सकता है,
जिसके पास हो थोड़ी भी ताकत
हरे नोटों की माला पहनने के साथ ही
अपनी तिजोरी भरता है,
यह तो रस्मी जुलूस है,
जो हम अपने नेता के कहने पर करने आये हैं,
अपनी रकम पूरी पाये हैं,
किसी आदमी के खिलाफ नारे लगाकर
उसे क्यों मशहूर बनायें,
वह तुरंत अपनी सफाई देने आयेगा,
मुफ्त में प्रचार पायेगा,
फिर इस हमाम में सब नंगे हैं,
जो नहीं पकड़े गये वही चंगे हैं,
यह बड़े लोगों कराते हैं वह हमें करना है,
वह भरते तिजोरी हमें तो पेट भरना है,
पता कब किससे काम पड़ जाये
इसलिये भ्रष्टाचार के खिलाफ  खूब बोलेंगे
उससे जिनको लाभ है वही मुद्दा तोलेंगे
हम बिना वजह किसी का नाम लेकर
उसे क्यों अपना दुश्मन बनायें।’’
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जब उनसे भ्रष्टाचार पर बोलने के लिये
कहा गया तो वह बोले-
‘‘भ्रष्टाचार वह अमृत है जिसे हर कोई चखता है,
स्वयं पीकर अमर होना चाहता है
हर कोई अपनी सात पीढ़ियां
रखना चाहता है हष्टपुष्ट
पर दूसरे पर वक्र दृष्टि रखता है,
जो पीयें उनकी सात पुश्तें तरती
जो न पीयें उनके बच्चे जन्म भर पछतायें।
इससे ज्यादा हम नहीं समझे
तुम्हें क्या समझायें।’’
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Saturday, July 10, 2010

बेवफाओं की भीड़-हिन्दी व्यंग्य कविता (bevfaon ki bheed-hindi vyangya kavita)

दूसरों में वफा की तलाश करते हुए
गुजार देते हैं लोग पूरी जिंदगी
फिर निराश हो जाते हैं।
पर कोई भी इंसान
अपने अंदर बैठे गद्दार को
मार नहीं पाया
सभी ज़माने में वफादार ढूंढते हुए
बेवफाओं की भीड़ में खो जाते हैं।
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एक तरफ दौलत, शौहरत और ताकत के
सिंहासन पर आका खड़े हैं
दूसरी तरफ चमचे उनकी दरबार में जड़े हैं।
बाकी इंसान तो भेड़ों की तरह चल रहे
जिनके सपने अपनी औकात से बड़े हैं।
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Saturday, July 3, 2010

दौलतमंद को सलाम-हिन्दी हास्य कविता (daulatmand ko salam- hasya kavita

भ्रष्टाचार एक भूत है
जो कभी नहीं मिटता,
क्योंकि कभी नहीं दिखता।
जिसकी जेब में जाता पैसा
वह हक की तरह रखता,
जिसकी जेब से जाता
वह भी कहीं अपना दांव तकता,
ज़माने ने बंद कर ली आंख
हर दौलतमंद को सबका सलाम मिलता यहां
भरे बाज़ार में ईमान कौड़ी के भाव बिकता।
जब नहीं लगा मोल
तभी तक हर कोई उसूलों पर टिकता।
चला जो अमीर बनने की राह पर
इंसानियत का हिसाब भी पैसों में लिखता।
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Sunday, June 6, 2010

क्रिकेट मैचों को दो भागों में बांटा जाये-हिन्दी लेख (cricket match and world cup footbal-hindi lekh)

विश्व कप फुटबाल प्रारंभ हो रहा है और टीवी चैनल वालों की समस्या यह है कि उसमें आसानी से अपना समय खर्च कर कमाने का प्रयास जरूरी है पर देश मे यह खेल इतना लोकप्रिय नहीं है। अगर देश में यह खेल लोकप्रिय नहीं है तो टीवी चैनल चाहें तो उससे मुंह फेर लें पर वह ऐसा भी नहीं कर सकते क्योंकि उनको विदेशी चैनलों की बराबरी करते दिखना भी जरूरी लगता है। इसलिये फुटबाल के लिये दर्शक जुटाने का प्रयास प्रारंभ कर दिये हैं। यह प्रयास फलीभूत नहीं भी हों तो भी वह फुटबाल के प्रसारण पर समय खर्च करने के अपने प्रयास को सही तो वह साबित कर ही सकते हैं इसलिये उन्होंने उसके प्रचार क्रिकेट से अपने माडल चुन लिये हैं। एक तो पुराना क्रिकेट कप्तान है जो बता रहा है कि ‘वह रात भर इन मैचों के लिये जागेगा।’
ऐसा नहीं है कि भारत में फुटबाल खेल की लोकप्रियता कोई शून्य के स्तर पर है पर वह जनमानस में क्रिकेट इतना नहीं जाना जाता जिस पर लोग अपना ढेर सारा फालतू वक्त बरबाद कर सकें। बंगाल में तो बहुत समय तक फुटबाल का जादू चला है। ईस्ट बंगाल, मोहम्मडन स्पोर्टिंग तथा मोहन बागान नाम के प्रसिद्ध क्लब रहे हैं जिन्होंने लंबे समय तक पूर्वी क्षेत्र में फुटबाल को लोकप्रिय बनाया। स्थिति यह थी कि देश के सभी समाचार पत्र उन प्रदेशों में भी अपने खेल पृष्ठों पर उनके मैचों के समाचार देते थे जहां यह खेल बिल्कुल नहीं खेला जाता। कम खेले जाने के बावजूद स्थिति यह थी कि बंगाल के इन फुटबाल खिलाड़ियों के इतना पैसा मिलता था कि उनमें से कुछ राष्ट्रीय टीम के लिये खेलने से कतराते थे। उनसे समय निकालकर देश के लिये खेलने का आग्रह किया जाता था। कालांतर में वहां के कुछ खिलाड़ियों देश की टीम को ऊंचे स्तर पर पहुंचाने का प्रयास किया भी पर नाकाम रहे।
उस समय के अखबार लिखते थे कि देश में फुटबाल का स्तर चाहे कुछ भी हो पर अनेक देशों के खिलाड़ियों के मुकाबले भारतीय क्लब के खिलाड़ी अधिक कमाते हैं। लगता है कि क्रिकेट भी अब इसी राह पर चल पड़ा है।
कल त्रिकोणीय मुकाबले में भारत अपना तीसरा मैच हारकर प्रतियोगिता से बाहर हो गया। टीम के खिलाड़ियों के नये या अनुभवी होने का बहाना सरलता से किया जा सकता है पर सच तो यह है कि वरिष्ठ खिलाड़ियों की उपस्थिति भी इस परिणाम को बदल नहीं सकती थी। अब विश्व कप क्रिकेट होने वाला है और उसमें आप देखना यह वरिष्ठ खिलाड़ी क्या कर पाते हैं?
अभी बीस ओवरीय विश्व कप में भी हमने देखा था कि देश की व्यवसायिक प्रतियोगिता में भारी धन लेकर खेलने के आदी हो चुके इन खिलाड़ियों के लिये अब यह संभव नहीं रहा कि वह इन प्रतियोगिताओं को गंभीरता से लें जो अधिक पैसा नहीं देती। कहने को तो यह कहा जा रहा था कि आईपीएल से भारतीय क्रिकेट को फायदा होगा पर उससे होने वाली हानि का अंदाजा किसी को नहीं था। पहले खिलाड़ी राष्ट्रीय प्रतियागिताओं में इसलिये खेलते थे कि देश की टीम में जगह मिले पर अब इसलिये खेल रहे हैं ताकि आईपीएल में जगह मिले। मानसिकता का अंतर आ गया है। वह दोहरी मानसिकता का शिकार हो रहे हैं। अगर वह क्रिकेट से प्रतिबद्ध होते तो चाहे जहां खिला लो वह अपना स्वाभाविक खेल दिखाते पर उनकी प्रतिबद्धता अधिक से अधिक पैसा बटोरना है। यह भावना बुरी नहीं है पर मुश्किल यह है कि क्रिकेट अब उनके लिये धर्म नहीं कमाऊ कर्म रह गया है और अंतर्राष्ट्रीय मैचों मेें यह जज़्बात अधिक देर नहीं चलते।
भारतीय खिलाड़ी दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन या आस्ट्रेलिया की तरह नहीं है जो हर हाल में व्यवसायिक रहते हैं चाहे अधिक पैसा मिले या कम। कहंी न भी मिले तो अपना स्वाभाविक खेल नहीं छोड़ते। यहां तो भारतीय खिलाड़ी अपनी भौतिक उपलब्धियों के बोझ तले दबे जा रहे हैं। कई खिलाड़ी तो केवल इसलिये खेल रहे हैं कि उनका नाम चलता रहे ताकि विज्ञापन का दौर बना रहे।
हम यह नहीं कहते कि व्यवसायिक प्रतियोगिता बंद होना चाहिये मगर अब क्रिकेट को दो भागों में बंटना होगा। एक व्यवसायिक तथा दूसरा अंतराष्ट्रीय! कम से कम भारत में तो यही करना पड़ेगा। टेस्ट मैच, एक दिवसीय तथा बीस ओवरीय मैचों के लिये अलग अलग टीम रखनी होगी क्योंकि इन तीनों का प्रारूप ही अलग है और यह बात तो विशेषज्ञ भी मानते हैं।
व्यवसायिक खिलाड़ियों का बूता नहीं है कि वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता जितवा सकें।
खिलाड़ियों के चयन का आधार भी रणजी ट्राफी और देवधर ट्राफी रखना चाहिये। व्यवसायिक प्रतियोगिताओं में हारने से खिलाड़ी की हार से किसी पर कोई अंतर नहीं पड़ता पर जब देश का नाम आता है तो दुःख होता है। चूंकि भारत की क्रिकेट नियंत्रण करने वाली संस्था अब पूरी तरह व्यवसायिक हो गयी है इसलिये सरकार को अपने देश के नाम पर चुनी जाने वाली टीम के चयन में हस्तक्षेप करना ही चाहिए। ऐसे में अव्यवसायिक खिलाड़ियों को चुनना चाहिये जो क्षेत्ररक्षण या बल्लेबाजी के साथ ही गेंदबाजी में जान लगाकर खेलते हैं। व्यवसायिक प्रतियोगिता मं पैसा कमाने के आदी हो चुके खिलाड़ियों का तो अब एक ही क्ष्य रह गया है कि कथित रूप से अंतराष्ट्रीय मैचों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराओ, एक दो मैचा अच्छा खेलो ताकि व्यवसायिक प्रतियोगिता के किसी क्लब में अपनी नीलामी हो सके। जबकि देश के लिये खेलने के लिये स्वाभिमान की भावना जरूरी है।
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Sunday, May 30, 2010

पीने वाले-हिन्दी शायरी (peene vale-hindi shayari)

उनसे पूछा गया कि
‘शराबी लोगों पर आप क्यों भरोसा नहीं करते,
उनके प्रति अविश्वास का भाव क्यों भरते,
क्या वह इंसान नहीं है,
आखिर पीने वाले भी इंसान हैं,
जरूरी नहीं जाम हलक से उतारने वाला
हर शख्स बेईमान है,
फिर हर कोई पीता है अपने पैसे से
किसी दूसरे को एतराज उठाने का अधिकार नहीं है।’

उन्होंने जवाब दिया
‘अगर हमने पी नहीं होती तो
कभी यह सच बयान नहीं करते
कि पीते भले ही लोग हैं शाम को हैं,
पर दिन मे भीं उसकी याद में आह भरते,
छोड़ने पर पता चला कि
हम पीते हुए यकीन के काबिल नहीं थे,
दोस्त बहुत बने, पर उनके दिल नहीं थे,
वादे करके हम भी खूब आते थे,
नहीं निभायेंगे, यह यकीन साथ लाते थे,
अपनी कहानी का अंत
हम दूसरों पर इसलिये जताते हैं,
क्योंकि पीने पर सभी के ख्याल
एक जैसे ही पाते हैं,
साफगोई इसलिये आ गयी है
क्योंकि अब हमारे अंदर नशे का विकार नहीं है।
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Wednesday, May 26, 2010

मुफ्त का मजा-हिन्दी शायरी (muft ka mazaa-hindi shayari)

सिंहासन पर बैठे लोगों को
फरिश्ता क्यों समझ जाते हो,
उनके गुलामों की महफिल में
बजता है चमचा राग
उसे संगीत समझ कर बहल क्यों जाते हो।
बिकती है इंसानों की अदायें भी
पर्दे पर देख कर दृश्य
असली जिंदगी से तोलने क्यों लग जाते हो।
सर्वशक्तिमान को जोर से भोंपू बजाकर
जगाने के आदी लोगों की भ्रमित भीड़ में
अपने यकीन के साथ क्यों जाते हो?
मुफ्त का मजा दिल के अंदर ही है
अपनी आंखों से अंदर ही झांको
बाहर तलाशने में भटकते क्यों जाते हो।

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Saturday, May 22, 2010

सम्मेलन-हिन्दी व्यंग्य कविता (sammelan-hindi vyangya kavita)

सम्मेलन में
कुछ रूठे इस उम्मीद में गये कि
कोई उन्हें मना लेगा
कुछ टूटे दिलों ने आसरा किया कि
कोई उन्हें फिर बना लेगा,
मगर वहां जमी महफिल में
सभी चीख रहे थे
गुर्राने के नये नये तरीके सीख रहे थे,
सद्भाव के नाम संघर्ष दिखने लगा।
सभी ने अपनी अपनी कही,
दूसरे की सलाह भी सही,
तय किया ज़माने में नश्तर चुभोने का,
अपने को छोड़कर सभी को डुबोने का,
फिर कोई अगले सम्मेलन की तारीख लिखने लगा।

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Sunday, May 16, 2010

इस तरह की चर्चायें कन्या भ्रुण हत्यायें रोकना कठिन बना सकती हैं-हिन्दी लेख (public disscution and kanya bhrun hataya)

अगर कुछ ब्लाग लेखकों के पाठ की बातों पर यकीन किया जाये तो फिर उस पत्रकार युवती की हत्या/आत्महत्या का मामला न रहकर अनेक विषयों पर बहस का रह गया है। हमारे देश में कथित रूप से विकासवादी तथा मनुष्यवादी बुद्धिजीवियों का प्रचार माध्यमों, विश्वविद्यालयों के साथ ही सामाजिक संगठनों पर भी वर्चस्व है और उनकी नीति यह है कि मरे हुए आदमी पर अपनी शोक रचनायें रचो और उसके लिये किसी जिंदा आदमी खलनायक बनाओ। अगर कोई नारी मर जाये तो नारीवादी उसके लिये शिकार ढूंढते हैं भले ही वह नारी हो! बहु मरे तो सास बेटी मरे तो मां और बहिन मरे तो बहिन के खिलाफ जंग छेडते हुए उनको संकोच नहीं  होता।
वह एक युवती युवा पत्रकार थी जो बिहार के छोटे से शहर दिल्ली आई। यहां महानगर संस्कृति का आकर्षण को झेल नहीं पायी और जवानी की मस्ती में डूब गयी। पत्रकार प्रेमी से शादी की तारीख तय हुई पर वह नहीं हुई-मामले में यह सबसे बड़ा पैंच है। उच्च जाति की लड़की का विवाह अपने से कम जाति के लड़के से हो यह मां बाप को मंजूर नहंी था-यह प्रचार भी काल्पनिक लगता है क्योंकि प्रेमी की जाति को नीची तो नहीं माना जा सकता। लड़की गर्भवती थी और संदिग्ध हालत में उसकी उस समय मौत हो गयी जब वह घर में मां के साथ अकेली थी। कहना कठिन है कि वहन क्या हुआ पर सार्वजिनक रूप से जिस तरह इस उसके परिवार को लांछित किया जा रहा है वह गलत है।
पत्रकार प्रेमी ने दिल्ली में बैठक होहल्ला मचाया तो मां के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हो गया। टीवी चैनलों पर बहस शुरु हो गयी। देश की जाति पाति और धर्म व्यवस्था को लेकर-यह भुला दिया गया कि गर्भवती होने के बाद यह विषय महत्वपूर्ण  नहीं  रहा था। जांच आगे बढ़ी तो पता लगा कि लड़की की आत्महत्या की बात तो पुलिस ने पहले ही मान ली थी पर दिल्ली से प्रचार माध्यमों के दबाव के चलते उसे हत्या का मामला बनाना पड़ा। अब पुलिस आत्महत्या के लिये उकसाने, धोखा देने तथा बलात्कार करने का मामला उसके पत्रकार प्रेमी पर दायर कर रही है। इसका मतलब यह है कि एक मौत पर दो अलग तरह के मामले बने हैं जो शायद कानूनी रूप से कुछ उलझन भरे हो सकते हैं।
इधर एक ब्लाग लेखक ने लड़की के पड़ौसियों के हवाले से दावा किया है कि यह आत्महत्या ही है क्योंकि उसकी एक पड़ौसन ने उसे सुबह देखा था तब वह उदास थी और उसके बाद ही यह घटना हुई। उस ब्लाग लेखक ने पत्रकार प्रेमी पर भी तमाम तरह की उंगलियां उठाई हैं।
हम यहां इन बहसों में दिये जा रहे तर्कों का खंडन या समर्थन नहीं कर रहे बल्कि ऐसे मामलों में सार्वजनिक रूप से चर्चाओं का परिणामों पर विचार करें तब लगेगा कि हम अनजाने में लोगों के अंदर आतंक का भाव बढ़ा रहे हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट हत्या तथा आत्महत्या दोनों का इशारा कर रही है। वह भी ढंग से नहीं हुआ यह भी कहा जा रहा है। इधर दिल्ली में जन और प्रगतिवाद का दंभ भरने वाले बुद्धिजीवी इस तरह प्रदर्शन कर रहे हैं जैसे कि लड़की के हत्यारे माता पिता हों। एक बार शादी तय होकर स्थगित होने के मामले में वह नहीं जाना चाहते। वह इन संभावनाओं पर विचार नहीं करते कहीं घर से सहमति के नाम पर लड़की के माता पिता से दहेज ऐंठने का तो प्रयास नहीं हो रहा था। यह खतरनाक खेल है। इससे समाज में पहुंचने वाले संदेशों पर निगाह करें तो यकीनन वह कन्याओं की माताओ, पिताओं और भाईयों के लिये चिंता बढ़ाने वाले हैं।
वैसे ही अपने देश में कन्या भ्रुण हत्याओं को लेकर चिंतायें बढ़ रही है। अभी तक इसके लिये देश की दहेजप्रथा को माना जाता था पर ऐसी घटनाओं पर सार्वजनिक
बहस लोगों के मन में यह धारण बढ़ायेगी कि लड़कियों का जीना ही नहीं मरना भी अब तनाव का कारण बन सकता है। अगर उनकी लड़की किसी लड़के के प्रेम के चक्कर में पड़ी तो वह आत्महत्या कर ले तो वह उनको हत्या के जुर्म में भी फंसा सकता है और सबसे बड़ी बात यह कि उसकी मदद के लिये एक समूह भी मौजूद है। इसके अलावा यह भी हो सकता है कि जिन परिवारों में कन्यायें हैं वहां उनके माता पिता और भाई घर से बाहर निकलकर नौकरी करने या पढ़ने से प्रतिबंध लगा सकते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि कालांतर में लड़कियों को ही बुरे नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। वैसे भी इस प्रकरण से एक बात समझ में आयी है कि प्राचीन घूंघट प्रथा हो या आधुनिक परंपरा की मस्ती उसके दुष्परिणाम लड़की को भी भोगने पड़ते हैं। हमारे पुराने विद्वान सही कहते हैं कि लड़की इज्जत पीतल के लोट की तरह है जो एक बार खराब होकर धुल जाता है जबकि लड़की इज्जत कांच की तरह है एक बार टूटी तो फिर नहीं जुड़ती। फिर अपनी लड़की की सार्वजनिक चर्चा किसी भी परिवार को मानसिक कष्ट देती है। इस तरह किसी मृत लड़की को न्याय दिलाने के लिये प्रदर्शन जीवित लड़कियों के लिये परेशानी का कारण बन सकता है। मुश्किल यह है कि कुछ कथित बुद्धिजीवियों को समझाना कठिन है वह तो मृतकों के शोक पर ही अपने ख्यालों तथा आदर्शों को रोटी की तरह पकाते हैं।
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Wednesday, May 12, 2010

पुराने नायक, नये खलनायक-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (purane nayak, naye khalnayak-hindi vyangya kaivtaen)

राजशाही लुट गयी
लुटेरे बन गये
ज़माने के खैरख्वाह।
उठाये थे पहले भी गरीब
साहुकारों का बोझ
भले ही भरकर रह जाते थे आह,
अब भी कहर बरपा रहे
लुटेरे तमंचों के जोर पर रोज
फिर भी बोलना पड़ता है वाह वाह।
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इतिहास क्यों पुराना सुनाते हो,
यहां घट रहा है रोज नया घटनाक्रम
तुम पुरानी कथा क्यों सुनाते हो।
पढ़ लिखकर किताबें क्यों ढूंढ रहे हो
जमाने को दिखाने का रास्ता,
अपनी खुद की सोच बयान करो
मत दो रद्दी हो चुके ख्यालों का वास्ता,
पुराने समय के नायकों की याद में
नये खलनायकों की चुनौती क्यों भुलाते हो।
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Sunday, May 9, 2010

टी-ट्वंटी में बीसीसीआई टीम का तमाशा खत्म-हिन्दी लेख (T-20 world cricket cup-hindi article)

वेस्टइंडीज ने बीसीसीआई की क्रिकेट टीम को बीस ओवरीय प्रतियोगिता में हराकर लगभग बाहर कर दिया हैै और श्रीलंका से आखिरी मैच केवल औपचारिक ही रह गया है।
आईपीएल में भारी कमाई कर चुके बीसीसीआई के खिलाड़ी उसका बोझ बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता में नहीं उठा पायेंगे इसका अनुमान पहले ही अनेक लोगों ने कर लिया था। भारतीय क्रिकेट विशेषज्ञ जानते थे कि शारीरिक थकान और धन के बोझ तले बीसीसीआई क्रिकेट टीम के अधिकांश खिलाड़ी उतने उत्साह से नहीं खेल पायेंगेे जिससे कि विश्व कप जीता जा सके। आज वेस्टइंडीज से हारने के बाद भारत विश्व कप की दौड़ से बाहर हो गया है।
अधिकतर प्रचार माध्यमों में व्यवसायिक विशेषज्ञ पुराने क्रिकेट खिलाड़ी होते हैं पर वह बजाय क्रिकेट के अपने प्रायोजकों के प्रति अधिक समर्पण दिखाते हैं। यह भी संभव है कि उनको दूसरे देशों की टीमों की तैयारी का आभास न रहता हो और उनके ध्यान में केवल भारत और पाकिस्तान दोनों ही देश बसते हैं। इसमें से एक क्रिकेट विशेषज्ञ ने सेमीफायनल ने में चार टीमों में आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, भारत तथा पाकिस्तान का नाम लिया था। उस समय लगा था कि हमारे देश में क्रिकेट के नाम पर कोरे लोग ही बसते हैं क्योंकि उनको लगता है कि चूंकि एशिया के खिलाड़ी कमा खूब रहे हैं इसलिये शायद यही क्रिकेट खेला जाता है। सच बात तो यह है कि पहले तथा दूसरी बीस ओवरीय विश्व कप तक दूसरे देश इस प्रतियोगिता को गंभीरता से नहीं ले रहे थे पर आईपीएल में पैसे के भारी आकर्षण में विदेशी खिलाड़ी अब इस विश्व कप की तैयारी अच्छी करने लगे हैं क्योंकि उनको लगता है कि इससे भारत में क्रिकेट क्लबों के स्वामी उनकी नीलाम बोली अच्छी लगायेंगे। यही कारण है बीस ओवरीय प्रारूप में पाकिस्तान और बीसीसीआई की टीमें अब वैसी मजबूत नहीं मानी जाती जैसे पहले थी। इस प्रतियोगिता में भारत और पाकिस्तान अब सेमीफायनल से लगभग बाहर हो गये हैं।
अब तो यह देखना है कि क्रिकेट में भारत की लोकप्रियत का क्या हाल होता है? इसके बावजूद भी लोग क्रिकेट देखते हैं तो यह मानना पड़ेगा कि यहां केवल पैसा खेलता है, खेल नहीं। दूसरी बात लोग खेल का मतलब हीं नहीं समझते, जो बड़े लोग थोप दें वही खेलने लगते हैं जैसे अंग्रेज इस देश को क्रिकेट का खेल थोप गये हैं जिसे केवल आठ देश ही खेलते हैं। क्रिकेट गुलामों का खेल है और हमारे देश् के लोग गुलामी की मानसिकता के साथ जीने के आदी हो चुके हैं।
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Sunday, May 2, 2010

समाज सेवा और अपराध-हिन्दी क्षणिकायें (social service and crime-hindi short poem)

समाज सेवा शुरु करने से पहले
कोई न कोई अपराध करना जरूरी है,
लोग देते हैं डर कर चंदा
कभी नहीं पड़ता धंधे में मंदा,
घी निकालने के लिये टेढी उंगली की तरह
चलना आजकल की मजबूरी है।
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नैतिकता की बातें करते वह लोग,
दौलत पाने की चाहत का लगा जिनको रोग।
सिमट गया है शिखर पुरुषों का दायरा
वाद और नारों के इर्दगिर्द,
खुद हो गये हैं सफेदपोश
काले करनामों अंजाम दे रहे उनके शागिर्द,
लोगों को त्याग करने की क्या प्रेरणा देंगे
अपने लिये जुटा रहे ढेर सारे भोग।
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दुःख इस बात का नहीं कि
वह अपने वादे से मुकर गये,
तकलीफ इस बात ये हुई,
वह अपना यकीन हमारे यहां खो गये।
चेहरे पर नकाब पहनकर धोखा देते तो
कोई बात नहीं थी,
पर हमारे अरमान का कत्ल कर
वह झूमकर नाचे
जैसे खुद शहंशाह हो गये।
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Wednesday, April 28, 2010

पर इसे रहस्य रखना है-हिन्दी शायरी (rahasya-hindi shayari)

चारों तरफ से बरस रहा है पैसा
पर इसे रहस्य रखना है,
उंगली के इशारे पर कत्ल कराना
पर इसे रहस्य रखना है,
लुट लो खज़ाना जमाने का
पर इसे रहस्य रखना है,
लोगों से वफा का दिखावा, मतलब अपना निकालना
पर इसे रहस्य रखना है,
दुश्मन ने कमजोरी देख ली
पर इसे रहस्य रखना है,
रहस्य एक हथियार की तरह है
पर इसे रहस्य रखना है।
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Sunday, April 25, 2010

ढाई कौड़ी की सोच-हिन्दी हास्य व्यंग्य

एक सरकारी अधिकारी के यहां छापा मारकर ढाई हजार करोड़ की अवैध संपत्ति का पता लगाया गया। डेढ़ टन सोना बरामद किया। यह खबर अखबार में पढ़कर अपने तो होश ही उड़ गये-आजकल अक्सर ऐसा होने लगा है।
हम सोचने लगे कि इतने सारी संपत्ति वह अधिकारी संभालता कैसै होगा। अपने से तो ढाई हजार रुपये की रकम हीं नहीं संभलती। पहले तो इतनी बड़ी रकम साथ लेकर निकलते ही नहीं-कुछ तो लेकर निकलते ही हैं क्योंकि इतने बड़े आदमी नहंी है कि साथ में सचिव वगैरह हो खर्च करने के लिये या लोग मुफ्त सेवा के लिये आतुर रहते हों-अगर साथ लेकर निकलते ही हैं तो कुछ पर्स में रखेंगे, कुछ पेंट की अंदरूनी जेब में तो कुछ शर्ट की जेब में और बाकी पेंट की दायीं जेब में।
इसके चलते एक बार हमें अपमानित भी होना पड़ा जब हमारा पर्स खो गया तो एक टूसीटर चालक वापस करने आया। उसमें एटीएम कार्ड था जो गरीब होने की छबि से बचाता है, इसलिये शर्मिंदा होने से बचे और और उस टूसीटर चालक ने कहा भी था कि ‘आपका एटीएम देखकर वापस करने का मन हुआ था वरना तो उसमें एक भी पैसा भी नहीं था जिससे वापस करने का विचार करता।’
कभी एक साथ ढाई लाख की रकम नहीं देखी इसलिये ढाई करोड़ जैसा शब्द ही डरा देता है। ऐसे में उसके साथ सौ का शब्द तो अंदर तक हिला देता है। देश की विकासदर बढ़ रही है पर अपनी विकास दर स्थिर है इसलिये यह सौ करोड़ या हजार करोड़ शब्द ही मातृभाषा हिन्दी से पृथक किसी दूसरी भाषा के शब्द प्रतीत होते हैं। उस समय सोच के दरवाजे ही बंद हो जाते हैं।
एक समय तक इस देश में करोड़ की रकम भ्रष्टाचार में पकड़े जाने तक सम्मानजनक मानी जाती थी। उसके बाद सौ करोड़ अब तो हजार करोड़ों से नीचे बात ही कहां होती है। वैसे आजकल अधिकारियों के पकड़े जाने की चर्चा खूब होती है। इसमें कुछ गरीब अधिकारी भी फंसे हैं जिनके पास सौ करोड़ के मानक में संपत्ति थी।
जब ऐसी खबरे आती हैं तो हमें कुछ देर लगता है कि जैसे वह इस धरती की चर्चा नहीं होगी कहीं स्वर्ग वगैरह का मामला होगा वरना यहां हजार करोड़ रखने की किसके पास ताकत होगी-यह तो ऊपर वाले देवताओं की कृपा हो सकती है जो स्वर्ग में ही रहते हैं। फिर शहर और प्रदेश देखते हैं तो यकीन करना ही पड़ता है कि इस धरती पर भी दूसरी दुनियां है जिसमें केवल पैसे वाले रहते हैं और भले ही उन सड़कों पर घूमते हों जहां से हम भी निकलते हैं पर उनको न हम जैसे लोग दिखाई देते हैं और न वह इनको देख पाते हैं। इतने हजार करोड़ों रुपये के मालिक भला खुले में निकल कहां सकते हैं? उनको तो चाहिये लोहे लंगर के बने हुए चलते फिरते किले।
प्रेम के ढाई आखर पढ़ ले वही पंडित बन जाये, पर जिससे पंडित नहीं बनना हो वह ढाई में सौ का गुणा करते हुए इस मायावी दुनियां में बढ़ता जाये। मुश्किल हम जैसे लोगों की है जिनके पास यह गुणा करने की ताकत नहीं है।
डेढ़ टन सोना। कर लो बात! यहां अपने घर में डेढ़ तोले सोने पर ही बात अटक जाती है। हमारे मित्र को अपने पत्नी के लिये सोने की चूड़ियां बनवानी थी। एक दिन हम से उसने कहा-‘अभी तय नहीं कर पा रहा कि एक तोले की चार चूड़ियां बनवाऊं या डेढ़ डेढ़ तोले की दो।’
हमने कहा-‘क्या यार। अभी भी एक ड़ेढ तोले पर ही अटके हुए हो। सोना तो विनिवेश करने एक अच्छा साधन है। दो दो तोले की चार बनवा लो।’
वह बोला-‘यार, औरतों को पहननी भी तो पड़ती हैं। भारी हो जाती हैं।’
सोना पहनने में भारी होता है पर रखने में नहीं। आम औरतें सोना पहनने के लिये लेती हैं ताकि समाज में उनकी अमीरी का अहसास बना रहे। विशिष्ट लोगों की औरतों में तो अब सोना पहनने का शौक नहीं रहा। शायद इसका कारण यह है कि किसी वस्तु अधिकता से बोरियत हो जाती है-यह अर्थशास्त्र के उपयोगिता नियम के अनुसार विचार है- अपने घर में टनों सोना देखकर उनका मन वैसे ही भर जाता है तब उसके गहने बनवाने का विचार उनको नहंी आता। वैसे ही उनका रौब इतना रहता है कि अगर गहने न भी पहने तब भी आम लोग उनकी अमीरी का लोहा मानते हैं। ऐसी औरतों के पति अगर बड़े पद पर हों तो वह सोने की बरफी-बिस्कुट भी कह सकते हैं-बनाने वाले हलवाई हो जाते हैं जो अपना माल खुद उपभोग में नहीं लाते। उनके घर की नारियां भी ऐसे ही हो जाती हैं कि क्या अपने पति का बना माल खाना’।
हद है यार! क्या लिखें और क्या कहें! ढाई हजार करोड़ रुपये की संपत्ति और डेढ़ टन सोने की मात्रा देखते हुए अपनी औकात नहीं लगती कि उस पर कुछ लिखें। मुश्किल यह है कि जिनकी औकात है वह लिखेंगे नहीं क्योंकि उनको तो अपने गुणा भाग से ही फुरसत नहीं होती। यह लिखने का काम तो ढाई कौड़ी के लेखक ही करते हैं-यकीनन इतनी औकात तो अपनी है ही। अपनी आंखें ढाई हजार पर ही बंद हो जाती हैं पर ऐसे महानुभाव तो गुण पर गुणा करते हुए बढ़ते जाते हैं। आखिर उनको जिंदा रहने के लिये कितना पैसा चाहिये। यह सोचकर ही हमारी सोच भी जवाब देने लगती है वह भी तो ठहरी आखिर ढाई कौड़ी की।
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Wednesday, April 21, 2010

मशहूर-हिन्दी शायरी (mashahur or famous-hindi shayri)

कुछ इंसानों के दौलतमंद बनने के किस्से
ज़माने में मशहूर हो जाते हैं
क्योंकि गरीब दुनियां में हैं ज्यादा
उनमें दिल लगाने को मजबूर हो जाते हैं।
अवाम भटके अक्ल की राह,
देख भरे हस्तियों को आह,
काबू में रखने के लिये भीड़ को
सौदागर बेचते हैं सपने
जिन्हें देखते देखते हुए
लोग अपनी असलियत से दूर हो जाते हैं।
कुछ खामोशी से झेलते हैं तकलीफ
कुछ खंजर लेकर मशहूर हो जाते हैं।
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Thursday, April 15, 2010

किक्रेट में सब चलता है-हिन्दी व्यंग्य (it's cricekt-hindi satire article)

उफ! यह क्रिकेट है! इस समय क्रिकेट खेल को देखकर जो विवाद चल रहा है उसे देखते हुए दिल में बस यही बात आती है कि ‘उफ! यह क्रिकेट है!
इस खेल को देखते हुए अपनी जिंदगी के 25 साल बर्बाद कर दिये-शायद कुछ कम होंगे क्योंकि इसमें फिक्सिंग के आरोप समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपने के बाद मन खट्टा हो गया था पर फिर भी कभी कभार देखते थे। इधर जब चार वर्ष पूर्व इंटरनेट का कनेक्शन लगाया तो फिर इससे छूटकारा पा लिया।
2006 के प्रारंभ में जब बीसीसीआई की टीम-तब तक हम इसे भारत की राष्ट्रीय टीम जैसा दर्जा देते हुए राष्ट्रप्रेम े जज्बे के साथ जुड़े रहते थे-विश्व कप खेलने जा रही थी तो सबसे पहला व्यंग्य इसी पर देव फोंट में लिखकर ब्लाग पर प्रकाशित किया था अलबता यूनिकोड में होने के कारण लोग उसे नहीं पढ़ नहीं पाये। शीर्षक उसका था ‘क्रिकेट में सब कुछ चलता है यार!’
टीम की हालत देखकर नहंी लग रहा था कि वह जीत पायेगी पर वह तो बंग्लादेश से भी हारकर लीग मैच से ही बाहर आ गयी। भारत के प्रचार माध्यम पूरी प्रतियोगिता में कमाने की तैयारी कर चुके थे पर उन पर पानी फिर गया। हालत यह हो गयी कि उसकी टीम के खिलाड़ियों द्वारा अभिनीत विज्ञापन दिखना ही बंद हो गये। जिन तीन खिलाड़ियों को महान माना जाता था वह खलनायक बन गये। उसी साल बीस ओवरीय विश्व कप में भारतीय टीम को नंबर एक बनवाया गया-अब जो हालत दिखते हैं उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है क्योंकि क्रिकेट के सबसे अधिक ग्राहक (प्रेमी कहना मजाक लगता है) भारत में ही हैं और यहां बाजार बचाने के लिये यही किया गया होगा। उस टीम में तीनों कथित महान खिलाड़ी नहीं थे पर वह बाजार के विज्ञापनों के नायक तो वही थे। एक बड़ी जीत मिल गयी आम लोग भूल गये। कहा जाता है कि आम लोगों की याद्दाश्त कम होती है और क्रिकेट कंपनी के प्रबंधकों ने इसका लाभ उठाया और अपने तीन कथित नायकों को वापसी दिलवाई। इनमें दो तो सन्यास ले गये पर वह अब उस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में खेलते हैं। अब पता चला है कि यह प्रतियोगिता तो ‘समाज सेवा’ के लिये आयोजित की जाती है। शुद्ध रूप से मनोरंजन कर पैसा बटोरने के धंधा और समाज सेवा वह भी क्रिकेट खेल में! हैरानी होती है यह सब देखकर!
आज इस बात का पछतावा होता है कि जितना समय क्रिकेट खेलने में बिताया उससे तो अच्छा था कि लिखने पढ़ने में लगाते। अब तो हालत यह है कि कोई भी क्रिकेट मैच नहीं देखते। इस विषय पर देशप्रेम जैसी हमारे मन में भी नहीं आती। हम मूर्खों की तरह क्रिकेट देखकर देशप्रेम जोड़े रहे और आज क्रिकेट की संस्थायें हमें समझा रही हैं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। यह अलग बात है कि टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाओं जब भारत का किसी दूसरे देश से मैच होता है तो इस बात का प्रयास करते हैं कि लोगों के अंदर देशप्रेम जागे पर सच यह है कि पुराने क्रिकेट प्रेमी अब इससे दूर हो चुके हैं। क्रिकेट कंपनियों की इसकी परवाह नहीं है वह अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की आड़ में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव के दर्शक ढूंढ रहे हैं। इसलिये अनेक जगह मुफ्त टिकटें तथा अन्य इनाम देने के नाम कुछ छिटपुट प्रतियोगितायें होने की बातें भी सामने आ रही है। बहुत कम लोग इस बात को समझ पायेंगे कि इसमें जितनी बड़ी राशि का खेल है वह कई अन्य खेलों का जन्म दाता है जिसमें राष्टप्रेम की जगह राष्ट्रनिरपेक्ष भाव उत्पन्न करना भी शामिल है।
कभी कभी हंसी आती है यह देखकर कि जिस क्रिकेट को खेल की तरह देखा वह खेलेत्तर गतिविधियों की वजह से सामने आ रहा है। यह क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में ऊपर क्या चल रहा है यह तो सभी देख रहे हैं पर जिस तरह आज के युवा राष्ट्रनिरपेक्ष भाव से इसे देख रहे हैं वह चिंता की बात है। दूसरी बात जो सबसे बड़ी परेशान करने वाली है वह यह कि इन मैचों पर सट्टे लगने के समाचार भी आते हैं और इस खेल में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव पैदा करने वाले प्रचार माध्यम यही बताने से भी नहीं चूकते कि इसमें फिक्सिंग की संभावना है। सब होता रहे पर दाव लगाने वाले युवकों को बर्बाद होने से बचना चाहिेए। इसे मनोंरजन की तरह देखें पर दाव कतई न लगायें। राष्ट्रप्र्रेम न दिखायें तो राष्ट्रनिरपेक्ष भी न रहे। हम तो अब भी यही दोहराते हैं कि ‘क्रिकेट में सब चलता है यार।’
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Friday, April 9, 2010

डर है घर के नादानों से-हिन्दी शायरी (ghar ke nadan-hindi shayri)

घाव थोड़ा हो वह ज्यादा दिखलाते हैं,
भला करने वाले इसलिये कहलाते हैं।
लाल स्याही से लिखते, जमाने का बयान,
जंग का इनाम अमन बताते हैं।
रहबर हो गये कुर्बाल, जमाने के लिये
वह उनके उसूलों
पर उंगली उठाते हैं।
वातानुकूलित कक्षों मे रहते, कारों में जाते हुए
बदनसीबों की बदहाली से अपनी नज़र मिलाते हैं।
जवानी से बुढ़ापे तक, किया पाखंड का सौदा
जमीन पर बिखरे जवां खून में भी वह फर्क दिखाते हैं।
कहें दीपक बापू, दुश्मन इतने खतरनाक नहीं
डर है घर के नादानों
से, जो अपनी नीयत छिपाते हैं।
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कैमरा था जब उनके सामने
बेबसों के कत्लेआम पर वह आंसु बहा रहे थे।
जो उससे हुए दूर तो
शराब खाने में मुस्कराते हुए जाम में नहा रहे थे।
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Sunday, April 4, 2010

मोहब्बत के जज़्बात-हिन्दी शायरी (mohbbat ke jazbat-hindi shayri)

इश्क के चर्चे जमाने में बहुत हुए,
जो एक हुए दो बदन
लोगों ने बीता कल मान लिया।
जो उतरा हवस का भूत
तो घर का बोझ
दिमाग पर बढ़ने लगा
जिंदगी में फिर कभी इश्क का नाम न लिया।
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जो पत्नी को प्रियतमा न समझे
भटके हैं प्यार पाने के लिये इस दर से उस दर।
दिल में पल रहे जज़्बात
जमीन पर चलते नहीं देखे जाते,
इश्क है या हवस
इसकी पहचान नहीं कर पाते,
सर्वशक्तिमान समझे जो इंसानी जिस्म को
मोहब्बत नहीं टिकती कभी उनके घर।
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Thursday, April 1, 2010

अपने दर्द पर हंसना सीख लो-हिन्दी शायरी (apne dard par hansna seekh lo-hindi shayri)

अपने दर्द का बोझ कब तक सहेंगे।
हल्का लगेगा जब दिल से हंसेंगे।
अपने ख्वाब पूरे होने की सौदागरों से चाहत
कब तक ईमान बेचकर पूरी करेंगे।
बाजार में बिकती है ढेर सारी शयें
उनके कबाड़ होने पर, घर कब तक भरेंगे।
दिखा रहे हैं बड़े और छोटे पर्दे पर नकली दृश्य
झूठे जज़्बातों से कब तक अपना दिल भरेंगे।
अपने दर्द पर हंसना सीख लो यारों
रोते हुए जिंदगी के दरिया में कब तक बहेंगे।
दिल को दे सुकून, भुला दे सारे गम
वह दवा तभी बनेगी, जब खुद अपनी बात पर हंसेंगे।
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