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Sunday, December 5, 2010

शब्द और दलाली-हिन्दी कवितायें (shabd aur dalali-hindi kavitaen)

कलमकार भी अब
सत्ता के दलाल हो गये,
ईमानदारी और नैतिकता
दो शब्द हैं जो नारे बने
जिनको अपनी कलम से
जिंदगी देने का दावा करते थे झूठा
यह दोनों ही नये धंधे में हलाल हो गये।
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उधार के शब्दों ने
उनको कलम का धनी बना दिया,
जो सत्ता की गली में घुसे
उनकी छवि को
दलाली की वसूली ने
उनकी छवि को कीचड़ में सना दिया।
शब्द तो एक छलावा था उनके
जिसके सहारे चढ़ना था सीढ़ियां,
हम तो समझे थे कि
इतिहास में उनके शब्दों की
शामिल होंगी कई पीढ़ियां,
क्या मालुम था वह कर रहे हैं छलावा,
उनको रचनाकार मानने पर होगा पछतावा,
अपनी नीयत में दलाली के धंधे को
उन्होंने अपनी मंज़िल बना लिया।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, May 22, 2010

सम्मेलन-हिन्दी व्यंग्य कविता (sammelan-hindi vyangya kavita)

सम्मेलन में
कुछ रूठे इस उम्मीद में गये कि
कोई उन्हें मना लेगा
कुछ टूटे दिलों ने आसरा किया कि
कोई उन्हें फिर बना लेगा,
मगर वहां जमी महफिल में
सभी चीख रहे थे
गुर्राने के नये नये तरीके सीख रहे थे,
सद्भाव के नाम संघर्ष दिखने लगा।
सभी ने अपनी अपनी कही,
दूसरे की सलाह भी सही,
तय किया ज़माने में नश्तर चुभोने का,
अपने को छोड़कर सभी को डुबोने का,
फिर कोई अगले सम्मेलन की तारीख लिखने लगा।

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