Sunday, November 9, 2008

जमाने में उसका नाम लेने वाला नहीं बचेगा-हिंदी कविता

वह इतराता रहेगा
बस अपनी बात कहेगा
पर तुम खामोश रहना
अपने शब्द सहजता से रचना
खड़ी रहेगी वह इतिहास में इमारत की तरह
उसका छद्म किला अपने आप ढहेगा

वह आतंक के शब्द रचेगा
बहने लगे खून कहीं
ऐसी उम्मीद करेगा
अपने काले कारनामों के लिये
सफेदपोश मुखौटे तलाश करेगा
तुम सहज और सरल शब्द लिखना
नहीं जरूरत होगी तुम्हें
किसी दूसरे के उधार चेहरे की
कभी न कभी उसके चेहरे पर ही
पुत जायेगी कालिख
कब तक वह चेहरे बदलेगा

वह लगायेगा शांति के नारे
पर चीख मचाता शोर करेगा
अमन और तसल्ली देने का दावा करता
बिखेर देगा अशांति इस जहां में
इसलिये उसका नाम भी चमकेगा
क्योंकि शोर की ताकत होती है ज्यादा
पर उम्र उसकी कम होती है
इसलिये भूल जायेगा जमाना नाम उसका
फिर कौन उसकी कद्र करेगा
तुम लिखना शांति के शब्द
प्रेम का प्रचार करना
जीवन जिससे महकता हो
उसे फूल जैसी रचना का सृजन करना
बनी बनाई इमारतों को ढहाना
बहुत आसान होता है
उसकी आवाज गूंजती है जोर से
इसलिये जमाने की नजर बहुत जल्दी जाती है
फिर फेर भी लेते हैं नजरे लोग उतनी ही जल्दी
जब इमारत का टूटा ढेर नजर आता है
तुम रखना एक एक ईंट अपने हाथ से
बनाना अपनी नयी इमारत
तुम्हारे बदने से निकलते पसीने पर
नहीं जायेगी किसी की नजर
कभी लगेगी भूख तो कभी होगा प्यास का कहर
पर बन जायेगी इमारत रचना की
कीर्ति स्तंभ पर तुम्हारा ही नाम गढ़ेगा

जिसे चमकते देखकर हैरान हुए थे तुम
जिस पर जमीं थी नजर जमाने की
चमकता था नाम जिसका आकाश में
उस विध्वंस और अशांति पैदा करने वाले
शख्स को याद कर तुम सोचोगे
पर जमाने में उसका नाम लेने वाला नहीं बचेगा

.........................................

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, November 6, 2008

अपने आप को ही गरीब पाओगे-व्यंग्य कविता


खूब खेलो और नृत्य करो
अभिनय करते हुए लोगों का दिल बहलाओ
जमकर कमाओ पैसा तो महान बन जाओगे
लकड़ी और प्लस्टिक के खिलौनो से
बचपन में खेले लोग
बड़े होकर हांड़मांस के खिलौनो से
खेलने के आदी हो जाते हैं
तुम उनके साथ जमकर खेलो
पर अहसास दिलाओ
उनको स्वयं खेलने का
तो तुम इस जिदंगी के खेल में जीत जाओगे

काल्पनिक कहानियों के पात्र बन जाओ
लोगों को भ्रम में सच दिखाओ
तो तुम उनके इष्ट बन जाओगे
लोगों का चाहिये हर पल कुछ नया
दौलत और शौहरत की इस दौड़ में
जुटे हैं सभी लोग
तुम दिल बहलाकर बटोर लो दौलत
बिना दौड़े किसी दौड़ में
पर्दे पर कई बार विजेता बन जाओगे

सच से दूर रहना सीख लो
खुद को ही दो धोखा
तभी दूसरे को भी दे पाओगे
हां, यह जरूरी होगा
क्योंकि सत्य कभी बदल नहीं सकता
भ्रम के रूप तो पल पल बदल सकते हैं
चमकती रौशनी कितनी भी तेज हो
सूर्य जैसी तो नहीं हो सकती
कितना भी सुंदर सूरत हो
चांद जैसी सीरत नहीं हो सकती
दरियादिल तो दिखने के होते
समंदर जैसी गहराई उनमें नहीं हो सकती
कभी इतिहास के नायकों जैसा
बनने का ख्वाब नहीं देखना
उनकी हकीकत भी वैसी बयान नहीं होती
फिर पूरा जमाना करने लगा है नकल मेे ही
असल जैसा विश्वास
तब असली नायक होने की सोची तो पछताओगे

तुम करते रहो स्वांग
खुद को भी यकीन दिला दो कि
तुम ही हो वाकई महान
अगर नहीं कर सकते तो
आम इंसान बन जाओ
देखो सच को अपनी आंखों से
महसूस करो अपनी ताकत को
जमाना तुम्हें चाहे, यह उम्मीद छोड़ दो
हंसना सीख लो अपनी हालातों पर
जमाने को बताना छोड़ दो
वह हंस सकता है मु्फ्त में तुम पर
अगर मौका दिया हंसने का
उसे अपना दर्द बताकर
तब अपने आप को ही गरीब पाओगे

..................................


यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, November 3, 2008

मुन्ने के बापू ने भी ऐसा ही लिखा था प्रेमपत्र-हास्य कविता

आवारा आशिक देखता था
उसे रोज गाडी में आते जाते
आ गया दिल तो उसने लिख कर प्रेम प्रस्ताव
और रास्ते में थमा दिया
"प्रिये रोज तुम्हें आते जाते देखता हूँ
तुम पहली हो जिस पर दिल आया
कितना सुन्दर तुम्हारा चेहरा है
क्या लहराते काले लम्बे बाल हैं
तुम्हारी चाल है हाथी की तरह मतवाली
मेरा दिल भी है खाली
इसलिए यह प्रेम प्रस्ताव तुमको दिया"

गाडी पर चलती लडकी भौचक्क रह गयी
किसी तरह संभली
पत्र हाथ में लेकर पढा
फिर गाडी पर बैठकर ही लिख जवाब लिख दिया
"गाडी पर हेलमेट पहनकर चलती हूँ
तुमने मेरे चेहरे के बारे में कैसा अनुमान कर लिया
बालों में लगाती हूँ रंग जो है लाल
घर से जाती हूँ इसी गाडी पर
अपने बच्चे को स्कूल से वापस लाने
वरना कभी बाहर पैदल नहीं चलती
गाडी की चाल हो सकती है मतवाली
मेरी कैसे समझ लिया
पर मुझे याद आया मुन्ने के बापू ने भी
भेजा था ऐसे ही प्रेमपत्र
जब मैं कालिज जाती थी
उस समय नहीं समझी थी
तब भी हेलमेट पहनाकर ऐसी ही गाडी पर जाती
आज पूछूंगी घर आते ही
उन्होंने कैसे मेरी सुन्दरता का वर्णन कर दिया
होता है झगडा तो परवाह नहीं
अच्छा हुआ तुमने मुझे याद दिला दिया
अंधी थी उसके प्यार में
मैंने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया"

लड़के ने उत्तर देखकर अपना सर पीट लिया
फिर जो देखा उसका चेहरा
तो बहुत खुश हो गया
वह उसके उस दोस्त की पत्नी थी
लिखवा गया था ऐसा ही प्रेम पत्र पर
जिसने शादी की बाद उसके लक्षणों को देखते हुए
कभी घर में नहीं घुसने दिया
इस तरह उसने बदला लिया

----------------------------------------

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, October 29, 2008

वासना में लिपटा भाव प्यार नहीं कहलाता-हिन्दी शायरी

किसी के ख्यालों में खो जाना
किसी के वादों में बहकना
किसी के इरादों के साथ बह जाना
क्या कहलाता है प्यार
जिसमें कुछ पल का भटकने की
सजा भी मिल सकती है
जिन्दगी में हर कदम पर बारंबार
कोई एक पहचान खोये
दूसरा उस पर थोपे अपना नाम
बराबरी की शर्त पूरी
नहीं करता ऐसा प्यार
एक खेलता है
दूसरा देखता है
वासना में लिपटा बदन मचले
कहलाता नहीं प्यार
दिल में भोगने की चाहत पूरी करना
जिस्म में जलती आग बुझाना तो
सभी चाहते हैं
पर त्याग और यकीन पर खरे उतरें
कुछ पाने की चाह न हो
तभी कहलाता है प्यार

----------------------

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, October 26, 2008

फैसला नये ज़माने के साथ चलने का-हास्य व्यंग्य कविता

समाज के ठेकेदारों की
पड़ती जा रही थी छबि फीकी
उन्होने तय किया
फैसला नये ज़माने के साथ चलने का
अपने तौर तरीकों को बदलने का

पहले लोग घर के झगडों की
पंचायत कराने आते थे
अब अदालतों में जाने लगे थे
उन्होने तरीका यह सोचकर बदला कि अब
लोग लोगों के आने का इन्तजार नहीं करेंगे
ऐसे मुद्दे उछालेंगे कि लोग
आपस में पहले से ज्यादा लड़ेंगे
फिर प्रस्ताव रखेंगे उनके सामने
आपस में समझौते करने का
उनकी योजना काम आयी
उनके पास अब रोज आते हैं
अवसर शांति के प्रवर्तक बनने का
--------------------------

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, October 21, 2008

मुफ्त में जुर्म सहती जाना-हास्य कविता

सास ने बहू से कहा
'तुम्हें आज मायके जाने की अनुमति
पर शाम ढलने से पहले घर लौट आना
तेरे ससुर और पति से तेरे जाने की
ख़बर छुपाये रखूँगी
उनके आने से पहले नहीं आई
तो दोनों नाराज होंगे
पडेगा तुम्हें पछताना
हाँ, मेरे लिए कोई तोहफा
जरूर लाना'
बहू बिचारी शाम से पहले वापस आयी
साथ में सास के लिए साड़ी भी लाई
पर सास को साड़ी पसंद नही आयी
और जोर से किया चिल्लाना शुरू
'कैसे कंगाल घर की हैं
इतनी सस्ती साड़ी लाई
ज़रा भी शर्म नहीं आयी
पता नहीं कौनसे मुहूर्त में
इसका रिश्ता अपने बेटे के लिए माना'

बेटा और पति के घर लौटने तक
उसने मचा रखा कोहराम
नहीं करने दिया बहु को आराम
घर में उनके घुसते उसने
उनको दी शिकायत
बहु को कोसने में नहीं की किफायत
ससुर ने बहु से कहा
'बेटी नए जमाने की हो
पर बदला नहीं है ज़माना
तुमने अभी सास-बहु के
रिश्ते को नहीं जाना
कभी तुम सास को खुश नहीं कर सकती
चाहे लाख जतन कर लो
इसलिए कभी सास के लिए कुछ नहीं लाना
अपने पिता का खर्चा करा कर भी झेलने से
तो अच्छा है मुफ्त में सास के जुर्म सहती जाना'
-----------------
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, October 12, 2008

जुबान का खेल है यह ज़िन्दगी-व्यंग्य कविता

तुम्हारे मुख से निकले कुछ
प्रशंसा के कुछ शब्द
किस तरह लुभा जाते हैं
जो तुम्हे करते हैं नापसंद
वही तुम्हारे प्रशंसक हो जाते

जुबान का खेल है यह जिन्दगी
कर्ण प्रिय और कटु शब्दों से
ही रास्ते तय हो पाते हैं
जो उगलते हैं जहर अपने लफ्जों से
वह अपने को धुप में खडे पाते
जिनकी बातों में है मिठास
वही दोस्ती और प्यार का
इम्तहान पास कर
सुख की छाया में बैठ पाते

जिन्होंने नहीं सीखा लफ्जों में
प्यार का अमृत घोलना
रूखा है जिनका बोलना
वह हमेशा रास्ते भटक जाते
उनके हमसफर भी अपने
हमदर्द नहीं बन पाते हैं
चुनते हैं भाषा से शब्दों को
फूल की तरह
लुटाते हैं लोगों पर अपनों की तरह
गैरों से भी वह हमदर्दी पाते
----------

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, October 11, 2008

अंतर्जाल पर पाठ चुराने वाले हैकर भी कम नहीं होंगे-आलेख

पता नहीं वह ब्लागर कभी कभी दिखता है पर उसकी सलाह को कभी नहीं भूल सकता। उसने हैकरों से लड़ने का जो सुझाव दिया वह बहुत दिलचस्प रहा।
उसने कहा था कि मुझे अपने पाठ में उस हैकर के लिये अभद्र शब्द लिख कर एक पाठ डालना चाहिये और फिर उस पाठ को हटा देना चाहिये या फिर उसकी वेबसाइट को चोर बताते एक पाठ लिखना चाहिये। उसे धमकाना चाहिये। आदि आदि।

इधर कई दिनों से देख रहा था कई लोग मुफ्त का माल समझकर मेरे पाठों को उठाये जा रहे थे। कहना यह चाहिये कि उन्होंने अपने साफ्टवेयर इस तरह बनाये हैं कि वह एक जाल बन गये हैं और जब हम अपना पाठ प्रकाशित करते हैं तो वह एक अंतरिक्ष में अपने शब्दों के साथ उठ रहा पाठ पंछी की तरह उनके इस जाल में फंस जाता है। बहरहाल उस ब्लागर की बात ने मेरे दिमाग में एक विचार घुसा दिया। मैंने अपने पाठ में अपने उस ब्लाग/पत्रिका के साथ अन्य ब्लाग/पत्रिका के पते भी लगाना शुरु दिये। वह मेरे पाठ का इस तरह हिस्सा था कि उनकी वेबसाइट पर अगर कोई मेरा पाठ खोलेगा तो मेरा नाम और ब्लाग/पत्रिका भी दिखाई देती है और कोई चाहे तो उनको खोल भी सकता है। जब से इस तरह अपने ब्लाग/पत्रिका के पते देने शुरु किये हैं तब से अब पाठ चोरी होना एक तरह से बंद हो गया है।

सबसे बढि़या बात यह है कि मैंने अपना नाम ब्लाग/पत्रिकाओं के साथ अनजाने में जोड़ा थे पर अब उनका लाभ यह दिखाई दे रहा है कि अंतर्जाल के यह हैकर उससे बचना चाहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि अपनी टिप्पणियों में ब्लाग/पत्रिकाओं में लिख जाते हैं कि प्रसिद्ध ब्लागर हूं-यह मजाक में वह लिखते हैं पर लगता है कि हैकरो ने यह पढ़ा है और इसी डर के कारण अब ऐसी शिकायतें कम हो गयीं हैं।
इन हैकरों ने लव,फ्रेंडस,विकिपीडिया और हिंदी और अन्य अनेक आकर्षक नाम लिखकर अपने वेबसाइट बनायी है। डोमेन पर पैसा खर्च किया पर लिखने के नाम पर पैदल हैं! वह अंतर्जाल पर हिंदी के वैसे ही प्रकाशक बनना चाहते हैं जैसे कि बाहर हैं। उनको लगता है कि ब्लाग लेखक तो एक मजदूर है वैसा ही जैसे कि बाहर होते हैं। यह उनका भ्रम है। अंतर्जाल पर सब वैसा नहीं चलेगा जैसा कि बाहर चल रहा है। वह पाठ लेना चाहते हैं पर नाम नहीं दिखे ऐसा इंतजाम कर लेते हैं तब गुस्सा आना स्वाभाविक है।

एक ब्लाग पर मैं विकिपीडिया का नाम देखकर तो हैरान हो गया और इधर मैं सोच रहा था कि इसकी शिकायत अपने मित्रों से करूं पर मेरी अपनी तकनीकी चालाकी की वजह से वह ब्लाग/वेबसाइट फिर मेरा पाठ लेने नहीं आया। हालांकि उसका लिंक अभी भी मेरे ब्लाग/पत्रिका पर दिख रहा है। हैकरी देखिये कि कोई और लिखे और हम उसका लाभ मुफ्त में उठायें।

इन हैकरों से जूझना भी एक अलग तरह का अनुभव है। कुछ लोगों को मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर इस तरह अनेक ब्लाग/पत्रिकाओं का पता देखकर हैरानी होती होगी उनको यह बता दूं कि यह केवल हैकरों से मुकाबला करने के लिये है। ऐसे हैकर जो लेखक का न नाम देना चाहते हैं और न नामा! आगे ऐसे हैकरों की संख्या और बढ़ेगी क्योंकि हिंदी में कई लोग अपने अंदर प्रकाशक होने का भ्रम पाल का डौमेन खरीद रहे हैं और ब्लाग के बारे में उनको लगा रहा है कि वह फ्री के हैं और लेखक तो उनकी नजर में फ्री के होते हैं।

इधर मैंने तय कर लिया है कि हिंदी की आधिकारिक साईटों पर ही जाना ठीक रहेगा। किसी समस्या के लिये ब्लाग लेखक मित्रों से पूछना ही ठीक है क्योंकि अंतर्जाल के बारे में अब वह जितना जानते हैं उतना शायद ही कोई जानता हो। इन हैकरों के बारे में उनसे जानकारी मिली तभी मैंने पाया कि कई ऐसे हैकर हैं जो मेरे पाठ ले जा रहे हैं। यहां यह बात बता दूं कि ब्लाग फ्री के जरूर हैं पर उस पर लिखा गया पाठ फ्री का नहीं होता। लेखक भले ही बैठकर लिखता है और उसका वहां भी पसीना बहता है।
कुछ लोग कहते हैं कि अंतर्जाल पर चोरी रोकने के लिये कानून होना चाहिये। यह बात सही है पर ऐसे हैकरों को बता दूं अनेक ऐसे भी कानून हैं जो उनको अपनी इन मूर्खताओं के लिये संकट में डाल सकते हैं।
डौमेन लेने वाले भी चेत जायें। कम से कम जहां मेरा नाम देखें तो अपने यहां से पाठ हटा लें। अगर मेरा पाठ लेते हैं तो मुझे पूर्व सूचना दें। मेरे पाठ केवल मेरे ब्लाग मित्र और हिंदी के ब्लाग दिखाने वाले चार फोरम ही दिखा सकते हैं क्योंकि यह मैंने तय किया है-अन्य का मामला मेरे विचाराधीन है। वैसे मुझे अपने लिखे से न तो पैसे की आशा है न ही अभी ऐसी कोई उत्सुकता है। भगवान का दिया सब कुछ है और सबसे बड़ी बात यह है कि सरस्वती मां की कृपा है पर अन्य ब्लाग लेखक मित्रों का परिश्रम व्यर्थ आते देख मेरा खून खौल उठता है तब प्रतिकार करने का मन होता है। सीधी बात यह है कि अगर आप अपनी वेबसाइट या ब्लाग पर इस तरह दिखाते हैं कि मेरा नाम नहीं दिखता तो इसका मतलब है कि आपकी नीयत ठीक नहीं है और उसका प्रतिकार आपको कभी भी झेलना पड़ सकता है।
-----------------------------------------------------------
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, October 8, 2008

नहीं तो आपकी कंपनी हो जायेगी फेल-हिन्दी शायरी

परेशान निर्माती ने पूछा
अपने प्रचार विशेषज्ञ से के
'सास बहू के धारावाहिक अब
क्यों हो रहे हैं फ्लॉप
अच्छी खबरें नहीं आ रहीं
हमारे धंधे के बारे में
प्रायोजक छोड़ रहे हैं साथ
खतरे में पड़ जायेगी सबकी कमाई
अपने ज्ञान से पता करो आप'

सुनकर बोला प्रचार विशेषज्ञ
'अब तो असली आतंक की
खबरें ही पा रहीं है सब जगह टॉप
आपके धारावाहिक की सासें तो
दिखाती हैं नकल क्रूरता
धमाकों के असली दृश्य टीवी पर देखकर
हर दर्शक दहल जाता है
उसका दिल भी बहल जाता है
हर टीवी चैनल लगा है
उसे भुनाने में
कौन देखेगा अब ऐसे रक्तहीन धारावाहिक
जब आपके कार्यक्रमों के शोर
धमाकों की आवाज में दब जाता हो
हर रोज ऐसा मंजर सामने आता हो
बम कहीं फटता हो
पर चैनल वाले दृश्य के साथ
अपनी असली धमाके की आवाज जोड़कर
आदमी को हिला देते हैं
अब आप भी बंद कर दो
यह सास बहू का खेल
आतंक का कार्यक्रम दो ठेल
आजकल बाज़ार में उसी की है सेल'
नहीं तो हो जायेगी आपकी कंपनी फेल
मैंने पहले ही बता दिया
फिर मुझे दोष न देना आप

------------------------------------
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, October 4, 2008

दूसरों पर फब्तियां कसने लग जाते हैं-हिंदी शायरी

आम इंसानों की तरह
रोज जिंदगी गुजारते हैं
पर आ जाता है
पर सर्वशक्तिमान के दलाल
जब देते हैं संदेश
अपना ईमान बचाने का
तब सब भूल जाते हैं
दिल से इबादत तो
कम ही करते हैं लोग
पर उसके नाम पर
जंग करने उतर आते हैं
कौन कहता है कि
दुनियां के सारे धर्म
इंसान को इंसान की
तरह रहना सिखाते
ढेर सारी किताबों को
दिल से इज्जत देने की बात तो
सभी यहां करते हैं
पर उनमें लिखे शब्द कितना पढ़ पाते हैं
पढ़कर कितना समझते
इस पर बहस कौन करता है
दूसरों की बात पर लोग
एक दूसरे पर फब्तियां कसने लग जाते हैं।
.......................................

<,blockquote>यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, September 28, 2008

कयामत अब किश्तों के कहर बरपाती है-व्यंग्य शायरी

माशुका की ख्वाहिश पर
आशिक ने एक चुराया हुआ शेर
कुछ यूं सुनाया
‘हम तो मोहब्बत के दीवाने है
प्यार करते है रोज रोज
जिंदगी ऐसे ही कट जायेगी
आखिर एक दिन तो कयामत आयेगी’

सुनकर माशुक भड़क उठी और कहा
‘इस खूबसूरत मौके पर भी
तुम्हें कयामत की याद आयी
दिल में कोई अच्छी सोच नहीं समाई
लगता है अखबार नहीं पढ़ते हो
इसलिये केवल प्यार में
कयामत के कसीदे गढ़ते हो
ऊपर वाले का घर छोड़कर
कयामत कभी की फरार हो गयी
अब तो चाहे जहां
जब चली आती है
एक दिन में दुनियां को तबाह करे
अब उसमें नहीं रही ताकत
इसलिये कयामत किश्तों में
कहर बरपा जाती है
टीवी पर बहता खून देखो
या अखबार के अल्फाजों में
हादसों की खबर पढ़ो
तभी कोई बात समझ आती है
इंसानों के उड़ जाते हैं चीथड़े
उन पर एक दिन रोकर जमाना
फिर कयामत के शैतानों पर ही
नजर लगाये रहता हैं
कभी उनके स्कूल तो कभी
उनकी माशुकाओं के नाम का जिक्र
चटखारे लेकर
पर बात अमन कायम करने की करता है
पड़ गयी हैं कयामत पर
ऐसी शायरी पुरानी
कई तो याद है मुझे याद हैं जुबानी
उसे भुलाने के वास्ते ही
तुम्हें आशिक बनाया
पर तुम्हारी शायरी सुनकर पछता रही हूं
इसलिये भूल जाओ मुझे
नहीं तो तुमसे मिलकर
रोज मुझे कयामत की याद आयेगी

..............................
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, September 26, 2008

किसी को दोस्त कहने में डर लगता है-हिंदी शायरी

अपने मन की उदासी
किसी से कहने में डर लगता है
जमाने में फंसा हर आदमी
अपनी हालातों से है खफा
नहीं जानता क्या होती वफा
अपने मन की उदासी को दूर
करने के लिये
दूसरे के दर्द में अपनी
हंसी ढूंढने लगता है
एक बार नहीं हजार बार आजमाया
अपने ही गम पर
जमाने को हंसता पाया
जिन्हें दिया अपने हाथों से
बड़े प्यार से सामान
उन्होंने जमाने को जाकर लूट का बताया
जिनको दिया शब्द के रूप में ज्ञान
उन्होंने भी दिया पीठ पीछे अपमान
बना लेते हैं सबसे रिश्ता कोई न कोई
पर किसी को दोस्त कहने में डर लगता है

...........................................

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, September 23, 2008

अक्लमंदों की महफिल से इसलिए बाहर निकल आये-हास्य शायरी



अक्लमंदों की महफिल से इसलिये ही

जल्दी बाहर निकल आये

सभी के पास था अपनी शिकायतों का पुलिंदा

किसी के पास मसलों का हल न था

अपनी बात कहते हुए चिल्ला रहे थे

पर करने का किसी में बल न था

करते वह कोई नई तलाश

उनसे यह उम्मीद करना बेकार था

हर कोई अपना मसले का

बयां करने को ही हर कोई तैयार था

सारी बहस शिकायतों का कहने के तरीके

और अल्फाजों पर ही चलती रही

टंग थे लोग महफिल में पेड़ की तरह

जिनमें कोई फल नहीं था
................................................

जब चार अक्लमंद मिलते हैं

लफ्जों की जंग में शामिल हो जाते हैं

उनसे तो कमअक्ल ही सही

जो आपस में टकराते हैं जाम

और अपना गम गलत कर जाते हैं

अक्लमंदों की हालत पर आता है तरस

निकलते हैं घर से तरोताजा

पर महफिलों से बेआबरू होने का

गम अपने दिमाग पर लिये लौट आते हैं

-------------------------------
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, September 22, 2008

आदमी अपनी आंखों से ही अपना शिकार कर आता -हिंदी शायरी

खूबसूरत चेहरे देखकर किसका

मन भर नहीं आता

शायद इसलिये ही लोगों को

भरमाने के लिये ही तस्वीरों में

सुंदर चेहरों को सजाया जाता

अब तो जरूरत ही नहीं

किसी कमसिन को तस्वीर से बाहर आने की

उनके नाम से ही सामान बिक जाता

आदमी के अंग अंग में तस्वीरों का असर दिख जाता

इतने चेहरे दुनियां में नहीं होंगे

जितनी तस्वीरें बनी हैं

कोई धोखे की शिकायत भी नहीं कर सकता

आदमी अपनी आंखों से ही

अपना शिकार कर आता

............................................................

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, September 21, 2008

हादसों से ही चमकता है अख़बार-व्यंग्य कविता

हादसों की ख़बरों से भरा हुआ अख़बार
ढूंढ रहे हैं शब्द लोग
अपने दिल को लुभाने वाले
विज्ञापनों से सजा रंगीन पृष्ठ
ढेर सरे शब्दों की पंक्तियों से
गुजर जाती हैं दृष्टि
पर बैचेनी बढाते जाते हैं शब्द
कहीं सूखे हैं अकाल से
तो कहीं उफनते हैं वर्षा से नदी और नाले
कही चटके हैं किसी घर के ताले
कही पकड़े हैं नकली माल बनाने वाले
लगता है चमकता है
बहुत सारे हादसों से अख़बार

---------------------------------------

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, September 20, 2008

आज वह मजाक बनाएगा-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल रहे थे तो बा (गृहस्वामिनी) ने कहा-‘अभी बिजली नहीं आयी है इसलिये सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन करने जा रहे हो नहीं तो अभी तक कंप्यूटर पर अपनी आखें झौंक रहे थे।’
दीपक बापू ने कहा-‘कैसी बात करती हो। लाईट चली गयी तो चली गयी। मैं तो पहले ही कंप्यूटर को पर्दा गिराने (शट डाउन) का संदेश भेज चुका था। अपने नियम का मैं पक्का हूं। सर्वशक्तिमान की कृपा है कि मैं ब्लाग लिख पा रहे हूं।
बा ने कहा-‘फंदेबाज बताता रहता है कि तुम्हारे हिट होने के लिये वह कई जगह मन्नतें मांगता है। तुम्हारे फ्लाप शो से वह भी दुःखी रहता है।
दीपक बापू ने कहा-‘तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गयी। न वह पढ़ने में न लिखने में। आ जाता है फालतू की बातें करने। हमने कभी अपने फ्लाप रहने की परवाह नहीं की जो वह करता है। जिनके दोस्त ऐसे ही हों वह भला हिट ब्लागर बन भी कैसे सकता है।’

इतने में फंदेबाज ने दरवाजे पर दस्तक दी। दीपक बापू ने कहा-‘और लो नाम शैतान का। अच्छा खासा सर्वतशक्तिमान के दरबार में जा रहा था और यह आ गया मेरा समय खराब करने। साथ में किसी को लाया भी है।’
फंदेबाज उस आदमी को लेकर अंदर आया और बोला-‘दीपक बापू कहीं जा रहे थे क्या? लगता है घर में लाईट नहीं हैं वरना तुम इस तरह जाते नहीं।’
दीपक बापू ने कहा-‘ अब तुम कोई फालतू बात तो करना नहीं क्योंकि हमारे पास समय कम ही है। बताओ कैसे आये? आज हमारा हास्य कविता लिखने का कोई विचार नहीं है।’
फंदेबाज अपने साथ लाये आदमी की तरफ हाथ उठाते हुए बोला-‘ यह मेरा दोस्त टोपीबाज है। इसने कई धंधे किये पर हिट नहीं हो सका। आपको तो परवाह नहीं है कि हिट हैं कि फ्लाप पर हर आदमी फ्लाप होने का दर्द नहीं झेल सकता। इसे किसी तोते वाले ज्योतिषी ने बताया है कि टोपी के धंधे में इसे सफलता मिलेगी। इसलिये इसने झगड़ेबाज की जगह अपना नाम टोपीबाज कर लिया। यह धंधे के हिसाब से अपना नाम बदलता रहता है। यह बिचारा इतने धंधे कर चुका है कि अपना असली नाम तक भूल गया है। अब आप इसके धंधे का शुभारंभ करो। तोते वाले ज्योतिषी ने इसे बताया था कि किसी फ्लाप लेखक से ही उसका शुभारंभ करवाना। लोग उससे सहानुभूति रखते हैं इसलिये तुम्हें लाभ होगा।’

दीपक बापू ने उस टोपीबाज की तरफ दृष्टिपात किया और फिर अपनी टोपी पर दोनों हाथ लगाकर उसे घुमाया और हंसते हुए बोले-‘चलो! यह नेक काम तो हम कर ही देते हैं। वहां से कोई चार छहः टोपी खरीदनी है। इसकी दुकान से पहली टोपी हम खरीद लेंगे। वह भी नगद। वैसे तो हमने पिछली बार छहः टोपी बाजार से उधार खरीदी थी पर वह चुकायी नहीं। जब उस बाजार से निकलते हैं तो उस दुकान वाले रास्ते नहीं निकलते। कहीं उस दुकान वाले की नजर न पड़ जाये। अगर तुम्हारी दुकान वहीं है तो भैया हम फिर हम नहीं चलेंगे क्योंकि उस दुकानदार को देने के लिये हमारे पास पैसा नहीं है। वैसे सर्वशक्तिमान ने चाहा तो इसके यहां से टोपी खरीदी कहीं फलदायी हो गयी तो शायद कोई एकाध ब्लाग हिट हो जाये।
फंदेबाज बोला-‘अरे, तुम समझे नहीं। यह किसी टोपी बेचने की दुकान नहीं खोल रहा बल्कि यह तो ‘इसकी टोपी उसके सिर’ वाली लाईन में जा रहा है। हां, शुभारंभ आपसे करना चाहता है। आप इसे सौ रुपये दीजिये आपको अंतर्जाल का हिट लेखक बना देगा। इसके लिये वह घर पर बैठ कर अंग्रेजी का मंत्र जपेगा अब उसमें इसकी ऊर्जा तो खत्म होगी तो उसके लिये तो कुछ पैसा तो चाहिये न!
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, ऐसे व्यापार करने से तो न करना अच्छा। यह तो धोखा है, हम तो कभी हिट लेखक नहीं बन सकते। कहीं ठगीबाजी में यह पकड़ लिया गया तो हम भी धर जिये जायेंगे कि इसके धंधे का शुभारंभ हमने किया था।
फंदेबाज ने कहा-‘तुम्हें गलतफहमी हो गयी है कि इसे सौ रुपये देकर हिट लेखक बन जाओगे और यह कोई अंग्रेजी का मंत्र वंत्र नहीं जपने वाला। सौ रुपये नहीं यह तो करोड़ों के वारे न्यारे करने वाला है। यह तो आपसे शुरूआत है। इसलिये टोकन में सौ रुपये मांग रहा हूं। ऐसे धंधे में कोई पकड़ा गया है आजतक। मंत्र का जाप तो यह करेगा। कुछ के काम बनेंेगे कुछ के नहीं। जिनके बनेंगे वह इसका गुण गायेंगे और जिनके नहीं बनेंगे वह कौन शिकायत लेकर जायेंगे?’
दीपक बापू ने कहा-‘क्या तुमने हमें बेवकूफ समझ रखा है। ठगी के धंधे का शुभारंभ भी हम करें क्योंकि एक फ्लाप लेखक हैं।’
फंदेबाज ने कहा-‘तुम भी चिंता मत करो। कई जगह तुम्हारे हिट होने के लिये मन्नतें मांगी हैं। जब हिट हो जाओगे तो तुमसे किसी और बड़े धंधे का शुभारंभ करायेंगे।’
दीपक बापू ने आखें तरेर कर पूछा-‘तो क्या लूटपाट के किसी धंधे का शुभारंभ करवायेगा।’
बा ने बीच में दखल दिया और बोली-‘अब दे भी दो इस बिचारे को सौ रुपये। हो सकता है इसका ध्ंाधा चल निकले। कम से कम फंदेबाज की दोस्ती का तो ख्याल करो। हो सकता है अंग्रेजी के मंत्रजाप करने से आप कंप्यूटर पर लिखते हुए हिट हो जाओ।’
दीपक बापू ने सौ का नोट टोपीबाज की तरफ बढ़ा दिया तो वह हाथ जोड़ते हुए बोला-‘आपके लिये तो मैं सचमुच में अंग्रेजी में मंत्र का जाप करूंगा। आप देखना अब कैसे उसकी टोपी उसके सिर और इसकी टोपी उसके सिर पहनाने का काम शुरू करता हूं। घर घर जाकर अपने लिये ग्राहक तलाश करूंगा। कहीं न कहीं कोई समस्या तो होती है। सभी की समस्या सुनकर उनके लिये अंग्रेजी का मंत्र जपने का आश्वासन दूंगा जो अच्छी रकम देंगे उनके लिये वह जपूंगा और जो कम देंगे उनका फुरसत मे ही काम करूंगा।’
बा ने कहा-‘महाराज, आप हमारे इनके लिये तो आप जरूर अंग्रेजी का मंत्र जाप कर लेना। अगर हिट हो गये तो फिर आपकी और भी सेवा कर देंगे। आपका नाम अपने ब्लाग पर भी चापेंगे (छापेंगे)
अपना काम निकलते ही फंदेबाज बोला-‘अच्छा दीपक बापू चलता हूं। आज कोई हास्य कविता का मसाला मिला नहीं। यह दुःखी जीव मिल गया। अपने धंधे के लिये किसी फ्लाप लेखक की तलाश में था। यह पुराना मित्र है मैंने सोचा तुमसे मिलकर इसका काम करा दूं।’
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, इतने करोड़ो के बजट वाला काम शुरू किया है और दो लड्डे भी नहीं ले आये।’
फंदेबाज ने झुककर बापू के मूंह के पास अपना मूंह ले जाकर कहा-‘यह धंधा किस तरह है यह बताया था न! इसमेें लड्डू खाये जाते हैं खिलाये नहीं जाते।’
वह दोनो चले गये तो बा ने दोनों हाथ उठाकर ऊपर की तरफ हाथ जोड़कर कहा-‘चलो इस दान ही समझ लो। हो सकता है उसके अंग्रेजी का मंत्र से हम पर कृपा हो जाये।’
दीपक बापू ने कहा-‘यह दान नहीं है क्योंकि यह सुपात्र को नहीं दिया गया। दूसरा कृपा तो सर्वशक्तिमान ही करते हैं और उन्होंने कभी कमी नहीं की। हम तो उनकी कृपा से ब्लाग लिख रहे हैं उसी से हीं संतुष्ट हैं। फ्लाप और हिट तो एक दृष्टिकोण है। कौन किसको किस दृष्टि से देखता है पता नहीं। फिर अंतर्जाल पर तो जिसका आभास भी नहीं हो सकता उसके लिये क्या किसी से याचना की जाये।’
बा ने पूछा-‘पर यह मंत्र जाप की बात कर रहा था। फिर धंधे की बात कर रहा था समझ में नहीं आया।’
दीपक बापू ने कहा-‘इसलिये तो मैंने उसे सौ रुपये दे दिये कि वह तुम्हारी समझ में आने से पहले निकल ले। क्योंकि अगर तुम्हारे समझ में आ जाता तो तुम देने नहीं देती और बिना लिये वह जाता नहीं। समझ में आने पर तुम फंदेबाज से लड़ बैठतीं और वह पैसा लेकर भी वह अपना अपमान नहीं भूलता। फिर वह आना बंद कर देता तो यह कभी कभार हास्य कविताओं का मसाला दे जाता है उससे भी हाथ धो बैठते। यह तो सौ रुपये का मैंने दंड भुगता है।’
इतने में लाइट आ गयी और बा ने कहा-‘लो आ गयी बिजली! अब बैठ जाओ। फंदेबाज ने कोई मसाला दिया हो तो लिख डालो हास्य कविता।’
दीपक बापू ने कहा-‘अब तो जा रहे सर्वशक्तिमान के दरबार में। आज वह कोई मसाला नहीं दे गया बल्कि हमारी हास्य कविता बना गया जिसे दस को सुनायेगा। अभी तक हमने उसकी टोपी उड़ायी है आज वह उड़ायेगा।
.......................................
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, September 13, 2008

आदमी के जिंदगी का भटकाव-हिंदी शायरी

चलने के लिये तो रास्ते बहुत हैं

पर आदमी की मंजिल बस एक है

दिल में बदलते हैं ख्याल तो

बदल देता है रास्ता

नहीं होता गहरी सोच से वास्ता

भटकाव एक बार जिंदगी में आये तो ठीक

पर उसके साथ बीत जाये जिंदगी

अनेक दिशाओं के मायाजाल में

फंसा आदमी

ढेर सारी चीजों के इर्द गिर्द घूमता है

पर पाता कोई नहीं एक है

..............................................

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, September 9, 2008

अभद्र शब्द संग्रह का विमोचन-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

उस दिन ब्लागर अपने कमरे में बैठा लिख रहा था तभी उसे बाहर से आवाज सुनाई दी जो निश्चित रूप से दूसरे ब्लागर की थी। वह उसकी पत्नी से पूछ रहा था-‘भाई साहब, अंदर बैठे कवितायें लिख रहे होंगे।’

गृहस्वामिनी ने पूछा-‘आपको कैसे पता?’
वह सीना तानकर बोला-‘मुझे सब पता है। आजकल वह दूसरों की कविताओं को देखकर अपनी कवितायें लिखते हैं। अपने सब विषय खत्म हो गये हैं। मैंने पहले भी मना किया था कि इतना मत लिख करो। फिर लिखने के लिये कुछ बचेगा ही नहीं।’
वह अंदर आ गया और ब्लागर की तरफ देखकर बोला-‘भाई साहब, नमस्कार।’

पहले ब्लागर ने उसे ऐसे देखा जैसे उसकी परवाह ही नहीं हो तो वह बोला-‘ऐसी भी क्या नाराजगी। एक नजर देख तो लिया करो।’
पहले ब्लागर ने कुर्सी का रुख उसकी तरफ मोड़ लिया औेर बोला-‘एक नजर क्या पूरी नजर ही डाल देता हूं। क्या मैं तुमसे डरता हूं।’
इसी बीच गृहस्वामिनी ने कहा-‘अच्छा आप यह बतायें। चाय पियेंगे या काफी!‘
दूसरा ब्लागर बोला-‘बाहर बरसात हो रही है मैं तो काफी पिऊंगा।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘केवल इसके लिये ही बनाना। काफी जहर है और उसे पीने से इसका जहर थोड़ा कम हो जायेगा तब यह कविता पर कोई अभद्र बात नहीं करेगा।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘आप भी थोड़ी पी लेना। जब से कंप्यूटर पर चिपके बैठे हो। थोड़ी राहत मिल जायेगी।’
वह चली गयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘यार, जरा शर्म करो। दूसरों की कविताओं से अपनी कविताएं टीप रहे हो। तुम्हें शर्म नहीं आती।’
पहले ब्लागर ने कुछ देरी आखें बंद कीं और फिर बोला-‘आती है! पर लिखने बैठता हूं तो चली जाती है। तुम बताओ यह लिफाफे में क्या लेकर आये हो। मुझे तो तुम कोई तोहफा दे नहीं सकते।’
वह बोला-‘इसमे कोई शक नहीं है कि तुम ज्ञानी बहुत हो। कितनी जल्दी यह बात समझ ली।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नहीं इसमें ज्ञान जैसी कोई बात नहीं है। तुम जैसा आदमी किसी को तोहफा नहीं दे सकता यह एक सामान्य समझ का विषय है। बस, यह बताओ कि इसमें हैं क्या?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘पहले काफी पी लूं। फिर इस किताब का विमोचन कर लूं। यह मैंने लिखी है। इस पर तुम कोई रिपोर्ट अपने ब्लाग पर लिख देना। ऐसी सड़ी गली कविताओं से तो इस पर रिपोर्ट लिखना अच्छा।’
पहले ब्लागर ने पूछा-‘मैं क्यों लिखूं? तुम स्वयं ही लिख लो। मेरे पास ऐसे फालतू कामों के लिये समय नहीं है।’
दूसरा ब्लागर ने कहा-‘दरअसल मैं किसी और से लिखवा नहीं सकता और कोई फालतू आदमी इसके लिये मिलता नहीं।’
तब तक गृहस्वामिनी काफी लेकर आयी तो वह बोला-‘यार, लिखने की योग्यता भी तो किसी में होना चाहिये। तुम इतने प्रसिद्ध ब्लागर हो कि जो लिखोगे लोगों की नजरों में अधिक आयेगा।
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां, लिख दो। देखो भाई साहब कितने दिनों बाद तो आये हैं। जो कह रहे हैं वह लिख दो। इतना तो फालतू लिखते हो।’
पहले ब्लागर ने हंसते हुए पूछा-‘इसकी किताब पर लिखने से मेरा लिखा पालतू हो जायेगा?’

दूसरे ब्लागर ने बिना कहे ही काफी का कप उठा लिया और बोला-‘भाभीजी आप हमेशा अच्छी बात करती हैं। इसलिये भाई साहब अच्छा लिख लेते हैं। अब देखिये मैंने यह किताब लिखी है उसका विमोचन कर रहा हूं तो सोचता हूं तो उसकी रिपोर्ट लिख भाई साहब लिखे लें।’
फिर उसने कुछ सोचकर वह पैकेट पहले ब्लागर के पास रख दिया तो उसने भी बिना सोचे समझे उसे खोल दिया। बस दूसरा ब्लागर ताली बजाते हुए बोला-‘वाह, भाई साहब ने तो स्वयं ही विमोचन कर दिया। धन्य हुआ मैं कि देश के इतने बड़े हिंदी ब्लागर ने मेरी किताब का विमोचन कर दिया।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘देखूं तो सही। किताब का नाम क्या है? वैसे यह हिंदी का सबसे बड़ा ब्लागर कौन है?
पहले ब्लागर ने दिखाते हुए कहा-‘‘यही है बड़ा ब्लागर तभी तो इतनी बड़ी किताब लिख है‘अभद्र शब्द संग्रह’!’’
गृहस्वामिनी ने हैरानी से पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘इस देश में भाषा का लेकर तमाम तरह के विवाद चलते हैं। लोग अनेक अभद्र शब्दों को भी भद्र समझ रहे हैं इसलिये लोगों को यह समझाना आवश्यक है कि कौनसे शब्द अभद्र हैं जिनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां! यह विचार तो ठीक है, पर यह सीखने के लिये यह पढ़+ना पढ़ेगा तो ऐसा भी हो सकता है कि लोगों को यही अधिक याद रह जायें और इसका प्रयोग करने लगें।’
गृहस्वमिनी खाली कप लेकर चली गयी तो दूसरा ब्लागर आंखों तरेरता हुआ बोला-‘पक्के बेशर्म हो। तुमने मेरे से पूछे बिना ही मेरी किताब का विमोचन कर दिया। वैसे मुझे अफसोस है कि जब तुम्हें जानता नहीं था तब मैंने यह किताब लिखी थी। फालतू घूमता था तो शाम को घर पर बैठकर लिखता था। अब कंप्यूटर पर टाईप कर एक प्रति लाया था और तुमने उसका विमोचन कर दिया। दूसरी होती तो मैं करता।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तो अभी पैकेट बांध देता हूं। अब कर लो विमोचन।
दूसरा ब्लागर-‘अब तो यह तुम्हारे विमोचन से अपवित्र हो गयी है। खैर एक अफसोस है कि अगर मैं तुमसे पहले मिला होता तो तुम्हारा नाम भी इन अभद्र शब्दा में लिखता।’
इतने में गृहस्वामिनी अंदर आयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘भाभीजी, भाईसाहब के विमोचन से आपकी काफी में मजा आया। अब चलता हूं।’
उसने पहले ब्लागर से किताब वापस मांगी तो उसने कहा-‘मेरे पास रहने दो। इस पर रिपोर्ट कैसे लिखूंगा।’
दूसरा ब्लागर-‘यह एक प्रति है दूसरी होगी तो दे जाऊंगा। हां, इसके विमोचन में अपना नाम मत देना क्योंकि हो सकता है आपकी छवि खराब हो। मेरा ही दे देना।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘तुम भद्र शब्द संग्रह भी तो लिख सकते थे।’
दूसरा ब्लागर-‘यह काम आप जैसे ही कर सकते हैं। आजकल हिट होने के लिये नये नये तरीके अपनाने पड़ते हैं भद्र शब्द तो बहुंत हैं किस किसको लिखें इसलिये अभद्र शब्द संग्रह ही लिखा।’
वह जाने लगा तो पीछे से पहले ब्लागर ने पूछा-‘इस अभद्र शब्द संग्रह पर मैं कोई रिपोर्ट नहीं लिख सकता।’
उसने नहीं सुना और चला गया तो पहला ब्लागर सोच में पड़ गया तो पत्नी ने पूछा-‘क्या सोच में पड़ गये।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘मैंने उससे यह तो पूछा ही नहीं कि इस पर व्यंग्य लिखना है या गंभीर रिपोर्र्ट।
---------------------
दीपक भारतदीप

सूचना-यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं हैं। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा। इस हास्य व्यंग्य का लेखक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नहीं आजतक नहीं मिला।


.....................................................................
दीपक भारतदीप
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप
hasya vyangya

Monday, September 8, 2008

कविता से शायरी शब्द में वजन है-हास्य कविता

लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिये
पहले प्रेमपत्र में लिखी कविता और
अपना नाम लिखा प्रेमी
लड़की के लिये प्रिया का संबोधन लगाया
लड़की ने पत्र बिना उत्तर के वापस लौटाया
दूसरे में उसने लिखी शायरी
अपने नाम के साथ आशिक शब्द लगाया
लड़की को आशुका बताया
वहां से प्यार की मंजूरी का पैगाम पाया

पहली मुलाकात में
आशिक ने माशुका से इसका कारण पूछा
तो उसने बताया
‘कविता शब्द से बोरियत लगती है
शायरी में वजन कुछ ज्यादा है
कवियों की कविता तो कोई पढ़ता नहीं
शायरी के फैन सबसे ज्यादा हैं
फिल्मों में शायरों को ही हीरो बनाते हैं
शायरियों को ही बढि़या बताते हैं
कवियों और कवियों का मजाक बनाते हैं
वैसे तो मुझे कविता और शायरी
दोनों की की समझ नहीं है
पर फिल्मों की रीति ही जमाने में हर कहीं है
पहले पत्र में तुम्हारा काव्य संदेश, प्रेमी और
प्रिया शब्द में पुरानापन लगा
दूसरे पत्र में प्यार और शायरी का पैगाम
तुम्हारा आशिक होना और
मुझे माशुका कहने में नयापन जगा
तुम कवि नहीं शायर हो इससे मेरा दिल खुश हुआ
इसलिये मुझे दूसरा प्रेम पत्र भाया
मैंने भी तुम्हें मंजूरी का पैगाम भिजवाया
............................


यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, September 7, 2008

फिर सोचता हूं कि लिखने में क्या बुराई है-आलेख

समय बदल रहा है और नित नयी तकनीकी के आगमन के साथ ही कोई न कोई नया उपकरण आता है जो संवाद प्रेषण को सरलता प्रदान के साथ उसे गति प्रदान कर रहा है। लोग चाहे जिससे जब बात कर सकते हैं और अपने मन पसंद के चित्र देखने के साथ ध्वनि भी सुन सकते है, पर फिर भी लोग लिखे हुए को पढ़ने को उत्सुक रहते है। कहने को मोबाइल, टीवी तथा इंटरनेट पर ढेर सारे मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। उनमें तमाम तरह के ध्वनि और चित्रों से सुसज्जित सामग्री है। फिर भी लोग किसी का लिखा पढ़ने की अपनी इच्छा के साथ जीते हैं। दुर्भाग्य इस बात का है कि लोग यहां भी वैसे ही व्यवहार कर रहे हैं जैसे वह बाहर करते हैं।

हमने देखा होगा कि अच्छी और ज्ञानवद्र्धक सामग्री जो पढ़ने पर दिल को प्रसन्न कर देती है पर उसके लिये थोड़ा अपने मस्तिष्क को खुला रखना पड़ता है। युवा पाठक और उसे न पढ़कर यौन या जासूसी साहित्य को पढ़ना चाहते हैं। इसी कारण ऐसे प्रकाशकों की बाढ़ आ गयी जिन्होंने यौन और जासूसी साहित्य को प्रधानता दी। सामाजिक साहित्य के नाम पर भी सामान्य समाज से परे खूंखार घरेलू पात्रों से सुसज्जित कहानियां और उपन्यास खूब बिके। ऐसे में उत्कृष्ट साहित्य की रचनाओं का लिखा जाना बंद ही हो गया।

फिर साहित्य के नाम पर भी ऐसे लोगों ने ही लिखा जिनको किसी विचारधारा के होने के कारण पुरस्कार आदि मिलते रहे। आजकल कोई भी नया लेखक उत्कृष्ट साहित्य लिखने की सोच भी नहीं सकता। अगर लिखेगा तो उसे प्रकाशक नहीं मिलेगा और अपने पैसे खर्च करेगा तो उसकी किताबें घर में पड़ी रहेंगी। यही कारण है कि हिंदी में मूल रूप से बेहतर साहित्य लिखना नगण्य हो गया है। अगर देखा जाये तो हिंदी में अनुवाद कर लाया साहित्य ही अधिक लोकप्रिय हुआ। इसका कारण यह है कि भारत की क्षेत्रीय भाषाओं मे जनसंख्या कम है और इस कारण उनमें लिखने वाले लेखकों को अपने लिखे के कारण थोड़ा बहुत सम्मान समाज में मिलता है इसलिये वह लिखते हैं और इसी कारण उनकी बेहतर रचनाएं वहां जब सम्मान पाती है और पुरस्कार मिलने पर उनका हिंदी अनुवाद जब आता है तो वह प्रभावपूर्ण लगती हैं। हिंदी भाषा में मूल रूप से लिखने वालों को समाज कोई अधिक महत्व नहीं देता। हां, अगर कोई लोकप्रिय हो जाये तो पत्र पत्रिकाओं में उसको आराम से जगह मिल जाती है।

इधर देख रहा हूं कि अंतर्जाल पर भी सामान्य पाठकों का व्यवहार कुछ ऐसा ही है। वह तलाश रहे हैं वैसा ही साहित्य जैसा वह सामान्य रूप से पढ़ते हैं। मुझे पहले इसका पता नहीं था पर कुछ प्रयोग किये तो देखा कि शायद मेरे लिखे से अधिक इस बात का महत्व है कि मैं पाठकों के उन मार्गों पर अपना ब्लाग बिछा दूं जहां से वह ऐसा वैसा साहित्य पढ़ना चाहते हैं। हां, इसमें सफलता मिली। लोग पता नहीं जानते हुए मेरा ब्लाग देखते हैं या अनजाने में खोलते हैं। जरूर उनको निराशा होती होगी जब वहां मेरी फालतू कवितायें या व्यंग्य उनके सामने आते हैं। इस तरह हिट्स मिलना मुझे स्वतः ही पसंद नहीं पर अतंर्जाल पर प्रयोगधर्मिता की सुविधाओं का उपयोग करना भी कोई बुरी बात नहीं है। एक बात तय रही कि ऐसे पाठक वहां पढ़ने ही आते हैं कोई ध्वनि या चित्र देखने नहीं क्योंकि उसके लिये तो उनके पास अनेक मार्ग है।

मैंने वह साहित्य भी देखा और पढ़ा है। लगभग वैसा ही है जैसा बाजार में बिकता देखा है। कौन क्या लिखता है या पढ़ता है इससे एक लेखक के रूप मेें किसी मतलब नहीं होना चाहिए पर जब सामाजिक सरोकार से संबंधित लिखना है तो यह सब करना ही पड़ता है। वहां ऐसी सामग्री लिखने वालों ने मेहनत की है पर सवाल यह है कि क्या इतनी लंबी सामग्री का लोग आनंद उठा पाते होंगे। अगर हाथ में किताब हो तो ठीक है यहां कंप्यूटर पर आंखें गढ़ाकर क्या वह इतनी बड़ी सामग्री को पढ़कर एन्जाय कर पाते होंंगे। यौन या जासूसी साहित्य कभी भी संक्षिप्त रूप से नहीं लिखे जाते। वैसे यहां मैं केवल यौन साहित्य की बात कर रहा हूं क्योंकि यहां केवल वही मैंने देखा है। यह पता नहीं कि यह रोज लिखा जाता है या लिख कर रख दिया गया है। मेरा पाठकों के मार्ग में अपने ब्लाग रखने का कारण यह भी है कि हो सकता है कि कोई इसी बहाने अच्छा साहित्य पढ़ने की लालसा लेकर आता हो तो वह पढ़ ले-क्योंकि अधिकतर लोगों को पता ही नहीं कि अच्छा साहित्य भी यहां लिखा जाता है।

अंतर्जाल पर लिखने के लिये सबसे बेहतर तरीका यही है कि संक्षिप्त लिखा जाये। एक बात और भी है कि अगर यौन साहित्य भी लिखा जाये तो उसकी भी गरिमा होती है। पहले कुछ लेखकों ने आदमी की इंद्रियों को भड़काने के लिये ऐसे उपन्यास लिखे पर वह साहित्य का हिस्सा रहे। बिल्कुल सीधी भाषा में लिखे गये यौन साहित्य का आनंद लोगों को आता है पर गरिमा से लिखे गये साहित्य को वह पढ़ें तो फिर उसे ही पढ़ना चाहेंगे। ऐसी कहानियां और व्यंग्य मेरे दिमाग में आते हैं पर उन पर समय बहुत लगता है। फिर संक्षिप्त में लिखना कोई सरल काम नहीं है। किश्तों में भी लिखा जा सकता है। उसके लिये यह जरूरी है कि कहीं से उसके लिये आय होती हो। यौन और जासूसी साहित्य को तो आजकल के प्रकाशन व्यवसाय का एक असली भाग है। ऐसे में अगर मैं यहां मेहनत करूं तो उसका कोई आर्थिक फायदा नजर नहीं आता। फिर मैं सोचता हूं कि सत्साहित्य की वजह से ही जब मुझे जाना जा रहा है तो फिर इस चक्कर में क्यों पड़ूं। जासूसी उपन्यास तो मेरे में लिखने का ख्याल आता है पर उसके लिये आर्थिक प्रोत्साहन के बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है।

मुख्य बात है कि कंप्यूटर पर ऐसा साहित्य पढ़कर अपनी आंखों और देह के साथ खिलवाड़ करना है। ऐसे में जब पाठकों के मार्ग में मेरी छोटी हास्य कवितायें और व्यंग्य आयेंगे तो हो सकता है उन्हें अच्छा लगे। इसमें कोई संशय नहीं है कि सत्साहित्य के लिये कोई धन का भुगतान नहीं करना चाहता । केवल वाहवाही से हर कोई काम चलाता हैं। इधर मैं भी इंटरनेट कनेक्शन अधिक समय तक नहीं चला पाऊंगा। लिखने के जो हालत हैं वह कोई अच्छे नहीं हैं। मुझे अन्य सुविधायें और उपकरण चाहियें ताकि नये तरीके से काम कर सकूं। उसके लिये चाहिये धन। मैं जिस कमरे में लिखता हूं वहां आजकल उमस है। मेरे बैठने की कुर्सी ठीक नहीं है पर अब नयी कुर्सी लाने की सोचना बेकार लगता है। डेढ़ बरस से लिखते हुए बोरियत हो गयी है। अपने लिखने की जगह बदलने का मतलब है उस पर कुछ पैसे खर्च करना। ऐसे में लगता है कि अब क्या लिखना। हां, ब्लागों पर 800 तक की व्यूज संख्या देखकर मन तो प्रसन्न होता है और यही बात सोचकर लिखता हूं कि यार अगर किसी को सुख दे सकता हूं तो उसमें क्या बुराई है। वैसे अब अधिक रचनायें लिखना कठिन होगा यह भी मुझे लगता है।
------------------------------------------------
यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकाऐं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर