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Sunday, September 7, 2008

फिर सोचता हूं कि लिखने में क्या बुराई है-आलेख

समय बदल रहा है और नित नयी तकनीकी के आगमन के साथ ही कोई न कोई नया उपकरण आता है जो संवाद प्रेषण को सरलता प्रदान के साथ उसे गति प्रदान कर रहा है। लोग चाहे जिससे जब बात कर सकते हैं और अपने मन पसंद के चित्र देखने के साथ ध्वनि भी सुन सकते है, पर फिर भी लोग लिखे हुए को पढ़ने को उत्सुक रहते है। कहने को मोबाइल, टीवी तथा इंटरनेट पर ढेर सारे मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। उनमें तमाम तरह के ध्वनि और चित्रों से सुसज्जित सामग्री है। फिर भी लोग किसी का लिखा पढ़ने की अपनी इच्छा के साथ जीते हैं। दुर्भाग्य इस बात का है कि लोग यहां भी वैसे ही व्यवहार कर रहे हैं जैसे वह बाहर करते हैं।

हमने देखा होगा कि अच्छी और ज्ञानवद्र्धक सामग्री जो पढ़ने पर दिल को प्रसन्न कर देती है पर उसके लिये थोड़ा अपने मस्तिष्क को खुला रखना पड़ता है। युवा पाठक और उसे न पढ़कर यौन या जासूसी साहित्य को पढ़ना चाहते हैं। इसी कारण ऐसे प्रकाशकों की बाढ़ आ गयी जिन्होंने यौन और जासूसी साहित्य को प्रधानता दी। सामाजिक साहित्य के नाम पर भी सामान्य समाज से परे खूंखार घरेलू पात्रों से सुसज्जित कहानियां और उपन्यास खूब बिके। ऐसे में उत्कृष्ट साहित्य की रचनाओं का लिखा जाना बंद ही हो गया।

फिर साहित्य के नाम पर भी ऐसे लोगों ने ही लिखा जिनको किसी विचारधारा के होने के कारण पुरस्कार आदि मिलते रहे। आजकल कोई भी नया लेखक उत्कृष्ट साहित्य लिखने की सोच भी नहीं सकता। अगर लिखेगा तो उसे प्रकाशक नहीं मिलेगा और अपने पैसे खर्च करेगा तो उसकी किताबें घर में पड़ी रहेंगी। यही कारण है कि हिंदी में मूल रूप से बेहतर साहित्य लिखना नगण्य हो गया है। अगर देखा जाये तो हिंदी में अनुवाद कर लाया साहित्य ही अधिक लोकप्रिय हुआ। इसका कारण यह है कि भारत की क्षेत्रीय भाषाओं मे जनसंख्या कम है और इस कारण उनमें लिखने वाले लेखकों को अपने लिखे के कारण थोड़ा बहुत सम्मान समाज में मिलता है इसलिये वह लिखते हैं और इसी कारण उनकी बेहतर रचनाएं वहां जब सम्मान पाती है और पुरस्कार मिलने पर उनका हिंदी अनुवाद जब आता है तो वह प्रभावपूर्ण लगती हैं। हिंदी भाषा में मूल रूप से लिखने वालों को समाज कोई अधिक महत्व नहीं देता। हां, अगर कोई लोकप्रिय हो जाये तो पत्र पत्रिकाओं में उसको आराम से जगह मिल जाती है।

इधर देख रहा हूं कि अंतर्जाल पर भी सामान्य पाठकों का व्यवहार कुछ ऐसा ही है। वह तलाश रहे हैं वैसा ही साहित्य जैसा वह सामान्य रूप से पढ़ते हैं। मुझे पहले इसका पता नहीं था पर कुछ प्रयोग किये तो देखा कि शायद मेरे लिखे से अधिक इस बात का महत्व है कि मैं पाठकों के उन मार्गों पर अपना ब्लाग बिछा दूं जहां से वह ऐसा वैसा साहित्य पढ़ना चाहते हैं। हां, इसमें सफलता मिली। लोग पता नहीं जानते हुए मेरा ब्लाग देखते हैं या अनजाने में खोलते हैं। जरूर उनको निराशा होती होगी जब वहां मेरी फालतू कवितायें या व्यंग्य उनके सामने आते हैं। इस तरह हिट्स मिलना मुझे स्वतः ही पसंद नहीं पर अतंर्जाल पर प्रयोगधर्मिता की सुविधाओं का उपयोग करना भी कोई बुरी बात नहीं है। एक बात तय रही कि ऐसे पाठक वहां पढ़ने ही आते हैं कोई ध्वनि या चित्र देखने नहीं क्योंकि उसके लिये तो उनके पास अनेक मार्ग है।

मैंने वह साहित्य भी देखा और पढ़ा है। लगभग वैसा ही है जैसा बाजार में बिकता देखा है। कौन क्या लिखता है या पढ़ता है इससे एक लेखक के रूप मेें किसी मतलब नहीं होना चाहिए पर जब सामाजिक सरोकार से संबंधित लिखना है तो यह सब करना ही पड़ता है। वहां ऐसी सामग्री लिखने वालों ने मेहनत की है पर सवाल यह है कि क्या इतनी लंबी सामग्री का लोग आनंद उठा पाते होंगे। अगर हाथ में किताब हो तो ठीक है यहां कंप्यूटर पर आंखें गढ़ाकर क्या वह इतनी बड़ी सामग्री को पढ़कर एन्जाय कर पाते होंंगे। यौन या जासूसी साहित्य कभी भी संक्षिप्त रूप से नहीं लिखे जाते। वैसे यहां मैं केवल यौन साहित्य की बात कर रहा हूं क्योंकि यहां केवल वही मैंने देखा है। यह पता नहीं कि यह रोज लिखा जाता है या लिख कर रख दिया गया है। मेरा पाठकों के मार्ग में अपने ब्लाग रखने का कारण यह भी है कि हो सकता है कि कोई इसी बहाने अच्छा साहित्य पढ़ने की लालसा लेकर आता हो तो वह पढ़ ले-क्योंकि अधिकतर लोगों को पता ही नहीं कि अच्छा साहित्य भी यहां लिखा जाता है।

अंतर्जाल पर लिखने के लिये सबसे बेहतर तरीका यही है कि संक्षिप्त लिखा जाये। एक बात और भी है कि अगर यौन साहित्य भी लिखा जाये तो उसकी भी गरिमा होती है। पहले कुछ लेखकों ने आदमी की इंद्रियों को भड़काने के लिये ऐसे उपन्यास लिखे पर वह साहित्य का हिस्सा रहे। बिल्कुल सीधी भाषा में लिखे गये यौन साहित्य का आनंद लोगों को आता है पर गरिमा से लिखे गये साहित्य को वह पढ़ें तो फिर उसे ही पढ़ना चाहेंगे। ऐसी कहानियां और व्यंग्य मेरे दिमाग में आते हैं पर उन पर समय बहुत लगता है। फिर संक्षिप्त में लिखना कोई सरल काम नहीं है। किश्तों में भी लिखा जा सकता है। उसके लिये यह जरूरी है कि कहीं से उसके लिये आय होती हो। यौन और जासूसी साहित्य को तो आजकल के प्रकाशन व्यवसाय का एक असली भाग है। ऐसे में अगर मैं यहां मेहनत करूं तो उसका कोई आर्थिक फायदा नजर नहीं आता। फिर मैं सोचता हूं कि सत्साहित्य की वजह से ही जब मुझे जाना जा रहा है तो फिर इस चक्कर में क्यों पड़ूं। जासूसी उपन्यास तो मेरे में लिखने का ख्याल आता है पर उसके लिये आर्थिक प्रोत्साहन के बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है।

मुख्य बात है कि कंप्यूटर पर ऐसा साहित्य पढ़कर अपनी आंखों और देह के साथ खिलवाड़ करना है। ऐसे में जब पाठकों के मार्ग में मेरी छोटी हास्य कवितायें और व्यंग्य आयेंगे तो हो सकता है उन्हें अच्छा लगे। इसमें कोई संशय नहीं है कि सत्साहित्य के लिये कोई धन का भुगतान नहीं करना चाहता । केवल वाहवाही से हर कोई काम चलाता हैं। इधर मैं भी इंटरनेट कनेक्शन अधिक समय तक नहीं चला पाऊंगा। लिखने के जो हालत हैं वह कोई अच्छे नहीं हैं। मुझे अन्य सुविधायें और उपकरण चाहियें ताकि नये तरीके से काम कर सकूं। उसके लिये चाहिये धन। मैं जिस कमरे में लिखता हूं वहां आजकल उमस है। मेरे बैठने की कुर्सी ठीक नहीं है पर अब नयी कुर्सी लाने की सोचना बेकार लगता है। डेढ़ बरस से लिखते हुए बोरियत हो गयी है। अपने लिखने की जगह बदलने का मतलब है उस पर कुछ पैसे खर्च करना। ऐसे में लगता है कि अब क्या लिखना। हां, ब्लागों पर 800 तक की व्यूज संख्या देखकर मन तो प्रसन्न होता है और यही बात सोचकर लिखता हूं कि यार अगर किसी को सुख दे सकता हूं तो उसमें क्या बुराई है। वैसे अब अधिक रचनायें लिखना कठिन होगा यह भी मुझे लगता है।
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

Wednesday, October 3, 2007

चाणक्य नीति:ज्ञानी को लोभी और राजा को सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए

  1. साहसी मनुष्य को अपने पराक्रम का पुरस्कार अवश्य मिलता है। सिंह की गुफा में जाने वाले को संभव है काले रंग का मोती गजमुक्ता मिल जाये परंतु जो मनुष्य गीदड़ की मांद में जायेगा तो उसे गाय की पुँछ और गधे के चमडे के अलावा और क्या मिल सकता है।
  2. धन का लोभ करने वाला ज्ञानी असंतुष्ट रहते हुए अपने धर्म का पालन नहीं कर पाता, इसलिए उसका गौरव शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। उसी तरह राजा भी सन्तुष्ट होते ही नष्ट हो जाता है क्योंकि वह अपने राज्य के प्रति सन्तुष्ट होने के कारण महत्त्वान्काक्षा से रहित सुस्त हो जाता और शत्रु उसे घेर लेता है।
  3. उनका जीवन व्यर्थ है जिन्होंने कभी अपने हाथों से दान नहीं किया, कभी अपने कानों से वैद नहीं सुना, अपने आँखों से सज्जन पुरुषों(साधू-संतों) के दर्शन नहीं किये, जिन्होंने कभी तीर्थयात्रा नहीं की जो अन्याय से प्राप्त किये धन से अपना भरण-भोषण करते हैं, घमंड से जिनका सिर हमेशा ऊंचा रहा।

Tuesday, October 2, 2007

रहीम के दोहे:मागने से पद छोटा हो जाता है

धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय
उदधि बढ़ाई कौन है जगत पिआसो
जाय संत रहीम जल के महत्व का बखान करते हुए कहते हैं कि कीचड का जल भी धन्य है जहाँ छोटे प्राणी उसे पीकर तृप्त हो जाते हैं परंतु सागर की बढ़ाई कोई नहीं करता क्योंकि उसके तट पर जाकर संपूर्ण संसार प्यासा लौटकर आता है।

मांगे घटत रहीम पद, कितौ करौ बढ़ि काम
तीन पैग बसुधा करो, तऊ बावनै नाम

यहाँ आशय यह है कि याचना कराने से पद कम हो जाता है चाहे कितना ही बड़ा कार्य करें। राजा बलि से तीन पग में संपूर्ण पृथ्वी मांगने के कारण भगवान् को बावन अंगुल का रूप धारण करना पडा।

चाणक्य नीति:क्रोध उतना ही करें जितना निभा सकें

  1. जिसके प्रति लगाव(सच्चा प्यार) वह दूर होते हुए भी पास रहता है। इसके विपरीत जिसके प्रति लगाव नहीं है वह प्राणी समीप होते हुए भी दूर रहता है। मन का लगाव न होने पर आत्मीयता बन ही नहीं पाती और किसी प्रकार का संबंध बन ही नहीं पाता।
  2. जिस किसी प्राणी से मनुष्य को किसी भी प्रकार के लाभ मिलने की आशा है उससे सदैव और प्रिय व्यवहार करना चाहिए। मृग का शिकार करने की इच्छा रखने वाला चालाक शिकारी उसे मोहित करने के लिए उसके पास रहकर मधुर स्वर में गीत गाता रहता है।
  3. विद्वान व्यक्ति वही है जो अपने व्यक्तित्व के अनुकूल ऎसी बात करता हो जो प्रसंग के भी अनुकूल हो। अच्छी से अच्छी बात अप्रान्सगिक होकर प्रभावहीन हो जाती है। यदि वह बात अप्रिय हो और उसमें क्रोध की अभिव्यक्ति आवश्यक हो तो वह भी उतना ही प्रदर्शित करना चाहिए जितना निभा सकें।

Wednesday, September 26, 2007

बाजार और प्रचार-हिन्दी हास्य कविता

उपभोक्ता और निर्माता की
मर्जी पर नहीं चलता बाजार
करता है काम एक तंत्र
जिसे कहते हैं प्रचार
सामान खरीदने वाले
कही रेडियो पर सुना हो
कही टीवी पर देखा को
कही पत्र-पत्रिका में पढा हो तब
बनाते अपने विचार का आधार
कभी कौन बनेगा करोड़पति
कभी इंडियन आइडियल
तो कभी चाहिए क्रिकेट का हीरो
उत्पाद बेचने के लिए
आजकल जरूरी है यह सब
नहीं तो सिमट जाता है जीरो
पर पूरा व्यापार

कहै दीपक बापू
आदमी की देह से ज्यादा
उसकी अक्ल पर काबू पाने के लिए
चल रही है विज्ञापन की जंग
जिसमें पैसे के अलावा कोई
किसी का साथी नही
कोई किसी के संग
साथ अपने अक्ल लेकर जाओ बाजार
ठगी से बच नही सकते
सस्ती चीज कही से ले नहीं सकते
किसी चीज की गारंटी भी नहीं उपचार
किसी चीज को खरीद कर ठग जाओ
तो भूल जाओ
मत करो पछतावे का विचार
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Sunday, September 9, 2007

इस तरह वह शादी न हो सकी-हास्य कविता

मंडप में पहुंचने से पहले ही
दूल्हे ने दहेज़ में
मोटर साइकल देने की माँग उठाई
उसके पिता ने दुल्हन के पिता को
इसकी जानकारी भिजवाई
मच गया तहलका
दुल्हन के पिता ने
आकर दूल्हे से किया आग्रह
शादी के बाद मोटर साइकल देने का
दिया आश्वासन
पर दूल्हे ने अपनी माँग
तत्काल पूरी करने की दोहराई

मामला बिगड़ गया
दूल्हे के साथ आए बरातियों ने
दुल्हन पक्ष की कंगाल कहकर
जमकर खिल्ली उडाई
दूल्हन का बाप रोता रहा ख़ून के आंसू
दूल्हे का जमकर हंसता रहा
आख़िर कुछ लोगों को आया तरस
और बीच-बचाव के लिए दोनों की
आपस में बातचीत कराई
मोटर साइकल जितने पैसे
नकद देने पर सहमति हो पाई

दुल्हन के सहेलियों ने देखा मंजर
पूरी बात उसे सुनाई
वह दनदनाती सबके सामने आयी
और बाप से बोली
'पापा आपसे शादी से पहले ही
मैंने शर्त रखी थी कि मेरे
दूल्हे के पास होनी चाहिए कार
पर यह तो है बेकार
मोटर साईकिल तक ही सोचता है
क्या खरीदेगा कार
मुझे यह शादी मंजूर नहीं है
तोड़ तो यह शादी और सगाई'

अब दूल्हा पक्ष पर लोग हंस रहे थे
'अरे, लड़का तो बेकार है
केवल मोटर साइकिल तक की सोचता है'
बाद में क्या करेगा अभी से ही
दुल्हन के बाप को नोचता है
क्या करेंगे ऐसा जमाई'

बात बिगड़ गयी
अब लड़के वाले गिडगिडाने लगे थे
अपनी मोटर साइकल की माँग से
वापस जाने लगे थे
दूल्हा गया दुल्हन के पास
और बोला
'मेरी शराफत समझो तुम
मोटर साइकल ही मांगी
मैं कार भी माँग सकता था
तब तुम क्या मेरे पास हवाई जहाज
होने का बहाना बनाती
अब मत कराओ जग हँसाई'
दुल्हन ने जवाब दिया
' तुम अभी भी अपनी माँग का
अहसान जता रहे हो
साइकिल भी होती तुम्हारे पास
मैं विवाह से इनकार नहीं करती
आज मांग छोड़ दोगे फिर कल करोगे
मैंने तुममें देखा है कसाई'
दूल्हा अपना मुहँ लेकर लॉट गया
इस तरह शादी नही हो पायी
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