Monday, December 29, 2008

दिल का इलाज तो शब्द ही कर पाते हैं-हिंदी शायरी

जख्म दिल पर हों या जिस्म पर
इंसान को बहुत सताते हैं।
जिस्म के लिये तो मिल जाती मरहम
दिल का इलाज तो शब्द ही कर पाते हैं।
कुछ जमाने की सुनो,कुछ अपनी कहो
कई दर्द आवाज में खुद ही बह जाते हैं।
अपने ही दर्द पर हंसना आसान नहीं
पर करते हैं जो ऐसा, अपने बयां खूबसूरती से सजाते हैं।
दुनियां में दर्द के सौदागर भी बहुत हैं
फिर हम अपने दिल की बात क्यों छिपाते हैं।
आओ बाजार चलें इससे पहले कोई चोरी कर जाये
लोगों के सामने अपना दर्द खुद ही सजाते हैं।

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Friday, December 26, 2008

युद्ध कोई क्रिकेट मैच जैसा नहीं होता-आलेख

देश में इस समय एक तरह से युद्धोन्माद का वातावरण बन गया है जो कि स्वाभाविक भी है। हर व्यक्ति अपने समाज और देश से प्रेम करता है और जब उस पर कोई आक्रमण आक्षेप होता है तो उसके मन में क्रोध के भाव आते ही हैं। अक्सर लोग आपस में एक दूसरे से सवाल करते हैं कि ‘पाकिस्तान से क्या युद्ध होगा’, युद्ध होगा कि नहीं’, या युद्ध में आखिर क्या होगा?’

अगर प्रचार और संचार माध्यमों के विश्लेषणों पर दृष्टिपात करने तो पाकिस्तान में भी यही हाल है। ऐसे में दोनों देशों में ज्योतिषयों की भी खूब बन आयी है। भारत में तो ठीक पाकिस्तान में भी कराची और लाहौर के भविष्यवक्ता अपनी बात प्रचारित करवा रहे हैं। वैसे पाकिस्तान धर्म आधारित देश है और उसमें ज्योतिष का कोई स्थान नहीं है पर मनुष्य का मन तो मन ही है जो उसे भटकाता है और जिज्ञासा उत्पन्न करने के साथ उसे शांत करने के लिये प्रेरित भी करता है। बहरहाल युद्धोन्माद के इस वातावरण में ऐसा लगता है कि युद्ध का मतलब कई लोग एक किकेट मैच की तरह समझते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि प्रचार माध्यम ने क्रिकेट और वास्तविक शो का जिस तरह जंग के रूप में प्रचार करते हैं तो लोगों की सोच में यह भी कोई खेल है। यह इसलिये लगता है कि क्रिकेट और रियल्टी शो पर बात करने वाले इस पर भी बात करते हैं। कोई अगर राजनीति का थोड़ा ज्ञान रखने वाला व्यक्ति मिल जाता है तो उससे पूछते हैं कि ‘बताओ भई पाकिस्तान से युद्ध प्रारंभ होगा कि नहीं।’

लोगांें में युद्ध के गंभीर परिणाम की जानकारी का अभाव परिलक्षित होता है। उनको लगता है कि दोनों की सेनायें ऐसे ही लड़ेंगी जैसे कि कोई खेल हो। उनको यह पता नहीं कि दोनों के पास दूर दूर तक फैंकने वाली मिसाइलें हैं जो उनके शहरों पर ही नहीं घरों भी पर गिर सकती हैं। इनमें नई पीढ़ी के लोग भी है जो 1971 में पाक्रिस्तान के विरुद्ध फतह का इतिहास पढ़ चुके हैं। यह अलग बात है कि उस फतह पर देश के विद्वान ही एकमत नहीं है। एक पक्ष तो अब भी निरंतर उस विजय के प+क्ष में लिखता है पर दूसरा पक्ष उस पर उंगली भी उठाता है। उनके दो तर्क हैं-एक तो यह कि उस लड़ाई में जिस बंग्लादेश को आजाद कराया गया वह अब उतना ही आतंकवादियों का अड्डा है जितना पाकिस्तान और वहां के नेता और सेना भारत विरोधी वातावरण बनाये रखते हैं। दूसरा यह कि उसके बाद इस देश में महंगाई और भ्रष्टाचार का दौर शुरू हुआ तो वह अब तक जारी है भले ही भारत विकास की राह पर है पर अभी भी उससे निजात नहीं मिली।
फिर एक समस्या और है। वह यह कि अमेरिका के गुणगान करने वाले भी कुछ अति ही कर जाते हैं। अमेरिका ने यह कर दिखाया और वह कर दिखाया। यह ठीक है कि अमेरिका एक संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र है और वहां के सभ्य समाज की अपनी छबि है। भारत से भी उसका कोई सीधा विरोध नहीं है बल्कि नित प्रतिदिन आर्थिक,सामाजिक तथा व्यापारिक विषयों पर दोनेां के संबंध मधुर होते जा रहे हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है पर इस तरह उसका प्रचार करना कि वह अपराजेय राष्ट्र है एक तरह का भ्रम है।
पहली बात तो यह है कि अमेरिका आज तक वियतनाम युद्ध को नहीं भूल पाया जिसे वह हारा था। उसके बाद क्या वह कभी विजयी हुआ है? मित्रगण इस बारे में अफगानिस्तान और इराक का उदाहरण देते हैं। मगर जनाब! वहां अभी तो जंंग चल रही हैं। अफगानिस्तान में तो यह हालत है कि वह पाकिस्तान से आग्रह कर रहा है कि वह भारत से विवाद के चलते अफगानिस्तान सीमा से अपनी सेना न हटाये। अखबार बता रहे हैं कि पाकिस्तान अमेरिका को ब्लैकमेल कर रहा है। फिर इराक में ही देखिये! वहां लोकतांत्रिक सरकार है पर उसके बारे में कहा जाता है कि वह तब तक ही है जब तक अमेरिका की सेना वहां है। लोकतांत्रिक सरकार होते हुए भी अमेरिका राष्ट्रपति के साथ जो बदतमीजी की गयी उसे दुनियां ने देखा। मतलब वहां उस सरकार की कोई कद्र ही नहीं है।

दो जगह अमेरिका एक साथ लड़ रहा है और अभी विजय का निर्णय होना बाकी है। कहने वालों ने यह तर्क दिया कि 9@11 के बाद तो अमेरिका में कोई आतंकी वारदात नहीं हुई पर इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका की जो जनधन हानि हो रही है वह कोई कम नहीं है। यकीनन वह कोई आतंकी वारदातों से कम नहीं है। नागरिक सुरक्षित हैं अच्छी बात है पर जो सैनिक मर रहे हैं या घायल हो रहे हैं उनकी पीड़ा झेलने वाले भी अमेरिका में बस रहे हैं। मतलब कोई न कोई तो तकलीफ झेल रहा है।

अमेरिका का समर्थक होना कोई बुरा नहीं है पर क्या उसके अंधसमर्थक बतायेंगे कि आज तक वह कितने परमाणू संपन्न राष्ट्रों से लड़ा है? उसने जापान पर परमाणु बम गिराया था क्योंकि उसके पास नहीं था। वैसे अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी बमबारी देखकर उन दृश्य की तारीफ करने वालों को समझना चाहिये कि वहां अमेरिका से लड़ रहे लोग तकनीकी रूप से सक्षम नहीं थे। अमेरिका पैंसठ हजार किलोमीटर ऊपर से बमबारी कर रहा था और इराक और अफगानिस्तान में लड़ रहे उसके शत्रुओं को उनको गिराने के लिये कोई सक्षम नहीं था। इसलिये चाहे वह जैसे बमबारी कर रहा था। फिर वह जमीन की दृष्टि से उनसे बहुत दूर था इसलिये वह चाहकर भी उस तक नहीं पहुंच सकते थे। कुल मिलाकर वह इकतरफा लड़ाईयां थीं पर भारत और पाकिस्तान में युद्ध हुआ तो इसकी संभावना नहीं है कि वह भी ऐसा रहेगा। अपनी गलतफहमी निकाल दीजिये। पाकिस्तान पर हमला करने का साहस तो अमेरिका के पास भी नहीं है इसलिये वह कूटनीति से काम चलाता है। इकतरफा लड़ाई की संभावना के बावजूद अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक में अपने मित्र राष्ट्रों-ब्रिटेन,फ्रंास,ब्रिटेन,जापान तथा अन्य देश- को साथ लिया। उसने अकेले वियतनाम का युद्ध लड़ा जिसे वह हार गया और उसके बाद वह कभी अकेले नहीं लड़ने निकला। अपने यहां एक सुपर स्टार है उनके बारे में उनके एक प्रतिद्वंद्वी रहे एक स्टार ने उसको चुनौती देते हुए कहा था कि‘उसकी कोई भी हिट फिल्म बताईये जो मल्टीस्टार न हो। मैं तो अपने दम पर फिल्में हिट करा चुका हूं।’ कुछ इसी तरह की बात लोग अमेरिका के बारे में भी कहते हैं। यह कोई निराशावादी दृष्टिकोण नहीं है।
परमाणु बम का नाम सुनने के आगे क्या जाना है? उसके बारे में कहा जाता है कि उसकी मार से जो मर गये वह मुक्त हो गये और जो बचे उनकी जिंदगी मौत से बदतर होती है। अभी प्रचार माध्यम युद्धोन्माद का माहौल ऐसे ही बना रहे हैं जैसे कि क्रिकेट और वास्तविक शो का बनाते हैं। जिन लोगों पर देश का जिम्मा है वह काफी सुलझे हुए हैं। उनकी क्षमताओं को कम आंकने वाले स्वयं ही भ्रमित हैं। देश में बुद्धिमान और अनुभवी लोगों की कमी नहीं है। आजकल युद्ध से भी बड़ी चीज है कूटनीति। इस मामले में अपने यहां काफी अनुभवी लोग हैं। देश को तत्काल युद्ध में झौंककर वह ऐसे झमेले में नहीं डाल रहे तो इसके पीछे कोई न कोई वजह है। कूटनीति की मार युद्ध से भी गहरी होती है। पाकिस्तान इस मामले में अधिक दक्ष नहीं समझा जाता। वहां नकारात्मक विचार धारा का बोलबाला है इसलिये उछलकूद कर काम चला लेता है। उसको यह अवसर भी इसलिये मिला क्योंकि अमेरिका ने उसको यह अवसर दिया है। भारत सकारात्मक विचारधारा वाला देश है और इसलिये उसे संयम रखना ही पड़ता है। सीमित सैन्य कार्यवाही की संभावना तो लगती है पर बृहद युद्ध तभी संभव है जब अन्य देश इसके लिये पूरी तरह तैयार हों जिसकी संभावना नगण्य है। वैसे कोई कुछ भी कहे पर समझदार लोगों को इस तरह के युद्धोन्माद में नहीं बहना चाहिये क्योंकि युद्ध कोई क्रिकेट मैच नहीं होता।
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Sunday, December 21, 2008

राजदार पाने के लिए क्यों मचलते हैं-हिन्दी शायरी

आदमी के रूप में सौंप तो
आस्तीन में ही पलते हैं
धोखा देते हैं वही लोग
जो कदम दर कदम साथ चलते हैं
अपना राजदार किसी को न बनाना
ज़माने में अपने ही बदनाम करते हैं
जो तुम अपनी बात दिल में नहीं रखते
तो भला कोई और कैसे रखेगा
इसे कान से उस कान में जाते हुए
शब्द भी अर्थ बदलते हैं
जो कोई और न जाने राज हमारा
यह जानते हुए भी
हम कोई राजदार पाने के लिए क्यों मचलते हैं

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Friday, December 19, 2008

देखने और कहने वाले-हिंदी शायरी

अपनी काबलियत पर न इतना इतराओ
इनाम यहां यूं ही नहीं मिल जाते हैं

भीख मांगने का भी होता है तरीका
लूटने के लिये भी चाहिए सलीका
लोगों की नजरें अब देख नहीं
जब कहीं बवंडर नहीं होता
समंदर भर आंसु बहाकर
जब तक कोई नहीं रोता
काबलियत को कर दो दरकिनार
फरेबी भी बदनाम होकर भी
यहां नाम तो पा जाते हैं
शौहरत होना चाहिये
अच्छा बुरा आदमी भला
लोग कहां देखने आते हैं

अगर नहीं है तुम्हारा झूठ का रास्ता
तो नहीं हो सकता इनाम से वास्ता
अपनी नजरों से न गिरो यह भी कम नहीं
देखने और कहने वालों का क्या
इंसानों की याद्दाश्त होती कमजोर
पल भर को देखकर फिर भूल जाते हैं
भलेमानस इसलिये ही
अपनी राह चले जाते हैं

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Friday, December 12, 2008

नाकाम इंसान की सनद-तीन क्षणिकायें

जीवन में कामयाबी के लिये
शार्टकट(छौटा रास्ता) के लिये
मत भटको यार
भीड़ बहुत है सब जगह
पता नहीं किस रास्ते
फंस जाये अपनी कार
तब सोचते हैं लंबे रास्ते
ही चले होते तो हो जाते पार
..............................
धरती की उम्र से भी छोटी होती हमारी
फिर भी लंबी नजर आती है
जिंदगी में कामयाबी के लिये
छोटा रास्ता ढूंढते हुए
निकल जाती है उमर
पर जिंदगी की गाड़ी वहीं अटकी
नजर आती है
.......................
जिंदगी मे दौलत और शौहरत
पाने के वास्ते
ढूंढते रहे वह छोटे रास्ते
खड़े रहे वहीं का वहीं
नाकाम इंसान की सनद
बढ़ती रही उनके नाम की तरफ
आहिस्ते-आहिस्ते

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Tuesday, December 9, 2008

वह कोई हवा का झोंका था-हिन्दी शायरी

जब वह पास थे तो ऐसा लगता कि
बस हमेशा के लिए साथ हैं
और कभी अलग नहीं होंगे
जब दूर चले गए तो ऐसा लगता है कि
वह कोई हवा का झोंका था तो
जो हमारे पास से गुजर गया
हम उसे गलतफहमी में
अपना समझते होंगे

वादों के तूफानों में कई बार
उन्होने हमें उडाया होगा
अपने लिए सामानों का समंदर
हमसे लेकर जुटाया होगा
हम तो समझते थे दिल का रिश्ता
क्या पता था कि वह दिल के नहीं
हमारी चीजों के कद्रदान होंगे
हमें कितने सपने दिखाते थे
ख़्वाबों के अंबार जुटाते थे
क्या पता था वह हमें
फुर्सत का सामान समझते होंगे
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दिल का दर्द किसे सुनाएँ
कान से सुनते हैं सब
पर दिल के बहरे नजर आयें
जो बोलते हैं जुबान से
पर हमदर्दी के अल्फाज
बोलने की बजाय गूंगे हो जाएं
आंखों से देखते हैं पर
किसी की तकलीफ देखने से
अपने का अंधा बनायें
इससे अच्छा है अपने दर्द
को अकेले में चिल्ला कर
खुद को ही सुनाएं
नहीं तो कोई गीत गुनगुनाएं

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Saturday, December 6, 2008

लगता है जैसे हर आदमी का चरित्र बौना हो-व्यंग्य कविता

वह हमारे दिल से
यूं खेलते रहे जैसे कोई खिलौना हो
हमने पाला था यह भ्रम कि
शायद उनके दिल में हमारे लिये भी कोई कोना हो
मगर कोई उम्मीद नहीं की थी
क्योंकि यह सच भी जानते थे कि
दिखाने के लिये
यहां सभी मोहब्बत करते हैं
अपने मतलब के लिये ही
सब साथ चलते हैं
दिखते हैं कद काठी से कैसे
यह अब सवाल करना है बेकार
पर लगता है जैसे
यहां हर आदमी का चरित्र बौना हो

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Monday, December 1, 2008

अंधेरा और चिराग-हिंदी शायरी

अंधेरे ने चिराग से कहा
‘तू क्यों उस इंसान के लिये
हमारे से लड़ता है
जो सुबह आकाश में आफताब के आते ही
अपने से दूर करता है’
कहा चिराग ने
‘कुदरत ने बनाया है
मुझे तुमसे रात में लड़ने के लिये
सब जगह तुम्हें हटा नहीं सकता
जहां तक है मेरी रोशनी
तेरा घर वहां बन नहीं सकता
जैसे छोटा हूं उतनी ही है मेरी दुनियां
पर अपने कर्तव्य पालन के कारण
बहुत बड़े आफताब के बाद
तुमसे लड़ने में मेरा नाम ही चलता
इस धरती पर कई जगह
आफताब की रोशनी नहीं पहुंचती
वहां भी तेरे साथ मेरी होती जंग
फिर भी तुम्हारे लिये मेरे मन में द्वेष नहीं है
तुम्हारा होना मेरे लिये क्लेश नहीं है
तुम हो इसलिये इंसान को मेरी जरूरत है
आफताब का सहारा कुदरत है
पर तुम नहीं होते तो
हम दोनों का कोई हमारा मोल नहीं समझता
तराजू के एक पलड़ में कोई
चीज तोल नहीं सकता
हमारी रौशनी की पहचान
तुम्हारा अस्तित्व है
लोग भले ही कहें तुम्हारा दुश्मन
पर मैं तो तुम्हें अपना ही दोस्त कहता

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Tuesday, November 25, 2008

अपने जुर्म को अपनी जुबान से इन्साफ कहें-हिन्दी शायरी

रखें हैं उन्होंने जमाने भर का हिसाब
पर अपने पापों का बहता घडा
सब की नज़र से छिपाने के लिए
लोगों के दिल में खौफ करते हैं पैदा
ताकि वह उनका लोहा मानते रहे
दूसरे के जुल्म का भय का शैतान
एक बुत बनाकर रख देते हैं
जिससे डरे लोग
उनकी दगाओं को प्यार समझते रहें

लोगों के जज़्बातों के सहारे चलते हैं
जिनके व्यापार
उनके दिल में कोई जज़्बा नहीं होता
दौलत और शौहरत कमाने वालों के
लिए इन्सान एक शय भर होता
मर जाए या जिन्दा बचे
उनके लिए बीच बाज़ार बिकता रहे
छोटा हो या बड़ा हो इंसान
आँखें हों पर देखे नहीं
कान है पर सुने नहीं
जुबान हैं पर एक शब्द भी बोले नहीं
हाड़मांस का बुत बनकर चलता रहे
इन सौदागरों के ख़ुद के ईमान का पता नहीं
दूसरे का खरीद लेते हैं
जो न बेचे जान उसकी छीन लेते हैं
उन सौदागरों के पेट हैं मोटे
जुबान पर है वफ़ा का नाम
पर नीयत के हैं खोटे
हर आदमी को गुलाम बनाने के लिए
हर तरह के हथियार जमा कर लेते हैं
ज़माने की भलाई का तो नाम है बस
अपने जुर्म को अपनी जुबान से वह इन्साफ कहें
भले लोग उन्हें बताते जो
उनके जुर्म बड़े प्यार से सहें

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Thursday, November 20, 2008

इसलिये उभारते दूसरे के गम-व्यंग्य शायरी

कुछ ख्वाब कुछ हकीकतें
जिंदगी का कारवां
हम बढ़ाये जा रहे यूं ही हम
कभी खुशी तो कभी गम
न किसी की शिकायत करते
न ही किसी की शान में
कभी झूठे कसीदे पढ़ते
खामोशी से चलते जाते अपनी राह हम

फिर भी लोग बैचेन हैं
लगता है कि
इसके घर में कहीं चैन है
दखलांदाजी कर जाते
चाहे जब ताने कस जाते
नहीं रोते शायद किसी के आगे
पी जाते हैंं अपने गम
लोग समझते हैं कि
इसके दुःख दर्द क्यों हैं कम
एक भी आंसू नहीं देखते
क्योंकि जंग लड़ने की आदत है
इसलिये कभी घुटने नहीं टेकते
अपनी आदतों और ख्वाबों के गुलाम
देख नहीं पाते
ढेर सारी कमियों के बाद भी
शायद हमारी आजादी
इसलिये मुफ्त सलाहों की
दवायें यूं ही घर ले आते
यह सोचकर कि बीमारों की
भीड़ में क्यों नहीं शामिल होते हम
हम खामोशी से देखते हैं सब
लोग अपने हालात छिपाने के लिये
मशक्कत तमाम करते हैं
इसलिये उभारते दूसरों के गम

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Sunday, November 9, 2008

जमाने में उसका नाम लेने वाला नहीं बचेगा-हिंदी कविता

वह इतराता रहेगा
बस अपनी बात कहेगा
पर तुम खामोश रहना
अपने शब्द सहजता से रचना
खड़ी रहेगी वह इतिहास में इमारत की तरह
उसका छद्म किला अपने आप ढहेगा

वह आतंक के शब्द रचेगा
बहने लगे खून कहीं
ऐसी उम्मीद करेगा
अपने काले कारनामों के लिये
सफेदपोश मुखौटे तलाश करेगा
तुम सहज और सरल शब्द लिखना
नहीं जरूरत होगी तुम्हें
किसी दूसरे के उधार चेहरे की
कभी न कभी उसके चेहरे पर ही
पुत जायेगी कालिख
कब तक वह चेहरे बदलेगा

वह लगायेगा शांति के नारे
पर चीख मचाता शोर करेगा
अमन और तसल्ली देने का दावा करता
बिखेर देगा अशांति इस जहां में
इसलिये उसका नाम भी चमकेगा
क्योंकि शोर की ताकत होती है ज्यादा
पर उम्र उसकी कम होती है
इसलिये भूल जायेगा जमाना नाम उसका
फिर कौन उसकी कद्र करेगा
तुम लिखना शांति के शब्द
प्रेम का प्रचार करना
जीवन जिससे महकता हो
उसे फूल जैसी रचना का सृजन करना
बनी बनाई इमारतों को ढहाना
बहुत आसान होता है
उसकी आवाज गूंजती है जोर से
इसलिये जमाने की नजर बहुत जल्दी जाती है
फिर फेर भी लेते हैं नजरे लोग उतनी ही जल्दी
जब इमारत का टूटा ढेर नजर आता है
तुम रखना एक एक ईंट अपने हाथ से
बनाना अपनी नयी इमारत
तुम्हारे बदने से निकलते पसीने पर
नहीं जायेगी किसी की नजर
कभी लगेगी भूख तो कभी होगा प्यास का कहर
पर बन जायेगी इमारत रचना की
कीर्ति स्तंभ पर तुम्हारा ही नाम गढ़ेगा

जिसे चमकते देखकर हैरान हुए थे तुम
जिस पर जमीं थी नजर जमाने की
चमकता था नाम जिसका आकाश में
उस विध्वंस और अशांति पैदा करने वाले
शख्स को याद कर तुम सोचोगे
पर जमाने में उसका नाम लेने वाला नहीं बचेगा

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Thursday, November 6, 2008

अपने आप को ही गरीब पाओगे-व्यंग्य कविता


खूब खेलो और नृत्य करो
अभिनय करते हुए लोगों का दिल बहलाओ
जमकर कमाओ पैसा तो महान बन जाओगे
लकड़ी और प्लस्टिक के खिलौनो से
बचपन में खेले लोग
बड़े होकर हांड़मांस के खिलौनो से
खेलने के आदी हो जाते हैं
तुम उनके साथ जमकर खेलो
पर अहसास दिलाओ
उनको स्वयं खेलने का
तो तुम इस जिदंगी के खेल में जीत जाओगे

काल्पनिक कहानियों के पात्र बन जाओ
लोगों को भ्रम में सच दिखाओ
तो तुम उनके इष्ट बन जाओगे
लोगों का चाहिये हर पल कुछ नया
दौलत और शौहरत की इस दौड़ में
जुटे हैं सभी लोग
तुम दिल बहलाकर बटोर लो दौलत
बिना दौड़े किसी दौड़ में
पर्दे पर कई बार विजेता बन जाओगे

सच से दूर रहना सीख लो
खुद को ही दो धोखा
तभी दूसरे को भी दे पाओगे
हां, यह जरूरी होगा
क्योंकि सत्य कभी बदल नहीं सकता
भ्रम के रूप तो पल पल बदल सकते हैं
चमकती रौशनी कितनी भी तेज हो
सूर्य जैसी तो नहीं हो सकती
कितना भी सुंदर सूरत हो
चांद जैसी सीरत नहीं हो सकती
दरियादिल तो दिखने के होते
समंदर जैसी गहराई उनमें नहीं हो सकती
कभी इतिहास के नायकों जैसा
बनने का ख्वाब नहीं देखना
उनकी हकीकत भी वैसी बयान नहीं होती
फिर पूरा जमाना करने लगा है नकल मेे ही
असल जैसा विश्वास
तब असली नायक होने की सोची तो पछताओगे

तुम करते रहो स्वांग
खुद को भी यकीन दिला दो कि
तुम ही हो वाकई महान
अगर नहीं कर सकते तो
आम इंसान बन जाओ
देखो सच को अपनी आंखों से
महसूस करो अपनी ताकत को
जमाना तुम्हें चाहे, यह उम्मीद छोड़ दो
हंसना सीख लो अपनी हालातों पर
जमाने को बताना छोड़ दो
वह हंस सकता है मु्फ्त में तुम पर
अगर मौका दिया हंसने का
उसे अपना दर्द बताकर
तब अपने आप को ही गरीब पाओगे

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Monday, November 3, 2008

मुन्ने के बापू ने भी ऐसा ही लिखा था प्रेमपत्र-हास्य कविता

आवारा आशिक देखता था
उसे रोज गाडी में आते जाते
आ गया दिल तो उसने लिख कर प्रेम प्रस्ताव
और रास्ते में थमा दिया
"प्रिये रोज तुम्हें आते जाते देखता हूँ
तुम पहली हो जिस पर दिल आया
कितना सुन्दर तुम्हारा चेहरा है
क्या लहराते काले लम्बे बाल हैं
तुम्हारी चाल है हाथी की तरह मतवाली
मेरा दिल भी है खाली
इसलिए यह प्रेम प्रस्ताव तुमको दिया"

गाडी पर चलती लडकी भौचक्क रह गयी
किसी तरह संभली
पत्र हाथ में लेकर पढा
फिर गाडी पर बैठकर ही लिख जवाब लिख दिया
"गाडी पर हेलमेट पहनकर चलती हूँ
तुमने मेरे चेहरे के बारे में कैसा अनुमान कर लिया
बालों में लगाती हूँ रंग जो है लाल
घर से जाती हूँ इसी गाडी पर
अपने बच्चे को स्कूल से वापस लाने
वरना कभी बाहर पैदल नहीं चलती
गाडी की चाल हो सकती है मतवाली
मेरी कैसे समझ लिया
पर मुझे याद आया मुन्ने के बापू ने भी
भेजा था ऐसे ही प्रेमपत्र
जब मैं कालिज जाती थी
उस समय नहीं समझी थी
तब भी हेलमेट पहनाकर ऐसी ही गाडी पर जाती
आज पूछूंगी घर आते ही
उन्होंने कैसे मेरी सुन्दरता का वर्णन कर दिया
होता है झगडा तो परवाह नहीं
अच्छा हुआ तुमने मुझे याद दिला दिया
अंधी थी उसके प्यार में
मैंने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया"

लड़के ने उत्तर देखकर अपना सर पीट लिया
फिर जो देखा उसका चेहरा
तो बहुत खुश हो गया
वह उसके उस दोस्त की पत्नी थी
लिखवा गया था ऐसा ही प्रेम पत्र पर
जिसने शादी की बाद उसके लक्षणों को देखते हुए
कभी घर में नहीं घुसने दिया
इस तरह उसने बदला लिया

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Wednesday, October 29, 2008

वासना में लिपटा भाव प्यार नहीं कहलाता-हिन्दी शायरी

किसी के ख्यालों में खो जाना
किसी के वादों में बहकना
किसी के इरादों के साथ बह जाना
क्या कहलाता है प्यार
जिसमें कुछ पल का भटकने की
सजा भी मिल सकती है
जिन्दगी में हर कदम पर बारंबार
कोई एक पहचान खोये
दूसरा उस पर थोपे अपना नाम
बराबरी की शर्त पूरी
नहीं करता ऐसा प्यार
एक खेलता है
दूसरा देखता है
वासना में लिपटा बदन मचले
कहलाता नहीं प्यार
दिल में भोगने की चाहत पूरी करना
जिस्म में जलती आग बुझाना तो
सभी चाहते हैं
पर त्याग और यकीन पर खरे उतरें
कुछ पाने की चाह न हो
तभी कहलाता है प्यार

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Sunday, October 26, 2008

फैसला नये ज़माने के साथ चलने का-हास्य व्यंग्य कविता

समाज के ठेकेदारों की
पड़ती जा रही थी छबि फीकी
उन्होने तय किया
फैसला नये ज़माने के साथ चलने का
अपने तौर तरीकों को बदलने का

पहले लोग घर के झगडों की
पंचायत कराने आते थे
अब अदालतों में जाने लगे थे
उन्होने तरीका यह सोचकर बदला कि अब
लोग लोगों के आने का इन्तजार नहीं करेंगे
ऐसे मुद्दे उछालेंगे कि लोग
आपस में पहले से ज्यादा लड़ेंगे
फिर प्रस्ताव रखेंगे उनके सामने
आपस में समझौते करने का
उनकी योजना काम आयी
उनके पास अब रोज आते हैं
अवसर शांति के प्रवर्तक बनने का
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Tuesday, October 21, 2008

मुफ्त में जुर्म सहती जाना-हास्य कविता

सास ने बहू से कहा
'तुम्हें आज मायके जाने की अनुमति
पर शाम ढलने से पहले घर लौट आना
तेरे ससुर और पति से तेरे जाने की
ख़बर छुपाये रखूँगी
उनके आने से पहले नहीं आई
तो दोनों नाराज होंगे
पडेगा तुम्हें पछताना
हाँ, मेरे लिए कोई तोहफा
जरूर लाना'
बहू बिचारी शाम से पहले वापस आयी
साथ में सास के लिए साड़ी भी लाई
पर सास को साड़ी पसंद नही आयी
और जोर से किया चिल्लाना शुरू
'कैसे कंगाल घर की हैं
इतनी सस्ती साड़ी लाई
ज़रा भी शर्म नहीं आयी
पता नहीं कौनसे मुहूर्त में
इसका रिश्ता अपने बेटे के लिए माना'

बेटा और पति के घर लौटने तक
उसने मचा रखा कोहराम
नहीं करने दिया बहु को आराम
घर में उनके घुसते उसने
उनको दी शिकायत
बहु को कोसने में नहीं की किफायत
ससुर ने बहु से कहा
'बेटी नए जमाने की हो
पर बदला नहीं है ज़माना
तुमने अभी सास-बहु के
रिश्ते को नहीं जाना
कभी तुम सास को खुश नहीं कर सकती
चाहे लाख जतन कर लो
इसलिए कभी सास के लिए कुछ नहीं लाना
अपने पिता का खर्चा करा कर भी झेलने से
तो अच्छा है मुफ्त में सास के जुर्म सहती जाना'
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Sunday, October 12, 2008

जुबान का खेल है यह ज़िन्दगी-व्यंग्य कविता

तुम्हारे मुख से निकले कुछ
प्रशंसा के कुछ शब्द
किस तरह लुभा जाते हैं
जो तुम्हे करते हैं नापसंद
वही तुम्हारे प्रशंसक हो जाते

जुबान का खेल है यह जिन्दगी
कर्ण प्रिय और कटु शब्दों से
ही रास्ते तय हो पाते हैं
जो उगलते हैं जहर अपने लफ्जों से
वह अपने को धुप में खडे पाते
जिनकी बातों में है मिठास
वही दोस्ती और प्यार का
इम्तहान पास कर
सुख की छाया में बैठ पाते

जिन्होंने नहीं सीखा लफ्जों में
प्यार का अमृत घोलना
रूखा है जिनका बोलना
वह हमेशा रास्ते भटक जाते
उनके हमसफर भी अपने
हमदर्द नहीं बन पाते हैं
चुनते हैं भाषा से शब्दों को
फूल की तरह
लुटाते हैं लोगों पर अपनों की तरह
गैरों से भी वह हमदर्दी पाते
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Saturday, October 11, 2008

अंतर्जाल पर पाठ चुराने वाले हैकर भी कम नहीं होंगे-आलेख

पता नहीं वह ब्लागर कभी कभी दिखता है पर उसकी सलाह को कभी नहीं भूल सकता। उसने हैकरों से लड़ने का जो सुझाव दिया वह बहुत दिलचस्प रहा।
उसने कहा था कि मुझे अपने पाठ में उस हैकर के लिये अभद्र शब्द लिख कर एक पाठ डालना चाहिये और फिर उस पाठ को हटा देना चाहिये या फिर उसकी वेबसाइट को चोर बताते एक पाठ लिखना चाहिये। उसे धमकाना चाहिये। आदि आदि।

इधर कई दिनों से देख रहा था कई लोग मुफ्त का माल समझकर मेरे पाठों को उठाये जा रहे थे। कहना यह चाहिये कि उन्होंने अपने साफ्टवेयर इस तरह बनाये हैं कि वह एक जाल बन गये हैं और जब हम अपना पाठ प्रकाशित करते हैं तो वह एक अंतरिक्ष में अपने शब्दों के साथ उठ रहा पाठ पंछी की तरह उनके इस जाल में फंस जाता है। बहरहाल उस ब्लागर की बात ने मेरे दिमाग में एक विचार घुसा दिया। मैंने अपने पाठ में अपने उस ब्लाग/पत्रिका के साथ अन्य ब्लाग/पत्रिका के पते भी लगाना शुरु दिये। वह मेरे पाठ का इस तरह हिस्सा था कि उनकी वेबसाइट पर अगर कोई मेरा पाठ खोलेगा तो मेरा नाम और ब्लाग/पत्रिका भी दिखाई देती है और कोई चाहे तो उनको खोल भी सकता है। जब से इस तरह अपने ब्लाग/पत्रिका के पते देने शुरु किये हैं तब से अब पाठ चोरी होना एक तरह से बंद हो गया है।

सबसे बढि़या बात यह है कि मैंने अपना नाम ब्लाग/पत्रिकाओं के साथ अनजाने में जोड़ा थे पर अब उनका लाभ यह दिखाई दे रहा है कि अंतर्जाल के यह हैकर उससे बचना चाहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि अपनी टिप्पणियों में ब्लाग/पत्रिकाओं में लिख जाते हैं कि प्रसिद्ध ब्लागर हूं-यह मजाक में वह लिखते हैं पर लगता है कि हैकरो ने यह पढ़ा है और इसी डर के कारण अब ऐसी शिकायतें कम हो गयीं हैं।
इन हैकरों ने लव,फ्रेंडस,विकिपीडिया और हिंदी और अन्य अनेक आकर्षक नाम लिखकर अपने वेबसाइट बनायी है। डोमेन पर पैसा खर्च किया पर लिखने के नाम पर पैदल हैं! वह अंतर्जाल पर हिंदी के वैसे ही प्रकाशक बनना चाहते हैं जैसे कि बाहर हैं। उनको लगता है कि ब्लाग लेखक तो एक मजदूर है वैसा ही जैसे कि बाहर होते हैं। यह उनका भ्रम है। अंतर्जाल पर सब वैसा नहीं चलेगा जैसा कि बाहर चल रहा है। वह पाठ लेना चाहते हैं पर नाम नहीं दिखे ऐसा इंतजाम कर लेते हैं तब गुस्सा आना स्वाभाविक है।

एक ब्लाग पर मैं विकिपीडिया का नाम देखकर तो हैरान हो गया और इधर मैं सोच रहा था कि इसकी शिकायत अपने मित्रों से करूं पर मेरी अपनी तकनीकी चालाकी की वजह से वह ब्लाग/वेबसाइट फिर मेरा पाठ लेने नहीं आया। हालांकि उसका लिंक अभी भी मेरे ब्लाग/पत्रिका पर दिख रहा है। हैकरी देखिये कि कोई और लिखे और हम उसका लाभ मुफ्त में उठायें।

इन हैकरों से जूझना भी एक अलग तरह का अनुभव है। कुछ लोगों को मेरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर इस तरह अनेक ब्लाग/पत्रिकाओं का पता देखकर हैरानी होती होगी उनको यह बता दूं कि यह केवल हैकरों से मुकाबला करने के लिये है। ऐसे हैकर जो लेखक का न नाम देना चाहते हैं और न नामा! आगे ऐसे हैकरों की संख्या और बढ़ेगी क्योंकि हिंदी में कई लोग अपने अंदर प्रकाशक होने का भ्रम पाल का डौमेन खरीद रहे हैं और ब्लाग के बारे में उनको लगा रहा है कि वह फ्री के हैं और लेखक तो उनकी नजर में फ्री के होते हैं।

इधर मैंने तय कर लिया है कि हिंदी की आधिकारिक साईटों पर ही जाना ठीक रहेगा। किसी समस्या के लिये ब्लाग लेखक मित्रों से पूछना ही ठीक है क्योंकि अंतर्जाल के बारे में अब वह जितना जानते हैं उतना शायद ही कोई जानता हो। इन हैकरों के बारे में उनसे जानकारी मिली तभी मैंने पाया कि कई ऐसे हैकर हैं जो मेरे पाठ ले जा रहे हैं। यहां यह बात बता दूं कि ब्लाग फ्री के जरूर हैं पर उस पर लिखा गया पाठ फ्री का नहीं होता। लेखक भले ही बैठकर लिखता है और उसका वहां भी पसीना बहता है।
कुछ लोग कहते हैं कि अंतर्जाल पर चोरी रोकने के लिये कानून होना चाहिये। यह बात सही है पर ऐसे हैकरों को बता दूं अनेक ऐसे भी कानून हैं जो उनको अपनी इन मूर्खताओं के लिये संकट में डाल सकते हैं।
डौमेन लेने वाले भी चेत जायें। कम से कम जहां मेरा नाम देखें तो अपने यहां से पाठ हटा लें। अगर मेरा पाठ लेते हैं तो मुझे पूर्व सूचना दें। मेरे पाठ केवल मेरे ब्लाग मित्र और हिंदी के ब्लाग दिखाने वाले चार फोरम ही दिखा सकते हैं क्योंकि यह मैंने तय किया है-अन्य का मामला मेरे विचाराधीन है। वैसे मुझे अपने लिखे से न तो पैसे की आशा है न ही अभी ऐसी कोई उत्सुकता है। भगवान का दिया सब कुछ है और सबसे बड़ी बात यह है कि सरस्वती मां की कृपा है पर अन्य ब्लाग लेखक मित्रों का परिश्रम व्यर्थ आते देख मेरा खून खौल उठता है तब प्रतिकार करने का मन होता है। सीधी बात यह है कि अगर आप अपनी वेबसाइट या ब्लाग पर इस तरह दिखाते हैं कि मेरा नाम नहीं दिखता तो इसका मतलब है कि आपकी नीयत ठीक नहीं है और उसका प्रतिकार आपको कभी भी झेलना पड़ सकता है।
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Wednesday, October 8, 2008

नहीं तो आपकी कंपनी हो जायेगी फेल-हिन्दी शायरी

परेशान निर्माती ने पूछा
अपने प्रचार विशेषज्ञ से के
'सास बहू के धारावाहिक अब
क्यों हो रहे हैं फ्लॉप
अच्छी खबरें नहीं आ रहीं
हमारे धंधे के बारे में
प्रायोजक छोड़ रहे हैं साथ
खतरे में पड़ जायेगी सबकी कमाई
अपने ज्ञान से पता करो आप'

सुनकर बोला प्रचार विशेषज्ञ
'अब तो असली आतंक की
खबरें ही पा रहीं है सब जगह टॉप
आपके धारावाहिक की सासें तो
दिखाती हैं नकल क्रूरता
धमाकों के असली दृश्य टीवी पर देखकर
हर दर्शक दहल जाता है
उसका दिल भी बहल जाता है
हर टीवी चैनल लगा है
उसे भुनाने में
कौन देखेगा अब ऐसे रक्तहीन धारावाहिक
जब आपके कार्यक्रमों के शोर
धमाकों की आवाज में दब जाता हो
हर रोज ऐसा मंजर सामने आता हो
बम कहीं फटता हो
पर चैनल वाले दृश्य के साथ
अपनी असली धमाके की आवाज जोड़कर
आदमी को हिला देते हैं
अब आप भी बंद कर दो
यह सास बहू का खेल
आतंक का कार्यक्रम दो ठेल
आजकल बाज़ार में उसी की है सेल'
नहीं तो हो जायेगी आपकी कंपनी फेल
मैंने पहले ही बता दिया
फिर मुझे दोष न देना आप

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Saturday, October 4, 2008

दूसरों पर फब्तियां कसने लग जाते हैं-हिंदी शायरी

आम इंसानों की तरह
रोज जिंदगी गुजारते हैं
पर आ जाता है
पर सर्वशक्तिमान के दलाल
जब देते हैं संदेश
अपना ईमान बचाने का
तब सब भूल जाते हैं
दिल से इबादत तो
कम ही करते हैं लोग
पर उसके नाम पर
जंग करने उतर आते हैं
कौन कहता है कि
दुनियां के सारे धर्म
इंसान को इंसान की
तरह रहना सिखाते
ढेर सारी किताबों को
दिल से इज्जत देने की बात तो
सभी यहां करते हैं
पर उनमें लिखे शब्द कितना पढ़ पाते हैं
पढ़कर कितना समझते
इस पर बहस कौन करता है
दूसरों की बात पर लोग
एक दूसरे पर फब्तियां कसने लग जाते हैं।
.......................................

<,blockquote>यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
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