Sunday, May 9, 2010

टी-ट्वंटी में बीसीसीआई टीम का तमाशा खत्म-हिन्दी लेख (T-20 world cricket cup-hindi article)

वेस्टइंडीज ने बीसीसीआई की क्रिकेट टीम को बीस ओवरीय प्रतियोगिता में हराकर लगभग बाहर कर दिया हैै और श्रीलंका से आखिरी मैच केवल औपचारिक ही रह गया है।
आईपीएल में भारी कमाई कर चुके बीसीसीआई के खिलाड़ी उसका बोझ बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता में नहीं उठा पायेंगे इसका अनुमान पहले ही अनेक लोगों ने कर लिया था। भारतीय क्रिकेट विशेषज्ञ जानते थे कि शारीरिक थकान और धन के बोझ तले बीसीसीआई क्रिकेट टीम के अधिकांश खिलाड़ी उतने उत्साह से नहीं खेल पायेंगेे जिससे कि विश्व कप जीता जा सके। आज वेस्टइंडीज से हारने के बाद भारत विश्व कप की दौड़ से बाहर हो गया है।
अधिकतर प्रचार माध्यमों में व्यवसायिक विशेषज्ञ पुराने क्रिकेट खिलाड़ी होते हैं पर वह बजाय क्रिकेट के अपने प्रायोजकों के प्रति अधिक समर्पण दिखाते हैं। यह भी संभव है कि उनको दूसरे देशों की टीमों की तैयारी का आभास न रहता हो और उनके ध्यान में केवल भारत और पाकिस्तान दोनों ही देश बसते हैं। इसमें से एक क्रिकेट विशेषज्ञ ने सेमीफायनल ने में चार टीमों में आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, भारत तथा पाकिस्तान का नाम लिया था। उस समय लगा था कि हमारे देश में क्रिकेट के नाम पर कोरे लोग ही बसते हैं क्योंकि उनको लगता है कि चूंकि एशिया के खिलाड़ी कमा खूब रहे हैं इसलिये शायद यही क्रिकेट खेला जाता है। सच बात तो यह है कि पहले तथा दूसरी बीस ओवरीय विश्व कप तक दूसरे देश इस प्रतियोगिता को गंभीरता से नहीं ले रहे थे पर आईपीएल में पैसे के भारी आकर्षण में विदेशी खिलाड़ी अब इस विश्व कप की तैयारी अच्छी करने लगे हैं क्योंकि उनको लगता है कि इससे भारत में क्रिकेट क्लबों के स्वामी उनकी नीलाम बोली अच्छी लगायेंगे। यही कारण है बीस ओवरीय प्रारूप में पाकिस्तान और बीसीसीआई की टीमें अब वैसी मजबूत नहीं मानी जाती जैसे पहले थी। इस प्रतियोगिता में भारत और पाकिस्तान अब सेमीफायनल से लगभग बाहर हो गये हैं।
अब तो यह देखना है कि क्रिकेट में भारत की लोकप्रियत का क्या हाल होता है? इसके बावजूद भी लोग क्रिकेट देखते हैं तो यह मानना पड़ेगा कि यहां केवल पैसा खेलता है, खेल नहीं। दूसरी बात लोग खेल का मतलब हीं नहीं समझते, जो बड़े लोग थोप दें वही खेलने लगते हैं जैसे अंग्रेज इस देश को क्रिकेट का खेल थोप गये हैं जिसे केवल आठ देश ही खेलते हैं। क्रिकेट गुलामों का खेल है और हमारे देश् के लोग गुलामी की मानसिकता के साथ जीने के आदी हो चुके हैं।
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Sunday, May 2, 2010

समाज सेवा और अपराध-हिन्दी क्षणिकायें (social service and crime-hindi short poem)

समाज सेवा शुरु करने से पहले
कोई न कोई अपराध करना जरूरी है,
लोग देते हैं डर कर चंदा
कभी नहीं पड़ता धंधे में मंदा,
घी निकालने के लिये टेढी उंगली की तरह
चलना आजकल की मजबूरी है।
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नैतिकता की बातें करते वह लोग,
दौलत पाने की चाहत का लगा जिनको रोग।
सिमट गया है शिखर पुरुषों का दायरा
वाद और नारों के इर्दगिर्द,
खुद हो गये हैं सफेदपोश
काले करनामों अंजाम दे रहे उनके शागिर्द,
लोगों को त्याग करने की क्या प्रेरणा देंगे
अपने लिये जुटा रहे ढेर सारे भोग।
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दुःख इस बात का नहीं कि
वह अपने वादे से मुकर गये,
तकलीफ इस बात ये हुई,
वह अपना यकीन हमारे यहां खो गये।
चेहरे पर नकाब पहनकर धोखा देते तो
कोई बात नहीं थी,
पर हमारे अरमान का कत्ल कर
वह झूमकर नाचे
जैसे खुद शहंशाह हो गये।
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Wednesday, April 28, 2010

पर इसे रहस्य रखना है-हिन्दी शायरी (rahasya-hindi shayari)

चारों तरफ से बरस रहा है पैसा
पर इसे रहस्य रखना है,
उंगली के इशारे पर कत्ल कराना
पर इसे रहस्य रखना है,
लुट लो खज़ाना जमाने का
पर इसे रहस्य रखना है,
लोगों से वफा का दिखावा, मतलब अपना निकालना
पर इसे रहस्य रखना है,
दुश्मन ने कमजोरी देख ली
पर इसे रहस्य रखना है,
रहस्य एक हथियार की तरह है
पर इसे रहस्य रखना है।
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Sunday, April 25, 2010

ढाई कौड़ी की सोच-हिन्दी हास्य व्यंग्य

एक सरकारी अधिकारी के यहां छापा मारकर ढाई हजार करोड़ की अवैध संपत्ति का पता लगाया गया। डेढ़ टन सोना बरामद किया। यह खबर अखबार में पढ़कर अपने तो होश ही उड़ गये-आजकल अक्सर ऐसा होने लगा है।
हम सोचने लगे कि इतने सारी संपत्ति वह अधिकारी संभालता कैसै होगा। अपने से तो ढाई हजार रुपये की रकम हीं नहीं संभलती। पहले तो इतनी बड़ी रकम साथ लेकर निकलते ही नहीं-कुछ तो लेकर निकलते ही हैं क्योंकि इतने बड़े आदमी नहंी है कि साथ में सचिव वगैरह हो खर्च करने के लिये या लोग मुफ्त सेवा के लिये आतुर रहते हों-अगर साथ लेकर निकलते ही हैं तो कुछ पर्स में रखेंगे, कुछ पेंट की अंदरूनी जेब में तो कुछ शर्ट की जेब में और बाकी पेंट की दायीं जेब में।
इसके चलते एक बार हमें अपमानित भी होना पड़ा जब हमारा पर्स खो गया तो एक टूसीटर चालक वापस करने आया। उसमें एटीएम कार्ड था जो गरीब होने की छबि से बचाता है, इसलिये शर्मिंदा होने से बचे और और उस टूसीटर चालक ने कहा भी था कि ‘आपका एटीएम देखकर वापस करने का मन हुआ था वरना तो उसमें एक भी पैसा भी नहीं था जिससे वापस करने का विचार करता।’
कभी एक साथ ढाई लाख की रकम नहीं देखी इसलिये ढाई करोड़ जैसा शब्द ही डरा देता है। ऐसे में उसके साथ सौ का शब्द तो अंदर तक हिला देता है। देश की विकासदर बढ़ रही है पर अपनी विकास दर स्थिर है इसलिये यह सौ करोड़ या हजार करोड़ शब्द ही मातृभाषा हिन्दी से पृथक किसी दूसरी भाषा के शब्द प्रतीत होते हैं। उस समय सोच के दरवाजे ही बंद हो जाते हैं।
एक समय तक इस देश में करोड़ की रकम भ्रष्टाचार में पकड़े जाने तक सम्मानजनक मानी जाती थी। उसके बाद सौ करोड़ अब तो हजार करोड़ों से नीचे बात ही कहां होती है। वैसे आजकल अधिकारियों के पकड़े जाने की चर्चा खूब होती है। इसमें कुछ गरीब अधिकारी भी फंसे हैं जिनके पास सौ करोड़ के मानक में संपत्ति थी।
जब ऐसी खबरे आती हैं तो हमें कुछ देर लगता है कि जैसे वह इस धरती की चर्चा नहीं होगी कहीं स्वर्ग वगैरह का मामला होगा वरना यहां हजार करोड़ रखने की किसके पास ताकत होगी-यह तो ऊपर वाले देवताओं की कृपा हो सकती है जो स्वर्ग में ही रहते हैं। फिर शहर और प्रदेश देखते हैं तो यकीन करना ही पड़ता है कि इस धरती पर भी दूसरी दुनियां है जिसमें केवल पैसे वाले रहते हैं और भले ही उन सड़कों पर घूमते हों जहां से हम भी निकलते हैं पर उनको न हम जैसे लोग दिखाई देते हैं और न वह इनको देख पाते हैं। इतने हजार करोड़ों रुपये के मालिक भला खुले में निकल कहां सकते हैं? उनको तो चाहिये लोहे लंगर के बने हुए चलते फिरते किले।
प्रेम के ढाई आखर पढ़ ले वही पंडित बन जाये, पर जिससे पंडित नहीं बनना हो वह ढाई में सौ का गुणा करते हुए इस मायावी दुनियां में बढ़ता जाये। मुश्किल हम जैसे लोगों की है जिनके पास यह गुणा करने की ताकत नहीं है।
डेढ़ टन सोना। कर लो बात! यहां अपने घर में डेढ़ तोले सोने पर ही बात अटक जाती है। हमारे मित्र को अपने पत्नी के लिये सोने की चूड़ियां बनवानी थी। एक दिन हम से उसने कहा-‘अभी तय नहीं कर पा रहा कि एक तोले की चार चूड़ियां बनवाऊं या डेढ़ डेढ़ तोले की दो।’
हमने कहा-‘क्या यार। अभी भी एक ड़ेढ तोले पर ही अटके हुए हो। सोना तो विनिवेश करने एक अच्छा साधन है। दो दो तोले की चार बनवा लो।’
वह बोला-‘यार, औरतों को पहननी भी तो पड़ती हैं। भारी हो जाती हैं।’
सोना पहनने में भारी होता है पर रखने में नहीं। आम औरतें सोना पहनने के लिये लेती हैं ताकि समाज में उनकी अमीरी का अहसास बना रहे। विशिष्ट लोगों की औरतों में तो अब सोना पहनने का शौक नहीं रहा। शायद इसका कारण यह है कि किसी वस्तु अधिकता से बोरियत हो जाती है-यह अर्थशास्त्र के उपयोगिता नियम के अनुसार विचार है- अपने घर में टनों सोना देखकर उनका मन वैसे ही भर जाता है तब उसके गहने बनवाने का विचार उनको नहंी आता। वैसे ही उनका रौब इतना रहता है कि अगर गहने न भी पहने तब भी आम लोग उनकी अमीरी का लोहा मानते हैं। ऐसी औरतों के पति अगर बड़े पद पर हों तो वह सोने की बरफी-बिस्कुट भी कह सकते हैं-बनाने वाले हलवाई हो जाते हैं जो अपना माल खुद उपभोग में नहीं लाते। उनके घर की नारियां भी ऐसे ही हो जाती हैं कि क्या अपने पति का बना माल खाना’।
हद है यार! क्या लिखें और क्या कहें! ढाई हजार करोड़ रुपये की संपत्ति और डेढ़ टन सोने की मात्रा देखते हुए अपनी औकात नहीं लगती कि उस पर कुछ लिखें। मुश्किल यह है कि जिनकी औकात है वह लिखेंगे नहीं क्योंकि उनको तो अपने गुणा भाग से ही फुरसत नहीं होती। यह लिखने का काम तो ढाई कौड़ी के लेखक ही करते हैं-यकीनन इतनी औकात तो अपनी है ही। अपनी आंखें ढाई हजार पर ही बंद हो जाती हैं पर ऐसे महानुभाव तो गुण पर गुणा करते हुए बढ़ते जाते हैं। आखिर उनको जिंदा रहने के लिये कितना पैसा चाहिये। यह सोचकर ही हमारी सोच भी जवाब देने लगती है वह भी तो ठहरी आखिर ढाई कौड़ी की।
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Wednesday, April 21, 2010

मशहूर-हिन्दी शायरी (mashahur or famous-hindi shayri)

कुछ इंसानों के दौलतमंद बनने के किस्से
ज़माने में मशहूर हो जाते हैं
क्योंकि गरीब दुनियां में हैं ज्यादा
उनमें दिल लगाने को मजबूर हो जाते हैं।
अवाम भटके अक्ल की राह,
देख भरे हस्तियों को आह,
काबू में रखने के लिये भीड़ को
सौदागर बेचते हैं सपने
जिन्हें देखते देखते हुए
लोग अपनी असलियत से दूर हो जाते हैं।
कुछ खामोशी से झेलते हैं तकलीफ
कुछ खंजर लेकर मशहूर हो जाते हैं।
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Thursday, April 15, 2010

किक्रेट में सब चलता है-हिन्दी व्यंग्य (it's cricekt-hindi satire article)

उफ! यह क्रिकेट है! इस समय क्रिकेट खेल को देखकर जो विवाद चल रहा है उसे देखते हुए दिल में बस यही बात आती है कि ‘उफ! यह क्रिकेट है!
इस खेल को देखते हुए अपनी जिंदगी के 25 साल बर्बाद कर दिये-शायद कुछ कम होंगे क्योंकि इसमें फिक्सिंग के आरोप समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपने के बाद मन खट्टा हो गया था पर फिर भी कभी कभार देखते थे। इधर जब चार वर्ष पूर्व इंटरनेट का कनेक्शन लगाया तो फिर इससे छूटकारा पा लिया।
2006 के प्रारंभ में जब बीसीसीआई की टीम-तब तक हम इसे भारत की राष्ट्रीय टीम जैसा दर्जा देते हुए राष्ट्रप्रेम े जज्बे के साथ जुड़े रहते थे-विश्व कप खेलने जा रही थी तो सबसे पहला व्यंग्य इसी पर देव फोंट में लिखकर ब्लाग पर प्रकाशित किया था अलबता यूनिकोड में होने के कारण लोग उसे नहीं पढ़ नहीं पाये। शीर्षक उसका था ‘क्रिकेट में सब कुछ चलता है यार!’
टीम की हालत देखकर नहंी लग रहा था कि वह जीत पायेगी पर वह तो बंग्लादेश से भी हारकर लीग मैच से ही बाहर आ गयी। भारत के प्रचार माध्यम पूरी प्रतियोगिता में कमाने की तैयारी कर चुके थे पर उन पर पानी फिर गया। हालत यह हो गयी कि उसकी टीम के खिलाड़ियों द्वारा अभिनीत विज्ञापन दिखना ही बंद हो गये। जिन तीन खिलाड़ियों को महान माना जाता था वह खलनायक बन गये। उसी साल बीस ओवरीय विश्व कप में भारतीय टीम को नंबर एक बनवाया गया-अब जो हालत दिखते हैं उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है क्योंकि क्रिकेट के सबसे अधिक ग्राहक (प्रेमी कहना मजाक लगता है) भारत में ही हैं और यहां बाजार बचाने के लिये यही किया गया होगा। उस टीम में तीनों कथित महान खिलाड़ी नहीं थे पर वह बाजार के विज्ञापनों के नायक तो वही थे। एक बड़ी जीत मिल गयी आम लोग भूल गये। कहा जाता है कि आम लोगों की याद्दाश्त कम होती है और क्रिकेट कंपनी के प्रबंधकों ने इसका लाभ उठाया और अपने तीन कथित नायकों को वापसी दिलवाई। इनमें दो तो सन्यास ले गये पर वह अब उस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में खेलते हैं। अब पता चला है कि यह प्रतियोगिता तो ‘समाज सेवा’ के लिये आयोजित की जाती है। शुद्ध रूप से मनोरंजन कर पैसा बटोरने के धंधा और समाज सेवा वह भी क्रिकेट खेल में! हैरानी होती है यह सब देखकर!
आज इस बात का पछतावा होता है कि जितना समय क्रिकेट खेलने में बिताया उससे तो अच्छा था कि लिखने पढ़ने में लगाते। अब तो हालत यह है कि कोई भी क्रिकेट मैच नहीं देखते। इस विषय पर देशप्रेम जैसी हमारे मन में भी नहीं आती। हम मूर्खों की तरह क्रिकेट देखकर देशप्रेम जोड़े रहे और आज क्रिकेट की संस्थायें हमें समझा रही हैं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। यह अलग बात है कि टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाओं जब भारत का किसी दूसरे देश से मैच होता है तो इस बात का प्रयास करते हैं कि लोगों के अंदर देशप्रेम जागे पर सच यह है कि पुराने क्रिकेट प्रेमी अब इससे दूर हो चुके हैं। क्रिकेट कंपनियों की इसकी परवाह नहीं है वह अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की आड़ में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव के दर्शक ढूंढ रहे हैं। इसलिये अनेक जगह मुफ्त टिकटें तथा अन्य इनाम देने के नाम कुछ छिटपुट प्रतियोगितायें होने की बातें भी सामने आ रही है। बहुत कम लोग इस बात को समझ पायेंगे कि इसमें जितनी बड़ी राशि का खेल है वह कई अन्य खेलों का जन्म दाता है जिसमें राष्टप्रेम की जगह राष्ट्रनिरपेक्ष भाव उत्पन्न करना भी शामिल है।
कभी कभी हंसी आती है यह देखकर कि जिस क्रिकेट को खेल की तरह देखा वह खेलेत्तर गतिविधियों की वजह से सामने आ रहा है। यह क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में ऊपर क्या चल रहा है यह तो सभी देख रहे हैं पर जिस तरह आज के युवा राष्ट्रनिरपेक्ष भाव से इसे देख रहे हैं वह चिंता की बात है। दूसरी बात जो सबसे बड़ी परेशान करने वाली है वह यह कि इन मैचों पर सट्टे लगने के समाचार भी आते हैं और इस खेल में राष्ट्रनिरपेक्ष भाव पैदा करने वाले प्रचार माध्यम यही बताने से भी नहीं चूकते कि इसमें फिक्सिंग की संभावना है। सब होता रहे पर दाव लगाने वाले युवकों को बर्बाद होने से बचना चाहिेए। इसे मनोंरजन की तरह देखें पर दाव कतई न लगायें। राष्ट्रप्र्रेम न दिखायें तो राष्ट्रनिरपेक्ष भी न रहे। हम तो अब भी यही दोहराते हैं कि ‘क्रिकेट में सब चलता है यार।’
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Friday, April 9, 2010

डर है घर के नादानों से-हिन्दी शायरी (ghar ke nadan-hindi shayri)

घाव थोड़ा हो वह ज्यादा दिखलाते हैं,
भला करने वाले इसलिये कहलाते हैं।
लाल स्याही से लिखते, जमाने का बयान,
जंग का इनाम अमन बताते हैं।
रहबर हो गये कुर्बाल, जमाने के लिये
वह उनके उसूलों
पर उंगली उठाते हैं।
वातानुकूलित कक्षों मे रहते, कारों में जाते हुए
बदनसीबों की बदहाली से अपनी नज़र मिलाते हैं।
जवानी से बुढ़ापे तक, किया पाखंड का सौदा
जमीन पर बिखरे जवां खून में भी वह फर्क दिखाते हैं।
कहें दीपक बापू, दुश्मन इतने खतरनाक नहीं
डर है घर के नादानों
से, जो अपनी नीयत छिपाते हैं।
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कैमरा था जब उनके सामने
बेबसों के कत्लेआम पर वह आंसु बहा रहे थे।
जो उससे हुए दूर तो
शराब खाने में मुस्कराते हुए जाम में नहा रहे थे।
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Sunday, April 4, 2010

मोहब्बत के जज़्बात-हिन्दी शायरी (mohbbat ke jazbat-hindi shayri)

इश्क के चर्चे जमाने में बहुत हुए,
जो एक हुए दो बदन
लोगों ने बीता कल मान लिया।
जो उतरा हवस का भूत
तो घर का बोझ
दिमाग पर बढ़ने लगा
जिंदगी में फिर कभी इश्क का नाम न लिया।
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जो पत्नी को प्रियतमा न समझे
भटके हैं प्यार पाने के लिये इस दर से उस दर।
दिल में पल रहे जज़्बात
जमीन पर चलते नहीं देखे जाते,
इश्क है या हवस
इसकी पहचान नहीं कर पाते,
सर्वशक्तिमान समझे जो इंसानी जिस्म को
मोहब्बत नहीं टिकती कभी उनके घर।
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Thursday, April 1, 2010

अपने दर्द पर हंसना सीख लो-हिन्दी शायरी (apne dard par hansna seekh lo-hindi shayri)

अपने दर्द का बोझ कब तक सहेंगे।
हल्का लगेगा जब दिल से हंसेंगे।
अपने ख्वाब पूरे होने की सौदागरों से चाहत
कब तक ईमान बेचकर पूरी करेंगे।
बाजार में बिकती है ढेर सारी शयें
उनके कबाड़ होने पर, घर कब तक भरेंगे।
दिखा रहे हैं बड़े और छोटे पर्दे पर नकली दृश्य
झूठे जज़्बातों से कब तक अपना दिल भरेंगे।
अपने दर्द पर हंसना सीख लो यारों
रोते हुए जिंदगी के दरिया में कब तक बहेंगे।
दिल को दे सुकून, भुला दे सारे गम
वह दवा तभी बनेगी, जब खुद अपनी बात पर हंसेंगे।
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Monday, March 29, 2010

शब्द और गणित-हिन्दी व्यंग्य कविता (word and mathmatics-hindi vyangya kavita)

उपदेश देते हुए उनकी
जुबान बहुत सुहाती हैं,
और बंद कमरे में उनकी हर उंगली
चढ़ावे के हिसाब में लग जाती है।
किताबों में लिखे शब्द उन्होंने पढ़े हैं बहुत
सुनाते हैं जमाने को कहानी की तरह
पर अकेले में करते दौलत का गणित से हिसाब
लिखने में कलम केवल गुणा भाग में चल पाती है।
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अपनी भाषा छोड़कर
कब तक कहां जाओगे,
किसी कौम या देश का अस्त्तिव
कभी भी मिट सकता है
परायी भाषा के सहारे
कहां कहां पांव जमाओगे।
दूसरों के घर में रोटी पाने के लिये
वैसी ही भाषा बोलने की चाहत बुरी नहीं है
दूसरा घर अकाल या तबाही में जाल में फंसा
तो फिर तुम कहां जाओगे।
अपनी भाषा तो नहीं आयेगी तब भी जुबां पर
फिर दूसरे घर की तलाश में कैसे जाओगे।
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Thursday, March 25, 2010

लुटेरे पहरेदार बनाये जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता (lutere aur paharedar-hindi satire poem)

अब तो पत्थर भी तराश कर
हीरे बनाये जाते हैं,
पर्दे पर चल रहे खेल में
कैमरे की तेज रोशनी में
बुरे चेहरे भी सुंदरता से सजाये जाते हैं।
ख्वाब और सपनों के खेल को
कभी हकीकत न समझना,
खूबसूरत लफ्ज़ों की बुरी नीयत पर न बहलना,
पर्दे सजे है अब घर घर में
उनके पीछे झांकना भी मुश्किल है
क्योंकि दृश्य हवाओं से पहुंचाये जाते हैं।
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कायरों की सेना क्या युद्ध लड़ेगी
नायक सबसे अधिक कायर बनाये जाते हैं।
कुछ खो जाने के भय से सहमे खड़े है
भीड़ में भेड़ों की तरह लोग,
चिंता है कि छिन न जायें
तोहफे में मिले मुफ्त के भोग,
इसलिये लुटेरे पहरेदार बनाये जाते हैं।
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Sunday, March 14, 2010

वह सिकंदर कहलायेगा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (vah sikandar kahlayega-hindi satire poem)

खतरा है जिनसे जमाने को
उनके घर सुरक्षा के पहरे लगे हैं,
लोगों के दिन का चैन
और रात की नींद हराम हो जाती जिनके नाम से
उनके घर के दरवाजे पर पहरेदार, चैबीस घंटे सजे हैं।
कसूरवारों को सजा देने की मांग कौन करेगा
लोग बेकसूर ही सजा होने से डरने लगे हैं।
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बाजार में जो महंगे भाव बिक जायेगा,
वही जमाने में नायक कहलायेगा।
जब तक खुल न जाये राज
कसूरवार कोई नहीं कहलाता,
छिपायेगा जो अपनी गल्तियां
वही सूरमा कहलायेगा।
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इंसान कितना भी काला हो चेहरा
पर उस पर मेअकप की चमक हो,
चरित्र पर कितनी भी कालिख हो
पर उसके साथ दौलत की महक हो,
वह शौहरत के पहाड़ पर चढ़ जायेगा।
बाजार में बिकता हो बुत की तरह जो इंसान
लाचार हो अपनी आजाद सोच से भले
पर वह सिकंदर कहलायेगा।

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Thursday, March 11, 2010

अहसास और सोच-हिन्दी व्यंग्य कविता (ahsas aur soch-hindi vyangya kavita)

देखते हैं घर की सजावट
दिल का प्यार नहीं देखते,
थाली में सजे व्यंजन पर है नज़र
सांसों की धड़कन में पल रहे
जज़्बात नहीं देखते।
इंसानी बुतों की दिल्लगी में
ढूंढ रहा है पूरा जमाना
कोई ख्वाबी जन्नत
हकीकत के इंसान नहीं देखते।
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अपने दिमाग पर उठाये बोझ
घूम रहे हैं लोग,
पल रहा है तनावों का रोग,
चल रही है दुनियां अपने आप
पर खुद पर टिके होने का अहसास सभी ने पाला।
सिकुड़ गये हैं लोगों के कदम
अपने मतलब की मंजिल तक
उससे आगे लगा है सोच पर ताला।
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Tuesday, March 9, 2010

हिन्दी ब्लाग का वैचारिक प्रभाव दिखने लगा है-आलेख (hindi blog's thought in media)

अंतर्जाल पर हिन्दी भाषा में लिख रहे लेखकों को अभी इसका अनुमान नहीं है कि संगठित प्रचार माध्यम-टीवी, रेडियो और समाचार पत्र पत्रिकाऐं-उनके ब्लाग पर नज़र रख रहे हैं। कुछ ब्लाग लेखक लिखते हैं कि इंटरनेट पर लिखने से समाज में कोई बड़ा वैचारिक बदलाव नहीं आने वाला तो उनकी स्थिति दो प्रकार की ही हो सकती है। एक तो यह कि वह अपने पाठों में कोई वैचारिक बात नहीं रखते और दूसरी यह कि रखते हैं तो उनके मौलिक न होने का अहसास स्वयं को है।
एक बड़े पत्रकार के व्यंग्य पर हिल जाने वाले हिन्दी ब्लाग जगत को अगर किसी बात की जरूरत है तो वह है आत्मविश्वास। प्रसंग वश यह लेख भी एक ऐसे ही टीवी और अखबार पत्रकार के लेख पर ही आधारित है जिसमें वह कुछ निष्पक्ष दिखने का प्रयास कर रहे थे। वह मान रहे थे कि केवल दो विचारधाराओं के मध्य ही प्रसारण माध्यमों में कार्यक्रम और समाचार पत्र पत्रिकाओं में आलेख होते हैं। उनका यह भी था कि जब हम कहीं बहस करते हैं तो एक तरफ राष्ट्रवादी तो दूसरी तरफ समतावादी विद्वानों को ही बुलाते हैं जो अपनी धुरी से इतर कुछ नहीं सोचते न बोलते। कहने का अभिप्राय यह है कि वह उस सत्य को स्वीकार कर रहे थे जिसे स्वतंत्र और मौलिक ब्लाग लेखक लिखते आ रहे हैं।
यहां यह भी उल्लेख करें कि वह पत्रकार स्वयं ही राष्ट्रवादियों पर सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगाकर अपने को समतावादी बताते रहें तो राष्ट्रवादियों ने भी उनको अपने धुरविरोधियों की सूची में शामिल कर रखा है। इतने बरसों से प्रचार माध्यमों में सक्रिय विद्वान की अभिव्यक्त्ति अपनी ही थी पर विचारों का स्त्रोत हिन्दी ब्लाग जगत का दिखा जहां यह बातें लिखी गयी हैं। कहने को तो यह भी कह जा सकता है कि इतने बड़े आदमी को भला कहां फुरसत रखी है? मगर यह सोचना गलता होगा। दरअसल आम पाठक इतना ब्लाग जगत पर नहीं आ रहा जितना यह बुद्धिजीवी आ रहे हैं। वजह साफ है कि वह अभी तक एक तय प्रारूप में चलते आ रहे थे इसलिये कुछ नया सोचने की जरूरत उनको नही थी पर इधर हिन्दी ब्लाग एक चुनौती बनता जा रहा है इसलिये यह संभव है कि वह यहां से विचारों को उठकार उस पर अपने मौलिक होने का ठप्पा लगाये क्योंकि उनके पास प्रचार माध्यमों की शक्ति है।
इन दो विचारधाराओं पर चलने वाली बहसों में आम आदमी का एक विचारवान व्यक्ति की बजाय निर्जीव प्रयोक्ता के रूप में ही रखा जाता है। सवाल यह है कि उनको यह विचार कहां से आया कि प्रचलित विचाराधाराओं से अलग भी किसी का विचार हो सकता है?
जवाब हम देते हैं। हिन्दी ब्लाग जगत पर बहुत कम लिखा जा रहा है पर याद रखिये न छपने की कुंठा लेकर आये ब्लाग लेखकों के साथ उनकी अभिव्यक्त होने के लिये तरस रही अपनी विचाराधारायें हैं। यह विचाराधारायें न तो विदेश से आयातित हैं और न अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से संपन्न देशी विद्वानों के सतही सोच पर आधारित है। वह उपजी है उनके स्वयं के विचार से। कहने का अभिप्राय है कि इंटरनेट पर हिन्दी में लिखने वाले ब्लाग लेखक बाहर चल रही गतिविधियों और प्रचार पर नज़र रखें। उनमें वैचारिक बदलाव नज़र आ रहा है। यह सच है कि हिन्दी ब्लाग जगत पर आम पाठकों की संख्या कम है पर खास वर्ग उस पर नज़र रखे हुए है क्योंकि एक ही विचार या नारे पर चलते हुए उसको अपना भविष्य अंधकार मय नज़र आ रहा है। दूसरा यह कि ब्लाग जगत से खतरे का आभास उनको है इसलिये वह अब कहीं कहीं यहां से विचार भी ग्रहण करने लगे हैं-इसे हम चोरी नहीं कह सकते-और उनको प्रस्तुत करते हैं। उनका नाम है इसलिये लगता है कि मौलिक हैं जबकि सच यह है कि हिन्दी ब्लाग लेखकों द्वारा आपसी चर्चाओं से उनका जन्म हुआ है। आप कुछ विचारों की बानगी देखिये।
1-इतने वर्षों से यह प्रचार माध्यम विज्ञापन पर चल रहे हैं पर बाजार और उसके प्रबंधकों को दबाव को कभी जाहिर नहीं किया। अब तो वह बहस करते हैं कि बाजार किस तरह तमाम क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है। समाज के साथ ही वह खेलों और फिल्मों में बाजार के हस्तक्षेप की चर्चा करते हैं। लोग यकीन नहीं करेंगे कि पर सच बात यह है कि बाजार के इस रूप पर सबसे पहली चर्चायें हिन्दी ब्लाग जगत पर ही हुईं थी। यहां यह बात नहीं भूलना चाहिये कि इस लेखक को तीन साल अंतर्जाल पर हो गये हैं और अनेक पाठों पर दूसरे ब्लाग लेखकों की बाजार के इस कथित प्रभाव की चर्चा करती हुईं अनेक टिप्पणियां हैं जो इतनी ही पुरानी हैं।
2-गांधीजी पर लिखे गये इस लेखक के पाठों को यहां के ब्लाग लेखकों ने पढ़ा होगा। गांधीजी को नोबल न दिये जाने के विषय पर लिखे गये इस लेखक के विचारों को एक स्तंभकार ने जस का तस अपने लेख में लिखा। सच है उसे आम पाठकों ने अभी कम पढ़ा होगा पर उस स्तंभकार ने लाखों लोगों तक वह बात पहुंचा दी। अखबारों ने इस लेखक के वैचारिक चिंतन बिना नाम के छापे। यहां हम कोई शिकायत नहीं कर रहे बल्कि इंटरनेट लेखकों को बता रहे हैं कि वह अपने अंदर कुंठा न पालें। अगर वह मौलिकता के साथ आयेंगे तो वह वैचारिक शक्ति केंद्र का बिन्दु बनेंगे। आम पाठकों की कम संख्या को लेकर अपने अंदर कुंठा पालना व्यर्थ है।
3-कलकत्ता में एक धर्म के युवक की मौत पर एक वर्ग बावेला मचाता है पर कश्मीर पर दूसरे धर्म के युवक की मौत पर वही खामोश हो जाता है तो दूसरा मचाता है। हम यहां इस विषय पर बहस नहीं कर रहे कि कौन गलत है या कौन सही्! मुख्य बात यह है कि कथित विचारधाराओं ने लोगों को सोच तो प्रदान की है पर एक दायरे के अंदर तक सिमटी है। ऐसे में मुक्त भाव से लिखने वाले हिन्दी लेखक कई ऐसी बातें लिख जाते हैं जिनको स्थापित विद्वान सोच भी नहीं सकता।
अब संगठित प्रचार माध्यम में सक्रिय बुद्धिजीवियों को यह लगने लगा है कि उनकी विचारों की पूंजी बहुत कम है भले ही उनके द्वारा लिखे गये शब्दों की संख्या हिन्दी ब्लाग लेखकों से अधिक है। उनका नाम ज्यादा है पर उनका सोच आजाद नहीं है।
हां, यह सच है कि हम ब्लाग लेखक कुंठित होकर यहां आते हैं पर ब्लाग शुरु करने के बाद उसका नशा सब भुला देता है। जहां तक मठाधीशी का सवाल है तो हर ब्लाग लेखक जैसे ही ब्लाग खोलता है यह पदवी उसके पास स्वयं ही आ जाती है। इंटरनेट पर लिखने वाले लेखकों यह बात समझ लेना चाहिये कि उनका अकेला होना ही उनको स्वतंत्र बनाता है। वह जिन संघर्षों से गुजर रहे हैं वह उनके लिये सोच को विकसित करने वाला है। उनको संगठित प्रचार माध्यमों में गढ़े गये विचारों से आगे जाना है। जैसे जैसे ब्लाग लेखकों की संख्या बढ़ेगी वैसे उनकी सोच का दायरा भी बड़ा होगा। संगठित प्रचार माध्यमों में नाम पाना किसे बुरा लगता है पर दूसरा सच यह है कि वहां नवीन और मौलिक विचार या विद्या को साथ लेकर स्थान पाना कठिन है। ऐसे में ब्लाग जगत पर आकर दायरा बढ़ जाता है। जब तब आम पाठक है स्थापित विद्वान ब्लाग लेखकों के विचारों को ग्रहण कर अपना जाहिर कर सकते हैं पर कालंातर में यह तो जाहिर होना ही है कि उनका जनक कौन है?
जब कोई स्थापित विद्वान यह मान रहा है कि सीमित विचाराधाराओं के इर्दगिर्द प्रचार माध्यम घूमते रहे हैं वह अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं को भी जिम्मेदार मान रहा है क्योंकि अभी तक तो वह भी यही करते रहे थे।
हिन्दी ब्लाग जगत पर कुछ गजब के लिखने वाले हैं। यह सही है कि उनमें कुछ लकीर के फकीर है तो कुछ नये ढंग से सोचने वाले भी है। इसमें दिलचस्प बात यह है कि नये ढंग से सोचने वाले अधिक भाषा सौंदर्य से नहीं लिख पाते पर उनकी बातें बहुत प्रभावी होती हैं और वह शायद स्वयं ही नहीं जानते कि ऐसी बात कह रहे हैं जिनको संगठित प्रचार माध्यम जगह नहीं देंगे अलबत्ता कुछ स्थापित विद्वान उनके विचारों को उठा भी सकते हैं। आप कहेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? इसका जवाब यह है कि हमारे आसपास घटता बहुत कुछ है पर शाब्दिक अभिव्यक्ति कैसे की जाये यह महत्वपूर्ण बात है। बड़े विद्वान अभिव्यक्ति तो कर सकते हैं पर नवीन विचार के जनक तो हिन्दी ब्लाग लेखक ही बनेंगे। यह बात हमने अपने अनुभव से कही है। ऐसे विचारों को लिखते हुए हम यह कहना नहीं भूलते कि यह जरूरी नहीं कि हम सही हों। हो सकता है हमारा यह अनुमान हो, पर विचारणीय तो है। इतना तय है कि इस ब्लाग जगत पर अनेक लोग तो ऐसे हैं जो पाठ लिखने के साथ ही जोरदार वैचारिक टिप्पणियां भी लिख जाते हैं और भविष्य में उनकी चर्चा भी प्रचार माध्यमों में होगी।
आखिरी बात हम यह भी कह सकते हैं कि अगर विद्वानों ने हिन्दी ब्लाग जगत से विचार नहीं भी लिये होंगे पर यह हो सकता है कि यहां की जानकारी उनको तो हो ही गयी है और इसलिये प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर रहे हिन्दी ब्लाग लेखकों को ध्यान में रखते हुए नये ढंग से सोचना शुरू किया हो-मतलब प्रभाव तो है न!
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Sunday, February 28, 2010

होली या दिवाली-आलेख और व्यंग्य क्षणिकायें (holi ho ya diwali-hindi article and satire poem)

होली हमारे देश का एक परंपरागत त्यौहार है जो उल्लास से मनाया जाता रहा है। यह अलग बात है कि इसे मनाने का ढंग अब लोगों का अलग अलग हो गया है। कोई रंग खेलने मित्रों के घर पर जाता है तो कोई घर पर ही बैठकर खापीकर मनोरंजन करते हुए समय बिताता है। इसका मुख्य कारण यह है कि जब तक हमारे देश में संचार और प्रचार क्रांति नहीं हुई थी तब तक इस त्यौहार को मस्ती के भाव से मनाया जरूर जाता था पर अनेक लोगों ने इस अवसर पर दूसरे को अपमानित और बदनाम करने के लिये भी अपना प्रयास कर दिखाया। केवल शब्दिक नहीं बल्कि सचमुच में नाली से कीचड़ उठाकर फैंकने की भी घटनायें हुईं। अनेक लोगों ने तो इस अवसर पर अपने दुश्मन पर तेजाब वगैरह डालकर उनको इतनी हानि पहुंचाई कि उसे देख सुनकर लोगों का मन ही इस त्यौहार से वितृष्णा से भर गया। तब होली उल्लास कम चिंता का विषय बनती जा रही थी।
शराब पीकर हुड़दंग करने वालों ने लंबे समय तक शहरों में आतंक का वातावरण भी निर्मित किया। समय के साथ सरकारें भी चेतीं और जब कानून का डंडा चला तो फिर हुडदंगबाजों की हालत भी खराब हुई। हर बरस सरकारें और प्रशासन होली पर बहुत सतर्कता बरतता है। इस बीच हुआ यह कि शहरी क्षेत्रों में अनेक लोग होली से बाहर निकलने से कतराने लगे। एक तरह से यह उनकी आदत बन गयी। अब तो ऐसे अनेक लोग हैं जो इस त्यौहार को घर पर बैठकर ही बिताते हैं।
जब सरकारों का ध्यान इस तरफ ध्यान नहीं था और पुलिस प्रशासन इसे सामान्य त्यौहारों की तरह ही लेता था तब हुड़दंगी राह चलते हुए किसी भी आदमी को नाली में पटक देते। उस पर कीचड़ उछालते। शहरों में तो यह संभव ही नहीं था कि कोई पुरुष अपने घर की स्त्री को साथ ले जाने की सोचे। जब पूरे देश में होली के अवसर पर सुरक्षा व्यवस्था का प्रचनल शुरु हुआ तब ऐसी घटनायें कम हो गयी हैं। इधर टीवी, वीडियो, कंप्यूटर तथा अन्य भौतिक साधनों की प्रचुरता ने लोगों को दायरे में कैद कर दिया और अब घर से बाहर जाकर होली खेलने वालों की संख्या कम ही हो गयी है। अब तो यह स्थिति है कि कोई भी आदमी शायद ही अनजाने आदमी पर रंग डालता हो। फिर महंगाई और रंगों की मिलावट ने भी इसका मजा बिगाड़ा।
महंगाई की बात पर याद आया। आज सुबह एक मित्र के घर जाना हुआ। उसी समय उसके मोहल्ले में होली जलाने के चंदा मांगने वाले कुछ युवक आये। हमने मित्र से हाथ मिलाया और अंदर चले गये। उधर उनकी पत्नी पचास रुपये लेकर आयी और लड़कों को सौंपते हुए बोली-‘इससे ज्यादा मत मांगना।’
एक युवक ने कहा-‘नहीं, हमें अब सौ रुपये चाहिये। महंगाई बढ़ गयी है।’
मित्र की पत्नी ने कहा-‘अरे वाह! तुम्हारे लिये महंगाई बढ़ी है और हमारे लिये क्या कम हो गयी? इससे ज्यादा नहीं दूंगी।’
लड़के धनिया, चीनी, आलू, और प्याज के भाव बताकर चंदे की राशि बढ़ाकर देने की मांग करने लगे।
मित्र ने अपनी पत्नी से कहा-‘दे दो सौ रुपया, नहीं तो यह बहुत सारी चीजों के दाम बताने लगेंगे। उनको सुनने से अच्छा है इनकी बात मान लो।’
गृहस्वामिनी ने सौ रुपये दे दिये। युवकों ने जाते हुए कहा-‘अंकल और अंाटी, आप रात को जरूर आईये। यह मोहल्ले की होली है, चंदा देने से ही काम नहीं चलेगा। आना भी जरूर है।’
मित्र ने बताया कि किसी समय उन्होंने ही स्वयं इस होली की शुरुआत की थी। उस समय लड़कों के बाप स्वयं चंदा देकर होली का आयोजन करते थे अब यह जिम्मेदारी लड़कों पर है।’
कहने का अभिप्राय यह है कि इस सामूहिक त्यौहार को सामूहिकता से मनाने की एक बेहतर परंपरा जारी है। जबकि पहले जोर जबरदस्ती सामान उठाकर ले जाकर या चंदा ऐंठकर होली मनाने का गंदा प्रचलन अब बिदा हो गया है। जहां नहीं हुआ वह उसे रोकना चाहिये। सच बात तो यह है कि अनेक बेवकूफ लोगों ने अपने कुकृत्यों से इसे बदनाम कर दिया। यह खुशी की बात है कि समय के साथ अब उल्लास और शांति से यह त्यौहार मनाया जाता है।
इस अवसर पर कुछ क्षणिकायें 
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रंगों में मिलावट
खोऐ में मिलावट
व्यवहार में दिखावट
होली कैसे मनायें।
कच्चे रंग नहीं चढ़ता
अब इस बेरंग मन पर
दिखावटी प्यार कैसे जतायें।
---------
रंगों के संग
खेलते हुए उन्होंने होली
कुछ इस तरह मनाई,
नोटों के झूंड में बैठकर
इठलाते रहे
इसलिये उनकी पूरी काया
रंगीन नज़र आयी।
---------
अगर रुपयों का रंग चढ़ा गया तो
फिर कौनसे रंग में
बेरंग इंसान नहायेगा,
आंख पर कोई रंग असर नहीं करता
होली हो या दिवाली
उसे बस मुद्रा में ही रंग नज़र आयेगा।



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Monday, February 22, 2010

शब्द मंद हो गये हैं-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (real word is slow-hindi comic poem)

हर तरफ घूम रहे
हाथ में खंजर लिये लोग
किसी से हमदर्दी का उम्मीद करना
बेकार है
पहले कोई किसी के पीठ में
घौंपकर आयेगा,
फिर अपनी पीठ को बचायेगा।
भला कब किसी को
दर्द सहलाने का समय मिल पायेगा।
----------
दौलत, शौहरत और ताकत के
घोड़े पर सवार लोग
गिरोहबंद हो गये हैं।
हवा के एक झौंके से
सब कुछ छिन जाने का खौफ
उनके दिल में इस कदर है कि
आंखों से हमेशा उनके खून टपकता है,
आम आदमी की पीठ पर
हर पल बरसा रहे चाबुक
फिर भी वह कांटे की तरह
आंखों में खटकता है,
समाज की हालातों पर
सच लिखने वाले शब्द मंद हो गये हैं।

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Thursday, February 18, 2010

शब्द और अनुभूति-हिन्दी कविता (shabd aur anubhuti-hindi poem)

कब तक तस्वीरों को देखकर
अपना दिल बहलायें,
चेहरों की आखों से पढ़कर
शब्द अपनी समझ से तय कर
दिमाग में सजायें।
इससे तो अच्छा है कि किताबों में
शब्द पढ़कर तस्वीरों के अहसास पायें।
तस्वीरें कितना बोलेंगी,
आंखें कैसे शब्दों को तोलेंगी,
चेहरे स्तब्ध करते हैं
आंखों में आश्चर्य भरते हैं,
दिल की गहराई तक तो
शब्द ही अनभूति पहुंचायें।
इसलिये फुरसत में अपने आगे
किताबों की ही सजायें।

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Saturday, February 13, 2010

माया तो संतों की दासी होती है-हिन्दी आलेख (maya to santon ki dasi hoti hai-hindi lekh)

भारतीय अध्यात्म ज्ञान के अनुसार ‘माया संतों की दासी होती है’, पर  अज्ञानी लोग इस बात को नहीं समझ सकते। इसके अलावा जिनका सोच पश्चिमी विचारधाराओं से प्रभावित है तो उनको समझाना अत्यंत कठिन है।
संत दो प्रकार के होते हैं, एक तो वह जो वनों में रहकर अपना जीवन पूरी तरह से सन्यासी की तरह बिताते हैं दूसरे वह जो समाज के बीच में रहते हैं।  जो संत समाज के बीच में रहते हैं वह तमाम तरह के दायित्व-जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य तथा समाज सुधार-भी अपनी सिर पर लेेते हैं। ऐसे में भक्त लोग उनको गुरु दक्षिणा, दान या उपहार भी प्रदान करते हैं जिसका वह उसी समाज के लिये उपयोग करते हैं।
जैसे जैसे देश में धन का वर्चस्व बढ़ रहा है वैसे ही उसका पैमाना संतों के पास भी बढ़ रहा है।  संतों की जो संपत्ति है वह अंततः सार्वजनिक काम में रहती है।  फिर दूसरी बात यह भी है कि उन संतों को अगर समाज के गरीब वर्ग की सहायता करनी है तो उसके लिये धन का होना आवश्यक है। अनेक संत दवाओं का निर्माण कर लोगों को बेचते हैं और उससे लोगों को लाभ भी होता है-अगर ऐसा न होता तो उनके द्वारा बेची जा रही वस्तुओं की बिक्री दिन-ब-दिन बढ़ती न जाती।  अनेक संत पत्रिकायें निकालते हैं और लोग उनको चाव से पढ़ते हैं।
ऐसे में आधुनिक बाजार और उनका प्रचारतंत्र विरोधी हो गया है।  इसका कारण एक तो यह है कि दवाईयों से जहां अनेक एलौपैथी कंपनियों का काम ठप्प हो रहा है वहीं रद्दी साहित्य प्रकाशित करने वाले प्रकाशनों को पाठक नहीं मिल रहे।  दूसरा यह कि उनके प्रवचनों में ढेर सारे श्रोता और भक्त जाते हैं जिससे आधुनिक बाजार और उसका प्रचार तंत्र अपने शिकारी पंजों से दूर पाता है। उसमें युवा वर्ग देखकर आधुनिक बाजार और उसका प्रचार तंत्र चिढ़ता है तो इसलिये क्योंकि उसे तो वैलंटाईन डे के लिये नये उत्पाद बेचने के लिये युवा वर्ग ही मिलता है। फिल्म देखने के लिये माल की महंगी टिकिटें खरीदने के लिये इसी नवधनाढ्य वर्ग के युवाओं की उसे जरूरत है। इसके अलावा क्रिकेट के खिलाड़ियों को महानायक के रूप में स्थािपत करने  भी यही वर्ग उपलब्ध है जिसे इस खेल पर लगे फिक्सिंग के दाग की जानकारी नहीं है।  ऐसे में प्रचारतंत्र अपने हाथ से एक बहुत बड़ा समाज दूर पाता है।
चिकित्सा और दवाईयों की बात करें तो एलौपेथी पर लोगों का विश्वास नहीं रहा।  ढेर सारे टेस्ट में समय और पैसा बरबाद कर चुके लोगों से उनकी दास्तान सुनी जा सकती है। जबकि इन बाबाओं के द्वारा बनायी गयी दवायें बहुत उपयोगी साबित हो रही हैं।  इसके अलावा ‘ऋषि प्रसाद’, अखंड ज्योति, तथा कल्याण जैसी पत्रिकायें समाज में अध्यात्मिक धारा को प्रवाहित किये हुए हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि ‘हमारे देश की सहज योग परंपरा का विस्तार हो रहा है पर आधुनिक बाजार का सारा काम लोगों में असहजता पैदा करना है। वह ऐसी विलासिता के साधनों को सुख कहकर बेच रहे हैं जिनके खराब होने पर आदमी अपने आपको अपाहिज अनुभव करता है।  वह नकली महानायक गढ़ रहे हैं और हालत यह है कि उनको क्रिकेट मैच और फिल्म देखने के लिये अनेक तरह के तनाव पैदा करने पड़ते हैं।  उसे असहज समाज चाहिये जबकि श्रीमद्भागवत गीता में चारों वेदों के सार तत्व के साथ जो सहज योग सरलता से लिखा गया है उसकी इस देश को सबसे अधिक जरूरत है।  इस प्रयास में सबसे आगे रहने वाले संतों में सर्वश्री आसाराम बापू, बाबा रामदेव तथा सुधांशु महाराज जैसे महापुरुष हैं। इन संतों का मायावी सौंदर्य देखकर अनेक विद्वान विचलित हो जाते हैं पर वह यह नहीं सोचते कि इतनी ऊंचाई पर कोई बिना ज्ञान, तप, तथा योग साधना के नहीं पहुंच सकता।  इन संतों ने असहजता पैदा करने वाले तत्वों से निपटने के लिये प्रयास किये हैं और इसके लिये धन की जरूरत होती है।  इन लोगों के लिये धन ही अस्त्र शस्त्र है, क्योंकि जो तत्व समाज में अस्थिरता, अज्ञान और असहजता फैला रहे हैं वह भी इसी अस्त्र शस्त्र का उपयोग कर रहे हैं। यह विद्वान लोग क्या चाहते हैं कि देश में अज्ञान, असहजता तथा अस्थिरता फैलाने वाले तत्वों से युद्ध बिना हथियार लिये लड़ें या उसे विकास का प्रतीक  मानकर उनकी तरह चुप बैठ कर देखें।
सच तो यह है कि संतों के पास जो धन है उसकी तुलना किसी अन्य धनाढ्य वर्ग से नहीं की जा सकती। 
कुछ अज्ञानी तो इन पर ठगने का आक्षेप भी लगाते हैं? दोष उनका नहीं है क्योंकि उनके संस्कारों में पश्चिमी विचार मौजूद हैं और उनको भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की बात समझ में नहीं आ सकती।  वह उस बाजार को नहीं देखते जिसका प्रचार तंत्र वैलंटाईन डे के नाम पर मनाये जाने वाले प्रेम दिवस पर केवल उभयपक्षी लिंग संबंध और बीयर पीने जैसी बातों को ही प्रोत्साहित करते हैं। फिल्मों के नकली पात्रों का अभिनय करने वाले अभिनेताओं को महानायक बताते हैं। इसके विपरीत संत तो केवल प्राचीन सत्साहित्य का ही प्रचार करते हैं इसमें ठगी कैसी?।  सच तो यह है कि अब इस देश में अगर आशा बची है तो इन्हीं संतों से! बाकी जिसकी जैसी मजी है। कहे या लिखे! हमने तो अपना विचार व्यक्त कर दिया।

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Sunday, February 7, 2010

इंसानी दिल-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (heart of man-hindi satire poem)

मतलब के लिए इंसान

अपना दिल इस तरह बदल जाते

कि आखें होती तो

बेपैंदी के लोटे भी देखकर शर्माते।

जुबान होती तो

एक दूसरे पर इंसान होने का शक जताते।

----------

नब्बे फीसदी सांप

जहरीले नहीं होते

यह विशेषज्ञ ने बताया।

तब से इंसानों की सांप से

तुलना करना बंद कर दिया हमने

क्योंकि सांप के डसने से

कई लोगों को बचते देखा

पर इंसानों के धोखे से बचता

कोई नज़र नहीं आया।

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Wednesday, February 3, 2010

नजरिया-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (nazariya-hindi comic poems)

जिंदगी का सच कटु होता जितना

इंसान का सपना उतना ही रंगीन हो जाता है।

रंगीले इंसानों के लिये

जिंदगी की  कड़वाहट में है मनोरंजन

इसलिये सोच से बने अफसानों में

हर रंग सराबोर हो जाता है।

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अमीर के बच्चे ने

गरीबों के दर्द पर

तो गरीब के बच्चे ने अमीरी के ख्वाब पर लिखा।

किन हालातों पर रोयें, किन पर हंसे

इंसानों के नजरिये में ही फर्क दिखा।

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