Showing posts with label हिन्दीशायरी. Show all posts
Showing posts with label हिन्दीशायरी. Show all posts

Saturday, September 2, 2017

कुदरत के कायदे से ज़माने के रंग बदलते-दीपकबापूवाणी (kudrat ke kayde ka rang badalte-DeepakBapuWani)

दिलदार का रूप पर सोच के छोटे होते, सिक्कों जैसे कुछ इंसान भी खोटे होते।
‘दीपकबापू’ सजधज कर सामने आते पर्दे में, मगर खरी नीयत के उनमें टोटे होते।।
------
कुदरत के कायदे से ज़माने के रंग बदलते, लोगों का वहम कि स्वयं ढंग बदलते।
‘दीपकबापू’ चले जा रहे जिंदगी में बदहवास, जिंदगी से पहले उनके ख्याल ढलते।।
---
उनके हाथ में मदद बटोरते खुले झोले हैं, आंखों मे आर्त भाव तो चेहरे भी भोले हैं।
‘दीपकबापू’ सर्वशक्तिमान के दरबार में बैठे, बाहर बेबस रूप धरे मस्तों के टोले हैं।।
-------
घरों के दरवाजे खिड़कियां रहते अब बंद, इश्क की बस्ती वाले दिल रह गये अब चंद।
‘दीपकबापू’ अपने दर्द पर चाद डाल देते, हमदर्द ही हौसलों के कदम करते अब मंद।।
------------
धन के आसक्त भजन करने भी लग जाते, कोई श्रद्धा जगाये कोई कभी ठग जाते।
‘दीपकबापू’ चेतना की संगत में हुए सयाने, वह निद्रा में बजती घंटी तभी जग जाते।।
--------
शुल्क लेकर वाणी धाराप्रवाह चलती है, धन से ज्ञान की रौशनी बाहर जलती है।
‘दीपकबापू’ सुविधाभोगी बांटें श्रम ज्ञान, क्या जाने पसीने के बूंद आग में पलती है।।
------

Friday, August 11, 2017

हृदय में रस से पत्थर भी गुरु हो जाते हैं-दीपकबापूवाणी (Hridya mein ras se PATHAR BHI GURU HO JATE HAIN-DEEPAK BAPUWANI)

हृदय में रस से पत्थर भी
गुरु हो जाते हैं।
दर्द के मारे रसहीन
जहां कोई मिले
रोना शुरु हो जाते हैं।
--

गरीबों के उद्धार के लिये
जो जंग लड़ते हैं।
उनके ही कदम
महलों में पड़ते हैं।
--
दिल की बात किससे कहें
सभी दर्द से भाग रहे हैं।
किसके दिल की सुने
सभी दर्द दाग रहे हैं।
---
ईमानदारी से जो जीते
गुमनामी उनको घेरे हैं।
चालाकी पर सवार
चारों तरफ मशहूरी फेरे है।
------
जहां शब्दों का शोर हो
वह शायर नहीं पहचाने जाते।
जहां जंग हो हक की
वहा कायर नहीं पहचाने जाते।
------
समय का खेल 
कभी लोग ढूंढते
कभी दूर रहने के बहाने बनाते।
--
राजपथों की दोस्ती
वहम निकलती
जब आजमाई जाती है।
गलियों में मिलती वफा
जहां चाहत जमाई नहीं जाती है।
---
कंधे से ज्यादा  बोझ दिमाग पर उठाये हैं,
खाने से ज्यादा गाने पर पैसे लुटाये हैं।
मत पूछना हिसाब ‘दीपकबापू’
इंसान के नाम पशु जुटाये हैं।
-----
नाम कमाने मे श्रम होता है,
बदनामी से कौन क्रम खोता है।
‘दीपकबापू’ कातिलों की करें पूजा
शिकार गलती का भ्रम ढोता है।।
-----

Sunday, June 11, 2017

दलालों के कारिंदे बाज़ार में आग सजाते-दीपकबापूवाणी (Dalalon ka karinde bazar mein aag sajate-DeepakbapuWani)

शब्दों के खिलाड़ी प्रेम से सहलाते, नरक में स्वर्ग लाने के वादे से बहलाते।
‘दीपकबापू’ विज्ञापन से पाई वाणी, आज का सच कल के सपने में नहलाते।
--़
बेरहम सौदागर के गोदाम में रहम बंद है, गुलाम रखते लेखे जुबान बंद है।
‘दीपकबापू’ दोनाली से निकाल रहे अमन, सफाई के पाखंडी नीयत गंद है।।
--
बाज़ार जवानी के जोश में इश्क मिलाता, विष भी अमृतरस जैसा पिलाता।
‘दीपकबापू’ नशे में शैतान बने अमीर, दोस्त क्या दुश्मन भी हाथ मिलाता।।
----------
दलालों के कारिंदे बाज़ार में आग सजाते, सौदागर अमन का राग बजाते।
‘दीपकबापू’ खूनखराबे के खेल में माहिर, लोग फरिश्तों पर भी दाग लगाते।।
--
प्रसिद्धि में बड़े पर कदम उनके छोटे हैं, बदनामी का डर साथ चैन के टोटे हैं।
‘दीपकबापू’ हर पल श्रृंगार करते चेहरे पर, शब्दों में सौंदर्य पर विचार खोटे हैं।।
--
आंखों के सामने पर आस नहीं होते, हाथों में हाथ पर दिल के पास नहीं होते।
‘दीपकबापू’ प्रेम के पाखंड में हो गये दक्ष, गले मिलते पर सभी खास नहीं होते।।
---
गुलामी का बरसों पुराना सबक पढ़ाते, आजादी का नित नया नारा आगे बढ़ाते।
‘दीपकबापू’ पुराने आकाओं का ज्ञान पकड़ा, बिन रोटीदाल कागज का दान चढ़ाते।।
---
सुंदर शब्द के पीछे कुविचार छिपाते, विकास के पीछे ढांचे तबाह कर छिपाते।
‘दीपकबापू’ समाज सेवा में लेते दलाली, सबकी भक्ति में लगे आसक्ति छिपाते।।
--
गर्मी में पानी की बूंदें स्वर्ग बरसायें, न हों तो शीत में नरक जैसा तरसायें।
‘दीपकबापू’ स्वर्ण के मोह में अंधे हुए, न प्यास बुझे न सूखी रोटी भी पायें।
--ं
दिल में चाहत जेब में पैसा नहीं है, कर्जे से चमक जाये चेहरा ऐसा नहीं है।
‘दीपकबापू’ सपने उधार से सच बनाये, अंधेरे दिल में रौशनी जैसा नहीं है।।
---
सोच से पैदल अक्लमंदों के कहार होते, पूछते रास्ता उनसे जो भटके यार होते।
‘दीपकबापू’ अजीब नज़ारे देखे दुनियां में, होशियार जूझें मझधार में मूर्ख पार होते।।
--
दिल के लिये अब कोई नहीं खेलता, सौदागर खेल जुआ बना पैसा पेलता।
‘दीपकबापू’ व्यापारी मन बना लिया, जेब भरे हार भी दिलदार जैसा झेलता।।
--
गोदाम में अनाज का भंडार रखा है, बाहर गरीब ने बस भूख को चखा है।
‘दीपकबापू’ तख्त पर बैठ करें बंदोबस्त, दलाली करने वालों के ही सखा हैं।
--
बहुत देर गरजे पर बादल बरसे नहीं, भरे भंडार जिनके प्यास से वह तरसे नहीं।
‘दीपकबापू’ हमदर्दी दिखाने भीड़ में जाते, भूखे पर हाथ फेरें पर रोटी परसे नहीं।।
--
स्वार्थ साधना में फंस गयी आसक्ति, लोहे लकड़ी के सामान पर चढ़ गयी भक्ति।
‘दीपकबापू’ मांस के बुतों में ढूंढ रहे देवता, बीमारी पालते दवा की भा गयी शक्ति।।
--------

Saturday, February 4, 2017

बेशरमी हमेशा बेहद होती है-हिन्दी कविता (Besharmi hmesha Behad hoti hai-Hindi Poem)


-----
हद होती शर्म की
बेशरमी हमेशा बेहद होती है।

याचक खड़ा द्वार पर
हाथ फैलाये
वाणी उसकी कातर
शब्द के पद ढोती है।

कहें दीपकबापू सेवक से
तब तक वफा की आशा करें
जब तक स्वामी न बना
फिर तो सोने की पालकी
उसमें मद बोती है।
----
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश

Wednesday, January 18, 2017

पेट जिनके भरे सीने उनके तने हैं, मत पूछो उनके महल कैसे बने हैं-दीपकबापूवाणी (Pet jinke Bhare seene Unke tane hain-DeepakBapuWani)

सिंहासन के लिये होता दंगल, घावों से रिसते खून में दिखाते मंगल।
‘दीपकबापू’ भावनाहीन हो गये, शहर भी डराते अब जैसे सूने जंगल।।
------
संवेदनहीन शहर में घृणा बढ़ गयी, प्रेम की कीमत यूं ही चढ़ गयी।
‘दीपकबापू’ विश्वास की तलाश छोड़कर, आंख पत्थर में गढ़ गयी।।
------
दौलत की चमक बढ़ा देती करचोरी, खर्च करें निर्बाध साथ सीनाजोरी।
‘दीपकबापू’ ईमानदारी का फंदा डाले, देशभक्ति में हाथ से सीते बोरी।।
--

मत करना यकीन बात के बंदर हैं, देव दिखें बाहर राक्षस अंदर हैं।
‘दीपकबापू’ शब्दों पर चलाते व्यापार, वह केवल सपनों का समंदर हैं।।
--
आम के दर्द की शिकायत खास दरबार में कौन सुने।
चापलूस सजे रत्न की तरह, जनकल्याण पर मौन बुने।।
मन का हाल आंख में छप जाता, शब्द सहमे बाहर आते,
‘दीपकबापू’ भौपूओं की महफिल में मधुर स्वर कौन चुने।।
------
पेट जिनके भरे सीने उनके तने हैं, मत पूछो उनके महल कैसे बने हैं।
‘दीपकबापू’ दान दया का लगाते नारा, मन में लोभ के बादल घने हैं।।
अन्ना के चेले वोट की राजनीति में व्यापार में उनका नाम तक नहीं लेते। क्या दिलचस्प है?
भयातुर कभी भ्रष्ट से नहीं लड़ पाते, कातर कभी कष्ट से नहीं लड़ पाते।
‘दीपकबापू’ स्वार्थ के जाल में फंसे, परमार्थ में पत्ता भी नहीं जड़ पाते।।
-------
सपनों के व्यापार में सभी लगे, दौलत को निरंतर ताड़ते सभी जगे।
‘दीपकबापू’ स्मृतियां रहती क्षीण, खाली रहे ग्राहक फिर भी सदा भगे।।
--
पत्तल छोड़कर सब थाली में खाने लगे, संगीत में शोर अब बजाने लगे।
‘दीपकबापू’ कोयल का सुर पहचाने नहीं, तालियों पर मेंढक टर्राने लगे।।


-

Tuesday, January 10, 2017

बहते जाना आसान नहीं है-हिन्दी कविता (Bahate jana asan nahin hai-Hindi Poem)

हृदय की धड़कनों के साथ
बहते जाना आसान नहीं है
संवेदना की नाव में
सवार होना भी जरूरी है।

जुबान के शब्दों की लहर के साथ
बहना आसान नहीं है
सामने सवालों के झौंके
आना भी जरूरी है।

‘दीपकबापू’ पत्थरों पर
रंगीन स्याही से लिखना
बहुत आसान नहीं है
विचारों के जंगल में
घुसना भी जरूरी है।
-----

Friday, July 15, 2016

अर्थ के बाग-हिन्दी कविता(Arth ke Baag-HindiPoem)

पर्दे पर रोज
पुराने चेहरे ही
कुश्ती करने आते हैं।

दंगे में शांति का
पर्व में क्रांति का शब्द
कान में भरने आते हैं।

कहें दीपकबापू वाणी से
कमाना जिन्होंने सीख लिया
उनके मुख से निकले वाक्य
अर्थ के बाग चरने आते हैं।
--------------

Monday, June 27, 2016

दिल का दाव-हिन्दी व्यंग्य कविता (Dil ka Dav-Hindi Satire Poem)

शिकायत न करें तो
लोग कमजोर
करें तो दुश्मन माने।

हम समझें मित्र
वह मोल देखकर
कभी कम कभी ज्यादा जाने।

कहें दीपकबापू संबंधों में
चलते हिसाब किताब
लालच पर दिल का दाव
कभी लगाने की न ठाने।
------------

Saturday, April 30, 2016

हालत का कसूर है पुण्य का भागी बना दिया-हिन्दी क्षणिकायें (Halat ka Kasur hai Punya ka Bhagi Bana diya-HindiShortPoem)

ऊंची इमारतों का विज्ञापन
रंगीन पर्दे पर ही
देख खुश हो जाओ।

जमीन पर विकास का सच
ढूंढने मत जाना
दिल टूट जायेगा
आंखें अंधेरे में न ले जाओे।
----------------
वह पुतले पर्दे पर
रोज दिखने के लिये
फिक्रमंद हैं।

नट के हाथ में डोर
उनकी अदा की भी खूब चर्चा
पर नतीजे का जिक्र बंद है।
---------
निर्देशक पुराने चेहरों पर
रोज लगाते नया मुखौटा
लोग बहल जाते हैं।

जिंदगी का खेल चलता
रुपहले पर्दे पर
कभी दर्शक होते खुश
कभी दहल जाते हैं।
--------
हम तो खड़े थे
उनके इंतजार में
वह बचने के लिये
राह ही बदल गये।

हमारी अदा या चेहरे से डरे
पता नहीं
हमसे मुंह फेरने के लिये
अपनी चाह ही बदल गये।
------------
न पैसा पाया
न मिली प्रतिष्ठा
भाग्य ने जबरन
त्यागी बना दिया।

पाप कमाने का
कभी मौका मिला नहीं
यह तो हालत का कसूर है
पुण्य का भागी बना दिया।
-------

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com


यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका


Thursday, February 4, 2016

जिंदगी का हिसाब-हिन्दी कविता(Zindagi ka Hisab-Hindi Kavita)


इतनी बड़ी जिंदगी
हर पल का हिसाब
किस बहीखाते में लिखते।
दो भुजा दो पांव
एक मुख  हमारे साथ
कहां कहां दिखते।
कहें दीपकबापू
अपने सीने में
पल रहा दर्द
किसके कान में डालकर
इलाज की चाह रखते
यहां  ऊंची   छवि के
लोग भी सस्ते में बिकते।
...................
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com


यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका


समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकाऐं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर