Sunday, September 9, 2007

सचिव हो तो ऐसा-हिन्दी हास्य कविता

वर्षा का मौसम आते ही
मदद नामक संस्था में
हो गया माहौल हुआ गर्म
अब बौछार होगी
पीड़ित लोगों की मदद के लिए
तरह-तरह के सामान की
नहीं था इसमें किसी को भ्रम
संस्था प्रमुख ने बुलाया अपने सहायकों को
और कहा
'इलाक़े में सूखा था फिर भी
हमारे लिए थी हरियाली
पिछले साल किसी ने नहीं मनाई
पर अपनी अच्छी मनी दिवाली
ऐक भी दाना नहीं बाँटा अन्न
पर कागजो पर दिखाया
बंटते कई टन
चन्दा और दान देने वाले
हमारा हिसाब देखेंगे
हमने नहीं दिया कमीशन
इसलिये दुकानदार हमें
अपने माल के फर्जी बिल नही देंगे
अब बाढ़ का आ गया संकट है
और बिना हिसाब मागे कोई
हमें कुछ देगा मत रखना यह भ्रम'

बैठक में सन्नाटा खिंच गया
तब सचिव ने कहा
'आप क्यों अपना ख़ून जलाते हो
हमने सब सोच रखा है सब
आप दिमाग क्यों खपाते हो
हमारे भाग्य से छींका फूटा है
लोगों पर बाढ़ का कोप टूटा है
ढह गए कई मकान
उनमें अपने गोदाम और उसमें रखा अन्न
बह जाना दिखा देंगे
किसी नकली ऑफिस में
रखा रिकार्ड भी तबाह हुआ बता देंगे
आज ही भेज देता हू सब जगह विज्ञप्ति
जिसमें अपने नुकसान के अलावा
दान और चन्दा देने वालो से अपील भी होगी
बाढ़ पीड़ितों पर दिखाने के लिए रहम
जो सामान आयेगा उसका
इंतजाम भी कर लिया है
सूखा पीड़ित इलाकों में
उसकी भूखो द्वारा लूट बता देंगे
इस बवाल में कौन पूछेगा
हमारे ऐक इलाक़े में
अब भी मचा है सूखे से हाहाकार
दूसरे इलाके में लोग कर रहे
भीषण बाढ़ से चीत्कार
हमारे कमाल को कौन ढूंढेंगा
बस आप नकली आंसू बहाते रहें
अपना और सेवकों घर भरवाते
करते रहें अपना कर्म'

संस्था प्रमुख खुश हो गये और बोले
'सचिव हो तो ऐसा, एकदम बेशर्म
जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म'
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