Friday, September 28, 2012

देश की खुशहाली के लिए वेदों के मन्त्रों का जाप करें-हिंदी चिंत्तन (desh ki khushahli ke liye vedmantron kaa jaap karen-hindi chittan)

       आज भारत में चल हिन्दी टीवी चैनलों पर चल रहे कार्यक्रमों को देखा जाये तो लगेगा कि हमारे देश में केवल युवाओं की  इश्क बाज़ी, क्रिकेट, फिल्म और तथा प्रशासनिक घोटालों के अलावा अन्य कोई विषय नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यह मान ली गई लगती है कि आम आदमी की कोई स्वयं  की  सोच नहीं है। उसकी कोई  आवाज़ नहीं है। प्रचार और समाज सेवा से जुड़े लोग चाहे जैसे अपने हिसाब से आम आदमी की अभिव्यक्ति प्रदर्शित करते दिखते हैं।  देश एक तरह से दो भागों में बाँट गया है। एक तरफ है इंडिया तो दूसरी तरफ हैं भारत।
    इंडिया का मुख बाहर की तरफ है तो भारत का रूप विश्व परिदृश्य से अज्ञात दिखता है। इस इंडिया में  देश के आठ दस बड़े शहर हैं जो विश्व बिरादरी से जुड़े हैं और यहीं के सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक तथा धार्मिक शिखर पर विराजमान लोग और उनके  पालित विद्वान बुद्धिजीवी जैसा देश का रूप दिखा रहे हैं वैसा ही सभी देख रहे हैं।  इतना ही नहीं देश के अंदर भी यही लोग भाग्य विधाता बना गए हैं।  यह सब बुरा नहीं होता अगर स्वार्थवाश कार्य करने वाले इन लोगों  की बुद्धि संकुचित और शारीरिक क्षमता सीमित नहीं होती।  एक बात निश्चित है कि स्वार्थ मनुष्य को संकीर्ण और सीमित क्षमता वाला बना देता हैं इसलिए  इन शिखर  पुरुषों से यह अपेक्षा तो करनी ही नहीं चाहिए कि वह अपने दृष्टिकोण  यह u को कभी व्यापक रखकर काम करें क्योंकि उन्होंने हमेशा ही दायरों में रहकर जीवन बिताया है।  यह इनके  लिए संभव ही नहीं है।  कहा जाता है जो  देह के पास हैं वही दिल के पास है।  बड़े शहरों में यही शिखर पुरुष और इनके पालित बुद्धिमान रहते हैं।  इनके पास सारी सुविधाएँ हैं जो इन्होने सारे देश से कमाई हैं मगर अपने पास स्थापित वैभव के इनको कुछ नहीं दिखता।  यह सब भी स्वीकार्य होता  अगर पूरे देश को प्रभैत करने का माद्दा इनके पास नहीं होता।
        इन्हीं शिखर पुरुषों के पास देश का  भविष्य और व्यवस्था को प्रभावित करने वाली शक्ति  है जिसका उपयोग  यह अपने पालित बुद्धिजीवियों कि राय से तय करते हैं।  यह दोनों मिलकर एक दुसरे के हितों की चिंता के अलावा कुछ नहीं करते।  इनका  दावा यह कि यह आम आदमी को जानते हैं। दूर की बात क्या  बड़ी इमारतों में रहने वाले इन लोगों को अपने ही बड़े शहरों के छोटे लोगों का ज्ञान नहीं है।  समाज, कला, अर्थ, धर्म   और प्रबंध के क्षेत्र में कार्यरत लोग आमजन निराश है। देश में जो निराशा और हताशा का वातावरण हैं उसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस पर कोई विचार कोई नहीं करता ।
        सच बात तो यह कि इसके लिए हमारे देश  के वही आमजन जिम्मेदार  हैं जो हमेशा  ही इन शक्तिशाली, वैभवशाली और ऊंची जगहों पर बैठे लोगों की तरफ मूंह किए बैठे रहते हैं, जिससे इनको अपनी विशिष्टता का बोध होता है जिससे  यह उदार होने की बजाय आत्ममुग्ध हो जाते हैं।  आमजन उनमें अपने वैभव का अहंकार भरते हैं। यही कारण  है की   दौलत, शौहरत  और ताकत में मदांध यह लोग अपने कार्यों सामान्य  कार्यों में भी विशिष्टता की अनुभूति  कराना  नहीं भूलते।  सच बात तो यह है देश भगवान भरोसे चल रहा है। अगर इसी तरह चलता रहा तो आगे हालात  और कठिन होने वाले हैं।  फिर भी हम मानते हैं हमारी  भूमि देव भूमि है और वही इसकी रक्षा करते हैं।  उनमें वह शक्ति  है जो इस अपनी भूमि की रक्षा के लिए अदृश्य रहकर भी काम करते  हैं और समय आने पर किसी की बुद्धि और ताकत कम या ज्यादा  आकर अंतत: हमारी रक्षा करेंगे।  वेदों में इस तरह की ऐसी अनेक प्रार्थनाएँ हैं उनमें से रोज एक जपना चाहिए।  हमारा मानना है उससे लाभ अपने को तो होगा ही पूरे समाज को भी होगा। अब यह नहीं सोचना चाहिए कि इससे  तो उन लोगों को भी लाभ होगा जो प्रार्थना नहीं करते।  हम जब शिखर पुरुषों और उनके पालित बुद्धिजीवियों पर संकीर्ण होने का संदेह करते हैं तब अपने व्यापक दृष्टिकोण अपनाकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। जय श्री राम, जय श्री कृष्ण, जय श्री शिव शंकर,हरिओम।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, September 15, 2012

एक फिल्म किसी विचाराधारा को नष्ट नहीं कर सकती-हिन्दी लेख (on film not distroyed ane religion thought)


           एक सामान्य योग साधक तथा गीता पाठक होने के नाते इस लेखक का मानना है कि हर मनुष्य के लिये धर्म एक निजी विषय है।  यह धर्म उच्च आचरण का प्रतीक होने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ा होना चाहिए।  इतना ही नहीं एक  अध्यात्मिक ज्ञानी कभी अपने ज्ञान या इष्ट को लेकर सार्वजनिक चर्चा नहीं करेगा यह भी इस लेखक का मानना है।  ऐसे में जब कुछ अल्पज्ञानी या अज्ञानी जब अपने धार्मिक विषय को सार्वजनिक बनाते हैं तो यह उनके अहंकार का ही प्रमाण होता है।  सार्वजनिक रूप से अपनी बात कहने पर उसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया सहने की क्षमता उनमें नहीं होती।  अज्ञानी तथा अल्पज्ञानी स्वयं को श्रेष्ठ  धार्मिक व्यक्त्तिव का स्वामी  बताने के चक्कर में एक दूसरे पर पर आक्षेप करते हैं।  अगर सामने वाला भी उस जैसा हुआ तो फिर झगड़ा बढ़ता है।  श्रीमद्भागवत गीता साधक के लिये दोनों ही एक जैसे होते है-अहंकारी, अज्ञानी और अन्मयस्क।
       आधुनिक विश्व में कभी  अनेक ऐसे प्रसंग आते हैं जब कार्टून, लेखक, और भाषणों को लेकर अनेक धर्मभीरु लोग इसलिये उत्तेजित होते हैं क्योंकि उसमें उनके इष्ट और विचारधारा पर कटाक्ष किये होते हैं।  उस समय समर्थन और विरोध के शोर के बीच ज्ञानियों के सच पर कोई विचार नहीं करता। अपनी जीत और श्रेष्ठता प्रमाणित करने का यह दंभपूर्ण प्रयास विश्व समाज में तात्कालिक  रूप से अस्थिरता पैदा करता है।  अभी हाल ही में एक फिल्म को लेकर अमेरिका के विरुद्ध पूरे विश्व में वातावरण बन रहा है।  यह फिल्म एक धार्मिक विचाराधारा पर प्रहार करती है। तय बात है कि फिल्म निर्माण से जुड़े लोग कोई तत्वज्ञानी नहीं है इसलिये ही तो उन्होंने दूसरे की धार्मिक विचाराधारा पर प्रहार कर अपनी आसुरी प्रवृत्ति का परिचय दिया है।  अब इस विवाद में बौद्धिक समुदाय दो भागों में बंट गया हैं। एक तो लोगों की आस्थाओं को ठेस पहुंचाने पर आर्तनाद कर हिंसा कर रहा है तो दूसरा अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई दे रहा है। 
     हमारा मानना है कि ऐसी फिल्म नहीं बनना चाहिये थी यह बात ठीक है पर जिस तरह इसका विरोध हो रहा है वह भी संशय से भरा है।  अगर इस फिल्म का विरोध नहीं होता तो दुनियां के कई देशों में अनेक लोग  उसका नाम तक नहीं जान पाते।  भारतीय अध्यात्म दर्शन ऐसे विषयों में उपेक्षासन की बात कहता है।  अगर कथित धर्मभीरु लोग ज्ञान की शरण लें तो उन पर ऐसी फिल्मों या कार्टूनों का कोई प्रभाव नहीं होता। वैसे हमारा मानना है कि पूरे विश्व में अर्थव्यवस्था जिस जटिल दौर से गुजर रही है सभी विचाराधारा के लोगों के लिये रोजी रोटी कमाना ही कठिन हो गया है।  उनके लिये इस बात के लिये यह जानने का समय नहीं है कि कौन उनकी धार्मिक विचाराधारा पर क्या कह रहा है? मगर धर्म के ठेकेदारों को अपने समूहों पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये ऐसे ही विवादास्पद विषय चाहिए।  फिल्म वालों को प्रचार चाहिए ताकि अधिक से अधिक दर्शक मिलें।  इसके लिये अनेक फिल्म वाले धन भी खर्च करते हैं।  संभव है कि कुछ धार्मिक ठेकेदारों ने  उनसे विरोध फिक्स किया हो।  खालीपीली प्रदर्शन से काम न चले इसलिये हिंसा भी कराई गयी हो।  इसका संदेह इसलिये उठेगा क्योंकि एक फिल्म या कार्टून से किसी पुरानी विचाराधारा का कुछ बिगड़ सकता है यह बात यकीन लायक नहीं है।  आस्था पर चोट का सवाल उठाता है तो फिर ज्ञान और अज्ञान की बात भी सामने आयेगी।  किसी भी समुदाय में सभी ज्ञानी हैं यह सोचना गलत है तो सभी अज्ञानी है यह मानना भी महान मूर्खता है। हम यह नहीं कहते कि यह सब प्रायोजित है पर जिस तरह मानव समुदायों को विभिन्न भागों के बांटकर उन पर पेशेवराना अंदाज में नियंत्रण करने की प्रवृत्ति आधुनिक समय में देखी जाती है  उसके चलते कुछ भी अनुमान किया जा सकता है।
            दूसरा भी एक पक्ष है। अगर हम अज्ञानता वश अपने मुख से अपने धर्म या इष्ट का बखान सार्वजनिक रूप से करते हैं तो संभव है कि ज्ञानी कुछ न कहें पर अपने जैसा अज्ञानी सामने आयेगा तो वह दस बातें कहेगा।  सार्वजनिक रूप से अपने इष्ट या विचारधारा की प्रशंसा करने पर उसकी निंदा सुनने को भी तैयार रहना चाहिए।  ऐसे में वाद विवाद से तनाव बढ़ता है।  ऐसे में एक ज्ञानी का मौन रहना बेहतर है।  ज्ञानी लोग अगर कोई जिज्ञासु मनुष्य उनके ज्ञान के बारे में जानना चाहे तो उसे अपने ज्ञान और अभ्यास के बारे में बतायें।  इतना ही नहीं अगर वह कोई प्रश्न पूछता है तो उसका जवाब दे।  जिज्ञासु से अपनी विचारा कहे पर दूसरे के ज्ञान या विचारधारा पर आक्षेप न करे।  दूसरे की निंदा या उस आक्षेप करने वाले कभी समाज में लोकप्रिय नहीं होते।  फिल्म  बनाकर या कार्टून बनाकर क्षणिक प्रतिष्ठा भले ही मिल जाये पर कालांतर में वह कष्टदायक होता है।  वैसे देखा जाये तो ज्ञानी हर समाज में हैं।  अगर ऐसा नहीं होता यह संसार अनेक बार अपनी ही आग से नष्ट हो चुका होता।  इसका मतलब यह है कि हर समुदाय का आम आदमी अपना निजी जीवन शांति से जीना चाहता है।  यही कारण है कि चंद स्थानों पर कुछ दिन ऐसे विषयों पर प्रायोजित हाहाकार बचने के बाद स्थिति सामान्य हो जाती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, September 1, 2012

हिंदी दिवस पर लेख-यथार्थवाद के बाज़ार को फैसबुक से चुनौती (hindi diwas par lekh-yatharthawad ke bazar ko facebbok ki chunauti-article on hindi divas )

       हमारे देश में यथार्थवादी लेखकों तथा बुद्धिजीवियों को अनेक राजकीय सम्मान मिले हैं।  यह लेखक और बुद्धिजीवी स्वयं को समाज का बहुत बड़ा झंडाबरदार समझते रहे हैं।  स्थिति यह रही है कि इनके समर्थक इन्हें समाज का सच सामने लाने वाला ऐसा महान आदमी मानते हैं जो अगर पैदा नहीं होता तो शायद लोग अंधेरे में जीते। इन यथार्थवादियों को हिन्दी के प्रकाशन तथा प्रचार संगठनों का बहुत समर्थन मिला है। स्थिति यह रही है कि इनके यथार्थवाद ने समाज में कोई सुधार तो नहीं ला सका अलबत्ता इनकी सामग्री का प्रचार प्रसार होने पर अंतर्राष्ट्रीय पटल पर  देश की छवि हमेशा खराब ही रही।  इनको सांगठनिक प्रकाशन तथा प्रचार मिलने  से   समाज में अध्यात्म तथा साहित्यक क्षेत्र में निष्पक्ष लेखकों को कभी आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला।
   इस यथार्थवाद में जिस कचड़े को प्रस्तुत किया जाता है दरअसल वह हमारे समाज में पहले से दिखता है।  समाज के कुछ सदस्य इसे भोगते हैं तो कुछ उनके हमदर्द बनकर सहारा भी देते हैं।  इन दोनों के लिये यथार्थवादी एक कल्पित क्रांतिकारी होता है।  एक अभिनेता ने अभी हाल में टीवी चैनल पर समाज के अनेक यथार्थों को प्रस्तुत किया तो वह लोकप्रिय हो गया।  सच बात तो यह है कि उसकी प्रस्तुति को आमजन में अधिक महत्व नहीं दिया क्योंकि समाज में वह सब पहले से ही देख रहा है।  समाज की अनेक दुखांत घटनाओं के समाचार भी हम देख रहे हैं।  यह अलग बात है कि हमारे प्रचार और प्रकाशन प्रबंधक मानते हैं कि भारतीय समाज सोया हुआ है और यथार्थ का चित्रण एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

           चाहे छोटे पर्दे का हो या बड़े पर्दे का अभिनेता  वह बाज़ार और प्रचार समूहों का एक ऐसा बुत होता है जो आमजन को मनोरंजन में इस तरह व्यस्त  रखने में सहायक होता है जिसका  उसका दिमाग कहीं गरीब और अमीर के बीच बढ़ते तनाव के विचलित न हो और देश बदलाव से दूर रहे।  इस यथार्थ में भले ही दोष आर्थिक, धाार्मिक, सामाजिक तथा राजनीति क्षेत्र के शिखर पुरुषों का हो पर उसके लिये समाज को दायी माना जाये। यह काम पहले लेखक करते थे अब अभिनेता भी करने लगे।  छोटे और बड़े पर्दे पर अभिनेता तथा अभिनेत्रियों का राज है और बाज़ार तथा प्रकाशन से जुड़े व्यवसायी उनका चेहरे के साथ नाम अपनी सामग्री बेचने के लिये उसी तरह कर रहे हैं जैसे कि पहले बुद्धिजीवियों के लिये सेमीनारों का आयोजन तथा लेखकों की किताबें प्रकाशित करते थे।
बहरहाल इन्हीं यथार्थवादियों के लिये अब फेसबुक एक चुनौती पेश कर रहा है। यहां अनेक लोग समाज का चित्र अपने कैमरे से कैद कर इस मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं। वह चित्र डराते हैं, हंसाते हैं और दिल को गुदगुदाते हैं।  उस दिन एक चित्र देखा उसमें एक गिलहरी प्लास्टिक की डंडी के सहारे ठंडेपेय की एक खाली बोतल में बची सामग्री अपने मुंह में खींचने की कोशिश कर रही थी। वैसे भी गिलहरियों की अदायें अनेक बार रोचक होती हैं। प्राकृतिक प्रेमियों के लिये उसकी चाल भी बड़ी रुचिकर होती है। 
      एक चित्र में दो बच्चों का चित्रण देखा जिसमें बड़ा बच्चा कचड़े से खाना उठाकर अपनी गोदी में बैठे बच्चे को खिला रहा था। हृदय को चुभोने वाला दृश्य यथार्थवादियों के ढेर सारे शब्दों या फिल्मों से अधिक प्रभावी था।   ऐसे बहुत चित्र देखने को मिलते हैं जिनकी प्रस्तृति लंबी खींचने या उन पर शब्दों का अपव्यय करना बेकार लगता है।  वह चित्र बहुत बड़ी कहानी कह देता है। हम जैसे आम लेखकों के लिये ब्लॉग और फेसबुक पर अधिक समर्थन नहीं होता न ही समाज में प्रचार मिलता है। इसका कारण यह है कि बाज़ार, प्रचार तथा प्रकाशन समूहों के शिखर पुरुष और उनके प्रबंधक अंतर्जाल  पर केवल प्रचारित लोगों की उपस्थिति ही दिखाते हैं।  
         आम लेखक का प्रचार करना इन  समाज पर कब्जा जमाये अपने संगठनों से प्रतिबद्ध लेखकों तथा बुद्धिजीवियों के लिये चुनौती पेश करने में उनको डर लगता है।  इसके बावजूद यह सच है कि फेसबुक ने इन सभी को चुनौती दी है।  इनके पेशेवर बुद्धिजीवियों और लेखकों से आज की पीढ़ी कट गयी है।
---------------------------------------------------------------------
लेखक एंव कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
Writer and poet-Deepak raj kureja "Bharatdeep"
Gwalior' Madhya Pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Friday, August 24, 2012

मेहनत और अक्ल का इस्तेमाल-हिंदी कविता (mehanat aur akla ka istemal-hindi kavita)


अपने सपनों का पूरा होने का बोझ
दूसरों के कंधों पर वह टिकाते हैं,
पूरे होने पर अपनी कामयाबी पर
अपनी ही ताकत दिखाते हैं।
कहें दीपक बापू
मेहनत और अक्ल का
इस्तेमाल करने का सलीका नहीं जिनको
वही दूसरों को अपनी जरूरतों के वास्ते
पहले सर्वशक्तिमान से याचना
फिर पूरी होने पर
ज़माने के सामने इतराना सिखाते हैं।
-------------------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा
ग्वालियर मध्य प्रदेश
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Thursday, August 16, 2012

साहूकार से बने लाचार-हिंदी कविता (sahukar se bane lachar-hindi kavita-hindi poem)


सेवा का व्रत उन्होंने उठाया है,
मेवा में पद मिलेगा
किसी ने उनको सुझाया है।
गरीबों की मदद
मजदूरों को मेहनताना
और बीमार को इलाज दिलाने के लिये
वह समाज सेवा करने में जुट गये है,
रहने के लिये महल
बैठने के लिये कुर्सी
उड़ने क्रे लिये विमान
उनकी पहली जरूरत बन गये है
लाचार तक पहुंचने के लिये
बन गयी उनकी पहली जरूरत
कई साहुकार बन गये मदद पाने के लिये लाचार
सेवक बने स्वामियों की मदद में
उनके खजाने लुट गये हैं।
.............................................
लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,‘‘भारतदीप’’,

ग्वालियर, मध्यप्रदेश


कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Monday, August 13, 2012

जिंदगी में मजे कुछ यूं लिये-हिन्दी कविता (aindagi ke majre hamane yoon liye-hindi kavita or poem)

चंद पल की खुशी की खातिर
हमने जिंदगी के कई साल बरबाद किये,
जब पढ़ते हैं हम अपनी कहानी
तब पता लगता है कि
अमृत से ज्यादा जहर के प्याले पिये।
कहें दीपक बापू
जुबान से निकले अपने बहुत से बोल
बाहर आते ही जमीन पर गिरते देखे
खामोशी में हम खुशी से जिये,
बहुत से दृश्यों में आंखों फोड़ी
शोर सुनकर कान भी बहरे किये,
मगर मजे से रहे तभी
जब लोग दौड़े सुख के वहम में दुखों की तरफ
हम खड़े रहे बांधे हाथ पीछे किये।
........................................
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ग्वालियर
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Tuesday, July 31, 2012

जितना बिजली चलाये-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (jitna bijzli chalaye-hindi hasya vyangya kavita)

कवि सम्मेलन में
बिजली गुल हो गयी
एकदम सन्नाटा छा गया
कवियों की हो गयी बोलती बंद,
सब श्रोता चिल्लाने लगे
नहीं रहे थे वह अब शांति के पाबंद,
एक श्रोता बोला
‘‘कवि भाईयों
इस बिजली गुल होने पर
कोई कविता सुनाओ,
अंधेरे पर कुछ गुनगुनाओ,
देशभक्ति पर बाद में
अपने गीत और गज़लें सुनाना,
मौका है तुम्हारे पास
चाहो तो तरक्की का मखौल उड़ाना,
हमारे अंदर का दर्द बाहर आ जाये,
आप में से कोई ऐसा गीत गाये।
सुनकर एक कवि बोला
‘‘अंधेरा मेरा गुरु है
जिससे प्रेरित होकर मैंने शब्द शास्त्र चुना
उसका मखौल मैं उड़ा नहीं सकता,
बिजली की राह भी अब नहीं तकता,
आ जाये तो कुछ लिख पाता हूं,
नहीं आती तो सो जाता हूं,
इस देश में अंधेरा बसता है
यह बिजली ने आकर ही बताया,
हैरानी है यह देख कर
अंधेरे ने पुराने लोगों को नहीं सताया,
हंसी यही सोचकर आती है
बिजली की रौशनी के हम गुलाम हो गये,
सूरज का प्रकाश अब मायने नहीं रखता
तरक्की में इंसानी जज़्बात कहीं खो गये,
इस अंधेरे में
मैं बोल सकता हूं
तुम सुन सकते हो
मगर इस कमरे में
अपनी आदतों से मजबूर हम
लाचार साये हो गये,
ओढ़ ली है बेबसी हमने खुद
उतना ही चलते हैं जितना बिजली चलाये,
कुदरत ने इंसान बनाया
मगर हम रोबोट बन गये,
यह अलग बात है कि
बिजली से चलने वाले रोबोट हमने बनाये,
वह हमारे काम आते हैं,
पर हम खुद कभी किसी के काम न आये।
---------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, July 8, 2012

भगवान बड़े हैं
उनकी तलाश में वह भटक रहे हैं,
कण कण में जो व्याप्त हैं
उसका कण ढूंढकर उसमें अटक रहे हैं।
कहें दीपक बापू
जिसे छुआ नहीं जा सकता,
आंखों से देखना भी संभव नहीं,
उसकी आवाज सुन सकें
ऐसे कान मिलना भी मुश्किल है,
उसकी गंध सूंघ सके
वह नाक अभी तक बनी नहीं,
हम शब्द बोलें
पर वह सुने इसका आभास भी नहीं होता
उसके कण की सत्यता
कौन पहचानेगा
अज्ञान के अंधेरे में भटकते लोग
विज्ञान की रौशनी में
झूठ को सच समझे लटके रहे हैं।
------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, June 3, 2012

घायल होने का दर्द-हिन्दी साहित्य (Ghyal hone ka dard-hindi kavita or poem)

रास्ते में मिलने वाले
सभी लोगों से हम कभी
अपना दिल नहीं मिलाते,
पता है कि जिनका ठिकाना आ गया पहले
वह हमें छोड़ जायेंगे,
मंजिल आयी पहले अगर हमारी
हम उन्हें आगे घकियाएंगे,
ऐसे में जिस हमराह के यादगार पल हों साथ
वह दिल का दर्द दिखाते।
कहें दीपक बापू
लोग हालतों से मजबूर होकर
अपना चेहरा बदल देते हैं,
मतलब निकलते ही दूर होकर
अपना नाम भी बदल देते हैं,
हवा में उड़ने की चाहत में
लोग जोड़ते हैं तूफानों से नाता,
गिरना तय था
घायल होने पर ही हर कोई समझ पाता,
इसलिये दूसरों को नहीं
खुद को ही जमीन पर पांव
रखकर चलना सिखाते।
-------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Monday, April 2, 2012

अध्यात्म ज्ञान क्रय विक्रय की वस्तु नहीं-हिन्दी संपादकीय (adhyatma gyan [kharid frokhta ki cheej nahin-hindi editorial, article or lekh)

             योग और ध्यान की कला बाज़ार में बिकने वाली चीज नहीं है जिसे खरीदकर कोई सिद्ध बन जाये। इसके अलावा जो सिद्ध हैं वह अपनी सिद्धियां बाज़ार में ब नहीं जाते। सच बात तो यह है कि साधना एकांत में सक्रिय रहकर की जा सकती है। ऐसे में चौराहों पर आकर अगर कोई यह दावा करता है कि वह योग और ध्यान में सिद्ध है और अपने चेले चपाटे इस प्रचार में लगा देता है कि उसके धार्मिक संसार का विस्तार हो तो समझ लीजिये कि वह गुरु अध्यात्म ज्ञान से स्वतः वंचित है। अध्यात्म और धर्म में अंतर है। धर्म बाह्य रूप से निर्वाह किया जाता है और अध्यात्म अंतर ज्योति में प्रकाशित होता है अतः उसका ज्ञान होने पर आदमी अंतर्मुखी होता है।
               आज हम देख रहे हैं कि सारे देश में धर्म के नाम पर तमाम तरह के प्रचारक हैं पर उनमें अध्यात्म ज्ञानी कितने हैं, यह शोध का विषय है। एक बात तय रही कि धन लेने और देने वाले कभी भी अध्यात्म ज्ञान में पारंगत नहीं हो सकते। अध्यात्म स्वचिंतन के लिये प्रेरित करता है और ऐसे में आदमी अपनी इंद्रियों को अंतर में सक्रियता रखता है। जब आदमी की इंद्रियां जैसे कान, नाक, हाथ, और आंख बाहरी रूप से सक्रिय हैं तब वह अध्यात्म से परे हो जाती हैं। ऐसे में अच्छा सुने या देखें वह प्रभाव अंदर तक नहीं जाता। उनका प्रभाव तभी अच्छी तरह अंदर जा सकता है जब इंद्रियों को अंतर में ले जाया जाये। यह कला ध्यानी और ज्ञानी जानते हैं और वह कभी आत्म प्रचार के लिये चेले चपाटे नहीं जुटाते।
              इस समय हमारे देश में योग का जिस तरह बाज़ार सजाया जा रहा है उसे देखकर अनेक लोग यह समझते हैं कि यह विधा बहुत सरल है और इसे चंद समय में कोई भी सिखा सकता है। इतना ही नहीं अनेक लोग तो ऐसे हैं जिन्होंने कहीं से दस पंद्रह दिन का योगासन और प्राणायाम का प्रशिक्षण लिया और अब स्वयं शिक्षक बन गये हैं। बहुत कम लोग इस बात को समझते हैं कि पंतजलि योग सूत्र और श्रीमद्भागवत गीता के संदेश केवल श्रद्धा से ही पढ़ने वाली सामग्री नहंी है वरन इनका अध्ययन भी कक्षा दर कक्षा में पढ़कर किया जा सकता है। मतलब यह कि इनके पाठों का अध्ययन करने में वैसी ही बुद्धि की आवश्यकता होती है जिसे गणित, विज्ञान और भूगोल की पुस्तकों को पढ़ने के लिये उपयोग में लायी जाती है। अंतर इतना है कि योग साहित्य और श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन से नौकरी नहीं मिलती दूसरा यह भी कि इनको श्रद्धा से पढ़ने पर ही समझा जा सकता है। थोड़ा बहुत अध्ययन कर शिक्षक बने लोग केवल धार्मिक व्यवसायी बन जाते हैं।
            पतंजलि योग साहित्य के आठ भाग हैं। यह एक तरह से अध्यात्मिक विज्ञान है जिसकी तुलना किसी अन्य किताब या ग्रंथ से नहीं है। यह अलग बात है कि पश्चिमी विज्ञानिकों की दृष्टि से अध्यात्म का कोई विज्ञान नहीं होता। इसी कारण इसके अध्ययन की उपेक्षा हमारे देश में हुई है जिसका लाभ अब वह लोग उठा रहे है जिन्होंने बस इतना सीखा है कि इससे अपनी रोजी रोटी कैसे चलायी जाये। हमें उनकी क्रिया पर कोई आपत्ति नहंी है पर लोगों का यह समझना चाहिए कि पतंजलि योग विज्ञान तथा श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान में वही पारंगत हो सकता है जिसने इनका विशद अध्ययन किया हो। अंत में यह भी बता दें कि जिन्होंने दोनों में अपना महारथ प्राप्त किया है वह कभी प्रचार के मैदान में नहीं दिखाई देंगे। वह दवाई, कैलेंडर और पेन बेचते नहीं दिखाई देंगे। यह भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का प्रभाव कहें कि उनका ज्ञान कभी अर्थ पर आधारित न होने से वह स्वाभाविक रूप से क्रय विक्रय की वस्तु नहीं बन पाया। अगर कोई इसे क्रय और विक्रय की वस्तु समझता है तो वह यकीनन घोर अज्ञानी है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Tuesday, March 13, 2012

उदासीनता और तटस्थता-हिन्दी कविता (udasinta aur tatasthata-hindi poem or kavita)

उदासीन नहीं हैं,
बड़ों बड़ों के बीच लगी है
ऊंचे ऊंचे बयानों की ज़ंग
हम नहीं लड़ेंगे
क्योंकि किसी पद पर आसीन नहीं हैं।
कहें दीपक बापू
बरसों से अखबार पढ़ा है,
नहीं चाहिए किसी से
अपने चेतन होने का प्रमाणपत्र
हमारी सोच में
तुमसे अधिक सच का इतिहास जड़ा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Wednesday, February 29, 2012

इश्क़ का सबूत-हिन्दी कविता (iskq ka saboot-hindi kavita or poem)

इश्क आसान है
अगर दिल से करना जानो तो
जिस्म से ज्यादा रूह को मानो तो
जहां कुछ पाने की ख्वाहिश पाली दिल में
सौदागरों के चंगुल में फंस जाओगे।
कहें दीपक बापू
कोई दौलत पाता है,
कोई उसे गँवाता है,
सिक्कों के खेल में
किसका पेट भरता है,
आम इंसान की ज़िंदगी
कभी कहानी नहीं बनती
चाहे जीता या मरता है,
किसी को होंठों से चूमना,
हाथ पकड़कर साथ साथ घूमना,
दिल का दिल से मिले होने का सबूत नहीं है,
जज़्बात बाहर दिखाये कोई ऐसा भूत नहीं,
इंसान के कायदे अलग हैं,
जिंदगी के उसूल अलग हैं,
करीब से जब जान लोगे
तभी सारे जहां पर हंस पाओगे।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, February 25, 2012

रोना और हँसना-हिन्दी कविता

अब अपने दिल के घर से
बाहर आकर
न हम रोते
न हँसते हैं,
लोग पर्दे पर चलते अफसाने
देखते देखते
हो गए इस जहान के लोग
हर पल प्रपंच रचने के आदी
हम उनके जाल में यूं नहीं फँसते हैं।
कहें दीपक बापू
फिल्म की पटकथाएँ
और टीवी धारावाहिकों की कथाएँ
ले उड़ जाती हैं अक्ल पढ़े लिखे लोगों की
ख्याली दुनियाँ के पात्रों को ढूंढते हुए
ज़मीन की हक़ीक़तों में खुद ही धँसते हैं,
रोना तो छूट गया बरसों पहले
अब ज़माने के कभी बहते घड़ियाली आंसुओं
कभी फीकी उड़ती मुस्कान देखकर
अब अपने दिल को साथ लेकर
बस, हम भी हँसते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, February 11, 2012

नई सुबह और नया चेहरा-हिन्दी कविता (new morning and new face or nai subah aur naya chehra-hindi kavita and poem)

ज़िंदगी का कारवां
बस यूं ही बढ़ता जाएगा,
रास्ते में आएंगे नए पड़ाव
साथी और हमसफरों के चेहरे भी
बदलते रहेंगे
कोई पीछे छूटेगा
कोई आगे निकाल जाएगा।
कहें दीपक बापू
महफिलों में मिलने वाले लोग
भले ही ताउम्र साथ चलने का वादा करें
मगर रात बीतते बीतते
उनके दावों का असर भी खत्म हो जाएगा,
सुबह फिर कोई नया चेहरा सामने आयेगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Friday, February 3, 2012

सेठ हो या भिखारी-हिन्दी कविताएँ (seth ho ya bhkhari-hindi kavitaen or poem)

क्यों हाथ बढ़ाएँ
उन डूबते लोगों के लिए
मरना जिन्होने तय कर लिया है,
दरिंदों की सोहबत जितना बुरा है
उन लोगों का साथ निभाना
जिन्होने थोड़े मज़े की खातिर
मुसीबतों से लड़ना आसान समझ लिया है।
----------------
जो हाथ उठे हैं
हमेशा मांगने के लिए
वह किसी की उम्मीद नहीं बन सकते,
सेठ हो या भिखारी
जिनको प्यारी दौलत है
झूठ बोलते कभी नहीं थकते।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Tuesday, January 24, 2012

रामायण, महाभारत, तथा श्रीमद्भागवत की महिमा-हिन्दी लेख (ramayan, mahabharat aur shrimadbhagwat ki mahima-hindi lekh or article

                उस दिन एक निजी कार्यालय में जाने का अवसर मिला। वहां कुछ युवक कंप्यूटर पर कार्यरत थे। उनमें एक लड़का शायद अपने कंप्यूटर पर रामायण से संबंधित कोई प्रस्तुति देख रहा था। हमने यह अनुमान कंप्यूटर से आ रही आवाजों से किया। उसके पीछे एक दूसरा लड़का भी खड़ा था। अचानक थोड़ी दूर कुर्सी पर बैठे एक आदमी ने कंप्यूटर पर बैठे लड़के को आवाज दी पर अपनी व्यस्तता के कारण उसने सुना नहीं। तब उस आदमी ने पीछे लड़के से पूछा‘‘यह कंप्यूटर पर क्या देख रहा है?
           दूसरे लड़के ने जवाब दिया-’‘रामायण देख रहा है।’’
          उस आदमी ने कहा-‘‘अरे, भईया रामायण बाद में देख लेना पहले मेरे हाथ से यह कागज लेकर जाओ।’’
तब कंप्यूटर पर बैठा लड़का उठा और कागज हाथ में लेते हुए बोला-‘‘रामायण देखने में मजा बहुत आता है। चाहे दूसरे कार्यक्रम भले ही देख लो पर इतना मजा किसी में नहीं आता।’’
          दूसरे लड़के ने कहा-‘‘हां, वाकई मजा आ रहा है।’’
ऐसी घटनायें कई होती हैं। हम जब रामायण, महाभारत या श्रीमद्भागवत में वर्णित कथाओं का चित्रण देखते हैं तो कहीं न कहीं उनके प्रति रुचिकर भाव अवश्य पैदा होता है। पहले लोक नाट्यों के माध्यम से जहां इनका प्रदर्शन होता था तब भी लोग इनको देखते थे और जब चलचित्र के माध्यम से जब इनकी प्रस्तुति सामने आती है तब भी बहुत प्रभावशाली लगती है। चाहे ग्रामीण हो या शहरी या फिर अनपढ़ हो या पढ़ा लिखा इस तरह की प्रस्तुति से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। दरअसल इस तरह हमारे भारतीय दर्शन में ज्ञान का प्रचार इस तरह कथाओं की माध्यम से ही किया गया है। इनके रचनाकारों ने अपने ग्रंथों की सरंचना इस तरह की है कि उनके पात्र हर काल और सभ्यता में लोकप्रिय रहें। इनमें नाट्यविद्या का समावेश तो है पर अध्यात्मिक ज्ञान के मूल तत्वों को प्रतिबिंब भी इनमें किया गया है। यही कारण है कि भले ही रामायण, महाभारत तथा श्रीमद्भागवत जैसे ग्रंथ भले ही भारत की वर्तमान शिक्षा पद्धति का भाग नहीं है पर उनके पात्र आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
             यह स्थिति जहां भारतीय अध्यात्मिक प्रेमियों को सुखद लगती है वहीं आधुनिक रचनाकारों के लिये अत्यंत कष्टकर होती है। वाह चाहें अपने पात्रों को कितना भी जीवंत बनाने का प्रयास करें पर अपनी रचना की वजह से वह बाल्मीकि, वेदव्यास और शुक्राचार्य की श्रेणी में अपना नाम नहीं लिखवा सकते। यही कारण है कि जिन आधुनिक पुरुषों को अपना नाम कालजयी बनाना होता है वह तमाम तरह की नौटंकियां करते हैं। अनेक लोग तो इन ग्रंथो और रचनाकारों के प्रति घृणा का प्रचार भी करते हैं। हालांकि आधुनिक काल में भी मीरा, कबीर, तुलसी, रहीम, तथा सुरदास ने प्रतिष्ठा अर्जित की पर वह प्राचीन परंपरा का विस्तृत रूप ही है। कुछ लोगों को इस भारतीय अध्यात्मिक धारा में बहना असुविधाजनक लगता है इसलिये वह पाश्चात्य धारा का अंधसमर्थन करने लगते हैं। इतना ही नहीं अब तो स्थिति यह है कि अनेक लोगों को पूरी तरह से हिन्दी नहीं आती पर वह हिन्दी भाषियों में लेखक कहलाना चाहते हैं तो वह अंग्रेजी के शब्द शामिल करते हैं। अपनी कमी को हिन्दी में नयी धारा बहाने का प्रयास बताकर छिपाते है।
              भारतीय अध्यात्म की शक्ति का अभी तक यह प्रमाण माना जाता था कि यहां आत्महत्या की घटनायें कम ही होती रही थीं। जैसे जैसे पाश्चात्य भाव यहां बढ़ा है वैसे वैसे आत्महत्यायें की घटनायें भी बढ़ रही हैं। दरअसल हमारे यहां साकार तथा निराकार भक्ति को समान महत्व संभवत इसलिये ही दिया गया ताकि जिसको जैसी सुविधा वैसा वह करे। साकार भक्ति के अनेक लाभ हैं। हताशा अथवा तनाव की स्थिति में मूर्ति के सामने आने परं ध्यान बंटता है जिससे मनुष्य को राहत मिल जाती है। मूर्ति में भगवान नहीं होते पर उसमें होने की अनुभूति मनुष्य में आत्मविश्वास पैदा करती हैं यह ज्ञान साधक समझते है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग स्वयं निराकार भक्ति करते हैं पर साकार भक्त का उपहास नहीं उड़ाते। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय अध्यात्म के मूल ग्रंथों से हमारी पूरे विश्व में पहचान इसलिये ही बनी है क्योंकि वह हर तरह सांसरिक विषयों से संबंधित सामग्री अपने अंदर संजोये हुए हैं।
---------------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Thursday, January 12, 2012

संवेदनाओं का त्याग-हिन्दी व्यंग्य कविता (sanvedna ka tyag-hindi vyangya kavita,shayri or satire poem)

कुछ पाने के लिए
कुछ खोना पड़ता है,
हर कोई दीवार पर तस्वीर सजाने से पहले
उसमें हथोड़े से कील जड़ता है।
कहें दीपक बापू
संस्कृति, संस्कार और समाज के विनाश पर
इतना रोते क्यों हो
अपने देश की बढ़ती दौलत पर इतराओ
विकास के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए
बस, हृदय की संवेदनाओं का त्याग देना पड़ता है।

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, January 8, 2012

उस दिन-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (us din-hindi vyangya kavitaen,shayari,poem)

खामोश
कमरे के अंदर
इस जहान के सारे खलीफा
बहस मेँ व्यस्त हैं
मुद्दा यह है कि
अलग अलग तरीके के हादसों पर
बयान किस तरह बदल बदल कर दिये जाएँ
हमलावरों को डरने की जरूरत नहीं है
उनके खिलाफ कार्रवाई का बयान आयेगा
मगर करेगा कौन
यह तय कभी नहीं होगा।
------------------
इंतज़ार करो
हुकूमत की नज़र आम इंसान पर
ज़रूर जाएगी।
जब वह दिखाकर कुछ सपने
वह दिल बहलाएगी,
मांगे तो खिलाएगी खाना
और दारू भी पिलाएगी।
येन केन प्रकरेण
अपनी हुकूमत पर हुक्म की
मोहर  उस दिन सड़क पर पकड़कर लगवाएगी।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, January 1, 2012

नीम की कड़वाहट, चंदन की खुशबु-हिन्दी व्यंग्य शायरियां (neem ki kadvahat, chandan ki khusbu-hindi vyangya shayariyan)

नीम के पेड़ पर चंदन की खुशबु कभी आ नहीं सकती,
चंदन के पेड़ पर भी कोई दवा भी नहीं मिल सकती।
कहें दीपक बापू सुगंध और मिठाई की दीवानी दुनियां
झूठ के आदी लोग कड़वी सच्चाई कभी पच नहीं सकती।
-----------
खाली दिमाग शैतान का घर होता है,
दिल बहलाने के लिये भी
उसके पास हैवान का दर होता है।
कहें दीपक बापू एक आदमी की बात होती तो ठीक
जहां तो सारा जहान ही जागते हुए सोता है।
--------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, December 24, 2011

गर्मी से बचकर, बरसात से हटकर और सर्दी से डटकर लड़ा जा सकता है-हिन्दी लेख (grami se bachakar,barsat se hatkar aur sardi se datkar bachen-hindi lekh or article)

             ठंड बढ़ रही है, और ऐसा लगता है उन इलाकों से गुजरने पर भी आसपास बर्फ जमे होने का अहसास होता है जो भीषण गर्मी की वजह से जाने जाते हैं। हम भारतीय लोग ठंड, बरसात और गर्मी का सामना करने के आदी माने जाते हैं पर लगता है आधुनिक जीवन शैली ने भारतीय समाज में ढेर सारे विभाजन कर दिये हैं जिसकी वजह से आज हम अपनी कोई बात या अपना सिद्धांत समस्त लोगों पर लागू नहीं कर सकते। मूल बात यह है कि गर्मी का सामना बचकर, बरसात का सामना हटकर और सर्दी का सामना डटकर ही हो सकता है। जब गर्मी में सूर्य की तेज किरणें धरती पर बरस रही हों तब आदमी पेट में पानी भरने के साथ ही पांव में ऐसे जूते पहनकर निकले जिनसे वह जले नहीं। जब बरसात हो रही हो तब जहां तक हो सके अपना सिर भीगने से बचाये ताकि सिर पर पानी पड़ने से स्वास्थ्य की हानि न हो। उसी तरह सर्दी का मुकाबला भले ही रात में बिस्तर में दुबककर हो सकता है पर दिन में जहां तक हो सके अपने शरीर को चलाईये जिससे उसमें अग्नि प्रज्जवलित रहे।
          टीवी पर एक कार्यक्रम में बताया गया कि दिल्ली में बढ़ती सर्दी के बावजूद लोगों के दिमाग में गर्म भरी हुई है। रास्ते चलते हुए वाहन टकराने पर झगड़े और कत्ल हो रहे हैं। इस पर तमाम तरह के सवाल जवाब हो सकते हैं पर मूल बात यह है कि हम मानव के बाह्य रूप के विज्ञान को जानते हैं। संभव है कि कोई मनोविज्ञानिक होने का दावा कर यह बताये कि वह मनुष्य की दिमागी गतिविधियों पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत कर कसते हैं। मगर प्रकृति और निवृत्ति के विज्ञान का सही ज्ञान केवल गीता साधकों को ही हो सकता है। इसके सूत्र बहुत हो सकते हैं पर उनका विस्तार करने से असली बात रह जायेगी। मुख्य बात यह है कि मनुष्य शरीर को एक आत्मा धारण करता है जिसके बिना इस जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। यह अलग बात है कि इस देह का संचालन मनुष्य स्वाभाविक रूप से मन, बुद्धि तथा अहंकार के वश होने देता है। यह केवल ज्ञानियों के लिये ही संभव है कि इन तीनों प्रकृतियों के प्रभाव से निवृत होना जानते हैं। इसके अलावा पंच तत्वों से बनी देह में जल, अग्नि, आकाश, वायु तथा प्रथ्वी पर जो समयानुसार प्रतिक्रिया होती है उसका भी मनुष्य की मनस्थिति पर प्रभाव पड़ता है। जैसा खाये अन्न वैसा हो मन। जैसा पाये धन वैसा हो जाये तन! हम अगर अधिक ज्ञान की बात करेंगे तो शायद समाज का ऐसा भयानक रूप दिखने लगेगा जिससे अंततः स्वयं को ही असहजता अनुभव होगी मगर सत्य तो सत्य है! हमेशा ज्ञानी बने रहना एकाकी बना देता है।
           अभी तक अधिकतर लोगों का हृदय असहज था तब तक चलता रहा पर अब तो लोगों के मस्तिष्क भी असंवेदनशील हो गये हैं जो कि आने वाले खतरों का संकेत है। उनकी प्राणशक्ति अत्यंत क्षीण है जो उनको असहनशील बना रही है। हमारे देश में विकास का पर्याय भौतिक साधनों के अधिक उपभोग से आंकी जा रही है। चीन से हमारे यहां कंप्युटर कम हैं, वहां के मुकाबले कारें कम चल रही हैं, वहां के मुकाबले हमारे यहां टीवी कम चल रहे तथा वहां के मुकाबले यहां इंटरनेट प्रयोक्ता कम है इसलिये हम उससे पीछे हैं, यह बात देश के हितचिंतक बड़े दुःख से कहते हैं। उपभोक्ता बाजार को बढ़ाया जा रहा है। यही कारण है कि कारें और बाईक की तो संख्या में बढ़ रही है पर सड़के चौडी होने की बजाय अतिक्रमण का शिकार हो गयी हैं। फिर आजकल का खानपान ऐसा है कि लोगों की शक्ति कम हो रही है। जैसा कि कहा जाता है कि जो चीज आदमी के पास नहीं होती वह उसके होने का अहसास करना चाहता है। शक्ति है नहीं पर वह दिखाना चाहता है। इसलिये रास्ते पर जरा जरा सी बात झगड़ा। कहीं कहीं कत्ल हो जाता हैं। कहीं सड़क दुर्घटना पर जाम लग जाता है। हमें तो ऐसा लगता है कि अनेक ऐसे लोगों के पास कार या बाइक आ गयी है जो उसके लायक नहीं है पर मगर यह बात उनसे कहना जान आफत में डालना है। बंदर के हाथ में उस्तरा कहें या गंजे को भगवान ने नाखून दे दिये यह कहें। हमारा समाज यह मानता है कि जिसके पास पैसा है उसके पास सब कुछ है। अक्ल तो भगवान उसे वैसे ही दे देता है। हमारा अनुभव इसका उल्टा है। सबसे ज्यादा नकारा धनवान हो गये है यही कारण है कि समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा राजरोगों की चपेट में है। यह रोग उनकी मनस्थिति को खतरनाक न बनायें यह संभव नहीं है।
          अन्ना हजारे ने समाज में चेतना लायी यह कहते हुए बहुत लोग थकते नहीं है पर इसका मतलब यह है कि हमारे यहां लोग सुप्तावस्था में थे। प्रचार माध्यमों को देखकर भले ही लोग समाज में चेतना का दंभ भर रहे हैं पर यह एक भ्रम है। अनेक मनोविशेषज्ञ लगतार यह कह रहे हैं कि भारत में मनोरोगी इतनी बड़ी संख्या में है कि कईयों को इसका आभास तक नहीं कि वह इसका शिकार हैं। मानसिक रूप से रुग्ण समाज अगर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर तालियां बजा रहा है तो उसके नायक के अभिनय को श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता है। प्रश्न तो दर्शक दीर्घा में उपस्थित लोगों की योग्यता पर भी संदेह है। भीड़ प्रसिद्ध का प्रमाण है पर प्रतिभा के लिये किसी भी आदमी की योग्यता के भौतिक सत्यापन से ही संभव है जो कि अपने लिये काम करने से नहीं वरन् समाज को कुछ देने से मिल सकता है। आदमी अकेले जीने का आदी है। वह सड़क पर भी अकेले चलने की अनुभूति चाहता है। ऐसे में कोई   वाहन से टक्कर मारत है तो वह उसमें थोड़ी टूट फूट से बिफर जाता है। घबड़ाता है कि घर पर लोग कहीं यह ताना न दें कि वाहन नहीं चलाना आता। इसलिये वह लड़कर अपनी भड़ासं निकालना चाहता है। पैसा वसूलना चाहता है। सर्दी, गर्मी और बरसात अब उसकी देह को प्रभावित करती है मस्तिष्क को नहीं जो कि असंवेदशील हो चुका है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकाऐं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर