Saturday, September 15, 2012

एक फिल्म किसी विचाराधारा को नष्ट नहीं कर सकती-हिन्दी लेख (on film not distroyed ane religion thought)


           एक सामान्य योग साधक तथा गीता पाठक होने के नाते इस लेखक का मानना है कि हर मनुष्य के लिये धर्म एक निजी विषय है।  यह धर्म उच्च आचरण का प्रतीक होने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ा होना चाहिए।  इतना ही नहीं एक  अध्यात्मिक ज्ञानी कभी अपने ज्ञान या इष्ट को लेकर सार्वजनिक चर्चा नहीं करेगा यह भी इस लेखक का मानना है।  ऐसे में जब कुछ अल्पज्ञानी या अज्ञानी जब अपने धार्मिक विषय को सार्वजनिक बनाते हैं तो यह उनके अहंकार का ही प्रमाण होता है।  सार्वजनिक रूप से अपनी बात कहने पर उसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया सहने की क्षमता उनमें नहीं होती।  अज्ञानी तथा अल्पज्ञानी स्वयं को श्रेष्ठ  धार्मिक व्यक्त्तिव का स्वामी  बताने के चक्कर में एक दूसरे पर पर आक्षेप करते हैं।  अगर सामने वाला भी उस जैसा हुआ तो फिर झगड़ा बढ़ता है।  श्रीमद्भागवत गीता साधक के लिये दोनों ही एक जैसे होते है-अहंकारी, अज्ञानी और अन्मयस्क।
       आधुनिक विश्व में कभी  अनेक ऐसे प्रसंग आते हैं जब कार्टून, लेखक, और भाषणों को लेकर अनेक धर्मभीरु लोग इसलिये उत्तेजित होते हैं क्योंकि उसमें उनके इष्ट और विचारधारा पर कटाक्ष किये होते हैं।  उस समय समर्थन और विरोध के शोर के बीच ज्ञानियों के सच पर कोई विचार नहीं करता। अपनी जीत और श्रेष्ठता प्रमाणित करने का यह दंभपूर्ण प्रयास विश्व समाज में तात्कालिक  रूप से अस्थिरता पैदा करता है।  अभी हाल ही में एक फिल्म को लेकर अमेरिका के विरुद्ध पूरे विश्व में वातावरण बन रहा है।  यह फिल्म एक धार्मिक विचाराधारा पर प्रहार करती है। तय बात है कि फिल्म निर्माण से जुड़े लोग कोई तत्वज्ञानी नहीं है इसलिये ही तो उन्होंने दूसरे की धार्मिक विचाराधारा पर प्रहार कर अपनी आसुरी प्रवृत्ति का परिचय दिया है।  अब इस विवाद में बौद्धिक समुदाय दो भागों में बंट गया हैं। एक तो लोगों की आस्थाओं को ठेस पहुंचाने पर आर्तनाद कर हिंसा कर रहा है तो दूसरा अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई दे रहा है। 
     हमारा मानना है कि ऐसी फिल्म नहीं बनना चाहिये थी यह बात ठीक है पर जिस तरह इसका विरोध हो रहा है वह भी संशय से भरा है।  अगर इस फिल्म का विरोध नहीं होता तो दुनियां के कई देशों में अनेक लोग  उसका नाम तक नहीं जान पाते।  भारतीय अध्यात्म दर्शन ऐसे विषयों में उपेक्षासन की बात कहता है।  अगर कथित धर्मभीरु लोग ज्ञान की शरण लें तो उन पर ऐसी फिल्मों या कार्टूनों का कोई प्रभाव नहीं होता। वैसे हमारा मानना है कि पूरे विश्व में अर्थव्यवस्था जिस जटिल दौर से गुजर रही है सभी विचाराधारा के लोगों के लिये रोजी रोटी कमाना ही कठिन हो गया है।  उनके लिये इस बात के लिये यह जानने का समय नहीं है कि कौन उनकी धार्मिक विचाराधारा पर क्या कह रहा है? मगर धर्म के ठेकेदारों को अपने समूहों पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये ऐसे ही विवादास्पद विषय चाहिए।  फिल्म वालों को प्रचार चाहिए ताकि अधिक से अधिक दर्शक मिलें।  इसके लिये अनेक फिल्म वाले धन भी खर्च करते हैं।  संभव है कि कुछ धार्मिक ठेकेदारों ने  उनसे विरोध फिक्स किया हो।  खालीपीली प्रदर्शन से काम न चले इसलिये हिंसा भी कराई गयी हो।  इसका संदेह इसलिये उठेगा क्योंकि एक फिल्म या कार्टून से किसी पुरानी विचाराधारा का कुछ बिगड़ सकता है यह बात यकीन लायक नहीं है।  आस्था पर चोट का सवाल उठाता है तो फिर ज्ञान और अज्ञान की बात भी सामने आयेगी।  किसी भी समुदाय में सभी ज्ञानी हैं यह सोचना गलत है तो सभी अज्ञानी है यह मानना भी महान मूर्खता है। हम यह नहीं कहते कि यह सब प्रायोजित है पर जिस तरह मानव समुदायों को विभिन्न भागों के बांटकर उन पर पेशेवराना अंदाज में नियंत्रण करने की प्रवृत्ति आधुनिक समय में देखी जाती है  उसके चलते कुछ भी अनुमान किया जा सकता है।
            दूसरा भी एक पक्ष है। अगर हम अज्ञानता वश अपने मुख से अपने धर्म या इष्ट का बखान सार्वजनिक रूप से करते हैं तो संभव है कि ज्ञानी कुछ न कहें पर अपने जैसा अज्ञानी सामने आयेगा तो वह दस बातें कहेगा।  सार्वजनिक रूप से अपने इष्ट या विचारधारा की प्रशंसा करने पर उसकी निंदा सुनने को भी तैयार रहना चाहिए।  ऐसे में वाद विवाद से तनाव बढ़ता है।  ऐसे में एक ज्ञानी का मौन रहना बेहतर है।  ज्ञानी लोग अगर कोई जिज्ञासु मनुष्य उनके ज्ञान के बारे में जानना चाहे तो उसे अपने ज्ञान और अभ्यास के बारे में बतायें।  इतना ही नहीं अगर वह कोई प्रश्न पूछता है तो उसका जवाब दे।  जिज्ञासु से अपनी विचारा कहे पर दूसरे के ज्ञान या विचारधारा पर आक्षेप न करे।  दूसरे की निंदा या उस आक्षेप करने वाले कभी समाज में लोकप्रिय नहीं होते।  फिल्म  बनाकर या कार्टून बनाकर क्षणिक प्रतिष्ठा भले ही मिल जाये पर कालांतर में वह कष्टदायक होता है।  वैसे देखा जाये तो ज्ञानी हर समाज में हैं।  अगर ऐसा नहीं होता यह संसार अनेक बार अपनी ही आग से नष्ट हो चुका होता।  इसका मतलब यह है कि हर समुदाय का आम आदमी अपना निजी जीवन शांति से जीना चाहता है।  यही कारण है कि चंद स्थानों पर कुछ दिन ऐसे विषयों पर प्रायोजित हाहाकार बचने के बाद स्थिति सामान्य हो जाती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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