Saturday, September 20, 2008

आज वह मजाक बनाएगा-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

दीपक बापू बाहर जाने के लिये बाहर निकल रहे थे तो बा (गृहस्वामिनी) ने कहा-‘अभी बिजली नहीं आयी है इसलिये सर्वशक्तिमान के दरबार में दर्शन करने जा रहे हो नहीं तो अभी तक कंप्यूटर पर अपनी आखें झौंक रहे थे।’
दीपक बापू ने कहा-‘कैसी बात करती हो। लाईट चली गयी तो चली गयी। मैं तो पहले ही कंप्यूटर को पर्दा गिराने (शट डाउन) का संदेश भेज चुका था। अपने नियम का मैं पक्का हूं। सर्वशक्तिमान की कृपा है कि मैं ब्लाग लिख पा रहे हूं।
बा ने कहा-‘फंदेबाज बताता रहता है कि तुम्हारे हिट होने के लिये वह कई जगह मन्नतें मांगता है। तुम्हारे फ्लाप शो से वह भी दुःखी रहता है।
दीपक बापू ने कहा-‘तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गयी। न वह पढ़ने में न लिखने में। आ जाता है फालतू की बातें करने। हमने कभी अपने फ्लाप रहने की परवाह नहीं की जो वह करता है। जिनके दोस्त ऐसे ही हों वह भला हिट ब्लागर बन भी कैसे सकता है।’

इतने में फंदेबाज ने दरवाजे पर दस्तक दी। दीपक बापू ने कहा-‘और लो नाम शैतान का। अच्छा खासा सर्वतशक्तिमान के दरबार में जा रहा था और यह आ गया मेरा समय खराब करने। साथ में किसी को लाया भी है।’
फंदेबाज उस आदमी को लेकर अंदर आया और बोला-‘दीपक बापू कहीं जा रहे थे क्या? लगता है घर में लाईट नहीं हैं वरना तुम इस तरह जाते नहीं।’
दीपक बापू ने कहा-‘ अब तुम कोई फालतू बात तो करना नहीं क्योंकि हमारे पास समय कम ही है। बताओ कैसे आये? आज हमारा हास्य कविता लिखने का कोई विचार नहीं है।’
फंदेबाज अपने साथ लाये आदमी की तरफ हाथ उठाते हुए बोला-‘ यह मेरा दोस्त टोपीबाज है। इसने कई धंधे किये पर हिट नहीं हो सका। आपको तो परवाह नहीं है कि हिट हैं कि फ्लाप पर हर आदमी फ्लाप होने का दर्द नहीं झेल सकता। इसे किसी तोते वाले ज्योतिषी ने बताया है कि टोपी के धंधे में इसे सफलता मिलेगी। इसलिये इसने झगड़ेबाज की जगह अपना नाम टोपीबाज कर लिया। यह धंधे के हिसाब से अपना नाम बदलता रहता है। यह बिचारा इतने धंधे कर चुका है कि अपना असली नाम तक भूल गया है। अब आप इसके धंधे का शुभारंभ करो। तोते वाले ज्योतिषी ने इसे बताया था कि किसी फ्लाप लेखक से ही उसका शुभारंभ करवाना। लोग उससे सहानुभूति रखते हैं इसलिये तुम्हें लाभ होगा।’

दीपक बापू ने उस टोपीबाज की तरफ दृष्टिपात किया और फिर अपनी टोपी पर दोनों हाथ लगाकर उसे घुमाया और हंसते हुए बोले-‘चलो! यह नेक काम तो हम कर ही देते हैं। वहां से कोई चार छहः टोपी खरीदनी है। इसकी दुकान से पहली टोपी हम खरीद लेंगे। वह भी नगद। वैसे तो हमने पिछली बार छहः टोपी बाजार से उधार खरीदी थी पर वह चुकायी नहीं। जब उस बाजार से निकलते हैं तो उस दुकान वाले रास्ते नहीं निकलते। कहीं उस दुकान वाले की नजर न पड़ जाये। अगर तुम्हारी दुकान वहीं है तो भैया हम फिर हम नहीं चलेंगे क्योंकि उस दुकानदार को देने के लिये हमारे पास पैसा नहीं है। वैसे सर्वशक्तिमान ने चाहा तो इसके यहां से टोपी खरीदी कहीं फलदायी हो गयी तो शायद कोई एकाध ब्लाग हिट हो जाये।
फंदेबाज बोला-‘अरे, तुम समझे नहीं। यह किसी टोपी बेचने की दुकान नहीं खोल रहा बल्कि यह तो ‘इसकी टोपी उसके सिर’ वाली लाईन में जा रहा है। हां, शुभारंभ आपसे करना चाहता है। आप इसे सौ रुपये दीजिये आपको अंतर्जाल का हिट लेखक बना देगा। इसके लिये वह घर पर बैठ कर अंग्रेजी का मंत्र जपेगा अब उसमें इसकी ऊर्जा तो खत्म होगी तो उसके लिये तो कुछ पैसा तो चाहिये न!
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, ऐसे व्यापार करने से तो न करना अच्छा। यह तो धोखा है, हम तो कभी हिट लेखक नहीं बन सकते। कहीं ठगीबाजी में यह पकड़ लिया गया तो हम भी धर जिये जायेंगे कि इसके धंधे का शुभारंभ हमने किया था।
फंदेबाज ने कहा-‘तुम्हें गलतफहमी हो गयी है कि इसे सौ रुपये देकर हिट लेखक बन जाओगे और यह कोई अंग्रेजी का मंत्र वंत्र नहीं जपने वाला। सौ रुपये नहीं यह तो करोड़ों के वारे न्यारे करने वाला है। यह तो आपसे शुरूआत है। इसलिये टोकन में सौ रुपये मांग रहा हूं। ऐसे धंधे में कोई पकड़ा गया है आजतक। मंत्र का जाप तो यह करेगा। कुछ के काम बनेंेगे कुछ के नहीं। जिनके बनेंगे वह इसका गुण गायेंगे और जिनके नहीं बनेंगे वह कौन शिकायत लेकर जायेंगे?’
दीपक बापू ने कहा-‘क्या तुमने हमें बेवकूफ समझ रखा है। ठगी के धंधे का शुभारंभ भी हम करें क्योंकि एक फ्लाप लेखक हैं।’
फंदेबाज ने कहा-‘तुम भी चिंता मत करो। कई जगह तुम्हारे हिट होने के लिये मन्नतें मांगी हैं। जब हिट हो जाओगे तो तुमसे किसी और बड़े धंधे का शुभारंभ करायेंगे।’
दीपक बापू ने आखें तरेर कर पूछा-‘तो क्या लूटपाट के किसी धंधे का शुभारंभ करवायेगा।’
बा ने बीच में दखल दिया और बोली-‘अब दे भी दो इस बिचारे को सौ रुपये। हो सकता है इसका ध्ंाधा चल निकले। कम से कम फंदेबाज की दोस्ती का तो ख्याल करो। हो सकता है अंग्रेजी के मंत्रजाप करने से आप कंप्यूटर पर लिखते हुए हिट हो जाओ।’
दीपक बापू ने सौ का नोट टोपीबाज की तरफ बढ़ा दिया तो वह हाथ जोड़ते हुए बोला-‘आपके लिये तो मैं सचमुच में अंग्रेजी में मंत्र का जाप करूंगा। आप देखना अब कैसे उसकी टोपी उसके सिर और इसकी टोपी उसके सिर पहनाने का काम शुरू करता हूं। घर घर जाकर अपने लिये ग्राहक तलाश करूंगा। कहीं न कहीं कोई समस्या तो होती है। सभी की समस्या सुनकर उनके लिये अंग्रेजी का मंत्र जपने का आश्वासन दूंगा जो अच्छी रकम देंगे उनके लिये वह जपूंगा और जो कम देंगे उनका फुरसत मे ही काम करूंगा।’
बा ने कहा-‘महाराज, आप हमारे इनके लिये तो आप जरूर अंग्रेजी का मंत्र जाप कर लेना। अगर हिट हो गये तो फिर आपकी और भी सेवा कर देंगे। आपका नाम अपने ब्लाग पर भी चापेंगे (छापेंगे)
अपना काम निकलते ही फंदेबाज बोला-‘अच्छा दीपक बापू चलता हूं। आज कोई हास्य कविता का मसाला मिला नहीं। यह दुःखी जीव मिल गया। अपने धंधे के लिये किसी फ्लाप लेखक की तलाश में था। यह पुराना मित्र है मैंने सोचा तुमसे मिलकर इसका काम करा दूं।’
दीपक बापू ने कहा-‘कमबख्त, इतने करोड़ो के बजट वाला काम शुरू किया है और दो लड्डे भी नहीं ले आये।’
फंदेबाज ने झुककर बापू के मूंह के पास अपना मूंह ले जाकर कहा-‘यह धंधा किस तरह है यह बताया था न! इसमेें लड्डू खाये जाते हैं खिलाये नहीं जाते।’
वह दोनो चले गये तो बा ने दोनों हाथ उठाकर ऊपर की तरफ हाथ जोड़कर कहा-‘चलो इस दान ही समझ लो। हो सकता है उसके अंग्रेजी का मंत्र से हम पर कृपा हो जाये।’
दीपक बापू ने कहा-‘यह दान नहीं है क्योंकि यह सुपात्र को नहीं दिया गया। दूसरा कृपा तो सर्वशक्तिमान ही करते हैं और उन्होंने कभी कमी नहीं की। हम तो उनकी कृपा से ब्लाग लिख रहे हैं उसी से हीं संतुष्ट हैं। फ्लाप और हिट तो एक दृष्टिकोण है। कौन किसको किस दृष्टि से देखता है पता नहीं। फिर अंतर्जाल पर तो जिसका आभास भी नहीं हो सकता उसके लिये क्या किसी से याचना की जाये।’
बा ने पूछा-‘पर यह मंत्र जाप की बात कर रहा था। फिर धंधे की बात कर रहा था समझ में नहीं आया।’
दीपक बापू ने कहा-‘इसलिये तो मैंने उसे सौ रुपये दे दिये कि वह तुम्हारी समझ में आने से पहले निकल ले। क्योंकि अगर तुम्हारे समझ में आ जाता तो तुम देने नहीं देती और बिना लिये वह जाता नहीं। समझ में आने पर तुम फंदेबाज से लड़ बैठतीं और वह पैसा लेकर भी वह अपना अपमान नहीं भूलता। फिर वह आना बंद कर देता तो यह कभी कभार हास्य कविताओं का मसाला दे जाता है उससे भी हाथ धो बैठते। यह तो सौ रुपये का मैंने दंड भुगता है।’
इतने में लाइट आ गयी और बा ने कहा-‘लो आ गयी बिजली! अब बैठ जाओ। फंदेबाज ने कोई मसाला दिया हो तो लिख डालो हास्य कविता।’
दीपक बापू ने कहा-‘अब तो जा रहे सर्वशक्तिमान के दरबार में। आज वह कोई मसाला नहीं दे गया बल्कि हमारी हास्य कविता बना गया जिसे दस को सुनायेगा। अभी तक हमने उसकी टोपी उड़ायी है आज वह उड़ायेगा।
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Saturday, September 13, 2008

आदमी के जिंदगी का भटकाव-हिंदी शायरी

चलने के लिये तो रास्ते बहुत हैं

पर आदमी की मंजिल बस एक है

दिल में बदलते हैं ख्याल तो

बदल देता है रास्ता

नहीं होता गहरी सोच से वास्ता

भटकाव एक बार जिंदगी में आये तो ठीक

पर उसके साथ बीत जाये जिंदगी

अनेक दिशाओं के मायाजाल में

फंसा आदमी

ढेर सारी चीजों के इर्द गिर्द घूमता है

पर पाता कोई नहीं एक है

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Tuesday, September 9, 2008

अभद्र शब्द संग्रह का विमोचन-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

उस दिन ब्लागर अपने कमरे में बैठा लिख रहा था तभी उसे बाहर से आवाज सुनाई दी जो निश्चित रूप से दूसरे ब्लागर की थी। वह उसकी पत्नी से पूछ रहा था-‘भाई साहब, अंदर बैठे कवितायें लिख रहे होंगे।’

गृहस्वामिनी ने पूछा-‘आपको कैसे पता?’
वह सीना तानकर बोला-‘मुझे सब पता है। आजकल वह दूसरों की कविताओं को देखकर अपनी कवितायें लिखते हैं। अपने सब विषय खत्म हो गये हैं। मैंने पहले भी मना किया था कि इतना मत लिख करो। फिर लिखने के लिये कुछ बचेगा ही नहीं।’
वह अंदर आ गया और ब्लागर की तरफ देखकर बोला-‘भाई साहब, नमस्कार।’

पहले ब्लागर ने उसे ऐसे देखा जैसे उसकी परवाह ही नहीं हो तो वह बोला-‘ऐसी भी क्या नाराजगी। एक नजर देख तो लिया करो।’
पहले ब्लागर ने कुर्सी का रुख उसकी तरफ मोड़ लिया औेर बोला-‘एक नजर क्या पूरी नजर ही डाल देता हूं। क्या मैं तुमसे डरता हूं।’
इसी बीच गृहस्वामिनी ने कहा-‘अच्छा आप यह बतायें। चाय पियेंगे या काफी!‘
दूसरा ब्लागर बोला-‘बाहर बरसात हो रही है मैं तो काफी पिऊंगा।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘केवल इसके लिये ही बनाना। काफी जहर है और उसे पीने से इसका जहर थोड़ा कम हो जायेगा तब यह कविता पर कोई अभद्र बात नहीं करेगा।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘आप भी थोड़ी पी लेना। जब से कंप्यूटर पर चिपके बैठे हो। थोड़ी राहत मिल जायेगी।’
वह चली गयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘यार, जरा शर्म करो। दूसरों की कविताओं से अपनी कविताएं टीप रहे हो। तुम्हें शर्म नहीं आती।’
पहले ब्लागर ने कुछ देरी आखें बंद कीं और फिर बोला-‘आती है! पर लिखने बैठता हूं तो चली जाती है। तुम बताओ यह लिफाफे में क्या लेकर आये हो। मुझे तो तुम कोई तोहफा दे नहीं सकते।’
वह बोला-‘इसमे कोई शक नहीं है कि तुम ज्ञानी बहुत हो। कितनी जल्दी यह बात समझ ली।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नहीं इसमें ज्ञान जैसी कोई बात नहीं है। तुम जैसा आदमी किसी को तोहफा नहीं दे सकता यह एक सामान्य समझ का विषय है। बस, यह बताओ कि इसमें हैं क्या?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘पहले काफी पी लूं। फिर इस किताब का विमोचन कर लूं। यह मैंने लिखी है। इस पर तुम कोई रिपोर्ट अपने ब्लाग पर लिख देना। ऐसी सड़ी गली कविताओं से तो इस पर रिपोर्ट लिखना अच्छा।’
पहले ब्लागर ने पूछा-‘मैं क्यों लिखूं? तुम स्वयं ही लिख लो। मेरे पास ऐसे फालतू कामों के लिये समय नहीं है।’
दूसरा ब्लागर ने कहा-‘दरअसल मैं किसी और से लिखवा नहीं सकता और कोई फालतू आदमी इसके लिये मिलता नहीं।’
तब तक गृहस्वामिनी काफी लेकर आयी तो वह बोला-‘यार, लिखने की योग्यता भी तो किसी में होना चाहिये। तुम इतने प्रसिद्ध ब्लागर हो कि जो लिखोगे लोगों की नजरों में अधिक आयेगा।
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां, लिख दो। देखो भाई साहब कितने दिनों बाद तो आये हैं। जो कह रहे हैं वह लिख दो। इतना तो फालतू लिखते हो।’
पहले ब्लागर ने हंसते हुए पूछा-‘इसकी किताब पर लिखने से मेरा लिखा पालतू हो जायेगा?’

दूसरे ब्लागर ने बिना कहे ही काफी का कप उठा लिया और बोला-‘भाभीजी आप हमेशा अच्छी बात करती हैं। इसलिये भाई साहब अच्छा लिख लेते हैं। अब देखिये मैंने यह किताब लिखी है उसका विमोचन कर रहा हूं तो सोचता हूं तो उसकी रिपोर्ट लिख भाई साहब लिखे लें।’
फिर उसने कुछ सोचकर वह पैकेट पहले ब्लागर के पास रख दिया तो उसने भी बिना सोचे समझे उसे खोल दिया। बस दूसरा ब्लागर ताली बजाते हुए बोला-‘वाह, भाई साहब ने तो स्वयं ही विमोचन कर दिया। धन्य हुआ मैं कि देश के इतने बड़े हिंदी ब्लागर ने मेरी किताब का विमोचन कर दिया।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘देखूं तो सही। किताब का नाम क्या है? वैसे यह हिंदी का सबसे बड़ा ब्लागर कौन है?
पहले ब्लागर ने दिखाते हुए कहा-‘‘यही है बड़ा ब्लागर तभी तो इतनी बड़ी किताब लिख है‘अभद्र शब्द संग्रह’!’’
गृहस्वामिनी ने हैरानी से पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
दूसरा ब्लागर बोला-‘इस देश में भाषा का लेकर तमाम तरह के विवाद चलते हैं। लोग अनेक अभद्र शब्दों को भी भद्र समझ रहे हैं इसलिये लोगों को यह समझाना आवश्यक है कि कौनसे शब्द अभद्र हैं जिनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।’
गृहस्वामिनी ने कहा-‘हां! यह विचार तो ठीक है, पर यह सीखने के लिये यह पढ़+ना पढ़ेगा तो ऐसा भी हो सकता है कि लोगों को यही अधिक याद रह जायें और इसका प्रयोग करने लगें।’
गृहस्वमिनी खाली कप लेकर चली गयी तो दूसरा ब्लागर आंखों तरेरता हुआ बोला-‘पक्के बेशर्म हो। तुमने मेरे से पूछे बिना ही मेरी किताब का विमोचन कर दिया। वैसे मुझे अफसोस है कि जब तुम्हें जानता नहीं था तब मैंने यह किताब लिखी थी। फालतू घूमता था तो शाम को घर पर बैठकर लिखता था। अब कंप्यूटर पर टाईप कर एक प्रति लाया था और तुमने उसका विमोचन कर दिया। दूसरी होती तो मैं करता।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तो अभी पैकेट बांध देता हूं। अब कर लो विमोचन।
दूसरा ब्लागर-‘अब तो यह तुम्हारे विमोचन से अपवित्र हो गयी है। खैर एक अफसोस है कि अगर मैं तुमसे पहले मिला होता तो तुम्हारा नाम भी इन अभद्र शब्दा में लिखता।’
इतने में गृहस्वामिनी अंदर आयी तो दूसरा ब्लागर बोला-‘भाभीजी, भाईसाहब के विमोचन से आपकी काफी में मजा आया। अब चलता हूं।’
उसने पहले ब्लागर से किताब वापस मांगी तो उसने कहा-‘मेरे पास रहने दो। इस पर रिपोर्ट कैसे लिखूंगा।’
दूसरा ब्लागर-‘यह एक प्रति है दूसरी होगी तो दे जाऊंगा। हां, इसके विमोचन में अपना नाम मत देना क्योंकि हो सकता है आपकी छवि खराब हो। मेरा ही दे देना।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘तुम भद्र शब्द संग्रह भी तो लिख सकते थे।’
दूसरा ब्लागर-‘यह काम आप जैसे ही कर सकते हैं। आजकल हिट होने के लिये नये नये तरीके अपनाने पड़ते हैं भद्र शब्द तो बहुंत हैं किस किसको लिखें इसलिये अभद्र शब्द संग्रह ही लिखा।’
वह जाने लगा तो पीछे से पहले ब्लागर ने पूछा-‘इस अभद्र शब्द संग्रह पर मैं कोई रिपोर्ट नहीं लिख सकता।’
उसने नहीं सुना और चला गया तो पहला ब्लागर सोच में पड़ गया तो पत्नी ने पूछा-‘क्या सोच में पड़ गये।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘मैंने उससे यह तो पूछा ही नहीं कि इस पर व्यंग्य लिखना है या गंभीर रिपोर्र्ट।
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दीपक भारतदीप

सूचना-यह एक काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं हैं। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा। इस हास्य व्यंग्य का लेखक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नहीं आजतक नहीं मिला।


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दीपक भारतदीप
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hasya vyangya

Monday, September 8, 2008

कविता से शायरी शब्द में वजन है-हास्य कविता

लड़के ने लड़की को प्रभावित करने के लिये
पहले प्रेमपत्र में लिखी कविता और
अपना नाम लिखा प्रेमी
लड़की के लिये प्रिया का संबोधन लगाया
लड़की ने पत्र बिना उत्तर के वापस लौटाया
दूसरे में उसने लिखी शायरी
अपने नाम के साथ आशिक शब्द लगाया
लड़की को आशुका बताया
वहां से प्यार की मंजूरी का पैगाम पाया

पहली मुलाकात में
आशिक ने माशुका से इसका कारण पूछा
तो उसने बताया
‘कविता शब्द से बोरियत लगती है
शायरी में वजन कुछ ज्यादा है
कवियों की कविता तो कोई पढ़ता नहीं
शायरी के फैन सबसे ज्यादा हैं
फिल्मों में शायरों को ही हीरो बनाते हैं
शायरियों को ही बढि़या बताते हैं
कवियों और कवियों का मजाक बनाते हैं
वैसे तो मुझे कविता और शायरी
दोनों की की समझ नहीं है
पर फिल्मों की रीति ही जमाने में हर कहीं है
पहले पत्र में तुम्हारा काव्य संदेश, प्रेमी और
प्रिया शब्द में पुरानापन लगा
दूसरे पत्र में प्यार और शायरी का पैगाम
तुम्हारा आशिक होना और
मुझे माशुका कहने में नयापन जगा
तुम कवि नहीं शायर हो इससे मेरा दिल खुश हुआ
इसलिये मुझे दूसरा प्रेम पत्र भाया
मैंने भी तुम्हें मंजूरी का पैगाम भिजवाया
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Sunday, September 7, 2008

फिर सोचता हूं कि लिखने में क्या बुराई है-आलेख

समय बदल रहा है और नित नयी तकनीकी के आगमन के साथ ही कोई न कोई नया उपकरण आता है जो संवाद प्रेषण को सरलता प्रदान के साथ उसे गति प्रदान कर रहा है। लोग चाहे जिससे जब बात कर सकते हैं और अपने मन पसंद के चित्र देखने के साथ ध्वनि भी सुन सकते है, पर फिर भी लोग लिखे हुए को पढ़ने को उत्सुक रहते है। कहने को मोबाइल, टीवी तथा इंटरनेट पर ढेर सारे मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। उनमें तमाम तरह के ध्वनि और चित्रों से सुसज्जित सामग्री है। फिर भी लोग किसी का लिखा पढ़ने की अपनी इच्छा के साथ जीते हैं। दुर्भाग्य इस बात का है कि लोग यहां भी वैसे ही व्यवहार कर रहे हैं जैसे वह बाहर करते हैं।

हमने देखा होगा कि अच्छी और ज्ञानवद्र्धक सामग्री जो पढ़ने पर दिल को प्रसन्न कर देती है पर उसके लिये थोड़ा अपने मस्तिष्क को खुला रखना पड़ता है। युवा पाठक और उसे न पढ़कर यौन या जासूसी साहित्य को पढ़ना चाहते हैं। इसी कारण ऐसे प्रकाशकों की बाढ़ आ गयी जिन्होंने यौन और जासूसी साहित्य को प्रधानता दी। सामाजिक साहित्य के नाम पर भी सामान्य समाज से परे खूंखार घरेलू पात्रों से सुसज्जित कहानियां और उपन्यास खूब बिके। ऐसे में उत्कृष्ट साहित्य की रचनाओं का लिखा जाना बंद ही हो गया।

फिर साहित्य के नाम पर भी ऐसे लोगों ने ही लिखा जिनको किसी विचारधारा के होने के कारण पुरस्कार आदि मिलते रहे। आजकल कोई भी नया लेखक उत्कृष्ट साहित्य लिखने की सोच भी नहीं सकता। अगर लिखेगा तो उसे प्रकाशक नहीं मिलेगा और अपने पैसे खर्च करेगा तो उसकी किताबें घर में पड़ी रहेंगी। यही कारण है कि हिंदी में मूल रूप से बेहतर साहित्य लिखना नगण्य हो गया है। अगर देखा जाये तो हिंदी में अनुवाद कर लाया साहित्य ही अधिक लोकप्रिय हुआ। इसका कारण यह है कि भारत की क्षेत्रीय भाषाओं मे जनसंख्या कम है और इस कारण उनमें लिखने वाले लेखकों को अपने लिखे के कारण थोड़ा बहुत सम्मान समाज में मिलता है इसलिये वह लिखते हैं और इसी कारण उनकी बेहतर रचनाएं वहां जब सम्मान पाती है और पुरस्कार मिलने पर उनका हिंदी अनुवाद जब आता है तो वह प्रभावपूर्ण लगती हैं। हिंदी भाषा में मूल रूप से लिखने वालों को समाज कोई अधिक महत्व नहीं देता। हां, अगर कोई लोकप्रिय हो जाये तो पत्र पत्रिकाओं में उसको आराम से जगह मिल जाती है।

इधर देख रहा हूं कि अंतर्जाल पर भी सामान्य पाठकों का व्यवहार कुछ ऐसा ही है। वह तलाश रहे हैं वैसा ही साहित्य जैसा वह सामान्य रूप से पढ़ते हैं। मुझे पहले इसका पता नहीं था पर कुछ प्रयोग किये तो देखा कि शायद मेरे लिखे से अधिक इस बात का महत्व है कि मैं पाठकों के उन मार्गों पर अपना ब्लाग बिछा दूं जहां से वह ऐसा वैसा साहित्य पढ़ना चाहते हैं। हां, इसमें सफलता मिली। लोग पता नहीं जानते हुए मेरा ब्लाग देखते हैं या अनजाने में खोलते हैं। जरूर उनको निराशा होती होगी जब वहां मेरी फालतू कवितायें या व्यंग्य उनके सामने आते हैं। इस तरह हिट्स मिलना मुझे स्वतः ही पसंद नहीं पर अतंर्जाल पर प्रयोगधर्मिता की सुविधाओं का उपयोग करना भी कोई बुरी बात नहीं है। एक बात तय रही कि ऐसे पाठक वहां पढ़ने ही आते हैं कोई ध्वनि या चित्र देखने नहीं क्योंकि उसके लिये तो उनके पास अनेक मार्ग है।

मैंने वह साहित्य भी देखा और पढ़ा है। लगभग वैसा ही है जैसा बाजार में बिकता देखा है। कौन क्या लिखता है या पढ़ता है इससे एक लेखक के रूप मेें किसी मतलब नहीं होना चाहिए पर जब सामाजिक सरोकार से संबंधित लिखना है तो यह सब करना ही पड़ता है। वहां ऐसी सामग्री लिखने वालों ने मेहनत की है पर सवाल यह है कि क्या इतनी लंबी सामग्री का लोग आनंद उठा पाते होंगे। अगर हाथ में किताब हो तो ठीक है यहां कंप्यूटर पर आंखें गढ़ाकर क्या वह इतनी बड़ी सामग्री को पढ़कर एन्जाय कर पाते होंंगे। यौन या जासूसी साहित्य कभी भी संक्षिप्त रूप से नहीं लिखे जाते। वैसे यहां मैं केवल यौन साहित्य की बात कर रहा हूं क्योंकि यहां केवल वही मैंने देखा है। यह पता नहीं कि यह रोज लिखा जाता है या लिख कर रख दिया गया है। मेरा पाठकों के मार्ग में अपने ब्लाग रखने का कारण यह भी है कि हो सकता है कि कोई इसी बहाने अच्छा साहित्य पढ़ने की लालसा लेकर आता हो तो वह पढ़ ले-क्योंकि अधिकतर लोगों को पता ही नहीं कि अच्छा साहित्य भी यहां लिखा जाता है।

अंतर्जाल पर लिखने के लिये सबसे बेहतर तरीका यही है कि संक्षिप्त लिखा जाये। एक बात और भी है कि अगर यौन साहित्य भी लिखा जाये तो उसकी भी गरिमा होती है। पहले कुछ लेखकों ने आदमी की इंद्रियों को भड़काने के लिये ऐसे उपन्यास लिखे पर वह साहित्य का हिस्सा रहे। बिल्कुल सीधी भाषा में लिखे गये यौन साहित्य का आनंद लोगों को आता है पर गरिमा से लिखे गये साहित्य को वह पढ़ें तो फिर उसे ही पढ़ना चाहेंगे। ऐसी कहानियां और व्यंग्य मेरे दिमाग में आते हैं पर उन पर समय बहुत लगता है। फिर संक्षिप्त में लिखना कोई सरल काम नहीं है। किश्तों में भी लिखा जा सकता है। उसके लिये यह जरूरी है कि कहीं से उसके लिये आय होती हो। यौन और जासूसी साहित्य को तो आजकल के प्रकाशन व्यवसाय का एक असली भाग है। ऐसे में अगर मैं यहां मेहनत करूं तो उसका कोई आर्थिक फायदा नजर नहीं आता। फिर मैं सोचता हूं कि सत्साहित्य की वजह से ही जब मुझे जाना जा रहा है तो फिर इस चक्कर में क्यों पड़ूं। जासूसी उपन्यास तो मेरे में लिखने का ख्याल आता है पर उसके लिये आर्थिक प्रोत्साहन के बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है।

मुख्य बात है कि कंप्यूटर पर ऐसा साहित्य पढ़कर अपनी आंखों और देह के साथ खिलवाड़ करना है। ऐसे में जब पाठकों के मार्ग में मेरी छोटी हास्य कवितायें और व्यंग्य आयेंगे तो हो सकता है उन्हें अच्छा लगे। इसमें कोई संशय नहीं है कि सत्साहित्य के लिये कोई धन का भुगतान नहीं करना चाहता । केवल वाहवाही से हर कोई काम चलाता हैं। इधर मैं भी इंटरनेट कनेक्शन अधिक समय तक नहीं चला पाऊंगा। लिखने के जो हालत हैं वह कोई अच्छे नहीं हैं। मुझे अन्य सुविधायें और उपकरण चाहियें ताकि नये तरीके से काम कर सकूं। उसके लिये चाहिये धन। मैं जिस कमरे में लिखता हूं वहां आजकल उमस है। मेरे बैठने की कुर्सी ठीक नहीं है पर अब नयी कुर्सी लाने की सोचना बेकार लगता है। डेढ़ बरस से लिखते हुए बोरियत हो गयी है। अपने लिखने की जगह बदलने का मतलब है उस पर कुछ पैसे खर्च करना। ऐसे में लगता है कि अब क्या लिखना। हां, ब्लागों पर 800 तक की व्यूज संख्या देखकर मन तो प्रसन्न होता है और यही बात सोचकर लिखता हूं कि यार अगर किसी को सुख दे सकता हूं तो उसमें क्या बुराई है। वैसे अब अधिक रचनायें लिखना कठिन होगा यह भी मुझे लगता है।
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Sunday, August 31, 2008

हौंसला दें वही दोस्त कहलाते-हिन्दी कविता

दूर भी हों पर उनके होने के
अहसास जब पास ही होते
वही दोस्त कहलाते हैं
यूं तो पास रहते हैं बहुत लोग
बहुत सारी बातें बतियाते
पर सभी दोस्त नहीं हो जाते हैं
जिनकी आवाज न पहुंचती हो
पर शब्द कागज की नाव पर
चलकर पास आते हैं
और दिल को छू जाते हैं
ऐसे दोस्त दिल में ही जगह पाते हैं

यूं तो जमाना दोस्त बन जाता है
पर परेशान हाल में छोड़ जाता है
जिनके दो शब्द भी देते हों
इस जिंदगी की जंग में लड़ने का हौंसला
वही दोस्त दूर होते भी
पास हो जाते हैं




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Sunday, August 17, 2008

चाणक्य नीति:पास और परे होने का सम्बन्ध हृदय से है

1.राजा, अग्नि, गुरु, स्त्री इनसे निकटता खतरनाक होती है। इनसे थोड़ा परे रहकर संपर्क रखना चाहिए। अग्नि, जल, सर्प, मूर्ख, और राजा कभी भी रुष्ट होने पर मनुष्य के प्राण तक ले सकते हैं।
2.सच्चा ज्ञानी तो वही है जो प्रसंग के अनुसार वार्तालाप में अपने तर्क उचित ढंग से प्रस्तुत करता है। वह अनुकूल होने पर प्रेम करता है और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध प्रदर्शन करने वाला भी होता है।
3.हृदय में रहने वाला दूर रहकर भी पास है और हृदय में न रहने वाला पास रहकर भी दूर रहता है। परे और निकट के संबंध का आधार हृदय के भाव से है।
4.जल में तेल पड़ते ही कम होने के बावजूद तेल का विस्तार हो जाता है। उसी तरह दुष्ट के साथ गोपनीय विषय पर की गयी वार्ता विद्युत गति से फैल जाती है। उसी तरह सुदान की चर्चा भी विस्तार पाती है। विस्तार की शक्ति अपने पात्र के कार्य करने पर निर्भर रहती है।
5.निर्धन को पत्नी, मित्र, सेवक, भाई और परिजन सब छोड़ देते हैं।

दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति
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Saturday, August 16, 2008

भृतहरि शतक: मूर्खता के निवारण के लिए कोई औषधि नहीं बनी

शक्यो वारयितं जलेन हुतभुक् छत्त्रेण सूर्यातपो
नागेन्द्रो निशितांकुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ
व्याधिर्भैषजसंग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगग्र्विषम्
सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्

हिंदी में भावार्थ-आग का पानी से धूप का छाते से, मद से पागल हाथी का अंकुश से, बैल और गधे का डंडे से, बीमारियों का दवा से और विष का मंत्र के प्रयोग निवारण किया जा सकता है। शास्त्रों के अनेक विकारों और बीमारियों के प्रतिकार का वर्णन तो है पर मूर्खता के निवारण के लिये कोई औषधि नहीं बताई गयी है।
येषा न विद्या न तपो न दानं
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मत्र्यलोके भुवि भारतूवा
मनुष्य रूपेणः मृगाश्चरन्ति।।


हिंदी में भावार्थ-जिन मनुष्यों में दान देने की प्रवृत्ति, विद्या, तप,शालीनता और अन्य कोई गुण नहीं है और वह इस प्रथ्वी पर भारत के समान है। वह एक मृग के रूप में पशु की तरह अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति
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Friday, August 15, 2008

किसी एक रंग में दिल मत लगाना-कविता


पल रंग बदलती दुनियां में
रिश्ते भी बदलते हैं रंग
जो सारी उमर साथ चलने का
एलान करते सरेआम
वह कभी नहीं चलते संग
जिनसे फेरा होता है मूंह
वही चल पड़ते है साथ
निभाने लगते हैं बिना वादा किये
चाहे होते है रास्ते तंग
कोई शिकायत नहीं करते
चलते है संग
.....................................

किसी एक रंग पर मत दिल लगाना
हर रंग को अपनी आंखें पर आजमाना
किसी रंग का भरोसा नहीं फीका पड़ जाये
जो फीका लगता संभव है वही जीवन चमकाये
इंसानों के भी रंग होते हैं
कभी उनके मन होतेे उजले तो
कभी काले होते हैं
इज्जत करते हैं जो दिखाने की
करते हैं वही बदनाम
कर जाते हैं अपने पैगाम देकर दिल खुश
जो खुश्क जिंदगी जी रहे होते हैं
बनते बिगड़ते हैं रंग और इंसान
किसी एक पर मत दिल न लगाना
..........................................................

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Wednesday, August 6, 2008

जिन्दगी चलते है ऐसे ही-हिन्दी शायरी

जीवन के उतार चढाव के साथ
चलता हुआ आदमी
कभी बेबस तो कभी दबंग हो जाता
सब कुछ जानने का भ्रम
उसमें जब जा जाता तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

दुख पहाड़ लगते
सुख लगता सिंहासन
खुली आँखों से देखता जीवन
मन की उथल-पुथल के साथ
उठता-बैठता
पर जीवन का सच समझ नहीं पाता
जब अपने से हटा लेता अपनी नजर तब
अपने आप से दूर हो जाता आदमी

मेलों में तलाशता अमन
सर्वशक्तिमान के द्वार पर
ढूँढता दिल के लिए अमन
दौलत के ढेर पर
सवारी करता शौहरत के शेर पर
अपने इर्द-गिर्द ढूँढता वफादार
अपने विश्वास का महल खडा करता
उन लोगों के सहारे
जिनका कोई नहीं होता आधार तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

जमीन से ऊपर अपने को देखता
अपनी असलियत से मुहँ फेरता
लाचार के लिए जिसके मन में दर्द नहीं
किसी को धोखा देने में कोई हर्ज नहीं
अपने काम के लिए किसी भी
राह पर चलने को तैयार होता है तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी
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Monday, August 4, 2008

शब्द हमेशा हवा में लहराते-हिंदी कविता

हर शब्द अपना अर्थ लेकर ही
जुबान से बाहर आता
जो मनभावन हो तो
वक्ता बनता श्रोताओं का चहेता
नहीं तो खलनायक कहलाता
संस्कृत हो या हिंदी
या हो अंग्रेजी
भाव से शब्द पहचाना जाता है
ताव से अभद्र हो जाता

बोलते तो सभी है
तोल कर बोलें ऐसे लोगों की कमी है
डंडा लेकर सिर पर खड़ा हो
दाम लेकर खरीदने पर अड़ा हो
ऐसे सभी लोग साहब शब्द से पुकारे जाते ं
पर जो मजदूरी मांगें
चाकरी कर हो जायें जिनकी लाचार टांगें
‘अबे’ कर बुलाये जाते हैं
वातानुकूलित कमरों में बैठे तो हो जायें ‘सर‘
बहाता है जो पसीना उसका नहीं किसी पर असर
साहब के कटू शब्द करते हैं शासन
जो मजदूर प्यार से बोले
बैठने को भी नहीं देते लोग उसे आसन
शब्द का मोल समझे जों
बोलने वाले की औकात की औकात देखकर
उनके समझ में सच्चा अर्थ कभी नहीं आता

शब्द फिर भी अपनी अस्मिता नहीं खोते
चाहे जहां लिखें और बोले जायें
अपने अर्थ के साथ ही आते हैं
जुबान से बोलने के बाद वापस नहीं आते
पर सुनने और पढ़ने वाले
उस समय चाहे जैसा समझें
समय के अनुसार उनके अर्थ सबके सामने आते
ओ! बिना सोचे समझे बोलने और समझने वालों
शब्द ही हैं यहां अमर
बोलने और लिखने वाले
सुनने और पढ़ने वाले मिट जाते
पर शब्द अपने सच्चे अर्थों के साथ
हमेशा हवाओं में लहराता
....................................

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Saturday, August 2, 2008

काला और सफेद बाजार-हास्य कविता

घर भरा है समंदर की तरह
दुनियां भर की चीजों से
नहीं है घर मे पांव रखने की जगह
फिर भी इंसान बेचैन है

चारों तरफ नाम फैला है
जिस सम्मान को भूखा है हर कोई
उनके कदमों मे पड़ा है
फिर भी इंसान बेचैन है

लोग तरसते हैं पर
उनको तो हजारों सलाम करने वाले
रोज मिल जाते हैं
फिर भी इंसान बेचैन है

दरअसल बाजार में कभी मिलता नहीं
कभी कोई तोहफे में दे सकता नहीं
अपने अंदर ढूंंढे तभी मिलता चैन है
---------------------

अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नियम’
उन्होंने कुछ इस तरह समझाया
‘जब कारखाने में चीज बनती हो
पर बाजार में नहीं दिखती हो
तो समझो मांग कुछ ज्यादा है
अगर मिलती हो वह काला बाजार में तो
समझ लो आपूर्ति है कम
सफेद बाजार को उन्होंने
आज के अर्थशास्त्र से बाहर का विषय बताया
.............................................

बाजार भी भला कभी
काले और सफेद होते
सौदागर की नीयत जैसी
वैसे ही उसके नाम होते
छिपकर कोई नहीं करता अब
हर शय के सौदे सरेआम होते
खरीददार की मजी नहीं चलती
सफेद बाजार में माल नहीं मिलता
काले सौदे पर भी सफेद होने के प्रमाण होते
चाहे दूने और चौगुने दाम होते
.....................................

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Sunday, June 22, 2008

रेल की बोगी में ज्ञान की किताबें बेच सकते हैं, ज्ञान नहीं-आलेख


वृंदावन की यात्रा कर हम दोनों पति-पत्नी दोनों ही खुश होते हैं। इस बार जब हम दोनों वहां पहुंचे तो बरसात हो रही थी और ठहरने के स्थान पर सामान रखकर हम सबसे अंग्रेजों के मंदिर में गये क्योंकि वह अधिक पास था। हमारे साथ के परिचित सज्जन तो नहीं चले पर उनकी दस वर्षीय बेटी हमारे साथ वहां चली।

वृंदावन में अनेक मंदिर हैं पर बांके बिहारी और अंग्रेजों (इस्कान) का मंदिर बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं और हम दोनों भी वहां रहते हुए प्रतिदिन जाते हैं। अंग्रेजों के मंदिर में आरती के समय नाचते हुए लोगों का दृश्य भी अच्छा लगता है। हालांकि बरसों से जा रहे हैं पर अब वहां मैटल डिक्टेटर और अन्य कड़ी सुरक्षा सहित अन्य परिवर्तन देखकर हमें आश्चर्य होता है। वहां तमाम लोग आते हैं और ऐसा लगता है कि कुछ पिकनिक मनाने के लिए भी आते हैं तो कुछ केवल देखने भर के लिये चले आते हैं। कुछ लोग भक्ति भाव से आते हैं। अगर सीधे कहें तो वहां चारों तरह के भक्त आते हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी। मैं तो वहां कर ध्यान लगाता हूं और मेरी पत्नी भीड़ में बैठकर तालियां बजाते हुए भजन गाती है।

बरसात बंद होने पर जो उमस का गुब्बार फूटा तो उसमें हम पसीना-पसीना हो गये थे। ग्यारस और अवकाश का दिन होने के कारण वहां भीड़ अधिक थी और मुझे ध्यान के लिये किसी अच्छी जगह की तलाश थी। मेरी पत्नी ने दीवार से रखे कूलर की तरफ इशारा किया और मैं वहां ध्यान लगाने बैठ गया और वह आगे बैठकर ताली बजाते हुए नाम जपने लगी। कुछ देर बाद हम बांके बिहारी के मंदिर जाने के लिये तैयार होकर बाहर निकलने लगे। वहां लगी दुकान पर किताबों का मैं निरीक्षण करने लगा। मेरी पत्नी किताबों में रुचि नहीं लेती वह फिर माला या कोई गले में डालने के लिये प्रतीकों के हार खरीदने के इरादे से खड़ी हो गयी।

मैं किताब की दुकान पर पहुंचा तो वहां धवल वस्त्र पहने एक सेल्समेन ने
मेरी तरफ चार पांच छोटी किताबों एक साथ आगे बढ़ाते हुए कहा-‘यह लीजिये सौ रुपये की हैं। दान समझकर लीजिये इससे आपको ज्ञान भी मिलेगा।’

मैंने उससे पूछा-‘क्या कबीर की रचनाओं का कोई अंग्रेजी संग्रह है?’

उसने तुरंत कहा-‘यहां तो केवल हमारी किताबें ही मिलती हैं।’

मैं वहां से चल पड़ा तो पत्नी ने कहा-‘जब आपको मालुम है तो फिर इन किताबोंे की दुकान पर जाते क्यों हैं?’
मैंने कहा-‘इस उम्मीद में शायद कोई किताब मिल जाये।’
वहां से बाहर निकलते हुए कम से कम तीन स्थानों पर ऐसी किताबें खरीदने के लिए हमारे समक्ष रखी गयी। अचानक मेरी पत्नी को याद आया कि कभी मैंने उससे इस्कान की श्रीगीता खरीदने की बात कही थी और उसने पूछा-‘आप खरीदते क्यों नहीं।’
मैंने उससे कहा-‘यह आज से पांच वर्ष पूर्व की बात है। तब तो मैंने अनेक संतों की व्याख्या वाली श्रीगीता खरीद ली थी, पर मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था कि गोरखपुर प्रेस की वही गीता पढ़ना जिसमें केवल संस्कृत श्लोक का अनुवाद हो। किसी द्वारा की गयी व्याख्या या महात्म्य वाली मत पढ़ना क्योंकि उससे भ्रमित हो जाओगे।’ वह तो मेरे पास थी।’
पत्नी ने पूछा-‘ पर उसने ऐसा क्यों कहा था?’
मैंने कहा-‘उसने मेरा लिखा पढ़ा था और वह जानता था कि मैं स्वयं भी अपना सृजन कर सकता हूं। वह मुझे और मेरे लेखन का प्रशंसक था और नहीं चाहता था कि मैं किसी दूसरे की सोच पर चलूं। वह मुझसे आज भी मौलिक सोच और सृजन की आशा करता हैं।’
पत्नी ने पूछा-‘वैसे इस तरह किताबों को इस तरह बेचना ठीक लगता है। अरे, जिसे खरीदना है वह खरीद लेगा।’
मैंने कहा-‘हां, मुझे भी लगता है कि किताबें तो बेची जा सकती हैं पर ज्ञान नहीं बेचा जा सकता है।’

रास्ते में एक जगह किताबों की दुकान पड़ी। वहां एक जगह हमारे साथ चल रही लड़की उसी दुकान के पास पानी पताशा खाने की जिद करने लगी तो मेरी पत्नी भी वहां रुक गयी। मैं पानी पताशा नहीं खाता इसलिये मेरी पत्नी ने उस किताब की दुकान की तरफ इशारा करते हुए बोली-‘आपको कोई किताब खरीदनी हो तो यहां देख लीजिये। आपकी पसंद की किताबें तो ऐसी ही दुकानों पर मिल पातीं हैं।’
मैं वहां जाकर किताबें देखने लगा। एक किताब ली। वहां से हम बांके बिहारी मंदिर में चले गये।

अगली सुबह हम वापस रवाना होने के लिये रेल्वे स्टेशन पर पहुंचे। वहां से हम एक ट्रेन में बैठे तो वहां इस्कान का ही एक गेहुंआ वस्त्र पहने व्यक्ति अपने हाथ में अपने संस्थान द्वारा प्रकाशित श्रीगीता और श्रीमद्भागवत सभी यात्रियों को दिखाकर उनको खरीदने के लिए प्रेरित करता हुआ हमारे पास आया। मेरे इंकार करने पर वह चला गया। मेरी पत्नी ने फिर हैरान होकर पूछा-‘यह क्या तरीका है?’
मैंने कहा-‘लगता है कि प्राईवेट कंपनियों की तरह इन पर भी टारगेट का बोझ है। शायद इन लोगों का अपने टारगेट पूरा करने पर ही आश्रमों मे बने रहने की छूट दी जाती होगी।

मुझे याद आ जब मैं छोटा था तब अपने माता पिता के साथ अंग्रेजों कें मंदिर में गया था उसके बाद उसमें बहुत विकास हुआ है। एक समय मैं सोचता था कि जो अंग्रेज भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं वह शायद श्रीगीता को समझ पायें क्योंकि भारत में तो ऐसे लोग कम ही दिखते हैं। यहां तो ज्ञान का व्यापार होता। लगता है कि जाने अनजाने इस्कान के लोग भारतीय साधु संतों से अपने आपको बड़ा भक्त साबित करने के लिये ऐसा प्रयास कर रहे हैं जिनका कोई तार्किक आधार नहीं है। जहां तक किताबों का प्रश्न है जो जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं वह तो स्वयं ही खरीद लेते हैं पर अर्थाथी या आर्ती हैं उनकी इन किताबों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। इस रेल्वे की बोगियों में इस तरह पवित्र ग्रंथों का ज्ञान बेचने वाले भक्त किस श्रेणी के हैं यह मेरे समझ से परे है? वैसे रेल की बोगी में ज्ञान और भक्ति की किताबें बेच सकते हैं पर ज्ञान और भक्ति भाव किसी में स्थापित करना मुश्किल है।

Saturday, April 19, 2008

मनु स्मृति:पर्याप्त धन न हो तो यज्ञ न करें

यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये
अधिकं वापि विद्येत सः सोम पातुमर्हति

जिस व्यक्ति के पास अपने परिवार हेतु तीन वर्षों से भी अधिक समय तक के लिये भरण-भोषण करने के लिऐ पैसा न हो उसे सोमयज्ञ करने का अधिकार नहीं है।

अतः स्वल्पीयसि द्रव्यै यः सोमं पिवति द्विज
सः पीतसोपूर्वीऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम्

जो व्यक्ति निश्चित मात्रा में भी कम धन राशि होने पर सोमयज्ञ करता है उसका पहला किया हुआ सोमयज्ञ भी व्यर्थ चला जाता है।

वर्तमान संदर्भों में व्याख्या-हमारे अध्यात्म मनीषियों ने अगर यज्ञ, हवन और दान की महिमा को प्रतिपादित किया है पर उनका उद्देश्य समाज में सद्भाव की स्थापना, पर्यावरण की रक्षा तथा गरीब और अमीर के बीच संतुलन स्थापित करना रहा है। अगर हम मनु के दर्शन को देखें तो वह पहले अपने परिवार के भरण भोषण को प्रमुखता देते हैं। अगर कोई व्यक्ति अधिक धन होने पर यज्ञ, हवन और दान करता हैं तो अच्छी बात है पर यह जरूरी नहीं है कि जिसके पास पर्याप्त धन नहीं है उसे कोई वैसा पुण्य नहीं मिलेगा। यज्ञों और हवनों में लोग एकत्रित होते हैं और उससे कुछ लोगों को आर्थिक लाभ होता है इसलिये जिनके पास धन है उनसे ऐसा करने के लिये कहा गया है पर जिनके पास नहीं है वह ऐसे समागमों में अपनी उपस्थिति से भी पुण्य प्राप्त कर लेते हैं। आशय यह है कि अपने और अपने परिवार को कष्ट देकर ऐसे धार्मिक कार्यक्रम करने का कोई लाभ नहीं है।

आपने देखा होगा की कुछ लोगों पर अपने परिवार के भरण-भोषण का जिम्मा होता है वहां उनके घर में कोई बुजुर्ग होते हैं वह अपने मन की शांति के लिये ऐसे यज्ञ हवन कराने या तीर्थ पर जाने के लिये उनसे धन मांगते हैं और नहीं मिलता तो धर्म का हवाला देते है। हम ऐसे कई परिवार देख सकते हैं जहां लोग यह अपेक्षा करते हैं कि पुत्र अपने माता-पिता को श्रवण कुमार की तरह तीर्थ पर ले जाये पर उसको अपने परिवार के भरण भोषण का ही इतना तनाव होता है कि वह न तो खुद ले जाता है और न ही जाने के लिए पैसा दे पाता है ऐसे में वह लोग अपने समाज में इसकी चर्चा करते हैं और लोग भी उसे कोसते हैं-और ऐसा करने वह लोग होते है जिनके पास पैसा होता है या फिर उन पर जिम्मेदारियां अधिक होतीं है। मनु के इन कथनों से एक बात यह स्पष्ट है कि पहला और बड़ा यज्ञ तो अपने आश्रितों को पेट भरने से है और बाकी धर्मकर्म के काम धन होने पर ही किये जाने चाहिए। यह भी एक जरूरी बात है कि अगर धन हो तो ऐसे काम करना चाहिए। यह प्रकृति द्वारा दिया गया संदेश मानिए कि अगर अधिक धन आया तो समाज हित में यज्ञ, हवन और दान करना चाहिए।

एक सहृदय सज्जन ने कहा था कि सुपात्र को दान देने के बहाने लोग नफरत फैलाते है और दूसरे धर्मों के खिलाफ भड़काते हैं। जिनका यह काम करने है वह तो करेंगे ही-एसा मेरा मानना है। एक बात मुझे इस संदर्भ में कहना है कि अगर हम दान करना चाहते हैं और हमें लग रहा है कि कोई सुपात्र व्यक्ति सामने हैं तो उसे देना चाहिए। मनु जी ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी कि उसे भेदात्मक दृष्टि से देखना चाहिए।

Thursday, November 15, 2007

एग्रीग्रेटरों से लिंक ब्लोग पर ही समस्या क्यों ?

मैंने लगातार यह देखने का प्रयास किया है कि कहीं कोई गलती मेरे से तो नहीं हुई है, पर पता नहीं लग रहा है। ब्लागस्पाट.कॉम के जो ब्लोग किसी भी एग्रीगेटर के यहाँ लिंक नहीं है वह काम कर रहे हैं। जो एग्रीग्रेटरों के यहाँ लिंक हैं उनमें सेव भी नहीं हो रहा है। अगर किसी एग्रीग्रेटर ने अपने यहाँ हाल ही में दिनांक और समय में कोइ परिवर्तन किया हो तो उसे देखे कहीं वह ब्लोगरों के ब्लोग में दर्ज समय और दिनांक को प्रभावित तो नहीं कर रहा है। यह भी देखें कि क्या क्या ब्लागस्पाट के कुछ ब्लोग ऐसे हैं जो प्रकाशित कर रहे हैं और वह किसी विशेष एग्रीग्रेटर के यहाँ लिंक नहीं हैं। अगर यह समस्या मेरे साथ होती तो कोई बात नहीं थी, परमजीत बाली जी के दिशाएं में भी यह समस्या थी, पर पता नहीं उनका इंकलाब ब्लोग कैसे दिखाई दे रहा था।

अपने आप में यह आश्चर्य जनक बात है कि आखिर एग्रीग्रेटरों से लिंक ब्लोग पर ही यह समस्या क्यों है? क्या किसी को हिन्दी ब्लोग एक जगह दिखना नहीं सुहाता है-या परमजीत बाली और मैं ही इसी समस्या के शिकार हैं। कम से कम यह समस्या ब्लागस्पाट.कॉम की नहीं लगती-अगर होती तो मेरे यह कहीं लिंक न होने वाले ब्लोग क्यों काम कर रहे हैं। मैंने जो कर के देखा है वही लिख रहा हूँ और बाकी कोई सुधीजन हो तो बताये मैं क्या करूं? उम्मीद करता हूँ कि सक्रिय लोग इस तरफ ध्यान देंगे।

Wednesday, October 3, 2007

संत कबीर वाणी: साधू वह जो समदर्शी हो

जौन चाल संसार के जौ साधू को नाहिं
डिंभ चाल करनी करे, साधू कहो मत ताहिं
संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो आचरण संसार का वह साधू का हो नहीं सकता। जो अपने आचरण और करनी का दंभ रखता है उसको साधू मत कहो।
सोई आवै भाव ले, कोइ अभाव लै आव
साधू दौऊँ को पोषते, भाव न गिनै अभाव
कोई भाव लेकर आता है और कोई अभाव लेकर आता है। साधू दोनों का पोषण करते हैं, वह न किसी के प्रेम पर आसक्त होते हैं और न किसी के अभाव देखकर उससे विरक्ति दिखाते हैं।

चाणक्य नीति:ज्ञानी को लोभी और राजा को सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए

  1. साहसी मनुष्य को अपने पराक्रम का पुरस्कार अवश्य मिलता है। सिंह की गुफा में जाने वाले को संभव है काले रंग का मोती गजमुक्ता मिल जाये परंतु जो मनुष्य गीदड़ की मांद में जायेगा तो उसे गाय की पुँछ और गधे के चमडे के अलावा और क्या मिल सकता है।
  2. धन का लोभ करने वाला ज्ञानी असंतुष्ट रहते हुए अपने धर्म का पालन नहीं कर पाता, इसलिए उसका गौरव शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। उसी तरह राजा भी सन्तुष्ट होते ही नष्ट हो जाता है क्योंकि वह अपने राज्य के प्रति सन्तुष्ट होने के कारण महत्त्वान्काक्षा से रहित सुस्त हो जाता और शत्रु उसे घेर लेता है।
  3. उनका जीवन व्यर्थ है जिन्होंने कभी अपने हाथों से दान नहीं किया, कभी अपने कानों से वैद नहीं सुना, अपने आँखों से सज्जन पुरुषों(साधू-संतों) के दर्शन नहीं किये, जिन्होंने कभी तीर्थयात्रा नहीं की जो अन्याय से प्राप्त किये धन से अपना भरण-भोषण करते हैं, घमंड से जिनका सिर हमेशा ऊंचा रहा।

Tuesday, October 2, 2007

रहीम के दोहे:मागने से पद छोटा हो जाता है

धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय
उदधि बढ़ाई कौन है जगत पिआसो
जाय संत रहीम जल के महत्व का बखान करते हुए कहते हैं कि कीचड का जल भी धन्य है जहाँ छोटे प्राणी उसे पीकर तृप्त हो जाते हैं परंतु सागर की बढ़ाई कोई नहीं करता क्योंकि उसके तट पर जाकर संपूर्ण संसार प्यासा लौटकर आता है।

मांगे घटत रहीम पद, कितौ करौ बढ़ि काम
तीन पैग बसुधा करो, तऊ बावनै नाम

यहाँ आशय यह है कि याचना कराने से पद कम हो जाता है चाहे कितना ही बड़ा कार्य करें। राजा बलि से तीन पग में संपूर्ण पृथ्वी मांगने के कारण भगवान् को बावन अंगुल का रूप धारण करना पडा।

कबीर वाणी:उसी धन का संचय करो जो आगे काम आये


'कबीर' मन फूल्या फिरै,करता हूँ मैं प्रेम
कोटि क्रम सिरि ते चल्या, चेत न देखै भ्रम
संत शिरोमणि कबीर कहते हैं कि आदमी का मन फूला नहीं समाता यह सोचकर कि'मैं धर्म करता हूँ , धर्म चलता हूँ' पर उसे चेतना नहीं है कि अपने इस भ्रम को देख ले कि धर्म कहाँ है जबकि कर्मों का बोझ उठाएँ चला जा रहा है।
'कबीर' सो धन संचिये, जो आगै कू होइ
सीस चढाये पोटली, ले जात न देख्या कोइ
उसी धन का संचय करो, जो आगे काम आए, तुम्हारे इस धन में क्या रखा है। गठरी सिर पर रखकर किसी को भी आज तक ले जाते नहीं देखा।

चाणक्य नीति:क्रोध उतना ही करें जितना निभा सकें

  1. जिसके प्रति लगाव(सच्चा प्यार) वह दूर होते हुए भी पास रहता है। इसके विपरीत जिसके प्रति लगाव नहीं है वह प्राणी समीप होते हुए भी दूर रहता है। मन का लगाव न होने पर आत्मीयता बन ही नहीं पाती और किसी प्रकार का संबंध बन ही नहीं पाता।
  2. जिस किसी प्राणी से मनुष्य को किसी भी प्रकार के लाभ मिलने की आशा है उससे सदैव और प्रिय व्यवहार करना चाहिए। मृग का शिकार करने की इच्छा रखने वाला चालाक शिकारी उसे मोहित करने के लिए उसके पास रहकर मधुर स्वर में गीत गाता रहता है।
  3. विद्वान व्यक्ति वही है जो अपने व्यक्तित्व के अनुकूल ऎसी बात करता हो जो प्रसंग के भी अनुकूल हो। अच्छी से अच्छी बात अप्रान्सगिक होकर प्रभावहीन हो जाती है। यदि वह बात अप्रिय हो और उसमें क्रोध की अभिव्यक्ति आवश्यक हो तो वह भी उतना ही प्रदर्शित करना चाहिए जितना निभा सकें।

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