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Saturday, August 2, 2008

काला और सफेद बाजार-हास्य कविता

घर भरा है समंदर की तरह
दुनियां भर की चीजों से
नहीं है घर मे पांव रखने की जगह
फिर भी इंसान बेचैन है

चारों तरफ नाम फैला है
जिस सम्मान को भूखा है हर कोई
उनके कदमों मे पड़ा है
फिर भी इंसान बेचैन है

लोग तरसते हैं पर
उनको तो हजारों सलाम करने वाले
रोज मिल जाते हैं
फिर भी इंसान बेचैन है

दरअसल बाजार में कभी मिलता नहीं
कभी कोई तोहफे में दे सकता नहीं
अपने अंदर ढूंंढे तभी मिलता चैन है
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अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नियम’
उन्होंने कुछ इस तरह समझाया
‘जब कारखाने में चीज बनती हो
पर बाजार में नहीं दिखती हो
तो समझो मांग कुछ ज्यादा है
अगर मिलती हो वह काला बाजार में तो
समझ लो आपूर्ति है कम
सफेद बाजार को उन्होंने
आज के अर्थशास्त्र से बाहर का विषय बताया
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बाजार भी भला कभी
काले और सफेद होते
सौदागर की नीयत जैसी
वैसे ही उसके नाम होते
छिपकर कोई नहीं करता अब
हर शय के सौदे सरेआम होते
खरीददार की मजी नहीं चलती
सफेद बाजार में माल नहीं मिलता
काले सौदे पर भी सफेद होने के प्रमाण होते
चाहे दूने और चौगुने दाम होते
.....................................

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