Thursday, September 19, 2013

बीमारी और दवाओं पर सत्संग-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(bimari aru davaon par satsang-hindi vyangya kavita or hindi satire poem)



इस जहान में आधे से ज्यादा लोग
चिकित्सक हो गये हैं,
अपनी बीमारियों की दवायें खाते खाते
इतना अभ्यास कर लिया है कि
वह बीमारी और दवा के बीच
अपना अस्तित्व खो रहे हैं,
बताते हैं दूसरों को दवा
भले कभी खुद ठीक न हो रहे हों।
कहें दीपक बापू
अपनी छींक आते ही हम
रुमाल लगा लेते हैं
इस भय से कि कोई देखकर
दुःखी हो जायेगा,
बड़ी बीमारी का भय दिखाकर
बड़े चिकित्सक का रास्ता बतायेगा,
सत्संग में भी सत्य पर कम
मधुमेह पर चर्चा ज्यादा होती है,
सर्वशक्तिमान से ज्यादा
दवाओं  पर बात  होती है,
कितनी बीमारियां
कितनी दवायें
बीमार समाज देखकर लगता है
छिपकर खुशी की सांस ली जाये,
लाचार शरीर में लोग
ऊबा हुआ मन ढो रहे हैं,
बीमार खुश है अपनी बीमारी और दवाओं पर
भीड़ में सत्संग कर
यह सोचते हुए कि
वह स्वास्थ्य का बीज बो रहे हैं।

  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Wednesday, September 11, 2013

हिन्दी दिवस पर व्यंग्य कविता-अंग्रेजी पढ़ने वाले हिन्दी रास्ता दिखाते हैं (satire poem on hindi day,hindi diwas par vyangya kavita)



ओढ़े हैं अंग्रेजी का लबादा
टिकायें है आसरा
दूसरों पर हिन्दी मशाल जलाने का,
कार पर सवार
हिंग्लिश में बतियाते हैं,
ख्वाब रखते हैं गरीबों पर
राष्ट्रभाषा की बैलगाड़ी का,
देश के इंसानों को गुलाम बनकर
विकास का रास्ता दिखाते हैं,
समाज के बड़े अब परे हो गये हैं,
अंग्रेजी भाषा के ठेकेदार
नाम पट्ठिका  भाषा की पदवी लिखाते हैं।
कहें दीपक बापू
अमीर से हो गयी  आम आदमी की लंबी दूरी,
गरीब के पसीने से निकले सोने को
बटोरने की उनके सामने हैं मजबूरी,
इसलिये साल में एक बार हिन्दी दिवस मनाते हैं,
मातृभाषा पर अहसान जताते हैं,
पूरा घर पढ़ रहा है जिनका अंग्रेजी में
देश के लोगों हिन्दी का मार्ग वही दिखाते हैं।


  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, September 6, 2013

आओ अपना सम्मान स्वयं करें-हिन्दी दिवस पर विशेष लेख (aao apana samman swyan karen-hindi diwas, hindi divas par vishesh lekh or hindi article hindi day)



                        14 सितम्बर 2013 को एक बार फिर हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है।  इस अवसर पर सरकारी तथा अर्द्धसरकारी तथा निजी संस्थाओं में कहीं हिन्दी सप्ताह तो कही पखवाड़ा मनाया जायेगा।  इस अवसर पर सभी जगह जो कार्यक्रम आयोजित होंगे उसमें निबंध, कहानी तथा कविता लेखन के साथ ही वादविवाद प्रतियोगितायें होंगी। कहीं परिचर्चा आयोजित होगी।  अनेक लोग भारत में हिन्दी दिवस मनाये जाने पर व्यंग्य करते हैं। उनका मानना है कि यह देश के लिये दुःखद है कि राष्ट्रभाषा के लिये हमें एक दिन चुनना पड़ता है।  उनका यह भी मानना है कि हिन्दी भाषा अभी भी अंग्रेजी के सामने दोयम दर्जे की है।  कुछ लोग तो अब भी हिन्दी को देश में दयनीय स्थिति में मानते हैं। दरअसल ऐसे विद्वानों ने अपने अंदर पूर्वाग्रह पाल रखा है। टीवी चैनल, अखबार तथा पत्रिकाओं में उनके लिये छपना तो आसान है पर उनका चिंत्तन और दृष्टि आज से पच्चीस या तीस वर्ष पूर्व से आगे जाती ही नहीं है।  ऐसे विद्वानों को मंच भी सहज सुलभ है क्योंकि हिन्दी का प्रकाशन बाज़ार उनका प्रयोजक है। इनमें से कई तो ऐसे हैं जो हिन्दी लिखना ही नहीं जानते बल्कि उनके अंग्रेजी में लिखे लेख हिन्दी प्रकाशनों में अनुवाद के साथ आते हैं। उनका सरोकार केवल लिखने से है। एक लेखक का इससे ज्यादा मतलब नहीं होना चाहिये पर शर्त यह है कि वह समय के बदलाव के साथ अपना दृष्टिकोण भी बदले।
                        एक संगठित क्षेत्र का लेखक कभी असंगठित लेखक के साथ बैठ नहीं सकता।  सच तो यह है कि जब तक इंटरनेट नहीं था हमें दूसरे स्थापित लेखकों को देखकर निराशा होती थी पर जब इस पर लिखना प्रारंभ किया तो इससे बाहर प्रकाशन में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया।  यहां लिखने से पहले हमने बहुत प्रयास किया कि भारतीय हिन्दी क्षितिज पर अपना नाम रोशन करें पर लिफाफे भेज भेजकर हम थक गये।  सरस्वती माता की ऐसी कृपा हुई कि हमने इंटरनेट पर लिखना प्रारंभ किया तो फिर बाहर छपने का मोह समाप्त हो गया।  यहंा स्वयंभू लेखक, संपादक, कवित तथा चिंत्तक बनकर हम अपना दिल यह सोचकर ठंडा करते हैं कि चलो कुछ लोग तो हमकों पढ़ ही रहे हैं।  कम से कम हिन्दी दिवस की अवधि में हमारे ब्लॉग जकर हिट लेते हैं।  दूसरे ब्लॉग  लेखकों का पता नहीं पर इतना तय है कि भारतीय अंतर्जाल पर हिन्दी की तलाश करने वालों का हमारे ब्लॉग से जमकर सामना होता है।  दरअसल निबंध, कहानी, कविता तथा टिप्पणी लिखने वालों को अपने लिये विषय चाहिये।  वादविवाद प्रतियोगिता में भाग लेने वाले युवाओं तथा परिचर्चाओं में बोलने वाले विद्वानों को हिन्दी विषय पर पठनीय सामग्रंी चाहिये और अब किताबों की बजाय ऐसे लोग इंटरनेट की तरफ आते हैं।  सर्च इंजिनों में उनकी तलाश करते हुए हमारे बलॉग उनके सामने आते हैं।  यही बीस ब्लॉग बीस  किताब की तरह हैं।  यही कारण है कि हम अब अपनी किताब छपवाने का इरादा छोड़ चुके हैं।  कोई प्रायोजक हमारी किताब छापेगा नहीं और हमने छपवा लिये तो हमारा अनुमान है कि हम हजार कॉपी बांट दें पर उसे पढ़ने वाले शायद उतने न हों जितना हमारी एक कविता यहां छपते ही एक दिन में लोग पढ़ते हैं।  इतना ही नहीं हमारे कुछ पाठ तो इतने हिट हैं कि लगता है कि उस ब्लॉग पर बस वही हैं।  अगर वह पाठ  हम किसी अखबार में छपवाते तो उसे शायद इतने लोग नहीं देखते जितना यहां अब देख चुके हैं। आत्ममुग्ध होना बुरा हेाता है पर हमेशा नहीं क्योंकि अपनी अंतर्जालीय यात्रा में हमने देख लिया कि हिन्दी के ठेकेदारों से अपनी कभी बननी नहीं थी।  यहां हमें पढ़ने वाले जानते हैं कि हम अपने लिखने के लिये बेताब जरूर रहते हैं पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हमें कोई प्रचार की भूख है।  कम से कम इस बात से  हमें तसल्ली है कि अपने समकालीन हिन्दी लेखकों में स्वयं ही अपनी रचना टाईप कर लिखने की जो कृपा प्राकृतिक रूप से हुई है कि हम  उस पर स्वयं भी हतप्रभ रह जाते हैं क्योंकि जो अन्य लेखक हैं वह इंटरनेट पर छप तो रहे हैं पर इसके लिये उनको अपने शिष्यों पर निर्भर रहना पड़ता है।  दूसरी बात यह भी है कि टीवी चैनल ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर जैसे अंतर्जालीय प्रसारणों में वही सामग्री उठा रहे हैं जो प्रतिष्ठत राजनेता, अभिनेता या पत्रकार से संबंधित हैं।  यह सार्वजनिक अंतर्जालीय प्रसारण पूरी तरह से बड़े लोगों के लिये है यह भ्रम बन गया है।  अखबारों में भी लोग छप रहे हैं तो वह अंतर्जालीय प्रसारणों का मोह नहीं छोड़ पाते।  कुछ मित्र पाठक पूछते हैं कि आपके लेख किसी अखबार में क्या नहीं छपतें? हमारा जवाब है कि जब हमारे लिफाफोें मे भेजे गये लेख नहीं छपे तो यहां से उठाकर कौन छापेगा?  जिनके अंतर्जालीय प्रसारण अखबारों या टीवी में छप रहे हैं वह संगठित प्रकाशन जगत में पहले से ही सक्रिय हैं। यही कारण है कि अंतर्जाल पर सक्रिय किसी हिन्दी लेखक को राष्ट्रीय क्षितिज पर चमकने का भ्रम पालना भी नहीं चाहिये।  वह केवल इंटरनेट के प्रयोक्ता हैं। इससे ज्यादा उनको कोई मानने वाला नहीं है।
                        दूसरी बात है कि मध्यप्रदेश के छोटे शहर का होने के कारण हम जैसे लेखको यह आशा नहीं करना चाहिये कि जिन शहरों या प्रदेशों के लेखक पहले से ही प्रकाशन जगत में जगह बनाये बैठे हैंे वह अपनी लॉबी से बाहर के आदमी को चमकने देंगे।  देखा जाये तो क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्म तथा विचारवाद पहले से ही देश में मौजूद हैं अंतर्जाल पर हिन्दी में सक्रिय लेाग उससे अपने को अलग रख नहीं पाये हैं।  अनेक लोगों से मित्र बनने का नाटक किया, प्रशंसायें की और आत्मीय बनने का दिखावा किया ताकि हम मुफ्त में यहां लिखते रहें।  यकीनन उन्हें कहीं से पैसा मिलता रहा होगा।  वह व्यवसायिक थे हमें इसका पता था पर हमारा यह स्वभाव है कि किसी के रोजगार पर नज़र नहीं डालते।  अब वह सब दूर हो गये हैं।  कई लोग तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर को होने का दावा भी करने लगे हैं पर उनका मन जानता है कि वह इस लेखक के मुकाबले कहां हैं? वह सम्मान बांट रहे हैं, आपस में एक दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं। कभी हमारे प्रशंसक थे अब उनको दूसरे मिल गये हैं। चल वही रहा है अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर दें।  दरअसल वह इंटरनेट पर हिन्दी फैलाने से अधिक अपना हित साधने में लगे हैं। यह बुरा नहीं है पर अपने दायित्व को पूरा करते समय अपना तथा पराया सभी का हित ध्यान में न रखना अव्यवसायिकता है। पैसा कमाते सभी है पर सभी व्यवसायी नहीं हो जाते। चोर, डाकू, ठग भी पैसा कमाते हैं।  दूसरी बात यह कि कहीं एक ही आदमी केले बेचने वाला है तो उसे व्यवसायिक कौशल की आवश्यकता नहीं होती। उसके केले बिक रहे हैं तो वह भले ही अपने व्यवसायिक कौशल का दावा करे पर ग्राहक जानता है कि वह केवल लाभ कमा रहा है।  अंतर्जाल पर हिन्दी का यही हाल है कि कथित रूप से अनेक पुरस्कार बंट जाते हैं पर देने वाला कौन है यह पता नहीं लगता।  आठ दस लोग हर साल आपस में ही पुरस्कार बांट लेते हैं।  हमें इनका मोह नहीं है पर अफसोस इस बात का है कि यह सब देखते हुए हम किसी दूसरे लेखक को यहां लिखने के लिये प्रोत्साहित नहीं कर पाते।  हमारे ब्लॉगों की पाठक संख्या चालीस लाख पार कर गयी है। यह सूचना हम देना चाहते हैं। इस पर बस इतना ही।  हिन्दी दिवस पर कोई दूसरा तो हमें पूछेगा नहंी इसलिये अपना स्म्मान स्वयं ही कर दिल बहला रहे हैं।                      


  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, August 14, 2013

१५ अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर विशेष हिंदी लेख-राजसी प्रकृति के लोगों को दृढतापूर्वक राजसी कर्म करना चाहिए (special hindi article on 15 august independay day of india-rajsi prakriti ke logon ko hee drudhtapurvak rajsi karma karna chahiye)



        भारत 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की राजनीतिक दासता से मुक्त हुआ था। जब हम राजनीतिक विषय की बात बरते हैं तो उसका संबंध सीधे मनुष्य की राजस प्रकृति और कर्म से होता है।  जैसा कि हम जानते हैं कि मनुष्य की तीन प्रवृत्तियां होती हैं। सात्विक, राजस और तामस, इसी क्रम में उसके कर्म भी होते हैं।  मनुष्य समाज में राजस भाव के लोगों की प्रधानता होती है और सच बात यह है कि संसार के समुचित संचालन में उनका ही योगदान होता है पर यह यहां स्पष्ट कर दें कि सब कुछ वही नहीं होते। तामसी प्रवृत्ति वाले लोगों का संसार संचालन में अपनी उपस्थिति के अलावा
अन्य कोई योगदान नहीं होता। सात्विक प्रकृत्ति के लोग येनकेन प्रकरेण राजसी प्रकृत्ति के लोगों के प्रति सद्भाव तो रखते हैं पर उनकी प्रकृति और कर्म का अनुकरण नहीं करते।  अगर मदद मांगी जाये तो वह राजसी प्रकृति के मनुष्य की सहायता करने को तैयार भी हो जाते हैं पर उनका अपने लाभ को लेकर कोई लोभ नहीं होता। राजसी प्रकृत्ति वाले कभी कोई काम बिना लाभ के नहीं करते। अपने पद, पैसे और प्रतिष्ठा का उनमें अहंकार भी रहता है। तामस प्रकृत्ति के लोगों का वह सहजता से उपयेाग करते हैं पर अर्थ सिद्ध न करें तो सात्विक मनुष्य की तरफ उदासीनता का भााव दिखाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि राजसी प्रकृति का जैसा स्वभाव है वैसा ही उसे धारण करने वाले का कर्म भी होता है। राजसी व्यक्ति कभी निष्कर्म भाव से सक्रिय नहीं रहता।
            अगर हम इस संसार में संचालन की तरफ देखें तो उसका भौतिक संचालन राजस भाव से ही संभव है। यहां तक कि सात्विक भाव वाले भी कभी न कभी राजस भाव धारण कर कार्य करते हैं।  इन तीनों से परे कर्मयोगी होते हैं जो कर्म की प्रकृति देखकर उसे करने के लिये वैसा ही भाव अपनाते हैं।  वह चाहे जो भी काम करें निष्कर्म भाव से करते हैं।  तय बात है कि ऐसे लोग  विरले ही होते हैं।  हां, यह जरूर है कि कुछ सात्विक प्रकृत्ति के लोग कभी कभी राजस कर्म की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इनमें एक नाम आता है महात्मा गांधी।  देखा जाये तो महात्मा गांधी सात्विक प्रकृत्ति के थे।  दक्षिण अफ्रीका में जब उनको भारतीय होने के कारण रेल के उस डिब्बे से निकाला गया जो केवल गोरे लागों के लिये सुरक्षित था तब उनके मन में आक्रोश का भाव पैदा हुआ। वहीं से उनकी अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोला तो उसकी चरम परिणति  15 अगस्त 1947  को भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के रूप में हुई।  सात्विक प्रकृत्ति के महात्मा गांधी ने राजसी भाव से जिस तरह अपना लक्ष्य प्राप्त किया वह पूरी दुनियां के लिये अनुकरणीय है।
        इसके बावजूद कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर सहजता से नहीं मिल पाता। पहला प्रश्न तो यह कि गांधीजी ने स्वतंत्रता तो दिलाई पर सत्ता से दूर रहे।  कुछ लोग इसे उनका त्याग मानते हैं पर ज्ञान साधक उनके इस भाव को स्वीकार नहीं करते। जब अंग्रेज भारत छोड़ रहे तो महात्मा गांधी यहां की व्यवस्था से प्रथक क्यों हुए? क्या सत्ता केवल भोग  के लिये है जिससे दूर रहना एक पुण्यकर्म है? यदि हम यह माने कि यह त्याग है तो इसका मतलब हम मानते हैं कि राज्य की व्यवस्था तो भगवान के भरोसे ही चलती है और राजा या राज्य प्रमुख तो केवल सुख भोगी होता है।  उस पर प्रजा की भलाई के लिये कोई जिम्मा नहीं होता और उसके लिये चतुराई के साथ उदारता की आवश्यकता भी नहीं होती।  सच तो यह है कि सात्विक प्रकृत्ति के महात्मा गांधी राजसी भाव में एक सीमा तक ही लिप्त हो सकते थे।  कहीं न कहीं अंग्रजों के प्रति उनके मन में नाराजगी का भाव था जो कि विशुद्ध रूप से राजसी भाव का प्रतीक था। जिनकी सात्विक प्रकृति होती है वह राजसी कर्म में निरंतर लिप्त नहीं रह पाते। किसी भी आंदोलन में व्यक्ति की सक्रियता नियमित नहीं होती है इसलिये उसका ठीक से आंकलन नहीं होता। दूसरी बात यह कि आंदोलन चाहे हिंसक हो या अहिंसक कही  न कहीं किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति के विध्वंस का भाव लिये होते हैं।  महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को भारत से बाहर किया पर जब उसके बाद नये भारत क निर्माण का प्रश्न आया तो वह त्यागी हो गये।  अब सवाल आता है कि निर्माण तो किसी भी व्यक्ति की रचनात्मकता की प्रकृति से ही संभव है।  महात्मा गांधी ने सरकार में कोई पद नहीं लिया इसे क्या समझा जाना चाहिये?  हमारा मानना है कि किसी समूह को आंदोलन सफल होने के बाद अभियान चलाना भी आना चाहिये।  आंदोलन से विध्वंस के बाद रचना का अभियान न चलाया जाये तो यह मानना चाहिये कि नेतृत्व में क्षमता का अभाव है।
      महात्मा गांधी के इस कथित त्याग ने देश में तत्कालीन ही नहीं वरन् भविष्य की राजनीतिक पीढ़ी को भी गलत संदेश दिया। आज भी राजनीति में सक्रिय लोगों से जब प्रधानमंत्री या  मुख्यमंत्री पर पर बैठने की इच्छा के बारे में तो वह हृदय में लालसा होते हुए भी मना करने का स्वांग रचते हैं। क्या वह यह साबित नहीं करते कि उच्च पद जिम्मेदारी की बजाय भोग के लिये होता है? दूसरी बात यह कि राजनीति को समाज सेवा के लिये अपनाने का ढोंग कई तरह के विरोधाभासों को उत्पन्न करता है। राज्य प्रमुख  को दृढ केवल न होना चाहिये वरन् दिखना भी चाहिये।  इससे प्रजा तथा शत्रु राष्ट्र डरे रहते हैं।  अगर उच्च पदों पर मन में कुछ और जुबान पर कुछ होने वाले बैठेंगे तो यकीनन राज्य में प्रजा की प्रसन्नता की आशा नहीं करना चाहिये।  सच तो यह है कि राजनीति समाज सेवा का नहीं वरन् राज्य को साधने के लिये करना चाहिये।  सभी को साथ लेकर चलने का स्वांग करने की बजाय सभी को साधने का निश्चय उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को धारण करना चाहिये।  गांधी जी ने अंग्रेजों के राज्य का विध्वंस करने वाले आंदोलन के प्रेरक तो बने पर देश की व्यवस्था को नया रूप देने के लिये किसी अभियान को कैसे चलायें, यह संदेश नहीं दे पाये।  कोई पद लेकर वह शासन चलाने की तरीका सिखाते तो यकीनन उनका दर्जा महात्मा  की बजाय देवता का होता।  यही कारण है कि उनके अनेक अनुयायी यदकदा उनके नाम का जाप करते हुए दूसरी आजादी का आंदोलन करते हैं। कोई कहता है कि हमें अधूरी आजादी मिली।  हम देख रहे हैं कि भारत अभी भी राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से अस्थिर मनस्थिति में फंसा है।  गांधी के ढेर सारे कथन हैं पर उनसे आंदोलन ही चल सकता है।  उनका संदेश या दर्शन किसी अभियान में सहायक हो सकता है, इसके लिये गांधी जी ने कोई उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया।
      बहरहाल 15 अगस्त 1947 को भारत ने राजनीतिक आजादी पायी। इससे अधिक इसका कोई महत्व नहीं है। इससे पूर्व जो भारत था उसके अब तक तीन भाग हो चुके  हैं। एक पाकिस्तान तथा बंग्लादेश तो तीसरा भारत।  दोनों ही देश दुश्मन बने हुए हैं।  मतलब यह कि इस दिन हमने एक दुश्मन पाया जिसके हमने ही दो टुकड़े किये पर दोनों का रवैया एक जैसा है।  पहले अंग्रेजों से लड़ते थे आज इन दोनों टुकड़ों से लड़ना पड़ रहा है।  जहां देश की व्यवस्था का प्रश्न है तो वह अंग्रेजों ने जो बनायी वही चल रही है। इतना ही नहीं हम दावा करते हैं कि अब हमारे अपने कानून हैं पर ताज्जुब हैं उनमें से अधिकतर अंग्रेजों के बने हुए है।  इनमें से कई कानून ऐसे हैं जो अनेक उन कामों को गलत मानते हैं जिनको अंग्रेजी समाज आज भी नहीं मानता।  यही कारण है कि अनेक वि़द्वान अभी भी पूर्ण आजादी के लिये वैचारिक युद्ध मे व्यस्त रहते हुए बहसें करते हैं।  जिनके पास शिखर पर पद हैं पता नहीं वह उनका कितना आनंद उठाते हैं, पर एक बात तय है कि अंग्रेजों की व्यवस्था चल रही है सो चल रही है। वैसे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडमस्मिथ कहते हैं कि ‘‘लोकतंत्र में लिपिक शासन चलाते हैं।’’
       एडमस्मिथ ने कभी भारत का दौरा किया यह तो पता नहीं पर उसने यह उस पश्चिमी व्यवस्था को देखकर ही कहा होगा जिसका अनुकरण हम कर रहे हैं।  हमारे देश में जो व्यवस्था है उसे कौन चला रहा है यह पता नहीं चलता।  खासतौर से उच्च पदों पर विराजमान शिखर पुरुष भी कभी कभी अपने अधीनस्थ अधिकारियों की-लगता है एडमस्मिथ उनको ही क्लर्क मानते होंगे-शिकायत करते हैं कि वह उनकी सुनते ही नहीं है तब यह कहना ही  पड़ता है कि यह देश भगवान भरोसे ही चल रहा है। इस स्वतत्रता दिवस पर हम इतना ही कह सकते हैं कि अभी देश के राजसी प्रवृत्ति के लोगों को सीखने की आवश्यकता है इसके लिये उन्हें कम से कम सात्विक होने का पाखंड छोड़कर राजसी कर्म के प्रति राजसी भाव से दृढ़ता पूर्वक लिप्त होना चाहिये। 
       सभी ब्लॉग लेखक मित्रों और पाठकों इस स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर हार्दिक बधाई।




  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

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Saturday, July 27, 2013

कहानी और अदायें-हिन्दी कविता (kahai aur adaaen-hindi kavita)



शहर में सजती  महफिलों में हम बस यूं ही जाते रहे,
खुद रहे उदास हमेशा, लोगो का दिल  बहलाते रहे।
जिंदगी से टूटे इंसान अपनी जोड़ी दौलत दिखलाते
खुशी नहीं पायी कभी, काले बालों में सफेदी लाते रहे।
अपनी हंसी दूसरों के दर्द से बहते आंसुओं में ढूंढते
अपने दिल के दर्द की क्या दवा पाते, उसे छिपाते रहे।
कहें दीपक बापू जिंदगी की कहानी सभी की एक जैसी
चेहरे बदलते देखकर  अदाओं मे यूं ही  नयापन पाते रहे।
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Sunday, July 7, 2013

विशिष्ट रविवारीय लेख-बौद्धिगया में विस्फोट करना निंदनीय कार्य (special hindi article on sanday-bauddhigaya mein visfot karna nindaneeya)



       भारत में रविवार अब एक तरह से अवकाश के साथ ही अध्यात्म दिवस भी बन गया है।  पहले सरकारी क्षेत्र बढ़ा था और उसके अधिकांश कर्मचारी रविवार को अवकाश होने से बाज़ार के साथ ही अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों की शोभा बढ़ाते थे। अब निजी क्षेत्र में भी रोजगार पाने वाले लोगों के लिये भी रविवार के दिन ही अवकाश रहता है।  वैसे छात्रों को भी रविवार मिलता है और उनमें कुछ मौज मस्ती करते हैं तो कुछ अकेले या परिवार के साथ ही अध्यात्मिक दिवस मनाते हैं।  यह बात बाज़ार तथा उसके प्रचार प्रबंधक जानते हैं इसलिये ही रविवार को ऐसे विषय चुनते हैं जो ज्वलंत हों। कभी कभार उनको स्वतः ही ऐसे विषय मिल जाते हैं। कभी अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान प्रचार समूहों ने जिस तरह अपने विज्ञापन का समय पास किया उसने उनके सामने किसी विषय को निरंतर ज्वंलत बनाये रखकर उसका व्यवसायिक बनाने की योजना की प्रेरणा प्रस्तुत की।
       अभी केदारनाथ सहित पूरे उत्तराखंड में जो प्रकोप हुआ उससे पूरे दो सप्ताह तक प्रचार समूहों का किसी नवीन विषय की आवश्यकता भी नहीं रही।  यह भी देखा गया है कि अर्थ, धर्म, कला, फिल्म और सार्वजनिक विषयों से जुड़े शिखर पुरुषों ने भी अब रविवार का उपयोग आम आदमी तक पहुंचने के लिये प्रचार के रूप में  करना प्रारंभ कर दिया है।  वैसे देखा जाये तो हमारे देश में  संतों पर अक्सर लोगों के भक्ति भाव का दोहन करने का आरोप लगता है पर सच यह है कि जनसमूहों को प्रभावित करने की उनकी कला का अनुकरण हमारे लोकतांत्रिक देश में गैर धार्मिक लोग भी कर रहे हैं।  रविवार का प्रचार के लिये उपयेाग करने का प्रयास पेशेवर धार्मिक संतों ने ही शुरु किया है।
            जब सभी रविवार का उपयोग इस तरह कर रहे हैं तो वह अपराधी समूह कैसे पीछे रह सकते हैं जो जनता में अपनी हिंसा का प्रचार चाहते हैं।  आज बिहार में बौद्धिगया में एक साथ नौ विस्फोट जिस तरह किये गये उससे लगता है कि जानबूझकर रविवार का दिन चुना गया।  समय भी वह चुना गया जिस समय लोग वहां कम थे।  स्पष्टतः इस विस्फोट से जुड़े अपराधियों का मुख्य ध्येय रविवार को अपराध कर सारे दिन टीवी पर बैठकर उसका प्रचार देखते रहना भी हो सकता है।  समय प्रातः पांच से छह के बीच का चुना गया।  यह समय एकदम नियमित भक्तों का होता है जिनकी संख्या नगण्य ही होती है।  वह भक्त  जिनके मन में भगवान के प्रति इतनी श्रद्धा होती है कि वह प्रातः आने वाली मीठी नींद का त्याग कर देते हैं। यही त्याग उनको सच्चा भक्त बनाता है। हम यह नहीं कहते है कि देर से उठकर भगवान की भक्ति करने वाली कोई भक्त नहीं है। एक ज्ञान साधक के लिये किसी की भक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करना वर्जित है पर जब हम थोड़ा विस्तार से विश्लेषण करते हैं तो कुछ ऐसी टिप्पणियां आ ही जाती हैं जब किसी को थोड़ा बेहतर बताया जाये तो तय बात है कि भले ही सीधी न कहें पर किसी का  कम बेहतर होना स्वतः ही प्रकट हो जाता हैं।  हमारा यह भाव कतई नहीं है कि हम देर उठकर भक्ति करने वालों की आलोचना करें पर इतना तय है कि प्रातः जल्दी उठकर सर्वशक्तिमान की प्रार्थना करने वाला वास्तव में एक सच्चा भक्त है।
     एक बार हम अपने एक मित्र के साथ एक  घर से दूर  एक योग शिविर में गये। शिविर का स्थान एक ऐसी कालोनी में था जहां व्यवसायिक लोग रहते हैं।  शिविर पांच दिनों का था पर हम शनिवार और रविवार को ही  वहां गये। वहीं हमारे एक मित्र के मित्र वहीं  रहते थे।  पहले दिन तो हम दोनों निकल आये पर दूसरे दिन मित्र के मित्र का लड़का मिल गया।  रविवार होने के कारण वह प्रातःकाल की सैर को आठ बजे निकला था।  तब हम शिविर से  बाहर निकलकर आपसी वार्तालाप कर रहे थे। हमारी साधना समाप्त हुए भी करीब एक घंटा बीत चुका था।  वहां नाश्ता तथा वार्तालाप में एक घंटा लग गया था।  बाहर निकले तो वह लड़का हमारे मित्र के पास आया। उसे समझते देर नहीं लगी कि हम यहां योग शिविर में आये हैं।  उसने हमारे मित्र से कहा-‘‘अंकल, अब तो आपका कार्यक्रम समाप्त हो गया है। चलिये हमारे घर, कभी तो आया करिये। आज अवसर है तो आप घर चलें और पापा मम्मी से मुलाकात करिये।  मैं थोड़ा घूमकर आता हूं।’’
  हमारे मित्र ने उसकी बात मान ली और उसके घर तक आये। संयुक्त परिवार होने के कारण बड़ा घर था और उसमें घुसने के लिये दो बड़े लोहे के दरवाजे थे। हमारे मित्र ने अपने लक्ष्य वाले दरवाजे की घंटी बजायी तो कोई बाहर नहीं आया।  हम दरवाजा खोलकर दालान पार करते हुए  मकान के अंदर दरवाजे तक आये। वह भी खुला था। मित्र ने अपने मित्र का नाम लेकर आवाज लगायी। कोई जवाब नहीं आया। फिल्म और धारावाहिकों में हम अनेक वारदातें ऐसी देख चुके हैं कि अंदर घुसने का साहस नहीं हुअता। हमारे मित्र के मित्र का छोटा भाई ऊपर से झांक रहा था। हमने उसे अपने आने का कारण बताया।   तब वह अंदर ही नीचे से उतरकर भाई को बुलाने गया।  इतने में उनके काम करने वाली एक महिला का आना हुआ। हमारे मित्र को अनेक बार आने के कारण वह जानती थी।  उसने कहा कि ‘‘आप अंदर चलिये न! वह लोग अंदर ही सो रहे होंगे।’’
       हम उसके साथ ही अंदर दाखिल हो गये।  उस महिला ने बैडरूम के दरवाजे पर जाकर अपने मालिकों को आवाज दी और हमारे  आने की सूचना भी सुना दी।
          हम शिविर से उस मकान तक भी रुकते रुकते पहुंचे थे। घड़ी में उस समय आठ बजकर चालीस मिनट हुए थे। मतलब हमें बिस्तर छोड़े उस समय तक चार घंटे हो चुके थे। हमारी  दैहिक स्थिति इतनी अच्छी थी कि हम घर न जाकर कहीं दूसरा काम भी कर सकते थे-जैसे खरीददारी वगैरह  या कहीं मंदिर में जाकर घ्यान और पूजा करना! खरीददारी करने की बात बेकार है क्योंकि बाज़ार भी अब ग्यारह बजे से पहले कहां खुलते हैं? किसी के घर प्रातःकाल जाकर उसे  किस तरह उसे तकलीफ दी जा सकती है यह भी हमने उस दिन देखा। मित्र तथा उसकी पत्नी एकदम नींद से उठकर बाहर आये। उन्होंने हमारा स्वागत हृदय से किया इसमें संशय नहीं है क्योंकि हम कोई ऐसे रिश्तेदार नहीं थे जो तकलीफ देने वाले हों।
             वहां से हम दस बजे चाय और नाश्ता कर ही बाहर आये। इसकी कोई आवश्यकता भी हमें नहीं थी पर मेजबान का दिल रखने के लिये उनके पदार्थों को सेवन आधे मन से  स्वीकार करना पड़ा। उसी दौरान उनका छोटा भाई भी मिलने आया जो हमें प्रातःकाल आया देखकर हैरान था।  वह अपनी पत्नी के साथ रविवार का दिन होने के कारण  मंदिर जा रहा था।
                 कहने का अभिप्राय यह है कि प्रातःकाल के समय मनुष्य का मन स्वतः ही पवित्र होता है और अगर वह भगवान की भक्ति में लीन हो तो फिर कभी उस पर संशय करना ही नहीं चाहिए।  जब बौद्धिगया में भगवान बुद्ध के मंदिर पर विस्फोटो का विचार करते हैं तो उन दो लामाओं के घायल होने पर दर्द होता ही है जो प्रातःकाल अपने भगवान की सेवा में लीन थे। यकीनन ऐसे विस्फोट करने और कराने वालों को नीच ही कहा जा सकता है।  अभी इस घटना की जांच चल रही है इसलिये कहना कठिन है इससे किसका लक्ष्य पूरा हुआ पर इतना तय है कि इस घटना को किसी भी  धर्म से जोड़ने को हम गलत मानते हैं। हमारा मानना है कि पहले आतंकवाद के अर्थशास्त्र का पता लगाया जाये।  कुछ विद्वान मानते हैं कि आतंकवाद घटनाओं की आड़ में गंदे और गलत काम करने वाले लोग अपनी सक्रियता बढ़ा देते हैं। उनका लक्ष्य प्रजा, प्रशासन तथा पुलिस का ध्यान भटकाकर अपने दो नंबर का काम करना होता है और वही आतंकवाद के प्रायोजक भी होते  है। विस्फोट करने वाले बिना धन या अन्य लाभ के ऐसा काम करें यह भी जंचता नहीं है।  बहरहाल हम इस घटना से पीड़ित लोगों के स्वस्थ होने का हृदय से कामना करते हैं।

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Friday, June 14, 2013

क्रिकेट में पैसा सिर चढ़कर बोल रहा है-लघु हिन्दी व्यंग्य चिंतन (cricket mein paisa sir chadhkaar bol rahaa hai-hindi vyangya chinttan(


        इस समय इंग्लैंड में चैम्पियन ट्राफी क्रिकेट प्रतियोगिता चल रही है। इसमें बीसीसीआई की टीम जोरदार प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ती जा रही है। अनेक क्रिकेट विशेषज्ञ चकित हैं। बीसीसीआई के क्रिकेट खिलाड़ी जिस तरह तूफानी बल्लेबाजी कर रहे है तो दूसरी टीमों के खिलाड़ी धीमे धीमे चल रहे हैं उससे लगता है कि जैसे पिचें अलग अलग हैं। कभी कभी लगता है कि बल्ला या गेंदें भी अलग अलग हैं। मतलब यह कि भारतीय बल्लेबाज दूसरों के मुकाबले ज्यादा आक्रामक हैं। किसी के समझ में नहीं आ रहा है।
          हम समझाते हैं कि आखिर मामला क्या है? गुरुगोविंद सिंह ने कहा है कि पैसा बहुत जरूरी चीज है पर खाने के लिये दो रोटी चाहिये। मतलब यह कि जिंदगी में पैसा जरूरी है।  एक विद्वान कहते हैं कि पैसा कुछ हो या न हो पर जीवन में आत्मविश्वास का बहुत बड़ा स्तोत्र होता है।  जी हां, आईपीएल में बीसीसीआई की टीम के बल्लेबाजों ने जमकर पैसा कमाया है।  यह उनके आत्मविश्वास का ही  कारण बन गया है।  उनको मालुम है कि हमारे पास पैसा बहुत है और यह भाव उनको आक्रामक बना देता है। सीधी बात कहें कि पैसा सिर चढ़कर बोलता है।  हम यहां बीसीसीआई के खिलाडियों की आलोचना नहीं कर रहे बल्कि यह बता रहे हैं कि जिस तरह अन्य टीमों के खिलाड़ी बुझे मन से खेल रहे हैं उससे तो यही लगता है कि उनमें वैसा विश्वास नहीं है जैसा बीसीसीाआई की टीम में हैं। इसे कहते हैं कि पैसा सिर चढ़कर बोलता है।



दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'

Gwalior, Madhya Pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Thursday, May 16, 2013

तुलसीदास के दोहे-कुसंग से बनता काम बिगड जाता है (Tulsidas ke dohe-kusang se banta kaam bigad jaata hai)



       जिन लोगों को अपना जीवन सहजता, सरलता तथा सम्मान के साथ बिताना है उन्हें अन्य काम करने की बजाय केवल अपनी संगत पर ही आत्ममंथन करना चाहिये। गलत आदमी की संगत कभी भी सुफल देने वाली नहीं होती।  अक्सर अनेक लोग गलत आदमी की संगत करते हुए यह सोचते हैं कि हमारा कोई भी मित्र हो उससे हमें क्या परेशानी? वह अच्छा हो या बुरा? उसका आचरण उसकी समस्या है।  यह गलत सोच है।  जब आप समाज में विचरते हैं तो यह भी देखा जाता है कि आपकी संगत किन लोगों से है। जिन लोगों ने आपका व्यवहार नहीं देखा है वह केवल आपकी संगत देखकर ही आपके व्यक्तित्व पर विचार करते हैं। ऐसे में दुष्ट, क्रूर तथा अपराधी से आपका संबंध आपकी छवि बिगाड़ देता है।
कविवर तुलसीदास  कहते हैं कि
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तुलसीकिएं कुंसग थिति,  होहिं दाहिने बाम।
कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल, रत हरि संकंर नाम।
       सामान्य भाषा  से भावार्थ-कुसंग करने से महत्वपूर्ण लोग भी बदनामी प्राप्त करते हैं।  वह अपनी प्रभुता गंवाकर लघुता को प्राप्त करते हैं।  यदि किसी स्त्री पुरुष का नाम देवी देवता के नाम पर रखा जाये पर बुरी संगत होने के कारण वह भी अप्रतिष्ठत हो जाते हैं।  उनका नाम कहीं भी सम्मान से नहीं लिया जाता।
बसि कुसंग  चाह सुजनता, ताकी आस निरास।
तीरथहू को नाम भो, गया मगह के पास।
           सामान्य भाषा में भावार्थ-जब कोई कुसंग करने के बावजूद अपने काम में सफलता और प्रतिष्ठा के लिये निहारता है तो उसकी कामना पूरी नहीं होती।  कुसंग की वजह से न केवल बनते हुए काम  बिगड़ते हैं बल्कि समाज में बदनामी भी होती है। मगध के पास होने के कारण विष्णुपद तीर्थ का नाम भी गया पड़ गया।
       दूसरी बात यह भी है कि हम चाहें या न नहीं हम पर संगत का प्रभाव पड़ता ही है।  जब हम किसी व्यसनी, असामाजिक तत्व या पाखंडी से संगत करते हैं तो उसके प्रति हमारे हृदय में नकारात्मक भाव पैदा होता है। इसके विपरीत अब हम किसी ईमानदार, आचरणवान तथा सहज भाव के व्यक्ति से संपर्क करते हैं तो उसके प्रति सकारात्मक भाव पैदा होता है। नकारात्मक भाव से मन में क्लेश होता है तो सकारात्मक भाव प्रसन्नता देने वाला होता है।  इतना ही नहीं अनेक लोग कुंसगियों के संगत में रहते हुए भी अपराध न करते हुए अपने कुसंगियों के साथ रहने के कारण ही फंस जाते हैं।  किसी व्यक्ति के अपराध करने पर सबसे पहले उसके मित्रों पर दृष्टि जाती हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि अपनी संगत पर हमेशा ही विचार करते रहना चाहिये। जिन लोगों के आचरण में दोष है उनसे दूरी बनाना अपने लिये ही श्रेयस्कर है।
     

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'

Gwalior, Madhya Pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, April 26, 2013

देश की मानसिक स्थिति का भी अध्ययन जरूरी-हिन्दी लेख (desh ke manodasha ka adhyayan jaroori-hindi lekh or editorial)

        न्यायविदों, सामाजिक चिंत्तकों और सेवकों के लिये छोटी आयु की बच्चियों के साथ कुकर्म की बढ़ती घटनायें अत्यंत चिंता का विषय है।  अपराधियों का पकड़ा जाना अच्छी बात है पर ऐसे अप्राकृतिक कर्म की बढ़ती निरंतरता इसे महत्वहीन बना देती है। यही कारण है कि जब सुरक्षा करने वाली संस्थायें  यह कहती है कि वह ऐसे अपराधों को रोक नहीं सकती तो न्यायविदों का उससे यह कहना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वह इतना तो पता लगाये कि ऐसा क्यों हो रहा है।  न्यायविदों का यह पूछना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या लोग पागल हो रहे हैं?
        आर्थिक विकास था भौतिक उत्थान की अंधी दौड़ प्रारंभ हुए पंद्रह वर्ष हो गये हैं।  आर्थिक उदारीकरण के चलते विश्व के सभी देशों में एक समान रूप वाली उपभोग संस्कृति विकसित हो रही है।  यह संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृतियों के साथ ही मूल मानवीय संस्कारों का विलोपन करने वाली है।  बच्चियों के साथ अप्राकृतिक रूप से अनाचार तथा कुंठावश आत्महत्याओं की घटनायें संस्काहीनता के कारण ही बढ़ रही हैं।
      इसी कारण देश की आर्थिक विकास दर का प्रश्न अब गौण होता जा रहा है। पिछले अनेक वर्षों से स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते आ रहे हैं कि देश में दैहिक विकारों के साथ ही लोगों की बिगडती जा रही है़।  समाज में दैहिक रोगियों के साथ ही मानसिक विकारवान लोगों का संख्या भी बढ़ी है। हमारे देश में  आमतौर से मनोरोगी केवल विक्षिप्त व्यक्ति को ही  माना जाता है। जिसे कुछ भी भान न हो वही पागल केवल मनोचिकित्सा योग्य है, यह सोच आज भी बनी हुई है।  आधुनिक मनोविज्ञान की जानकारी आम लोगों को नहीं है।  उनको यह पता नहीं कि अस्थाई रूप से पागलपन के शिकार अनेक लोग हो रहे है।  कब किसका मस्तिष्क पर से नियंत्रण समाप्त हो सकता है इसका अंदाज किसी को नहीं है।  एक पत्रिका मे छपे एक लेख में हमने स्वास्थ्य विशेषज्ञों के आंकड़े पांच से छह वर्ष पूर्व पढ़े थे।  उसमें देश में मधुमेह से चालीस, उच्चरक्तचाप, से पचास तथा हृदय रोगों से पैतीस  प्रतिशत लोगों के पीड़ित होने की बात कही गयी थी।  उसमें मनोरोगियों की संख्या भी तीस प्रतिशत बताई गयी थी।  उसमें महत्वपूर्ण बात यह कही गयी थी कि समस्या यह  भी है कि अनेक रोगियों को अपने रोग के बारे में पता ही नहीं है।
           हम पिछले अनेक वर्षों से देख  रहे हैं कि मधुमेह, उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोगों के परीक्षण के लिये निशुल्क शिविर लगते हैं-क्योंकि इससे चिकित्सकों को अपने मरीज ढूंढने का अवसर मिलता है- पर मनोरोगों के लिये कभी ऐसा कार्यक्रम नहीं होता। इसका कारण यह है कि यह माना जाता है कि मनोरोगी होना केवल पागल होना ही है।  यही कारण है कि कोई भी व्यक्ति मनोरोगों की जांच के लिये तैयार नहीं होगा।  लोग इस खौफ के साये में नहीं जीना चाहेगे कि किसी को उनके मनोरोगी होने का पता लगे। मनोचिकित्सा का कोई बड़ा बाज़ार भी इसी कारण नहीं बन पाया है क्योंकि सभी लोगों को यह लगता है कि वह मानसिक रूप से स्वस्थ हैं।   मधुमेह, उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोग की जांच करने के पश्चात् कोई भी आदमी इलाज के लिये तैयार हो जाता है पर मनोरोगी होने की बात कोई भी आदमी बदनामी के भय से  स्वीकार नहीं करना चाहेगा।
       देश में मनोरोगों के बढ़ने की बात स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्वीकार भी करते हैं पर इसके निवारण का कोई बड़ा प्रयास हो भी नहीं रहा।  योग साधन का ज्ञान देने वाले अनेक आचार्य  अपने प्रचार में दैहिक स्वास्थ्य की बात तो करते हैं पर मानसिक रोगों से निजात पाने की बात कहने में उनकी हिचक साफ देखी जा सकती हैं।  उन्हें अपने सामने उपस्थित लोगों के सामने मनोरोगों के निवारण की बात कहते हुए शायद संकोच इसलिये होता है कि कहीं लोग उनसे नाराज न हो जायें।  हालांकि हम यह लेख योग साधना के प्रचार के लिये नहीं लिख रहे। साथ ही यह भी बता दें कि योग साधना से ही कोई ज्ञानी या मानसिक रूप से परिपक्व हो जाये यह जरूरी नहीं है।  हम जिन मनोरोगों की बात कर रहे हैं वह आधुनिक भौतिक साधनों के उपयोग से ही बढ़े है। खासतौर से कंप्यूटर और मोबाइल के उपयोग ने लोगों की दिमागी स्थिति को बिगाड़ दिया है।  कंप्यूटर और मोबाइल के उपयोग के खतरे पश्चिमी स्वास्थ्य विशेषज्ञ पहले ही बता चुके हैं।  कंप्यूटर जहां शहरी सभ्यता तक सीमित है वहीं मोबाइल फोन का जाल तो गांवों तक भी फैल चुका है। कंप्यूटर जहां सीमित रूप से शिक्षित तथा धनी लोगों में अपनी बीमारी फैला रहा है,  तो मोबाइल हर वर्ग में मनोविकार पैदा कर रहा है। इस पर विश्लेषण करना जरूरी है।  मोबाइल के बारे में स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य विशेषज्ञ कह चुके हैं कि उसकी गर्मी मनुष्य के मस्तिष्क को विकृत तक कर सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि  देश में लोगों की मनोदशाओं का भी अध्ययन करना अब आवश्यक है। अप्राकृतिक रूप से किये जा रहे अपराधों से निपटने के लिये यह आवश्यक है।
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Saturday, March 9, 2013

महिला दिवस पर संपादकीय-एक पहिया आगे तो दूसरा पीछे लगना ही है (edtorial on women day-man and woman two wheel of life)

       हमारे देश में आजकल रोज एक दिवस मनता दिखता है।  वैसे तो भारत को वैसे भी त्यौहारों का ही देश कहा जाता है पर वह सप्ताह या माह के अंतराल बाद ही आते हैं। पूर्णमासी तथा अमावस्या हर महीने ही आती हैं।  कैलेंडर में देखें तो रोज कोई न कोई खास दिन होता है। इधर पश्चात्य संस्कृति ने अपने पांव पसारे हैं तो लगता है कि हर दिन ही त्यौहार है। मित्र दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस और नया वर्ष जैसे दिन तो बहुत सुनते हैं। कभी एड्स विरोधी दिवस तो कभी कैंसर निरोधी दिवस भी सुनाई देता हैं  इधर हाल ही में महिला दिवस मना। व्यवसायिक बुद्धिमानों ने जहां अपनी वाणी और चेहरे से टीवी चैनलों के साथ ही रेडियों पर अपने भाषण झाड़े वही आमजनों में अपना रुतवा रखने वाले महानुभावों ने नारी शक्ति अनौपचारिक बैठकों में  बखान किया।
      हमने देखा है कि पुरुष दिवस कभी नहीं मनता। इसका सीधा मतलब यह है कि यह मान लिया गया है कि यह संसार पुरुषों की संपत्ति है जिसमें महिलायें उनकी अनुकंपा से जी रही हैं।  हमारे देश के जनवादी और प्रगतिशील  बुद्धिमान हमेशा ही जाति, वर्ण, भाषा तथा क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाते हैं पर नारी विषय पर उनका रुख बदल जाता है।  वहां वह पुरुष को एक तरह से राक्षसी वृत्ति का मान लेते हैं यह अलग बात है कि वह स्वयं भी पुरुष ही होते हैं। उनके तर्कों पर हम हंसते हैं।  कहते हैं कि समाज में पुरुषवादी मानसिकता है।  हम पूछते हैं कि जब आप नारी अनाचार के विरुद्ध विषवमन करते हो तब क्या कभी यह देखा है कि वास्तव में उनका शत्रु कौन होता है?
    कुछ नारीवादी बुद्धिमान तो नारी के लिये विवाह बंधन ही खतरनाक मानते हैं यह अलग बात है कि उनमें अविवाहित या ब्रह्चारी कोई नहीं होता।  आयुवर्ग में भी वह युवा न होकर उस अवस्था में होते हैं जब देह में रोमांस का असर काम हो जाता है।  अपनी बात वह युवाओं पर तब लादते दिखते हैं जब उनका खुद का समय बीत गया होता है। अपने युवा दिनों की मटरगस्ती को वह भूल जाते हैं।  कहा जाता है कि विवाह का लड्डू जो खाये वह भी दुःखी जो न खाये वह भी दुःखी।  जिन्होंने स्वयं खा लिया है वह दूसरों को न खाने की सलाह देते हैं।  मजे की बात यह कि भारतीय पारिवारिक संस्कारों के साथ जीने वाले लोग उसका मजाक बनाते हैं पर स्वयं के लिये उनका नियम पुराना ही होता है। वह विद्रोह का झंडा दूसरों के हाथ में देकर स्वयं आराम से सामाजिक फिल्म देखना चाहते हैं ताकि उसकी समीक्षायें लिखी और सुनाईं जा सकें।  समस्या यह है कि वह इस बात नियम को नहीं मानते कि नारी के लिये पुरुष कम नारियां ही अधिक समस्या खड़ी करती हैं।  भारतीय रिश्तों में नहीं वरन् पूरे विश्व में ही ननद-भाभी, सास-बहु, देवरानी-जेठानी तथा अन्य बहन जैसे रिश्तों में तनाव की बात सामने आती है।  अपवाद स्वरूप ही देवर-भाभी, ससुर-बहु, नन्दोही-सलहज और साली बहनोई के रिश्ते में खटास वाली घटनायें होती हैं।  सामाजिक विशेषज्ञों का अनुभव तो यह भी कहता है कि पर्दे के पीछे नारियों के विवाद होते हैं पर समाज के सामने फंसता पुरुष ही है क्योंकि परिवार उसके नाम पर जाना जाता है।  हमारे यहां घरेलु नारियों की रक्षा के नाम पर जितने भी प्रयास हुए हैं उनमें जड़ में नारियों का आपसी विवाद होता है पर परेशान पुरुष ही होता है।  इन मामलों में यह देखा गया है कि मामलों को बाहर सुलझाने के लिये घर से बाहर ले जाने जो प्रयास होते हैं उनमें से अधिकतर शिकायतें गलत आधार पर गलत व्यक्ति के खिलाफ होती है।  दहेज विरोधी कानून का जमकर दुरुपयोग हुआ।  अनेक सामाजिक विशेषज्ञ तो यह कहते हैं कि इस कानून का दुरुपयोग करने का यह परिणाम हुआ है कि ऐसे अनेक दंपत्ति जो एक साथ समझाने पर रह सकते थे वह मामला बाहर आने में मन में  बढ़ी हुई  खटास के कारण अलग हो गये।  अनेक लोगों की कथा तो इसलिये भी दर्दनाक रही है कि वह उस शादी में एक समय का भोजन करना उन्हें महंगा लगा जिसका भांडा चौराहे पर फूटा और उन पर भी घाव हुए। स्थिति इतनी खराब है कि कहीं नवदंपत्ति का विवाद होने  पर निकटस्थ रिश्तेदार बीच में आकर सुलझाना ही नहीं चाहते क्योंकि उनको लगता है कि कहीं उनका नाम चौराहे पर न घसीट लिया जाये।  विवाह एक सामाजिक मामला है और उसे उसके नियमों के दायरे में ही रखना चाहिये न कि उसमें राजकीय हस्तक्षेप हो।  राजकीय हस्तक्षेप से समाज के सुधार का प्रयास पाश्चात्य विचाराधारा से उपजा है जो निहायत अव्यवाहारिक है।  ऐसे प्रयासों से भारतीय समाज बिखरा है। दूसरी बात यह कि जिस तरह सारे पुरुष देवता नहीं है तो राक्षस भी नहीं है उसी तरह नारियों का भी हमेशा सकारात्म स्वरूप रहता है यह माना नहीं माना जा सकता।  अगर समाज में नारियों के विरुद्ध अपराध बढ़े हैं तो उसमें शामिल नारियों की संख्या भी बढ़ी है।
     अब मुश्किल यह है कि जनवादियों और प्रगतिवादियों ने देश के अभिव्यक्ति के साधनों पर इस कदर कब्जा कर लिया है कि उनके प्रतिकूल सर प्रथक  किसी बात कहने पर किसी पर प्रभाव नहीं होता।  समाज में आयु, वर्ण, जाति, भाषा, धर्म और लिंग के आधार पर कल्याण के दावे हो रहे हैं पर खुश कोई नहीं है।  वजह साफ है कि  समाज को एक इकाई मानते हुए देश में सभी शहरों के साथ गांवों में भी सड़कों का जाल बिछा होना चाहिये।   सभी जगह शुद्ध पेयजल प्रदाय की सहज व्यवस्था हो।  इसके साथ ही बिजली हर घर में पहुंचना चाहिये।  यह मूलभूत सुविधायें हैं अगर यह देश के किसी हिस्से में नहीं है तो हम अपने पूर्ण विकास का दावा नहीं कर सकते।  इसके विपरीत देश के बुद्धिमान किश्तों में अलग अलग समाज को भागों में बांटकर विकास देखना चाहते हैं।  हमारे देश में गरीब परिवारों जो स्थिति है उसमें नारी दयनीय जीवन जीती है पर यकीनन पुरुष भी कोई खुशहाल नहीं होता।   अपने पिता, पति और पुत्र को जूझते देखकर नारी स्वयं की दयनीय स्थिति से समझौता कर लेती है।  सीधी बात कहें तो नारी और पुरुष के बिना मानवीय संसार नहीं चल सकता।  दोनों परिवार के पहिये हैं।  एक पहिया पीछे तो एक आगे चलता है।  आगे का पहिया पुरुष है और अगर नारीवादी चाहते हैं कि नारी आगे पहिये के रूप में चले तो ठीक है।  उनके प्रयास बुरे नहीं है पर उन्हें यह समझना होगा कि तब पुरुष को पिछला पहिया बनना होगा। एक पहिया आगे तो एक पीछे रखना ही होगा। हालांकि तब इन नारीवादियों को तब पुरुषवादी बनना पड़ेगा।
  दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'

Gwalior, Madhya Pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Friday, February 1, 2013

जिंदगी का मजा-हिन्दी शायरी (zindagi ka maza-hindi shayri)

खुशियां का फल
किसी पेड़ पर नहीं उगता
जिसे तोड़कर अपने दिल में लगाते,
जिंदगी का दौर चलता रहे
खुशी का मौका हो या गम का
चेहरे पर यूं ही हंसी लाते।
कहें दीपक बापू
चेहरे पर फरिश्ते का लगाकर मुखौटा
चाल चलते हैं लोग शैताने जैसी,
सौदे में मिलती है दाम पर हमदर्दी
दर्द की दवा बनेगी कैसी,
शोर मचा देते है वह लोग
जिन्हें अपनी बदहाली सुनाओ,
सहते रहें तन्हाई में अपने हाल
अच्छा है मन में मौन बुलाओ,
अपने अंदाज के साथ
जिंदगी में मजा यूं ही लाते।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'

Gwalior, Madhya Pradesh
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