Sunday, July 7, 2013

विशिष्ट रविवारीय लेख-बौद्धिगया में विस्फोट करना निंदनीय कार्य (special hindi article on sanday-bauddhigaya mein visfot karna nindaneeya)



       भारत में रविवार अब एक तरह से अवकाश के साथ ही अध्यात्म दिवस भी बन गया है।  पहले सरकारी क्षेत्र बढ़ा था और उसके अधिकांश कर्मचारी रविवार को अवकाश होने से बाज़ार के साथ ही अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों की शोभा बढ़ाते थे। अब निजी क्षेत्र में भी रोजगार पाने वाले लोगों के लिये भी रविवार के दिन ही अवकाश रहता है।  वैसे छात्रों को भी रविवार मिलता है और उनमें कुछ मौज मस्ती करते हैं तो कुछ अकेले या परिवार के साथ ही अध्यात्मिक दिवस मनाते हैं।  यह बात बाज़ार तथा उसके प्रचार प्रबंधक जानते हैं इसलिये ही रविवार को ऐसे विषय चुनते हैं जो ज्वलंत हों। कभी कभार उनको स्वतः ही ऐसे विषय मिल जाते हैं। कभी अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान प्रचार समूहों ने जिस तरह अपने विज्ञापन का समय पास किया उसने उनके सामने किसी विषय को निरंतर ज्वंलत बनाये रखकर उसका व्यवसायिक बनाने की योजना की प्रेरणा प्रस्तुत की।
       अभी केदारनाथ सहित पूरे उत्तराखंड में जो प्रकोप हुआ उससे पूरे दो सप्ताह तक प्रचार समूहों का किसी नवीन विषय की आवश्यकता भी नहीं रही।  यह भी देखा गया है कि अर्थ, धर्म, कला, फिल्म और सार्वजनिक विषयों से जुड़े शिखर पुरुषों ने भी अब रविवार का उपयोग आम आदमी तक पहुंचने के लिये प्रचार के रूप में  करना प्रारंभ कर दिया है।  वैसे देखा जाये तो हमारे देश में  संतों पर अक्सर लोगों के भक्ति भाव का दोहन करने का आरोप लगता है पर सच यह है कि जनसमूहों को प्रभावित करने की उनकी कला का अनुकरण हमारे लोकतांत्रिक देश में गैर धार्मिक लोग भी कर रहे हैं।  रविवार का प्रचार के लिये उपयेाग करने का प्रयास पेशेवर धार्मिक संतों ने ही शुरु किया है।
            जब सभी रविवार का उपयोग इस तरह कर रहे हैं तो वह अपराधी समूह कैसे पीछे रह सकते हैं जो जनता में अपनी हिंसा का प्रचार चाहते हैं।  आज बिहार में बौद्धिगया में एक साथ नौ विस्फोट जिस तरह किये गये उससे लगता है कि जानबूझकर रविवार का दिन चुना गया।  समय भी वह चुना गया जिस समय लोग वहां कम थे।  स्पष्टतः इस विस्फोट से जुड़े अपराधियों का मुख्य ध्येय रविवार को अपराध कर सारे दिन टीवी पर बैठकर उसका प्रचार देखते रहना भी हो सकता है।  समय प्रातः पांच से छह के बीच का चुना गया।  यह समय एकदम नियमित भक्तों का होता है जिनकी संख्या नगण्य ही होती है।  वह भक्त  जिनके मन में भगवान के प्रति इतनी श्रद्धा होती है कि वह प्रातः आने वाली मीठी नींद का त्याग कर देते हैं। यही त्याग उनको सच्चा भक्त बनाता है। हम यह नहीं कहते है कि देर से उठकर भगवान की भक्ति करने वाली कोई भक्त नहीं है। एक ज्ञान साधक के लिये किसी की भक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करना वर्जित है पर जब हम थोड़ा विस्तार से विश्लेषण करते हैं तो कुछ ऐसी टिप्पणियां आ ही जाती हैं जब किसी को थोड़ा बेहतर बताया जाये तो तय बात है कि भले ही सीधी न कहें पर किसी का  कम बेहतर होना स्वतः ही प्रकट हो जाता हैं।  हमारा यह भाव कतई नहीं है कि हम देर उठकर भक्ति करने वालों की आलोचना करें पर इतना तय है कि प्रातः जल्दी उठकर सर्वशक्तिमान की प्रार्थना करने वाला वास्तव में एक सच्चा भक्त है।
     एक बार हम अपने एक मित्र के साथ एक  घर से दूर  एक योग शिविर में गये। शिविर का स्थान एक ऐसी कालोनी में था जहां व्यवसायिक लोग रहते हैं।  शिविर पांच दिनों का था पर हम शनिवार और रविवार को ही  वहां गये। वहीं हमारे एक मित्र के मित्र वहीं  रहते थे।  पहले दिन तो हम दोनों निकल आये पर दूसरे दिन मित्र के मित्र का लड़का मिल गया।  रविवार होने के कारण वह प्रातःकाल की सैर को आठ बजे निकला था।  तब हम शिविर से  बाहर निकलकर आपसी वार्तालाप कर रहे थे। हमारी साधना समाप्त हुए भी करीब एक घंटा बीत चुका था।  वहां नाश्ता तथा वार्तालाप में एक घंटा लग गया था।  बाहर निकले तो वह लड़का हमारे मित्र के पास आया। उसे समझते देर नहीं लगी कि हम यहां योग शिविर में आये हैं।  उसने हमारे मित्र से कहा-‘‘अंकल, अब तो आपका कार्यक्रम समाप्त हो गया है। चलिये हमारे घर, कभी तो आया करिये। आज अवसर है तो आप घर चलें और पापा मम्मी से मुलाकात करिये।  मैं थोड़ा घूमकर आता हूं।’’
  हमारे मित्र ने उसकी बात मान ली और उसके घर तक आये। संयुक्त परिवार होने के कारण बड़ा घर था और उसमें घुसने के लिये दो बड़े लोहे के दरवाजे थे। हमारे मित्र ने अपने लक्ष्य वाले दरवाजे की घंटी बजायी तो कोई बाहर नहीं आया।  हम दरवाजा खोलकर दालान पार करते हुए  मकान के अंदर दरवाजे तक आये। वह भी खुला था। मित्र ने अपने मित्र का नाम लेकर आवाज लगायी। कोई जवाब नहीं आया। फिल्म और धारावाहिकों में हम अनेक वारदातें ऐसी देख चुके हैं कि अंदर घुसने का साहस नहीं हुअता। हमारे मित्र के मित्र का छोटा भाई ऊपर से झांक रहा था। हमने उसे अपने आने का कारण बताया।   तब वह अंदर ही नीचे से उतरकर भाई को बुलाने गया।  इतने में उनके काम करने वाली एक महिला का आना हुआ। हमारे मित्र को अनेक बार आने के कारण वह जानती थी।  उसने कहा कि ‘‘आप अंदर चलिये न! वह लोग अंदर ही सो रहे होंगे।’’
       हम उसके साथ ही अंदर दाखिल हो गये।  उस महिला ने बैडरूम के दरवाजे पर जाकर अपने मालिकों को आवाज दी और हमारे  आने की सूचना भी सुना दी।
          हम शिविर से उस मकान तक भी रुकते रुकते पहुंचे थे। घड़ी में उस समय आठ बजकर चालीस मिनट हुए थे। मतलब हमें बिस्तर छोड़े उस समय तक चार घंटे हो चुके थे। हमारी  दैहिक स्थिति इतनी अच्छी थी कि हम घर न जाकर कहीं दूसरा काम भी कर सकते थे-जैसे खरीददारी वगैरह  या कहीं मंदिर में जाकर घ्यान और पूजा करना! खरीददारी करने की बात बेकार है क्योंकि बाज़ार भी अब ग्यारह बजे से पहले कहां खुलते हैं? किसी के घर प्रातःकाल जाकर उसे  किस तरह उसे तकलीफ दी जा सकती है यह भी हमने उस दिन देखा। मित्र तथा उसकी पत्नी एकदम नींद से उठकर बाहर आये। उन्होंने हमारा स्वागत हृदय से किया इसमें संशय नहीं है क्योंकि हम कोई ऐसे रिश्तेदार नहीं थे जो तकलीफ देने वाले हों।
             वहां से हम दस बजे चाय और नाश्ता कर ही बाहर आये। इसकी कोई आवश्यकता भी हमें नहीं थी पर मेजबान का दिल रखने के लिये उनके पदार्थों को सेवन आधे मन से  स्वीकार करना पड़ा। उसी दौरान उनका छोटा भाई भी मिलने आया जो हमें प्रातःकाल आया देखकर हैरान था।  वह अपनी पत्नी के साथ रविवार का दिन होने के कारण  मंदिर जा रहा था।
                 कहने का अभिप्राय यह है कि प्रातःकाल के समय मनुष्य का मन स्वतः ही पवित्र होता है और अगर वह भगवान की भक्ति में लीन हो तो फिर कभी उस पर संशय करना ही नहीं चाहिए।  जब बौद्धिगया में भगवान बुद्ध के मंदिर पर विस्फोटो का विचार करते हैं तो उन दो लामाओं के घायल होने पर दर्द होता ही है जो प्रातःकाल अपने भगवान की सेवा में लीन थे। यकीनन ऐसे विस्फोट करने और कराने वालों को नीच ही कहा जा सकता है।  अभी इस घटना की जांच चल रही है इसलिये कहना कठिन है इससे किसका लक्ष्य पूरा हुआ पर इतना तय है कि इस घटना को किसी भी  धर्म से जोड़ने को हम गलत मानते हैं। हमारा मानना है कि पहले आतंकवाद के अर्थशास्त्र का पता लगाया जाये।  कुछ विद्वान मानते हैं कि आतंकवाद घटनाओं की आड़ में गंदे और गलत काम करने वाले लोग अपनी सक्रियता बढ़ा देते हैं। उनका लक्ष्य प्रजा, प्रशासन तथा पुलिस का ध्यान भटकाकर अपने दो नंबर का काम करना होता है और वही आतंकवाद के प्रायोजक भी होते  है। विस्फोट करने वाले बिना धन या अन्य लाभ के ऐसा काम करें यह भी जंचता नहीं है।  बहरहाल हम इस घटना से पीड़ित लोगों के स्वस्थ होने का हृदय से कामना करते हैं।

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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