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Friday, September 6, 2013

आओ अपना सम्मान स्वयं करें-हिन्दी दिवस पर विशेष लेख (aao apana samman swyan karen-hindi diwas, hindi divas par vishesh lekh or hindi article hindi day)



                        14 सितम्बर 2013 को एक बार फिर हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है।  इस अवसर पर सरकारी तथा अर्द्धसरकारी तथा निजी संस्थाओं में कहीं हिन्दी सप्ताह तो कही पखवाड़ा मनाया जायेगा।  इस अवसर पर सभी जगह जो कार्यक्रम आयोजित होंगे उसमें निबंध, कहानी तथा कविता लेखन के साथ ही वादविवाद प्रतियोगितायें होंगी। कहीं परिचर्चा आयोजित होगी।  अनेक लोग भारत में हिन्दी दिवस मनाये जाने पर व्यंग्य करते हैं। उनका मानना है कि यह देश के लिये दुःखद है कि राष्ट्रभाषा के लिये हमें एक दिन चुनना पड़ता है।  उनका यह भी मानना है कि हिन्दी भाषा अभी भी अंग्रेजी के सामने दोयम दर्जे की है।  कुछ लोग तो अब भी हिन्दी को देश में दयनीय स्थिति में मानते हैं। दरअसल ऐसे विद्वानों ने अपने अंदर पूर्वाग्रह पाल रखा है। टीवी चैनल, अखबार तथा पत्रिकाओं में उनके लिये छपना तो आसान है पर उनका चिंत्तन और दृष्टि आज से पच्चीस या तीस वर्ष पूर्व से आगे जाती ही नहीं है।  ऐसे विद्वानों को मंच भी सहज सुलभ है क्योंकि हिन्दी का प्रकाशन बाज़ार उनका प्रयोजक है। इनमें से कई तो ऐसे हैं जो हिन्दी लिखना ही नहीं जानते बल्कि उनके अंग्रेजी में लिखे लेख हिन्दी प्रकाशनों में अनुवाद के साथ आते हैं। उनका सरोकार केवल लिखने से है। एक लेखक का इससे ज्यादा मतलब नहीं होना चाहिये पर शर्त यह है कि वह समय के बदलाव के साथ अपना दृष्टिकोण भी बदले।
                        एक संगठित क्षेत्र का लेखक कभी असंगठित लेखक के साथ बैठ नहीं सकता।  सच तो यह है कि जब तक इंटरनेट नहीं था हमें दूसरे स्थापित लेखकों को देखकर निराशा होती थी पर जब इस पर लिखना प्रारंभ किया तो इससे बाहर प्रकाशन में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया।  यहां लिखने से पहले हमने बहुत प्रयास किया कि भारतीय हिन्दी क्षितिज पर अपना नाम रोशन करें पर लिफाफे भेज भेजकर हम थक गये।  सरस्वती माता की ऐसी कृपा हुई कि हमने इंटरनेट पर लिखना प्रारंभ किया तो फिर बाहर छपने का मोह समाप्त हो गया।  यहंा स्वयंभू लेखक, संपादक, कवित तथा चिंत्तक बनकर हम अपना दिल यह सोचकर ठंडा करते हैं कि चलो कुछ लोग तो हमकों पढ़ ही रहे हैं।  कम से कम हिन्दी दिवस की अवधि में हमारे ब्लॉग जकर हिट लेते हैं।  दूसरे ब्लॉग  लेखकों का पता नहीं पर इतना तय है कि भारतीय अंतर्जाल पर हिन्दी की तलाश करने वालों का हमारे ब्लॉग से जमकर सामना होता है।  दरअसल निबंध, कहानी, कविता तथा टिप्पणी लिखने वालों को अपने लिये विषय चाहिये।  वादविवाद प्रतियोगिता में भाग लेने वाले युवाओं तथा परिचर्चाओं में बोलने वाले विद्वानों को हिन्दी विषय पर पठनीय सामग्रंी चाहिये और अब किताबों की बजाय ऐसे लोग इंटरनेट की तरफ आते हैं।  सर्च इंजिनों में उनकी तलाश करते हुए हमारे बलॉग उनके सामने आते हैं।  यही बीस ब्लॉग बीस  किताब की तरह हैं।  यही कारण है कि हम अब अपनी किताब छपवाने का इरादा छोड़ चुके हैं।  कोई प्रायोजक हमारी किताब छापेगा नहीं और हमने छपवा लिये तो हमारा अनुमान है कि हम हजार कॉपी बांट दें पर उसे पढ़ने वाले शायद उतने न हों जितना हमारी एक कविता यहां छपते ही एक दिन में लोग पढ़ते हैं।  इतना ही नहीं हमारे कुछ पाठ तो इतने हिट हैं कि लगता है कि उस ब्लॉग पर बस वही हैं।  अगर वह पाठ  हम किसी अखबार में छपवाते तो उसे शायद इतने लोग नहीं देखते जितना यहां अब देख चुके हैं। आत्ममुग्ध होना बुरा हेाता है पर हमेशा नहीं क्योंकि अपनी अंतर्जालीय यात्रा में हमने देख लिया कि हिन्दी के ठेकेदारों से अपनी कभी बननी नहीं थी।  यहां हमें पढ़ने वाले जानते हैं कि हम अपने लिखने के लिये बेताब जरूर रहते हैं पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हमें कोई प्रचार की भूख है।  कम से कम इस बात से  हमें तसल्ली है कि अपने समकालीन हिन्दी लेखकों में स्वयं ही अपनी रचना टाईप कर लिखने की जो कृपा प्राकृतिक रूप से हुई है कि हम  उस पर स्वयं भी हतप्रभ रह जाते हैं क्योंकि जो अन्य लेखक हैं वह इंटरनेट पर छप तो रहे हैं पर इसके लिये उनको अपने शिष्यों पर निर्भर रहना पड़ता है।  दूसरी बात यह भी है कि टीवी चैनल ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर जैसे अंतर्जालीय प्रसारणों में वही सामग्री उठा रहे हैं जो प्रतिष्ठत राजनेता, अभिनेता या पत्रकार से संबंधित हैं।  यह सार्वजनिक अंतर्जालीय प्रसारण पूरी तरह से बड़े लोगों के लिये है यह भ्रम बन गया है।  अखबारों में भी लोग छप रहे हैं तो वह अंतर्जालीय प्रसारणों का मोह नहीं छोड़ पाते।  कुछ मित्र पाठक पूछते हैं कि आपके लेख किसी अखबार में क्या नहीं छपतें? हमारा जवाब है कि जब हमारे लिफाफोें मे भेजे गये लेख नहीं छपे तो यहां से उठाकर कौन छापेगा?  जिनके अंतर्जालीय प्रसारण अखबारों या टीवी में छप रहे हैं वह संगठित प्रकाशन जगत में पहले से ही सक्रिय हैं। यही कारण है कि अंतर्जाल पर सक्रिय किसी हिन्दी लेखक को राष्ट्रीय क्षितिज पर चमकने का भ्रम पालना भी नहीं चाहिये।  वह केवल इंटरनेट के प्रयोक्ता हैं। इससे ज्यादा उनको कोई मानने वाला नहीं है।
                        दूसरी बात है कि मध्यप्रदेश के छोटे शहर का होने के कारण हम जैसे लेखको यह आशा नहीं करना चाहिये कि जिन शहरों या प्रदेशों के लेखक पहले से ही प्रकाशन जगत में जगह बनाये बैठे हैंे वह अपनी लॉबी से बाहर के आदमी को चमकने देंगे।  देखा जाये तो क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्म तथा विचारवाद पहले से ही देश में मौजूद हैं अंतर्जाल पर हिन्दी में सक्रिय लेाग उससे अपने को अलग रख नहीं पाये हैं।  अनेक लोगों से मित्र बनने का नाटक किया, प्रशंसायें की और आत्मीय बनने का दिखावा किया ताकि हम मुफ्त में यहां लिखते रहें।  यकीनन उन्हें कहीं से पैसा मिलता रहा होगा।  वह व्यवसायिक थे हमें इसका पता था पर हमारा यह स्वभाव है कि किसी के रोजगार पर नज़र नहीं डालते।  अब वह सब दूर हो गये हैं।  कई लोग तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर को होने का दावा भी करने लगे हैं पर उनका मन जानता है कि वह इस लेखक के मुकाबले कहां हैं? वह सम्मान बांट रहे हैं, आपस में एक दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं। कभी हमारे प्रशंसक थे अब उनको दूसरे मिल गये हैं। चल वही रहा है अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर दें।  दरअसल वह इंटरनेट पर हिन्दी फैलाने से अधिक अपना हित साधने में लगे हैं। यह बुरा नहीं है पर अपने दायित्व को पूरा करते समय अपना तथा पराया सभी का हित ध्यान में न रखना अव्यवसायिकता है। पैसा कमाते सभी है पर सभी व्यवसायी नहीं हो जाते। चोर, डाकू, ठग भी पैसा कमाते हैं।  दूसरी बात यह कि कहीं एक ही आदमी केले बेचने वाला है तो उसे व्यवसायिक कौशल की आवश्यकता नहीं होती। उसके केले बिक रहे हैं तो वह भले ही अपने व्यवसायिक कौशल का दावा करे पर ग्राहक जानता है कि वह केवल लाभ कमा रहा है।  अंतर्जाल पर हिन्दी का यही हाल है कि कथित रूप से अनेक पुरस्कार बंट जाते हैं पर देने वाला कौन है यह पता नहीं लगता।  आठ दस लोग हर साल आपस में ही पुरस्कार बांट लेते हैं।  हमें इनका मोह नहीं है पर अफसोस इस बात का है कि यह सब देखते हुए हम किसी दूसरे लेखक को यहां लिखने के लिये प्रोत्साहित नहीं कर पाते।  हमारे ब्लॉगों की पाठक संख्या चालीस लाख पार कर गयी है। यह सूचना हम देना चाहते हैं। इस पर बस इतना ही।  हिन्दी दिवस पर कोई दूसरा तो हमें पूछेगा नहंी इसलिये अपना स्म्मान स्वयं ही कर दिल बहला रहे हैं।                      


  लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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Sunday, July 7, 2013

विशिष्ट रविवारीय लेख-बौद्धिगया में विस्फोट करना निंदनीय कार्य (special hindi article on sanday-bauddhigaya mein visfot karna nindaneeya)



       भारत में रविवार अब एक तरह से अवकाश के साथ ही अध्यात्म दिवस भी बन गया है।  पहले सरकारी क्षेत्र बढ़ा था और उसके अधिकांश कर्मचारी रविवार को अवकाश होने से बाज़ार के साथ ही अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों की शोभा बढ़ाते थे। अब निजी क्षेत्र में भी रोजगार पाने वाले लोगों के लिये भी रविवार के दिन ही अवकाश रहता है।  वैसे छात्रों को भी रविवार मिलता है और उनमें कुछ मौज मस्ती करते हैं तो कुछ अकेले या परिवार के साथ ही अध्यात्मिक दिवस मनाते हैं।  यह बात बाज़ार तथा उसके प्रचार प्रबंधक जानते हैं इसलिये ही रविवार को ऐसे विषय चुनते हैं जो ज्वलंत हों। कभी कभार उनको स्वतः ही ऐसे विषय मिल जाते हैं। कभी अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान प्रचार समूहों ने जिस तरह अपने विज्ञापन का समय पास किया उसने उनके सामने किसी विषय को निरंतर ज्वंलत बनाये रखकर उसका व्यवसायिक बनाने की योजना की प्रेरणा प्रस्तुत की।
       अभी केदारनाथ सहित पूरे उत्तराखंड में जो प्रकोप हुआ उससे पूरे दो सप्ताह तक प्रचार समूहों का किसी नवीन विषय की आवश्यकता भी नहीं रही।  यह भी देखा गया है कि अर्थ, धर्म, कला, फिल्म और सार्वजनिक विषयों से जुड़े शिखर पुरुषों ने भी अब रविवार का उपयोग आम आदमी तक पहुंचने के लिये प्रचार के रूप में  करना प्रारंभ कर दिया है।  वैसे देखा जाये तो हमारे देश में  संतों पर अक्सर लोगों के भक्ति भाव का दोहन करने का आरोप लगता है पर सच यह है कि जनसमूहों को प्रभावित करने की उनकी कला का अनुकरण हमारे लोकतांत्रिक देश में गैर धार्मिक लोग भी कर रहे हैं।  रविवार का प्रचार के लिये उपयेाग करने का प्रयास पेशेवर धार्मिक संतों ने ही शुरु किया है।
            जब सभी रविवार का उपयोग इस तरह कर रहे हैं तो वह अपराधी समूह कैसे पीछे रह सकते हैं जो जनता में अपनी हिंसा का प्रचार चाहते हैं।  आज बिहार में बौद्धिगया में एक साथ नौ विस्फोट जिस तरह किये गये उससे लगता है कि जानबूझकर रविवार का दिन चुना गया।  समय भी वह चुना गया जिस समय लोग वहां कम थे।  स्पष्टतः इस विस्फोट से जुड़े अपराधियों का मुख्य ध्येय रविवार को अपराध कर सारे दिन टीवी पर बैठकर उसका प्रचार देखते रहना भी हो सकता है।  समय प्रातः पांच से छह के बीच का चुना गया।  यह समय एकदम नियमित भक्तों का होता है जिनकी संख्या नगण्य ही होती है।  वह भक्त  जिनके मन में भगवान के प्रति इतनी श्रद्धा होती है कि वह प्रातः आने वाली मीठी नींद का त्याग कर देते हैं। यही त्याग उनको सच्चा भक्त बनाता है। हम यह नहीं कहते है कि देर से उठकर भगवान की भक्ति करने वाली कोई भक्त नहीं है। एक ज्ञान साधक के लिये किसी की भक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करना वर्जित है पर जब हम थोड़ा विस्तार से विश्लेषण करते हैं तो कुछ ऐसी टिप्पणियां आ ही जाती हैं जब किसी को थोड़ा बेहतर बताया जाये तो तय बात है कि भले ही सीधी न कहें पर किसी का  कम बेहतर होना स्वतः ही प्रकट हो जाता हैं।  हमारा यह भाव कतई नहीं है कि हम देर उठकर भक्ति करने वालों की आलोचना करें पर इतना तय है कि प्रातः जल्दी उठकर सर्वशक्तिमान की प्रार्थना करने वाला वास्तव में एक सच्चा भक्त है।
     एक बार हम अपने एक मित्र के साथ एक  घर से दूर  एक योग शिविर में गये। शिविर का स्थान एक ऐसी कालोनी में था जहां व्यवसायिक लोग रहते हैं।  शिविर पांच दिनों का था पर हम शनिवार और रविवार को ही  वहां गये। वहीं हमारे एक मित्र के मित्र वहीं  रहते थे।  पहले दिन तो हम दोनों निकल आये पर दूसरे दिन मित्र के मित्र का लड़का मिल गया।  रविवार होने के कारण वह प्रातःकाल की सैर को आठ बजे निकला था।  तब हम शिविर से  बाहर निकलकर आपसी वार्तालाप कर रहे थे। हमारी साधना समाप्त हुए भी करीब एक घंटा बीत चुका था।  वहां नाश्ता तथा वार्तालाप में एक घंटा लग गया था।  बाहर निकले तो वह लड़का हमारे मित्र के पास आया। उसे समझते देर नहीं लगी कि हम यहां योग शिविर में आये हैं।  उसने हमारे मित्र से कहा-‘‘अंकल, अब तो आपका कार्यक्रम समाप्त हो गया है। चलिये हमारे घर, कभी तो आया करिये। आज अवसर है तो आप घर चलें और पापा मम्मी से मुलाकात करिये।  मैं थोड़ा घूमकर आता हूं।’’
  हमारे मित्र ने उसकी बात मान ली और उसके घर तक आये। संयुक्त परिवार होने के कारण बड़ा घर था और उसमें घुसने के लिये दो बड़े लोहे के दरवाजे थे। हमारे मित्र ने अपने लक्ष्य वाले दरवाजे की घंटी बजायी तो कोई बाहर नहीं आया।  हम दरवाजा खोलकर दालान पार करते हुए  मकान के अंदर दरवाजे तक आये। वह भी खुला था। मित्र ने अपने मित्र का नाम लेकर आवाज लगायी। कोई जवाब नहीं आया। फिल्म और धारावाहिकों में हम अनेक वारदातें ऐसी देख चुके हैं कि अंदर घुसने का साहस नहीं हुअता। हमारे मित्र के मित्र का छोटा भाई ऊपर से झांक रहा था। हमने उसे अपने आने का कारण बताया।   तब वह अंदर ही नीचे से उतरकर भाई को बुलाने गया।  इतने में उनके काम करने वाली एक महिला का आना हुआ। हमारे मित्र को अनेक बार आने के कारण वह जानती थी।  उसने कहा कि ‘‘आप अंदर चलिये न! वह लोग अंदर ही सो रहे होंगे।’’
       हम उसके साथ ही अंदर दाखिल हो गये।  उस महिला ने बैडरूम के दरवाजे पर जाकर अपने मालिकों को आवाज दी और हमारे  आने की सूचना भी सुना दी।
          हम शिविर से उस मकान तक भी रुकते रुकते पहुंचे थे। घड़ी में उस समय आठ बजकर चालीस मिनट हुए थे। मतलब हमें बिस्तर छोड़े उस समय तक चार घंटे हो चुके थे। हमारी  दैहिक स्थिति इतनी अच्छी थी कि हम घर न जाकर कहीं दूसरा काम भी कर सकते थे-जैसे खरीददारी वगैरह  या कहीं मंदिर में जाकर घ्यान और पूजा करना! खरीददारी करने की बात बेकार है क्योंकि बाज़ार भी अब ग्यारह बजे से पहले कहां खुलते हैं? किसी के घर प्रातःकाल जाकर उसे  किस तरह उसे तकलीफ दी जा सकती है यह भी हमने उस दिन देखा। मित्र तथा उसकी पत्नी एकदम नींद से उठकर बाहर आये। उन्होंने हमारा स्वागत हृदय से किया इसमें संशय नहीं है क्योंकि हम कोई ऐसे रिश्तेदार नहीं थे जो तकलीफ देने वाले हों।
             वहां से हम दस बजे चाय और नाश्ता कर ही बाहर आये। इसकी कोई आवश्यकता भी हमें नहीं थी पर मेजबान का दिल रखने के लिये उनके पदार्थों को सेवन आधे मन से  स्वीकार करना पड़ा। उसी दौरान उनका छोटा भाई भी मिलने आया जो हमें प्रातःकाल आया देखकर हैरान था।  वह अपनी पत्नी के साथ रविवार का दिन होने के कारण  मंदिर जा रहा था।
                 कहने का अभिप्राय यह है कि प्रातःकाल के समय मनुष्य का मन स्वतः ही पवित्र होता है और अगर वह भगवान की भक्ति में लीन हो तो फिर कभी उस पर संशय करना ही नहीं चाहिए।  जब बौद्धिगया में भगवान बुद्ध के मंदिर पर विस्फोटो का विचार करते हैं तो उन दो लामाओं के घायल होने पर दर्द होता ही है जो प्रातःकाल अपने भगवान की सेवा में लीन थे। यकीनन ऐसे विस्फोट करने और कराने वालों को नीच ही कहा जा सकता है।  अभी इस घटना की जांच चल रही है इसलिये कहना कठिन है इससे किसका लक्ष्य पूरा हुआ पर इतना तय है कि इस घटना को किसी भी  धर्म से जोड़ने को हम गलत मानते हैं। हमारा मानना है कि पहले आतंकवाद के अर्थशास्त्र का पता लगाया जाये।  कुछ विद्वान मानते हैं कि आतंकवाद घटनाओं की आड़ में गंदे और गलत काम करने वाले लोग अपनी सक्रियता बढ़ा देते हैं। उनका लक्ष्य प्रजा, प्रशासन तथा पुलिस का ध्यान भटकाकर अपने दो नंबर का काम करना होता है और वही आतंकवाद के प्रायोजक भी होते  है। विस्फोट करने वाले बिना धन या अन्य लाभ के ऐसा काम करें यह भी जंचता नहीं है।  बहरहाल हम इस घटना से पीड़ित लोगों के स्वस्थ होने का हृदय से कामना करते हैं।

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, April 26, 2013

देश की मानसिक स्थिति का भी अध्ययन जरूरी-हिन्दी लेख (desh ke manodasha ka adhyayan jaroori-hindi lekh or editorial)

        न्यायविदों, सामाजिक चिंत्तकों और सेवकों के लिये छोटी आयु की बच्चियों के साथ कुकर्म की बढ़ती घटनायें अत्यंत चिंता का विषय है।  अपराधियों का पकड़ा जाना अच्छी बात है पर ऐसे अप्राकृतिक कर्म की बढ़ती निरंतरता इसे महत्वहीन बना देती है। यही कारण है कि जब सुरक्षा करने वाली संस्थायें  यह कहती है कि वह ऐसे अपराधों को रोक नहीं सकती तो न्यायविदों का उससे यह कहना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वह इतना तो पता लगाये कि ऐसा क्यों हो रहा है।  न्यायविदों का यह पूछना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या लोग पागल हो रहे हैं?
        आर्थिक विकास था भौतिक उत्थान की अंधी दौड़ प्रारंभ हुए पंद्रह वर्ष हो गये हैं।  आर्थिक उदारीकरण के चलते विश्व के सभी देशों में एक समान रूप वाली उपभोग संस्कृति विकसित हो रही है।  यह संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृतियों के साथ ही मूल मानवीय संस्कारों का विलोपन करने वाली है।  बच्चियों के साथ अप्राकृतिक रूप से अनाचार तथा कुंठावश आत्महत्याओं की घटनायें संस्काहीनता के कारण ही बढ़ रही हैं।
      इसी कारण देश की आर्थिक विकास दर का प्रश्न अब गौण होता जा रहा है। पिछले अनेक वर्षों से स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते आ रहे हैं कि देश में दैहिक विकारों के साथ ही लोगों की बिगडती जा रही है़।  समाज में दैहिक रोगियों के साथ ही मानसिक विकारवान लोगों का संख्या भी बढ़ी है। हमारे देश में  आमतौर से मनोरोगी केवल विक्षिप्त व्यक्ति को ही  माना जाता है। जिसे कुछ भी भान न हो वही पागल केवल मनोचिकित्सा योग्य है, यह सोच आज भी बनी हुई है।  आधुनिक मनोविज्ञान की जानकारी आम लोगों को नहीं है।  उनको यह पता नहीं कि अस्थाई रूप से पागलपन के शिकार अनेक लोग हो रहे है।  कब किसका मस्तिष्क पर से नियंत्रण समाप्त हो सकता है इसका अंदाज किसी को नहीं है।  एक पत्रिका मे छपे एक लेख में हमने स्वास्थ्य विशेषज्ञों के आंकड़े पांच से छह वर्ष पूर्व पढ़े थे।  उसमें देश में मधुमेह से चालीस, उच्चरक्तचाप, से पचास तथा हृदय रोगों से पैतीस  प्रतिशत लोगों के पीड़ित होने की बात कही गयी थी।  उसमें मनोरोगियों की संख्या भी तीस प्रतिशत बताई गयी थी।  उसमें महत्वपूर्ण बात यह कही गयी थी कि समस्या यह  भी है कि अनेक रोगियों को अपने रोग के बारे में पता ही नहीं है।
           हम पिछले अनेक वर्षों से देख  रहे हैं कि मधुमेह, उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोगों के परीक्षण के लिये निशुल्क शिविर लगते हैं-क्योंकि इससे चिकित्सकों को अपने मरीज ढूंढने का अवसर मिलता है- पर मनोरोगों के लिये कभी ऐसा कार्यक्रम नहीं होता। इसका कारण यह है कि यह माना जाता है कि मनोरोगी होना केवल पागल होना ही है।  यही कारण है कि कोई भी व्यक्ति मनोरोगों की जांच के लिये तैयार नहीं होगा।  लोग इस खौफ के साये में नहीं जीना चाहेगे कि किसी को उनके मनोरोगी होने का पता लगे। मनोचिकित्सा का कोई बड़ा बाज़ार भी इसी कारण नहीं बन पाया है क्योंकि सभी लोगों को यह लगता है कि वह मानसिक रूप से स्वस्थ हैं।   मधुमेह, उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोग की जांच करने के पश्चात् कोई भी आदमी इलाज के लिये तैयार हो जाता है पर मनोरोगी होने की बात कोई भी आदमी बदनामी के भय से  स्वीकार नहीं करना चाहेगा।
       देश में मनोरोगों के बढ़ने की बात स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्वीकार भी करते हैं पर इसके निवारण का कोई बड़ा प्रयास हो भी नहीं रहा।  योग साधन का ज्ञान देने वाले अनेक आचार्य  अपने प्रचार में दैहिक स्वास्थ्य की बात तो करते हैं पर मानसिक रोगों से निजात पाने की बात कहने में उनकी हिचक साफ देखी जा सकती हैं।  उन्हें अपने सामने उपस्थित लोगों के सामने मनोरोगों के निवारण की बात कहते हुए शायद संकोच इसलिये होता है कि कहीं लोग उनसे नाराज न हो जायें।  हालांकि हम यह लेख योग साधना के प्रचार के लिये नहीं लिख रहे। साथ ही यह भी बता दें कि योग साधना से ही कोई ज्ञानी या मानसिक रूप से परिपक्व हो जाये यह जरूरी नहीं है।  हम जिन मनोरोगों की बात कर रहे हैं वह आधुनिक भौतिक साधनों के उपयोग से ही बढ़े है। खासतौर से कंप्यूटर और मोबाइल के उपयोग ने लोगों की दिमागी स्थिति को बिगाड़ दिया है।  कंप्यूटर और मोबाइल के उपयोग के खतरे पश्चिमी स्वास्थ्य विशेषज्ञ पहले ही बता चुके हैं।  कंप्यूटर जहां शहरी सभ्यता तक सीमित है वहीं मोबाइल फोन का जाल तो गांवों तक भी फैल चुका है। कंप्यूटर जहां सीमित रूप से शिक्षित तथा धनी लोगों में अपनी बीमारी फैला रहा है,  तो मोबाइल हर वर्ग में मनोविकार पैदा कर रहा है। इस पर विश्लेषण करना जरूरी है।  मोबाइल के बारे में स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य विशेषज्ञ कह चुके हैं कि उसकी गर्मी मनुष्य के मस्तिष्क को विकृत तक कर सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि  देश में लोगों की मनोदशाओं का भी अध्ययन करना अब आवश्यक है। अप्राकृतिक रूप से किये जा रहे अपराधों से निपटने के लिये यह आवश्यक है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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