Sunday, August 31, 2008

हौंसला दें वही दोस्त कहलाते-हिन्दी कविता

दूर भी हों पर उनके होने के
अहसास जब पास ही होते
वही दोस्त कहलाते हैं
यूं तो पास रहते हैं बहुत लोग
बहुत सारी बातें बतियाते
पर सभी दोस्त नहीं हो जाते हैं
जिनकी आवाज न पहुंचती हो
पर शब्द कागज की नाव पर
चलकर पास आते हैं
और दिल को छू जाते हैं
ऐसे दोस्त दिल में ही जगह पाते हैं

यूं तो जमाना दोस्त बन जाता है
पर परेशान हाल में छोड़ जाता है
जिनके दो शब्द भी देते हों
इस जिंदगी की जंग में लड़ने का हौंसला
वही दोस्त दूर होते भी
पास हो जाते हैं




दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति
-------------------------------
यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

Sunday, August 17, 2008

चाणक्य नीति:पास और परे होने का सम्बन्ध हृदय से है

1.राजा, अग्नि, गुरु, स्त्री इनसे निकटता खतरनाक होती है। इनसे थोड़ा परे रहकर संपर्क रखना चाहिए। अग्नि, जल, सर्प, मूर्ख, और राजा कभी भी रुष्ट होने पर मनुष्य के प्राण तक ले सकते हैं।
2.सच्चा ज्ञानी तो वही है जो प्रसंग के अनुसार वार्तालाप में अपने तर्क उचित ढंग से प्रस्तुत करता है। वह अनुकूल होने पर प्रेम करता है और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध प्रदर्शन करने वाला भी होता है।
3.हृदय में रहने वाला दूर रहकर भी पास है और हृदय में न रहने वाला पास रहकर भी दूर रहता है। परे और निकट के संबंध का आधार हृदय के भाव से है।
4.जल में तेल पड़ते ही कम होने के बावजूद तेल का विस्तार हो जाता है। उसी तरह दुष्ट के साथ गोपनीय विषय पर की गयी वार्ता विद्युत गति से फैल जाती है। उसी तरह सुदान की चर्चा भी विस्तार पाती है। विस्तार की शक्ति अपने पात्र के कार्य करने पर निर्भर रहती है।
5.निर्धन को पत्नी, मित्र, सेवक, भाई और परिजन सब छोड़ देते हैं।

दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति
-------------------------------
यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

Saturday, August 16, 2008

भृतहरि शतक: मूर्खता के निवारण के लिए कोई औषधि नहीं बनी

शक्यो वारयितं जलेन हुतभुक् छत्त्रेण सूर्यातपो
नागेन्द्रो निशितांकुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ
व्याधिर्भैषजसंग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगग्र्विषम्
सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्

हिंदी में भावार्थ-आग का पानी से धूप का छाते से, मद से पागल हाथी का अंकुश से, बैल और गधे का डंडे से, बीमारियों का दवा से और विष का मंत्र के प्रयोग निवारण किया जा सकता है। शास्त्रों के अनेक विकारों और बीमारियों के प्रतिकार का वर्णन तो है पर मूर्खता के निवारण के लिये कोई औषधि नहीं बताई गयी है।
येषा न विद्या न तपो न दानं
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मत्र्यलोके भुवि भारतूवा
मनुष्य रूपेणः मृगाश्चरन्ति।।


हिंदी में भावार्थ-जिन मनुष्यों में दान देने की प्रवृत्ति, विद्या, तप,शालीनता और अन्य कोई गुण नहीं है और वह इस प्रथ्वी पर भारत के समान है। वह एक मृग के रूप में पशु की तरह अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति
-------------------------------
यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
1.दीपक भारतदीप का चिंतन
2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

Friday, August 15, 2008

किसी एक रंग में दिल मत लगाना-कविता


पल रंग बदलती दुनियां में
रिश्ते भी बदलते हैं रंग
जो सारी उमर साथ चलने का
एलान करते सरेआम
वह कभी नहीं चलते संग
जिनसे फेरा होता है मूंह
वही चल पड़ते है साथ
निभाने लगते हैं बिना वादा किये
चाहे होते है रास्ते तंग
कोई शिकायत नहीं करते
चलते है संग
.....................................

किसी एक रंग पर मत दिल लगाना
हर रंग को अपनी आंखें पर आजमाना
किसी रंग का भरोसा नहीं फीका पड़ जाये
जो फीका लगता संभव है वही जीवन चमकाये
इंसानों के भी रंग होते हैं
कभी उनके मन होतेे उजले तो
कभी काले होते हैं
इज्जत करते हैं जो दिखाने की
करते हैं वही बदनाम
कर जाते हैं अपने पैगाम देकर दिल खुश
जो खुश्क जिंदगी जी रहे होते हैं
बनते बिगड़ते हैं रंग और इंसान
किसी एक पर मत दिल न लगाना
..........................................................

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
लेखक के अन्य ब्लाग@पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, August 6, 2008

जिन्दगी चलते है ऐसे ही-हिन्दी शायरी

जीवन के उतार चढाव के साथ
चलता हुआ आदमी
कभी बेबस तो कभी दबंग हो जाता
सब कुछ जानने का भ्रम
उसमें जब जा जाता तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

दुख पहाड़ लगते
सुख लगता सिंहासन
खुली आँखों से देखता जीवन
मन की उथल-पुथल के साथ
उठता-बैठता
पर जीवन का सच समझ नहीं पाता
जब अपने से हटा लेता अपनी नजर तब
अपने आप से दूर हो जाता आदमी

मेलों में तलाशता अमन
सर्वशक्तिमान के द्वार पर
ढूँढता दिल के लिए अमन
दौलत के ढेर पर
सवारी करता शौहरत के शेर पर
अपने इर्द-गिर्द ढूँढता वफादार
अपने विश्वास का महल खडा करता
उन लोगों के सहारे
जिनका कोई नहीं होता आधार तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

जमीन से ऊपर अपने को देखता
अपनी असलियत से मुहँ फेरता
लाचार के लिए जिसके मन में दर्द नहीं
किसी को धोखा देने में कोई हर्ज नहीं
अपने काम के लिए किसी भी
राह पर चलने को तैयार होता है तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
लेखक के अन्य ब्लाग@पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, August 4, 2008

शब्द हमेशा हवा में लहराते-हिंदी कविता

हर शब्द अपना अर्थ लेकर ही
जुबान से बाहर आता
जो मनभावन हो तो
वक्ता बनता श्रोताओं का चहेता
नहीं तो खलनायक कहलाता
संस्कृत हो या हिंदी
या हो अंग्रेजी
भाव से शब्द पहचाना जाता है
ताव से अभद्र हो जाता

बोलते तो सभी है
तोल कर बोलें ऐसे लोगों की कमी है
डंडा लेकर सिर पर खड़ा हो
दाम लेकर खरीदने पर अड़ा हो
ऐसे सभी लोग साहब शब्द से पुकारे जाते ं
पर जो मजदूरी मांगें
चाकरी कर हो जायें जिनकी लाचार टांगें
‘अबे’ कर बुलाये जाते हैं
वातानुकूलित कमरों में बैठे तो हो जायें ‘सर‘
बहाता है जो पसीना उसका नहीं किसी पर असर
साहब के कटू शब्द करते हैं शासन
जो मजदूर प्यार से बोले
बैठने को भी नहीं देते लोग उसे आसन
शब्द का मोल समझे जों
बोलने वाले की औकात की औकात देखकर
उनके समझ में सच्चा अर्थ कभी नहीं आता

शब्द फिर भी अपनी अस्मिता नहीं खोते
चाहे जहां लिखें और बोले जायें
अपने अर्थ के साथ ही आते हैं
जुबान से बोलने के बाद वापस नहीं आते
पर सुनने और पढ़ने वाले
उस समय चाहे जैसा समझें
समय के अनुसार उनके अर्थ सबके सामने आते
ओ! बिना सोचे समझे बोलने और समझने वालों
शब्द ही हैं यहां अमर
बोलने और लिखने वाले
सुनने और पढ़ने वाले मिट जाते
पर शब्द अपने सच्चे अर्थों के साथ
हमेशा हवाओं में लहराता
....................................

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, August 2, 2008

काला और सफेद बाजार-हास्य कविता

घर भरा है समंदर की तरह
दुनियां भर की चीजों से
नहीं है घर मे पांव रखने की जगह
फिर भी इंसान बेचैन है

चारों तरफ नाम फैला है
जिस सम्मान को भूखा है हर कोई
उनके कदमों मे पड़ा है
फिर भी इंसान बेचैन है

लोग तरसते हैं पर
उनको तो हजारों सलाम करने वाले
रोज मिल जाते हैं
फिर भी इंसान बेचैन है

दरअसल बाजार में कभी मिलता नहीं
कभी कोई तोहफे में दे सकता नहीं
अपने अंदर ढूंंढे तभी मिलता चैन है
---------------------

अर्थशास्त्र के ‘मांग और आपूर्ति का नियम’
उन्होंने कुछ इस तरह समझाया
‘जब कारखाने में चीज बनती हो
पर बाजार में नहीं दिखती हो
तो समझो मांग कुछ ज्यादा है
अगर मिलती हो वह काला बाजार में तो
समझ लो आपूर्ति है कम
सफेद बाजार को उन्होंने
आज के अर्थशास्त्र से बाहर का विषय बताया
.............................................

बाजार भी भला कभी
काले और सफेद होते
सौदागर की नीयत जैसी
वैसे ही उसके नाम होते
छिपकर कोई नहीं करता अब
हर शय के सौदे सरेआम होते
खरीददार की मजी नहीं चलती
सफेद बाजार में माल नहीं मिलता
काले सौदे पर भी सफेद होने के प्रमाण होते
चाहे दूने और चौगुने दाम होते
.....................................

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, June 22, 2008

रेल की बोगी में ज्ञान की किताबें बेच सकते हैं, ज्ञान नहीं-आलेख


वृंदावन की यात्रा कर हम दोनों पति-पत्नी दोनों ही खुश होते हैं। इस बार जब हम दोनों वहां पहुंचे तो बरसात हो रही थी और ठहरने के स्थान पर सामान रखकर हम सबसे अंग्रेजों के मंदिर में गये क्योंकि वह अधिक पास था। हमारे साथ के परिचित सज्जन तो नहीं चले पर उनकी दस वर्षीय बेटी हमारे साथ वहां चली।

वृंदावन में अनेक मंदिर हैं पर बांके बिहारी और अंग्रेजों (इस्कान) का मंदिर बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं और हम दोनों भी वहां रहते हुए प्रतिदिन जाते हैं। अंग्रेजों के मंदिर में आरती के समय नाचते हुए लोगों का दृश्य भी अच्छा लगता है। हालांकि बरसों से जा रहे हैं पर अब वहां मैटल डिक्टेटर और अन्य कड़ी सुरक्षा सहित अन्य परिवर्तन देखकर हमें आश्चर्य होता है। वहां तमाम लोग आते हैं और ऐसा लगता है कि कुछ पिकनिक मनाने के लिए भी आते हैं तो कुछ केवल देखने भर के लिये चले आते हैं। कुछ लोग भक्ति भाव से आते हैं। अगर सीधे कहें तो वहां चारों तरह के भक्त आते हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी। मैं तो वहां कर ध्यान लगाता हूं और मेरी पत्नी भीड़ में बैठकर तालियां बजाते हुए भजन गाती है।

बरसात बंद होने पर जो उमस का गुब्बार फूटा तो उसमें हम पसीना-पसीना हो गये थे। ग्यारस और अवकाश का दिन होने के कारण वहां भीड़ अधिक थी और मुझे ध्यान के लिये किसी अच्छी जगह की तलाश थी। मेरी पत्नी ने दीवार से रखे कूलर की तरफ इशारा किया और मैं वहां ध्यान लगाने बैठ गया और वह आगे बैठकर ताली बजाते हुए नाम जपने लगी। कुछ देर बाद हम बांके बिहारी के मंदिर जाने के लिये तैयार होकर बाहर निकलने लगे। वहां लगी दुकान पर किताबों का मैं निरीक्षण करने लगा। मेरी पत्नी किताबों में रुचि नहीं लेती वह फिर माला या कोई गले में डालने के लिये प्रतीकों के हार खरीदने के इरादे से खड़ी हो गयी।

मैं किताब की दुकान पर पहुंचा तो वहां धवल वस्त्र पहने एक सेल्समेन ने
मेरी तरफ चार पांच छोटी किताबों एक साथ आगे बढ़ाते हुए कहा-‘यह लीजिये सौ रुपये की हैं। दान समझकर लीजिये इससे आपको ज्ञान भी मिलेगा।’

मैंने उससे पूछा-‘क्या कबीर की रचनाओं का कोई अंग्रेजी संग्रह है?’

उसने तुरंत कहा-‘यहां तो केवल हमारी किताबें ही मिलती हैं।’

मैं वहां से चल पड़ा तो पत्नी ने कहा-‘जब आपको मालुम है तो फिर इन किताबोंे की दुकान पर जाते क्यों हैं?’
मैंने कहा-‘इस उम्मीद में शायद कोई किताब मिल जाये।’
वहां से बाहर निकलते हुए कम से कम तीन स्थानों पर ऐसी किताबें खरीदने के लिए हमारे समक्ष रखी गयी। अचानक मेरी पत्नी को याद आया कि कभी मैंने उससे इस्कान की श्रीगीता खरीदने की बात कही थी और उसने पूछा-‘आप खरीदते क्यों नहीं।’
मैंने उससे कहा-‘यह आज से पांच वर्ष पूर्व की बात है। तब तो मैंने अनेक संतों की व्याख्या वाली श्रीगीता खरीद ली थी, पर मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था कि गोरखपुर प्रेस की वही गीता पढ़ना जिसमें केवल संस्कृत श्लोक का अनुवाद हो। किसी द्वारा की गयी व्याख्या या महात्म्य वाली मत पढ़ना क्योंकि उससे भ्रमित हो जाओगे।’ वह तो मेरे पास थी।’
पत्नी ने पूछा-‘ पर उसने ऐसा क्यों कहा था?’
मैंने कहा-‘उसने मेरा लिखा पढ़ा था और वह जानता था कि मैं स्वयं भी अपना सृजन कर सकता हूं। वह मुझे और मेरे लेखन का प्रशंसक था और नहीं चाहता था कि मैं किसी दूसरे की सोच पर चलूं। वह मुझसे आज भी मौलिक सोच और सृजन की आशा करता हैं।’
पत्नी ने पूछा-‘वैसे इस तरह किताबों को इस तरह बेचना ठीक लगता है। अरे, जिसे खरीदना है वह खरीद लेगा।’
मैंने कहा-‘हां, मुझे भी लगता है कि किताबें तो बेची जा सकती हैं पर ज्ञान नहीं बेचा जा सकता है।’

रास्ते में एक जगह किताबों की दुकान पड़ी। वहां एक जगह हमारे साथ चल रही लड़की उसी दुकान के पास पानी पताशा खाने की जिद करने लगी तो मेरी पत्नी भी वहां रुक गयी। मैं पानी पताशा नहीं खाता इसलिये मेरी पत्नी ने उस किताब की दुकान की तरफ इशारा करते हुए बोली-‘आपको कोई किताब खरीदनी हो तो यहां देख लीजिये। आपकी पसंद की किताबें तो ऐसी ही दुकानों पर मिल पातीं हैं।’
मैं वहां जाकर किताबें देखने लगा। एक किताब ली। वहां से हम बांके बिहारी मंदिर में चले गये।

अगली सुबह हम वापस रवाना होने के लिये रेल्वे स्टेशन पर पहुंचे। वहां से हम एक ट्रेन में बैठे तो वहां इस्कान का ही एक गेहुंआ वस्त्र पहने व्यक्ति अपने हाथ में अपने संस्थान द्वारा प्रकाशित श्रीगीता और श्रीमद्भागवत सभी यात्रियों को दिखाकर उनको खरीदने के लिए प्रेरित करता हुआ हमारे पास आया। मेरे इंकार करने पर वह चला गया। मेरी पत्नी ने फिर हैरान होकर पूछा-‘यह क्या तरीका है?’
मैंने कहा-‘लगता है कि प्राईवेट कंपनियों की तरह इन पर भी टारगेट का बोझ है। शायद इन लोगों का अपने टारगेट पूरा करने पर ही आश्रमों मे बने रहने की छूट दी जाती होगी।

मुझे याद आ जब मैं छोटा था तब अपने माता पिता के साथ अंग्रेजों कें मंदिर में गया था उसके बाद उसमें बहुत विकास हुआ है। एक समय मैं सोचता था कि जो अंग्रेज भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं वह शायद श्रीगीता को समझ पायें क्योंकि भारत में तो ऐसे लोग कम ही दिखते हैं। यहां तो ज्ञान का व्यापार होता। लगता है कि जाने अनजाने इस्कान के लोग भारतीय साधु संतों से अपने आपको बड़ा भक्त साबित करने के लिये ऐसा प्रयास कर रहे हैं जिनका कोई तार्किक आधार नहीं है। जहां तक किताबों का प्रश्न है जो जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं वह तो स्वयं ही खरीद लेते हैं पर अर्थाथी या आर्ती हैं उनकी इन किताबों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। इस रेल्वे की बोगियों में इस तरह पवित्र ग्रंथों का ज्ञान बेचने वाले भक्त किस श्रेणी के हैं यह मेरे समझ से परे है? वैसे रेल की बोगी में ज्ञान और भक्ति की किताबें बेच सकते हैं पर ज्ञान और भक्ति भाव किसी में स्थापित करना मुश्किल है।

Saturday, April 19, 2008

मनु स्मृति:पर्याप्त धन न हो तो यज्ञ न करें

यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये
अधिकं वापि विद्येत सः सोम पातुमर्हति

जिस व्यक्ति के पास अपने परिवार हेतु तीन वर्षों से भी अधिक समय तक के लिये भरण-भोषण करने के लिऐ पैसा न हो उसे सोमयज्ञ करने का अधिकार नहीं है।

अतः स्वल्पीयसि द्रव्यै यः सोमं पिवति द्विज
सः पीतसोपूर्वीऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम्

जो व्यक्ति निश्चित मात्रा में भी कम धन राशि होने पर सोमयज्ञ करता है उसका पहला किया हुआ सोमयज्ञ भी व्यर्थ चला जाता है।

वर्तमान संदर्भों में व्याख्या-हमारे अध्यात्म मनीषियों ने अगर यज्ञ, हवन और दान की महिमा को प्रतिपादित किया है पर उनका उद्देश्य समाज में सद्भाव की स्थापना, पर्यावरण की रक्षा तथा गरीब और अमीर के बीच संतुलन स्थापित करना रहा है। अगर हम मनु के दर्शन को देखें तो वह पहले अपने परिवार के भरण भोषण को प्रमुखता देते हैं। अगर कोई व्यक्ति अधिक धन होने पर यज्ञ, हवन और दान करता हैं तो अच्छी बात है पर यह जरूरी नहीं है कि जिसके पास पर्याप्त धन नहीं है उसे कोई वैसा पुण्य नहीं मिलेगा। यज्ञों और हवनों में लोग एकत्रित होते हैं और उससे कुछ लोगों को आर्थिक लाभ होता है इसलिये जिनके पास धन है उनसे ऐसा करने के लिये कहा गया है पर जिनके पास नहीं है वह ऐसे समागमों में अपनी उपस्थिति से भी पुण्य प्राप्त कर लेते हैं। आशय यह है कि अपने और अपने परिवार को कष्ट देकर ऐसे धार्मिक कार्यक्रम करने का कोई लाभ नहीं है।

आपने देखा होगा की कुछ लोगों पर अपने परिवार के भरण-भोषण का जिम्मा होता है वहां उनके घर में कोई बुजुर्ग होते हैं वह अपने मन की शांति के लिये ऐसे यज्ञ हवन कराने या तीर्थ पर जाने के लिये उनसे धन मांगते हैं और नहीं मिलता तो धर्म का हवाला देते है। हम ऐसे कई परिवार देख सकते हैं जहां लोग यह अपेक्षा करते हैं कि पुत्र अपने माता-पिता को श्रवण कुमार की तरह तीर्थ पर ले जाये पर उसको अपने परिवार के भरण भोषण का ही इतना तनाव होता है कि वह न तो खुद ले जाता है और न ही जाने के लिए पैसा दे पाता है ऐसे में वह लोग अपने समाज में इसकी चर्चा करते हैं और लोग भी उसे कोसते हैं-और ऐसा करने वह लोग होते है जिनके पास पैसा होता है या फिर उन पर जिम्मेदारियां अधिक होतीं है। मनु के इन कथनों से एक बात यह स्पष्ट है कि पहला और बड़ा यज्ञ तो अपने आश्रितों को पेट भरने से है और बाकी धर्मकर्म के काम धन होने पर ही किये जाने चाहिए। यह भी एक जरूरी बात है कि अगर धन हो तो ऐसे काम करना चाहिए। यह प्रकृति द्वारा दिया गया संदेश मानिए कि अगर अधिक धन आया तो समाज हित में यज्ञ, हवन और दान करना चाहिए।

एक सहृदय सज्जन ने कहा था कि सुपात्र को दान देने के बहाने लोग नफरत फैलाते है और दूसरे धर्मों के खिलाफ भड़काते हैं। जिनका यह काम करने है वह तो करेंगे ही-एसा मेरा मानना है। एक बात मुझे इस संदर्भ में कहना है कि अगर हम दान करना चाहते हैं और हमें लग रहा है कि कोई सुपात्र व्यक्ति सामने हैं तो उसे देना चाहिए। मनु जी ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी कि उसे भेदात्मक दृष्टि से देखना चाहिए।

Thursday, November 15, 2007

एग्रीग्रेटरों से लिंक ब्लोग पर ही समस्या क्यों ?

मैंने लगातार यह देखने का प्रयास किया है कि कहीं कोई गलती मेरे से तो नहीं हुई है, पर पता नहीं लग रहा है। ब्लागस्पाट.कॉम के जो ब्लोग किसी भी एग्रीगेटर के यहाँ लिंक नहीं है वह काम कर रहे हैं। जो एग्रीग्रेटरों के यहाँ लिंक हैं उनमें सेव भी नहीं हो रहा है। अगर किसी एग्रीग्रेटर ने अपने यहाँ हाल ही में दिनांक और समय में कोइ परिवर्तन किया हो तो उसे देखे कहीं वह ब्लोगरों के ब्लोग में दर्ज समय और दिनांक को प्रभावित तो नहीं कर रहा है। यह भी देखें कि क्या क्या ब्लागस्पाट के कुछ ब्लोग ऐसे हैं जो प्रकाशित कर रहे हैं और वह किसी विशेष एग्रीग्रेटर के यहाँ लिंक नहीं हैं। अगर यह समस्या मेरे साथ होती तो कोई बात नहीं थी, परमजीत बाली जी के दिशाएं में भी यह समस्या थी, पर पता नहीं उनका इंकलाब ब्लोग कैसे दिखाई दे रहा था।

अपने आप में यह आश्चर्य जनक बात है कि आखिर एग्रीग्रेटरों से लिंक ब्लोग पर ही यह समस्या क्यों है? क्या किसी को हिन्दी ब्लोग एक जगह दिखना नहीं सुहाता है-या परमजीत बाली और मैं ही इसी समस्या के शिकार हैं। कम से कम यह समस्या ब्लागस्पाट.कॉम की नहीं लगती-अगर होती तो मेरे यह कहीं लिंक न होने वाले ब्लोग क्यों काम कर रहे हैं। मैंने जो कर के देखा है वही लिख रहा हूँ और बाकी कोई सुधीजन हो तो बताये मैं क्या करूं? उम्मीद करता हूँ कि सक्रिय लोग इस तरफ ध्यान देंगे।

Wednesday, October 3, 2007

संत कबीर वाणी: साधू वह जो समदर्शी हो

जौन चाल संसार के जौ साधू को नाहिं
डिंभ चाल करनी करे, साधू कहो मत ताहिं
संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो आचरण संसार का वह साधू का हो नहीं सकता। जो अपने आचरण और करनी का दंभ रखता है उसको साधू मत कहो।
सोई आवै भाव ले, कोइ अभाव लै आव
साधू दौऊँ को पोषते, भाव न गिनै अभाव
कोई भाव लेकर आता है और कोई अभाव लेकर आता है। साधू दोनों का पोषण करते हैं, वह न किसी के प्रेम पर आसक्त होते हैं और न किसी के अभाव देखकर उससे विरक्ति दिखाते हैं।

चाणक्य नीति:ज्ञानी को लोभी और राजा को सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए

  1. साहसी मनुष्य को अपने पराक्रम का पुरस्कार अवश्य मिलता है। सिंह की गुफा में जाने वाले को संभव है काले रंग का मोती गजमुक्ता मिल जाये परंतु जो मनुष्य गीदड़ की मांद में जायेगा तो उसे गाय की पुँछ और गधे के चमडे के अलावा और क्या मिल सकता है।
  2. धन का लोभ करने वाला ज्ञानी असंतुष्ट रहते हुए अपने धर्म का पालन नहीं कर पाता, इसलिए उसका गौरव शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। उसी तरह राजा भी सन्तुष्ट होते ही नष्ट हो जाता है क्योंकि वह अपने राज्य के प्रति सन्तुष्ट होने के कारण महत्त्वान्काक्षा से रहित सुस्त हो जाता और शत्रु उसे घेर लेता है।
  3. उनका जीवन व्यर्थ है जिन्होंने कभी अपने हाथों से दान नहीं किया, कभी अपने कानों से वैद नहीं सुना, अपने आँखों से सज्जन पुरुषों(साधू-संतों) के दर्शन नहीं किये, जिन्होंने कभी तीर्थयात्रा नहीं की जो अन्याय से प्राप्त किये धन से अपना भरण-भोषण करते हैं, घमंड से जिनका सिर हमेशा ऊंचा रहा।

Tuesday, October 2, 2007

रहीम के दोहे:मागने से पद छोटा हो जाता है

धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पिअत अघाय
उदधि बढ़ाई कौन है जगत पिआसो
जाय संत रहीम जल के महत्व का बखान करते हुए कहते हैं कि कीचड का जल भी धन्य है जहाँ छोटे प्राणी उसे पीकर तृप्त हो जाते हैं परंतु सागर की बढ़ाई कोई नहीं करता क्योंकि उसके तट पर जाकर संपूर्ण संसार प्यासा लौटकर आता है।

मांगे घटत रहीम पद, कितौ करौ बढ़ि काम
तीन पैग बसुधा करो, तऊ बावनै नाम

यहाँ आशय यह है कि याचना कराने से पद कम हो जाता है चाहे कितना ही बड़ा कार्य करें। राजा बलि से तीन पग में संपूर्ण पृथ्वी मांगने के कारण भगवान् को बावन अंगुल का रूप धारण करना पडा।

कबीर वाणी:उसी धन का संचय करो जो आगे काम आये


'कबीर' मन फूल्या फिरै,करता हूँ मैं प्रेम
कोटि क्रम सिरि ते चल्या, चेत न देखै भ्रम
संत शिरोमणि कबीर कहते हैं कि आदमी का मन फूला नहीं समाता यह सोचकर कि'मैं धर्म करता हूँ , धर्म चलता हूँ' पर उसे चेतना नहीं है कि अपने इस भ्रम को देख ले कि धर्म कहाँ है जबकि कर्मों का बोझ उठाएँ चला जा रहा है।
'कबीर' सो धन संचिये, जो आगै कू होइ
सीस चढाये पोटली, ले जात न देख्या कोइ
उसी धन का संचय करो, जो आगे काम आए, तुम्हारे इस धन में क्या रखा है। गठरी सिर पर रखकर किसी को भी आज तक ले जाते नहीं देखा।

चाणक्य नीति:क्रोध उतना ही करें जितना निभा सकें

  1. जिसके प्रति लगाव(सच्चा प्यार) वह दूर होते हुए भी पास रहता है। इसके विपरीत जिसके प्रति लगाव नहीं है वह प्राणी समीप होते हुए भी दूर रहता है। मन का लगाव न होने पर आत्मीयता बन ही नहीं पाती और किसी प्रकार का संबंध बन ही नहीं पाता।
  2. जिस किसी प्राणी से मनुष्य को किसी भी प्रकार के लाभ मिलने की आशा है उससे सदैव और प्रिय व्यवहार करना चाहिए। मृग का शिकार करने की इच्छा रखने वाला चालाक शिकारी उसे मोहित करने के लिए उसके पास रहकर मधुर स्वर में गीत गाता रहता है।
  3. विद्वान व्यक्ति वही है जो अपने व्यक्तित्व के अनुकूल ऎसी बात करता हो जो प्रसंग के भी अनुकूल हो। अच्छी से अच्छी बात अप्रान्सगिक होकर प्रभावहीन हो जाती है। यदि वह बात अप्रिय हो और उसमें क्रोध की अभिव्यक्ति आवश्यक हो तो वह भी उतना ही प्रदर्शित करना चाहिए जितना निभा सकें।

Saturday, September 29, 2007

गरीबों के नाम बहुत दर्शन थोड़े-हास्य व्यंग्य

एक टीवी चैनल पार प्याज के बढती कीमतों पर लोगों के इन्टरव्यू आ रहे थे, और चूंकि उसमें सारा फोकस मुंबई और दिल्ली पर था इसलिये वहाँ के उच्च और मध्यम वर्ग के लोगों से बातचीत की जा रही थी। प्याज की बढती कीमतें देश के लोगों के लिए और खास तौर से अति गरीब वर्ग के लिए चिंता और परेशानी का विषय है इसमें कोई संदेह नहीं है पर जिस तरह उसका रोना उसके ऊंचे वर्ग के लोग रोते हैं वह थोडा अव्यवाहारिक और कृत्रिम लगता है। उच्च और मध्यम वर्ग के लोग यही कह रहे थे कि'प्याज जो पहले आठ से दस रूपये किलो मिल रहा था वह अब पच्चीस रूपये होगा। इसे देश का गरीब आदमी जिसका रोटी का जुगाड़ तो बड़ी मुशिकल से होता है और वह बिचारा प्याज से रोटी खाकर गुजारा करता है, उसका काम कैसे चलेगा'?

अब सवाल है कि क्या वह लोग प्याज की कीमतों के बढने से इसलिये परेशान है कि इससे गरीब सहन नहीं कर पा रहे या उन्हें खुद भी परेशानी है? या उन्हें अपने पहनावे से यह लग रहा था कि प्याज की कीमतों के बढने पर उनकी परेशानी पर लोग यकीन नहीं करेंगे इसलिये गरीब का नाम लेकर वह अपने साक्षात्कार को प्रभावी बना रहे थे। हो सकता है कि टीवी पत्रकार ने अपना कार्यक्रम में संवेदना भरने के लिए उनसे ऐसा ही आग्रह किया हो और वह भी अपना चेहरा टीवी पर दिखाने के लिए ऐसा करने को तैयार हो गये हौं। यह मैं इसलिये कह रहा हूँ कि एक बार मैं हनुमान जी के मंदिर गया था और उस समय परीक्षा का समय था। उस समय कुछ भक्त विधार्थी मंदिर के पीछे अपने रोल नंबर की पर्ची या नाम लिखते है ताकि वह पास हो सकें। वहां ऐक टीवी पत्रकार एक छात्रा को समझा रहा था'आप बोलना कि हम यहाँ पर्ची इसलिये लगा रहे हैं कि हनुमान जीं हमारी पास होने में मदद करें।'
उसने और भी समझाया और लडकी ने वैसा ही कैमरे की सामने आकर कहा। वैसे उस छात्र के मन में भी वही बातें होंगी इसमें कोई शक नहीं था पर उसने वही शब्द हूबहू बोले जैसे उससे कहा गया था।

प्याज पर हुए इस कार्यक्रम में जैसे गरीब का नम लिया जा रहा था उससे तो यही लगता था कि यह बस खानापूरी है। मेरे सामने कुछ सवाल खडे हुए थे-
  1. क्या इसके लिए कोई ऐसा गरीब टीवी वालों को नहीं मिलता जो अपनी बात कह सके। केवल उन्हें शहरों में उच्च और मध्यम वर्ग के लोग ही दिखते हैं, और अगर गरीब नहीं दिखते तो यह कैसे पता लगे कि गरीब है भी कि नहीं।
  2. जो केवल प्याज से रोटी खाता है उसका पहनावा क्या होगा यह हम समझ सकते हैं तो यह टीवी पत्रकार जो अपने परदे पर आकर्षक वस्त्र पहने लोगों को दिखाने के आदी हो चुके हैं क्या उससे सीधे बात कराने में कतराते हैं जो वाकई गरीब है। उन्हें लगता है कि गरीब के नाम में ही इतनी ही संवेदना है कि लोग भावुक हो जायेंगे तो फिर फटीचर गरीब को कैमरे पर लाने की क्या जरूरत है।
  3. जो गरीब है उसे बोलने देना का हक ही क्या है उसके लिए तो बोलने वाले तो बहुत हैं-क्या यही भाव इन लोगों का रह गया है।

आजादी के बाद से गरीब का नाम इतना आकर्षक है कि हर कोई उसकी भलाई के नाम पर राजनीति और समाज सेवा के मैदान में आता है पर किसी वास्तविक गरीब के पास न उन्हें जाते न उसे पास आते देखा जाता है। जब कभी पैट्रोल और डीजल की दाम बढ़ाये जाते है तो मिटटी के तेल भाव इसलिये नही बढाए जाते क्योंकि गरीब उससे स्टोव पर खाना पकाते हैं। जब कि यह वास्तविकता है कि गरीबों को तो मिटटी का तेल मिलना ही मुश्किल हो जाता है। देश में ढ़ेर सारी योजनाएं गरीबों के नाम पर चलाई जाती हैं पर गरीबों का कितना भला होता है यह अलग चर्चा का विषय है पर जब आप अपने विषय का सरोकार उससे रख रहे हैं तो फिर उसे सामने भी लाईये।

प्याज की कीमतों से कोई मध्यम वर्ग कम परेशान नहीं है और अब तो मेरा मानना है कि मध्यम वर्ग के पास गरीबों से ज्यादा साधन है पर उसका संघर्ष कोई गरीब से कम नहीं है क्योंकि उसको उन साधनों के रखरखाव पर भी उसे व्यय करने में कोई कम परेशानी नहीं होती क्योंकि वह उनके बिना अब रह नहीं सकता और अगर गरीब के पास नहीं है तो उसे उसके बिना जीने की आदत भी है। पर अपने को अमीरों के सामने नीचा न देखना पडे यह वर्ग अपनी तक्लीफे छिपाता है और शायद यही वजह है कि ऐक मध्यम वर्ग के व्यक्ति को दूसरे से सहानुभूति नहीं होती और इसलिये गरीब का नाम लेकर वह अपनी समस्या भी कह जाते है और अपनी असलियत भी छिपा जाते हैं। यही वजह है कि टीवी पर गरीबों की समस्या कहने वाले बहुत होते हैं खुद गरीब कम ही दिख पाते हैं।

Friday, September 28, 2007

सुनो सबकी करो मन की-हिन्दी हास्य कविता

जिनके पास नही कोई ज्ञान
वही पा रहे ज्ञानी का सम्मान
वैद, पुराण और शास्त्र जिन्होंने कभी
समझना तो दूर पढे भी न होंगे
लोगों में करते उनका बखान

कभी सुनकर हैरानी होती है कि
क्या वह सब लिखा है ग्रंथों में
जो सुनते उनका ज्ञान
या कुछ हमसे ही पढने में छूट गया
या चूक गया हमारा ध्यान
कभी कभी तो शक होता है कि
हम कोई और ग्रंथ पढे थे
या तथाकथित ज्ञानियों ने
तथ्य पाने मन से गढे थे
कहीं हम तो नहीं भूल जाते
अपने ही दर्शन का ज्ञान

कहैं दीपक बापू
अपने ही हाथ हैं जिस तरह जगन्नाथ
वैसे ही हमारी बुद्धि है हमारे साथ
किसी के सुने पर इतनी आसान से
यकीन नहीं करते
जब तक जब तक उसकी पुष्टि ना कर लें
खुद ही पढ़कर ग्रंथ करते हैं
प्राप्त करते हैं ज्ञान
कह गए बडे-बुजुर्ग सुनो सबकी
करो वही जो मन रहा है मान
----------------

माया और सत्य-हिन्दी हास्य कविता

इधर जाएँ कि उधर
यह कभी तय नहीं कर पाए
जिस माना को पाने की चाहत है
उसके आदि और अंत को समझ नहीं पाए
चारों और फैली दिखती है रोशनी
पर कभी हाथ से पकड़ नहीं पाए
कहीं इस घर मे मिलेगी
कहीं उस दर पर सजेगी
और कहीं किसी शहर में दिखेगी
उसके पीछे दौडे जाते लोग
जितना उसके पास जाओ
वह उतनी दूर नजर आये
सौ से हजार
हजार से लाख
लाख से करोड़
गिनते-गिनते मन की भूख बढती जाये

कहै दीपक बापू
माया की जगह जेब में ही है
उसे सिर मत चढ़ाओ
इधर-उधर देख क्यों चकराये
पीछे जाओगे तो आगी भागेगी
बेपरवाह होकर अपनी रह चलोगे
तो पीछे-पीछे आयेगी
जितना खेलोगे उससे
उतना ही इतरायेगी
मुहँ फेरोगे तो खुद चली आयेगी
आदमी की पास उसका है धर्म
करते रहो समर्पण भाव से अपना कर्म
सत्य का यही है मर्म
जीवन के खेल में वही विजेता होते
जो सत्य के साथ ही चल पाए
---------------------------

Thursday, September 27, 2007

एक ही कंपनी-हिन्दी हास्य कविता

हीरो ने कहा निर्देशक और निर्माता से
'आज शूटिंग नहीं करूंगा
पैकअप करा दो
मेरा मूड है खराब'
निर्माता ने अपना मोबाइल
उसकी तरफ बढ़ाया और कहा
'मैंने नंबर लगा दिया है
पहले इस पर बात कर लो
फिर देना जनाब'

हीरो ने नंबर देखा और घबडाया
अपने सेक्रेटरी को बुलाया
उसने जब मामला समझा
तब उसने भी अपना मोबाइल
निर्माता की तरफ बढाया
और कहा
'
उस बिचारे को क्या धमकाते हो
मुझ से बात करो
आप इस नंबर पर बात करो पहले जनाब '

निर्माता का सेक्रेटरी भी वहीं खड़ा
उसने भी नंबर देखा और खुश होकर बोला
'अरे काहेका झगडा आप और हम एक ही
कंपनी का मोबाइल इस्तेमाल करते हैं
फिर क्यों झगडा करते हैं साहब'

हीरो ने कुछ सुना कुछ समझा
और बोला
'बात एक कंपनी ही की है
यह सुनकर मैं खुश हुआ
अब तो शूटिंग शुरू करो जनाब'
----------------------

समस्याओं के जंगल में आन्दोलन-हिन्दी हास्य कविता

लोग भीड़ में जाकर
जुलूस सजाते हैं
चीख-चिल्लाकर नारे लगाते हैं
और फिर आश्वासन और वादों का
पुलिंदा लेकर वापस आते हैं
कई बरस से चल रहा है
आंदोलनों का सिलसिला
पर फिर भी किसी को कुछ नहीं मिला
समस्याओं के रोग नित बढते जाते हैं

अभी तक इतने आश्वासनों, वादों और
घोषणाओं के पुलिंदे बंट चुके हैं कि
उनेमें कोई तोहफे होते तो
सब जगह इन्द्रपुरी जिसे दृश्य होते
पर फिर जुलूस के लिए
कहाँ से लोग जुटाए जाते
कमरे के बाहर की राजनीति तो
दिखाई देती है
पर अन्दर के सौदे कौन देखे
इसलिये लोग जहाँ से चलते हैं
फिर लॉट कर वहीं अपने को पाते हैं
समस्याओं के इस जंगल में
आंदोलन रेंगने वाले कीड़े की
तरह शोभा पाते हैं
--------------------

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकाऐं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर