Monday, March 10, 2014

रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख-धनी समाज में समरसता का भाव स्थापित करने का प्रयास करें(rahim darshan par aadhari chinntan lekh-dhani smaj mein samrasta ka bhav sthapit karna ka prayas kaen)



      हमारे देश में कुछ उत्साही बुद्धिमान तथा समाज सेवक विदेशी विचारधाराओं के सिद्धांत उधार लेकर देश में गरीबों के उद्धार के लिये अभियान छेड़ने का स्वांग रचते हैं।  आमतौर से यह माना जाता है कि भारत में केवल भक्ति करने वाले उन विद्वानों की प्रसिद्ध मिली है जिन्होंने परमात्मा का स्मरण करने का लोगों का संदेश दिया है। उन्होंने अपने समाज की स्थिति से कोई मतलब नहीं रखा। यह सोच गलत है।  हमारे अध्यात्मिक विद्वानों ने हमेशा ही समाज में कमजोर, गरीब तथा बेबस की सहायता के लिये लोगों को प्रेरित किया है।  कार्ल मार्क्स को मजदूरी का मसीहा बताकर भारत में प्रचार करने वाले कुछ उत्साही विद्वान यह मानते है कि पूंजीवाद नामक दैत्य की खोज उन्होंने ही की थी जिसे नष्ट करने के सूत्र भी बताये।  ऐसा नहीं है क्योंकि  हमारे देश में तो अध्यात्मिक विद्वान न केवल तत्वज्ञान का संदेश देने के साथ ही  समाज में समरसता का भाव बनाये रखने का विचार तथा योजना भी बताते रहे हैं। उनका मानना रहा है कि जब तक आप अपने आसपास सहजता का वातावरण नहीं बनाये रखते तब तक स्वयं भी खुश नहीं रह सकते।
कविवर रहीम कहते हैं कि
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बढ़त रहीम धनाढय धन, धनौ धनी को जाई।
घटैं बढ़े वाको कहा, भीख मांगि जो खाई।
     हिन्दी में भावार्थ-धनी का धन बढ़ता ही जाता है और जो श्रमिक उसका स्वामी है वह उसे पा नहीं सकता।  जो व्यक्ति भीख मांग कर जीवन गुजारता है उसके लिये धन घटने या बढ़ने का कोई अर्थ नहीं है।
      हमारे अध्यात्मिक विद्वान मानते हैं कि धन का असली स्वामी तो उसका सृजक श्रमिक ही है।  वह यह भी मानते हैं कि धनी बीच में अपना हाथ डालकर धन की नदी से गरीब के घर जाती धारा से अपना अधिक हिस्सा मार लेता है। इतना ही नहीं हमारे अध्यात्मिक चिंत्तकों ने धर्म के नाम पर रचे जा रहे उस पाखंड पर भी अपनी वक्र दृष्टि डाली है जिससे गरीबों में मसीहाई छवि बनाने वाले कथित संत और महात्मा धनिकों की रक्षा का काम करते हैं। वह गरीबों और मजदूरों को धार्मिक कथाओं में व्यस्त रखकर उन्हें अपने उपदेशों से भटकाते हैं।  स्वयं मोह और माया के चक्कर में रहते हैं और लोगों से कहते हैं कि दूर रहो।  इस तरह वह समाज में धनिकों के लिये संभावित विद्रोह को रोके रहते हैं।
      कहने का अभिप्राय यह है कि गरीब, बेबस, लाचार और अस्वस्थ लोगों की सहायता करने का विचार हमारे देश के अध्यात्मिक विद्वानों का भी रहा है।  यह कहना व्यर्थ है कि भारत में बाहर से आये कथित सभ्य लोगों ने यहा कोई वैचारिक क्रांति की है। हमें समाज में समरसता का भाव अपने पंरपरागत ढंग से दान, सहायता अथवा उपहार देकर करने का प्रयास करना चाहिये न कि विदेशी विचारधाराओं का मुंह ताकना चाहिये।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Monday, March 3, 2014

सामान और दिल के रिश्ते-हिन्दी व्यंग्य कविता(saman aur dil ke rishtey-hindi vyangya kavita)



देश के विकास का हमने अब रिश्ता महंगाई से जोड़ लिया है,
घर के रिश्तों के दाम का आंकलन भी बाज़ार पर छोड़ दिया है।
ईंधन के दाम हर रोज बढ़ने का समाचार  आता है
मन में चिंताओं का उठता धुंआ ख्याल पर अंधेरा छा जाता है,
शादी हो या गमी अपनी इज्जत बढ़ाने के लिये लोग खाना बांटते,
कुछ लेते कर्जा कुछ अपनी तिजोरियों में रुपये छांटते,
तत्वज्ञान बघारने वाले बहुत है मगर पाखंड कोई नहीं छोड़ता,
रस्म निभाने के लिये जिंदगी गंवाकर हर कोई दौलत जोड़ता,
कहें दीपक बापू दिन-ब-दिन समाज सिकुड़ रहा है
सामानों की चाहतों ने इंसान के दिल के रिश्तों को तोड़ दिया है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Monday, February 24, 2014

चतुर बेच रहे अपनी चाल-हिन्दी व्यंग्य कविता(chature bech rahe apni chal-hindi vyangya kavita


खेल भी नाटक की तरह पहले पटकथा लिखकर होते हैं,
जुआ और सट्टे के दाव पर लोग कभी हसंते कभी रोते  हैं,
अभिनेता और खिलाड़ी में नहीं रह गया अंतर,
सभी पैसे के लिये अदायें बेचते जपते हैं मनोरंजन मंतर,
गेंद पर आंकड़ा बढ़ेगा कि विकेट गिरेगा पहले ही तय है,
फुटबाल हो या टेनिस हर प्रहार बिकने की शय है,
मिल बैठते हैं खिलाड़ी और अभिनेता नायकों की तरह,
दर्शकों के भगवान धनवानों के गीत गाते गायकों की तरह,
कहें दीपक बापू पर्दे पर चल रहे हर दृश्य पर होता शक
चतुर बेचते अपनी चाल मूर्ख भ्रम को सच समझ रहे होते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Sunday, February 16, 2014

कुर्सी के खेल में शहादत-हिन्दी व्यंग्य कविता(kursi ke khel mein shahadat-hindi vyangya kavita)




कुर्सी के खेल में शहादत भी कभी रंग लाती है,
ज़माने की हमदर्दी बादशाहत भी संग लाती है,
सियासत की चाल शतरंज के खेल जैसी होती,
घोड़ा चले ढाई कदम बादशाह की ताकत ऐसी नहीं होती,
सीधे चलता पैदल वार तिरछा कर वजीर बन जाये,
मात दे बादशाह को तो बाजी एक नज़ीर बन जाये,
ऊंट की तिरछी तो हाथी की सीधी चाल करती हैरान,
हुकुमत का खेल पसंद करते फरिश्ते हों या शैतान,
कहें दीपक बापू बेबस और बेजान राजा बुत जैसा है
उसकी किस्मत की कुंजी मुहरों की चालों में फंसी होती।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

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Monday, February 10, 2014

बाहर से स्वर्ग अंदर से नर्क-हिन्दी व्यंग्य कविता(bahar se swarg aur andar narak-hindi vyangya kavita)



बड़े लोग अच्छा कहें या बुरा कुछ फर्क नहीं होता है,
हिचकोले खाते हालातों में ज़माने का बेड़ा गर्क होता है।
गरीबी से रहे जो दूर वही गरीब का उद्धार करने चले हैं,
मजदूरों के पसीने के गाते गीत वही महलों में जो पले है,
जवानी के जश्न का सामान जुटाते वृद्धों का भला करते हुए
अभिव्यक्ति के झंडबरदारों के पास जाते लोग डरते हुए,
विज्ञान की डिग्री लेकर क्रांतिकारी अर्थशास्त्र पर चर्चा करते,
नारे लगाते लोग लेते चंदा जिससे अपना ही खर्चा भरते,
नाटकबाजी से चले आंदोलन  वजन प्रचार से पाते हैं,
तख्त पर पहुंचे लोगों के विचार आखिर खो जाते हैं,
कहें दीपक बापू स्वर्ग के सपने बेचने वाले बाज़ार में बहुत हैं
सस्ते मिले या महंगा सुंदर आवरण में छिपा नर्क होता है।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Tuesday, February 4, 2014

बसंत पंचमी पर बधाई लेख-योगाभ्यासी अधिक आंनद अनुभव करते हैं(basant panchmi par badhai lekh-yagabhyasi adhik anand anubhav karte hain)



         आज पूरे देश में बसंत पंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस अवसर पर बुद्धि की देवी श्री सरस्वती का पूजन किया जाता है। हमारे देश में दिपावली के अवसर पर लक्ष्मी और बसंत पंचमी पर सरस्वती की आराधना करना इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश के लोग धन तथा बुद्धि के सामंजस्य से भरा जीवन जीना चाहते हैं। उनमें सांसरिक विषयों के प्रति रुचि स्वाभाविक रूप से वि़द्यमान होने के साथ ही  अपने अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति भी चेतना यथावत है।  आमतौर से अध्यात्मिक दर्शन के प्रति झुकाव रखने वालों के लिये सरस्वती की आराधना अत्यंत महत्व रखती है। जो लोग नियमित रूप से योग साधना तथा हªदय में स्थित ज्ञानार्जन के प्रति जिज्ञासा भाव को शांत करने के लिये अध्ययन के साथ अभ्यास करते हैं उनके लिये श्रीसरस्वती की उपासना हर्ष प्रदान करती है।
      बसंत पंचमी के साथ ही मौसम परिवर्तित होता है।  शीत लहर थमने लगती है और समशीतोष्ण वायु देह तथा मन को प्रफुल्लित करते हुए प्रवाहित होती है। इतना अवश्य है कि इस सुखद वातावरण की अनुभूति में व्यक्तियों की दृष्टि से भिन्नता हो सकती है-कोई इसका अधिक आनंद उठाता है तो कोई कम! जो लोग नियमित रूप से योगाभ्यास करते हैं उनको इसकी सहज पर व्यापक सुखानुभूति अनुभव होती है। उनके रक्त की हर बूंद प्रसन्नता के साथ देह में विचरण करते हुए स्फूर्ति प्रदान करती है।  सामान्य मनुष्य को भी कहीं न कहीं सुखद अनुभव तो होता है पर वह उसे समझ नहीं आता।  उसका मन तथा शरीर कहीं न कहीं अज्ञात भाव से इस वातावरण का लाभ तो उठाता है पर उसे अधिक देर तक साथ नहीं रख पाता। उसमें हार्दिक सुखानुभूति उतनी नहीं दिखाई देती जितनी योगाभ्यासी में दिखती है।
      इस संसार में अनेक विषय है जिनमें मनुष्य का मन इस कदर लिप्त रहता है कि उसे सुख दुःख के साथ जीने का अभ्यास हो ही जाता है। वह जैसी स्थिति होती है उसके अनुरूप ही भाव ग्रहण करता है।  एक तरह से वह बाहरी दबाव से प्रभावित रहता है।  अपनी बुद्धि से मनुष्य कोई सृजन कर उसका आनंद उठाने की बजाय दूसरे के अविष्कार का लाभ उठाना चाहता है।  इसके विपरीत योगाभ्यासी तथा अध्यात्मिक दर्शन साधक अपनी देह की आंतरिक सरंचना में ही सुख का साधन ढूंढता है। कहा जाता है कि अपनी घोल तो नशा होय।  दूसरे के सृजन का लाभ उठाते हुए मन उकता जाता है जबकि अपने प्रयासों से जुटाये गये आनंद के क्षण का भाव स्थायी होता है। नियमित सृजन करने वाला मनुष्य नित्य नये प्रयोग करता है और यह प्रक्रिया उसे अपनी देह की सार्थकता का आनंद देने वाली होती है।
      यही कारण है कि विद्वान तथा ज्ञान साधक लक्ष्मी की बजाय सरस्वती की आराधना करती है। कहा जाता है कि सरस्वती और लक्ष्मी देवी का आपस में बैर है और दोनों कभी साथ नहीं रहती। यह एक भ्रम है क्योंकि दोनों की उपस्थिति प्रथक हो ही नहीं सकती।  यह अलग बात है कि किसी के पास लक्ष्मी देवी तो किसी पर सरस्वती की कृपा की प्रधानता होती है। दोनों की एक साथ प्रधानता हो ही नहीं सकती और होना भी नहीं चाहिए।  जिनके पास धन है उनका अज्ञानी होना ही श्रेयस्कर है क्योंकि वह तब मदांध होकर उसका अपव्यय नहीं कर पायेंगे जिससे कुछ लोगों की रोजी रोटी प्रभावित हो सकती है।  जिनके पास धन अधिक नहीं है उनको सरस्वती माता की ही आराधना करना चाहिए ताकि सांसरिक विषयों से मिली निराशा से मुक्ति पायी जा सके। अंततः सुख और दुःख, आशा तथा निराशा और संदेह और विश्वास मन के भाव हैं जिनका निर्माण बुद्धि ही करती है।  अगर बुद्धि शुद्ध हो तो फिर इस संसार में किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। सरस्वती माता को नमन।
      बसंत पंचमी के इस पावन पर्व पर समस्त ब्लॉग पाठकों, लेखक मित्रों तथा स्नेहजनों को बधाई। हमारी कामना है कि यह पर्व सभी लोगों को प्रसन्नता प्रदान करे।


लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Wednesday, January 29, 2014

पेट सबका बड़ा है-हिन्दी व्यंग्य कविता(pet sabka badha hai-hindi vyangya kavita)



बेचैन जमाना आसमान से फरिश्ता आने के इंतजार में खड़ा है,
दर्द बढ़ा रहा खुद इंसान अपना, हमदर्दी के लिये अड़ा है।
कदम कदम पर खड़े हैं भलाई करने वाले दलाल
अपने लाभ के लिये दिल तोड़ते नहीं होता उनको मलाल।
आला दर्ज के अदाकार हैं अपनी हाथ की सफाई दिखाते,
बचने के लिये अपने बयान में हमेशा दो अर्थ छिपाते।
उनकी हंसी हो या रुदन छिपी रहती है चालाकी,
दूसरे की मदद का सामान समेटत नहीं छोड़ते बाकी।
कहें दीपक बापू करो खुद पर या सर्वशक्त्मिान पर भरोसा,
यहां उदार चेहरे बहुत हैं  पर पेट सबका बहुत बड़ा है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Thursday, January 23, 2014

बाज़ार में भलाई की तिजारत-हिन्दी क्षणिकायें(bazar mein bhalai ki tizarat-hindi short poem)





सिंहासन पर बैठने की ख्वाहिश किसे नही होती,

दरबारियों से मुजरा कराने मे खुशी किसे नहीं होती।

कहें दीपक बापू सबका भला करने का पाखंड आसान है,

राजसुख के भोगते हुए त्याग की नीयत किसमें होती।

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उन पर भरोसा कभी न करना जो नारे लगाते हैं,

धरती पर स्वर्ग लाने का वादा मु्फ्त में बरसाते हैं।

कहें दीपक बापू, तिजारत हो गयी है इंसान की भलाई का काम,

बेदर्द बुत दाम लेकर सौदागरों के लिये ईमानदार बन जाते हैं ।

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भलाई की तिजारत करते हुए बाज़ार में रोज नये चेहरे आयेंगे,

अपने लफ्जों में भरेंगे नये अंदाज, धोखा पुराना सजायेंगे।
कहें दीपक बापू सिंहासन पर बैठते ही नीयत बदल जाती है
सौदागरों के हाथ में जिनकी डोर, वह बुत क्या तरक्की लायेंगे।


लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Wednesday, January 15, 2014

धार्मिक आस्थाओं पर चोट पहुंचाने का सवाल-हिन्दी अध्यात्मिक चिंत्तन (dharmik aasthaon par chot pahunchane ka sawal-hindi adhyatmik chinntan)



      हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ऐसे कानून बनाये गये हैं जिसमें किसी धर्म के प्रतीक पुरुषों की आलोचना पर अपराध  का प्रकरण कायम किया जाता है।  हम यहां बता दें कि हम किसी भी धर्म के-चाहे जिसे यह लेखक जुड़ा या नहीं  है-प्रतीक पुरुष की आलोचना करना अच्छा नहीं समझते।  इस लेखक का मानना है कि किसी भी धर्म के प्रतीक पुरुष की निंदा करना मूर्खता ही नहीं वरन् तामस प्रवृत्ति या कहें आसुरी प्रवृत्ति की परिचायक है।  कम से कम श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान साधक होने के कारण इस लेखक को यह लगता है कि जब तक कोई दूसरा इच्छुक न हो उसे धर्म का उपदेश भी नहीं देना चाहिये। इतना ही नहीं अपने धर्म सिद्ध और दूसरे को अज्ञानी कहना महान अहंकार का प्रमाण है।
      अब इसका दूसरा पक्ष भी है। यह लेखक धर्म प्रचार को भी एक पाखंड मानता है।  देखा जाये तो धर्म पथ वह है जिसमें अध्यात्म का ज्ञान होने पर जीवन सहजता से चले।  यह नितांत एकांत विषय है। अगर हम अपने धर्म के पथ पर चल रहे हैं तो अपने एक अंदर आत्मविश्वास होता है ऐसे में कोई दूसरा आक्षेप भी करे तो उसकी परवाह नहीं होती।  अगर अपने धार्मिक पुरुष, चिन्ह या संस्कार पर कोई आक्षेप करता है और उसे मन में पीड़ा हो तो वह उसकी मानसिक कमजोरी का ही प्रमाण है।  अगर इस लेखक से कोई कहे कि आप अपने धर्म का प्रचार करो तो वह उसे ठुकरा देगा।  धर्म प्रचार करने का आशय है कि हमने सिद्धि हासिल कर ली है और अब दूसरे को सिखा सकते हैं, यह प्रवृत्ति अहंकार का परिचायक है। चाहे किसी भी धर्म का प्रचारक हो वह कहीं न कहीं अपने समाज का विस्तार किसी धनी, राजकीय, या व्यक्तिगत प्रभाव को बढ़ाने का काम करता है।  उसे कहीं न कहीं से धन मिलता है।  सीधी बात यह है कि कहीं न कहीं उसे अपने लिये कमाने का साधन बनाता है।  सच्चा धर्मभीरु तो वह जो अपना सांसरिक काम करते हुए अपने प्रतीक पुरुष का ध्यान करे।  ऐसे में धर्म प्रचारकों को लेकर यह सवाल उठता है कि उनकी रोजी रोटी कैसे चलती है? तय बात है कि वह कोई अन्य सांसरिक काम नहीं करते।
      भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में अपना संदेश दिया था पर वह अपने सांसरिक कर्म से कभी वह लिप्त नहीं हुए। उन्होंने तो सन्यास को एक कठिन विधा बताया है।  इसलिये उन्होंने कर्मयोग का श्रेष्ठ बताया।  सभी धर्म के प्रचारक कथित रूप से सांसरिक कर्म से लिप्त होकर लोगों को सिखाने चल पड़ते हैं।  यह प्रचार अपनी छवि उज्जवल रखते हैं पर जब कोई उनका विरोध करे तो उनके पीछे से हिंसक तत्व सामने प्रकट हो ही जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि यह धर्म प्रचारक एक तरह से उस व्यवसायी की तरह होते हैं जो अपना सामान अच्छा बताते हैं।  हमारा मानना है कि जिस तरह किसी व्यवसायी की वस्तु को दोषपूर्ण बताया जा सकता है तो इन व्यवसायी धर्म के ठेकेदारों की वाणी से जब अपने प्रतीक पुरुष की प्रशंसा करते हैं तो कोई व्यक्ति सामने या पीछे प्रतिकूल बात भी कह सकता है।  ऐसे में उस पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाना अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने जैसा अमानवीय आचरण है।
      आपत्ति हमें इस बात पर भी है कि किसी धार्मिक पुरुष की आलोचना करना गलत है तो सवाल यह है कि आखिर समाज में धर्म के नाम पर अंधविश्वास दूर कैसे किया जाये। हर धर्म प्रचारक अपने प्रतीक पुरुष की प्रशंसा कर लोगों को बहलाते हैं तो दूसरे को भी यह हम होना चाहिये कि वह प्रतिवाद करे। इसे रोकना समाज में धर्म के नाम यथास्थितिवादी बने रहने की वह इच्छा है जिससे शिखर पुरुष अपना नियंत्रण बना रहें।
      दूसरी बात यह कि किसी धार्मिक पुरुष की निजी या उसके संदेश की आलोचना पर धार्मिक भावना भड़कने की बात कहकर किसी एक व्यक्ति पर अपराध कायम करना एक डरपोक कार्यवाही है क्योंकि हर राज्य के पास सामूहिक हिंसा रोकने की शक्ति होती है। लोग अपने धर्म को मानते हैं इसका मतलब यह नहीं है कि वह सब ज्ञानी हैं।  सच बात तो यह है कि हर धर्म के मानने वालों की संख्या बहुत हैं पर उस पर चलते कितने हैं यह सभी जानते हैं।  दरअसल इस तरह के धर्म समूह लोगों में असुरक्षा के भाव से बने हुए हैं जो समय समय सामूहिक हिंसक घटनाओं के कारण भर जाते हैं।  पूरे विश्व में ऐसी अनेक घटनायें हुईं हैं जिस कारण लोग किसी धार्मिक समूह का सदस्य बना रहना ही अच्छा समझते हैं। विश्व के अनेक देश तो कथित धार्मिक राज्य होने का स्वांग करते हैं ताकि लोगों को राजा और सर्वशक्तिमान दोनों के प्रभाव से नियंत्रित रखा जा सके।  यही कारण है कि धार्मिक प्रतीकों या संस्कारों पर टिप्पणियां करना हर कानून में वर्जित किया गया है ताकि समाज में कोई ऐसा बदलावा न आये जिससे शिखर पुरुषों का पतन हो।
      इसलिये कम से कम धर्म के नाम पर आस्थाओं को चोट पहुंचाने जैसे नारे तो अब बंद होना चाहिये।  साथ ही हम यह भी कहना चाहते हैं कि किसी भी धार्मिक प्रतीक पुरुष, चिन्ह या संस्कार पर टिप्पणी कर अपनी श्रेष्ठता दिखाने की बजाय अपने धर्म पथ पर चलकर स्वयं आनंद उठाना चाहिये।  हम अपने स्वयं के धार्मिक आचरण को देखें। यह दूसरे के धर्म पर आक्षेप करने ज्यादा बेहतर स्थिति है।


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Sunday, January 5, 2014

दूसरों का दर्द, अपनी ख्वाहिशें-हिन्दी व्यंग्य कविता(doosron ka dard,apni khwahishen-hindi vyangya kavita



ज़माने को दिखाने के लिये
नये नये स्वांग रचना होता है जरूरी,
नारे लगाते रहो भीड़ में
तख्त पर बैठते ही बना लो वादों से दूरी।
कहें दीपक बापू
नयी नयी अदायें दिखाओ,
पुराने शब्दों की पंक्तियां
नई कहकर सिखाओ,
मुखौटा बदलकर
नया चेहरा दिखाओ,
दौलत चाहे जितनी हो पास
गरीब के बने रहो हमदर्द,
दिल में चाहे अपने सुंदर सपने बसे हो
बेचो बाज़ार में दूसरों का दर्द,
ऊंचाई पर महल भले ही बना लो,
रहने के लिये जमीन पर झौंपड़ी भी तना लो,
दूसरों को आसरे देते रहो
ख्वाहिशें अपनी करते रहो यूं ही पूरी।
 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Thursday, December 26, 2013

चाणक्य नीति दर्शन-नकारा आदमी दूसरों की निंदा कर अपनी श्रेष्ठता जताता है(nikamma aadmo doosron ki ninda kar apani shreshta jataataa hai)



     हमारे देश में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने लोगों की चिंत्तन क्षमता को सीमित कर दिया है। सच बात तो यह है कि लोग मानव जन्म को श्रेष्ठ तो मानते हैं पर उसके फलितार्थ नहीं समझ पाते। पश्चिम की उपभोग संस्कृति से सराबोर समाज में सुविधाओं की वस्तुओं के नये तथा परिवर्तित वस्तुओं को विज्ञान की उन्नति तथा बाज़ार में उनकी उपलब्धता को विकास मान लिया गया है। इस भौतिक विकास से जो दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक विकार  युक्त लोगों के लिये जीवन का संघर्ष अत्यंत कठिन होता है यही कारण है कि वह किसी के सपने दिखाने पर ही उसके वश में हो जाते हैं। स्थिति यह है कि लोग अपनी रोजमर्रा की परेशानियों से निजात पाने के लिये सर्वशक्तिमान की दरबार में जाते हैं या फिर किसी चालाक मनुष्य को ही सिद्ध मानकर उसके इर्दगिर्द अपनी समस्याओं का रोना रोते हैं।
            सर्वशक्तिमान ने इंसान को हाथ, पांव, नाक, कान तथा आंखों के साथ अन्य जीवों से अधिक बुद्धि दी है पर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के कारण समाज अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है।  यही कारण है कि प्रकृत्ति के उपहार होते हुए भी अनेक लोग लाचारी का जीवन बिता रहे हैं। इससे उन चालाक तथा विलासी लोगों की चांदी हो रही है जिनके पास बेचने के लिये सपने हैं।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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धर्मार्थकाममीक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते।
अजागलस्तनास्येव तस्य जन्म निरर्थकम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-जिस व्यक्ति के पास धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष इन चारों में से कोई पुरुषार्थ नहीं है उसका जन्म बकरे के गले में लटके थनों के समान व्यर्थ आर निष्फल है।
दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः पर-यशोऽगिना।
अशक्तास्तत्पद्र गन्तुं ततो निन्दां प्रकृर्वते।।
            हिन्दी में भावार्थ-दुष्ट आदमी दूसरों की कीर्ति को देखकर जलता है और जब स्वयं उन्नति नहीं कर पाता तो वह दूसरे का विकास देखकर उसकी निंदा करने लगता है।
आजकल यह भी देखा जा रहा है कि समाज के हित के लिये कोई काम करने की योजना तो बनाता नहीं है। न ही कोई सार्वजनिक हित के लिये काम करने को इच्छुक है पर कमजोर और लाचार लोगों का भला करने के नाम पर अनेक चालाक लोग अपनी दुकान लगा ही लेते हैं।  ऐसे लोग एक दूसरे की निंदा करते हैं।  अमुक ऐसा है हम भले हैं-जैसी बातें कहते हैं।  दूसरे के काम में दोष निकालते हैं पर स्वयं कुछ नहीं करे।  इस प्रचार के युग में निंदा करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। भौतिकता ने लोगों के निजी स्वाभिमान को नष्ट कर दिया है। अपनी समस्याओं पर दूसरे पर आश्रित रहने की सामान्य प्रवृत्ति ने समाज में अनेक ऐसे लोगों तथा उनके समूहों का निर्माण कर दिया है जो भलाई का व्यापार समाज सेवा के नाम पर करते हैं।
इस संसार में समस्यायें सभी के सामने होती हैं पर योग तथा ज्ञान साधक अपने प्रयासों से उनका निपटारा करते हैं। परिणाम के लिये प्रतीक्षा करने का उनमें धैर्य होता है।  दूसरे उनकी बुद्धि का हरण नहीं कर सकते। इस प्रकार का गुण अपने अंदर लाने का एकमात्र उपाय यही है कि हम अपने अध्यात्मिक दर्शन के ग्रंथों का अध्ययन करें।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Monday, December 9, 2013

भ्रष्टाचार मुक्त समाज की कल्पना-हिन्दी व्यंग्य कविता(bhrashtachar mukt samaj ki kalpana-hindi vyangya kavita)

भ्रष्टाचार मुक्त समाज की कल्पना
कितनी सुखद लगती है,
मगर इसके लिये जरूरी है कि
भगवान अवतार लेकर
स्वयं राजा बन जायें,
हम सारे सुख भोगते हुए
केवल उनका नाम गायें।
कहें दीपक बापू
हम बंदे इंसानों में देवता
क्यों तलाशते हैं,
यकीन कर लेते हैं
खूबसूरत चेहरों पर
स्वर्ग धरती पर लाने का वादा
करते हुए जो नाचते हैं,
कुछ लोग महापुरुष बनने के लिये
सतयुग जैसा वातावरण
लाने का का स्वांग रचते हैं,
आम आदमी  की भलाई काम हाथ में लिये
अपनी सारी समस्याओं से बचते हैं,
हम सुनकर उनकी बातें
कभी अपने दिल में न ले जायें।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

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