Wednesday, January 15, 2014

धार्मिक आस्थाओं पर चोट पहुंचाने का सवाल-हिन्दी अध्यात्मिक चिंत्तन (dharmik aasthaon par chot pahunchane ka sawal-hindi adhyatmik chinntan)



      हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ऐसे कानून बनाये गये हैं जिसमें किसी धर्म के प्रतीक पुरुषों की आलोचना पर अपराध  का प्रकरण कायम किया जाता है।  हम यहां बता दें कि हम किसी भी धर्म के-चाहे जिसे यह लेखक जुड़ा या नहीं  है-प्रतीक पुरुष की आलोचना करना अच्छा नहीं समझते।  इस लेखक का मानना है कि किसी भी धर्म के प्रतीक पुरुष की निंदा करना मूर्खता ही नहीं वरन् तामस प्रवृत्ति या कहें आसुरी प्रवृत्ति की परिचायक है।  कम से कम श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान साधक होने के कारण इस लेखक को यह लगता है कि जब तक कोई दूसरा इच्छुक न हो उसे धर्म का उपदेश भी नहीं देना चाहिये। इतना ही नहीं अपने धर्म सिद्ध और दूसरे को अज्ञानी कहना महान अहंकार का प्रमाण है।
      अब इसका दूसरा पक्ष भी है। यह लेखक धर्म प्रचार को भी एक पाखंड मानता है।  देखा जाये तो धर्म पथ वह है जिसमें अध्यात्म का ज्ञान होने पर जीवन सहजता से चले।  यह नितांत एकांत विषय है। अगर हम अपने धर्म के पथ पर चल रहे हैं तो अपने एक अंदर आत्मविश्वास होता है ऐसे में कोई दूसरा आक्षेप भी करे तो उसकी परवाह नहीं होती।  अगर अपने धार्मिक पुरुष, चिन्ह या संस्कार पर कोई आक्षेप करता है और उसे मन में पीड़ा हो तो वह उसकी मानसिक कमजोरी का ही प्रमाण है।  अगर इस लेखक से कोई कहे कि आप अपने धर्म का प्रचार करो तो वह उसे ठुकरा देगा।  धर्म प्रचार करने का आशय है कि हमने सिद्धि हासिल कर ली है और अब दूसरे को सिखा सकते हैं, यह प्रवृत्ति अहंकार का परिचायक है। चाहे किसी भी धर्म का प्रचारक हो वह कहीं न कहीं अपने समाज का विस्तार किसी धनी, राजकीय, या व्यक्तिगत प्रभाव को बढ़ाने का काम करता है।  उसे कहीं न कहीं से धन मिलता है।  सीधी बात यह है कि कहीं न कहीं उसे अपने लिये कमाने का साधन बनाता है।  सच्चा धर्मभीरु तो वह जो अपना सांसरिक काम करते हुए अपने प्रतीक पुरुष का ध्यान करे।  ऐसे में धर्म प्रचारकों को लेकर यह सवाल उठता है कि उनकी रोजी रोटी कैसे चलती है? तय बात है कि वह कोई अन्य सांसरिक काम नहीं करते।
      भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में अपना संदेश दिया था पर वह अपने सांसरिक कर्म से कभी वह लिप्त नहीं हुए। उन्होंने तो सन्यास को एक कठिन विधा बताया है।  इसलिये उन्होंने कर्मयोग का श्रेष्ठ बताया।  सभी धर्म के प्रचारक कथित रूप से सांसरिक कर्म से लिप्त होकर लोगों को सिखाने चल पड़ते हैं।  यह प्रचार अपनी छवि उज्जवल रखते हैं पर जब कोई उनका विरोध करे तो उनके पीछे से हिंसक तत्व सामने प्रकट हो ही जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि यह धर्म प्रचारक एक तरह से उस व्यवसायी की तरह होते हैं जो अपना सामान अच्छा बताते हैं।  हमारा मानना है कि जिस तरह किसी व्यवसायी की वस्तु को दोषपूर्ण बताया जा सकता है तो इन व्यवसायी धर्म के ठेकेदारों की वाणी से जब अपने प्रतीक पुरुष की प्रशंसा करते हैं तो कोई व्यक्ति सामने या पीछे प्रतिकूल बात भी कह सकता है।  ऐसे में उस पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाना अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने जैसा अमानवीय आचरण है।
      आपत्ति हमें इस बात पर भी है कि किसी धार्मिक पुरुष की आलोचना करना गलत है तो सवाल यह है कि आखिर समाज में धर्म के नाम पर अंधविश्वास दूर कैसे किया जाये। हर धर्म प्रचारक अपने प्रतीक पुरुष की प्रशंसा कर लोगों को बहलाते हैं तो दूसरे को भी यह हम होना चाहिये कि वह प्रतिवाद करे। इसे रोकना समाज में धर्म के नाम यथास्थितिवादी बने रहने की वह इच्छा है जिससे शिखर पुरुष अपना नियंत्रण बना रहें।
      दूसरी बात यह कि किसी धार्मिक पुरुष की निजी या उसके संदेश की आलोचना पर धार्मिक भावना भड़कने की बात कहकर किसी एक व्यक्ति पर अपराध कायम करना एक डरपोक कार्यवाही है क्योंकि हर राज्य के पास सामूहिक हिंसा रोकने की शक्ति होती है। लोग अपने धर्म को मानते हैं इसका मतलब यह नहीं है कि वह सब ज्ञानी हैं।  सच बात तो यह है कि हर धर्म के मानने वालों की संख्या बहुत हैं पर उस पर चलते कितने हैं यह सभी जानते हैं।  दरअसल इस तरह के धर्म समूह लोगों में असुरक्षा के भाव से बने हुए हैं जो समय समय सामूहिक हिंसक घटनाओं के कारण भर जाते हैं।  पूरे विश्व में ऐसी अनेक घटनायें हुईं हैं जिस कारण लोग किसी धार्मिक समूह का सदस्य बना रहना ही अच्छा समझते हैं। विश्व के अनेक देश तो कथित धार्मिक राज्य होने का स्वांग करते हैं ताकि लोगों को राजा और सर्वशक्तिमान दोनों के प्रभाव से नियंत्रित रखा जा सके।  यही कारण है कि धार्मिक प्रतीकों या संस्कारों पर टिप्पणियां करना हर कानून में वर्जित किया गया है ताकि समाज में कोई ऐसा बदलावा न आये जिससे शिखर पुरुषों का पतन हो।
      इसलिये कम से कम धर्म के नाम पर आस्थाओं को चोट पहुंचाने जैसे नारे तो अब बंद होना चाहिये।  साथ ही हम यह भी कहना चाहते हैं कि किसी भी धार्मिक प्रतीक पुरुष, चिन्ह या संस्कार पर टिप्पणी कर अपनी श्रेष्ठता दिखाने की बजाय अपने धर्म पथ पर चलकर स्वयं आनंद उठाना चाहिये।  हम अपने स्वयं के धार्मिक आचरण को देखें। यह दूसरे के धर्म पर आक्षेप करने ज्यादा बेहतर स्थिति है।


लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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