Sunday, September 6, 2015

आतंकवादी भेजकर शरणार्थी निकालना अरब देशों की योजना भी हो सकती है(atankwad bhejkar sharnaarthi nikalna arab deshon ki yojna ho sakateehai)



                                   जिस तरह अरब देशों में उथलपुथल हो रही है उससे वहां के जनसमुदाय में अन्य देशों की तरफ पलायन बढ़ रहा है। ऐसा लगता है कि राजनीतिक रूप से आर्थिक रूप से संपन्न अरब देश अपने आसपास के देशों से भयभीत होकर वहां आतंकवाद को प्रश्रम दे रहे हैं।  यमन में तो सऊदी अरब शिया मुसलमानों का वर्चस्व रोकने के लिये खुल्लखुल्ला लगा हुआ है।  सामान्य तौर से कहा जा रहा है कि अरब क्षेत्र में आईएसआईएस के आतंकवादी अभियान के कारणं तनाव है। यह मान लेते हैं पर आईएसआईएस के खैरख्वाह कौन हैं यह बात छिपा दी जाती है।  आईएसआईएस को समर्थन उन अरब देशों से मिल रहा है जो अपनी बढ़ती आबादी पर नियंत्रण नहीं कर पाये तो अपने यहां की युवाशक्ति को आतंकवाद बनाकर पड़ौसी देशों की तरफ ढकेल रहे हैं।  वहां से पलायन होकर लोग यूरोप जा रहे हैं। यह संदेह होता है कि  अरब देश अपने  धर्म के विस्तार की कोई योजना पर काम कर रहे हैं।   यूरोप के लोग इससे परेशान होकर शरणार्थियों को रोकना चाहते हैं पर उनकी मौतों के फोटो देखकर अब दरियादिली दिखाना चाहते हैं।
                                   सभी जानते है कि अरबी लोग अपना मूल धर्म कभी नहीं छोड़ सकते। यूरोप, इंग्लैंड या अमेरिका जाकर भी वह अपनी पूजा पद्धति के साथ वैसा रहन सहन भी रखना चाहते हैं जैसे अरब देश में होता है।  एक बात निश्चित है कि अरब देशों की अधिकृत सरकारों के समर्थन के बिना आईएकआईएस इतना आगे नहीं आ सकता।  महत्वपूर्ण बात यह कि विश्व के आधुनिकीकरण से अरब देशों का धर्म नफरत करता है।  अमीर शेख भले ही आधुनिक साधन उपयोग करें पर वह अपनी जनता को पशुओं से अधिक नहीं समझते।  अपने यहां जनविद्रोह की आशंकों में जीते यह लोग अपने लोग दूसरी जगह आतंकवादी और दूसरी जगह से शरणार्थी के रूप में तीसरी जगह भेजने की योजना बना सकते हैं। ताकि उनकी धार्मिक तिलिस्म बना रहे। विश्व में रणनीतिकारों को इस पर ध्यान देना चाहिये।
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Sunday, August 30, 2015

पाकिस्तान की बढ़ती परमाणु ताकत पूरी दुनियां के लिये खतरा-हिन्दी लेख(pakistani etamy power denger for all world-hindi article)

                       

                  पाकिस्तान दिन प्रतिदिन अपने पास परमाणु हथियारों की जखीरा बढ़ता जा रहा है पर लगता है  पश्चिमी देशी इसकी परवाह नहीं कर रहे। उनको लगता है कि इससे केवल भारत को ही खतरा है।  जब तक भारत झुलसेगा तक तब हम अपने को बचा लेंगे-यही उनका सोचना है। पाकिस्तान की परमाणु शक्ति बढ़ी तो भारत के लिये झेलने की हद तक खतरा है पर अमेरिका और ब्रिटेन का तो अस्तित्व ही मिट जायेगा। पाकिस्तान सरकार कहती है कि भारत हमारा सबसे बड़ा शत्रु है बाकी दुनियां उसके बयान को सच मानकर चुप न बैठ जाये।  पाकिस्तान के तीन प्रांतों में भारत के विरुद्ध शत्रुता का वैसा भाव नहीं है जैसा कि पंजाब प्रांत में है। आतंकवादियों के अड़डे बाकी तीन प्रांतों में ही है और वह तो वहां के आतंवादी दुनियां के ही शत्रु हैं। पाकिस्तान उनका जन्मदाता है पर अब उसका उन पर स्वामित्व नहीं रहा।  पाकिस्तान की सामाजिक स्थिति को धर्म की चादर में ढंकने का प्रयास व्यर्थ साबित हुआ है क्योंकि वहां जातीय और भाषाई समूहों के बीच जो भावनात्मक संघर्ष रहा है उसे मिटाया नहीं जा सका।   वहां आतंकवादी समूह जिन क्षेत्रों में उपस्थिति है वहां पाकिस्तान के नागरिक प्रशासन की पहुंच उस तरह नहीं है जैसी अगर उनके हाथ परमाणु बन आ गये तो वह भारत में उसका उपयोग करने से पहले अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप  में उसका प्रयोग कर सकते हैं। इसलिये पूरे विश्व को  पाकिस्तान के विरुद्ध सक्रिय होना चाहिये।
                                   आखिरी बात यह कि पाकिस्तान और भारत के संबंध रहस्यमय भी हैं जिनको समझने के लिये एक ऐसी अलग सोच की आवश्यकता है जो विश्व के अन्य देशों तथा समुदायों पर लागू नहीं होती।  याद रखें भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान कभी एक ही देश के रूप में थे जिसका विभाजन वैश्विक दबाव में हुआ है जिसमें यहां के लोगों की इच्छा शामिल नहीं रही।  इसलिये बाकी देशों को आरामदायक स्थिति में रहना चाहिये।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Tuesday, August 25, 2015

फरिश्ते की उम्मीद-हिन्दी कविता(farishte ki ummid-hindi poem)

अपने अपने दर्द
बयान क्यों करते हो।

हमदर्द बनना
खुद सीखा नहीं
दूसरा आकर मदद करे
यह उम्मीद क्यों करते हो।

कहें दीपक बापू दुनियां का कायदा
यही है जैसा बोओगे
वैसा काटोगे
संकीर्ण विचारों की
गली में सबकी तरह
तुम भी खुद फंसे हो
कोई फरिश्ता आकर निकाले
यह उम्मीद क्यों करते हो।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Friday, August 21, 2015

ताश और जिंदगी-हिन्दी कविता(tash aur zindagi-hindi poem)

ताश के तीन पत्ते
सामने पड़े हैं
उठाकर देखने का
विचार नहीं होता
छोटे है कि बड़े हैं।

कहें दीपक बापू ज़माने की
निगाहों का खौफ नहीं
अपनी नज़रों से गिर
जाने की चिंता है
जिंदगी के सवाल
ताश के खेल से बड़े हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Friday, August 14, 2015

आजादी और किताब के कायदे-15 अगस्त पर विशेष हिन्दी कविता(azadi aur kitab ke kayAde-Special hindi poem on 15 AUGUST)


लोगों की आजादी
कायदों की किताब में
हमेशा से बंद हैं।

आम इंसान ढूंढ रहे
अपने लिये आशियाने
अमीरों के घरों में
दुनियां का नक्शा बंद हैं।

कहें दीपक बापू गुलामों से
चल रहा है सारा व्यापार
ताकतवर मालिक
खून चूसने के पाबंद हैं,
पसीने से नहाये लोग
क्या दुआ या बद्दुआ देंगे
मजबूरियों में  जुबान बंद हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Sunday, August 9, 2015

मीडिया की बहस से अध्यात्मिक साधक परेशान न हों-हिन्दी चिंत्तन लेख(media ki bahas se adhyamik sadhak pareshan n hon-hindi thought article)

                                   हम जैसे योग तथा ज्ञानसाधक मानते हैं कि  लीलामय संत सुंदर कपड़े और गहने पहने पर उसमें उनका भाव लिप्त नहीं है तो चलेगा। कुछ संतों पर प्रचार युद्ध चल रहा है। हमारे अंदर अनेक तरक के विचार घूम रहे हैं। विवादास्पद गुरु ज्ञानी नहीं होते यह बात मीडिया वाले कैसे तय कर लेते हैं। क्या श्रीगीता का ज्ञान उन्होंने धारण कर लिया है? अनेक सवाल हमारे मन में आते हैं। हमारा तो यह भी कहना है कि आर्थिक उदारीकरण के बाद हमारे हमारे समाज में अस्थिरता आयी है जिसे मनोरोगों के साथ ही शारीरिक रूप से भी लोगों में अनेक विकार पैदा हो रहे हैं।  ऐसे में  तनाव और रोगों से घिरे समाज में मानसिक रूप से कमजोरों का सहारा बनने वाले पेशेवर संत प्रशंसायोग्य ही कहना चाहिये। उनका कमाना भी बुरा नहीं।
                                   इस विषय पर समाचर माध्यमों में जमकर बहस हो रही है पर लगता नहीं है कि धर्म के विषय पर कोई पेशेवर विद्वान  अपनी समझ का प्रदर्शन कर पा रहा है। कर्मकांडों के आधार पर तर्क गढ़ने में सभी माहिर दिखते हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान का अभाव है। मीडिया-हिन्दी समाचार चैनल- अमीर संतों के कारनामों की चर्चा के लिये समाचार और बहस के बीच इतना समय अपने विज्ञापनदाताओं की चीजें बिकवाने के लिये लगाता है। इससे अध्यात्मिक साधकों को परेशान होने की जरूरत नहीं है।
             एक योग तथा ज्ञान साधक होने के नाते हमारा मानना है कि  गीता का ज्ञान एक ऐसा चश्मा है जो अंतर्चक्षुओं पर पहनना ही चाहिये। उसे गुरु मानकर पढ़ो, समझो और फिर उसके आधार पर संसार को समझो। धर्म और धन लीला की समझ के साथ मजा भी आयेगा। मीडिया अमीर संतों के कारनामों की चर्चा के लिये समाचारा और बहस के बीच इतना समय अपने विज्ञापनदाताओं की चीजें बिकवाने के लिये लगाता है।
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Wednesday, August 5, 2015

तरक्की की हड़बड़ी-हिन्दी कविता(tarakki ki hadbadi-hindi poem)


तरक्की की हड़बड़ी में
ज़माने के लोग
नये जाल बुन रहे हैं।

सभी के अपने मकसद
दिखाने  के लिये
भलाई की चाल चुन रहे हैं।

कहें दीपक बापू भरोसे से
टूटा रिश्ता सभी का
बिखरा विश्वास कभी का
मुश्किलों में अपने ही
सिर के बाल धुन रहे हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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Saturday, August 1, 2015

समाचारों के नाम पर आतंकवाद का प्रचार न करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(not add name terrarism as isis-hindi thought article)

                लगभग आईएसआईएस नामक एक आंतकी संगठन के समाचार एक विज्ञापन की तरह भारतीय प्रचार माध्यम इस तरह कर रहे हैं जैसे कि उसमें आकाश से उतरे महादानव हों। जिनसे लड़ने के लिये कोई भारत में कोई  पैदा ही नहीं हुआ।  शायद प्रचार प्रबंधकों को लग रहा है कि कथित भारतीय आतंकी सगंठनों के दम पर अब उनकी सनसनी का व्यवसाय चल नहीं पा रहा या फिर ज्यादा नहीं चलेगा। हमारे हिसाब से आईएसआईएस अपने सहधर्मी राष्ट्र की सरकारें से संरक्षित है जो अपने आसपास के कमजोर क्षेत्रों में धार्मिक आधार पर वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। भारतीय प्रचार माध्यम उन देशों के नाम छिपाते हैं क्योंकि इनके स्वामियों के अन्य व्यवसाय उनके शहरों में ही है।
                              प्रचारकों के चेहरे अनेक बार इस तरह झल्लाते दिखते हैं अभी तक आईएसआईएस वाले इस देश में आये क्यों नहीं? दुर्भाग्य से किसी दिन इस संगठन के नाम पर कोई छोटी वारदात भी  हुए उस दिन यह विज्ञापनों के बीच  चिल्लायेंगे-आ गया आ गया आईएसआईएस आ गया। इन प्रचारकों को भारतीय आतंकी संगठन उसके मुकाबले कम क्रूर लगते हैं क्योंकि वह बम विस्फोट कर भाग जाते हैं। आईएसआईएस वाले तो क्रूरता पूर्वक हत्या का सीधा प्रसारण करते है।  भारतीय प्रचार प्रबंधक उसका सतत प्रचार इस आशा से करते लगते हैं कि भविष्य में ऐसे दृश्य यहां हो तो कुछ संवेदनाओं का व्यापार चमकदार हो जाये।  हमारी यह समझायश है कि अनावश्यक रूप से इस संगठन का प्रचार न करें। यह संगठन भारत में सक्रिय होगा या नहीं, यह कहना कठिन है पर कहीं ऐसा न हो जाये कि प्रचार पाने के लिये कुछ खरदिमाग लोग उस जैसे कांड करने लगें। हम भारतीय प्रचार माध्यमों की दो खबरों से बेहद चिढ़ते हैं। एक तो श्रीनगर में हर शुक्रवार को पाकिस्तानी झंडे फहराने दूसरा आईएसआईएस के हत्या के प्रसारण हमें बेहद चिढ़ा देते हैं। इन खबरों की भारत में चर्चा करना  एक तरह से आतंकवाद का विज्ञापन करना है।
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#आईएसआईएस (#isisi)
लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Tuesday, July 28, 2015

आम जनमानस की उपेक्षा करने वाले अंतर्जाल की ताकत समझें(aam janmanas ki upeksha karane wale social media ki takat samjhen)


                    सार्वजनिक जीवन में मानवीय संवेदनाओं से खिलवाड़ कर  सदैव लाभ उठाना खतरनाक भी हो सकता है। खासतौर से आज जब अंतर्जाल पर सामाजिक जनसंपर्क तथा प्रचार की सुविधा उपलब्ध है। अभी तक भारत के विभिन्न पेशेवर बुद्धिजीवियों ने संगठित प्रचार माध्यमों में अपने लिये खूब मलाई काटी पर अब उनके लिये परेशानियां भी बढ़ने लगी हैं-यही कारण है कि बुद्धिजीवियों का एक विशेष वर्ग अंतर्जालीय जनसंपर्क तथा प्रचार पर नियंत्रण की बात करने लगा है।
                              1993 में मुंबई में हुए धारावाहिक बम विस्फोटों का पंजाब के गुरदासपुर में हाल ही में हमले से सिवाय इसके कोई प्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं है कि दोनों घटनायें पाकिस्तान से प्रायोजित है।  बमविस्फोटों के सिलसिले में एक आरोपी को फांसी होने वाली है जिस पर कुछ बुद्धिमान लोगों ने वैसे ही प्रयास शुरु किये जैसे पहले भी करते रहे हैं। इधर उधर अपीलों में करीब तीन सौ से ज्यादा लोगों ने हस्ताक्षर किये-मानवीय आधार बताया गया। इसका कुछ सख्त लोगों ने विरोध किया। अंतर्जाल पर इनके विरुद्ध अभियान चलने लगा। इसी दौरान पंजाब के गुरदासपुर में हमला होने के बाद पूरे देश में गुस्सा फैला जो अंतर्जाल पर दिख रहा है। लगे हाथों सख्त मिजाज लोगों ने इन हस्ताक्षरकर्ता बुद्धिजीवियों पर उससे ज्यादा भड़ास निकाली।  जिन शब्दों का उपयोग हुआ वह हम लिख भी नहीं सकते। हमारे हिसाब से स्थिति तो यह बन गयी है कि इन हस्ताक्षरकर्ता बुद्धिजीवियों के हृदय भी अब यह सोचकर कांप रहे होंगे कि गुरदासपुर की घटना के बाद आतंकवाद पर उनका परंपरागत ढुलमुल रवैया जनमानस में स्वयं की खलनायक छवि स्थाई न बना दे।
                              हमने पिछले दो दिनों से ट्विटर और फेसबुक पर देखा है।  यकीनन यह लोग अभी तक अंतर्जालीय मंच को निम्न कोटि का समझते हैं शायद परवाह न करें पर कालांतर में उनको यह अनुभव हो जायेगा कि संगठित प्रचार माध्यमों से ज्यादा यह साामाजिक जनसंपर्क और प्रचार माध्यम ज्यादा शक्तिशाली है। सबसे बड़ी बात यह कि आम जनमानस के प्रति उपेक्षा का रवैया अपनाने वाले इन लोगों का इस बात का अहसास धीरे धीरे तब होने लगेगा उनके जानने वाले तकनीक लोग उन्हें अपनी छवि के बारे में बतायेंगे।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, July 25, 2015

श्रीमद्भागवत गीता का महत्व शब्दों में बयान करना संभव नहीं(shri madbhagawat geeta ka mahatva shabdon ke bayan karna sambhav nahin)


                              अनेक बार फुर्सत के क्षण मे जब इस लेखक की अपने  अंतर्जाल पर स्वरचित पाठों पर दृष्टि जाती है तो पता चलता है कि श्रीमद्भागवत गीता से संबद्ध सामग्री अन्य की तुलना में ज्यादा पाठकों को प्रभावित करती है। अनेक लोग यह दावा करते हैं कि वह अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण श्रीमद्भागवत गीता के प्रति अधिक संवदेनशील है।  अनेक लोग कहते हैं कि श्रीमद्भागवत गीता में उनकी आस्था है।  अनेक पेशेवर धार्मिक बुद्धिमान श्रीमद्भागवत गीता के संदेश सुनाकर यह प्रमाणित करते हैं कि वह समाज को सुधारने के योग्य हैं।
                              एक योग साधक तथा श्रीगीता का नियमित पाठक होने के कारण इस लेखक ने अंतर्जाल पर अनेक अध्यात्मिक पाठ लिखे  है पर श्रीगीता के महत्व का बखान करने केे लिये शब्द पर्याप्त नही होते।  हमारा मानना है कि  श्रीगीता के संदेश जो मर्म में स्थापित कर लेगा वह कभी उसके प्रति संवेदनशील नहीं होगा।  श्रीगीता जीवन जीने की कला सिखाने का वह ग्रंथ है जो व्यक्ति को मार्मिक नहीं कार्मिक बनाती है।  भावनाओं में बहने की बजाय सांसरिक विषयों के सागर से भागने की बजाय उसमें होती उथल पुथल में स्थिर खड़े रहना सिखाती है।  जिसमें श्रीगीता समा गयी वह आस्था का प्रचार नहीं करता वरन् उसका व्यक्तित्व, व्यवहार और विचार उसके ज्ञानी होने का प्रमाण देते हैं।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने संदेशों में साफ कहा है कि श्रीगीता का ज्ञान हमेशा उनके भक्तों के बीच में ही दिया जाना चाहिये।  सार्वजनिक रूप से श्रीगीता का ज्ञान बघारना यही साबित करता है कि वक्ता उसका अनुसरण नहीं कर रहा है।
                              हमारे यहां अक्सर कहा जाता है कि दूसरे की धार्मिक आस्था पर सवाल नहीं उठाना चाहिये। श्रीमद्भागवत गीता का पाठक कभी भी यह काम नहीं करेगा क्योंकि उसे यह समझाने या सिखाने की जरूरत नहीं है कि भक्त और भक्ति के प्रकारों के अनुसार चार प्रकृत्ति के लोग इस विश्व में निवास करेंगे। सच बात तो यह कि श्रीगीता विश्व का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान के सिद्धांत एक साथ मौजूद हैं।
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Monday, July 20, 2015

सच के पांव छिपाये जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता(sach ke paanv chhipaye jate hain-hindi satire poem)

हमेशा तकलीफ देने वालों की
शिकायत करना बेकार है
मसला है उन हमदर्दों का
जो नये घाव दे जाते हैं।

लुटेरों से सफाई कौन मांगता
शिकायत है उन पहरेदारों से
उनके हाथ जो खजाना दे आते हैं।

कहें दीपक बापू चमकीले पर्दे पर
झूठे किस्से बयान किया जाते
सच के पांव पीछे ले जाते हैं।
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Thursday, July 16, 2015

हिन्दी समाचार चैनल उच्च स्तर से बहुत दूर-हिन्दी चिंत्तन लेख(hindi new chainal far away form high standard-hindi thought article)


                              हमारे देश के निजी हिन्दी टीवी समाचार चैनल अभी प्रसारण के उच्च स्तर से बहुत दूर हैं। बहुत समय से सोचते रहे हैं कि हिन्दी टीवी समाचार चैनलों पर अपनी राय रखें पर लगता नहीं है कि पहले तो सही जगह बात पहुंचेगी दूसरा यह कि इसका कोई प्रभाव पड़ेगा। वैसे भी हम जैसे असंगठित लेखकों के पढ़ने वाले लोग अधिक नहीं होते हैं।  बहरहाल भारत के जितने भी राष्ट्रीय हिन्दी समाचार चैनल हैं उनमें शायद ही कोई अब लोकप्रियता की दौड़ में है।  इन चैनलों के पास समाचारों के लिये क्रिकेट, पाकिस्तान की सीमा पर गोलीबारी और चीन के ड्रोन के अलावा अगर कोई चौथी सनसनीखेज खबर होती है तो वह भारतीय समाज में कथित साप्रदायिक तनाव को इंगित करती है। इस मुद्दे पर किसी का एक कोने में दिया गया बयान पहले पूरे देश में जबरदस्ती सुनाकर फिर उस पर बहस करते हैं।
                              इन चैनलों के प्रबंधकों का यह पता होना चाहिये कि मनोरंजन के लिये बहुत सारे चैनल है।  कुछ प्रादेशिक चैनल इन राष्ट्रीय चैनलों से बेहतर समाचार प्रसारण कर रहे हैं। इन चैनलों की सबसे बुरी प्रवृत्ति यह दिखाई दे रही है कि यह न्यायपालिका पर अप्रत्यक्ष हमला करते हैं। इतना ही नहीं सरकार की कुछ अपराधियों के विरुद्ध की गयी कार्यवाही में भी मीनमेख निकालने का प्रयास करते हैं-यह जानते हुए भी कि अंततः न्यायपालिका के बिना यहां किसी को सजा नहीं दी जा सकती।  बहरहाल इन राष्ट्रीय टीवी समाचार चैनलों को यह पता होना चाहिये कि दृनियां भर की खबर लेना भी एक नशा है जिसे यह परोस नहीं पा रहे।  उन्होंने अपनी विषयों का इतना सीमित कर दिया है कि समाचारों के अनेक  नशेड़ी भी अब इनसे विरक्त होने लगे हैं।  सभी चैनल एक जैसे हैं और यह कोई नशेड़ी यह नहीं बता सकता कि उसने कौनसा समाचार किस चैनल पर सुना था।  बहसों पर तो कोई बात भी नहीं करता। इसमें दिये गये तर्क इतने प्रायोजित होते हैं कि इसमें शामिल कथित विद्वानों से बेहतर सोच तो समाचारों के नशेड़ी स्वयं अपने पास रखते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
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Saturday, July 11, 2015

धूप में बाल सफेद-हिन्दी व्यंग्य कविता(dhoop mein bal safed-hindi satire poem)

कमजोर सपने बुनकर
 झूठे वादे चुनकर
अपनी उम्र बिताते हैं।

किया नहीं किसी का भला
तना रहा हमेशा गला
सम्मानीय दिखने के लिये
अब भी इतराते हैं।

कहें दीपक बापू बड़ी उम्र से
बड़े कहलाने के लिये
मरे जाते बहुत लोग
पूरी जिंदगी अपने बाल
धूप में जो सफेद किये जाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Sunday, July 5, 2015

गरीबी शब्द आकाशीय फरिश्ते का प्रतीक-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख(garibi shabda aakshiya farishte ka prateek-hindi satire thought article)

                              ‘गरीबीशब्द अब किसी श्रेणी की बजाय किसी आकाशीय फरिश्ते  का प्रतीक लगता है।  यह फरिश्ता अपनी चादर ओढ़े विचरने वालो  लोगों की तरफ तो नहीं देखता मगर अपना नाम जपने वालों को तख्त की सीढ़ियों पर पहुंचा देता है। जो गरीब इस फरिश्ते को घर में धारण किये हैं उनकी तरफ तो देखता भी नहीं है पर जो उससे हटाने या मिटाने के नारे लगाता है उसे खूब लोकप्रियता इतनी मिल जाती है कि वह दौलत, शौहरत और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंच जाता है।
                              सामान्य इंसानों में गरीब होना अभिशाप है पर यह उन चालाक लोगों के लिये वरदान बन जाता है जो इस अभिशाप को दूर करने के लिये संघर्ष करने के नाटक रचते हैं।  हमारे देश में तो स्थिति यह है कि अगर कहीं क्रिकेट मैच में जीत पर जश्न मनाया जा रहा हो तो टीवी पर कोई भी कहता है कि ‘‘इससे क्या? पहले देश की गरीबी दूर करो।’’
                              हंसी तो तब आती है जब टीवी चैनलों पर प्रचारक खेल, क्रिकेट, कला या साहित्यक विषय पर चर्चा करते करते देश की गरीबी पर चले आते हैं।  अनेक स्वयंभू समाज सेवक जब इन बहसों के चरम पहुंचते हैं तो केवल गरीबी को दूर करना ही अपना लक्ष्य बताते हैं।
                              अभी डिजिटल इंडिया सप्ताह पर बहस चल रही थी।  यह सभी जानते हैं कि डिजिटल कार्य के लिये शिक्षित होने के साथ ही कंप्यूटर या मोबाइल होना जरूरी है। हमारे देश में करोड़ों लोग इस कार्य से जुड़ भी चुके हैं।  जब डिजिटल सप्ताह की चर्चा चल रही है तब उसके योग्य काम करने वालों की समस्याओं पर चर्चा होना चाहिये न कि उस समय गरीबी का रोना धोना होना चाहिये।  अब यह तो हो नहीं सकता कि पहले सभी को शिक्षित करने के साथ ही उनके कंप्यूटर तथा मोबाइल देने के बाद यह  सप्ताह मनाया जाये। इन टीवी चैनलों से कोई पूछे कि इस देश मेें अनेक गांवों में तो उनका कार्यक्रम भी देखने को नहीं मिलता तो क्या वह अपना प्रसारण बंद कर देंगे?
                              हमारे यह प्रगतिशील और जनवादी सोच इस कदर घुस गयी है कि किसी को विद्वान तब तक नहीं माना जाता जब तक गरीबी या गरीब का हितैषी होने का दावा कोई कर ले। इस सोच का विस्तार इस कदर है कि मजदूर को मजबूर और गरीब को भिखारी की तरह समझा जाता है।  यही कारण है कि मजदूरों को सिंहासन और गरीब को स्वर्ग दिलाने का वादा करने वाले अपना रोजगार  खूब चलाते हैं। यह अलग बात है कि आजकल मजदूर और गरीब यह समझ गये हैं कोई उनको सिंहासन तो क्या जमीन पर बैठने के लिये  चटाई और ही चलने लिये गाड़ी तो क्या साइकिल तक नहीं देगा।
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Tuesday, June 30, 2015

खुशी पैसे से ही आती है-हिन्दी व्यंग्य कविता(khushi paise se hi aatee hai-hindi satire poem)

पेड़ पौद्यों से होता है
स्वच्छ वातावरण
मगर दिल में खुशहाली
पैसे से ही आती है।

अच्छी बातों से 
नहीं भरता पेट
रोटी पैसे से ही आती है।

कहें दीपक बापू गुड़ नहीं  देते
मगर उस जैसी बात
कहने का जिम्मा भी नहीं लेते
इतनी ताकत उनमे
पैसे से ही आती है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Thursday, June 25, 2015

जिंदगी का दर्शन-हिन्दी कविता(zindagi ka darshan-hindi poem)

सफर में ढेर सारे
वादे करते रहो
मंजिल पाते ही भूल जाओ।

पीछे छूटे हमराही
सवाल करने नहीं आते
अपने मुख से निकले शब्द
दिल के न शूल बनाओ।

कहें दीपक बापू जिंदगी का दर्शन
जो समझा वह तर गये
फरेबों की सौगात बांटी
उनके घर दौलत से भर गये
सच की राह कांटो से भरी है
झूठ के पैर नहीं होते
साथ लेते उनके पांव
जमीन पर नहीं होते
तुम भी चाहो उसकी
गोद मे झूल जाओ।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Friday, June 19, 2015

खंडहर हो चुके ख्याल-हिन्दी कविता(khandahar ho chuke khayal-hindi poem)


पुरानी किताबों में लिखे
शब्दों के अर्थ का व्यापार
वह चमका रहे हैं।

स्वर्ग का सौदा करते
बंदों में सर्वशक्तिमान के दलाल बनकर
 नरक के भय से
वह धमका रहे हैं।

कहें दीपक बापू सांसों से
लड़खड़ाते बूढ़े हो चुके चेहरे
इंसानों में पुराने होने के भय से
खंडहर हो चुके ख्यालों को
नया कहकर चमका रहे हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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Saturday, June 13, 2015

कूड़े पर क्षणिकायें(short poem on kuda)

सर्वशक्तिमान के दरबार में
अब वह हाजिरी नहीं लगायेंगे,
कूड़े के इर्द गिर्द झाड़ू 
झंडे की तरह लहराकर
प्रतिष्ठा का दान पाकर
शिखर पर चढ़ जायेंगे।
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शहर में कचरा बहुत
उम्मीद है कोई तो आकर
उसे हटायेगा।
कभी अभियान चलेगा
स्वच्छता का
कोई तो झाड़ू झंडे की तरह
लहराता आयेगा।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
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