Monday, July 20, 2015

सच के पांव छिपाये जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता(sach ke paanv chhipaye jate hain-hindi satire poem)

हमेशा तकलीफ देने वालों की
शिकायत करना बेकार है
मसला है उन हमदर्दों का
जो नये घाव दे जाते हैं।

लुटेरों से सफाई कौन मांगता
शिकायत है उन पहरेदारों से
उनके हाथ जो खजाना दे आते हैं।

कहें दीपक बापू चमकीले पर्दे पर
झूठे किस्से बयान किया जाते
सच के पांव पीछे ले जाते हैं।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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