Monday, January 18, 2016

घृणा की राह प्रेम की चाह-हिन्दी कविता-(Grana ki rah prem ki chah-Hindi Kavita)

घृणा की राह पर
बिना प्रयास चलना
एकदम सहज होता है।

प्रेम की चाह पर
जब परीक्षा का समय आता
त्याग असहज होता है।

कहें दीपकबापू हृदय के भाव में
बहता हुआ आदमी
कुछ तय नहीं कर पाता
खुशी या हादसा
नतीजा महज होता है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप
लश्करग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak 'Bharatdeep',Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com


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